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जैनेन्द्र कुमार — त्यागपत्र notes

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जैनेन्द्र कुमार — त्यागपत्र is a topic in Hindi novel (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

जैनेन्द्र कुमार का उपन्यास त्यागपत्र है। संस्करण सेतु प्रकाशन का है। पूरी कृति पढ़नी है, अंश नहीं। प्रकाशन 1937। तीसरा उपन्यास — परख 1929, सुनीता 1935 के…

इकाई 3 · जैनेन्द्र कुमार — त्यागपत्र

जैनेन्द्र कुमार का उपन्यास त्यागपत्र है। संस्करण सेतु प्रकाशन का है। पूरी कृति पढ़नी है, अंश नहीं। प्रकाशन 1937। तीसरा उपन्यास — परख 1929, सुनीता 1935 के बाद। रूप लघु मनोवैज्ञानिक उपन्यास है। वाचक उत्तम पुरुष है — प्रमोद, मृणाल का भतीजा, बाद में न्यायाधीश। केंद्र मृणाल का निर्णय और समाज की दृष्टि है। घटना पतली है, द्वंद्व घना है। पाजेब 1942 की कहानी है, यह कृति नहीं। अज्ञेय का शेखर उत्तम पुरुष है, यह कृति नहीं। रंगभूमि सर्वज्ञ वाचक है, यह मन का उपन्यास है। राजेंद्र यादव संवेदना व्यक्ति पर देखते हैं। रामदरश मिश्र प्रेमचंदोत्तर को मन का सोपान कहते हैं।

सार: त्यागपत्र 1937, जैनेन्द्र, लघु उपन्यास। नायिका मृणाल। वाचक प्रमोद। शीर्षक = न्यायाधीश-पद का त्याग + मृणाल का दावा छोड़ना। पाजेब कहानी अलग। सुनीता अलग कृति।

1 जैनेन्द्र — परिचय और यह कृति

जैनेन्द्र कुमार का जन्म 2 जनवरी 1905, कौड़ियागंज, अलीगढ़। बचपन का नाम आनंदीलाल। निधन 24 दिसंबर 1988। प्रारंभिक शिक्षा हस्तिनापुर के गुरुकुल में। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की पढ़ाई 1921 में छोड़कर असहयोग में आए। पद्म भूषण 1971। साहित्य अकादमी 1979 — उपन्यास मुक्तिबोध पर; वह निर्धारित नहीं। हिन्दी उपन्यास में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक माने जाते हैं। प्रेमचंद का विलोम नहीं, पूरक हैं — बाहर का समाज प्रेमचंद, भीतर का निर्णय जैनेन्द्र। भाषा खड़ी बोली; वाक्य छोटे, विचार घने। अज्ञेय का गद्य इसी तोड़-फोड़ के बाद संभव कहा जाता है।

उपन्यास-पंक्ति परख, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी है। त्यागपत्र शिखर-नाम है, पहला उपन्यास नहीं। कहानी-संग्रह फाँसी, पाजेब। पाजेब कहानी अलग है। तपोभूमि सह-लेखन है, यह कृति नहीं। दृष्टि अंतर्मन, नैतिक द्वंद्व, नारी-प्रतिक्रिया है। घटना-संघटना पर बल कम है। पात्र कम हैं। सीमा दुरुहता और समाज-कटान का आक्षेप है। गुण चरित्र का गहरा होना है।

दृष्टि अंतर्मन, नैतिक द्वंद्व, नारी-प्रतिक्रिया है। घटना-संघटना पर बल कम है। पात्र कम हैं। प्रेमचंद बाहर का समाज दिखाते हैं; जैनेन्द्र भीतर का निर्णय। अज्ञेय का गद्य इसी तोड़-फोड़ के बाद संभव कहा जाता है। सेतु प्रकाशन का संस्करण पाठ्यक्रम में है। साहित्य अकादमी 1979 उपन्यास मुक्तिबोध पर है; मुक्तिबोध कवि गजानन माधव अलग नाम हैं।

संकेततथ्य
जन्म–निधन1905, कौड़ियागंज — 1988
बचपनआनंदीलाल
त्यागपत्र1937; तीसरा उपन्यास; मृणाल-प्रमोद
नहीं मिलाएँपाजेब कहानी; सुनीता; मुक्तिबोध कवि

2 नाम, वर्ष और स्वरूप

त्यागपत्र नाम दो अर्थ बाँधता है। पहला — प्रमोद न्यायाधीश पद से पत्र देकर हटता है; यह प्रायश्चित्त है। दूसरा — मृणाल समाज की दावेदारी छोड़ती है; वह वापस लेने का हाथ नहीं पकड़ती। पत्र लिखित निर्णय है, केवल भाव नहीं। वर्ष 1937 है। रूप लघु उपन्यास है — आकार छोटा, प्रश्न चौड़ा। सामाजिक उपन्यास पूरा नहीं; समाज दबाव है, कथा मन की है। आंचलिक नहीं। राजनीतिक नहीं। ऐतिहासिक नहीं। मनोवैज्ञानिक उपन्यास का प्रतिनिधि यही कृति है। वाचक उत्तम पुरुष है। लुबॉक की भाषा में दृष्टि सीमित-व्यक्तिगत है, सर्वज्ञ नहीं।

गोदान 1936 के एक वर्ष बाद आता है। प्रेमचंद का शिखर किसान-ऋण है; यह शिखर निर्णय-मन है। सुनीता 1935 नारी और आकर्षण का दूसरा प्रयोग है, कथा अलग है। कल्याणी 1939 आगे की कृति है। स्वरूप तीन प्रश्नों से कटता है। कथा किस आँख से कही गई — प्रमोद की। नायक कौन है — मृणाल का जीवन, प्रमोद की स्मृति। अंत क्या है — पद का त्याग, मृणाल की मृत्यु। बिना पद-त्याग के नाम अधूरा रहता है।

नाम दो अर्थ बाँधता है — प्रमोद का पद-त्याग और मृणाल का दावा छोड़ना। पत्र लिखित निर्णय है। रूप लघु उपन्यास है। सामाजिक पूरा नहीं; समाज दबाव है, कथा मन की है। लुबॉक की भाषा में दृष्टि सीमित-व्यक्तिगत है, सर्वज्ञ नहीं। सेतु प्रकाशन का संस्करण पाठ्यक्रम में है।

पदअर्थ
त्यागदावा, पद, सहानुभूति का इंकार
पत्रलिखित निर्णय; न्यायाधीश-पद छूटना
वर्ष1937
वाचकउत्तम पुरुष; प्रमोद

3 वाचक — प्रमोद

प्रमोद मृणाल से पाँच वर्ष छोटा भतीजा है। कथा उसकी आँख से चलती है। बचपन, कालेज, वकालत, न्यायाधीश — ये परतें उसी स्मृति में हैं। वह मृणाल की पीड़ा समझता है। सर्वस्व लगाकर दुर्भाग्य पलटना चाहता है, पर कृपा अस्वीकृत हो जाती है। दुविधा पीछे खींचती है — पद, प्रतिष्ठा, सामाजिक दृष्टि। कुछ पाठ उसे एम. दयाल की आत्मकथा-ढाँचे से पढ़ते हैं; पहचान प्रमोद है। उत्तम पुरुष सहानुभूति भी देता है, बचाव भी करता है। वह निष्पक्ष दर्शक नहीं।

शिल्प यहीं बैठता है। सर्वज्ञ वाचक सूरदास के पक्ष में झुकता है। यह वाचक अपने मन को भी छिपाता है। आलोचना उसे स्वार्थ और करुणा का मिश्रण कहती है। अंत में अंतिम अवस्था आंदोलित करती है; त्यागपत्र प्रायश्चित्त बनता है। नायक मृणाल है; वाचक प्रमोद है। दोनों को एक कहना अधूरा है। शेखर एक जीवनी का मैं चेतना की परत है; यह मैं स्मृति और अपराध-बोध है। बिना वाचक के शिल्प अधूरा है।

प्रमोद पाँच वर्ष छोटा भतीजा है। बचपन, कालेज, वकालत, न्यायाधीश — परतें स्मृति में हैं। वह मृणाल की पीड़ा समझता है, सर्वस्व लगाकर दुर्भाग्य पलटना चाहता है, कृपा अस्वीकृत हो जाती है। दुविधा पीछे खींचती है — पद, प्रतिष्ठा। उत्तम पुरुष सहानुभूति भी देता है, बचाव भी करता है। निष्पक्ष दर्शक नहीं।

4 कथा का सूत्र

मृणाल के माता-पिता नहीं रहे। पालन बड़े भाई के यहाँ है। भाभी कठोर अनुशासन रखती है — आदर्श नारी बनाना लक्ष्य है। प्रमोद भतीजा है। कालेज में मृणाल की सहेली शीला है। शीला के भाई से प्रेम खुलता है। भाभी दंड देती है। विवाह अधेड़, पूर्व-विवाहित पुरुष से कर दिया जाता है। मृणाल पति से पूर्व-प्रेम कह देती है — सत्य का दावा। पति निकाल देता है। एक कोयला-व्यापारी अनुरक्त होकर साथ लेता है, फिर छोड़ देता है। अस्पताल में कन्या जन्म लेती है; कुछ मास बाद मर जाती है।

मृणाल तथाकथित सभ्य वृत्त से कटकर निम्न बस्ती में पहुँचती है। बच्चों को पढ़ाती भी है। रोग और कष्ट अंत तक रहते हैं। प्रमोद ले जाना चाहता है; वह इंकार करती है। मृत्यु पीड़ा में होती है। प्रमोद न्यायाधीश पद से त्यागपत्र देता है। कथानक का कारण समाज की दृष्टि और मृणाल का सत्य है, संयोग नहीं। फॉर्स्टर क्रम और कारण कहते हैं। क्रम घटनाओं का है; कारण दृष्टि का है।

शीर्षक पद-त्याग और दावा-त्याग दोनों है। घटना पतली है, द्वंद्व घना है। फॉर्स्टर क्रम घटनाओं का कहते हैं; कारण दृष्टि का है। रंगभूमि दीर्घ सामाजिक चित्र है; यह लघु स्मृति है। भाव और प्रसंग लिखे जाते हैं, पूरी पंक्ति नहीं उतारी जाती। बिना इंकार के त्यागपत्र केवल दुखांत रह जाता है। बिना प्रमोद के शीर्षक पद-त्याग खो देता है।

5 मृणाल

मृणाल गोल चरित्र है। गुण सत्य, आत्मदान, इंकार, सहन हैं। वह समाज तोड़ना नहीं चाहती; अलग होकर टूटती है। पति-धर्म मानती है; पति उसे छोड़ता है। ससुराल से कटे तो मायके का दावा भी नहीं रखती। सहानुभूति लेती नहीं। प्रमोद का हाथ ठुकराती है। आलोचना आत्मदान में मुक्ति पढ़ती है। सीमा यह कि पीड़ा कभी विद्रोह नहीं बनती; व्यवस्था ज्यों की त्यों रहती है। गुण यह कि नारी दया का उपकरण नहीं, निर्णय की कर्ता है।

सेवासदन की सुमन नगर-नैतिकता है। सोफिया धर्म-संकर प्रेम है। मृणाल मन और मर्यादा के बीच है। सुनीता आकर्षण का दूसरा प्रयोग है, यह जीवन नहीं। अंधी दया उसे छोटा करती है। वह पतित ठहराई जाती है; वाचक उसे भीतर से शुद्ध दिखाता है। शरीर की तथाकथित पवित्रता और मन की पवित्रता अलग तराजू पर हैं। बिना निर्णय के चरित्र अधूरा है। बिना समाज की दृष्टि के चरित्र अधूरा है।

आलोचना आत्मदान में मुक्ति पढ़ती है। सीमा यह कि पीड़ा कभी विद्रोह नहीं बनती; व्यवस्था ज्यों की त्यों रहती है। गुण यह कि नारी दया का उपकरण नहीं, निर्णय की कर्ता है। पति-धर्म मानती है; पति उसे छोड़ता है। ससुराल से कटे तो मायके का दावा भी नहीं रखती। बिना इंकार के गोल चरित्र सपाट करुण रह जाता है। सुनीता आकर्षण का दूसरा प्रयोग है, यह जीवन नहीं।

सूत्रमृणाल
संबंधप्रमोद की बुआ
कर्मसत्य कहना; दावा न पकड़ना
अंतइंकार; मृत्यु; प्रमोद का पद-त्याग
नहींसुनीता; सोफिया; सुमन

6 प्रमोद का द्वंद्व

प्रमोद करुण है, मुक्त नहीं। वह समझता है, करता कम है। पद और प्रतिष्ठा पीछे खींचते हैं। मृणाल की ओर से स्वयं को भुलावे में रखता है — आलोचना यही कहती है। अंतिम अवस्था तक आंदोलन भीतर ही रहता है। त्यागपत्र बाहर का कर्म है, देर से। द्वंद्व तीन हैं — नेह बनाम मर्यादा, कर्म बनाम डर, न्याय का पद बनाम न्याय का अर्थ। न्यायाधीश कानून चलाता है; बुआ के सामने कानून अधूरा पड़ जाता है।

विनय सिंह आवेश में प्राण देते हैं। प्रमोद पत्र से पद देते हैं। दोनों करुण हैं; मार्ग अलग है। सूरदास इंकार सार्वजनिक है। प्रमोद का इंकार देर का प्रायश्चित्त है। चरित्र सपाट खल नहीं। वह रक्षक बनना चाहता है, बन नहीं पाता। मनोविज्ञान यहीं है — इच्छा और आचरण का अंतर। बिना इस अंतर के प्रमोद केवल रिश्तेदार रह जाता है।

शीर्षक न्यायाधीश-पद का त्याग भी है, मृणाल का दावा छोड़ना भी है। आलोचना प्रमोद को भुलावे में रखती हुई कहती है। अंतिम अवस्था तक आंदोलन भीतर ही रहता है। राजेंद्र यादव व्यक्ति की संवेदना यहीं देखते हैं। बिना पद-त्याग के द्वंद्व केवल नेह रह जाता है। कानून बुआ के सामने अधूरा पड़ जाता है।

7 शीला, पति, कोयला-व्यापारी

शीला सहेली है। उसका भाई पहला प्रेम है। प्रेम खुलना दंड बनता है। पति अधेड़ है, पूर्व-विवाह का बोझ रखता है। सत्य सुनकर निकालता है। कोयला-व्यापारी रक्षा और अनुरक्ति दोनों लाता है; फिर संपत्ति और साथ दोनों छीनता है। तीन पुरुष तीन दृष्टि हैं — अस्थायी प्रेम नहीं, तीन दबाव। भाभी अनुशासन है। ये सपाट सहायक हैं; कथा मोड़ते हैं, गहराई मृणाल-प्रमोद में है।

नायक आधुनिक उपन्यास में देवता नहीं। खलनायक एकआयामी दैत्य भी नहीं। पति भय और मर्यादा है। व्यापारी लोभ है। प्रमोद नेह और डर है। सहायक पात्र नाम की सूची न रह जाएँ। देशकाल मध्यवर्गीय परिवार, विवाह, अस्पताल, बस्ती है। गोदान का गाँव नहीं। पांडेपुर की बस्ती उद्योग की है; यह बस्ती मर्यादा से गिरी हुई कही जाती है। वैषम्य यहीं लिखा जाता है।

तीन पुरुष तीन दृष्टि हैं — अस्थायी प्रेम नहीं, तीन दबाव। भाभी अनुशासन है, आदर्श नारी बनाना लक्ष्य है। नायक देवता नहीं। खलनायक एकआयामी दैत्य भी नहीं। पति भय और मर्यादा है। व्यापारी लोभ है। प्रमोद नेह और डर है। देशकाल मध्यवर्गीय परिवार, विवाह, अस्पताल, बस्ती है। गोदान का गाँव नहीं। पांडेपुर की बस्ती उद्योग की है; यह बस्ती मर्यादा से गिरी हुई कही जाती है। वैषम्य यहीं लिखा जाता है।

8 समाज, पवित्रता, विवाह

समाज आदर्श स्त्री माँगता है। शिक्षा, प्रेम, सत्य — तीनों दंड बन सकते हैं। विवाह संस्था सम्मानित है, कमजोर भी दिखाई गई है। पवित्रता शरीर पर नापी जाती है; मृणाल मन पर नापती है। तथाकथित शिष्ट वृत्त छल रख सकता है; तिरस्कृत बस्ती छल नहीं छिपाती — यही व्यंग्य है, नारा नहीं। नारी-प्रश्न आलंबन का है: मृणाल वाचक नहीं, केंद्र है। वाचक पुरुष है; अनुभव स्त्री का है। यह तनाव शिल्प का अंग है।

सेवासदन इज्जत और वेश्या-प्रश्न है। महाभोज सत्ता है। त्यागपत्र मर्यादा और निर्णय है। तीनों स्त्री को छूते हैं, मार्ग अलग हैं। दलित गवाही यह उपन्यास नहीं; जाति-नाम सूरदास जैसा केंद्र नहीं। प्रश्न नैतिक दृष्टि का है। सीमा यह कि व्यवस्था का ढाँचा नहीं टूटता, व्यक्ति टूटता है। गुण यह कि प्रश्न व्यक्ति के भीतर तक जाता है।

विवाह संस्था सम्मानित है, कमजोर भी दिखाई गई है। पवित्रता शरीर पर नापी जाती है; मृणाल मन पर नापती है। वाचक पुरुष है; अनुभव स्त्री का है। तथाकथित शिष्ट वृत्त छल रख सकता है; तिरस्कृत बस्ती छल नहीं छिपाती — यही व्यंग्य है, नारा नहीं। शिक्षा, प्रेम, सत्य — तीनों दंड बन सकते हैं।

9 नारी-प्रश्न — आलंबन और निर्णय

नारी-प्रश्न पूछता है कि स्त्री वस्तु है या कर्ता। मृणाल पीटा जाता है, ब्याही जाती है, निकाली जाती है — वस्तु जैसी घटनाएँ हैं। सत्य कहना, इंकार करना, न लौटना — कर्ता के कर्म हैं। आत्मदान विद्रोह का नारा नहीं; अलग होकर टूटना है। आलोचना कभी इसे व्यवस्था-समर्थन पढ़ती है। बचाव यह है कि चित्र व्यवस्था की क्रूरता बिना उपदेश के दिखाता है। उपदेश वाचक पर सवार हो तो उपन्यास कमजोर पड़ता है; यहाँ चित्र कठोर है।

मन्नू भंडारी बाद की वाचक-स्त्री हैं। कृष्णा सोबती स्मृति हैं। जैनेन्द्र 1937 में पुरुष-वाचक से स्त्री-केंद्र चलाते हैं। यह सीमा भी है, प्रयोग भी है। दिव्यांग विमर्श सूरदास का है, यह कृति नहीं। स्त्री-स्वर का अर्थ केवल लेखिका होना नहीं; आलंबन का अधिकार भी है। पहचान यही है — मृणाल कर्ता है, केवल करुण दृश्य नहीं।

आत्मदान विद्रोह का नारा नहीं; अलग होकर टूटना है। आलोचना कभी इसे व्यवस्था-समर्थन पढ़ती है। बचाव यह है कि चित्र व्यवस्था की क्रूरता बिना उपदेश के दिखाता है। उपदेश वाचक पर सवार हो तो उपन्यास कमजोर पड़ता है; यहाँ चित्र कठोर है। पीटा जाना वस्तु जैसी घटना है; सत्य कहना कर्ता का कर्म है।

10 शिल्प — दृष्टि, संरचना, तत्त्व

शिल्प उत्तम पुरुष है। स्मृति आगे-पीछे मोड़ती है। घटना कम, प्रतिक्रिया अधिक। संवाद विचार का है, बोलचाल का ढेर नहीं। देशकाल पृष्ठ नहीं, दृष्टि का दबाव है। कथावस्तु कारण से बँधी है — दृष्टि दंड देती है, संयोग नहीं। चरित्र दो गोल हैं — मृणाल, प्रमोद। उद्देश्य चित्रण और नैतिक प्रश्न है। लुबॉक दृष्टि को केंद्र कहते हैं। नामवर नए उपन्यास के शिल्प पर बोलते हैं; जैनेन्द्र उसी मोड़ के आरंभ हैं।

रंगभूमि दो सूत्र और सर्वज्ञ टिप्पणी है। यह एक स्मृति और एक द्वंद्व है। चेतना-प्रवाह पूरा धारा नहीं; संकेत और दमित इच्छा हैं। आत्मकथा-ढाँचा बाणभट्ट की आत्मकथा में संस्कृति है; यहाँ अपराध-बोध है। सीमा दुरुहता है। गुण यह कि हिन्दी उपन्यास को भीतर की आँख मिली। तत्त्व बिना शिल्प के ढेर हैं; शिल्प बिना मृणाल के प्रयोग है।

छह तत्त्व लघु आकार में सिमटते हैं — कथावस्तु कारण, चरित्र दो गोल, कथोपकथन विचार, देशकाल दृष्टि का दबाव, भाषा तराश, उद्देश्य नैतिक प्रश्न। नामवर नए उपन्यास के शिल्प पर बोलते हैं; जैनेन्द्र उसी मोड़ के आरंभ हैं। गोपाल राय शिल्प को शरीर-विधान कहते हैं; त्यागपत्र का शरीर लघु स्मृति है, कारखाना-विस्तार नहीं।

अंगत्यागपत्र
वाचकउत्तम पुरुष; प्रमोद
संरचनास्मृति; लघु आकार
भाषाखड़ी बोली; विचार-संवाद
रसकरुण; शांत-विषण्ण

11 भाषा और शैली

भाषा खड़ी बोली है। वाक्य छोटे हैं। प्रश्न वाक्य भीतर के द्वंद्व खोलते हैं। संस्कृत-गर्भ कम है, विचार-भार अधिक है। प्रेमचंद का संवाद बोलचाल का है; यह संवाद नैतिक तर्क का है। रेणु आंचल-शब्द लाते हैं; यहाँ आंचल नहीं। व्यंग्य राग दरबारी जैसा प्रशासनिक नहीं; दृष्टि का व्यंग्य है। शैली आत्मकथा-कथन की है, डायरी नहीं। बिना उदाहरण के भाषा सूखी रहती है; उदाहरण कृति के मोड़ हैं, लंबे उद्धरण नहीं।

जैनेन्द्र गद्य को तराशते हैं। अज्ञेय इसी तराश के बाद व्यक्ति-बिंब चलाते हैं। सीमा यह कि दुरुहता पाठक काट सकती है। गुण पारदर्शिता और नया वाक्य-क्रम है। भाव और प्रसंग लिखे जाते हैं, पूरी पंक्ति नहीं उतारी जाती।

शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; यह गद्य उसी चिह्न की भीतर की शाखा है। प्रेमचंद का संवाद बाजार और खेत तक जाता है; यह संवाद कमरे और स्मृति तक जाता है। रेणु गीत और बोली लाते हैं; यहाँ आंचल नहीं। व्यंग्य राग दरबारी जैसा कार्यालय नहीं; दृष्टि का व्यंग्य है। शैली आत्मकथा-कथन की है, डायरी नहीं। सेतु का संस्करण पाठ्यक्रम में है; रूप उपन्यास है, कहानी-संग्रह नहीं।

12 प्रेमचंद से अंतर, सुनीता से अंतर

साम्य खड़ी बोली, आधुनिक मनुष्य, तिलिस्म से कटान है। वैषम्य आलंबन पर है। प्रेमचंद बाहर का कारण दिखाते हैं — ऋण, कारखाना, गोली। जैनेन्द्र भीतर का कारण दिखाते हैं — दृष्टि, द्वंद्व, इंकार। वाचक सर्वज्ञ बनाम उत्तम पुरुष। नायक सूरदास सार्वजनिक है; मृणाल निजी सत्य सार्वजनिक दंड पाती है। रंगभूमि दीर्घ है; त्यागपत्र लघु है। गोदान किसान है; यह नगर-परिवार की नैतिकता है।

सुनीता 1935 आकर्षण, दांपत्य और निर्णय का दूसरा प्रयोग है। नायिका सुनीता है, मृणाल नहीं। परख 1929 पहला बड़ा उपन्यास है। कल्याणी 1939 आगे है। पाजेब कहानी है। मुक्तिबोध कवि गजानन माधव हैं; जैनेन्द्र का उपन्यास मुक्तिबोध अलग कृति है, निर्धारित नहीं। अंतर नाम और रूप दोनों पर है।

शेखर एक जीवनी उत्तम पुरुष है, चेतना की परत अलग है। रंगभूमि दीर्घ सामाजिक चित्र है; यह लघु नैतिक स्मृति है। गोदान किसान है; यह नगर-परिवार की नैतिकता है। वाचक सर्वज्ञ बनाम उत्तम पुरुष — यही शिल्प का वैषम्य है। साम्य खड़ी बोली, आधुनिक मनुष्य, तिलिस्म से कटान है। बिना मृणाल के अंतर नामों की सूची रह जाता है।

13 महत्त्व और सीमा

महत्त्व तीन हैं। पहला — हिन्दी का स्थिर मनोवैज्ञानिक उपन्यास। दूसरा — उत्तम पुरुष वाचक। तीसरा — नारी को कर्ता बनाना, केवल करुण दृश्य नहीं। 1937 में यह मोड़ प्रेमचंदोत्तर को खोलता है। अज्ञेय, जोशी आगे की पंक्ति हैं। राष्ट्रीय आंदोलन कथा का केंद्र नहीं; व्यक्ति का सत्य केंद्र है। यही पूरक होना है, शत्रु होना नहीं।

सीमाएँ साफ हैं। आकार छोटा, समाज की चौड़ाई कम। दुरुहता। पुरुष-वाचक स्त्री-केंद्र पर। व्यवस्था नहीं टूटती। आत्मदान को मुक्ति कहना विवाद है। फिर भी कृति इन्हीं सीमाओं के बावजूद टिकती है — मृणाल, प्रमोद, 1937, पद-त्याग।

रामदरश मिश्र प्रेमचंदोत्तर को मन का सोपान कहते हैं। राजेंद्र यादव संवेदना व्यक्ति पर देखते हैं। राष्ट्रीय आंदोलन कथा का केंद्र नहीं; व्यक्ति का सत्य केंद्र है। यही पूरक होना है, शत्रु होना नहीं। पाजेब कहानी अलग है। सुनीता अलग कृति है। मुक्तिबोध कवि अलग हैं। बिना इन निषेधों के महत्त्व अधूरा है।

सार: जैनेन्द्र 1905–1988, कौड़ियागंज। त्यागपत्र 1937, मृणाल, प्रमोद, उत्तम पुरुष। शीर्षक पद-त्याग है। पाजेब कहानी अलग। सुनीता अलग। मुक्तिबोध कवि अलग।

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