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प्रेमचंद — रंगभूमि notes
Readyप्रेमचंद — रंगभूमि is a topic in Hindi novel (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.
प्रेमचंद का उपन्यास रंगभूमि है। पूरी कृति पढ़नी है, अंश नहीं। प्रकाशन 1925; रचना 1924–25 के आसपास। नायक सूरदास है — पांडेपुर का अंधा भिखारी, भक्त-कवि…
इकाई 2 · प्रेमचंद — रंगभूमि
प्रेमचंद का उपन्यास रंगभूमि है। पूरी कृति पढ़नी है, अंश नहीं। प्रकाशन 1925; रचना 1924–25 के आसपास। नायक सूरदास है — पांडेपुर का अंधा भिखारी, भक्त-कवि सूरदास नहीं। टकराव सिगरेट के कारखाने और उसकी ज़मीन पर है। पूँजीपति जॉन सेवक है। अंग्रेज़ अफसर जोज़फ क्लार्क है। दूसरा सूत्र सोफिया और विनय सिंह का प्रेम है। कर्मभूमि 1932 अलग उपन्यास है। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग कर्ण की सभा है, यह कृति नहीं। गोपाल राय शिल्प से सामाजिक चित्र पढ़ते हैं। रामदरश मिश्र प्रेमचंद-युग को यथार्थ का सोपान कहते हैं। नवलकिशोर मानववाद सूरदास के नायकत्व तक ले जाते हैं।
1 प्रेमचंद — परिचय और यह कृति
धनपत राय ‘प्रेमचंद’ का जन्म 31 जुलाई 1880, लमही, वाराणसी। निधन 8 अक्टूबर 1936, वाराणसी। उर्दू में नवाब राय। हिन्दी उपन्यास का केंद्र-नाम। सेवासदन 1918 नगर-नैतिकता। प्रेमाश्रम 1921 किसान। रंगभूमि 1925 उद्योग और श्रम। गबन 1931 मध्यवर्गीय लोभ। कर्मभूमि 1932 आंदोलन — निर्धारित नहीं। गोदान 1936 होरी और ऋण — शिखर, यह इकाई की निर्धारित कृति नहीं। भाषा खड़ी बोली। दृष्टि यथार्थ; आदर्श चित्र के साथ कभी रहता है। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। प्रगतिवाद का वर्ग-सूत्र पूरा उनका पर्याय नहीं; वे सामाजिक यथार्थ के उपन्यासकार हैं।
रंगभूमि प्रेमचंद युग के मध्य की बड़ी कृति है। सेवासदन से बाद, गोदान से पहले। विषय गाँव का सामान्य किसान नहीं; नगर के किनारे की बस्ती, ज़मीन और कारखाना है। नायक अंधा है, फिर भी कथा का केंद्र वही है। यह दया का चित्र नहीं, टकराव का चित्र है। आलोचना इसे गाँधी-स्पर्श, पूँजी-विरोध और राष्ट्रीय भाव से पढ़ती है। सीमा लंबाई और दो सूत्रों का ढीलापन है। गुण यह कि हिन्दी उपन्यास को उद्योग का प्रश्न और श्रम-नायक मिला।
आलोचना रंगभूमि को गाँधी-स्पर्श, पूँजी-विरोध और राष्ट्रीय भाव से पढ़ती है; कृति गाँधी-चरित नहीं। नवलकिशोर मानववाद सूरदास के नायकत्व तक ले जाते हैं। रामदरश मिश्र प्रेमचंद-युग को यथार्थ का सोपान कहते हैं। सीमा लंबाई और दो सूत्रों का ढीलापन है। गुण यह कि हिन्दी उपन्यास को उद्योग का प्रश्न और श्रम-नायक मिला। उर्दू में नवाब राय वही लेखक हैं; यह इकाई हिन्दी गद्य-कृति पर है।
| संकेत | तथ्य |
|---|---|
| जन्म–निधन | 1880, लमही — 1936, वाराणसी |
| रंगभूमि | 1925; नायक सूरदास; पांडेपुर |
| पहले–बाद | सेवासदन 1918; गोदान 1936 |
| नहीं मिलाएँ | कर्मभूमि 1932; भक्त सूरदास; रश्मिरथी का सर्ग |
2 नाम, वर्ष और स्वरूप
रंगभूमि नाम जीवन को कर्म और नीति की परीक्षा बनाता है। सूरदास गाता है — तू रंगभूमि में आया, दिखलाने अपनी माया; धर्म-नीति क्यों तोड़े, रण से मुँह क्यों मोड़े। अर्थ यह है कि मनुष्य आकर कर्म करता है; भाग नहीं सकता। रूप सामाजिक उपन्यास है। इतिहास का स्पर्श औपनिवेशिक तंत्र और कारखाना है। राजनीतिक उपन्यास पूरा नहीं; आंदोलन एक अंग है। मनोवैज्ञानिक उपन्यास नहीं; मन है, केंद्र समाज है। आंचलिक उपन्यास नहीं; पांडेपुर नाम की बस्ती है, रेणु का बोली-आंचल नहीं।
वर्ष 1925 पुस्तक का है। कुछ उल्लेख 1924–25 करते हैं; पुस्तक-वर्ष 1925 है। आकार दीर्घ है। वाचक सर्वज्ञ है। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली। रस करुण और वीर-सत्याग्रह मिला है; हास्य-व्यंग्य गौण है। उद्देश्य चित्रण और प्रश्न है — पूँजी, ज़मीन, जाति, धर्म-संकर प्रेम। नाम रश्मिरथी के प्रथम सर्ग से नहीं जुड़ता। वहाँ रंगभूमि सभा है, कर्ण है, जाति-प्रश्न धनुष पर है। यहाँ रंगभूमि उपन्यास है, सूरदास है, ज़मीन का प्रश्न है।
पुस्तक-वर्ष 1925 है; रचना 1924–25 के आसपास कही जाती है। आकार दीर्घ है, त्यागपत्र जैसा लघु नहीं। रस करुण और प्रतिरोध मिला है; हास्य-व्यंग्य गौण है। सूरदास का पद भक्ति-पद्य छूता है, गद्य सरल खड़ी बोली रहता है। रश्मिरथी का प्रथम सर्ग कर्ण की सभा है, जाति-प्रश्न धनुष पर है; वह कविता है, यह गद्य-उपन्यास है। नाम जीवन की परीक्षा है, शस्त्र-सभा नहीं।
तू रंगभूमि में आया, दिखलाने अपनी माया,
क्यों धरम-नीति को तोड़ै? भई, क्यों रन से मुँह मोड़ै?
प्रेमचंद — रंगभूमि (सूरदास)
3 देशकाल — पांडेपुर
देशकाल बनारस शहर के बाहर पांडेपुर की गरीब बस्ती है। शहर दीपक और अदालत रखता है। बस्ती अँधेरा और भिक्षा रखती है। सूरदास यहीं रहता है। पुश्तैनी ज़मीन उसने मुहल्ले के पशुओं के चरने के लिए छोड़ रखी है। गोदाम के पीछे मैदान है। जॉन सेवक यहीं सिगरेट का कारखाना चाहता है। देशकाल पृष्ठ नहीं, दबाव है। बिना इस बस्ती के कारखाना केवल उद्योग-समाचार रह जाता। बिना कारखाने के बस्ती केवल दया का दृश्य रह जाती।
समय परतंत्र भारत है — रियासत, अंग्रेज़ अफसर, कोर्ट ऑफ वार्ड्स, मुआवजा और बेदखली। रानी और कुंवर सेवा-भवन चलाते हैं। राजा महेंद्र कुमार सिंह शासन और अंग्रेज़ से तालमेल रखते हैं। ईसाई परिवार कारखाना और संरक्षण चाहता है। हिन्दू सामंत जाति और सेवा के बीच बँटे हैं। देशकाल तीन शक्तियाँ एक जगह ठेलता है — पूँजी, रियासत, बस्ती। गोदान का गाँव ऋण का है। यह बस्ती ज़मीन और कारखाने की है। दोनों प्रेमचंद हैं; आलंबन अलग है।
सेवा भवन भरत सिंह और जान्हवी का है; यहीं विनय-सोफिया का दूसरा सूत्र देशकाल पाता है। कोर्ट ऑफ वार्ड्स बेदखली का कानूनी रूप है। मैला आँचल का मेरीगंज बोली-आंचल है; पांडेपुर नाम की गरीब बस्ती है, रेणु का आंचल नहीं। बिना इस बस्ती के कारखाना केवल उद्योग-समाचार रह जाता है। शहर दीपक और अदालत रखता है; बस्ती अँधेरा और भिक्षा रखती है — यही दबाव है, पृष्ठ-सज्जा नहीं।
| स्थान | काम |
|---|---|
| पांडेपुर | बस्ती; सूरदास; चारागाह-ज़मीन |
| बनारस | शहर; अदालत; कारखाना-दबाव |
| सेवा भवन | भरत सिंह, जान्हवी; विनय-सोफिया |
4 पहला सूत्र — ज़मीन और कारखाना
कथा दो सिरों से चलती है। पहला सिरा ज़मीन का है। जॉन सेवक सूरदास को पहले भिखारी जानकर दुत्कारता है। फिर पता चलता है कि प्रस्तावित कारखाने की ज़मीन उसी की है। पाँच रुपये का प्रलोभन ठुकराया जाता है। मुँहमाँगी कीमत भी ठुकराई जाती है। सूरदास ज़मीन मुहल्ले के पशुओं के लिए छोड़ना चाहता है; सिगरेट का धुआँ वहाँ नहीं चाहता। इंकार निजी हठ नहीं, सार्वजनिक उपयोग का तर्क है।
जॉन सेवक राजा महेंद्र और क्लार्क को अपने पक्ष में करता है। ज़मीन छिनती है। कारखाना उठता है। बाहर के मज़दूर आते हैं। शराब, ताड़ी, वेश्यालय बस्ती में घुसते हैं। कुछ मुहल्ले वाले व्यापार बढ़ने की लालच में कारखाने के साथ हो जाते हैं। सूरदास पर झूठा मुकदमा चलाने की कोशिश होती है। पांडेपुर कोर्ट ऑफ वार्ड्स के नीचे जाता है। घर तोड़े जाते हैं। सूरदास जन-आंदोलन खड़ा करता है। यही पहला सूत्र है — ज़मीन, कारखाना, बेदखली, प्रतिरोध।
फॉर्स्टर कारण पूँजी और राज्य कहते हैं, संयोग नहीं। दूसरा सूत्र सोफिया-विनय बाद में इसी बेदखली पर मिलता है। झूठा मुकदमा और कोर्ट ऑफ वार्ड्स कानूनी रूप हैं, केवल व्यापार नहीं। गोदान में कारण ऋण है; कर्मभूमि में आंदोलन अलग कृति है। बिना ज़मीन के कारखाना कथा नहीं बनता। सूरदास का इंकार सार्वजनिक उपयोग का तर्क है — पशु, साँस, धुआँ नहीं।
5 जॉन सेवक, क्लार्क, राजा महेंद्र
जॉन सेवक ईसाई पूँजीपति है। जानसेवक वही नाम है। पत्नी मिसेज जॉन सेवक। पुत्र प्रभु सेवक। पुत्री सोफिया। वह कारखाना प्रगति और लाभ दोनों से देखता है। सूरदास की आन उसके हिसाब से अड़चन है। वह कीमत देता है, फिर ज़बरदस्ती लेता है। धर्म का मुखौटा और व्यापार का स्वार्थ एक व्यक्ति में हैं। खलनायक एकआयामी दैत्य नहीं; तंत्र का आदमी है। बिना उसके उपन्यास में उद्योग नहीं आता।
जोज़फ क्लार्क अंग्रेज़ अफसर है। जॉन उसे सोफिया से बाँधना चाहता है। राज्य की शक्ति उसके हाथ है। आंदोलन कुचलने पर वह सूरदास पर पिस्तौल चलाता है। गोली कंधे पर लगती है। घाव से मृत्यु अस्पताल में होती है। राजा महेंद्र कुमार सिंह इंदु के पति हैं, कुंवर भरत सिंह के दामाद। वे अंग्रेज़ और कारखाने से तालमेल रखते हैं। प्रजा और सूरदास पर इंदु से मतभेद रखते हैं। तीनों मिलकर पूँजी-राज्य-रियासत का त्रिकोण बनाते हैं। सूरदास अकेला नहीं; उसके सामने व्यवस्था है।
मिसेज जॉन सेवक घर और धर्म का दबाव रखती हैं। प्रभु सेवक पुत्र है। सोफिया पुत्री है — पूँजी के घर से निकली, त्याग के पक्ष में खड़ी। क्लार्क राज्य की पिस्तौल है; जॉन उसे विवाह से बाँधना चाहता है। राजा महेंद्र इंदु के पति हैं, कुंवर भरत सिंह के दामाद; प्रजा और सूरदास पर इंदु से मतभेद रखते हैं। तीनों मिलकर पूँजी-राज्य-रियासत का त्रिकोण बनाते हैं। सूरदास अकेला नहीं; उसके सामने व्यवस्था है।
| पात्र | काम |
|---|---|
| जॉन सेवक | कारखाना; ज़मीन छीनना |
| क्लार्क | अंग्रेज़ अफसर; गोली |
| राजा महेंद्र | रियासत; तालमेल |
| प्रभु सेवक | जॉन का पुत्र |
6 सूरदास — नायक
सूरदास पांडेपुर का अंधा भिखारी है। उपन्यास उसे चमार कहता है। प्रश्न जाति-नाम का अपमान नहीं, नायकत्व का है। गुण गाने-बजाने, भक्ति, सरलता, स्वाभिमान हैं। शरीर क्षीण है। दृष्टि नहीं है। कर्म है। ज़मीन न देना निजी संपत्ति का लोभ नहीं; मुहल्ले के पशु और साँस का तर्क है। प्रलोभन लेता नहीं। आंदोलन हिंसा से नहीं, जन-संगठन से चलाता है। क्लार्क की गोली उसे शहीद बनाती है। जहाँ झोपड़ी थी, वहाँ मूर्ति बैठती है। रानी जान्हवी अंत में उसके चरणों पर सिर रखती है।
भक्त-कवि सूरदास अलग पुरुष हैं — भक्ति-काव्य, कृष्ण, नेत्रहीन भक्त। यह सूरदास प्रेमचंद का गद्य-नायक है। होरी गोदान का किसान है, ऋण से बँधा। यह सूरदास ज़मीन और कारखाने से टकराता है। अंधत्व दया का उपकरण नहीं। वह वाचक की सहानुभूति का केंद्र है, और कथा का कर्ता भी है। आदर्श यह है कि सत्य और अहिंसा उसके पास हैं। सीमा यह है कि प्रेमचंद उसे कभी राष्ट्रपिता की छाया तक ले जाते हैं; मनुष्य उससे बड़ा प्रतीक बन जाता है। फिर भी आधुनिक हिन्दी में श्रम-नायक का इतना बड़ा रूप दुर्लभ है।
भक्त-कवि सूरदास भक्ति-काव्य के कृष्ण-भक्त हैं, यह गद्य-नायक नहीं। होरी गोदान का किसान है, ऋण से बँधा; यह सूरदास ज़मीन और कारखाने से टकराता है। नवलकिशोर मानववाद नायकत्व यहीं पढ़ते हैं। दिव्यांग दृष्टि शरीर की कमी को कथा का कारण नहीं बनाती; समाज की शक्ति को कारण बनाती है। आदर्श यह है कि सत्य और अहिंसा उसके पास हैं। सीमा यह है कि मनुष्य कभी राष्ट्रपिता की छाया तक बढ़ जाता है; फिर भी श्रम-नायक का इतना बड़ा रूप दुर्लभ है।
| सूत्र | सूरदास |
|---|---|
| शरीर | अंधा; भिक्षा; पांडेपुर |
| कर्म | ज़मीन न देना; आंदोलन |
| अंत | गोली; अस्पताल; मूर्ति |
| नहीं | भक्त-कवि; होरी; कर्ण |
7 सोफिया और विनय
दूसरा सिरा प्रेम का है। सोफिया जॉन सेवक की पुत्री है। धर्म पर विश्वास रखती है, अंधश्रद्धा पर नहीं। ईसा को त्याग का आदर्श मानती है; भक्तों की गढ़ी बातें नहीं। रानी जान्हवी और विनय सिंह के संपर्क से हिन्दू भाव और विनय के प्रति आकर्षण बढ़ता है। माता-पिता विवाह क्लार्क से चाहते हैं। सगाई तक होती है। हृदय विनय के पास रहता है। वह क्लार्क को मोहित कर जेल में विनय तक पहुँचती है। नायकराम सहयोग करता है। दोनों जंगल और भील-बस्ती से होते पांडेपुर लौटते हैं। सोफिया जॉन के पास नहीं, सेवा भवन जाती है। जान्हवी विवाह को राजी होती है।
विनय सिंह कुंवर भरत सिंह के पुत्र हैं। जाति-सेवा में दूसरी रियासत में गिरफ्तार होते हैं। प्रेम शाश्वत भाव है, विवाह-सुख नहीं। आंदोलन में सूरदास का साथ देते हैं। भीड़ उन्हें रईस का बेटा कहकर अपमानित करती है। वे पूछते हैं — रईसों के बेटे प्राण कैसे देते हैं — और पिस्तौल से स्वयं को मारते हैं। सोफिया विनय के बाद गंगा में उतरती है। पत्र में लिखती है — विनय न रहे तो किसके लिए रहूँ। प्रेम जाति और धर्म का बंधन तोड़ता है; अंत दोनों की मृत्यु है। यह सूत्र कारखाने से अलग लगता है; बाद में एक हो जाता है।
धर्म-संकर प्रेम दूसरा सूत्र है, उपकथा नहीं। सगाई क्लार्क से होती है; हृदय विनय के पास रहता है। जेल, जंगल, भील-बस्ती — प्रेम-सूत्र का देशकाल कारखाने से कटता दिखता है, पांडेपुर लौटकर एक होता है। गोदान में प्रेम केंद्र नहीं; यहाँ प्रेम उसी समाज की दूसरी साँस है। नायक सूरदास रहते हैं; विनय करुण छाया हैं। सोफिया पूँजी के घर से निकलकर त्याग के पक्ष में खड़ी होती है।
8 जान्हवी, इंदु, भरत सिंह
कुंवर भरत सिंह और रानी जान्हवी सामंत हैं, पर सेवा और धर्म की ओर झुके हैं। जान्हवी सोफिया को पास लाती है, फिर विनय को दूर भी भेजती है — जाति-सेवा के नाम पर। अंत में प्रेम देखकर विवाह मानती है। सूरदास की मृत्यु पर भक्ति-विह्वल रोती है। यह नारी केवल आभूषण नहीं। इंदु उनकी पुत्री हैं, राजा महेंद्र की पत्नी। प्रजा और सूरदास के पक्ष में पति से मतभेद रखती हैं। आंदोलन में सहयोग करती हैं। स्त्री यहाँ या तो सेवा-घर है, या विद्रोह का स्वर, या पूँजीपति की पुत्री जो धर्म बदलती है।
नायकराम सहयोगी है। जमुनी, भैरों, ताहिर अली, डाक्टर गांगुली बस्ती और नगर के अन्य नाम हैं। सहायक पात्र कथा चलाते हैं। सपाट रह जाएँ तो सूची बनते हैं। गोल वही हैं जो निर्णय बदलते हैं — सूरदास, सोफिया, विनय, इंदु, जॉन, क्लार्क। भरत सिंह कोर्ट ऑफ वार्ड्स की सलाह पर रियासत अंग्रेज़ को सौंप देते हैं; यही बेदखली का कानूनी रूप है। सामंत विरोध में पूरे नहीं उतरते; तंत्र के भीतर से समझौता करते हैं। सूरदास बाहर से टकराता है।
स्त्री यहाँ सेवा-घर, विद्रोह का स्वर, या पूँजीपति की पुत्री — तीनों आलंबन भर नहीं। इंदु प्रजा और सूरदास के पक्ष में पति से मतभेद रखती हैं। जान्हवी जाति-सेवा के नाम पर विनय को दूर भेजती है, अंत में प्रेम देखकर विवाह मानती है। सामंत तंत्र के भीतर समझौता करते हैं; सूरदास बाहर से टकराता है। सहायक पात्र सपाट रह जाएँ तो सूची बनते हैं; गोल वही हैं जो निर्णय बदलते हैं।
9 आंदोलन, गोली, दो मौतें
दो सूत्र कारखाना-बेदखली पर मिलते हैं। सूरदास के आंदोलन में विनय, सोफिया, इंदु साथ आते हैं। सिपाही घर तोड़ते हैं। क्लार्क सूरदास पर गोली चलाता है। सोफिया घायल को अस्पताल ले जाती है। भीड़ आक्रोश में मरने-मारने को उठती है। विनय समझाते हैं। लोग उन्हें दोषी रईस कहते हैं — गरीब की जान सस्ती। विनय आत्महत्या करते हैं। सूरदास अस्पताल में मरता है। शहीद का दर्जा सूरदास को मिलता है, विनय को उतना नहीं। प्रेमचंद श्रम-नायक को केंद्र रखते हैं, कुंवर-पुत्र को करुण छाया।
अंत तीन मौतों तक जाता है। सूरदास। विनय। सोफिया। मूर्ति और अश्रु सूरदास पर हैं। सोफिया का पत्र जान्हवी को है — भौतिक देह बाधक है, गंगा की गोद। माता-पिता से कह देना विवाह हो गया। यह आदर्शोन्मुख यथार्थ है — चित्र कठोर है, अंत नैतिक ऊँचाई माँगता है। गोदान में होरी की मृत्यु ऋण की शृंखला है। यहाँ मृत्यु गोली, आत्महत्या और गंगा तीन रूपों में है। कथा यहीं बंद होती है। कारखाना जीतता दिखाई देता है; स्मृति सूरदास की रहती है।
दो सूत्र कारखाना-बेदखली पर एक होते हैं। श्रम-नायक शहीद बनता है, कुंवर-पुत्र करुण छाया। भीड़ आक्रोश में मरने-मारने को उठती है; विनय समझाते हैं, लोग उन्हें दोषी रईस कहते हैं। गोली कंधे पर लगती है; मृत्यु अस्पताल में होती है। कारखाना जीतता दिखाई देता है; स्मृति सूरदास की रहती है। आदर्शोन्मुख यथार्थ चित्र कठोर रखता है, अंत नैतिक ऊँचाई माँगता है।
10 औद्योगीकरण और गाँव
रंगभूमि औद्योगीकरण को चमक नहीं, उसके विष को दिखाती है। कारखाना रोज़गार का वादा करता है। लाता है बेदखली, नशा, देह-व्यापार, बाहर का मज़दूर, मुहल्ले का फूट। सूरदास की ज़मीन चरने का मैदान थी; कारखाना उसे धुएँ का मैदान बनाता है। प्रगति का शब्द जॉन के पास है। साँस और पशु पांडेपुर के पास हैं। प्रेमचंद मशीन के दुश्मन नहीं; वे पूँजी को राज्य और रियासत से जुड़ा देखते हैं। बिना क्लार्क के कारखाना अकेला नहीं चलता।
गोदान किसान और ऋण है। प्रेमाश्रम खेत-प्रश्न है। कर्मभूमि राजनीतिक आंदोलन और नगर-गाँव दोनों छूती है — अलग कृति। रंगभूमि उद्योग बनाम बस्ती है। आज भी ज़मीन-अधिग्रहण और कारखाना यही प्रश्न पूछते हैं। सीमा यह है कि प्रेमचंद कारखाने के भीतर के मज़दूर-संगठन को गोदान के किसान जितना नहीं फैलाते। गुण यह है कि 1925 में ही सिगरेट-कारखाना को नैतिक और सामाजिक प्रश्न बनाया गया। नायक मशीन तोड़ता नहीं; ज़मीन और सत्य पर डटा रहता है।
प्रेमाश्रम खेत-प्रश्न है। गोदान किसान और ऋण है। कर्मभूमि राजनीतिक आंदोलन और नगर-गाँव दोनों छूती है — अलग कृति, नायक सूरदास नहीं। रंगभूमि उद्योग बनाम बस्ती है। आज भी ज़मीन-अधिग्रहण यही प्रश्न पूछता है। सीमा यह है कि कारखाने के भीतर का मज़दूर-संगठन गोदान के किसान जितना नहीं फैलता। गुण यह है कि 1925 में सिगरेट-कारखाना नैतिक और सामाजिक प्रश्न बनता है। नायक मशीन तोड़ता नहीं; ज़मीन और सत्य पर डटा रहता है। फॉक्स लोकजीवन से उपन्यास जोड़ते हैं; यहाँ लोकजीवन बस्ती का है, चमक-विज्ञापन नहीं।
11 सत्य, अहिंसा, गाँधी-स्पर्श
आलोचना सूरदास में गाँधी की छाया पढ़ती है — सत्य, अहिंसा, प्रलोभन का इंकार, जन-सत्याग्रह, मृत्यु के बाद संगठन। देश 1920 के दशक में असहयोग और खादी का समय देख चुका था। उपन्यास उसी हवा में है। सूरदास हिंसा नहीं चलाता। विनय भीड़ को रोकते हैं, फिर स्वयं हिंसा अपने ऊपर कर लेते हैं — यह गाँधी नहीं, आहत स्वाभिमान है। सोफिया का अंत भी गाँधी नहीं; प्रेम की तृप्ति है। इसलिए कृति गाँधी-चरित नहीं। गाँधी-स्पर्श सूरदास के सूत्र पर है।
निष्काम कर्म गीता का शब्द है; सूरदास का गाना कर्म और नीति बाँधता है। जाति का दबाव उस पर है, फिर भी नगर उसे पूज्य बनाता है। दिव्यांग दृष्टि यहाँ शरीर की कमी को कथा का कारण नहीं बनाती; समाज की शक्ति को कारण बनाती है। अंधा देखता नहीं, सत्य पर टिकता है। वाचक उसके पक्ष में है। सीमा आदर्शीकरण की है। गुण यह कि नायक साधारण है — भिखारी, अंधा, श्रम — और कथा का नैतिक केंद्र वही रहता है।
मृत्यु के बाद संगठन राष्ट्रीय भाव पढ़ा जाता है — नेता नहीं, नैतिक केंद्र। असहयोग और खादी की हवा 1920 के दशक की है; कृति उसी समय की सामाजिक परीक्षा है। विनय की आत्महत्या गाँधी-सूत्र नहीं, आहत स्वाभिमान है। सोफिया का अंत प्रेम की तृप्ति है। आलोचना सूरदास में गाँधी की छाया पढ़ती है; पूरा उपन्यास गाँधी-चरित नहीं बनता।
12 शिल्प — दो सिरे, वाचक, भाषा
शिल्प दो कथा-सूत्र साथ चलाता है। पहला पांडेपुर, ज़मीन, कारखाना, सूरदास। दूसरा सोफिया-विनय, जाति, धर्म, जेल, जंगल। आरंभ में सिरे अलग हैं। मध्य में छूते हैं। अंत से पहले एक हो जाते हैं। फॉर्स्टर की भाषा में कथा क्रम है, कथानक कारण है। कारण पूँजी और राज्य हैं; प्रेम उपकथा नहीं, उसी समाज की दूसरी साँस है। वाचक सर्वज्ञ है। मन पढ़ता है, न्याय करता है, सूरदास के पक्ष में झुकता है। उत्तम पुरुष नहीं। चेतना-प्रवाह नहीं। प्रेमचंद का आम शिल्प यही है — वर्णन, संवाद, टिप्पणी।
भाषा खड़ी बोली बोलचाल की है। सूरदास का गाना भक्ति-पद्य छूता है; गद्य सरल रहता है। संवाद चरित्र खोलते हैं — जॉन का लोभ, सूरदास की आन, सोफिया का धर्म-विवेक, भीड़ का आक्रोश। देशकाल पांडेपुर का दबाव है। उद्देश्य सामाजिक प्रश्न है। सीमा दो हैं। पहला — प्रेम-सूत्र कभी कारखाने से कटकर रमानी लग सकता है। दूसरा — दीर्घता और पात्रों की भीड़। गुण यह कि उद्योग, जाति, प्रेम और मृत्यु एक शरीर में आते हैं। त्यागपत्र का शिल्प मन है; यह शिल्प समाज का विस्तार है।
गोपाल राय शिल्प को शरीर-विधान कहते हैं; रंगभूमि का शरीर दो सूत्र फिर एक है। लुबॉक दृष्टि सामाजिक चित्र की है, एक स्मृति की नहीं। उत्तम पुरुष नहीं। चेतना-प्रवाह नहीं। वर्णन, संवाद, टिप्पणी — प्रेमचंद का आम शिल्प यही है। पोथा पांडुलिपि है; महाभोज घटना-कमरे हैं; यह विस्तार समाज का है।
| अंग | रंगभूमि |
|---|---|
| वाचक | सर्वज्ञ; सूरदास-पक्ष |
| संरचना | दो सूत्र, फिर एक |
| भाषा | खड़ी बोली; सूरदास का पद |
| रस | करुण; प्रतिरोध; प्रेम-करुण |
13 महत्त्व, सीमा, गोदान और कर्मभूमि
महत्त्व तीन हैं। पहला — श्रम और जाति-दबाव का नायक सूरदास। दूसरा — औद्योगिक पूँजी और औपनिवेशिक तंत्र का चित्र 1925 में। तीसरा — धर्म-जाति तोड़ता प्रेम, जिसका अंत करुण है। हिन्दी उपन्यास यहाँ तिलिस्म से बहुत दूर है। सेवासदन नारी-नैतिकता है। गोदान किसान-ऋण है। रंगभूमि उद्योग-बस्ती है। तीनों प्रेमचंद हैं; प्रश्न अलग हैं। राष्ट्रीय भाव सूरदास की मृत्यु को संगठन बनाता है। यही आलोचक राष्ट्रनायक कहते हैं — नेता नहीं, नैतिक केंद्र।
सीमाएँ साफ हैं। आकार बड़ा है। दो सूत्र कभी ढीले पड़ते हैं। सोफिया कभी नायिका, कभी चाल — आलोचना छवि अस्थिर कहती है। विनय की आत्महत्या आदर्श और आवेश दोनों है। सूरदास का आदर्शीकरण गाँधी-छाया तक जाता है। कर्मभूमि 1932 का विषय आंदोलन और नगर-गाँव है; नायक सूरदास नहीं। गोदान 1936 का नायक होरी है, अंत ऋण का है, गोली का नहीं। रंगभूमि इन्हीं अंतरों से पहचानी जाती है।
भक्त-कवि सूरदास अलग पुरुष हैं। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग कर्ण की सभा है। त्यागपत्र 1937 मन का लघु उपन्यास है, सर्वज्ञ विस्तार नहीं। अनामदास का पोथा संस्कृति-आख्यान है। महाभोज चुनाव-तंत्र है। शिखर गोदान कहा जाता है; उद्योग और श्रम-नायक का बड़ा प्रश्न यहीं टिकता है। बिना सूरदास के मूल्यांकन खाली है। बिना पांडेपुर के कारखाना उद्योग-समाचार रह जाता है।
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- हजारीप्रसाद द्विवेदी — अनामदास का पोथा notes — हजारीप्रसाद द्विवेदी का उपन्यास अनामदास का पोथा है। संस्करण राजकमल प्रकाशन का पेपरबैक है। पूरी कृति पढ़नी है, अंश नहीं। प्रकाशन 1976। अंतिम उपन्यास। भीतर…
- मन्नू भंडारी — महाभोज notes — मन्नू भंडारी का उपन्यास महाभोज है। संस्करण राधाकृष्ण प्रकाशन का पेपरबैक है। पूरी कृति पढ़नी है, अंश नहीं। प्रकाशन 1979। रूप राजनीतिक उपन्यास है। देशकाल…
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