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उपन्यास का शास्त्र और हिन्दी उपन्यास का इतिहास notes
Readyउपन्यास का शास्त्र और हिन्दी उपन्यास का इतिहास is a topic in Hindi novel (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.
तीन विषय हैं। पहला — अर्थ, परिभाषा, स्वरूप, तत्त्व और शिल्प। दूसरा — हिन्दी उपन्यास का उद्भव, विकास और सोपान। तीसरा — प्रमुख उपन्यासकारों का सामान्य…
इकाई 1 · उपन्यास का शास्त्र और हिन्दी उपन्यास का इतिहास
तीन विषय हैं। पहला — अर्थ, परिभाषा, स्वरूप, तत्त्व और शिल्प। दूसरा — हिन्दी उपन्यास का उद्भव, विकास और सोपान। तीसरा — प्रमुख उपन्यासकारों का सामान्य परिचय। आचार्य रामचंद्र शुक्ल गद्य के आविर्भाव को आधुनिक काल का चिह्न कहते हैं। उपन्यास उसी गद्य का सबसे बड़ा कथा-रूप है। गोपाल राय हिन्दी उपन्यास का इतिहास लिखते हैं। नगेन्द्र रूप और तत्त्व बाँधते हैं।
आधार गोपाल राय का उपन्यास का शिल्प; शंभुनाथ मिश्र का उपन्यास एवं हिन्दी आलोचना; राजेंद्र यादव का उपन्यास: स्वरूप और संवेदना; रामदरश मिश्र की हिन्दी उपन्यास: एक अंतर्यात्रा; चंद्रकांत बांदिवडेकर का उपन्यास: स्थिति और गति; रैल्फ फॉक्स का उपन्यास और लोकजीवन (अनुवाद नरोत्तम नागर); डॉ. प्रियदर्शिनी का हिन्दी उपन्यास; नवलकिशोर का मानववाद और आधुनिक हिन्दी उपन्यास पर लेखन। प्रेमचंद, जैनेन्द्र, द्विवेदी और मन्नू भंडारी इसी इतिहास के शिखर-नाम हैं।
1 उपन्यास — अर्थ और परिभाषा
उपन्यास गद्य का दीर्घ कथा-रूप है। उसमें जीवन का विस्तार है और चरित्र का विकास है। कहानी एक घटना या एक प्रभाव पर सिमटती है। उपन्यास समय, संबंध और समाज को फैलाता है। अंग्रेज़ी novel से यह रूप आधुनिक भारत में आया। बंगला और अंग्रेज़ी अनुवाद ने मार्ग दिखाया। हिन्दी ने उसे अपनी भाषा और अपने प्रश्न दिए। नगेन्द्र उपन्यास को गद्य में लिखा वह कथा-रूप कहते हैं जिसमें मानव-जीवन का व्यापक चित्र हो। गोपाल राय उसे आधुनिक मध्यवर्ग का प्रधान कथा-माध्यम मानते हैं। शुक्ल गद्य-साहित्य में उपन्यास को नया उत्कर्ष कहते हैं। पर्सी लुबॉक दृष्टि को शिल्प का केंद्र कहते हैं। ई.एम. फॉर्स्टर कथा और कथानक अलग करते हैं — कथा क्रम है, कथानक कारण है।
परिभाषा तीन बिंदुओं पर बैठती है। रूप गद्य है, पद्यात्मक महाकाव्य नहीं। विस्तार मध्यम या दीर्घ है; एक बैठक की कहानी नहीं। केंद्र मनुष्य है — उसका कर्म, द्वंद्व, वर्ग और मन। उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं; चित्रण, मूल्यांकन और प्रश्न भी हैं। तिलिस्मी उपन्यास मनोरंजन प्रधान रहा। प्रेमचंद ने उसे समाज का प्रश्न बनाया। जैनेन्द्र ने मन का प्रश्न बनाया। रेणु ने आंचल का चित्र बनाया। बिना परिभाषा के इतिहास नामों की सूची रह जाता है। बिना इतिहास के परिभाषा सूखी रहती है।
शंभुनाथ मिश्र आलोचना से उपन्यास को बाँधते हैं। राजेंद्र यादव स्वरूप और संवेदना साथ देखते हैं — रूप खाली साँचा नहीं, अनुभव का रंग भी है। रामदरश मिश्र अंतर्यात्रा कहते हैं — प्रत्येक सोपान पिछली यात्रा का निषेध और ग्रहण दोनों है। फॉक्स लोकजीवन से उपन्यास को जोड़ते हैं। गलत वाक्य: उपन्यास केवल लंबी कहानी है। सही वाक्य: उपन्यास गद्य का वह दीर्घ कथा-रूप है जिसमें जीवन फैलता है और चरित्र बदलता है।
| आलोचक | सूत्र |
|---|---|
| शुक्ल | गद्य का नया उत्कर्ष; आधुनिक काल का चिह्न |
| नगेन्द्र | व्यापक जीवन-चित्र; गद्य-कथा |
| गोपाल राय | हिन्दी उपन्यास का इतिहास; सोपान |
| फॉर्स्टर | कथा = क्रम; कथानक = कारण |
2 स्वरूप — कहानी, महाकाव्य, नाटक से अंतर
स्वरूप पूछता है कि उपन्यास कौन-सा कथा-शरीर है। कहानी से अंतर विस्तार और प्रभाव पर है। कहानी एक बिंदु पर चोट करती है। उपन्यास कई बिंदु जोड़ता है। पात्र कहानी में संकेत रहते हैं; उपन्यास में बदलते हैं। देशकाल कहानी में पृष्ठ है; उपन्यास में दबाव है। महाकाव्य से अंतर भाषा और नायक पर है। महाकाव्य पद्य है, उदात्त नायक और संस्कृति-प्रश्न का। उपन्यास गद्य है, साधारण मनुष्य का। साकेत और कामायनी महाकाव्य हैं। गोदान उपन्यास है। नाटक से अंतर प्रदर्शन पर है। नाटक रंगमंच, संवाद और दृश्य माँगता है। उपन्यास वर्णन, मन और समय माँगता है। कथोपकथन उपन्यास में अंग है, पूरा शरीर नहीं।
उपन्यास के भीतर उपभेद हैं। सामाजिक, ऐतिहासिक, तिलिस्मी, मनोवैज्ञानिक, आंचलिक, राजनीतिक। ये जातियाँ शत्रु नहीं। एक कृति दो जातियाँ छू सकती है। रंगभूमि सामाजिक है, इतिहास का स्पर्श भी रखती है। बाणभट्ट की आत्मकथा ऐतिहासिक-सांस्कृतिक है। मैला आँचल आंचलिक है, राजनीति भी रखता है। स्वरूप तीन प्रश्नों से कटता है। कथा गद्य में कितनी फैलती है। नायक साधारण है या उदात्त। वाचक वर्णन करता है या केवल संवाद। इन्हीं से उपन्यास कहानी, महाकाव्य और नाटक से अलग बैठता है।
नगेन्द्र स्वरूप को व्यापक जीवन-चित्र कहते हैं। गुलेरी की उसने कहा था एक प्रभाव की कहानी है; गोदान कई वर्ष का ऋण है। साकेत पद्य का उदात्त राम है; त्यागपत्र गद्य का साधारण निर्णय है। अंधेर नगरी रंगमंच माँगती है; महाभोज वर्णन और तंत्र माँगता है। उपभेद शिल्प नहीं बदलते, आलंबन बदलते हैं। सामाजिक खेत और कारखाना देखता है। मनोवैज्ञानिक मन देखता है। आंचलिक बोली और रीति देखता है। राजनीतिक चुनाव और संरक्षण देखता है।
| रूप | पहचान | उदाहरण-संकेत |
|---|---|---|
| कहानी | एक प्रभाव, संक्षिप्त | गुलेरी; प्रसाद-कहानी |
| महाकाव्य | पद्य, उदात्त कथा | साकेत, कामायनी |
| नाटक | दृश्य, संवाद, रंगमंच | अंधेर नगरी |
| उपन्यास | गद्य, विस्तार, चरित्र-विकास | गोदान, त्यागपत्र |
3 तत्त्व — कथावस्तु
कथावस्तु घटना-क्रम है। फॉर्स्टर उसे कथा और कथानक में बाँटते हैं। कथा बताती है कि आगे क्या हुआ। कथानक बताता है कि वह क्यों हुआ। आरंभ स्थिति खोलता है। मध्य द्वंद्व बढ़ाता है। अंत निर्णय या भंग देता है। प्रेमचंद की कथावस्तु सामाजिक कारण से बँधी है — ऋण, खेत-प्रश्न, नगर का लोभ। जैनेन्द्र की कथावस्तु भीतर के निर्णय पर मुड़ती है। रेणु की कथावस्तु आंचल की कई रेखाएँ साथ चलाती है। ढीली कथावस्तु भ्रम पैदा करती है। कसी कथावस्तु कारण दिखाती है।
कथावस्तु के दोष तीन हैं। संयोग का बोझ। उपकथा का बिखराव। उपदेश का घटना पर सवार होना। गुण तीन हैं। कारण-शृंखला। चरित्र से घटना का निकलना। समय का दबाव। गोदान में होरी का अंत संयोग-भर नहीं; ऋण और मर्यादा की शृंखला है। त्यागपत्र में घटना कम है, निर्णय अधिक। आलोचक कथावस्तु को कंकाल कहते हैं। बिना चरित्र के वह सूखी रहती है। बिना उद्देश्य के वह मनोरंजन रह जाती है। तत्त्व अलग लिखे जाते हैं, पर कृति में एक साथ चलते हैं।
गोपाल राय कथावस्तु को इतिहास के सोपान से भी देखते हैं — तिलिस्म घटना-कौतुक चलाता है, प्रेमचंद कारण समाज से निकालते हैं, जैनेन्द्र कारण दृष्टि से निकालते हैं। रंगभूमि में क्रम ज़मीन से गोली तक है; कथानक पूँजी और राज्य हैं। त्यागपत्र में क्रम घटनाओं का पतला है; कथानक मर्यादा की दृष्टि है। महाभोज में क्रम लाश से चुनाव तक है; कथानक सत्ता-रक्षा है। उपकथा तभी दोष है जब कारण से कट जाए। सोफिया-विनय कटने पर रमानी लगते हैं; मिलने पर उसी समाज की दूसरी साँस बनते हैं।
4 तत्त्व — चरित्र
चरित्र वह मनुष्य है जो घटना को अर्थ देता है। सपाट चरित्र एक गुण पर टिकता है। गोल चरित्र बदलता है, द्वंद्व रखता है। प्रेमचंद के होरी, धनिया, सूरदास सामाजिक दबाव में बनते हैं। जैनेन्द्र के मृणाल, सुनीता भीतर के प्रश्न से बनते हैं। अज्ञेय का शेखर चेतना की परत से बनता है। मन्नू की नारी निर्णय और समाज दोनों से टकराती है। चरित्र-चित्रण दो मार्गों से होता है। कर्म और संवाद से बाहर। स्मृति और द्वंद्व से भीतर।
नायक आधुनिक उपन्यास में देवता नहीं। वह किसान, कर्मचारी, स्त्री, दलित, नगर-युवक हो सकता है। खलनायक एकआयामी रहने पर कमजोर पड़ता है। सहायक पात्र कथा चलाते हैं; वे केवल नाम न रह जाएँ। आंचलिक उपन्यास में आंचल स्वयं दबाव बनता है — रेणु का मेरीगंज। ऐतिहासिक उपन्यास में इतिहास का पुरुष आधुनिक प्रश्न बोलता है — द्विवेदी के बाणभट्ट। बिना नाम के चरित्र अधूरा है। बिना परिवर्तन के चरित्र सपाट रह जाता है।
फॉर्स्टर सपाट और गोल बाँटते हैं। सपाट एक वाक्य में सिमटता है। गोल आश्चर्य देता है, द्वंद्व रखता है। होरी ऋण में बदलता है। मृणाल सत्य कहकर निकलती है। सूरदास भिक्षा से आंदोलन तक जाता है। बिसू हक माँगता है, लाश बन जाता है। कर्म और संवाद बाहर से चरित्र खोलते हैं। स्मृति और द्वंद्व भीतर से खोलते हैं। प्रेमचंद बाहर चलते हैं। जैनेन्द्र भीतर चलते हैं। दोनों मनुष्य नापते हैं, देवता नहीं।
| प्रकार | लक्षण | संकेत |
|---|---|---|
| सपाट | एक गुण, स्थिर | तिलिस्मी खल-नायक |
| गोल | द्वंद्व, परिवर्तन | होरी; मृणाल |
| आंचल-दबाव | स्थान चरित्र जैसा | मैला आँचल |
5 तत्त्व — कथोपकथन, देशकाल, भाषा, उद्देश्य
कथोपकथन पात्रों का संवाद है। वह चरित्र खोलता है, कथा बढ़ाता है, समाज की भाषा लाता है। नाटकीय संवाद तेज है। वर्णनात्मक उपन्यास संवाद को कम रखता है। प्रेमचंद का संवाद बोलचाल का है। जैनेन्द्र का संवाद विचार का है। देशकाल देश, समय और वातावरण है। वह पृष्ठ नहीं, दबाव है। गोदान का गाँव ऋण का देशकाल है। मैला आँचल का आंचल चुनाव और महामारी का देशकाल है। महाभोज का नगर सत्ता और लाश का देशकाल है। भाषा शैली है — सरल खड़ी बोली, संस्कृत-गर्भित, आंचलिक शब्द, व्यंग्य। उद्देश्य नैतिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक या कलात्मक हो सकता है। शुक्ल उद्देश्य को जीवन की आलोचना से जोड़ते हैं।
छह तत्त्व हैं — कथावस्तु, चरित्र, कथोपकथन, देशकाल, भाषा-शैली, उद्देश्य। शिल्प इन तत्त्वों को बाँधने का ढंग है — दृष्टि, संरचना, प्रतीक। तत्त्व सामग्री हैं। शिल्प विन्यास है। प्रेमचंद तत्त्वों को समाज से भरते हैं। अज्ञेय शिल्प को चेतना से तेज करते हैं। रेणु भाषा को आंचल से रंगते हैं। द्विवेदी भाषा को संस्कृति से गाढ़ा करते हैं। नाम और उदाहरण के बिना तत्त्व केवल गिनती रह जाते हैं।
नगेन्द्र तत्त्वों को रूप की शर्त कहते हैं, गिनती की शर्त नहीं। राजेंद्र यादव संवेदना बिना भाषा के सूख जाती है — इसलिए शैली खाली अलंकार नहीं। बांदिवडेकर स्थिति और गति से देशकाल को समय में बाँधते हैं: 1882 का नगर, 1925 का कारखाना, 1937 का परिवार, 1979 का चुनाव एक ही तत्त्व के अलग दबाव हैं। नाटक संवाद से खड़ा होता है; उपन्यास संवाद को वर्णन के साथ रखता है। उद्देश्य उपदेश की सूची बन जाए तो चरित्र कठपुतली हो जाते हैं।
| तत्त्व | काम |
|---|---|
| कथावस्तु | घटना और कारण |
| चरित्र | मनुष्य और परिवर्तन |
| कथोपकथन | संवाद; चरित्र की वाणी |
| देशकाल | देश, समय, वातावरण |
| भाषा-शैली | कथन का ढंग |
| उद्देश्य | चित्रण और प्रश्न |
6 शिल्प — दृष्टि, संरचना, वाचक
शिल्प उपन्यास को बाँधने का ढंग है। दृष्टि पूछती है कि कथा किस आँख से कही गई। सर्वज्ञ वाचक सब मन पढ़ता है — प्रेमचंद प्रायः यहीं हैं। उत्तम पुरुष मैं-कथन है — शेखर एक जीवनी। सीमित दृष्टि एक पात्र के साथ चलती है। चेतना-प्रवाह भीतर की असंतत धारा है — जैनेन्द्र और अज्ञेय के निकट। डायरी, पत्र, आत्मकथा-ढाँचा शिल्प के उपभेद हैं। बाणभट्ट की आत्मकथा आत्मकथा का शिल्प है, इतिहास की नकल नहीं। संरचना आरंभ-मध्य-अंत है; कभी वृत्त, कभी कई रेखाएँ। आंचलिक उपन्यास कई सूत्र साथ रखता है।
शिल्प तत्त्व का विरोधी नहीं। बिना शिल्प के तत्त्व ढेर हैं। बिना तत्त्व के शिल्प खाली प्रयोग है। नामवर और नेमिचंद्र जैन नए उपन्यास के शिल्प पर बोलते हैं। राजेंद्र यादव नए कथा-स्वर के व्यक्ति को देखते हैं। सीमा यह है कि शिल्प कभी कथा को ढक लेता है। गुण यह है कि शिल्प आधुनिक मन को पकड़ता है। रंगभूमि विस्तृत सामाजिक चित्र है। त्यागपत्र निर्णय और मन है। अनामदास का पोथा कथा-वाचक और संस्कृति है। महाभोज राजनीतिक घटना-शिल्प है।
गोपाल राय शिल्प को शरीर-विधान कहते हैं — तत्त्व मांस हैं, शिल्प हड्डी-जोड़। लुबॉक दृष्टि को केंद्र कहते हैं; फॉर्स्टर क्रम और कारण बाँधते हैं। बांदिवडेकर स्थिति और गति से शिल्प को समय में देखते हैं — तिलिस्म का शिल्प कौतुक है, प्रेमचंद का विस्तार है, जैनेन्द्र का संकोच है, रेणु का बहुसूत्र है। नामवर और नेमिचंद्र जैन नए उपन्यास पर बोलते हैं; मोड़ 1936 के बाद का है, 1882 का नहीं। पोथा पांडुलिपि-ढाँचा है, आत्मकथा का पर्याय नहीं। महाभोज घटना-कमरे चलाता है, चेतना-प्रवाह नहीं।
7 उद्भव — परीक्षा गुरु और पहला विवाद
हिन्दी उपन्यास का उद्भव उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में है। प्रेस, शिक्षा, बंगला-अंग्रेज़ी अनुवाद और नवजागरण पृष्ठभूमि हैं। लाला श्रीनिवास दास का परीक्षा गुरु 1882 हिन्दी का प्रथम मौलिक उपन्यास प्रायः माना जाता है। विषय व्यापार, नैतिक परीक्षा और नगर का मध्यवर्ग है। भाषा खड़ी बोली गद्य है। श्रद्धाराम फिल्लौरी की भाग्यवती 1877 पहले आती है; वह उपदेश-प्रधान स्त्री-शिक्षा की कथा है। कुछ इतिहास उसे उपन्यास की सीमा पर रखते हैं, कुछ प्रथम कहते हैं। इंशा अल्ला खाँ की रानी केतकी की कहानी गद्य-कथा है, आधुनिक उपन्यास का पूरा रूप नहीं। परीक्षा गुरु पर सहमति इसलिए अधिक है कि उसमें नगर, चरित्र-विकास और मौलिक हिन्दी गद्य मिलते हैं।
उद्भव का अर्थ एक तिथि नहीं। अर्थ यह है कि हिन्दी गद्य ने दीर्घ कथा अपनाई। भारतेंदु युग नाटक और निबंध में अधिक शक्ति रखता है; उपन्यास अभी सीख रहा है। अनुवाद और रूपांतरण साथ चलते हैं। बंगला के बंकिम और बाद में शरतचंद्र का प्रभाव पढ़ने की रुचि बढ़ाता है। अंग्रेज़ी उपन्यास संरचना देता है। हिन्दी अपनी नैतिकता और व्यापार-नगर जोड़ती है। उद्भव का सूत्र यही है — 1882 परीक्षा गुरु, 1877 भाग्यवती का विवाद, गद्य का नया कथा-रूप। बिना विवाद के उद्भव अधूरा है, बिना सहमति के विवाद अधूरा है।
भारतेंदु युग नाटक, पत्रकारिता और निबंध में अधिक शक्ति रखता है; उपन्यास अभी सीख रहा है। अनुवाद बंकिम और अंग्रेज़ी संरचना से रुचि बढ़ाते हैं; मौलिकता परीक्षा गुरु पर अधिक सहमति इसलिए है कि नगर, चरित्र-विकास और हिन्दी गद्य साथ मिलते हैं। गोपाल राय सोपान यहीं से खोलते हैं। रामदरश मिश्र अंतर्यात्रा का पहला पड़ाव यही कहते हैं। शुक्ल गद्य के आविर्भाव को आधुनिक चिह्न कहते हैं; उद्भव उसी चिह्न की कथा-शाखा है, नाटक की जगह नहीं।
| कृति | वर्ष | लेखक |
|---|---|---|
| भाग्यवती | 1877 | श्रद्धाराम फिल्लौरी; उपदेश; विवाद |
| परीक्षा गुरु | 1882 | श्रीनिवास दास; प्रायः प्रथम मौलिक |
| रानी केतकी की कहानी | उन्नीसवीं पूर्व | इंशा अल्ला खाँ; गद्य-कथा, पूरा उपन्यास नहीं |
8 तिलिस्मी-ऐयारी और द्विवेदी-सोपान
देवकीनंदन खत्री का चंद्रकांता 1888 के आसपास तिलिस्मी-ऐयारी का शिखर है। गुफा, तिलिस्म, ऐयार, राजकुमार — मनोरंजन प्रधान है। हिन्दी पढ़ने वाले बढ़े। खड़ी बोली गद्य का प्रसार इसी लोकप्रियता से हुआ। आलोचना उसे कला का शिखर नहीं मानती; इतिहास उसे पाठक-निर्माण मानता है। किशोरीलाल गोस्वामी ऐतिहासिक-रमानी कथाएँ लिखते हैं। गोपालराम गहमरी जासूसी कथा चलाते हैं। द्विवेदी युग भाषा-शुद्धि और आदर्श जोड़ता है। उपन्यास अभी प्रेमचंद जितना सामाजिक नहीं। वह पाठक जोड़ता है, प्रश्न गहरा नहीं करता।
यह सोपान दो काम करता है। पहला — गद्य को व्यापक पाठक तक पहुँचाता है। दूसरा — घटना-कौतुक को कथा का स्वाद बनाता है। प्रेमचंद बाद में कौतुक से यथार्थ की ओर मोड़ते हैं। बिना खत्री के पाठक-समुदाय पतला रहता। बिना प्रेमचंद के तिलिस्म ही उपन्यास रह जाता। सोपान का अर्थ सीढ़ी है — प्रत्येक सीढ़ी अगली को संभव बनाती है, स्वयं अंतिम नहीं। गोपाल राय इसी क्रम को इतिहास का कंकाल बनाते हैं।
चंद्रकांता की संतति पाठक की भूख घटना-कौतुक पर टिकाए रखती है। द्विवेदी युग सरस्वती और भाषा-शुद्धि से आदर्श जोड़ता है, पर उपन्यास अभी सेवासदन जितना सामाजिक नहीं। महावीर प्रसाद द्विवेदी भाषा के आचार्य हैं, उपन्यासकार नहीं; हजारीप्रसाद द्विवेदी बाद की संस्कृति-कथा हैं। फॉक्स लोकजीवन से उपन्यास जोड़ते हैं; खत्री लोक-रुचि जोड़ते हैं, लोक-प्रश्न नहीं। बिना इस सोपान के खड़ी बोली का पाठक-समुदाय पतला रहता।
| नाम | पहचान |
|---|---|
| देवकीनंदन खत्री | चंद्रकांता; तिलिस्मी-ऐयारी |
| किशोरीलाल गोस्वामी | ऐतिहासिक-रमानी कथा |
| गोपालराम गहमरी | जासूसी गद्य |
9 प्रेमचंद युग
धनपत राय ‘प्रेमचंद’ का जन्म 31 जुलाई 1880, लमही, वाराणसी। निधन 8 अक्टूबर 1936, वाराणसी। उर्दू में नवाब राय भी कहा गया। हिन्दी उपन्यास का केंद्र-नाम वही हैं। सेवासदन 1918 वेश्या-प्रश्न और मध्यवर्गीय नैतिकता का पहला बड़ा सामाजिक उपन्यास माना जाता है। प्रेमाश्रम 1921 किसान और खेत-प्रश्न। रंगभूमि 1925 अंधे भिखारी सूरदास और औद्योगिक नगर का टकराव — निर्धारित कृति। गबन 1931 मध्यवर्गीय लोभ। कर्मभूमि 1932 राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन। गोदान 1936 किसान होरी और ऋण — शिखर। भाषा खड़ी बोली है। दृष्टि यथार्थवादी है। आदर्श अंत में कभी झलकता है; चित्र कठोर है।
युग का अर्थ केवल एक लेखक नहीं। अर्थ यह है कि उपन्यास समाज का प्रधान माध्यम बना। किसान, स्त्री, श्रम, नगर का कर्मचारी — ये नायक बने। जयशंकर प्रसाद कंकाल, तितली में संस्कृति और नारी-प्रश्न छूते हैं; वे उपन्यास के गौण शिखर हैं, कहानी-नाटक में बड़े। वृंदावनलाल वर्मा ऐतिहासिक उपन्यास चलाते हैं — झाँसी की रानी, मृगनयनी। प्रेमचंद युग का स्वर यथार्थ और आदर्श का योग है। प्रगतिशील लेखक संघ 1936 में प्रेमचंद अध्यक्ष रहे। सीमा यह है कि आदर्श कभी चित्र पर सवार हो जाता है। गुण यह है कि हिन्दी उपन्यास को किसान और नगर दोनों मिले। बिना प्रेमचंद के हिन्दी उपन्यास का इतिहास अधूरा है।
युग-संग प्रसाद कंकाल और तितली में संस्कृति छूते हैं; वे उपन्यास के गौण शिखर हैं, कहानी-नाटक में बड़े। वर्मा झाँसी की रानी और मृगनयनी से ऐतिहासिक शाखा चलाते हैं। नवलकिशोर मानववाद से प्रेमचंद-युग को पढ़ते हैं। फॉक्स लोकजीवन से उपन्यास जोड़ते हैं; प्रेमचंद उसी जोड़ के हिन्दी प्रमाण हैं। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष रहे; वर्ग-सूत्र पूरा पर्याय नहीं। रंगभूमि उद्योग-बस्ती है, गोदान का पर्याय नहीं, कर्मभूमि का पर्याय नहीं।
| कृति | वर्ष | संकेत |
|---|---|---|
| सेवासदन | 1918 | नारी, नैतिकता, नगर |
| रंगभूमि | 1925 | सूरदास; उद्योग; निर्धारित |
| गबन | 1931 | मध्यवर्गीय लोभ |
| कर्मभूमि | 1932 | आंदोलन |
| गोदान | 1936 | होरी; ऋण; शिखर |
10 प्रेमचंदोत्तर — मनोविज्ञान और इतिहास
प्रेमचंदोत्तर उपन्यास 1936 के बाद का मोड़ है। सामाजिक यथार्थ रहता है, पर मन और शिल्प आगे आते हैं। जैनेन्द्र कुमार — 1905–1988 — सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी। त्यागपत्र 1937; मृणाल का निर्णय और समाज की दृष्टि केंद्र हैं। अज्ञेय — शेखर एक जीवनी 1941–44; नदी के द्वीप उपन्यास 1952, कविता अलग कृति है। यशपाल झूठा सच में विभाजन का दस्तावेज रखते हैं। इलाचंद्र जोशी और सियारामशरण गुप्त मनोविज्ञान के निकट हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी — 1907–1979 — बाणभट्ट की आत्मकथा 1946, चारु चंद्रलेख, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा 1976। संस्कृति, कथा-वाचक और इतिहास का प्रश्न द्विवेदी की पहचान है।
यह सोपान प्रेमचंद का निषेध नहीं, उसकी अगली परत है। प्रेमचंद बाहर का समाज दिखाते हैं। जैनेन्द्र भीतर का निर्णय दिखाते हैं। अज्ञेय चेतना और व्यक्ति दिखाते हैं। द्विवेदी संस्कृति की स्मृति दिखाते हैं। यशपाल इतिहास की चोट दिखाते हैं। साम्य खड़ी बोली और आधुनिक मनुष्य है। वैषम्य आलंबन पर है — खेत, मन, स्मृति, राज्य। सीमा यह कि मनोविज्ञान कभी समाज से कट जाता है। गुण यह कि चरित्र गोल होता है।
त्यागपत्र 1937 मृणाल का निर्णय है। शेखर एक जीवनी 1941–44 चेतना की परत है। नदी के द्वीप उपन्यास 1952 है, कविता अलग कृति है। झूठा सच विभाजन का दस्तावेज है। बाणभट्ट की आत्मकथा 1946 संस्कृति-आत्मकथा है। अनामदास का पोथा 1976 अंतिम सांस्कृतिक उपन्यास है। राजेंद्र यादव संवेदना के इस मोड़ को व्यक्ति का स्वर कहते हैं। जैनेन्द्र प्रेमचंद का विलोम नहीं, पूरक हैं।
| उपन्यासकार | कृति-संकेत | धारा |
|---|---|---|
| जैनेन्द्र | त्यागपत्र, सुनीता | मनोवैज्ञानिक |
| अज्ञेय | शेखर एक जीवनी; नदी के द्वीप | चेतना, व्यक्ति |
| यशपाल | झूठा सच | ऐतिहासिक-राजनीतिक |
| हजारीप्रसाद द्विवेदी | बाणभट्ट; अनामदास का पोथा | संस्कृति-कथा |
11 आंचलिक, प्रगतिशील, व्यंग्य
आंचलिक उपन्यास किसी विशेष अंचल की बोली, रीति, प्रकृति और राजनीति को कथा बनाता है। फणीश्वरनाथ रेणु का मैला आँचल 1954 इस धारा का शिखर है। मेरीगंज आंचल है। परती परिकथा आगे की कृति है। नागार्जुन का बलचनमा 1952 मिथिला-किसान का स्वर है। अमृतलाल नागर बूँद और समुद्र में नगर-संस्कृति फैलाते हैं। रांगेय राघव सामाजिक-ऐतिहासिक कथा रखते हैं। प्रगतिशील धारा वर्ग, किसान और शोषण को केंद्र रखती है — नागार्जुन, यशपाल का एक सिरा, रेणु का जन-चित्र। श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारी 1968 स्वतंत्र भारत के विकास-गाँव का व्यंग्य है। व्यंग्य प्रगति का नारा नहीं; तंत्र की हँसी है।
आंचलिकता लोक-रंग भरना मात्र नहीं। वह आंचल को विश्व का नमूना बनाती है। रेणु गीत, रोग, चुनाव और नेता एक साथ चलाते हैं। नागार्जुन व्यंग्य और करुण मिलाते हैं। शुक्ल विकास के शब्द और सड़ांध का अंतर दिखाते हैं। सीमा यह कि आंचल कभी संग्रहालय रह जाता है। गुण यह कि हिन्दी उपन्यास महानगर के कमरे से निकलता है। प्रेमचंद का गाँव सामान्य गाँव है; रेणु का गाँव नाम और बोली वाला आंचल है। दोनों ग्रामीण हैं; शिल्प अलग है।
मैला आँचल 1954 शिखर है। मेरीगंज आंचल है। बलचनमा 1952 मिथिला-किसान है। राग दरबारी 1968 तंत्र की हँसी है, प्रगति का नारा नहीं। नागर बूँद और समुद्र में नगर-संस्कृति फैलाते हैं। प्रगतिशील धारा वर्ग और शोषण देखती है; व्यंग्य उसी तंत्र को हँसी से काटता है। आंचल तत्त्व नहीं बदलता, देशकाल को दबाव बनाता है।
| कृति | वर्ष | पहचान |
|---|---|---|
| बलचनमा | 1952 | नागार्जुन; किसान |
| मैला आँचल | 1954 | रेणु; आंचल |
| राग दरबारी | 1968 | श्रीलाल शुक्ल; व्यंग्य |
12 स्त्री-स्वर, दलित और समकालीन उपन्यास
स्त्री-स्वर पूछता है कि नारी आलंबन है या वाचक। महादेवी गद्य में रेखाचित्र रखती हैं; उपन्यास का बड़ा नाम मन्नू भंडारी है — 1931–2021। आपका बंटी 1971 विवाह-विच्छेद और बच्चे का प्रश्न है। महाभोज 1979 सत्ता, लाश और तंत्र है — निर्धारित कृति। कृष्णा सोबती ज़िंदगीनामा में पंजाब की स्मृति रखती हैं। मृदुला गर्ग, ममता कालिया आगे की पंक्ति हैं। दलित उपन्यास अनुभव को गवाही बनाता है। ओमप्रकाश वाल्मीकि जूठन आत्मकथा है, उपन्यास की सीमा पर गद्य-प्रमाण है। मोहनदास नैमिशराय, जयप्रकाश कर्दम उपन्यास-कथा चलाते हैं। समकालीन उपन्यास बाजार, हिंसा, स्मृति और पहचान पर खुलता है।
यह परत इतिहास का अंतिम सोपान है, मूल्यांकन अभी चल रहा है। मन्नू का शिल्प घटना और संवाद का है, रहस्य का नहीं। महाभोज राजनीतिक उपन्यास है, केवल स्त्री-कथा नहीं। दलित गद्य आत्मकथा और उपन्यास दोनों से बोलता है। भीष्म साहनी का तमस 1973 साम्प्रदायिकता का उपन्यास है। समकालीन का अर्थ केवल नयी तिथि नहीं; अर्थ यह है कि राज्य, शरीर और पहचान कथा के केंद्र में आते हैं। विमर्श तत्त्व नहीं बदलता; वाचक और आलंबन बदलता है।
आपका बंटी 1971 परिवार और बच्चे का प्रश्न है; महाभोज 1979 सत्ता और लाश है। ज़िंदगीनामा स्मृति है। जूठन आत्मकथा है, उपन्यास की सीमा पर गद्य-प्रमाण है। स्त्री विमर्श पूछता है वाचक कौन है। दलित विमर्श गवाही माँगता है। दिव्यांग दृष्टि सूरदास को दया का उपकरण नहीं, कर्ता पढ़ती है। तीनों दृष्टि इतिहास का अंतिम सोपान तेज करती हैं, अलग विधा नहीं बनातीं।
| नाम | कृति | प्रश्न |
|---|---|---|
| मन्नू भंडारी | आपका बंटी; महाभोज | परिवार; सत्ता |
| कृष्णा सोबती | ज़िंदगीनामा | स्मृति, स्त्री |
| भीष्म साहनी | तमस | साम्प्रदायिकता |
13 प्रमुख उपन्यासकार — क्रम और संबंध
प्रमुख नाम एक पंक्ति में बाँधे जाते हैं। उद्भव — श्रीनिवास दास, फिल्लौरी। लोकप्रिय गद्य — खत्री, गोस्वामी, गहमरी। यथार्थ — प्रेमचंद; साथ प्रसाद, वर्मा। मनोविज्ञान — जैनेन्द्र, अज्ञेय, जोशी। संस्कृति-इतिहास — द्विवेदी, यशपाल, नागर। आंचल-जन — रेणु, नागार्जुन। व्यंग्य — श्रीलाल शुक्ल। स्त्री-राजनीति — मन्नू, सोबती। साम्प्रदायिकता — साहनी। प्रत्येक नाम के साथ एक कृति और एक धारा है। बिना वर्ष के इतिहास कमजोर है। बिना धारा के नाम कमजोर है।
संबंध निषेध और ग्रहण दोनों है। खत्री पाठक देते हैं, प्रेमचंद यथार्थ देते हैं। प्रेमचंद समाज देते हैं, जैनेन्द्र मन देते हैं। अज्ञेय व्यक्ति देते हैं, रेणु आंचल देते हैं। द्विवेदी स्मृति देते हैं, मन्नू तंत्र देते हैं। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं। गोपाल राय सोपान बाँधते हैं। नगेन्द्र स्वरूप बाँधते हैं। चार शिखर-नाम प्रेमचंद, जैनेन्द्र, द्विवेदी, मन्नू इसी पंक्ति के हैं।
सामान्य परिचय नाम, वर्ष, कृति और धारा माँगता है, पूरे प्लॉट की नकल नहीं। श्रीनिवास दास 1882, खत्री तिलिस्म, प्रेमचंद 1880–1936, जैनेन्द्र त्यागपत्र 1937, रेणु मैला आँचल 1954, द्विवेदी पोथा 1976, मन्नू महाभोज 1979 — ये इतिहास के खूँटे हैं। नदी के द्वीप अज्ञेय का उपन्यास 1952 है, कविता अलग कृति है। जूठन आत्मकथा है, उपन्यास की सीमा पर गद्य-प्रमाण है। बिना धारा के चार शिखर-नाम भी सूची रह जाते हैं।
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