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Exam answers is a topic in Hindi novel (Practice) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.
Written-style answers for Hindi novel at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.
Exam answers
1. उपन्यास की परिभाषा लिखिए।8 अंक
उपन्यास गद्य का दीर्घ कथा-रूप है। उसमें जीवन का विस्तार है और चरित्र का विकास है। कहानी एक घटना या एक प्रभाव पर सिमटती है। उपन्यास समय, संबंध और समाज को फैलाता है। नगेन्द्र उपन्यास को गद्य में लिखा वह कथा-रूप कहते हैं जिसमें मानव-जीवन का व्यापक चित्र हो। गोपाल राय उसे आधुनिक मध्यवर्ग का प्रधान कथा-माध्यम मानते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल गद्य के आविर्भाव को आधुनिक काल का चिह्न कहते हैं; उपन्यास उसी गद्य का सबसे बड़ा रूप है। ई.एम. फॉर्स्टर कथा को क्रम और कथानक को कारण कहते हैं। रूप गद्य है, पद्यात्मक महाकाव्य नहीं। विस्तार मध्यम या दीर्घ है। केंद्र साधारण मनुष्य है — कर्म, द्वंद्व, वर्ग और मन।
उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं; चित्रण, मूल्यांकन और प्रश्न भी हैं। तिलिस्मी उपन्यास मनोरंजन प्रधान रहा। प्रेमचंद ने रंगभूमि में समाज का प्रश्न बनाया। जैनेन्द्र ने त्यागपत्र में मन का प्रश्न बनाया। द्विवेदी ने अनामदास का पोथा में संस्कृति का प्रश्न बनाया। मन्नू भंडारी ने महाभोज में तंत्र का प्रश्न बनाया। बिना परिभाषा के इतिहास नामों की सूची रह जाता है। बिना उदाहरण के परिभाषा सूखी रहती है।
निष्कर्ष यह है कि उपन्यास गद्य का दीर्घ कथा-रूप है, जिसके केंद्र में जीवन-विस्तार और चरित्र-विकास हैं।
2. उपन्यास और कहानी में अंतर लिखिए।8 अंक
कहानी एक घटना या एक प्रभाव की संक्षिप्त कथा है। उपन्यास दीर्घ गद्य-कथा है। कहानी के पात्र संकेत रहते हैं; उपन्यास के पात्र बदलते हैं, द्वंद्व रखते हैं। देशकाल कहानी में पृष्ठ है; उपन्यास में दबाव है। गुलेरी की उसने कहा था एक युद्ध-स्मृति पर सिमटती है। गोदान ऋण और किसान-जीवन को फैलाता है। रंगभूमि पांडेपुर की बस्ती और कारखाने को फैलाती है। त्यागपत्र आकार में लघु है, फिर भी उपन्यास है क्योंकि निर्णय और समय फैलते हैं। नाटक संवाद और दृश्य माँगता है; महाकाव्य पद्य और उदात्त नायक माँगता है। यह प्रश्न कहानी बनाम उपन्यास का है।
अंतर विस्तार, चरित्र-विकास और देशकाल के दबाव पर लिखा जाता है। साम्य दोनों गद्य-कथा हैं। नई कहानी और नया उपन्यास व्यक्ति-स्वर में पास भी आते हैं, फिर भी आकार और विन्यास अलग रहते हैं। फॉर्स्टर कथा को क्रम और कथानक को कारण कहते हैं; उपन्यास कारण को लंबा चला सकता है, कहानी एक प्रभाव पर ठहरती है। नगेन्द्र व्यापक जीवन-चित्र उपन्यास से बाँधते हैं।
निष्कर्ष यह है कि कहानी एक प्रभाव है और उपन्यास जीवन का विस्तार है; अंतर केवल लंबाई का नहीं, विन्यास का है।
3. उपन्यास के स्वरूप का विवेचन कीजिए।20 अंक
उपन्यास का स्वरूप पूछता है कि यह कौन-सा कथा-शरीर है। रूप गद्य है, पद्यात्मक महाकाव्य नहीं। विस्तार मध्यम या दीर्घ है; एक बैठक की कहानी नहीं। केंद्र साधारण मनुष्य है — उसका कर्म, द्वंद्व, वर्ग और मन। कहानी एक बिंदु पर चोट करती है; उपन्यास कई बिंदु जोड़ता है। पात्र कहानी में संकेत रहते हैं; उपन्यास में बदलते हैं। देशकाल कहानी में पृष्ठ है; उपन्यास में दबाव है। महाकाव्य पद्य और उदात्त नायक का है — साकेत, कामायनी। नाटक रंगमंच और संवाद माँगता है — अंधेर नगरी। उपन्यास वर्णन, मन और समय माँगता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल गद्य को आधुनिक काल का चिह्न कहते हैं। नगेन्द्र उपन्यास को मानव-जीवन का व्यापक गद्य-चित्र कहते हैं। गोपाल राय उसे आधुनिक मध्यवर्ग का प्रधान कथा-माध्यम मानते हैं।
स्वरूप के भीतर उपभेद हैं, शत्रु नहीं। सामाजिक उपन्यास समाज का प्रश्न है — प्रेमचंद की रंगभूमि और गोदान। ऐतिहासिक-सांस्कृतिक उपन्यास इतिहास के पुरुष को वर्तमान प्रश्न से पढ़ता है — द्विवेदी की बाणभट्ट की आत्मकथा और अनामदास का पोथा। तिलिस्मी-ऐयारी कौतुक है — खत्री का चंद्रकांता। मनोवैज्ञानिक भीतर का निर्णय है — जैनेन्द्र का त्यागपत्र, अज्ञेय का शेखर एक जीवनी। आंचलिक बोली और अंचल का दबाव है — रेणु का मैला आँचल। राजनीतिक तंत्र और चुनाव है — मन्नू का महाभोज। एक कृति दो जातियाँ छू सकती है। रंगभूमि सामाजिक है, औपनिवेशिक तंत्र का स्पर्श भी रखती है। मैला आँचल आंचलिक है, राजनीति भी रखता है।
वाचक और संरचना भी स्वरूप के अंग हैं। सर्वज्ञ वाचक सब मन पढ़ता है — प्रेमचंद का आम मार्ग, महाभोज का घटना-वाचक। उत्तम पुरुष मैं-कथन है — शेखर; त्यागपत्र में प्रमोद। आत्मकथा-ढाँचा बाणभट्ट की आत्मकथा में है। पोथा-ढाँचा अनामदास का पोथा में है। चेतना-प्रवाह भीतर की धारा है — जैनेन्द्र और अज्ञेय के निकट। संरचना आरंभ-मध्य-अंत हो सकती है; आंचल कई रेखाएँ साथ चलाता है। ई.एम. फॉर्स्टर कथा को क्रम और कथानक को कारण कहते हैं। बिना वाचक के स्वरूप केवल लंबाई रह जाता है। बिना कारण के विस्तार घटना-ढेर रह जाता है। उद्देश्य मनोरंजन से आगे चित्रण और प्रश्न है।
सीमा दो हैं। पहला — उपभेदों की सूची में परिभाषा छूट जाती है। दूसरा — पश्चिमी novel का साँचा हिन्दी के आंचल और संस्कृति-आख्यान पर ज्यों का त्यों नहीं बैठता। गुण यह है कि स्वरूप उपन्यास को कहानी, महाकाव्य और नाटक से बचाता है। निर्धारित चार कृतियाँ अलग शरीर रखती हैं — रंगभूमि विस्तृत सामाजिक चित्र, त्यागपत्र लघु मन, अनामदास का पोथा संस्कृति-आख्यान, महाभोज राजनीतिक घटना। गोपाल राय इतिहास से स्वरूप को सोपानों पर चढ़ाते हैं। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग कर्ण की सभा है, उपन्यास का स्वरूप नहीं। बिना निषेध के स्वरूप नामों का ढेर रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि उपन्यास का स्वरूप गद्य, विस्तार, चरित्र-विकास और साधारण मनुष्य है; उपभेद सामाजिक से आंचलिक-राजनीतिक तक उसी स्वरूप के भेद हैं, अलग विधा नहीं।
4. उपन्यास के तत्त्व लिखिए।8 अंक
उपन्यास के छह तत्त्व स्थिर हैं। कथावस्तु घटना और कारण है — फॉर्स्टर कथा को क्रम और कथानक को कारण कहते हैं। चरित्र वह मनुष्य है जो घटना को अर्थ देता है; सपाट एक गुण पर टिकता है, गोल बदलता है। कथोपकथन पात्रों का संवाद है; वह चरित्र खोलता है और कथा बढ़ाता है। देशकाल देश, समय और वातावरण है; वह पृष्ठ नहीं, दबाव है। भाषा-शैली कथन का ढंग है — सरल खड़ी बोली, संस्कृत-गर्भ, व्यंग्य। उद्देश्य चित्रण और प्रश्न है; शुक्ल उसे जीवन की आलोचना से जोड़ते हैं। एक तत्त्व लिखकर छूट जाना अधूरा उत्तर है।
उदाहरण तत्त्व को पहचान देते हैं। रंगभूमि में कथावस्तु ज़मीन और कारखाने से बँधती है, देशकाल पांडेपुर का दबाव है। त्यागपत्र में चरित्र निर्णय से खुलता है, संवाद विचार का है। अनामदास का पोथा में भाषा संस्कृति से गाढ़ी है। महाभोज में उद्देश्य राजनीतिक प्रश्न है, देशकाल सरोहा का चुनाव है। तत्त्व सामग्री हैं; शिल्प उन्हें बाँधने का ढंग है — दृष्टि, संरचना, वाचक। बिना उदाहरण के तत्त्व गिनती रह जाते हैं।
निष्कर्ष यह है कि उपन्यास के तत्त्व कथावस्तु, चरित्र, कथोपकथन, देशकाल, भाषा-शैली और उद्देश्य हैं।
5. उपन्यास के तत्त्व और शिल्प का विवेचन कीजिए।20 अंक
तत्त्व सामग्री हैं। शिल्प उन्हें बाँधने का ढंग है। छह तत्त्व स्थिर हैं — कथावस्तु, चरित्र, कथोपकथन, देशकाल, भाषा-शैली और उद्देश्य। कथावस्तु घटना-क्रम है। फॉर्स्टर कथा को क्रम और कथानक को कारण कहते हैं। आरंभ स्थिति खोलता है, मध्य द्वंद्व बढ़ाता है, अंत निर्णय देता है। प्रेमचंद की कथावस्तु सामाजिक कारण से बँधी है — ऋण, खेत, कारखाना। जैनेन्द्र की कथावस्तु भीतर के निर्णय पर मुड़ती है। गोदान में होरी का अंत संयोग-भर नहीं; ऋण की शृंखला है। त्यागपत्र में घटना कम है, निर्णय अधिक। महाभोज में लाश संयोग नहीं, सत्ता-रक्षा का कारण है। बिना कारण के कथावस्तु कौतुक रह जाती है।
चरित्र वह मनुष्य है जो घटना को अर्थ देता है। सपाट चरित्र एक गुण पर टिकता है। गोल चरित्र बदलता है — होरी, मृणाल, सूरदास, रैक्व, बिसू। नायक देवता नहीं; किसान, भिखारी, स्त्री, दलित हो सकता है। जॉन सेवक और दा साहब तंत्र के आदमी हैं, दैत्य नहीं। कथोपकथन वाणी है — प्रेमचंद बोलचाल, जैनेन्द्र विचार, द्विवेदी शास्त्र-जीवन, मन्नू सभा-दफ्तर। देशकाल दबाव है, पृष्ठ नहीं — गोदान का गाँव ऋण का, पांडेपुर कारखाने का, सरोहा चुनाव का। भाषा खड़ी बोली से संस्कृत-गर्भ और व्यंग्य तक है। उद्देश्य शुक्ल के अनुसार जीवन की आलोचना भी है। एक तत्त्व लिखकर छूट जाना अधूरा उत्तर है।
शिल्प दृष्टि, संरचना और वाचक से खुलता है। लुबॉक दृष्टि को केंद्र कहते हैं। सर्वज्ञ वाचक सब मन पढ़ता है — रंगभूमि, महाभोज। उत्तम पुरुष मैं-कथन है — त्यागपत्र का प्रमोद, शेखर एक जीवनी। चेतना-प्रवाह भीतर की धारा है। आत्मकथा और पोथा-ढाँचा उपभेद हैं। रंगभूमि दो सिरे चलाती है फिर एक करती है। त्यागपत्र स्मृति मोड़ती है। अनामदास का पोथा पांडुलिपि में आख्यान रखता है। महाभोज लाश से थाना-प्रेस तक घटना बाँधता है। नामवर सिंह नए उपन्यास के शिल्प पर बोलते हैं। तत्त्व बिना शिल्प के ढेर हैं। शिल्प बिना तत्त्व के खाली प्रयोग है।
संबंध यह है कि प्रेमचंद तत्त्व समाज से भरते हैं, दृष्टि सरल रखते हैं। अज्ञेय शिल्प को चेतना से तेज करते हैं। रेणु भाषा को आंचल से रंगते हैं। द्विवेदी वाचक को संस्कृति का संकलक बनाते हैं। सीमा संयोग का बोझ, उपकथा का बिखराव, और शिल्प का कथा ढक लेना है। गुण यह है कि तत्त्व सामग्री देते हैं और शिल्प मन तथा तंत्र को पकड़ते हैं। निर्धारित चार कृतियाँ तत्त्व एक हैं, विन्यास अलग है। गोदान शिखर है, पत्र निर्धारित नहीं। सुनीता त्यागपत्र नहीं। नाटक-रूपांतर महाभोज की दूसरी विधा है।
निष्कर्ष यह है कि तत्त्व छह हैं और शिल्प दृष्टि-संरचना-वाचक है; दोनों मिलकर उपन्यास पूरा होता है, अकेले सूची या अकेले प्रयोग नहीं।
6. हिन्दी उपन्यास के उद्भव पर प्रकाश डालिए।8 अंक
हिन्दी उपन्यास का उद्भव उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में है। पृष्ठभूमि प्रेस, शिक्षा, अनुवाद और नवजागरण है। लाला श्रीनिवास दास का परीक्षा गुरु 1882 प्रायः प्रथम मौलिक उपन्यास माना जाता है। विषय व्यापार, नैतिक परीक्षा और नगर का मध्यवर्ग है। भाषा खड़ी बोली गद्य है। श्रद्धाराम फिल्लौरी की भाग्यवती 1877 पहले आती है; वह उपदेश-प्रधान स्त्री-शिक्षा की कथा है। कुछ इतिहास उसे उपन्यास की सीमा पर रखते हैं, कुछ प्रथम कहते हैं। इंशा अल्ला खाँ की रानी केतकी की कहानी गद्य-कथा है, आधुनिक उपन्यास का पूरा रूप नहीं। परीक्षा गुरु पर सहमति इसलिए अधिक है कि उसमें नगर, चरित्र-विकास और मौलिक हिन्दी गद्य मिलते हैं।
उद्भव का अर्थ एक तिथि नहीं। अर्थ यह है कि हिन्दी गद्य ने दीर्घ कथा अपनाई। भारतेंदु युग नाटक और निबंध में अधिक शक्ति रखता है; उपन्यास अभी सीख रहा है। बंकिम का प्रभाव पढ़ने की रुचि बढ़ाता है। अंग्रेज़ी उपन्यास संरचना देता है। शुक्ल गद्य को आधुनिक काल का चिह्न कहते हैं। गोपाल राय इतिहास सोपानों से बाँधते हैं। बिना विवाद लिखे उद्भव अधूरा है, बिना सहमति के विवाद अधूरा है।
निष्कर्ष यह है कि उद्भव 1882 परीक्षा गुरु से पहचाना जाता है और भाग्यवती 1877 का विवाद साथ लिखा जाता है।
7. हिन्दी उपन्यास के उद्भव और विकास का विवेचन कीजिए।20 अंक
हिन्दी उपन्यास का उद्भव उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में है। पृष्ठभूमि प्रेस, शिक्षा, अनुवाद और नवजागरण है। लाला श्रीनिवास दास का परीक्षा गुरु 1882 प्रायः प्रथम मौलिक उपन्यास माना जाता है — व्यापार, नैतिक परीक्षा, नगर का मध्यवर्ग; भाषा खड़ी बोली गद्य। श्रद्धाराम फिल्लौरी की भाग्यवती 1877 पहले आती है; उपदेश-प्रधान स्त्री-शिक्षा है। कुछ इतिहास उसे सीमा पर रखते हैं, कुछ प्रथम कहते हैं। इंशा अल्ला खाँ की रानी केतकी की कहानी गद्य-कथा है, पूरा उपन्यास नहीं। सहमति परीक्षा गुरु पर इसलिए अधिक है कि नगर, चरित्र-विकास और मौलिक हिन्दी गद्य मिलते हैं। भारतेंदु युग नाटक-निबंध में अधिक शक्ति रखता है; उपन्यास अभी सीख रहा है। उद्भव का अर्थ एक तिथि नहीं; अर्थ यह है कि हिन्दी गद्य ने दीर्घ कथा अपनाई।
विकास का पहला बड़ा सोपान तिलिस्मी-ऐयारी और द्विवेदी-आदर्श है। देवकीनंदन खत्री का चंद्रकांता 1888 के आसपास तिलिस्म, ऐयार और राजकुमार से पाठक बढ़ाता है। आलोचना उसे कला का शिखर नहीं मानती; इतिहास उसे पाठक-निर्माण मानता है। किशोरीलाल गोस्वामी ऐतिहासिक-रमानी कथा लिखते हैं। गोपालराम गहमरी जासूसी गद्य चलाते हैं। द्विवेदी युग भाषा-शुद्धि और आदर्श जोड़ता है। उपन्यास अभी प्रेमचंद जितना सामाजिक नहीं। वह पाठक जोड़ता है, प्रश्न गहरा नहीं करता। बिना खत्री के पाठक-समुदाय पतला रहता। बिना प्रेमचंद के तिलिस्म ही उपन्यास रह जाता। सोपान का अर्थ सीढ़ी है — प्रत्येक सीढ़ी अगली को संभव बनाती है। गोपाल राय इसी क्रम को इतिहास का कंकाल बनाते हैं।
दूसरा सोपान प्रेमचंद युग है। धनपत राय ‘प्रेमचंद’ 1880–1936, लमही, वाराणसी। सेवासदन 1918 नारी-नैतिकता, प्रेमाश्रम 1921 किसान, रंगभूमि 1925 उद्योग और श्रम, गबन 1931 मध्यवर्गीय लोभ, कर्मभूमि 1932 आंदोलन, गोदान 1936 होरी और ऋण — शिखर। भाषा खड़ी बोली, दृष्टि यथार्थ; आदर्श कभी चित्र के साथ रहता है। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। जयशंकर प्रसाद कंकाल, तितली में संस्कृति छूते हैं। वृंदावनलाल वर्मा ऐतिहासिक उपन्यास चलाते हैं। उपन्यास समाज का प्रधान माध्यम बनता है। किसान, स्त्री, श्रम, नगर-कर्मचारी नायक बनते हैं। रंगभूमि पत्र की निर्धारित कृति है। गोदान शिखर-नाम है, यह पत्र निर्धारित नहीं। कर्मभूमि अलग विषय है। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग कविता है, यह विकास-पंक्ति नहीं।
तीसरा सोपान प्रेमचंदोत्तर मन और संस्कृति है — जैनेन्द्र त्यागपत्र 1937, अज्ञेय शेखर एक जीवनी, यशपाल झूठा सच, द्विवेदी बाणभट्ट की आत्मकथा और अनामदास का पोथा 1976। चौथा आंचल और व्यंग्य है — नागार्जुन बलचनमा, रेणु मैला आँचल 1954, श्रीलाल शुक्ल राग दरबारी। पाँचवाँ समकालीन स्त्री-राजनीति है — मन्नू महाभोज 1979, सोबती, साहनी तमस। विकास निषेध और ग्रहण दोनों है। खत्री पाठक देते हैं, प्रेमचंद यथार्थ, जैनेन्द्र मन, रेणु आंचल, मन्नू तंत्र। सीमा यह कि हर सोपान को केवल एक नाम से बाँधना अधूरा है। निर्धारित चार लेखक इन्हीं मोड़ों के शिखर-नाम हैं।
निष्कर्ष यह है कि उद्भव परीक्षा गुरु 1882 से पहचाना जाता है — भाग्यवती का विवाद साथ — और विकास तिलिस्म, प्रेमचंद-यथार्थ, मनोविज्ञान, आंचल तथा समकालीन राजनीति के सोपानों से चलता है।
8. प्रेमचंद युग का महत्त्व लिखिए।8 अंक
धनपत राय ‘प्रेमचंद’ का जन्म 31 जुलाई 1880, लमही, वाराणसी। निधन 8 अक्टूबर 1936। उर्दू में नवाब राय भी कहा गया। हिन्दी उपन्यास का केंद्र-नाम वही हैं। सेवासदन 1918 नारी-नैतिकता का पहला बड़ा सामाजिक उपन्यास माना जाता है। प्रेमाश्रम 1921 किसान और खेत-प्रश्न। रंगभूमि 1925 सूरदास और औद्योगिक नगर का टकराव — पत्र की निर्धारित कृति। गबन 1931 मध्यवर्गीय लोभ। कर्मभूमि 1932 आंदोलन, पत्र निर्धारित नहीं। गोदान 1936 होरी और ऋण — शिखर। भाषा खड़ी बोली है। दृष्टि यथार्थवादी है। आदर्श कभी चित्र के साथ रहता है। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष रहे।
युग का अर्थ केवल एक लेखक नहीं। उपन्यास समाज का प्रधान माध्यम बना। किसान, स्त्री, श्रम और कर्मचारी नायक बने। जयशंकर प्रसाद संस्कृति छूते हैं। वृंदावनलाल वर्मा ऐतिहासिक उपन्यास चलाते हैं। स्वर यथार्थ और आदर्श का योग है। सीमा आदर्श का बोझ है। गुण यह है कि हिन्दी उपन्यास को किसान और नगर दोनों मिले। भक्त-कवि सूरदास और रश्मिरथी का कर्ण यह युग नहीं।
निष्कर्ष यह है कि प्रेमचंद युग का महत्त्व यथार्थ, किसान-नगर और खड़ी बोली से है; गोदान शिखर-नाम है, रंगभूमि निर्धारित कृति है।
9. आंचलिक उपन्यास किसे कहते हैं?8 अंक
आंचलिक उपन्यास उस कथा-रूप को कहते हैं जिसमें किसी विशेष अंचल की बोली, रीति, प्रकृति और राजनीति केंद्र हों। आंचल पृष्ठ नहीं, दबाव है। फणीश्वरनाथ रेणु का मैला आँचल 1954 इस धारा का शिखर है। मेरीगंज नाम और बोली वाला आंचल है। परती परिकथा आगे की कृति है। नागार्जुन का बलचनमा 1952 मिथिला-किसान का स्वर है, आंचल के निकट है। अमृतलाल नागर बूँद और समुद्र में नगर-संस्कृति फैलाते हैं। प्रेमचंद का गाँव सामान्य गाँव है; रेणु का गाँव नाम, गीत और बोली वाला आंचल है। दोनों ग्रामीण हैं; शिल्प अलग है। पांडेपुर रंगभूमि की बस्ती है, रेणु का आंचल नहीं। सरोहा महाभोज का चुनाव-कस्बा है, आंचल-धारा नहीं।
शिल्प कई सूत्र साथ चलाता है — गीत, रोग, चुनाव, नेता। आंचलिकता लोक-रंग भरना मात्र नहीं; वह आंचल को विश्व का नमूना बनाती है। सीमा यह कि आंचल कभी संग्रहालय रह जाता है। गुण यह कि हिन्दी उपन्यास महानगर के कमरे से निकलता है। गोपाल राय इतिहास में रेणु को आंचल-जन के सोपान पर रखते हैं। बिना नाम-बोली-रीति के आंचल सामान्य ग्राम-चित्र रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि आंचलिक उपन्यास अंचल को कथा का दबाव बनाता है; प्रतिनिधि रेणु हैं और कृति मैला आँचल है।
10. हिन्दी उपन्यास के प्रमुख सोपान लिखिए।20 अंक
सोपान विकास की सीढ़ियाँ हैं; प्रत्येक अगली को संभव बनाती है, स्वयं अंतिम नहीं। पहला सोपान उद्भव है। उन्नीसवीं के उत्तरार्ध में प्रेस और अनुवाद पृष्ठभूमि हैं। परीक्षा गुरु 1882, लाला श्रीनिवास दास, प्रायः प्रथम मौलिक — व्यापार, नैतिक परीक्षा, नगर। भाग्यवती 1877, श्रद्धाराम फिल्लौरी, उपदेश और स्त्री-शिक्षा — प्रथम होने का विवाद। रानी केतकी की कहानी गद्य-कथा है, पूरा उपन्यास नहीं। भारतेंदु-युगीन नाटक-निबंध शक्ति रखते हैं; दीर्घ कथा अभी बैठ रही है। यह सीढ़ी गद्य को कथा-रूप देती है। बिना वर्ष और विवाद के उद्भव अधूरा लिखा जाता है। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं।
दूसरा सोपान लोकप्रिय गद्य है — तिलिस्मी-ऐयारी, ऐतिहासिक-रमानी और जासूसी। चंद्रकांता खत्री की पहचान है। गोस्वामी इतिहास-रमानी चलाते हैं। गहमरी जासूसी गद्य चलाते हैं। द्विवेदी युग भाषा-शुद्धि और आदर्श जोड़ता है। पाठक बनते हैं, प्रश्न पतला रहता है। आलोचना कला का शिखर यहाँ नहीं खोजती; इतिहास पाठक-समुदाय यहाँ खोजता है। तीसरा सोपान प्रेमचंद युग है — सेवासदन 1918 से गोदान 1936 तक यथार्थ। किसान, स्त्री, नगर, ऋण। खड़ी बोली बोलचाल की। रंगभूमि 1925 निर्धारित कृति है; नायक सूरदास, विषय उद्योग और बस्ती। गोदान शिखर-नाम है; नायक होरी। प्रसाद और वर्मा साथ की शाखाएँ हैं — संस्कृति और इतिहास। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष प्रेमचंद रहे। यही हिन्दी उपन्यास का केंद्र-सोपान है। कर्मभूमि 1932 आंदोलन छूती है, पत्र निर्धारित नहीं।
चौथा सोपान प्रेमचंदोत्तर मनोविज्ञान और संस्कृति-इतिहास है। जैनेन्द्र कुमार त्यागपत्र 1937, सुनीता 1935; पाजेब कहानी अलग। अज्ञेय शेखर एक जीवनी 1941–44; नदी के द्वीप 1952 उपन्यास है, कविता अलग कृति। यशपाल झूठा सच में विभाजन रखते हैं। इलाचंद्र जोशी और सियारामशरण गुप्त मन के निकट हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी बाणभट्ट की आत्मकथा 1946, चारु चंद्रलेख 1963, पुनर्नवा 1973, अनामदास का पोथा 1976। महावीर प्रसाद द्विवेदी इस सोपान के उपन्यासकार नहीं। भीतर का निर्णय और संस्कृति की स्मृति यहीं खुलते हैं। यह प्रेमचंद का निषेध नहीं, अगली परत है। आलंबन खेत से मन और स्मृति की ओर मुड़ता है। वाचक सर्वज्ञ से उत्तम पुरुष और पांडुलिपि तक जाता है। नामवर नए उपन्यास के शिल्प को इसी मोड़ से पढ़ते हैं।
पाँचवाँ सोपान आंचल, व्यंग्य और समकालीन राजनीति है। मैला आँचल 1954, मेरीगंज आंचल। बलचनमा 1952 मिथिला-किसान। राग दरबारी 1968 विकास-गाँव का व्यंग्य। तमस 1973 साम्प्रदायिकता। महाभोज 1979 लाश और चुनाव। आपका बंटी 1971 परिवार; मन्नू की दूसरी बड़ी कृति राजनीति है। गोपाल राय इतिहास इन्हीं मोड़ों से बाँधते हैं। निर्धारित चार लेखक — प्रेमचंद, जैनेन्द्र, द्विवेदी, मन्नू — अलग-अलग सोपान के शिखर-नाम हैं। सीमा यह कि स्त्री-स्वर और दलित गवाही को केवल अंतिम तिथि कह देना मूल्यांकन को रोकता है; विमर्श तत्त्व नहीं बदलता, वाचक और आलंबन बदलता है। प्रेमचंद का गाँव सामान्य गाँव है; रेणु का नाम-बोली वाला आंचल है। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग इस सोपान-क्रम में नहीं आता।
निष्कर्ष यह है कि प्रमुख सोपान उद्भव, तिलिस्म-आदर्श, प्रेमचंद-यथार्थ, प्रेमचंदोत्तर मन-संस्कृति, फिर आंचल-व्यंग्य-समकालीन हैं; प्रत्येक अगला पिछले का निषेध और ग्रहण दोनों है।
11. प्रमुख हिन्दी उपन्यासकारों का परिचय दीजिए।20 अंक
प्रमुख उपन्यासकार नाम, कृति, वर्ष और धारा से पहचाने जाते हैं। बिना धारा के नाम सूची रह जाता है। उद्भव के नाम लाला श्रीनिवास दास और श्रद्धाराम फिल्लौरी हैं। परीक्षा गुरु 1882 व्यापार और नैतिक परीक्षा का नगर-गद्य है। भाग्यवती 1877 स्त्री-शिक्षा का उपदेश है; प्रथम होने का विवाद साथ लिखा जाता है। इंशा अल्ला खाँ गद्य-कथा देते हैं, पूरा उपन्यास नहीं। लोकप्रिय गद्य के नाम देवकीनंदन खत्री, किशोरीलाल गोस्वामी और गोपालराम गहमरी हैं। चंद्रकांता तिलिस्मी-ऐयारी है। गोस्वामी ऐतिहासिक-रमानी कथा चलाते हैं। गहमरी जासूसी गद्य चलाते हैं। काम खड़ी बोली कथा को व्यापक पाठक तक पहुँचाना है, शिल्प का शिखर नहीं। भारतेंदु मंडल नाटक-निबंध में बड़ा है; उपन्यास अभी इन नामों से सीख रहा है।
केंद्र-नाम प्रेमचंद हैं — जन्म 31 जुलाई 1880 लमही, निधन 8 अक्टूबर 1936 वाराणसी; उर्दू में नवाब राय। सेवासदन 1918, प्रेमाश्रम 1921, रंगभूमि 1925, गबन 1931, कर्मभूमि 1932, गोदान 1936। यथार्थ दृष्टि, खड़ी बोली, किसान-स्त्री-श्रम। रंगभूमि पत्र की निर्धारित कृति है; नायक सूरदास, देशकाल पांडेपुर। गोदान शिखर है; नायक होरी; यह पत्र निर्धारित नहीं। जयशंकर प्रसाद कंकाल, तितली लिखते हैं — संस्कृति और नारी; उपन्यास में गौण शिखर, कहानी-नाटक में बड़े। वृंदावनलाल वर्मा झाँसी की रानी, मृगनयनी से ऐतिहासिक शाखा चलाते हैं। 1936 में प्रेमचंद प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। प्रगतिवाद का वर्ग-सूत्र पूरा उनका पर्याय नहीं; वे सामाजिक यथार्थ के उपन्यासकार हैं। भक्त-कवि सूरदास और रश्मिरथी का कर्ण यह परिचय नहीं।
मनोविज्ञान और संस्कृति के नाम जैनेन्द्र कुमार, अज्ञेय, यशपाल और हजारीप्रसाद द्विवेदी हैं। जैनेन्द्र 1905–1988, कौड़ियागंज; बचपन आनंदीलाल; त्यागपत्र 1937 निर्धारित, सुनीता 1935 अलग, पाजेब कहानी अलग; पद्म भूषण 1971; साहित्य अकादमी 1979 उपन्यास मुक्तिबोध पर — कवि मुक्तिबोध अलग। अज्ञेय शेखर एक जीवनी 1941–44; नदी के द्वीप उपन्यास 1952। यशपाल झूठा सच विभाजन का दस्तावेज है। द्विवेदी 1907–1979, बलिया; बचपन वैद्यनाथ; बाणभट्ट की आत्मकथा 1946, अनामदास का पोथा 1976 निर्धारित; पद्म भूषण 1957; साहित्य अकादमी 1973 आलोक पर्व पर। महावीर प्रसाद द्विवेदी भाषा-शुद्धि के आचार्य हैं, यह उपन्यासकार नहीं। इलाचंद्र जोशी मन के निकट हैं। साम्य खड़ी बोली और आधुनिक मनुष्य है। वैषम्य आलंबन पर है — खेत, मन, स्मृति।
आंचल और समकालीन के नाम फणीश्वरनाथ रेणु, नागार्जुन, श्रीलाल शुक्ल, मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती और भीष्म साहनी हैं। मैला आँचल 1954 आंचल का शिखर; परती परिकथा आगे। बलचनमा 1952 किसान। राग दरबारी 1968 व्यंग्य। मन्नू 1931–2021, भानपुरा; बचपन महेंद्र कुमारी; आपका बंटी 1971 परिवार, महाभोज 1979 निर्धारित राजनीतिक; अकेली कहानी अलग; पति राजेंद्र यादव का सारा आकाश यह कृति नहीं। सोबती ज़िंदगीनामा स्मृति हैं। साहनी तमस साम्प्रदायिकता हैं। निर्धारित चार — प्रेमचंद, जैनेन्द्र, द्विवेदी, मन्नू — इसी परिचय की रीढ़ हैं। संबंध निषेध और ग्रहण दोनों है। खत्री पाठक, प्रेमचंद यथार्थ, जैनेन्द्र मन, रेणु आंचल, द्विवेदी स्मृति, मन्नू तंत्र। बिना कृति और वर्ष के परिचय अधूरा है।
निष्कर्ष यह है कि प्रमुख उपन्यासकार परीक्षा गुरु से महाभोज तक सोपान और कृति के साथ पहचाने जाते हैं; केंद्र प्रेमचंद हैं, आगे मन, संस्कृति, आंचल और तंत्र के नाम हैं।
12. मनोवैज्ञानिक उपन्यास की विशेषताएँ लिखिए।8 अंक
मनोवैज्ञानिक उपन्यास भीतर के द्वंद्व, निर्णय और चेतना को कथा का केंद्र बनाता है। घटना कम हो सकती है, निर्णय घना होता है। संवाद विचार का होता है। दृष्टि सीमित या उत्तम पुरुष की होती है। जैनेन्द्र कुमार हिन्दी में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक माने जाते हैं — सुनीता 1935, त्यागपत्र 1937 निर्धारित। अज्ञेय शेखर एक जीवनी में उत्तम पुरुष और चेतना-प्रवाह चलाते हैं। इलाचंद्र जोशी निकट की पंक्ति हैं। प्रेमचंद बाहर का समाज दिखाते हैं — ऋण, कारखाना, गोली। यह धारा भीतर का कारण दिखाती है — दृष्टि, इंकार, अपराध-बोध। त्यागपत्र में मृणाल का इंकार और प्रमोद की दुविधा दो मन हैं।
विशेषताएँ चार हैं — अंतर्मन, सीमित या उत्तम दृष्टि, गोल चरित्र, नैतिक द्वंद्व। रंगभूमि सर्वज्ञ सामाजिक चित्र है, यह धारा नहीं। सीमा यह कि मनोविज्ञान कभी समाज से कट जाता है; दुरुहता पाठक काट सकती है। गुण यह कि चरित्र गहरा होता है। नामवर नए उपन्यास के शिल्प को इसी मोड़ से पढ़ते हैं। पाजेब कहानी है, यह रूप नहीं।
निष्कर्ष यह है कि मनोवैज्ञानिक उपन्यास अंतर्मन और निर्णय से पहचाना जाता है; प्रतिनिधि जैनेन्द्र और अज्ञेय हैं, निर्धारित कृति त्यागपत्र है।
13. प्रेमचंद और प्रेमचंदोत्तर उपन्यास का साम्य-वैषम्य लिखिए।20 अंक
प्रेमचंद युग सामाजिक यथार्थ, किसान, नगर और खड़ी बोली का है। काल-केंद्र 1880–1936 है; कृति-केंद्र सेवासदन 1918 से गोदान 1936 तक। वाचक प्रायः सर्वज्ञ है। आदर्श कभी चित्र के साथ रहता है। नायक होरी, सूरदास, मध्यवर्गीय कर्मचारी जैसे साधारण मनुष्य हैं। प्रेमचंदोत्तर 1936 के बाद का मोड़ है। जैनेन्द्र, अज्ञेय, यशपाल, द्विवेदी, रेणु, नागार्जुन, श्रीलाल शुक्ल, मन्नू आगे की पंक्ति हैं। मन, शिल्प, आंचल, व्यंग्य और तंत्र खुलते हैं। यह मोड़ प्रेमचंद का निषेध नहीं, उसकी अगली परत है। गोदान 1936 और त्यागपत्र 1937 एक वर्ष के अंतर पर दो शिखर हैं — बाहर का ऋण और भीतर का निर्णय। पत्र की निर्धारित कृतियाँ दोनों धाराओं को छूती हैं — रंगभूमि प्रेमचंद युग, त्यागपत्र-पोथा-महाभोज प्रेमचंदोत्तर। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; दोनों धाराएँ उसी गद्य पर बैठती हैं।
साम्य चार बिंदुओं पर है। पहला — आधुनिक मनुष्य और तिलिस्म से कटान। दूसरा — खड़ी बोली गद्य। तीसरा — उपन्यास को जीवन का माध्यम मानना, केवल कौतुक नहीं। चौथा — साधारण नायक की संभावना। गोदान का होरी और त्यागपत्र की मृणाल दोनों गोल चरित्र हैं, मार्ग अलग हैं। रंगभूमि का सूरदास सामाजिक टकराव है; महाभोज का बिसू राजनीतिक टकराव है — दोनों श्रम और हक के पुरुष हैं। नगेन्द्र व्यापक जीवन-चित्र कहते हैं; प्रेमचंद चौड़ाई देते हैं, बाद वाले नया आलंबन देते हैं। सेवासदन नारी-नैतिकता छूता है; त्यागपत्र नारी-निर्णय छूता है।
वैषम्य आलंबन और दृष्टि पर है। प्रेमचंद बाहर का समाज और कारण दिखाते हैं — ऋण, कारखाना, गोली, खेत। जैनेन्द्र भीतर का निर्णय दिखाते हैं — दृष्टि, इंकार, पद-त्याग। अज्ञेय चेतना और व्यक्ति दिखाते हैं। द्विवेदी संस्कृति की स्मृति दिखाते हैं। रेणु आंचल दिखाते हैं — प्रेमचंद का गाँव सामान्य गाँव है, रेणु का गाँव नाम-बोली वाला आंचल है। मन्नू सत्ता की घटना दिखाती हैं। यशपाल इतिहास की चोट दिखाते हैं। श्रीलाल शुक्ल तंत्र की हँसी दिखाते हैं। शिल्प प्रेमचंद में वर्णन-संवाद-टिप्पणी है; बाद में उत्तम पुरुष और पोथा-ढाँचा तेज होते हैं। गोपाल राय सोपान बाँधते हैं, एक को रद्द नहीं करते।
सीमा दोनों ओर लिखी जाती है। प्रेमचंद पर आदर्श और उपदेश का आक्षेप है; कभी चित्र पर सवार हो जाता है। रंगभूमि में मज़दूर-संगठन गोदान के किसान जितना नहीं फैलता। प्रेमचंदोत्तर पर समाज-कटान या शिल्प-बोझ का आक्षेप है। जैनेन्द्र दुरुह कहे जाते हैं। द्विवेदी संस्कृत-भार रखते हैं। रेणु आंचल को संग्रहालय बना सकते हैं। मन्नू में दा साहब का आकर्षण पीड़ा को ढक सकता है। रेणु और यशपाल समाज वापस लाते हैं, पर प्रेमचंद का सादा वाचक नहीं रखते। मूल्यांकन एक को रद्द करके नहीं होता। निर्धारित चार में एक प्रेमचंद, तीन बाद — यही पत्र का संतुलन है। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग कविता है, यह युग-तुलना नहीं। बिना इन अंतरों के साम्य-वैषम्य अधूरा है।
निष्कर्ष यह है कि साम्य आधुनिक गद्य-कथा और साधारण मनुष्य पर है, वैषम्य समाज बनाम मन-शिल्प-आंचल-तंत्र पर है; प्रेमचंद केंद्र हैं, प्रेमचंदोत्तर उसकी अगली परत है, शत्रु-धारा नहीं।
14. रंगभूमि का नामकरण स्पष्ट कीजिए।8 अंक
रंगभूमि प्रेमचंद का सामाजिक उपन्यास है। प्रकाशन 1925। नाम जीवन को कर्म और नीति की परीक्षा बनाता है। नायक सूरदास पांडेपुर का अंधा भिखारी है; वह गाता है कि मनुष्य इस कर्म-भूमि में आकर शक्ति दिखाता है, धर्म-नीति तोड़कर रण से मुँह नहीं मोड़ सकता। अर्थ यह है कि आकर कर्म करना है, भागना धर्म नहीं। रूप सामाजिक उपन्यास है। इतिहास का स्पर्श औपनिवेशिक तंत्र और सिगरेट-कारखाना है। राजनीतिक उपन्यास पूरा नहीं; आंदोलन एक अंग है। आंचलिक उपन्यास नहीं; पांडेपुर नाम की बस्ती है, रेणु का बोली-आंचल नहीं। वाचक सर्वज्ञ है। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली है। दो सूत्र हैं — कारखाना और सोफिया-विनय का प्रेम; नाम दोनों को कर्म-परीक्षा पर लाता है।
यह नाम रश्मिरथी के प्रथम सर्ग से नहीं जुड़ता। वहाँ रंगभूमि सभा है, कर्ण है, जाति-प्रश्न धनुष पर है। यहाँ सूरदास है, ज़मीन का प्रश्न है। भक्त-कवि सूरदास भक्ति-काव्य के पुरुष हैं, यह गद्य-नायक नहीं। कर्मभूमि 1932 अलग उपन्यास है। बिना सूरदास के पद के शीर्षक सूखा रहता है।
निष्कर्ष यह है कि नामकरण सूरदास के कर्म-नीति पद और जीवन-परीक्षा से है; कृति 1925 की रंगभूमि है, रश्मिरथी का सर्ग या कर्मभूमि नहीं।
15. सूरदास का चरित्र-चित्रण कीजिए।8 अंक
सूरदास पांडेपुर का अंधा भिखारी है। उपन्यास उसे चमार कहता है। प्रश्न जाति-नाम का अपमान नहीं, नायकत्व का है। गुण गाने-बजाने, भक्ति, सरलता और स्वाभिमान हैं। शरीर क्षीण है, दृष्टि नहीं है, कर्म है। पुश्तैनी ज़मीन उसने मुहल्ले के पशुओं के चरने के लिए छोड़ रखी है। जॉन सेवक का प्रलोभन ठुकराता है; मुँहमाँगी कीमत भी नहीं लेता। इंकार निजी लोभ नहीं, सार्वजनिक उपयोग का तर्क है। जन-आंदोलन हिंसा से नहीं, संगठन से चलाता है। जोज़फ क्लार्क की गोली कंधे पर लगती है। मृत्यु अस्पताल में होती है। जहाँ झोपड़ी थी, वहाँ मूर्ति बैठती है। रानी जान्हवी चरणों पर सिर रखती है।
भक्त-कवि सूरदास भक्ति-काव्य के पुरुष हैं; यह प्रेमचंद का गद्य-नायक है। होरी गोदान का किसान है, ऋण से बँधा; यह सूरदास ज़मीन और कारखाने से टकराता है। रश्मिरथी का कर्ण यह नहीं। अंधत्व दया का उपकरण नहीं; वह कथा का कर्ता है। आदर्श सत्य और अहिंसा उसके पास हैं। सीमा आदर्शीकरण है — मनुष्य प्रतीक बन सकता है। फिर भी श्रम-नायक का इतना बड़ा रूप दुर्लभ है।
निष्कर्ष यह है कि सूरदास अंधा भिखारी और आंदोलन का नायक है; पहचान ज़मीन, इंकार और शहादत से है, भक्त-कवि या होरी से नहीं।
16. रंगभूमि की कथावस्तु लिखिए।20 अंक
रंगभूमि प्रेमचंद का निर्धारित सामाजिक उपन्यास है। प्रकाशन 1925। नायक सूरदास पांडेपुर का अंधा भिखारी है। भक्त-कवि सूरदास यह पुरुष नहीं। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग कर्ण की सभा है, यह कथावस्तु नहीं। देशकाल बनारस के बाहर की गरीब बस्ती है। पुश्तैनी ज़मीन मुहल्ले के पशुओं के चरने के लिए छोड़ी गई है। जॉन सेवक उसी भूमि पर सिगरेट का कारखाना चाहता है। पहला सूत्र यहीं खुलता है। पाँच रुपये का प्रलोभन ठुकराया जाता है। मुँहमाँगी कीमत भी नहीं ली जाती। इंकार सार्वजनिक उपयोग का तर्क है, निजी हठ नहीं। राजा महेंद्र और जोज़फ क्लार्क पूँजी के साथ आते हैं। ज़मीन छिनती है। कारखाना उठता है। झोपड़ियाँ तोड़ी जाती हैं। सूरदास जन-आंदोलन खड़ा करता है।
दूसरा सूत्र प्रेम का है। सोफिया जॉन सेवक की पुत्री है। धर्म पर विश्वास रखती है, अंधश्रद्धा पर नहीं। विनय सिंह कुंवर भरत सिंह और रानी जान्हवी के पुत्र हैं। जाति और धर्म प्रेम को रोकते हैं। माता-पिता विवाह क्लार्क से चाहते हैं। हृदय विनय के पास रहता है। विनय जाति-सेवा में गिरफ्तार होते हैं। सोफिया जेल तक पहुँचती है। लौटकर सेवा भवन जाती है। जान्हवी अंत में विवाह मानती है। इंदु राजा महेंद्र की पत्नी हैं; प्रजा और सूरदास के पक्ष में पति से मतभेद रखती हैं। यह सूत्र कारखाने से अलग लगता है; बाद में एक हो जाता है।
मध्य में दोनों सिरे बेदखली पर मिलते हैं। विनय, सोफिया और इंदु आंदोलन में सूरदास का साथ देते हैं। सिपाही बस्ती उजाड़ते हैं। क्लार्क सूरदास पर पिस्तौल चलाता है। गोली कंधे पर लगती है। सोफिया घायल को अस्पताल ले जाती है। भीड़ विनय को रईस का बेटा कहकर अपमानित करती है। विनय पिस्तौल से स्वयं को मारते हैं। सूरदास अस्पताल में मरता है। शहीद का दर्जा सूरदास को मिलता है। सोफिया विनय के बाद गंगा में उतरती है। जहाँ झोपड़ी थी, वहाँ मूर्ति बैठती है। रानी जान्हवी चरणों पर सिर रखती है।
फॉर्स्टर कथा को क्रम और कथानक को कारण कहते हैं। क्रम घटनाओं का है। कारण पूँजी और राज्य हैं; प्रेम उपकथा नहीं, उसी समाज की दूसरी साँस है। गोदान में होरी की मृत्यु ऋण की शृंखला है। यहाँ मृत्यु गोली, आत्महत्या और गंगा तीन रूपों में है। कर्मभूमि 1932 अलग कृति है; नायक सूरदास नहीं। वाचक सर्वज्ञ है; टिप्पणी सूरदास-पक्ष में झुकती है। सीमा दो सूत्रों का आरंभ में ढीला लगना है। गुण यह कि उद्योग, जाति, प्रेम और मृत्यु एक शरीर में आते हैं।
निष्कर्ष यह है कि रंगभूमि की कथावस्तु ज़मीन-कारखाना और सोफिया-विनय दो सूत्रों से चलकर गोली, आत्महत्या और गंगा पर समाप्त होती है; केंद्र सूरदास का प्रतिरोध है, रश्मिरथी का सर्ग नहीं।
17. जॉन सेवक का चरित्र लिखिए।8 अंक
जॉन सेवक ईसाई पूँजीपति है। जानसेवक वही नाम है। पत्नी मिसेज जॉन सेवक हैं। पुत्र प्रभु सेवक है। पुत्री सोफिया है। वह पांडेपुर में सिगरेट का कारखाना खोलना चाहता है। सूरदास को पहले भिखारी जानकर दुत्कारता है। फिर पता चलता है कि प्रस्तावित कारखाने की ज़मीन उसी की है। प्रलोभन और कीमत दोनों दिखाता है। इंकार के बाद राजा महेंद्र और जोज़फ क्लार्क को अपने पक्ष में करता है। ज़मीन छिनती है। कारखाना उठता है। बाहर के मज़दूर आते हैं। शराब, ताड़ी और देह-व्यापार बस्ती में घुसते हैं। कुछ मुहल्ले वाले लालच में कारखाने के साथ हो जाते हैं।
धर्म का मुखौटा और व्यापार का स्वार्थ एक व्यक्ति में हैं। वह कारखाना प्रगति और लाभ दोनों से देखता है। सूरदास की आन उसके हिसाब से अड़चन है। खलनायक एकआयामी दैत्य नहीं; तंत्र का आदमी है। बिना उसके उपन्यास में उद्योग नहीं आता। क्लार्क राज्य की गोली है; जॉन ज़मीन का लोभ है। राजा महेंद्र रियासत से तालमेल रखते हैं। तीनों पूँजी-राज्य-रियासत का त्रिकोण बनाते हैं। सोफिया उसी घर से निकलकर प्रेम और सेवा चुनती है।
निष्कर्ष यह है कि जॉन सेवक कारखाने और ज़मीन-हरण का पूँजीपति है; चरित्र लोभ और राज्य-संग से बनता है, दैत्य-चित्र से नहीं।
18. सूरदास को राष्ट्रनायक क्यों कहा जाता है?20 अंक
सूरदास को राष्ट्रनायक कहने का अर्थ नेतापद नहीं, कथा का नैतिक केंद्र है। प्रेमचंद का सूरदास पांडेपुर का अंधा भिखारी है। उपन्यास उसे चमार कहता है। प्रश्न जाति-नाम का अपमान नहीं, नायकत्व का है। गुण गाने-बजाने, भक्ति, सरलता और स्वाभिमान हैं। शरीर क्षीण है, दृष्टि नहीं है, कर्म है। पुश्तैनी ज़मीन मुहल्ले के पशुओं के चरने के लिए छोड़ी गई है। जॉन सेवक का प्रलोभन ठुकराया जाता है। मुँहमाँगी कीमत भी नहीं ली जाती। इंकार निजी संपत्ति का लोभ नहीं; साँस, पशु और सार्वजनिक उपयोग का तर्क है। आलोचना उसके जीवन और मृत्यु में 1920 के दशक के गाँधी-स्पर्श पढ़ती है — सत्य, अहिंसा, प्रलोभन का इंकार, जन-संगठन। देश असहयोग और खादी का समय देख चुका था। उपन्यास उसी हवा में है। सूरदास हिंसा नहीं चलाता। आंदोलन अर्जी नहीं, जन-शक्ति है।
नायकत्व जाति और धन पर नहीं टिकता। नगर उसे पूज्य बनाता है। जहाँ झोपड़ी थी, वहाँ मूर्ति बैठती है। रानी जान्हवी अंत में उसके चरणों पर सिर रखती है। विनय सिंह कुंवर-पुत्र हैं, शहीद का दर्जा सूरदास को अधिक मिलता है। प्रेमचंद श्रम को केंद्र रखते हैं, सामंत-पुत्र को करुण छाया। क्लार्क की गोली व्यक्तिगत हत्या नहीं, राज्य की चोट है। घाव से मृत्यु अस्पताल में होती है। मृत्यु संगठन-शक्ति देती है। यही राष्ट्रनायक कहने का दूसरा अर्थ है — व्यक्तिगत देह से बड़ी स्मृति। सूरदास गाता है कि मनुष्य रंगभूमि में आकर कर्म करता है। अंधत्व दया का उपकरण नहीं। वाचक उसके पक्ष में है, पर कर्ता वही है।
तुलना से पहचान स्थिर होती है। भक्त-कवि सूरदास भक्ति-काव्य और कृष्ण-लीला के पुरुष हैं; यह गद्य-नायक है। होरी गोदान का किसान है, ऋण से बँधा; यह सूरदास ज़मीन और कारखाने से टकराता है। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग कर्ण की सभा है, जाति-प्रश्न धनुष पर है; यहाँ जाति-प्रश्न चारागाह और कारखाने पर है। कर्मभूमि 1932 का नायक सूरदास नहीं। जॉन सेवक पूँजीपति है, क्लार्क अंग्रेज़ अफसर, राजा महेंद्र रियासत — तीनों के सामने सूरदास अकेला दिखाई देता है, पर जन-आंदोलन उसके साथ है। सोफिया और इंदु सहयोग करती हैं। राष्ट्रनायक कहने का अर्थ यह नहीं कि कृति गाँधी-चरित है। स्पर्श सूरदास के सूत्र पर है।
सीमा साफ लिखी जाती है। आदर्शीकरण मनुष्य को प्रतीक बना सकता है; प्रेमचंद उसे कभी राष्ट्रपिता की छाया तक ले जाते हैं। विनय की आत्महत्या गाँधी नहीं, आहत स्वाभिमान है। सोफिया का अंत प्रेम की तृप्ति है, राष्ट्र-संगठन नहीं। दिव्यांग दृष्टि यहाँ शरीर की कमी को कथा का कारण नहीं बनाती; समाज की शक्ति को कारण बनाती है। गुण यह है कि आधुनिक हिन्दी में श्रम-नायक का इतना बड़ा रूप दुर्लभ है। साधारण भिखारी कथा का नैतिक पुरुष बनता है। बिना इंकार के सत्य केवल भाषण रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि राष्ट्रनायक कहने का अर्थ सत्य-अहिंसा, प्रलोभन का इंकार और शहादत का नैतिक केंद्र है; सूरदास भिखारी रहकर भी कथा का राष्ट्र-पुरुष बनता है, भक्त-कवि या कर्ण नहीं।
19. सोफिया का चरित्र लिखिए।8 अंक
सोफिया जॉन सेवक की पुत्री है। सोफी भी कही गई। धर्म पर विश्वास रखती है, अंधश्रद्धा पर नहीं। ईसा को त्याग का आदर्श मानती है। रानी जान्हवी और विनय सिंह के संपर्क से विनय के प्रति आकर्षण बढ़ता है। माता-पिता विवाह जोज़फ क्लार्क से चाहते हैं। सगाई तक होती है। हृदय विनय के पास रहता है। वह जेल में विनय तक पहुँचती है। लौटकर सेवा भवन जाती है, जॉन के पास नहीं। जान्हवी विवाह को राजी होती है। घायल सूरदास को वह अस्पताल ले जाती है। विनय की मृत्यु के बाद गंगा में उतरती है। पत्र जान्हवी को है — विनय न रहे तो किसके लिए रहूँ; माता-पिता से कह देना विवाह हो गया।
आलोचना कभी छवि अस्थिर कहती है — नायिका और चाल दोनों। फिर भी वह जाति और धर्म का बंधन तोड़ती है। सेवासदन की सुमन नगर-नैतिकता है। मृणाल इंकार की नायिका है। यह पूँजीपति-पुत्री सेवा और प्रेम चुनती है। सीमा प्रेम-सूत्र का कभी रमानी लगना है। गुण यह कि स्त्री केवल आभूषण नहीं। रश्मिरथी का सर्ग यह चरित्र नहीं।
निष्कर्ष यह है कि सोफिया पूँजीपति-पुत्री है जो प्रेम और सेवा चुनती है; अंत गंगा है, क्लार्क का विवाह नहीं।
20. रंगभूमि में औद्योगीकरण का चित्रण लिखिए।8 अंक
रंगभूमि औद्योगीकरण को चमक नहीं, उसके विष को दिखाती है। जॉन सेवक सिगरेट का कारखाना पांडेपुर की ज़मीन पर चाहता है। वादा रोज़गार का है। परिणाम बेदखली, बाहर का मज़दूर, शराब-ताड़ी, देह-व्यापार और मुहल्ले की फूट हैं। सूरदास की ज़मीन चरने का मैदान थी; कारखाना उसे धुएँ का मैदान बनाता है। इंकार के बाद ज़मीन छिनती है। झोपड़ी और बस्ती तोड़ी जाती है। पांडेपुर कोर्ट ऑफ वार्ड्स के नीचे जाता है। प्रगति का शब्द जॉन के पास है। साँस और पशु पांडेपुर के पास हैं। जोज़फ क्लार्क अंग्रेज़ अफसर है; राजा महेंद्र रियासत से तालमेल रखते हैं। बिना राज्य के कारखाना अकेला नहीं चलता। सूरदास जन-आंदोलन खड़ा करता है। नायक मशीन तोड़ता नहीं; ज़मीन और सत्य पर डटा रहता है।
प्रेमचंद मशीन के गाली-कवि नहीं। वे पूँजी को राज्य से जुड़ा देखते हैं। गोदान किसान-ऋण है। कर्मभूमि 1932 अलग कृति है। यह उद्योग बनाम बस्ती है। सीमा यह है कि कारखाने के भीतर का मज़दूर-संगठन गोदान के किसान जितना नहीं फैलता। गुण यह है कि 1925 में सिगरेट-कारखाना नैतिक प्रश्न बना। रश्मिरथी का सर्ग उद्योग-चित्र नहीं।
निष्कर्ष यह है कि औद्योगीकरण चमक नहीं, ज़मीन-हरण और बस्ती के विघटन का चित्र है; केंद्र कारखाना बनाम सूरदास है।
21. रंगभूमि के शिल्प-विधान का विवेचन कीजिए।20 अंक
रंगभूमि का शिल्प दो कथा-सूत्र साथ चलाता है। पहला पांडेपुर, ज़मीन, कारखाना, सूरदास। दूसरा सोफिया-विनय, जाति, धर्म, जेल, जंगल। आरंभ में सिरे अलग हैं। मध्य में छूते हैं। अंत से पहले एक हो जाते हैं। फॉर्स्टर की भाषा में कथा क्रम है, कथानक कारण है। कारण पूँजी और राज्य हैं; प्रेम उपकथा नहीं, उसी समाज की दूसरी साँस है। वाचक सर्वज्ञ है। मन पढ़ता है, न्याय करता है, सूरदास के पक्ष में झुकता है। उत्तम पुरुष नहीं। चेतना-प्रवाह नहीं। प्रेमचंद का आम शिल्प यही है — वर्णन, संवाद, टिप्पणी। त्यागपत्र का शिल्प स्मृति और मैं-कथन है; यह शिल्प समाज का विस्तार है। लुबॉक दृष्टि को शिल्प का केंद्र कहते हैं; यहाँ दृष्टि सूरदास-पक्ष की सर्वज्ञ आँख है।
भाषा खड़ी बोली बोलचाल की है। सूरदास का गाना भक्ति-पद्य छूता है; गद्य सरल रहता है। संवाद चरित्र खोलते हैं — जॉन का लोभ, सूरदास की आन, सोफिया का धर्म-विवेक, भीड़ का आक्रोश, विनय का आहत स्वाभिमान। देशकाल पांडेपुर का दबाव है, पृष्ठ नहीं। शहर दीपक और अदालत रखता है; बस्ती अँधेरा और भिक्षा रखती है। रस करुण और प्रतिरोध मिला है; हास्य-व्यंग्य गौण है। उद्देश्य चित्रण और प्रश्न है — पूँजी, ज़मीन, जाति, धर्म-संकर प्रेम। नाम जीवन को कर्म और नीति की परीक्षा बनाता है। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग सभा का काव्य-शिल्प है, यह गद्य-उपन्यास नहीं। कर्मभूमि 1932 अलग संरचना की कृति है। गोदान किसान-ऋण का शिल्प है; यह उद्योग-बस्ती का शिल्प है।
तत्त्व शिल्प में बँधते हैं। कथावस्तु दो सूत्रों से कसी है। चरित्र गोल वही हैं जो निर्णय बदलते हैं — सूरदास, सोफिया, विनय, इंदु, जॉन, क्लार्क। सहायक नायकराम, जमुनी, भैरों, ताहिर अली, डाक्टर गांगुली कथा चलाते हैं; सपाट रह जाएँ तो सूची बनते हैं। कथोपकथन बोलचाल का है, विचार का ढेर नहीं। आकार दीर्घ है। पात्र-भीड़ है। भरत सिंह कोर्ट ऑफ वार्ड्स की सलाह पर रियासत अंग्रेज़ को सौंप देते हैं; यही बेदखली का कानूनी रूप शिल्प में आता है। सामंत विरोध में पूरे नहीं उतरते; तंत्र के भीतर से समझौता करते हैं। सूरदास बाहर से टकराता है। संरचना यहीं सार्वजनिक और निजी को एक मैदान पर लाती है।
सीमा दो मुख्य हैं। पहला — प्रेम-सूत्र कभी कारखाने से कटकर रमानी लग सकता है। दूसरा — दीर्घता और पात्रों की भीड़ ढीलापन लाती हैं। सोफिया की छवि आलोचना अस्थिर कहती है — नायिका और चाल दोनों। विनय की आत्महत्या आदर्श और आवेश दोनों है। सूरदास का आदर्शीकरण गाँधी-छाया तक जाता है। गुण यह कि उद्योग, जाति, प्रेम और मृत्यु एक शरीर में आते हैं। नामवर नए उपन्यास के शिल्प से इसकी तुलना करते हुए इसे सरल वर्णन कहते हैं, प्रयोग नहीं। गुण यहीं है — सरल दृष्टि कथा को ढकती नहीं। बिना दो सूत्र लिखे शिल्प-उत्तर अधूरा है। बिना सर्वज्ञ वाचक के प्रेमचंद-शिल्प पहचाना नहीं जाता।
निष्कर्ष यह है कि रंगभूमि का शिल्प सर्वज्ञ वाचक, दो सूत्र और खड़ी बोली है; विन्यास समाज के टकराव को बाँधता है, केवल प्रेम-कथा या रश्मिरथी का सर्ग नहीं।
22. विनय सिंह का चरित्र लिखिए।8 अंक
विनय सिंह कुंवर भरत सिंह के पुत्र हैं। रानी जान्हवी माता हैं। इंदु बहन हैं, राजा महेंद्र की पत्नी। विनय सोफिया से प्रेम करते हैं। प्रेम शाश्वत भाव है, विवाह-सुख नहीं। जाति-सेवा में दूसरी रियासत में गिरफ्तार होते हैं। सोफिया जेल तक पहुँचती है। लौटकर सूरदास के आंदोलन में साथ देते हैं। भीड़ उन्हें रईस का बेटा कहकर अपमानित करती है — गरीब की जान सस्ती। वे पूछते हैं कि रईसों के बेटे प्राण कैसे देते हैं, और पिस्तौल से स्वयं को मारते हैं। शहीद का दर्जा सूरदास को अधिक मिलता है। प्रेमचंद श्रम-नायक को केंद्र रखते हैं, कुंवर-पुत्र को करुण छाया। सोफिया विनय के बाद गंगा में उतरती है।
चरित्र करुण और आदर्श दोनों है। प्रेम में निष्ठा है। वर्ग का बोझ मृत्यु तक जाता है। सूरदास हिंसा नहीं चलाता। विनय भीड़ को रोकते हैं, फिर हिंसा अपने ऊपर कर लेते हैं — यह गाँधी नहीं, आहत स्वाभिमान है। सीमा आत्महत्या का आवेश है। गुण यह कि प्रेम-सूत्र अंत में कारखाने के मैदान पर आता है।
निष्कर्ष यह है कि विनय प्रेम और सेवा का कुंवर-पुत्र है जिसका अंत आत्महत्या है; नायक सूरदास रहते हैं।
23. रंगभूमि की नारी-पात्रों का मूल्यांकन कीजिए।20 अंक
रंगभूमि की नारी-पात्र आलंबन भर नहीं, निर्णय और दबाव दोनों हैं। सोफिया जॉन सेवक की पुत्री है। धर्म पर विश्वास रखती है, अंधश्रद्धा पर नहीं। माता-पिता विवाह क्लार्क से चाहते हैं। हृदय विनय के पास रहता है। वह जेल में विनय तक पहुँचती है। घायल सूरदास को अस्पताल ले जाती है। विनय की मृत्यु के बाद गंगा में उतरती है। वह जाति और धर्म का बंधन तोड़ती है। आलोचना कभी छवि अस्थिर कहती है — नायिका और चाल दोनों। फिर भी वह पूँजीपति-घर से निकलकर सेवा और प्रेम चुनती है।
रानी जान्हवी कुंवर भरत सिंह की पत्नी हैं। सामंत-नारी हैं, पर सेवा और धर्म की ओर झुकी हैं। सोफिया को पास लाती हैं, फिर विनय को दूर भी भेजती हैं — जाति-सेवा के नाम पर। अंत में प्रेम देखकर विवाह मानती हैं। सूरदास की मृत्यु पर भक्ति-विह्वल रोती हैं, चरणों पर सिर रखती हैं। यह नारी केवल आभूषण नहीं। इंदु उनकी पुत्री हैं, राजा महेंद्र कुमार सिंह की पत्नी। प्रजा और सूरदास के पक्ष में पति से मतभेद रखती हैं। आंदोलन में सहयोग करती हैं। स्त्री यहाँ या तो सेवा-घर है, या विद्रोह का स्वर, या पूँजीपति की पुत्री जो धर्म-संकर प्रेम चुनती है। मिसेज जॉन सेवक पुत्री को क्लार्क से बाँधना चाहती हैं — तंत्र की माँ, कथा का गौण सिरा। तीन छोर साफ हैं — सेवा, प्रतिरोध, पूँजी।
तुलना से मूल्यांकन बैठता है। सेवासदन की सुमन नगर-नैतिकता और वेश्या-प्रश्न है; यहाँ सोफिया धर्म-संकर प्रेम है। त्यागपत्र की मृणाल मन और मर्यादा के बीच इंकार करती है; यहाँ सोफिया प्रेम में तृप्ति तक जाती है। अनामदास का पोथा की जाबाला ज्ञान और नेह के बीच है; सत्यकाम-माता यह नहीं। महाभोज की रुक्मा तंत्र के सामने खड़ी है, परिवार-केंद्र नहीं। रंगभूमि की नारी 1925 के सामाजिक उपन्यास की नारी है — जाति, धर्म, रियासत और कारखाना उसके चारों ओर हैं। वाचक सर्वज्ञ है; अनुभव स्त्री का भी है। बिना सोफिया के दूसरा सूत्र नहीं चलता। बिना इंदु के प्रजा-पक्ष पतला रह जाता है। बिना जान्हवी के अंत की भक्ति अधूरी रहती है।
सीमाएँ लिखी जाती हैं। सोफिया की अस्थिर छवि। प्रेम-सूत्र का कभी रमानी लगना। नारी-केंद्र आपका बंटी जितना नहीं; वाचक-स्त्री मन्नू बाद की हैं। कुछ सहायक स्त्री-नाम सूची रह सकते हैं। गुण यह है कि नारी केवल करुण वस्तु नहीं। सोफिया कर्म करती है — जेल, अस्पताल, गंगा। इंदु पति से मतभेद रखती है। जान्हवी निर्णय बदलती है। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग नारी-केंद्र नहीं। मूल्यांकन इन्हीं अंतरों के बिना अधूरा है। यहाँ चित्र करुण है, नारा नहीं।
निष्कर्ष यह है कि नारी-पात्र सोफिया, जान्हवी और इंदु से पहचानी जाती हैं; केंद्र प्रेम, सेवा और प्रजा-पक्ष है, केवल आभूषण नहीं।
24. रंगभूमि के सामाजिक-राजनीतिक महत्त्व का विवेचन कीजिए।20 अंक
रंगभूमि 1925 परतंत्र भारत की कृति है। सामाजिक महत्त्व ज़मीन, जाति, भिक्षा, नशा, देह-व्यापार और नारी पर है। नायक अंधा भिखारी है। उपन्यास उसे चमार कहता है; नायकत्व कर्म पर टिकता है, गोत्र पर नहीं। पूँजीपति ईसाई व्यापारी जॉन सेवक है। सामंत बीच में हैं — भरत सिंह, जान्हवी, राजा महेंद्र, इंदु। समाज एक नहीं, कई दबाव हैं। पुश्तैनी ज़मीन चारागाह थी; कारखाना उसे धुएँ का मैदान बनाता है। बाहर के मज़दूर आते हैं। शराब, ताड़ी और वेश्यालय बस्ती में घुसते हैं। मुहल्ले का फूट व्यापार की लालच से होता है। सोफिया-विनय का प्रेम जाति और धर्म का बंधन तोड़ता है; अंत करुण है। सामाजिक उपन्यास यहाँ दया का चित्र नहीं, टकराव का चित्र है। गोदान किसान-ऋण का सामाजिक है। प्रेमाश्रम खेत-प्रश्न है। यह उद्योग बनाम बस्ती है।
राजनीतिक महत्त्व कारखाना, अंग्रेज़ अफसर, रियासत और कोर्ट ऑफ वार्ड्स पर है। जोज़फ क्लार्क राज्य की शक्ति रखता है। आंदोलन कुचलने पर सूरदास पर पिस्तौल चलाता है। राजा महेंद्र अंग्रेज़ और कारखाने से तालमेल रखते हैं। भरत सिंह कोर्ट ऑफ वार्ड्स की सलाह पर रियासत अंग्रेज़ को सौंप देते हैं; यही बेदखली का कानूनी रूप है। सूरदास का आंदोलन कानूनी अर्जी नहीं, जन-शक्ति है। गाँधी-स्पर्श सत्य और अहिंसा पर है, पूरा चरित नहीं। राष्ट्रीय भाव सूरदास की मृत्यु को स्मृति और संगठन बनाता है। आलोचना उसे राष्ट्रनायक कहती है — नेता नहीं, नैतिक केंद्र। बिना क्लार्क के कारखाना अकेला नहीं चलता। प्रेमचंद मशीन के दुश्मन नहीं; वे पूँजी को राज्य और रियासत से जुड़ा देखते हैं। आज भी ज़मीन-अधिग्रहण और कारखाना यही प्रश्न पूछते हैं।
धार्मिक महत्त्व सोफिया के विवेक और सूरदास की भक्ति-पक्ति पर है। धर्म व्यापार का मुखौटा भी है — जॉन सेवक — प्रेम का सेतु भी है — सोफिया। सेवा भवन भरत सिंह और जान्हवी का धर्म-सेवा सिरा है। राजनीतिक उपन्यास पूरा यह नहीं; आंदोलन एक अंग है। मनोवैज्ञानिक उपन्यास नहीं; मन है, केंद्र समाज है। आंचलिक उपन्यास नहीं; पांडेपुर नाम की बस्ती है, रेणु का बोली-आंचल नहीं। कर्मभूमि 1932 राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन अधिक सीधे छूती है — अलग कृति। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग काव्य-सभा है, औपनिवेशिक तंत्र नहीं। महाभोज चुनाव-तंत्र है; यह रियासत-अंग्रेज़-पूँजी का त्रिकोण है।
सीमाएँ लिखी जाती हैं। आकार बड़ा है। दो सूत्र कभी ढीले पड़ते हैं। मज़दूर-संगठन गोदान के किसान जितना नहीं फैलता। सूरदास का आदर्शीकरण गाँधी-छाया तक जाता है। सोफिया की छवि अस्थिर कही गई है। विनय की आत्महत्या आदर्श और आवेश दोनों है। गुण यह कि हिन्दी उपन्यास को 1925 में पूँजी-राज्य का प्रश्न और श्रम-नायक मिला। सेवासदन नारी-इज्जत है। गोदान किसान-ऋण है। रंगभूमि उद्योग-बस्ती है। तीनों प्रेमचंद हैं; प्रश्न अलग हैं। गोपाल राय इतिहास में इसे प्रेमचंद के बड़े सामाजिक में रखते हैं। बिना जाति के सामाजिक अधूरा है। बिना क्लार्क के राजनीतिक अधूरा है। दोनों सूरदास के प्रतिरोध में एक होते हैं।
निष्कर्ष यह है कि सामाजिक महत्त्व जाति-ज़मीन-नारी पर है, राजनीतिक महत्त्व कारखाना-क्लार्क-आंदोलन पर है; दोनों सूरदास के प्रतिरोध में एक होते हैं, रश्मिरथी के सर्ग में नहीं।
25. रंगभूमि और कर्मभूमि में अंतर लिखिए।8 अंक
रंगभूमि 1925 का निर्धारित सामाजिक उपन्यास है। नायक सूरदास पांडेपुर का अंधा भिखारी है। विषय सिगरेट-कारखाना, पुश्तैनी ज़मीन और बस्ती की बेदखली है। पूँजीपति जॉन सेवक है। अंग्रेज़ अफसर जोज़फ क्लार्क है। दूसरा सूत्र सोफिया-विनय का प्रेम है। अंत तीन मौतों तक जाता है — क्लार्क की गोली से सूरदास, विनय की आत्महत्या, सोफिया का गंगा में उतरना। झोपड़ी और बस्ती तोड़ी जाती है। वाचक सर्वज्ञ है। कर्मभूमि 1932 अलग उपन्यास है। विषय राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन है; नगर और गाँव दोनों छूते हैं। नायक सूरदास नहीं। पत्र की इकाई और निर्धारित कृति यह नहीं। शीर्षक की ‘भूमि’ दोनों में है, एक कथा नहीं।
साम्य प्रेमचंद, खड़ी बोली, यथार्थ और साधारण मनुष्य है। वैषम्य वर्ष, नायक और आलंबन पर है। गोदान 1936 किसान-ऋण है, तीसरी कृति। सेवासदन नारी-नैतिकता है। तीनों प्रेमचंद हैं, प्रश्न अलग हैं। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग कविता है, यह तुलना नहीं। भक्त-कवि सूरदास कर्मभूमि में भी नहीं आते। बिना वर्ष लिखे अंतर नाम-भ्रम रह जाता है। बिना नायक लिखे भूमि-शब्द एक कर देता है। गोपाल राय इतिहास में दोनों को प्रेमचंद के बड़े सामाजिक में रखते हैं, पर्याय नहीं।
निष्कर्ष यह है कि रंगभूमि सूरदास और कारखाना है, कर्मभूमि 1932 का अलग आंदोलन-उपन्यास है; मिलाया नहीं जाता।
26. रंगभूमि का मूल्यांकन कीजिए।20 अंक
रंगभूमि का मूल्यांकन तीन स्तरों पर बैठता है। साहित्यिक — प्रेमचंद युग का दीर्घ सामाजिक उपन्यास, सर्वज्ञ वाचक, खड़ी बोली बोलचाल, दो कथा-सूत्र। ऐतिहासिक — प्रकाशन 1925, रचना 1924–25 के आसपास, उद्योग और परतंत्र तंत्र। नैतिक — सत्य, आन, प्रेम, शहादत। नायक सूरदास आधुनिक हिन्दी का दुर्लभ श्रम-नायक है। आलोचना गाँधी-स्पर्श और पूँजी-विरोध से पढ़ती है। कृति गाँधी-चरित नहीं। रूप सामाजिक उपन्यास है। राजनीतिक उपन्यास पूरा नहीं; आंदोलन एक अंग है। गोपाल राय इतिहास में इसे प्रेमचंद के बड़े सामाजिक में रखते हैं।
गुण चार हैं। पहला — श्रम और जाति-दबाव का नायक। दूसरा — औद्योगिक पूँजी और औपनिवेशिक तंत्र का चित्र 1925 में। तीसरा — धर्म-जाति तोड़ता प्रेम, जिसका अंत करुण है। चौथा — दो सूत्र का अंत में योग: कारखाना और सोफिया-विनय एक मैदान पर आते हैं। सेवासदन नारी-इज्जत है। प्रेमाश्रम खेत-प्रश्न है। गोदान किसान-ऋण है। गबन मध्यवर्गीय लोभ है। यह कारखाना-बस्ती है। तीनों बड़े सामाजिक एक लेखक हैं, प्रश्न अलग हैं। हिन्दी उपन्यास यहाँ तिलिस्म से बहुत दूर है। खत्री पाठक देते हैं; प्रेमचंद प्रश्न देते हैं। नायक मशीन तोड़ता नहीं; ज़मीन और सत्य पर डटा रहता है। राष्ट्रीय भाव मृत्यु को स्मृति बनाता है। मूर्ति और अश्रु सूरदास पर हैं।
सीमाएँ साफ हैं। आकार बड़ा है। दो सूत्र कभी ढीले पड़ते हैं। सोफिया कभी नायिका, कभी चाल — आलोचना छवि अस्थिर कहती है। विनय की आत्महत्या आदर्श और आवेश दोनों है। सूरदास का आदर्शीकरण गाँधी-छाया तक जाता है; मनुष्य प्रतीक बन सकता है। मज़दूर-संगठन गोदान के किसान जितना नहीं फैलता। पात्र-भीड़ सहायक को सूची बना सकती है। प्रेम-सूत्र आरंभ में रमानी लग सकता है। आदर्शोन्मुख यथार्थ है — चित्र कठोर है, अंत नैतिक ऊँचाई माँगता है। गोदान में होरी की मृत्यु ऋण की शृंखला है, गोली की नहीं। यहाँ मृत्यु तीन रूपों में है — गोली, आत्महत्या, गंगा। यही गुण भी है, सीमा भी — नैतिक विजय घटना-हार के साथ।
पहचान निषेध से पूरी होती है। भक्त-कवि सूरदास अलग पुरुष हैं। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग कर्ण की सभा है, जाति-प्रश्न धनुष पर है। कर्मभूमि 1932 विषय आंदोलन और नगर-गाँव है; नायक सूरदास नहीं, पत्र की इकाई नहीं। त्यागपत्र 1937 मन का लघु उपन्यास है, सर्वज्ञ विस्तार नहीं। अनामदास का पोथा संस्कृति-आख्यान है। महाभोज चुनाव-तंत्र है। मूल्यांकन इन्हीं अंतरों के बिना अधूरा है। शिखर गोदान कहा जाता है; निर्धारित कृति और पूँजी-प्रश्न यही है। बिना सूरदास के मूल्यांकन खाली है।
निष्कर्ष यह है कि रंगभूमि 1925 का उद्योग-विरोध और सूरदास-नायकत्व है; सीमा दीर्घता और आदर्शीकरण की हैं, पर निर्धारित कृति और पूँजी-राज्य का प्रश्न यही टिकता है।
27. जैनेन्द्र कुमार का परिचय लिखिए।8 अंक
जैनेन्द्र कुमार का जन्म 2 जनवरी 1905, कौड़ियागंज, अलीगढ़। बचपन का नाम आनंदीलाल। निधन 24 दिसंबर 1988। प्रारंभिक शिक्षा हस्तिनापुर के गुरुकुल में हुई। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की पढ़ाई 1921 में छोड़कर असहयोग में आए। पद्म भूषण 1971। साहित्य अकादमी 1979 — उपन्यास मुक्तिबोध पर; वह निर्धारित नहीं, कवि गजानन माधव मुक्तिबोध अलग हैं। हिन्दी उपन्यास में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक माने जाते हैं। प्रेमचंद का विलोम नहीं, पूरक हैं — बाहर का समाज प्रेमचंद, भीतर का निर्णय जैनेन्द्र। भाषा खड़ी बोली; वाक्य छोटे, विचार घने। अज्ञेय का गद्य इसी तोड़-फोड़ के बाद संभव कहा जाता है। उपन्यास-पंक्ति परख 1929, सुनीता 1935, त्यागपत्र 1937, कल्याणी 1939 है।
त्यागपत्र शिखर-नाम है, पहला उपन्यास नहीं। कहानी-संग्रह फाँसी, पाजेब; पाजेब 1942 की कहानी है, यह पत्र नहीं। तपोभूमि सह-लेखन है, निर्धारित नहीं। दृष्टि अंतर्मन, नैतिक द्वंद्व और नारी-प्रतिक्रिया है। घटना-संघटना पर बल कम है। पात्र कम हैं। सीमा दुरुहता और समाज-कटान का आक्षेप है। गुण चरित्र का गहरा होना है। निर्धारित कृति त्यागपत्र इन्हीं गुणों का प्रमाण है। शेखर एक जीवनी अज्ञेय की है, यह परिचय नहीं।
निष्कर्ष यह है कि जैनेन्द्र 1905–1988 के मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार हैं; निर्धारित कृति त्यागपत्र 1937 है, पाजेब और सुनीता अलग नाम हैं।
28. त्यागपत्र का नामकरण स्पष्ट कीजिए।8 अंक
त्यागपत्र जैनेन्द्र कुमार का लघु मनोवैज्ञानिक उपन्यास है। प्रकाशन 1937। तीसरा उपन्यास — परख 1929, सुनीता 1935 के बाद। नाम दो अर्थ बाँधता है। पहला — प्रमोद न्यायाधीश पद से पत्र देकर हटता है; यह प्रायश्चित्त है। दूसरा — मृणाल समाज की दावेदारी छोड़ती है; वह वापस लेने का हाथ नहीं पकड़ती। पत्र लिखित निर्णय है, केवल भाव नहीं। रूप लघु उपन्यास है — आकार छोटा, प्रश्न चौड़ा। सामाजिक उपन्यास पूरा नहीं; समाज दबाव है, कथा मन की है। आंचलिक नहीं, राजनीतिक नहीं, ऐतिहासिक नहीं। वाचक उत्तम पुरुष है — प्रमोद, मृणाल का भतीजा। लुबॉक की भाषा में दृष्टि सीमित-व्यक्तिगत है, सर्वज्ञ नहीं। गोदान 1936 के एक वर्ष बाद यह मोड़ प्रेमचंदोत्तर खोलता है।
रंगभूमि का नाम कर्म-नीति है; यह नाम पद-त्याग और दावा-त्याग है। अनामदास का पोथा पांडुलिपि है। महाभोज व्यंग्य-उत्सव है। पाजेब कहानी है, शीर्षक का पर्याय नहीं। सुनीता 1935 आकर्षण का दूसरा प्रयोग है, नायिका सुनीता है। बिना प्रमोद के पत्र के शीर्षक अधूरा है। बिना मृणाल के इंकार के अर्थ पतला है। मुक्तिबोध कवि अलग हैं; जैनेन्द्र का उपन्यास मुक्तिबोध निर्धारित नहीं।
निष्कर्ष यह है कि नामकरण न्यायाधीश-पद के त्याग और मृणाल के दावा छोड़ने से है; कृति 1937 की है, सुनीता या पाजेब नहीं।
29. त्यागपत्र की कथावस्तु लिखिए।20 अंक
त्यागपत्र जैनेन्द्र कुमार का निर्धारित लघु मनोवैज्ञानिक उपन्यास है। प्रकाशन 1937। तीसरा उपन्यास — परख 1929, सुनीता 1935 के बाद। वाचक उत्तम पुरुष है — प्रमोद, मृणाल का भतीजा, बाद में न्यायाधीश। कथावस्तु उसकी स्मृति में बैठती है। घटना पतली है, द्वंद्व घना है। पाजेब 1942 की कहानी है, यह कथा नहीं। सुनीता आकर्षण का दूसरा प्रयोग है, यह जीवन नहीं। मृणाल के माता-पिता नहीं रहे। पालन बड़े भाई के यहाँ है। भाभी कठोर अनुशासन रखती है — आदर्श नारी बनाना लक्ष्य है। प्रमोद पाँच वर्ष छोटा भतीजा है। कालेज में मृणाल की सहेली शीला है। शीला के भाई से प्रेम खुलता है। भाभी दंड देती है। विवाह अधेड़, पूर्व-विवाहित पुरुष से कर दिया जाता है। आरंभ परिवार की मर्यादा है, संयोग नहीं।
मृणाल पति से पूर्व-प्रेम कह देती है — सत्य का दावा। पति निकाल देता है। ससुराल से कटान सामाजिक मृत्यु है। मायके का दावा भी वह नहीं रखती। एक कोयला-व्यापारी अनुरक्त होकर साथ लेता है, फिर संपत्ति और साथ दोनों छीनता है। अस्पताल में कन्या जन्म लेती है; कुछ मास बाद मर जाती है। तीन पुरुष तीन दबाव हैं — अस्थायी प्रेम, पति की मर्यादा, व्यापारी का लोभ। सहायक सपाट रहते हैं; गहराई मृणाल-प्रमोद में है। मृणाल तथाकथित सभ्य वृत्त से कटकर निम्न बस्ती में पहुँचती है। बच्चों को पढ़ाती भी है। रोग और कष्ट अंत तक रहते हैं। प्रमोद सर्वस्व लगाकर दुर्भाग्य पलटना चाहता है; कृपा अस्वीकृत हो जाती है। वह इंकार करती है। मृत्यु पीड़ा में होती है।
प्रमोद बचपन, कालेज, वकालत, न्यायाधीश — ये परतें उसी स्मृति में हैं। वह मृणाल की पीड़ा समझता है, करता कम है। पद और प्रतिष्ठा पीछे खींचते हैं। आलोचना उसे स्वार्थ और करुणा का मिश्रण कहती है। अंत में अंतिम अवस्था आंदोलित करती है; न्यायाधीश पद से त्यागपत्र देता है। नाम यहीं पूरा होता है — पत्र लिखित निर्णय है। दूसरा अर्थ मृणाल का दावा छोड़ना है; वापस लेने का हाथ नहीं पकड़ती। फॉर्स्टर क्रम और कारण कहते हैं। क्रम घटनाओं का है; कारण समाज की दृष्टि और मृणाल का सत्य है, संयोग नहीं। रंगभूमि में कारण पूँजी-राज्य है। गोदान में ऋण है। यहाँ कारण पवित्रता-दंड है।
सीमा आकार की छोटी चौड़ाई है; समाज का ढाँचा घटना से नहीं टूटता। गुण यह कि कथानक निर्णय से बँधा है, कौतुक से नहीं। शेखर एक जीवनी का मैं चेतना की परत है; यह मैं स्मृति और अपराध-बोध है। बाणभट्ट आत्मकथा-मैं संस्कृति है। महाभोज सर्वज्ञ घटना है। बिना प्रमोद के यह कथा सर्वज्ञ समाज-विस्तार बन जाती, जैनेन्द्र नहीं रहती। बिना मृणाल के पद-त्याग शीर्षक सूख जाता है। मुक्तिबोध कवि गजानन माधव हैं; जैनेन्द्र का उपन्यास मुक्तिबोध निर्धारित नहीं। देशकाल मध्यवर्गीय परिवार, विवाह, अस्पताल, बस्ती है। पांडेपुर उद्योग की बस्ती है; यह बस्ती मर्यादा से गिरी हुई कही जाती है।
निष्कर्ष यह है कि त्यागपत्र की कथावस्तु मृणाल का सत्य, पति का निकालना, बस्ती और मृत्यु है; अंत प्रमोद के पद-त्याग पर बैठता है, सुनीता या पाजेब पर नहीं।
30. मृणाल का चरित्र-चित्रण कीजिए।20 अंक
मृणाल त्यागपत्र की नायिका है, प्रमोद की बुआ। गोल चरित्र है। गुण सत्य, आत्मदान, इंकार और सहन हैं। माता-पिता नहीं रहे। पालन भाई के यहाँ है। भाभी कठोर अनुशासन से आदर्श नारी बनाना चाहती है। कालेज, सहेली शीला, शीला के भाई से प्रेम — शिक्षा और नेह दोनों दंड बनते हैं। विवाह अधेड़, पूर्व-विवाहित पुरुष से कर दिया जाता है। वह पति-धर्म मानती है; पति उसे छोड़ता है क्योंकि वह पूर्व-प्रेम सत्य से कह देती है। ससुराल से कटे तो मायके का दावा भी नहीं रखती। समाज तोड़ना नहीं चाहती; अलग होकर टूटती है। शरीर की तथाकथित पवित्रता समाज नापता है; वह मन की पवित्रता नापती है। वाचक प्रमोद उसे भीतर से शुद्ध दिखाता है; बाहर वह पतित ठहराई जाती है। यही द्वंद्व चरित्र को गोल करता है।
कर्म तीन स्तरों पर पहचाने जाते हैं। पहला — पूर्व-प्रेम कहना; सत्य का दावा दंड बनता है। दूसरा — कोयला-व्यापारी के अनुरक्ति-रक्षा के बाद भी दावा न पकड़ना; साथ छिनने पर वापस लेने का हाथ नहीं फैलता। तीसरा — प्रमोद का हाथ ठुकराना; सहानुभूति लेती नहीं, ले जाना अस्वीकृत करती है। अस्पताल में कन्या जन्म लेती है, कुछ मास बाद मर जाती है। निम्न बस्ती में बच्चों को पढ़ाती भी है। रोग और कष्ट अंत तक रहते हैं। मृत्यु पीड़ा में होती है। आलोचना आत्मदान में मुक्ति पढ़ती है। सीमा यह कि पीड़ा विद्रोह का नारा नहीं बनती; व्यवस्था ज्यों की त्यों रहती है। व्यक्ति टूटता है, ढाँचा नहीं। गुण यह कि नारी दया का उपकरण नहीं, निर्णय की कर्ता है। कर्ता के कर्म हैं — सत्य, इंकार, न लौटना।
तुलना बिना चरित्र अधूरा रह जाता है। सेवासदन की सुमन नगर-नैतिकता और इज्जत का प्रश्न है। रंगभूमि की सोफिया धर्म-संकर प्रेम चुनती है, अंत गंगा है। सुनीता 1935 आकर्षण का दूसरा प्रयोग है; नायिका सुनीता है, यह जीवन नहीं। मृणाल मन और मर्यादा के बीच है। सूरदास सार्वजनिक इंकार है। प्रमोद देर का प्रायश्चित्त है। मृणाल नैतिक इंकार है। जैनेन्द्र 1937 में पुरुष-वाचक से स्त्री-केंद्र चलाते हैं — सीमा भी है, प्रयोग भी है।
प्रमोद करुण है, रक्षक बन नहीं पाता। नेह और डर उसके द्वंद्व हैं। न्यायाधीश कानून चलाता है; बुआ के सामने कानून अधूरा पड़ जाता है। त्यागपत्र उसी अधूरे न्याय का पत्र है। बिना समाज की दृष्टि के चरित्र सपाट दंड-कथा रह जाता है। बिना इंकार के आत्मदान नारा रह जाता है। सहायक शीला, पति, व्यापारी, भाभी कथा मोड़ते हैं, गहराई नहीं। देशकाल मध्यवर्गीय परिवार और तिरस्कृत बस्ती है। गोदान का गाँव नहीं। पांडेपुर उद्योग की बस्ती नहीं। नारी-प्रश्न आलंबन का अधिकार भी है, केवल लेखिका होना नहीं। पहचान यही है — मृणाल कर्ता है, केवल करुण दृश्य नहीं। दुरुहता शैली की है, चरित्र की अस्पष्टता नहीं।
निष्कर्ष यह है कि मृणाल सत्य और इंकार की नायिका है; पहचान बुआ, पति का निकालना और प्रमोद का ठुकराया जाना है, सुनीता या सोफिया नहीं।
31. प्रमोद का चरित्र लिखिए।8 अंक
प्रमोद त्यागपत्र का वाचक है, नायक नहीं। मृणाल से पाँच वर्ष छोटा भतीजा है। कथा उसकी आँख से चलती है। बचपन, कालेज, वकालत, न्यायाधीश — ये परतें उसी स्मृति में हैं। वह मृणाल की पीड़ा समझता है। सर्वस्व लगाकर दुर्भाग्य पलटना चाहता है, पर कृपा अस्वीकृत हो जाती है। दुविधा पीछे खींचती है — पद, प्रतिष्ठा, सामाजिक दृष्टि। उत्तम पुरुष सहानुभूति भी देता है, बचाव भी करता है। आलोचना उसे स्वार्थ और करुणा का मिश्रण कहती है। अंत में न्यायाधीश पद से त्यागपत्र देता है — देर का प्रायश्चित्त। द्वंद्व तीन हैं — नेह बनाम मर्यादा, कर्म बनाम डर, न्याय का पद बनाम न्याय का अर्थ।
नायक मृणाल है; वाचक प्रमोद है। दोनों को एक कहना अधूरा है। विनय सिंह आवेश में प्राण देते हैं। सूरदास इंकार सार्वजनिक है। यह इंकार निजी और देर का है। शेखर का मैं चेतना की परत है; यह मैं स्मृति और अपराध-बोध है। बिना इस अंतर के वह केवल रिश्तेदार रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि प्रमोद स्मृति और अपराध-बोध का वाचक है; कर्म पद-त्याग है, रक्षक बनना या नायक होना नहीं।
32. त्यागपत्र के शिल्प-विधान का विवेचन कीजिए।20 अंक
त्यागपत्र का शिल्प उत्तम पुरुष है। वाचक प्रमोद है — मृणाल से पाँच वर्ष छोटा भतीजा, वकील, फिर न्यायाधीश। स्मृति आगे-पीछे मोड़ती है। घटना कम, प्रतिक्रिया अधिक। लुबॉक दृष्टि को केंद्र कहते हैं। यहाँ दृष्टि सीमित-व्यक्तिगत है, सर्वज्ञ नहीं। रंगभूमि सर्वज्ञ टिप्पणी है; सूरदास-पक्ष में झुकती है। यह वाचक अपने मन को भी छिपाता है। सहानुभूति देता है, बचाव भी करता है। निष्पक्ष दर्शक नहीं। कुछ पाठ उसे एम. दयाल की आत्मकथा-ढाँचे से पढ़ते हैं; पहचान प्रमोद है। शेखर एक जीवनी का मैं चेतना की परत है; यह मैं स्मृति और अपराध-बोध है। बाणभट्ट आत्मकथा का मैं कवि-नायक है। अनामदास पोथा का संकलक है। महाभोज सर्वज्ञ घटना है। बिना वाचक लिखे शिल्प-उत्तर अधूरा है। नायक मृणाल है; वाचक प्रमोद है। दोनों को एक कहना अधूरा है।
कथावस्तु कारण से बँधी है — समाज की दृष्टि दंड देती है, संयोग नहीं। फॉर्स्टर क्रम और कारण कहते हैं। क्रम घटनाओं का है; कारण पवित्रता-दंड और सत्य है। चरित्र दो गोल हैं — मृणाल, प्रमोद। सहायक शीला, पति, कोयला-व्यापारी, भाभी सपाट रहते हैं; कथा मोड़ते हैं। उद्देश्य चित्रण और नैतिक प्रश्न है। पात्र-भीड़ रंगभूमि जैसी नहीं। आकार लघु है, प्रश्न चौड़ा है। संवाद विचार का है, बोलचाल का ढेर नहीं। प्रेमचंद का संवाद बोलचाल का है; यह संवाद नैतिक तर्क का है। भाषा खड़ी बोली; वाक्य छोटे, विचार घने। प्रश्न-वाक्य भीतर के द्वंद्व खोलते हैं। संस्कृत-गर्भ कम है, विचार-भार अधिक है। रेणु आंचल-शब्द लाते हैं; यहाँ आंचल नहीं। व्यंग्य राग दरबारी जैसा प्रशासनिक नहीं; दृष्टि का व्यंग्य है। शैली आत्मकथा-कथन की है, डायरी नहीं। चेतना-प्रवाह पूरा धारा नहीं; संकेत और दमित इच्छा हैं।
देशकाल पृष्ठ नहीं, दृष्टि का दबाव है — मध्यवर्गीय परिवार, विवाह, अस्पताल, बस्ती। यह मर्यादा से गिरी कही गई बस्ती है। नामवर नए उपन्यास के शिल्प पर बोलते हैं; जैनेन्द्र उसी मोड़ के आरंभ हैं। तत्त्व बिना शिल्प के ढेर हैं; शिल्प बिना मृणाल के प्रयोग है। शीर्षक दो अर्थ बाँधता है — पद का पत्र, दावे का त्याग। पत्र लिखित निर्णय है, केवल भाव नहीं। संरचना स्मृति की है; आरंभ-मध्य-अंत द्वंद्व-क्रम से पहचाने जाते हैं। भाषा खड़ी बोली है, वाक्य छोटे हैं।
सीमा दुरुहता है। पुरुष-वाचक स्त्री-केंद्र पर तनाव है। समाज की चौड़ाई कम है। व्यवस्था नहीं टूटती। गुण यह कि हिन्दी उपन्यास को भीतर की आँख मिली। सुनीता 1935 दूसरा प्रयोग है। गोदान 1936 के एक वर्ष बाद यह मोड़ प्रेमचंदोत्तर खोलता है। आदर्शीकरण सूरदास जैसा सार्वजनिक नहीं; यहाँ आत्मदान का विवाद है।
निष्कर्ष यह है कि शिल्प उत्तम पुरुष, स्मृति-संरचना और विचार-संवाद है; विन्यास मन के द्वंद्व को बाँधता है, सर्वज्ञ समाज-विस्तार या रंगभूमि का दो-सूत्र नहीं।
33. त्यागपत्र में नारी-समस्या लिखिए।8 अंक
त्यागपत्र में नारी-समस्या पूछती है कि स्त्री वस्तु है या कर्ता। मृणाल पीटी जाती है, ब्याही जाती है, निकाली जाती है — वस्तु जैसी घटनाएँ हैं। सत्य कहना, इंकार करना, न लौटना — कर्ता के कर्म हैं। शिक्षा, प्रेम और सत्य तीनों दंड बन सकते हैं। भाभी कठोर अनुशासन से आदर्श नारी बनाना चाहती है। विवाह अधेड़, पूर्व-विवाहित पुरुष से कर दिया जाता है। पवित्रता शरीर पर नापी जाती है; मृणाल मन पर नापती है। वाचक पुरुष प्रमोद है; अनुभव स्त्री का है। तथाकथित शिष्ट वृत्त छल रख सकता है; तिरस्कृत बस्ती छल नहीं छिपाती। आत्मदान विद्रोह का नारा नहीं; अलग होकर टूटना है। आलोचना कभी इसे व्यवस्था-समर्थन पढ़ती है। बचाव यह है कि चित्र व्यवस्था की क्रूरता बिना उपदेश के दिखाता है।
सेवासदन इज्जत का प्रश्न है। सोफिया धर्म-संकर प्रेम है। महाभोज की रुक्मा तंत्र के सामने खड़ी है। सुनीता 1935 अलग प्रयोग है। यहाँ मर्यादा और निर्णय है। सीमा यह कि व्यवस्था नहीं टूटती, व्यक्ति टूटता है। गुण यह कि नारी करुण दृश्य नहीं।
निष्कर्ष यह है कि नारी-समस्या मृणाल के सत्य और इंकार पर खुलती है; केंद्र कर्ता होना है, केवल दंड पाना नहीं।
34. त्यागपत्र की मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ लिखिए।8 अंक
त्यागपत्र मनोवैज्ञानिक उपन्यास की निर्धारित कृति है। प्रकाशन 1937। भीतर का द्वंद्व कथा का केंद्र है। घटना पतली है, निर्णय घना है। वाचक उत्तम पुरुष है — प्रमोद। संवाद विचार का है। स्मृति आगे-पीछे मोड़ती है। चेतना-प्रवाह पूरा धारा नहीं; संकेत और दमित इच्छा हैं। मृणाल का इंकार और प्रमोद की दुविधा दो मन हैं। प्रेमचंद बाहर का कारण दिखाते हैं — ऋण, कारखाना, गोली। यह कृति भीतर का कारण दिखाती है — दृष्टि, पवित्रता-दंड, अपराध-बोध। अज्ञेय का शेखर चेतना-प्रवाह है; यह स्मृति और प्रायश्चित्त है। लुबॉक दृष्टि को शिल्प का केंद्र कहते हैं; यहाँ दृष्टि सीमित-व्यक्तिगत है।
विशेषताएँ चार हैं — अंतर्मन, मैं-दृष्टि, गोल चरित्र, नैतिक द्वंद्व। चरित्र दो गोल हैं — मृणाल, प्रमोद। सहायक शीला, पति, कोयला-व्यापारी सपाट रहते हैं। सीमा समाज की चौड़ाई कम है। गुण चरित्र का गहरा होना है। नामवर जैनेन्द्र को नए उपन्यास के आरंभ पर रखते हैं। सुनीता दूसरा प्रयोग है, पाजेब कहानी है।
निष्कर्ष यह है कि त्यागपत्र की मनोवैज्ञानिक पहचान निर्णय, स्मृति और द्वंद्व से है; प्रतिनिधि कृति यही है, शेखर का पर्याय नहीं।
35. प्रमोद त्यागपत्र क्यों देता है?8 अंक
प्रमोद न्यायाधीश पद से त्यागपत्र देता है। कारण प्रायश्चित्त है। वह मृणाल की पीड़ा बचपन से समझता था, साथ कम देता था। पद और प्रतिष्ठा पीछे खींचते रहे। आलोचना उसे स्वार्थ और करुणा का मिश्रण कहती है। अंतिम अवस्था आंदोलित करती है — रोग, बस्ती, मृत्यु। कानून चलाता रहा; बुआ के सामने कानून अधूरा पड़ा। न्यायाधीश सामाजिक व्यवस्था का मुख है; पत्र उसी मुख का इंकार है। नाम यहीं पूरा होता है — पत्र लिखित निर्णय है। दूसरा अर्थ मृणाल का दावा छोड़ना है; प्रमोद का पत्र उसके इंकार के बाद आता है। कर्म बाहर का है, देर से। बिना मृत्यु के पत्र कमजोर रहता। बिना पत्र के शीर्षक अधूरा रहता।
यह विनय सिंह की आत्महत्या नहीं। यह सूरदास का सार्वजनिक इंकार नहीं। यह निजी पद छोड़ना है। नायक मृणाल रहती है; वाचक कर्म से अपने को तौलता है, रक्षक नहीं बन पाता। सुनीता में यह पद-त्याग नहीं।
निष्कर्ष यह है कि प्रमोद त्यागपत्र इसलिए देता है कि न्यायाधीश का न्याय मृणाल के सत्य के सामने टूट जाता है।
36. त्यागपत्र का सामाजिक महत्त्व लिखिए।20 अंक
त्यागपत्र का सामाजिक महत्त्व 1937 के मध्यवर्ग, विवाह और पवित्रता-दृष्टि पर है। आदर्श स्त्री माँगना दंड बनता है। शिक्षा, प्रेम और सत्य तीनों अपराध ठहराए जा सकते हैं। भाभी अनुशासन है — आदर्श नारी बनाना लक्ष्य है। विवाह संस्था सम्मानित भी है, कमजोर भी दिखाई गई है। पति अधेड़ है, स्वयं पूर्व-विवाह का बोझ रखता है; सत्य सुनकर निकालता है। ससुराल से कटान सामाजिक मृत्यु है। मायके का दावा भी नहीं टिकता। तथाकथित शिष्ट वृत्त छल रख सकता है; तिरस्कृत बस्ती छल नहीं छिपाती — यही व्यंग्य है, नारा नहीं। नारी-प्रश्न आलंबन का है। वाचक पुरुष है; अनुभव स्त्री का है। यह तनाव सामाजिक भी है, शिल्प का भी। दलित गवाही यह उपन्यास नहीं; जाति-नाम सूरदास जैसा केंद्र नहीं। प्रश्न नैतिक दृष्टि का है — शरीर की पवित्रता बनाम मन की पवित्रता।
गोदान ऋण का समाज है — किसान, महाजन, मर्यादा। रंगभूमि कारखाने का समाज है — पांडेपुर, जॉन सेवक, क्लार्क। महाभोज चुनाव का समाज है — सरोहा, लाश, वोट। अनामदास का पोथा ज्ञान और संस्कृति का समाज है। त्यागपत्र परिवार और मर्यादा का समाज है। तीनों आधुनिक मनुष्य हैं, दबाव अलग हैं। राष्ट्रीय आंदोलन कथा का केंद्र नहीं; व्यक्ति का सत्य केंद्र है। यही पूरक होना है, शत्रु होना नहीं। प्रेमचंद बाहर का कारण दिखाते हैं। यह कृति भीतर तक समाज की दृष्टि ले जाती है। सेवासदन इज्जत और वेश्या-प्रश्न है। आपका बंटी विवाह-विच्छेद और बच्चे का प्रश्न है। यहाँ विवाह-दंड और इंकार है। तीनों स्त्री को छूते हैं, मार्ग अलग हैं।
प्रमोद न्यायाधीश है। कानून सामाजिक व्यवस्था का मुख है। बुआ के सामने वही कानून अधूरा पड़ जाता है। पद-त्याग सामाजिक कर्म भी है, केवल निजी भाव नहीं। नाम पत्र से सार्वजनिक होता है। मृणाल दावा छोड़ती है; समाज उसे पतित कहता रहता है। बच्चों को पढ़ाना बस्ती में छोटा सामाजिक कर्म है, सुधार-आंदोलन नहीं। कोयला-व्यापारी संपत्ति के समाज का सिरा है। शीला का भाई अस्थायी प्रेम का सिरा है। तीन पुरुष तीन सामाजिक दबाव हैं। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण दृष्टि है। लुबॉक दृष्टि कहते हैं; सामाजिक महत्त्व उसी सीमित आँख से दिखता है। गोपाल राय प्रेमचंदोत्तर को मन की परत कहते हैं; समाज गायब नहीं, दबाव बनकर रहता है।
सीमा यह कि व्यवस्था का ढाँचा नहीं टूटता, व्यक्ति टूटता है। आकार छोटा, चौड़ाई कम। दुरुहता पाठक काट सकती है। आत्मदान को मुक्ति कहना विवाद है; आलोचना कभी व्यवस्था-समर्थन पढ़ती है। बचाव यह है कि चित्र व्यवस्था की क्रूरता बिना उपदेश के दिखाता है। उपदेश वाचक पर सवार हो तो उपन्यास कमजोर पड़ता है; यहाँ चित्र कठोर है। सामाजिक उपन्यास पूरा नहीं; समाज दबाव है, कथा मन की है। गुण यह कि प्रश्न व्यक्ति के भीतर तक जाता है। सुनीता 1935 अलग कृति है। बिना पवित्रता-दंड के नारी-प्रश्न नारा रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि सामाजिक महत्त्व विवाह, पवित्रता और नारी-दंड पर है; चित्र व्यवस्था की क्रूरता बिना उपदेश के दिखाता है, कारखाना या चुनाव नहीं।
37. त्यागपत्र और सुनीता में अंतर लिखिए।8 अंक
सुनीता 1935 जैनेन्द्र कुमार का उपन्यास है। नायिका सुनीता है। आकर्षण, दांपत्य और निर्णय का दूसरा प्रयोग है। पत्र की निर्धारित कृति यह नहीं। त्यागपत्र 1937 है। नायिका मृणाल है। वाचक प्रमोद — भतीजा, वकील, न्यायाधीश। शीर्षक पद-त्याग और दावा-त्याग है। रूप लघु मनोवैज्ञानिक उपन्यास है। उत्तम पुरुष वाचक यहीं केंद्र है। निर्धारित कृति पत्र में यही है। परख 1929 पहला बड़ा उपन्यास है, तीसरा त्यागपत्र है, सुनीता बीच का प्रयोग है। कल्याणी 1939 आगे की कृति है। पाजेब 1942 की कहानी है, दोनों उपन्यासों से अलग। मुक्तिबोध कवि गजानन माधव हैं; जैनेन्द्र का उपन्यास मुक्तिबोध निर्धारित नहीं।
साम्य जैनेन्द्र, खड़ी बोली, अंतर्मन और नारी-केंद्र है। वैषम्य वर्ष, नायिका, वाचक और शीर्षक-अर्थ पर है। रंगभूमि से अंतर और भी बड़ा है — सर्वज्ञ समाज बनाम मैं-स्मृति। बिना नायिका लिखे नाम-भ्रम रह जाता है। बिना वर्ष लिखे क्रम उलझ जाता है। गोपाल राय इतिहास में त्यागपत्र को शिखर-नाम कहते हैं, सुनीता को उसी पंक्ति का दूसरा प्रयोग। मिलाए बिना मूल्यांकन अधूरा है, एक कहकर भी अधूरा है।
निष्कर्ष यह है कि सुनीता 1935 का अलग प्रयोग है, त्यागपत्र मृणाल-प्रमोद और पद-त्याग की निर्धारित कृति है; मिलाया नहीं जाता।
38. त्यागपत्र का मूल्यांकन कीजिए।20 अंक
त्यागपत्र का मूल्यांकन तीन स्तरों पर है। साहित्यिक — लघु मनोवैज्ञानिक उपन्यास, उत्तम पुरुष, खड़ी बोली, छोटे वाक्य, विचार-संवाद। ऐतिहासिक — 1937, गोदान के एक वर्ष बाद, प्रेमचंदोत्तर मोड़। नैतिक — सत्य, इंकार, प्रायश्चित्त। नायिका मृणाल आधुनिक हिन्दी की दुर्लभ कर्ता-स्त्री है। वाचक प्रमोद स्मृति और अपराध-बोध है। शीर्षक दो अर्थ बाँधता है — न्यायाधीश-पद का पत्र, मृणाल का दावा छोड़ना। जैनेन्द्र कुमार 1905–1988, कौड़ियागंज; बचपन आनंदीलाल; पद्म भूषण 1971; साहित्य अकादमी 1979 उपन्यास मुक्तिबोध पर — निर्धारित नहीं। हिन्दी में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक माने जाते हैं। प्रेमचंद का विलोम नहीं, पूरक हैं। भाषा तराशती है। अज्ञेय का गद्य इसी तोड़ के बाद कहा जाता है। नामवर नए उपन्यास के शिल्प पर बोलते हैं; जैनेन्द्र उसी मोड़ के आरंभ हैं।
गुण तीन हैं। पहला — स्थिर अंतर्मन; घटना पतली, निर्णय घना। दूसरा — वाचक की सीमित आँख; लुबॉक दृष्टि को केंद्र कहते हैं। तीसरा — नारी को दृश्य नहीं, निर्णय बनाना। अज्ञेय और जोशी आगे की पंक्ति हैं। प्रेमचंद बाहर का समाज देते हैं; यह भीतर का निर्णय देता है। सूरदास सार्वजनिक इंकार है; मृणाल निजी सत्य सार्वजनिक दंड पाती है। रंगभूमि दीर्घ है; यह लघु है। गोदान किसान है; यह नगर-परिवार की नैतिकता है। फॉर्स्टर कारण माँगते हैं; कारण दृष्टि है, संयोग नहीं। गोपाल राय इतिहास में इसे प्रेमचंदोत्तर के शिखर-नाम पर रखते हैं। बिना पद-त्याग के शीर्षक अधूरा है। बिना मृणाल के मनोविज्ञान खाली प्रयोग है।
सीमाएँ साफ हैं। आकार छोटा। समाज की चौड़ाई कम। दुरुहता। पुरुष-वाचक स्त्री-केंद्र पर। व्यवस्था नहीं टूटती, व्यक्ति टूटता है। आत्मदान को मुक्ति कहना विवाद है; आलोचना कभी व्यवस्था-समर्थन पढ़ती है। प्रमोद करुण है, रक्षक बन नहीं पाता; त्यागपत्र देर का प्रायश्चित्त है। सहायक पात्र सपाट रह सकते हैं। राष्ट्रीय आंदोलन कथा का केंद्र नहीं — कुछ इसे समाज-कटान कहते हैं, कुछ व्यक्ति-सत्य की शक्ति। दोनों आक्षेप उत्तर में लिखे जाते हैं। गुण चित्र की कठोरता है, नारा नहीं। उपदेश वाचक पर सवार नहीं।
पहचान निषेध से पूरी होती है। पाजेब कहानी अलग है। सुनीता 1935 अलग कृति है; नायिका सुनीता है। परख 1929 पहला बड़ा उपन्यास है, शिखर-नाम यह है। कल्याणी 1939 आगे है। मुक्तिबोध कवि गजानन माधव हैं; जैनेन्द्र का उपन्यास मुक्तिबोध निर्धारित नहीं। शेखर एक जीवनी उत्तम पुरुष है, चेतना की परत अलग है। सेवासदन की सुमन नगर-नैतिकता है। सोफिया धर्म-संकर प्रेम है। मूल्यांकन इन्हीं अंतरों के बिना अधूरा है। पूरी कथा पढ़नी है; सार मृणाल, प्रमोद, 1937, पद-त्याग याद रखने के लिए है, ग्रंथ की जगह नहीं। सीमाओं के बावजूद निर्धारित कृति टिकती है।
निष्कर्ष यह है कि त्यागपत्र 1937 का मनोवैज्ञानिक शिखर-नाम है; सीमाएँ दुरुहता और व्यवस्था-अटूट की हैं, पर मृणाल, प्रमोद और पद-त्याग इन्हीं से पहचाने जाते हैं।
39. त्यागपत्र में व्यक्ति और समाज का द्वंद्व लिखिए।20 अंक
त्यागपत्र में व्यक्ति और समाज का द्वंद्व मृणाल के सत्य और समाज की दृष्टि के बीच है। व्यक्ति सत्य कहना चाहता है। समाज पवित्रता शरीर पर नापता है। भाभी अनुशासन है — आदर्श स्त्री का साँचा। शीला का भाई प्रेम है, संस्था नहीं; प्रेम खुलना दंड बनता है। विवाह सम्मानित संस्था है, कमजोर भी दिखाई गई है। पति स्वयं पूर्व-विवाहित है, सत्य सुनकर निकालता है। ससुराल से कटान सामाजिक मृत्यु है। मायके का दावा भी नहीं टिकता। व्यक्ति अकेला पड़ जाता है। मृणाल समाज तोड़ना नहीं चाहती; अलग होकर टूटती है। यही द्वंद्व का पहला रूप है — भीतर का सत्य, बाहर का दंड। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण दृष्टि है, संयोग नहीं। वाचक प्रमोद उसी द्वंद्व को स्मृति में दोहराता है।
प्रमोद द्वंद्व का दूसरा सिरा है। नेह है, मर्यादा है। न्याय का पद है, न्याय का अर्थ अधूरा है। वह व्यक्ति को समझता है, समाज के पद पर बैठता है। करुण है, मुक्त नहीं। समझता है, करता कम है। पद और प्रतिष्ठा पीछे खींचते हैं। आलोचना उसे स्वार्थ और करुणा का मिश्रण कहती है। अंतिम अवस्था तक आंदोलन भीतर ही रहता है। त्यागपत्र उसी द्वंद्व का अंतिम कर्म है — देर का प्रायश्चित्त। विनय सिंह आवेश में प्राण देते हैं; यह वाचक पत्र से पद देता है। सूरदास इंकार सार्वजनिक है। मृणाल इंकार निजी है, दंड सार्वजनिक है। तीनों व्यक्ति-समाज के अलग मार्ग हैं। न्यायाधीश कानून चलाता है; बुआ के सामने कानून अधूरा पड़ जाता है। नाम यहीं द्वंद्व को लिखित करता है।
रंगभूमि का द्वंद्व सार्वजनिक है — ज़मीन, कारखाना, गोली, क्लार्क। गोदान का द्वंद्व ऋण और मर्यादा का है — होरी किसान। महाभोज का द्वंद्व हक और चुनाव का है — बिसू की लाश। अनामदास का पोथा में द्वंद्व ज्ञान और नेह का है — रैक्व, जाबाला, जनश्रुति। त्यागपत्र का द्वंद्व निजी है, दंड सार्वजनिक है। आंचल नहीं। राजनीति नहीं। ऐतिहासिक राज-युद्ध नहीं। नैतिक दृष्टि का दबाव है। तथाकथित शिष्ट वृत्त छल रख सकता है; तिरस्कृत बस्ती छल नहीं छिपाती। व्यक्ति को समाज पतित कहता है; वाचक उसे भीतर से शुद्ध दिखाता है। लुबॉक दृष्टि कहते हैं; द्वंद्व उसी सीमित आँख से दिखता है, सर्वज्ञ समाज-चित्र से नहीं। नारी वस्तु जैसी घटनाएँ पाती है, कर्ता जैसे कर्म करती है। यही व्यक्ति का बचाव है।
सीमा यह कि समाज का ढाँचा नहीं टूटता। व्यक्ति टूटता है या पद छोड़ता है। आत्मदान विद्रोह का नारा नहीं; अलग होकर टूटना है। आलोचना कभी इसे व्यवस्था-समर्थन पढ़ती है। बचाव यह है कि चित्र व्यवस्था की क्रूरता बिना उपदेश के दिखाता है। गुण यह कि द्वंद्व भीतर तक जाता है। सुनीता आकर्षण का दूसरा द्वंद्व है, यह कृति नहीं। बिना समाज की दृष्टि के व्यक्ति केवल संत रह जाता है। दोनों सिरे लिखे बिना उत्तर अधूरा है।
निष्कर्ष यह है कि व्यक्ति मृणाल का सत्य है और समाज पवित्रता-दंड है; द्वंद्व इंकार और पद-त्याग तक चलता है, कारखाना या चुनाव तक नहीं।
40. हजारीप्रसाद द्विवेदी का परिचय लिखिए।8 अंक
हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म 19 अगस्त 1907, दुबे का छपरा, ओझवलिया, बलिया। बचपन का नाम वैद्यनाथ। पिता अनमोल द्विवेदी, संस्कृत-ज्योतिष। निधन 19 मई 1979, दिल्ली। काशी में शास्त्री, फिर ज्योतिष में आचार्य 1930। शांतिनिकेतन में हिन्दी-अध्यापन 1930 से लगभग बीस वर्ष — रवींद्रनाथ ठाकुर और क्षितिमोहन सेन का संग। 1950 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, हिन्दी विभागाध्यक्ष। 1968–70 रेक्टर। पद्म भूषण 1957। साहित्य अकादमी 1973 — निबंध-संग्रह आलोक पर्व पर; यह उपन्यास नहीं। नामवर उन्हें दूसरी परंपरा कहते हैं — लोक, भक्ति, संस्कृति शुक्ल-पंक्ति का पूरक। उपन्यास-पंक्ति बाणभट्ट की आत्मकथा 1946, चारु चंद्रलेख 1963, पुनर्नवा 1973, अनामदास का पोथा 1976। निबंध अशोक के फूल, कल्पलता, कुटज। आलोचना कबीर, हिन्दी साहित्य की भूमिका।
निर्धारित कृति अंतिम उपन्यास है, पहला नहीं। दृष्टि मानव और संस्कृति का समन्वय है। भाषा खड़ी बोली, संस्कृत-गर्भ। सीमा दुरुहता का आक्षेप है। गुण युग के मन को कथा बनाना है। महावीर प्रसाद द्विवेदी द्विवेदी युग के आचार्य हैं, भाषा-शुद्धि के; यह उपन्यासकार नहीं। वृंदावनलाल वर्मा घटना-इतिहास लिखते हैं; द्विवेदी मानस लिखते हैं।
निष्कर्ष यह है कि द्विवेदी 1907–1979 के संस्कृति-उपन्यासकार हैं; निर्धारित कृति अनामदास का पोथा 1976 है, बाणभट्ट अलग नाम है।
41. अनामदास का पोथा का नामकरण स्पष्ट कीजिए।8 अंक
अनामदास का पोथा हजारीप्रसाद द्विवेदी का अंतिम उपन्यास है। प्रकाशन 1976, राजकमल। नाम दो स्तर बाँधता है। पोथा पांडुलिपि है, छपा इश्तिहार नहीं। अनामदास उसे लिखता-संकलित करता है। भीतर का शीर्षक अथ रैक्व-आख्यान है। आलोचना उसे जिजीविषा की कथा कहती है — जीने की इच्छा ज्ञान से कटती नहीं। रूप सांस्कृतिक-ऐतिहासिक उपन्यास है। वर्मा जैसा राज-युद्ध नहीं। रेणु जैसा आंचल नहीं। जैनेन्द्र जैसा केवल अंतर्मन नहीं। उपनिषद् का सूत्र है, टीका नहीं। वाचक पोथा का है, सर्वज्ञ कारखाना-वर्णन नहीं। अनामदास संकलक है, रैक्व आख्यान का साधक है; दोनों एक नहीं। पृष्ठभूमि छान्दोग्य का रैक्व-जनश्रुति प्रसंग है।
बाणभट्ट की आत्मकथा 1946 आत्मकथा-ढाँचा है, हर्ष-काल का मानस है। चारु चंद्रलेख 1963 अलग आख्यान है। पुनर्नवा 1973 बुद्ध-काल छूती है। यह उपनिषद्-काल का मानस है। रंगभूमि का नाम कर्म-नीति है। त्यागपत्र पद-त्याग है। महाभोज व्यंग्य-भोज है। बिना रैक्व के आख्यान अधूरा रहता है। बिना अनामदास के पोथा ढाँचा खो देता है। महावीर प्रसाद द्विवेदी इस शीर्षक के लेखक नहीं। सत्यकाम-माता का नाम-भ्रम जाबाला पर है, पोथा-ढाँचे पर नहीं।
निष्कर्ष यह है कि नामकरण पोथा-ढाँचे और अनामदास-संकलक से है; कृति 1976 की है, बाणभट्ट की आत्मकथा नहीं।
42. अनामदास का पोथा की कथावस्तु लिखिए।20 अंक
अनामदास का पोथा हजारीप्रसाद द्विवेदी का निर्धारित अंतिम उपन्यास है। प्रकाशन 1976, राजकमल। भीतर का आख्यान अथ रैक्व-आख्यान कहा जाता है। ढाँचा अनामदास की पोथी का है; अनामदास संकलक-वाचक है, रैक्व नहीं। पृष्ठभूमि छान्दोग्य उपनिषद् का रैक्व-जनश्रुति प्रसंग है। रूप सांस्कृतिक उपन्यास है — घटना की नकल नहीं, युग के मानस की कथा। बाणभट्ट की आत्मकथा 1946 अलग कृति है। चारु चंद्रलेख 1963, पुनर्नवा 1973 अलग हैं। महावीर प्रसाद द्विवेदी द्विवेदी युग के आचार्य हैं, यह लेखक नहीं। कथावस्तु रैक्व के जीवन से खुलती है। ऋषिपुत्र है। माता जन्म पर नहीं रहतीं। पिता वेद का कुछ अंश देकर चल बसते हैं। बालक जंगल और गाँव के बीच साधक कहा जाता है। आरंभ ज्ञान का एकांत है, संयोग-कौतुक नहीं।
एक तूफान आता है। वायु का बल उसे ज्ञान का प्रश्न बनाता है। तूफान के बाद बिखरी बैलगाड़ी मिलती है। एक शरीर नहीं बचता। दूसरा घायल राजकन्या है — जाबाला, जनश्रुति की पुत्री। यहीं साधक और संसार का पहला मिलन है। वह संसार, सौंदर्य और कर्तव्य का दबाव है। उपन्यास उसे केवल वस्तु नहीं रहने देता। प्रेम ब्रह्म-ज्ञान का पहला सोपान कहा जाता है, अंतिम नहीं — आलोचना यही पढ़ती है। सत्यकाम जाबाल की माता जाबाला अलग प्रसंग हैं — दासी/अज्ञात गोत्र, सत्य कहने वाली; यह नायिका नहीं। मिलाए बिना कथावस्तु गलत हो जाती है। अरुंधति सहायक नारी-पात्र हैं; गृहस्थ और तप के बीच की रेखा खोलती हैं।
आगे छान्दोग्य का प्रसंग खुलता है। राजा जनश्रुति दान के लिए विख्यात है। पक्षियों की वार्ता से वह रैक्व की महिमा सुनता है — शकट के नीचे बैठा साधक, ज्ञान में बड़ा। राजा ज्ञान माँगता है। रैक्व पहले टालता है। ज्ञान बिकाऊ नहीं। फिर भेंट और कन्या के साथ राजा लौटता है। उपन्यास इस अधूरे प्रसंग को नेह, जिजीविषा और समाज-परीक्षा से भरता है। द्विवेदी कहते हैं शास्त्र-प्रसंग अधूरा लगता है। सूत्र शास्त्र का है; विस्तार मनुष्य का है। फॉर्स्टर क्रम और कारण कहते हैं। क्रम घटनाओं का है; कारण ज्ञान की चाह, नेह और राजा का अहं है, संयोग नहीं। जिजीविषा जीने की इच्छा है; ज्ञान जीवन से कटकर सूखता है।
देशकाल आश्रम, वन, राजसभा, शकट है। गोदान का गाँव नहीं। पांडेपुर उद्योग की बस्ती नहीं। सरोहा चुनाव नहीं। वर्मा जैसा राज-युद्ध नहीं। कथानक टीका नहीं, कथा है। ऐतिहासिक तिथि नहीं माँगी जाती; मानस माँगा जाता है। सीमा यह कि शास्त्र-पाठक उपन्यास को केवल व्याख्या पढ़ ले। प्रेम-सूत्र को केवल रमानी पढ़ लेना दूसरा दोष है। गुण यह कि शास्त्र मनुष्य तक उतरता है। बिना अनामदास के पोथा ढाँचा खो देता है। बिना रैक्व के आख्यान अधूरा रहता है। बिना जनश्रुति के सार्वजनिक अर्थ पतला है। सार ग्रंथ की जगह नहीं; पूरी कथा पढ़नी है। वाचक निष्पक्ष दर्शक नहीं; संस्कृति का पक्ष लेता है, उपदेश का नारा नहीं।
निष्कर्ष यह है कि कथावस्तु रैक्व का साधक-जीवन, जाबाला-मिलन और जनश्रुति का ज्ञान-याचना है; ढाँचा अनामदास की पोथी है, बाणभट्ट या सत्यकाम-माता नहीं।
43. रैक्व का चरित्र-चित्रण कीजिए।20 अंक
रैक्व अनामदास का पोथा का आख्यान-पुरुष है, वाचक नहीं। गोल चरित्र है। ऋषिपुत्र है। माता जन्म पर नहीं रहतीं। पिता वेद का कुछ अंश देकर चल बसते हैं। उपनिषद् उसे शकट-चालक साधु कहता है। उपन्यास उसे साधक और मनुष्य बनाता है। गुण जिज्ञासा, तप, इंकार, फिर स्वीकार हैं। संसार नहीं जानता; जाबाला संसार है। ज्ञान शास्त्र से आता है, परीक्षा समाज से होती है। अकेले सत्य बोलना सरल है; लोगों के बीच सत्य टिकता है — यही द्विवेदी का सूत्र है। तूफान वायु को ज्ञान का प्रश्न बनाता है। बिखरी बैलगाड़ी के बाद घायल राजकन्या मिलती है। साधक और जीवन का मिलन यहीं है। पीठ की खुजली उपनिषद् का संकेत है; उपन्यास उसे मनुष्य की बेचैनी तक ले जाता है। अनामदास नाम का बोझ कम रखता है; रैक्व अनुभव का बोझ रखता है। दोनों को एक कहना अधूरा है।
कर्म तीन हैं। पहला — तूफान के बाद घायल कन्या को पाना, एकांत तोड़ना। दूसरा — राजा जनश्रुति का पहला हाथ न पकड़ना; ज्ञान बिकाऊ न मानना। पक्षी राजा को रैक्व से छोटा ठहराते हैं; दान पद ज्ञान नहीं बनता। तीसरा — नेह की परीक्षा; जाबाला भेंट की तरह भी लाई जाती है, उपन्यास उसे कर्ता रहने देता है। आलोचना रैक्व को अनुभव का पुरुष कहती है। जिजीविषा जीने की इच्छा ज्ञान से कटती नहीं। प्रेम ब्रह्म-ज्ञान का पहला सोपान कहा जाता है, अंतिम नहीं। सीमा आदर्शीकरण है; साधक प्रतीक बन सकता है। गुण यह कि ज्ञान गोत्र और पद से नहीं, अनुभव से पहचाना जाता है। बिना जाबाला के चरित्र अधूरा है। बिना जनश्रुति के सार्वजनिक अर्थ पतला है। अरुंधति सहायक रेखा खोलती हैं, नायक नहीं।
तुलना से पहचान स्थिर होती है। सूरदास सार्वजनिक इंकार है — ज़मीन, कारखाना, गोली। प्रमोद देर का प्रायश्चित्त है — पद-त्याग। मृणाल नैतिक इंकार है। बिसू हक का इंकार है। बाणभट्ट कवि-नायक है, आत्मकथा-मैं। रैक्व ज्ञान का इंकार और नेह का स्वीकार दोनों रखता है। होरी ऋण से बँधा किसान है, यह साधक नहीं। भक्त-कवि सूरदास यह नहीं। जनश्रुति खलनायक-दैत्य नहीं; ज्ञान चाहने वाला सामंत है, अहं लेकर आता है। जॉन सेवक लोभ का पूँजीपति है; यह राजा दान का अहं है। नामवर द्विवेदी को दूसरी परंपरा कहते हैं; रैक्व उसी मानव-सूत्र का पुरुष है।
शिल्प पोथा-ढाँचे में चरित्र बैठता है। वाचक संकलक है; आख्यान साधक का है। लुबॉक दृष्टि कहते हैं; यहाँ दो आँखें हैं। भाषा खड़ी बोली, संस्कृत-गर्भ; संवाद शास्त्र और जीवन का है। देशकाल वन, आश्रम, शकट, राजसभा है। वर्मा घटना-इतिहास लिखते हैं; द्विवेदी मानस लिखते हैं। सत्यकाम-प्रसंग अलग अध्याय है, यह चरित्र नहीं। बिना स्रोत लिखे प्रसंग अधूरा है। बिना जोड़ के स्रोत नकल है। पूरी कथा पढ़नी है; सार निर्णय और इंकार याद रखने के लिए है, ग्रंथ की जगह नहीं।
निष्कर्ष यह है कि रैक्व ज्ञान और नेह का साधक है; पहचान शकट, इंकार और जाबाला-मिलन से है, अनामदास या बाणभट्ट से नहीं।
44. जाबाला का चरित्र लिखिए।8 अंक
जाबाला अनामदास का पोथा में राजकन्या है, राजा जनश्रुति की पुत्री। तूफान के बाद बिखरी बैलगाड़ी में घायल मिलती है। रैक्व साधक है; यहीं साधक और संसार का पहला मिलन है। वह संसार, सौंदर्य और कर्तव्य का दबाव है। राजा उसे भेंट की तरह भी ले जाता है; उपन्यास उसे केवल वस्तु नहीं रहने देता। वह साधक को जीवन से जोड़ती है। प्रेम ब्रह्म-ज्ञान का पहला सोपान कहा जाता है, अंतिम नहीं — आलोचना यही पढ़ती है। जिजीविषा यहीं खुलती है — ज्ञान जीवन की खिंचाव से कटता नहीं। अरुंधति सहायक नारी-पात्र हैं; गृहस्थ और तप की रेखा खोलती हैं, नायिका नहीं। बिना जाबाला के रैक्व अधूरा है। बिना जनश्रुति के उसका सार्वजनिक अर्थ पतला है।
छान्दोग्य का दूसरा प्रसंग सत्यकाम जाबाल है। वहाँ जाबाला माता हैं, दासी या अज्ञात गोत्र, सत्य कहने वाली। वह यह उपन्यास की नायिका नहीं। मिलाए बिना उत्तर गलत हो जाता है। सेवासदन की सुमन नगर-नैतिकता है। मृणाल मर्यादा और इंकार है। सोफिया धर्म-संकर प्रेम है। रुक्मा तंत्र की साक्षी है। यह ज्ञान और नेह के बीच है। गोल चरित्र है, सपाट भेंट नहीं।
निष्कर्ष यह है कि जाबाला राजकन्या और नेह की कर्ता है; सत्यकाम की माता से मिलाया नहीं जाता।
45. अनामदास का पोथा के शिल्प-विधान का विवेचन कीजिए।20 अंक
अनामदास का पोथा का शिल्प पोथा-ढाँचा है। पोथा पांडुलिपि है, छपा इश्तिहार नहीं। अनामदास लिखता-संकलित करता है। भीतर अथ रैक्व-आख्यान चलता है। स्मृति और प्रसंग आगे-पीछे चल सकते हैं। घटना कम, संवाद विचार का। लुबॉक दृष्टि को केंद्र कहते हैं। यहाँ दृष्टि दो आँखें हैं — संकलक और साधक। अनामदास नाम का बोझ कम, खोज का बोझ अधिक रखता है। वह रैक्व की जगह नहीं लेता। शेखर का मैं चेतना की परत है। प्रमोद स्मृति और अपराध-बोध है। बाणभट्ट आत्मकथा का मैं कवि-नायक है। महाभोज सर्वज्ञ घटना है। रंगभूमि सर्वज्ञ टिप्पणी है। यह पांडुलिपि है। उत्तम पुरुष पूरा धारा नहीं; ढाँचा पोथी का है। लेखक आरंभ में उपनिषद्-प्रसंग को अधूरा पाता है; मनुष्य का नेह और जिज्ञासा जोड़ता है। वाचक निष्पक्ष दर्शक नहीं। वह संस्कृति का पक्ष लेता है, उपदेश का नारा नहीं।
कथावस्तु कारण से बँधी है — ज्ञान की चाह, नेह, राजा का अहं। फॉर्स्टर क्रम और कारण कहते हैं। चरित्र दो गोल हैं — रैक्व, जाबाला। जनश्रुति और अरुंधति सहायक हैं। उद्देश्य चित्रण और संस्कृति-प्रश्न है। पात्र-भीड़ रंगभूमि जैसी नहीं। भाषा खड़ी बोली, संस्कृत-गर्भ अधिक। वाक्य विचार ढोते हैं। प्रेमचंद का संवाद बोलचाल का है। जैनेन्द्र का संवाद नैतिक तर्क का है। यह संवाद शास्त्र और जीवन का है। रेणु आंचल-शब्द लाते हैं; यहाँ आंचल नहीं, संस्कृति-शब्द हैं। व्यंग्य राग दरबारी जैसा प्रशासनिक नहीं; अहं और दान का व्यंग्य है। शैली अध्यापकीय कही जाती है, उपदेश का ढेर नहीं। निबंधों की गवेषणात्मक शैली उपन्यास में कथा बनती है। देशकाल वन, आश्रम, राजसभा, शकट है — संस्कृति का दबाव, पृष्ठ नहीं।
चेतना-प्रवाह पूरा धारा नहीं। आत्मकथा-ढाँचा बाणभट्ट 1946 में है; यह 1976 का पोथा है। चारु चंद्रलेख 1963 अलग आख्यान-शिल्प है। पुनर्नवा 1973 बुद्ध-काल का स्पर्श है। तीनों एक लेखक हैं, विन्यास अलग है। वर्मा झाँसी की रानी में घटना और इतिहास-पुरुष चाहते हैं; द्विवेदी मानस चाहते हैं। नामवर दूसरी परंपरा के शिल्प पर बोलते हैं — लोक, भक्ति, संस्कृति शुक्ल-पंक्ति का पूरक। तत्त्व बिना शिल्प के ढेर हैं; शिल्प बिना रैक्व के प्रयोग है। रस शांत और करुण-नेह है। रूप सांस्कृतिक-ऐतिहासिक उपन्यास है, राजनीतिक नहीं, आंचलिक नहीं, केवल अंतर्मन नहीं। उपनिषद् का सूत्र है, टीका नहीं।
सीमा दुरुहता और कथा का उलझाव है। संस्कृत-भार पाठक काट सकता है। प्रेम-सूत्र को केवल रमानी पढ़ लेना शिल्प का दुरुपयोग है। सत्यकाम-माता से नाम-भ्रम संरचना का दोष नहीं, पाठ का भ्रम है। गुण यह कि हिन्दी उपन्यास को उपनिषद् का मानस मिला। निर्धारित कृति इन्हीं वाक्यों से पहचानी जाती है, अध्याय-गिनती से नहीं। लंबे उद्धरण नहीं; प्रसंग और भाव याद रहें। बिना वाचक लिखे शिल्प-उत्तर अधूरा है। बिना रैक्व के वाचक सूखा रहता है। महावीर प्रसाद द्विवेदी भाषा-शुद्धि हैं, यह शिल्प नहीं। पूरी कथा पढ़नी है; सार ढाँचा याद रखने के लिए है।
निष्कर्ष यह है कि शिल्प पोथा, अनामदास-वाचक और विचार-संवाद है; विन्यास संस्कृति के आख्यान को बाँधता है, सर्वज्ञ समाज-विस्तार या त्यागपत्र की स्मृति-मैं नहीं।
46. अनामदास कौन है?8 अंक
अनामदास अनामदास का पोथा का संकलक-वाचक है। नाम ही संकेत है — नाम का बोझ कम, खोज का बोझ अधिक। वह आख्यान का साक्षी-संकलक है। कथा उसकी पोथी में बैठती है। वह रैक्व की जगह नहीं लेता। रैक्व ऋषिपुत्र और शकट-साधक है; आख्यान उसी का है। शेखर का मैं चेतना की परत है। प्रमोद स्मृति और अपराध-बोध है। बाणभट्ट आत्मकथा का मैं कवि-नायक है। यह मैं पोथा लिखने वाला साधक है। उत्तम पुरुष पूरा धारा नहीं; ढाँचा पांडुलिपि का है। लेखक आरंभ में उपनिषद्-प्रसंग को अधूरा पाता है; मनुष्य का नेह और जिज्ञासा जोड़ता है। वाचक निष्पक्ष दर्शक नहीं। वह संस्कृति का पक्ष लेता है, उपदेश का नारा नहीं। पिता का नाम अनमोल द्विवेदी लेखक का है, यह पात्र नहीं।
बिना वाचक लिखे शिल्प-उत्तर अधूरा है। बिना रैक्व के वाचक सूखा रहता है। दोनों को एक कहना अधूरा है। शीर्षक पोथा उसी संकलक से पूरा होता है। सर्वज्ञ कारखाना-वाचक रंगभूमि का है; यह वह नहीं। महाभोज घटना-वाचक है। पहचान संकलक है, नायक नहीं।
निष्कर्ष यह है कि अनामदास संकलक-वाचक है; आख्यान का साधक रैक्व है, दोनों एक नहीं।
47. अनामदास का पोथा और बाणभट्ट की आत्मकथा में अंतर लिखिए।8 अंक
बाणभट्ट की आत्मकथा 1946 हजारीप्रसाद द्विवेदी का पहला बड़ा उपन्यास है। वाचक बाणभट्ट है। काल हर्ष-काल का मानस है। शिल्प आत्मकथा है। नायक कवि-पुरुष है। पत्र की निर्धारित कृति यह नहीं। अनामदास का पोथा 1976 अंतिम उपन्यास है। वाचक अनामदास संकलक है। आख्यान रैक्व और जाबाला का है। पृष्ठभूमि छान्दोग्य उपनिषद् का रैक्व-जनश्रुति प्रसंग है। शिल्प पांडुलिपि-पोथा है। निर्धारित कृति पत्र में यही है। चारु चंद्रलेख 1963 अलग आख्यान है। पुनर्नवा 1973 बुद्ध-काल का स्पर्श है। तीनों एक लेखक हैं, प्रश्न अलग हैं। महावीर प्रसाद द्विवेदी इस अंतर के किसी सिरे के लेखक नहीं।
साम्य द्विवेदी, खड़ी बोली, संस्कृति और मानव है। वैषम्य वर्ष, ढाँचा और आख्यान-पुरुष पर है। वृंदावनलाल वर्मा झाँसी की रानी में घटना चाहते हैं; द्विवेदी दोनों कृतियों में मानस चाहते हैं, युद्ध नहीं। रंगभूमि समाज का टकराव है। त्यागपत्र मन का द्वंद्व है। यह संस्कृति का आख्यान है, पर दो अलग शरीरों में। बिना वर्ष के अंतर नाम-भ्रम रह जाता है। नामवर दूसरी परंपरा दोनों से पढ़ते हैं, एक नहीं करते।
निष्कर्ष यह है कि बाणभट्ट आत्मकथा-मैं और हर्ष-मानस है, पोथा रैक्व-आख्यान और 1976 का अंतिम उपन्यास है; मिलाया नहीं जाता।
48. उपन्यास की जाबाला सत्यकाम की माता क्यों नहीं है?8 अंक
छान्दोग्य उपनिषद् में दो अलग प्रसंग हैं। सत्यकाम जाबाल गुरु के पास गोत्र पूछे जाने पर माता का सत्य कहता है — माता जाबाला, अज्ञात पिता, दासी-जीवन। वह प्रसंग गोत्र और सत्य का है। उपन्यास वह कथा नहीं चलाता। अनामदास का पोथा रैक्व-जनश्रुति आख्यान चलाता है। राजा जनश्रुति दान के लिए विख्यात है। पक्षियों की वार्ता से शकट-साधक रैक्व की महिमा सुनता है। ज्ञान माँगता है, पहले ठुकराया जाता है, भेंट और कन्या लेकर लौटता है। यहाँ जाबाला राजकन्या है, जनश्रुति की पुत्री, तूफान के बाद रैक्व से मिलन वाली। नेह और जिजीविषा उसी मिलन से खुलते हैं। द्विवेदी शास्त्र-प्रसंग को अधूरा पाकर मनुष्य जोड़ते हैं; सत्यकाम-अध्याय का पर्याय नहीं बनाते।
नाम का साम्य भ्रम पैदा करता है। रूप अलग है — माता बनाम राजकन्या। केंद्र अलग है — गोत्र-सत्य बनाम ज्ञान-नेह। मिलाए बिना उत्तर गलत हो जाता है। अरुंधति सहायक हैं, सत्यकाम-माता नहीं। बाणभट्ट की आत्मकथा इस भ्रम की कृति नहीं। परीक्षा में यही निषेध माँगा जाता है।
निष्कर्ष यह है कि उपन्यास की जाबाला राजकन्या है, सत्यकाम की माता अलग उपनिषद्-प्रसंग है; मिलाया नहीं जाता।
49. अनामदास का पोथा में जिजीविषा लिखिए।8 अंक
जिजीविषा जीने की इच्छा है। आलोचना अनामदास का पोथा के आख्यान को जिजीविषा की कथा कहती है। रैक्व ज्ञान चाहता है, फिर भी जीवन की खिंचाव जाबाला से आती है। तूफान के बाद बचना, घायल राजकन्या को पाना, राजा जनश्रुति का मोल न लेना — ये जीने के रूप हैं। ज्ञान जीवन से कटकर सूखता है। द्विवेदी अकेले सत्य को सरल कहते हैं; लोगों के बीच सत्य को कठिन कहते हैं। समाज तप की तराजू है। प्रेम ब्रह्म-ज्ञान का पहला सोपान कहा जाता है, अंतिम नहीं। पोथा-ढाँचा इसी इच्छा को संकलित कथा बनाता है, मंत्र-टीका नहीं। बिना जाबाला के जिजीविषा नारा रह जाती है। बिना रैक्व के वह केवल गृहस्थ-सुख रह जाती है।
त्यागपत्र इंकार और मृत्यु की कथा है। रंगभूमि शहादत की है। महाभोज लाश की है। यह जीने और जानने की एक कथा है। सीमा यह कि प्रेम-सूत्र को केवल रमानी पढ़ लेना जिजीविषा को घटाता है। गुण यह कि उपनिषद् मनुष्य-हित से पढ़ा जाता है। सत्यकाम-माता का प्रसंग गोत्र का है, यह इच्छा नहीं।
निष्कर्ष यह है कि जिजीविषा ज्ञान का विरोध नहीं, उसका अंग है; बिना जीवन के ज्ञान अधूरा रहता है।
50. अनामदास का पोथा का सांस्कृतिक महत्त्व लिखिए।20 अंक
अनामदास का पोथा का सांस्कृतिक महत्त्व 1976 में उपनिषद् को मनुष्य-कथा बनाने पर है। शास्त्र संक्षेप है। उपन्यास मानस खोलता है। ज्ञान गोत्र और पद से नहीं बँधता। रैक्व शकट के नीचे है, राजा जनश्रुति दान से बड़ा नहीं। पक्षी राजा को छोटा ठहराते हैं — दान का अहं ज्ञान नहीं। जाबाला कन्या-दान की वस्तु भी बन सकती है, कर्ता भी। अरुंधति गृहस्थ-स्मृति खोलती है। तप एकांत में सरल है, समाज में कठिन है। द्विवेदी समाज को तप की तराजू कहते हैं। अकेला सत्य सरल है; लोभ के सामने सत्य कठिन है। जिजीविषा जीने की इच्छा ज्ञान से कटती नहीं। आलोचना आख्यान को जिजीविषा की कथा कहती है। नामवर द्विवेदी को दूसरी परंपरा कहते हैं — लोक, भक्ति, संस्कृति शुक्ल-पंक्ति का पूरक। राष्ट्रीय आंदोलन कथा का केंद्र नहीं; संस्कृति का सत्य केंद्र है।
तुलना से महत्त्व बैठता है। गोदान ऋण का समाज है। रंगभूमि कारखाने का समाज है — जाति सार्वजनिक टकराव। त्यागपत्र मर्यादा का समाज है — पवित्रता शरीर पर नापी जाती है। महाभोज चुनाव का समाज है — जाति वोट-बैंक। यहाँ ज्ञान मनुष्य पर नापा जाता है। दलित गवाही पूरा उपन्यास नहीं; प्रश्न वर्ण-अभिमान का है। बाणभट्ट की आत्मकथा हर्ष-काल का मानस है। यह उपनिषद्-काल का मानस है।
नारी-प्रश्न आलंबन का है। जाबाला संसार, सौंदर्य और कर्तव्य का दबाव है। राजा उसे भेंट की तरह भी ले जाता है; उपन्यास वस्तु नहीं रहने देता। प्रेम ब्रह्म-ज्ञान का पहला सोपान कहा जाता है, अंतिम नहीं। मृणाल इंकार की नायिका है। सोफिया धर्म-संकर प्रेम है। रुक्मा तंत्र की साक्षी है। जाबाला ज्ञान और नेह के बीच है। बिना समाज की परीक्षा के चरित्र अधूरा है। भाषा खड़ी बोली, संस्कृत-गर्भ — संस्कृति का घन, आंचल-शब्द नहीं। व्यंग्य अहं और दान पर है, कार्यालय-व्यंग्य नहीं। शिल्प पोथा है; सांस्कृतिक महत्त्व ढाँचे से भी आता है — कथा छपे नारे की नहीं, संकलित स्मृति की है। हजारीप्रसाद द्विवेदी 1907–1979, बलिया; शांतिनिकेतन, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय। निबंध अशोक के फूल; आलोचना कबीर। उपन्यास उसी गवेषणा को कथा बनाता है।
सीमा यह कि व्यवस्था नहीं टूटती, दृष्टि बदलती है। आकार उलझ सकता है। दुरुहता और संस्कृत-भार पाठक काट सकते हैं। प्रेम-सूत्र को केवल रमानी पढ़ लेना महत्त्व को घटाता है। गुण यह कि शास्त्र मनुष्य-हित से पढ़ा जाता है, केवल मंत्र से नहीं। सांस्कृतिक उपन्यास पूरा इतिहास नहीं; मानस है। तिथि नहीं माँगी जाती। बिना स्रोत लिखे महत्त्व अधूरा है। बिना जोड़ के स्रोत नकल है। गोपाल राय इतिहास में द्विवेदी को संस्कृति-कथा पर रखते हैं। 1976 का अंतिम उपन्यास पंक्ति को बंद करता है, पहला उपन्यास नहीं।
निष्कर्ष यह है कि सांस्कृतिक महत्त्व ज्ञान, नारी और तप-समाज पर है; चित्र उपनिषद् को मनुष्य तक उतारता है, टीका या राज-युद्ध नहीं।
51. अनामदास का पोथा का मूल्यांकन कीजिए।20 अंक
अनामदास का पोथा का मूल्यांकन तीन स्तरों पर है। साहित्यिक — सांस्कृतिक उपन्यास, पोथा-ढाँचा, संस्कृत-गर्भ खड़ी बोली, विचार-संवाद। ऐतिहासिक — 1976, द्विवेदी का अंतिम उपन्यास, राजकमल। नैतिक — ज्ञान, जिजीविषा, नेह, इंकार। नायक रैक्व आधुनिक हिन्दी का दुर्लभ साधक-पुरुष है। वाचक अनामदास संकलक है। आख्यान अथ रैक्व-आख्यान है। हजारीप्रसाद द्विवेदी जन्म 19 अगस्त 1907 दुबे का छपरा, ओझवलिया, बलिया; बचपन वैद्यनाथ; निधन 19 मई 1979 दिल्ली। शांतिनिकेतन में हिन्दी-अध्यापन; 1950 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय विभागाध्यक्ष; पद्म भूषण 1957; साहित्य अकादमी 1973 आलोक पर्व पर। नामवर उन्हें दूसरी परंपरा कहते हैं। दृष्टि मानव और संस्कृति का समन्वय है। घटना पतली हो सकती है, प्रश्न चौड़ा है।
गुण तीन हैं। पहला — उपनिषद् का मनुष्य-रूप; छान्दोग्य संक्षेप है, उपन्यास मानस है। दूसरा — वाचक का पांडुलिपि-ढाँचा। तीसरा — नारी को केवल भेंट न रहने देना; जाबाला कर्ता है। बाणभट्ट की आत्मकथा 1946 आत्मकथा-मैं और हर्ष-मानस है। चारु चंद्रलेख 1963 अलग आख्यान है। पुनर्नवा 1973 बुद्ध-स्पर्श है। यह उपनिषद्-मानस है। तीनों एक लेखक हैं, प्रश्न अलग हैं। वर्मा घटना-इतिहास लिखते हैं। रंगभूमि समाज का टकराव है। त्यागपत्र मन का द्वंद्व है। महाभोज तंत्र है। यह संस्कृति का आख्यान है। लुबॉक दृष्टि कहते हैं; दो आँखें संकलक और साधक हैं। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण ज्ञान की चाह है। गोपाल राय इतिहास में द्विवेदी को संस्कृति-कथा पर रखते हैं।
सीमाएँ साफ हैं। आकार और उलझाव। दुरुहता। संस्कृत-भार। प्रेम-सूत्र को रमानी पढ़ लेना। सत्यकाम-माता से नाम-भ्रम — वहाँ जाबाला माता हैं, यहाँ राजकन्या। महावीर प्रसाद द्विवेदी से नाम-भ्रम — वे भाषा-शुद्धि के आचार्य हैं। व्यवस्था नहीं टूटती, दृष्टि बदलती है। शैली अध्यापकीय कही जाती है; उपदेश का ढेर दोष हो तो उत्तर में लिखा जाता है। गुण पारदर्शिता का नया वाक्य-क्रम नहीं, संस्कृति का घन है। राष्ट्रीय आंदोलन केंद्र नहीं — कुछ इसे समाज-कटान कह सकते हैं; बचाव यह है कि संस्कृति का सत्य केंद्र है। बिना जाबाला के मूल्यांकन अधूरा है। बिना जनश्रुति के सार्वजनिक अर्थ पतला है।
पहचान निषेध से पूरी होती है। बाणभट्ट अलग उपन्यास है। चारु चंद्रलेख और पुनर्नवा अलग हैं। सत्यकाम-प्रसंग गोत्र का है, यहाँ केंद्र नहीं। झाँसी की रानी वर्मा की है। शेखर उत्तम पुरुष है, यह पोथा है। पाजेब कहानी है। आपका बंटी परिवार है। मूल्यांकन इन्हीं अंतरों के बिना अधूरा है। पूरी कथा पढ़नी है; सार रैक्व, जाबाला, जनश्रुति, 1976, पोथा याद रखने के लिए है, ग्रंथ की जगह नहीं। सीमाओं के बावजूद निर्धारित कृति टिकती है। जिजीविषा ज्ञान का विरोध नहीं, उसका अंग है।
निष्कर्ष यह है कि अनामदास का पोथा 1976 का सांस्कृतिक शिखर-नाम है; सीमाएँ दुरुहता और उलझाव की हैं, पर रैक्व, जाबाला और पोथा इन्हीं से पहचाने जाते हैं।
52. अनामदास का पोथा में उपनिषद् और उपन्यास का संबंध लिखिए।20 अंक
अनामदास का पोथा का स्रोत छान्दोग्य उपनिषद् का रैक्व-जनश्रुति प्रसंग है। शास्त्र में राजा दान के लिए विख्यात है। पक्षियों की वार्ता से वह शकट के नीचे बैठे साधक की महिमा सुनता है। ज्ञान माँगने जाता है। ठुकराया जाता है। भेंट और कन्या लेकर लौटता है। ज्ञान पाता है। संक्षेप इतना है। द्विवेदी कहते हैं प्रसंग अधूरा लगता है। मनुष्य का नेह, बचपन, तूफान और समाज-परीक्षा नहीं खुलते। उपन्यास उसी अधूरेपन को कथा बनाता है। यह टीका नहीं। सूत्र शास्त्र का है; विस्तार मनुष्य का है। ऐतिहासिक तिथि नहीं माँगी जाती; मानस माँगा जाता है। रूप सांस्कृतिक उपन्यास है, उपनिषद् का भाष्य-ग्रंथ नहीं। वाचक अनामदास संकलक है; आख्यान रैक्व का है। दोनों एक नहीं। पोथा पांडुलिपि-ढाँचा शास्त्र को छपे नारे से बचाता है।
जोड़ चार स्तरों पर है। पहला — रैक्व का बचपन: माता जन्म पर नहीं, पिता वेद का अंश देकर चल बसते हैं। दूसरा — तूफान: वायु ज्ञान का प्रश्न बनती है, बिखरी बैलगाड़ी मिलती है। तीसरा — जाबाला-मिलन: घायल राजकन्या संसार है; प्रेम ज्ञान का पहला सोपान कहा जाता है, अंतिम नहीं। चौथा — समाज-परीक्षा: जनश्रुति का अहं, दान, भेंट; रैक्व का पहला इंकार ज्ञान को मोल नहीं बनने देता। अरुंधति गृहस्थ-रेखा खोलती हैं। जिजीविषा जीने की इच्छा ज्ञान से कटती नहीं। सत्यकाम जाबाल का प्रसंग गोत्र और सत्य का है; माता जाबाला दासी/अज्ञात गोत्र, सत्य कहने वाली। वह यह उपन्यास की नायिका नहीं। नाम का साम्य भ्रम पैदा करता है। केंद्र अलग है। मिलाए बिना संबंध गलत हो जाता है।
बाणभट्ट की आत्मकथा हर्ष-काल को आत्मकथा बनाती है। पुनर्नवा बुद्ध-काल छूती है। यह उपनिषद्-काल को आख्यान बनाती है। दोनों संस्कृति पढ़ते हैं, स्रोत अलग हैं। वर्मा तिथि और युद्ध चाहते हैं; द्विवेदी मानस चाहते हैं। रंगभूमि समाज का टकराव है, शास्त्र-स्रोत नहीं। त्यागपत्र मन का द्वंद्व है। महाभोज चुनाव है। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण ज्ञान की चाह है, संयोग नहीं। लुबॉक दृष्टि कहते हैं; दृष्टि संकलक और साधक दो आँखें हैं। नामवर दूसरी परंपरा यहीं से पढ़ते हैं — शास्त्र को मनुष्य-हित से। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; द्विवेदी उसी गद्य में प्राचीन मानस उतारते हैं। भाषा खड़ी बोली, संस्कृत-गर्भ — संबंध भाषा में भी दिखता है, केवल कथा-सूचना में नहीं।
सीमा यह कि पाठक उपन्यास को केवल व्याख्या पढ़ ले। गुण यह कि शास्त्र मनुष्य तक उतरता है। बिना स्रोत लिखे प्रसंग अधूरा है। बिना जोड़ के स्रोत नकल है। व्यवस्था नहीं टूटती, दृष्टि बदलती है। ज्ञान गोत्र और पद से नहीं बँधता — यही शास्त्र और उपन्यास का साझा प्रश्न है। उपन्यास उसे नेह और समाज से तौलता है। महावीर प्रसाद द्विवेदी इस संबंध के लेखक नहीं। पूरी कथा पढ़नी है; सार सूत्र और विस्तार याद रखने के लिए है, ग्रंथ की जगह नहीं। लंबे उद्धरण नहीं; प्रसंग-भाव पर्याप्त है।
निष्कर्ष यह है कि उपनिषद् संक्षेप देता है और उपन्यास मनुष्य-आख्यान देता है; संबंध नकल का नहीं, मानस का है, सत्यकाम-माता का पर्याय नहीं।
53. मन्नू भंडारी का परिचय लिखिए।8 अंक
मन्नू भंडारी का जन्म 3 अप्रैल 1931, भानपुरा, मंदसौर, मध्य प्रदेश। बचपन का नाम महेंद्र कुमारी। पिता सुख संपत राय भंडारी, कोशकार। शिक्षा अजमेर और कलकत्ता; हिन्दी में एम.ए.। दिल्ली के मिरांडा हाउस में अध्यापन। पति राजेंद्र यादव। निधन 15 नवंबर 2021, गुरुग्राम। नयी कहानी की प्रमुख लेखिका। कहानी मैं हार गई 1957; संग्रह यही सच है, त्रिशंकु। अकेली कहानी है, यह पत्र नहीं। उपन्यास एक इंच मुस्कान 1962 सह-लेखन; आपका बंटी 1971 विवाह-विच्छेद और बच्चे का प्रश्न; महाभोज 1979 निर्धारित राजनीतिक उपन्यास। आत्मकथा एक कहानी यह भी 2007; व्यास सम्मान इसी पर। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने महाभोज पर सम्मान दिया। सारा आकाश यादव की कृति है, यह नहीं।
दृष्टि मध्यवर्ग की स्त्री से आगे सत्ता और जाति तक जाती है। भाषा सरल खड़ी बोली। सीमा दा साहब के आकर्षण का आक्षेप है। गुण यह कि तंत्र की घटना कथा बनती है। नाटक-रूपांतर अलग विधा है; निर्धारित रूप उपन्यास है। गोपाल राय इतिहास में स्त्री-राजनीति के सोपान पर मन्नू को रखते हैं।
निष्कर्ष यह है कि मन्नू 1931–2021 की राजनीतिक-यथार्थ लेखिका हैं; निर्धारित कृति महाभोज 1979 है, आपका बंटी अलग नाम है।
54. महाभोज का नामकरण स्पष्ट कीजिए।8 अंक
महाभोज मन्नू भंडारी का राजनीतिक उपन्यास है। प्रकाशन 1979, राधाकृष्ण। नाम व्यंग्य है। भोज उत्सव है; यहाँ उत्सव बिसेसर उर्फ़ बिसू की लाश पर सत्ता का है। वोट, प्रेस और जाँच उसी मेज के आसन हैं। देशकाल सरोहा है — पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कस्बा, विधानसभा का उपचुनाव। रूप राजनीतिक-यथार्थ उपन्यास है। वाचक सर्वज्ञ-घटना है, स्मृति-मैं नहीं। बेलछी 1977 का दलित-हत्याकांड प्रेरणा कहा जाता है; उपन्यास रिपोर्ट नहीं, सरोहा की कथा है। बिना लाश के भोज अधूरा रहता है। बिना चुनाव के व्यंग्य कार्यालय-हँसी रह जाता है।
रंगभूमि का नाम कर्म-नीति है। त्यागपत्र पद-त्याग है। अनामदास का पोथा पांडुलिपि है। राग दरबारी विकास-गाँव का व्यंग्य है, केंद्र लाश नहीं। तमस साम्प्रदायिकता है। आपका बंटी 1971 परिवार है, शीर्षक का पर्याय नहीं। अकेली कहानी है। नाटक-रूपांतर अमल अल्लाना, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, लगभग 1982 — अलग विधा है। बच्चन सिंह उपन्यास को अपराध और राजनीति के गठजोड़ पर रखते हैं। आलोचना उसे अपराध का राजनीतिकरण कहती है। नाम वही गठजोड़ है।
निष्कर्ष यह है कि नामकरण व्यंग्य से है — सत्ता का भोज मृतक की पूँजी पर है; कृति 1979 की है, आपका बंटी नहीं।
55. महाभोज की कथावस्तु लिखिए।20 अंक
महाभोज मन्नू भंडारी का निर्धारित राजनीतिक उपन्यास है। प्रकाशन 1979, राधाकृष्ण। देशकाल सरोहा है — पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कस्बा, विधानसभा का उपचुनाव। केंद्र बिसेसर उर्फ़ बिसू की हत्या और उस लाश का सत्ता-उपयोग है। आपका बंटी 1971 अलग कृति है। अकेली कहानी है। निर्धारित रूप उपन्यास है। बेलछी 1977 का दलित-हत्याकांड प्रेरणा कहा जाता है; उपन्यास रिपोर्ट नहीं। कथावस्तु पहले हरिजन बस्ती की आगजनी और हत्या से पृष्ठ रखती है। बिसू शिक्षित दलित है, पिता हीरा। सबूत रखता है। दिल्ली जाकर न्याय माँगना चाहता है। जोरावर के हित में षड्यंत्र होता है। विष से मृत्यु कही जाती है। कथा उसकी मृत्यु से खुलती है; उपस्थिति पूरी कथा में है।
लाश पहचान में आती है। परिजन अंत्येष्टि रोकते हैं जब तक कारण न खुले। आगे लाश राजनीतिक पूँजी बनती है। सुकुल बाबू प्रतिपक्ष हैं, पूर्व मुख्यमंत्री; संवेदना दिखाते हैं, सभा चुनावी हो जाती है। दा साहब मुख्यमंत्री हैं, गृह का प्रभार भी; शांत रहते हैं, तंत्र चलाते हैं। लखनसिंह सत्ता का प्रत्याशी है। सदाशिव अत्रे पार्टी के अध्यक्ष हैं। बिंदेश्वरी उर्फ़ बिंदा बिसू का साथी है; प्रतिरोध रखता है। पुलिस उसे मारती है, झूठा हत्या-आरोप देकर बंद करती है। रुक्मा उसकी पत्नी हैं; पहले डर है, फिर भ्रम टूटता है, सबूत साथ ले जाती हैं। सक्सेना पुलिस अधीक्षक सत्य की रपट चाहते हैं; निलंबित होते हैं। डीआईजी सिंहा रपट बदलते हैं, पद पाते हैं। दत्ता बाबू मशाल समाचार पत्र के संपादक हैं; कागज-कोटा और अनुकूल खबर पास बैठते हैं। नरोत्तम खबर लाता है; संपादन सत्ता देखता है।
फॉर्स्टर कारण कहते हैं। कारण सत्ता-रक्षा है, संयोग नहीं। जाति वोट-बैंक है, न्याय नहीं। दोनों दल लाश से शक्ति चाहते हैं, हक नहीं। बच्चन सिंह उपन्यास को अपराध और राजनीति के गठजोड़ पर रखते हैं। आलोचना उसे अपराध का राजनीतिकरण कहती है। वाचक सर्वज्ञ-घटना है, स्मृति-मैं नहीं। शिल्प आरंभ लाश से है; आगे सभा, थाना, मंत्रालय, प्रेस। रंगभूमि में क्लार्क गोली चलाता है; यहाँ पुलिस गोली से अधिक कागज चलाती है। गोदान महाजनी तंत्र है; यह चुनावी तंत्र है। त्यागपत्र मर्यादा है। अनामदास का पोथा संस्कृति है। राग दरबारी कार्यालय-व्यंग्य है। यह लाश और चुनाव का गठजोड़ है।
सीमा यह कि कुछ पात्र सपाट रह सकते हैं; दा साहब का आकर्षण पीड़ा को ढक सकता है। ईमानदार अफसर आशा का स्पर्श दे सकता है, व्यवस्था नहीं टूटती। गुण यह कि कथानक घटना से बँधा है, रहस्य-कौतुक से नहीं। बिना बिसू के भोज अधूरा है। बिना जोरावर के हिंसा अधूरी है। बिना दा साहब के संरक्षण अधूरा है। बिना बिंदा के प्रतिरोध केवल शहीद-नाम रह जाता है। नाम व्यंग्य है — उत्सव लाश पर सत्ता का। वोट, प्रेस और जाँच उसी मेज के आसन हैं। जूठन अनुभव-गवाही है; यह कथा तंत्र की है। दलित उपन्यास का पूरा रूप यह नहीं; प्रश्न सत्ता का है।
निष्कर्ष यह है कि कथावस्तु बिसू की हत्या, लाश का चुनाव-उपयोग और बिंदा-सक्सेना का प्रतिरोध है; देशकाल सरोहा है, आपका बंटी या नाटक-मात्र नहीं।
56. बिसू का चरित्र-चित्रण कीजिए।20 अंक
बिसेसर उर्फ़ बिसू महाभोज का नैतिक केंद्र है। गोल चरित्र है, यद्यपि मृत्यु कथा के आरंभ में है। शिक्षित दलित है। पिता हीरा। वह मजदूरी और हक दोनों पूछता है। दूसरे गाँव की हत्या और बस्ती की आगजनी पर सबूत रखता है। न्याय दिल्ली से माँगता है। चुप न रहना उसका कर्म है। जोरावर के हित में षड्यंत्र होता है। विष से मृत्यु कही जाती है। लाश पहचान में आती है। परिजन अंत्येष्टि रोकते हैं। उपस्थिति पूरी कथा में है — लाश उसके बाद भी बोलती है। बिना उसके सत्ता का उत्सव खाली रह जाता है। आलोचना उसे जागरूक दलित कहती है। सीमा यह कि विकास घटना में कम है, मृत्यु जल्दी है। गुण यह कि साधारण पुरुष सत्ता का प्रश्न बनता है। नायक देवता नहीं; हक माँगने वाला शिक्षित युवा है।
तुलना से चरित्र स्थिर होता है। सूरदास सार्वजनिक इंकार है — ज़मीन, अहिंसा, गोली; भक्त-कवि यह नहीं। मृणाल नैतिक इंकार है — सत्य, दावा न पकड़ना। रैक्व ज्ञान का इंकार है — राजा का मोल न लेना। प्रमोद देर का प्रायश्चित्त है। होरी ऋण का किसान है। बिसू हक का इंकार है — चुप न रहना। अनामदास वाचक है, यह पुरुष नहीं। दा साहब विलोम हैं — सादगी का मुखौटा, संरक्षण का कर्म। जॉन सेवक लोभ का पूँजीपति है; यह चुनावी तंत्र का शिकार है। बिना बिंदा के प्रतिरोध अधूरा है। बिंदेश्वरी साथी है, नगर-शिक्षा और हठ रखता है; बिसू की इच्छा पूरी करना चाहता है; झूठा आरोप पाता है। रुक्मा सबूत आगे ले जाती हैं। हीरा पिता का नाम है, कथा का गौण शोक। तीनों बिना बिसू के सूची रह जाते हैं; बिसू उन्हें अर्थ देता है।
जाति वोट-बैंक है, न्याय नहीं। बिसू हक माँगता है। सुकुल और दा साहब दोनों दलित-दुख से शक्ति चाहते हैं, हक नहीं। बच्चन सिंह गठजोड़ देखते हैं। आलोचना अपराध के राजनीतिकरण की बात करती है। बेलछी प्रेरणा है, अध्याय नहीं; चरित्र रिपोर्ट का नाम नहीं। जूठन अनुभव-गवाही है; यह कथा तंत्र की है। प्रश्न सत्ता का है। फिर भी चरित्र दलित हक को वोट से अलग करता है। शिक्षा उसे नौकर नहीं, साक्षी बनाती है। दिल्ली की आशा पतली रह सकती है; माँग वहीं तक जाती है। लाश चुप नहीं रहती — यही चरित्र की दूसरी आयु है। शहीद-नाम पर्याप्त नहीं; सबूत और इच्छा बचते हैं।
शिल्प घटना-ढाँचा है। वाचक सर्वज्ञ है। बिसू मन की लंबी परत नहीं पाता, त्यागपत्र की मृणाल जैसी; उपस्थिति घटनाओं में है। लुबॉक दृष्टि कहते हैं; दृष्टि कई कमरे हैं — बस्ती, थाना, सभा। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण सबूत और चुनाव है। सीमा सपाट शहीद बन जाने की है। गुण यह कि मृत्यु कथा बंद नहीं करती। बिना जोरावर के हिंसा का कारण पतला है। बिना दा साहब के सार्वजनिक अर्थ पतला है।
निष्कर्ष यह है कि बिसू हक और सबूत का दलित-पुरुष है; पहचान शिक्षा, हत्या और लाश के सत्ता-उपयोग से है, दा साहब या सूरदास का पर्याय नहीं।
57. दा साहब का चरित्र लिखिए।8 अंक
दा साहब महाभोज के मुख्यमंत्री हैं। गृह का प्रभार भी उन्हीं के पास है। सादगी का मुखौटा है — गीता, दरी, शांत वाणी। कर्म जोरावर को बचाना है। जोरावर स्थानीय बाहुबली है, बस्ती की आगजनी और बिसू की मृत्यु से जुड़ा हित। दा साहब स्वयं हाथ नहीं लगाते; इशारा काफी है। लखनसिंह विश्वासपात्र प्रत्याशी है। सदाशिव अत्रे पार्टी के अध्यक्ष हैं। सुकुल बाबू प्रतिपक्ष हैं; दुख बाँटने आते हैं, सभा चुनाव बन जाती है। दोनों दल लाश से शक्ति चाहते हैं। जॉन सेवक लोभ का पूँजीपति है। यह पद का प्रबंधक है। खलनायक-दैत्य नहीं; तंत्र का चेहरा है।
सीमा यह कि आकर्षण पीड़ा को ढक सकता है। गुण यह कि तंत्र का चेहरा दिखता है, उपदेश का दैत्य नहीं। सूरदास के सामने क्लार्क गोली चलाता है; यहाँ इशारा और फाइल चलती है। बिना जोरावर के हिंसा अधूरी है। बिना दा साहब के संरक्षण अधूरा है। आपका बंटी इस चरित्र की कृति नहीं।
निष्कर्ष यह है कि दा साहब सादगी के मुखौटे वाला मुख्यमंत्री है; कर्म संरक्षण और चुनाव-प्रबंध है, खुली गोली नहीं।
58. महाभोज के शिल्प-विधान का विवेचन कीजिए।20 अंक
महाभोज का शिल्प घटना-ढाँचा है। आरंभ लाश है। आगे सभा, थाना, मंत्रालय, प्रेस। वाचक सर्वज्ञ है। लुबॉक दृष्टि को केंद्र कहते हैं। यहाँ दृष्टि कई कमरे हैं — बस्ती, थाना, सचिवालय, अखबार। त्यागपत्र स्मृति-मैं है। शेखर चेतना की परत है। अनामदास का पोथा पांडुलिपि है। रंगभूमि सर्वज्ञ टिप्पणी और दो सूत्र है। यह घटना है, नैतिक गीत नहीं। कथावस्तु कारण से बँधी है — सबूत, चुनाव, संरक्षण। फॉर्स्टर क्रम और कारण कहते हैं। कारण सत्ता-रक्षा है, संयोग नहीं। नाम व्यंग्य है; भोज उत्सव है, उत्सव लाश पर सत्ता का। वोट, प्रेस और जाँच मेज के आसन हैं। नाटक बाद का रूपांतर है — अमल अल्लाना, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, लगभग 1982। पत्र की निर्धारित विधा उपन्यास है। संवाद-दृश्य अधिक हैं, फिर भी गद्य-कथा है। चेतना-प्रवाह पूरा धारा नहीं।
चरित्र बिसू, बिंदा, दा साहब गोल के निकट हैं। जोरावर, दत्ता, सिंहा सहायक-सपाट रह सकते हैं। रुक्मा और सक्सेना प्रतिरोध की दूसरी पंक्ति हैं। उद्देश्य चित्रण और राजनीतिक प्रश्न है। भाषा सरल खड़ी बोली। आंचल-शब्द रेणु जैसे ढेर नहीं। संस्कृत-गर्भ द्विवेदी जैसा नहीं। जैनेन्द्र का तर्क-संवाद नहीं; यहाँ सभा और दफ्तर का संवाद है। व्यंग्य राग दरबारी के निकट प्रशासन पर भी है, पर केंद्र लाश है। आलोचना शिल्पहीनता कहती है — अर्थ यह कि वर्णन सीधा है, प्रयोग का बोझ नहीं। गुण यही सीधापन है; पाठक तंत्र तक पहुँचता है। सीमा दुरुहता की नहीं, घटना की तेज़ी की है। कुछ पात्र सपाट रह जाते हैं। पात्र-भीड़ रंगभूमि जैसी है, मन त्यागपत्र जैसा नहीं।
देशकाल सरोहा, उपचुनाव, पश्चिमी उत्तर प्रदेश। गोदान का गाँव ऋण का है। पांडेपुर कारखाने का है। मेरीगंज आंचल का है। वन-आश्रम ज्ञान का है। सरोहा चुनाव और लाश का है। बेलछी प्रेरणा है, शिल्प का अध्याय नहीं। आपका बंटी परिवार-शिल्प है। एक इंच मुस्कान सह-लेखन है। अकेली कहानी है। सारा आकाश यादव का शिल्प है। तत्त्व बिना शिल्प के ढेर हैं; शिल्प बिना बिसू के प्रयोग है। रस व्यंग्य और करुण-रोष है। रूप राजनीतिक-यथार्थ उपन्यास है। बच्चन सिंह गठजोड़ देखते हैं — अपराध का राजनीतिकरण शिल्प का विषय है, नारा नहीं। क्लार्क गोली चलाता है; यहाँ इशारा और फाइल चलती है। संरचना यहीं हिंसा को कागज से बाँधती है।
सीमा दा साहब के आकर्षण की है — पीड़ा ढक सकती है। नाटक से विधा-भ्रम दूसरी सीमा है। गुण यह कि हिन्दी उपन्यास को चुनाव-तंत्र मिला। मन्नू 1931–2021, भानपुरा; नयी कहानी से सत्ता तक आईं। गोपाल राय उन्हें स्त्री-राजनीति के सोपान पर रखते हैं। निर्धारित कृति इन्हीं संवादों से पहचानी जाती है, नाटक की गिनती से नहीं। लंबे उद्धरण नहीं; प्रसंग और भाव याद रहें। बिना लाश के शिल्प अधूरा है। बिना कई कमरों के तंत्र नहीं दिखता। पूरी कथा पढ़नी है; सार विन्यास याद रखने के लिए है।
निष्कर्ष यह है कि शिल्प सर्वज्ञ वाचक, लाश-घटना और व्यंग्य-संवाद है; विन्यास तंत्र को बाँधता है, केवल स्त्री-कथा या नाटक-रूपांतर नहीं।
59. महाभोज राजनीतिक उपन्यास क्यों है?8 अंक
राजनीतिक उपन्यास तंत्र, चुनाव और राज्य-शक्ति को कथा का दबाव बनाता है। महाभोज 1979 में विधानसभा का उपचुनाव है। देशकाल सरोहा है। मुख्यमंत्री दा साहब, प्रतिपक्ष सुकुल बाबू, बाहुबली जोरावर, पुलिस सक्सेना-सिंहा, प्रेस दत्ता बाबू एक चक्र हैं। बिसेसर उर्फ़ बिसू की लाश वोट बनती है। जाति वोट-बैंक है, न्याय नहीं। कारण सत्ता-रक्षा है, संयोग नहीं। बच्चन सिंह अपराध और राजनीति के गठजोड़ को केंद्र कहते हैं। आलोचना उसे अपराध का राजनीतिकरण कहती है। नाम व्यंग्य है — भोज उत्सव है, उत्सव लाश पर है। वाचक सर्वज्ञ घटना है। रूप राजनीतिक-यथार्थ है। बेलछी प्रेरणा है, अध्याय नहीं।
रंगभूमि उद्योग और औपनिवेशिक राज्य है; आंदोलन एक अंग है, पूरा राजनीतिक उपन्यास नहीं। राग दरबारी विकास-कार्यालय का व्यंग्य है। तमस साम्प्रदायिक दंगा है। त्यागपत्र मर्यादा का मन है। अनामदास का पोथा संस्कृति का आख्यान है। आपका बंटी 1971 परिवार है। आंचल रेणु का है, यह चुनाव-कस्बा है। केवल स्त्री-कथा नहीं; रुक्मा साक्षी है, केंद्र लाश है। नाटक-रूपांतर विधा बदलता है, प्रश्न नहीं। बिना चुनाव के राजनीतिक विशेषण सूख जाता है। बिना लाश के तंत्र सामान्य व्यंग्य रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि महाभोज राजनीतिक इसलिए है कि कथा का कारण चुनाव-तंत्र है, निजी द्वंद्व या परिवार-कथा नहीं।
60. बिंदा की भूमिका लिखिए।8 अंक
बिंदेश्वरी उर्फ़ बिंदा महाभोज में बिसू का साथी है। नगर-शिक्षा रखता है। हठ है। बिसेसर शिक्षित दलित है, बस्ती की आगजनी के सबूत दिल्ली ले जाना चाहता था। बिंदा उसकी इच्छा पूरी करना चाहता है। लाश के बाद प्रतिरोध का दूसरा सिरा वही है। सभा में विरोध करता है। पुलिस उसे मारती है। झूठा हत्या-आरोप देकर बंद करती है। वह खलनायक नहीं। अपराध पुरस्कृत होता है, सत्य दंडित — यही उसकी भूमिका का व्यंग्य है। रुक्मा पत्नी हैं; पहले डर है, फिर भ्रम टूटता है, सबूत साथ ले जाती हैं। बिना बिंदा के बिसू केवल शहीद-नाम रह जाता है। हीरा पिता का शोक है, प्रतिरोध नहीं।
विनय सिंह आवेश में प्राण देते हैं; यह बंद होकर भी दावा रखता है। भूमिका मृत्यु के बाद लड़ाई को जीवित रखना है। सीमा यह कि कुछ पाठ उसे सपाट साथी पढ़ ले। गुण यह कि प्रतिरोध लाश के बाद भी कथा चलाता है। दा साहब विलोम हैं — संरक्षण। आपका बंटी इस भूमिका की कृति नहीं।
निष्कर्ष यह है कि बिंदा प्रतिरोध का दूसरा सिरा है; भूमिका बिसू की लड़ाई को आगे बढ़ाना है, खलनायक होना नहीं।
61. महाभोज और आपका बंटी में अंतर लिखिए।8 अंक
आपका बंटी 1971 मन्नू भंडारी का उपन्यास है। केंद्र बच्चा बंटी है। विषय विवाह-विच्छेद और माता-पिता का दावा है। नारी-केंद्र माता शकुंत की महत्त्वाकांक्षा और बच्चे का प्रश्न है। रूप परिवार-मनोविज्ञान है। पत्र की निर्धारित कृति यह नहीं। महाभोज 1979 है। केंद्र बिसेसर उर्फ़ बिसू की लाश है। देशकाल सरोहा, उपचुनाव। रूप राजनीतिक-यथार्थ उपन्यास है। नारी-पात्र रुक्मा तंत्र की साक्षी है, परिवार-केंद्र नहीं। साम्य मन्नू, खड़ी बोली और यथार्थ है। वैषम्य वर्ष, आलंबन और देशकाल पर है। एक इंच मुस्कान 1962 सह-लेखन राजेंद्र यादव के साथ अलग है। अकेली कहानी है, उपन्यास नहीं। सारा आकाश यादव का है। नाटक-रूपांतर महाभोज का लगभग 1982 का अलग रूप है; निर्धारित विधा उपन्यास है।
दृष्टि बंटी में मध्यवर्ग की स्त्री और बच्चे तक है; महाभोज में सत्ता, जाति और फाइल तक जाती है। गोपाल राय दोनों को मन्नू की पंक्ति में रखते हैं, पर्याय नहीं। राग दरबारी कार्यालय-व्यंग्य है, बंटी नहीं। रंगभूमि कारखाना है। बिना वर्ष के अंतर नाम-भ्रम रह जाता है। बिना बच्चे और लाश लिखे शीर्षक एक हो जाते हैं।
निष्कर्ष यह है कि आपका बंटी बच्चे और विच्छेद का है, महाभोज लाश और तंत्र की निर्धारित कृति है; मिलाया नहीं जाता।
62. महाभोज का सामाजिक-राजनीतिक महत्त्व लिखिए।20 अंक
महाभोज का सामाजिक महत्त्व जाति और हक पर है। बिसू शिक्षित दलित है, हक माँगता है, सबूत रखता है। बस्ती जल चुकी है। समाज दलित को वोट-बैंक देखता है, न्याय नहीं। रुक्मा स्त्री को तंत्र के सामने खड़ा करती है; पहले डर है, फिर सबूत। जमुना बहन दा साहब की पत्नी हैं — सादगी का स्वर, केंद्र नहीं। नारी-केंद्र आपका बंटी जितना नहीं; गुण यह कि स्त्री केवल करुण दृश्य नहीं। दलित उपन्यास का पूरा रूप यह नहीं; प्रश्न सत्ता का है, अनुभव-गवाही जूठन जैसी नहीं। फिर भी सामाजिक चित्र जाति को चुनाव से बाँधता है। बेलछी प्रेरणा है, अध्याय नहीं। सरोहा पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कस्बा है। गोदान ऋण का समाज है। रंगभूमि कारखाने का समाज है। त्यागपत्र मर्यादा का समाज है। यह चुनाव का समाज है।
राजनीतिक महत्त्व चुनाव, संरक्षण और फाइल पर है। दा साहब मुख्यमंत्री हैं, गृह का प्रभार भी; गीता और शांत वाणी मुखौटा हैं, कर्म जोरावर को बचाना है। स्वयं हाथ नहीं लगाते; इशारा काफी है। लखनसिंह प्रत्याशी है। सदाशिव अत्रे अध्यक्ष हैं। सुकुल बाबू प्रतिपक्ष हैं; दुख बाँटने आते हैं, सभा चुनाव बन जाती है। जोरावर बाहुबली है, आग और मृत्यु से जुड़ा हित। सक्सेना सत्य की रपट चाहते हैं, हटते हैं। डीआईजी सिंहा रपट बदलते हैं, पद पाते हैं। दत्ता बाबू मशाल में कागज-कोटा और अनुकूल खबर चलाते हैं। नरोत्तम खबर लाता है; संपादन सत्ता देखता है। बच्चन सिंह गठजोड़ देखते हैं। आलोचना अपराध का राजनीतिकरण कहती है। दोनों दल लाश से शक्ति चाहते हैं। बिना जोरावर के हिंसा अधूरी है। बिना दा साहब के संरक्षण अधूरा है। बिना प्रेस के भोज अधूरा है।
रंगभूमि में क्लार्क गोली चलाता है; राज्य खुला है। यहाँ पुलिस गोली से अधिक कागज चलाती है। राग दरबारी विकास-कार्यालय का व्यंग्य है। तमस साम्प्रदायिक दंगा है। यह लाश और उपचुनाव है। नाम व्यंग्य है — उत्सव मृतक की पूँजी पर। वोट, प्रेस और जाँच मेज के आसन हैं। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण सत्ता-रक्षा है। लुबॉक दृष्टि कहते हैं; दृष्टि कई कमरे हैं। गोपाल राय मन्नू को स्त्री-राजनीति के सोपान पर रखते हैं। मन्नू 1931–2021, भानपुरा; नयी कहानी से तंत्र तक आईं। भाषा सरल खड़ी बोली सामाजिक-राजनीतिक चित्र को पाठक तक पहुँचाती है। नाटक-रूपांतर अलग विधा है; महत्त्व उपन्यास के घटना-चक्र का है।
सीमा यह कि व्यवस्था नहीं टूटती। दिल्ली की आशा पतली रह सकती है। दा साहब का आकर्षण पीड़ा को ढक सकता है। कुछ पात्र सपाट। गुण यह कि लाश चुप नहीं रहती। बिंदा बंद होकर भी दावा रखता है। रुक्मा और सक्सेना सबूत आगे ले जाते हैं। न्याय केवल अदालत नहीं, तंत्र की रपट है। बिना जाति लिखे चुनाव अधूरा है। बिना चुनाव के जाति केवल उत्पीड़न रह जाती है। दोनों बिसू की लाश में एक होते हैं। रश्मिरथी का सर्ग यह महत्त्व नहीं।
निष्कर्ष यह है कि सामाजिक महत्त्व जाति-हक पर है, राजनीतिक महत्त्व चुनाव-संरक्षण पर है; दोनों बिसू की लाश में एक होते हैं, परिवार-कथा या नाटक-मात्र नहीं।
63. महाभोज का मूल्यांकन कीजिए।20 अंक
महाभोज का मूल्यांकन तीन स्तरों पर है। साहित्यिक — राजनीतिक उपन्यास, सरल खड़ी बोली, घटना-शिल्प, सर्वज्ञ वाचक, व्यंग्य-संवाद। ऐतिहासिक — 1979, राधाकृष्ण, समकालीन तंत्र, सरोहा का उपचुनाव। नैतिक — हक, लाश, संरक्षण। नायक बिसू मृत्यु के बाद भी कथा का नैतिक केंद्र है। मन्नू भंडारी जन्म 3 अप्रैल 1931 भानपुरा, मंदसौर; बचपन महेंद्र कुमारी; निधन 15 नवंबर 2021 गुरुग्राम। नयी कहानी; मिरांडा हाउस अध्यापन। उपन्यास एक इंच मुस्कान 1962 सह-लेखन, आपका बंटी 1971, महाभोज 1979। आत्मकथा एक कहानी यह भी 2007; व्यास सम्मान उसी पर। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने महाभोज पर सम्मान दिया। दृष्टि मध्यवर्ग की स्त्री से आगे सत्ता और जाति तक जाती है। गोपाल राय इतिहास में स्त्री-राजनीति के सोपान पर मन्नू को रखते हैं।
गुण तीन हैं। पहला — लाश को राजनीतिक प्रश्न बनाना; नाम व्यंग्य है, उत्सव मृतक की पूँजी पर। दूसरा — पुलिस-प्रेस-नेता का एक चक्र दिखाना — सक्सेना, सिंहा, दत्ता, दा साहब, सुकुल। तीसरा — दलित हक को वोट से अलग करना; बिसू हक माँगता है, दल संवेदना माँगते हैं। आपका बंटी बच्चे और विच्छेद का है। राग दरबारी कार्यालय है। तमस दंगा है। रंगभूमि कारखाना है। त्यागपत्र मर्यादा है। अनामदास का पोथा संस्कृति है। यह चुनाव और लाश है। तीनों यथार्थ हैं, प्रश्न अलग हैं। बच्चन सिंह गठजोड़ देखते हैं। आलोचना अपराध का राजनीतिकरण कहती है। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण सत्ता-रक्षा है। लुबॉक दृष्टि कहते हैं; कई कमरे हैं। बेलछी प्रेरणा है, रिपोर्ट नहीं।
सीमाएँ साफ हैं। दा साहब का आकर्षण पीड़ा को ढक सकता है। कुछ पात्र सपाट। नाटक से विधा-भ्रम — रूपांतर लगभग 1982, निर्धारित विधा उपन्यास। अकेली और बंटी से नाम-भ्रम। सारा आकाश यादव का है। व्यवस्था अटूट। ईमानदार अफसर आशा का स्पर्श दे सकता है। आलोचना शिल्पहीनता कहती है — वर्णन सीधा है; यह सीमा भी कही जाती है, गुण भी। नारी-केंद्र बंटी जितना नहीं। विकास बिसू में घटना-कम है, मृत्यु जल्दी है। गुण यह कि लाश चुप नहीं रहती। बिंदा और रुक्मा प्रतिरोध बचाते हैं।
पहचान निषेध से पूरी होती है। रंगभूमि सूरदास है, गोली और कारखाना। त्यागपत्र मृणाल है, पद-त्याग। अनामदास का पोथा रैक्व है, शकट। गोदान होरी है। मूल्यांकन इन्हीं अंतरों के बिना अधूरा है। पूरी कथा पढ़नी है; सार बिसू, बिंदा, दा साहब, 1979, सरोहा याद रखने के लिए है, ग्रंथ की जगह नहीं। सीमाओं के बावजूद निर्धारित कृति टिकती है। 1979 में यह कृति समकालीन राजनीति को उपन्यास का विषय बनाती है। बिना लाश के मूल्यांकन खाली है। बिना गठजोड़ के राजनीतिक शिखर-नाम पतला है।
निष्कर्ष यह है कि महाभोज 1979 का राजनीतिक शिखर-नाम है; सीमाएँ आकर्षण और सपाट पात्र की हैं, पर बिसू, दा साहब और सरोहा इन्हीं से पहचाने जाते हैं।
64. महाभोज की नारी-पात्र लिखिए।8 अंक
महाभोज की प्रमुख नारी-पात्र रुक्मा हैं। बिंदेश्वरी उर्फ़ बिंदा की पत्नी हैं। बिसू से लगाव का उल्लेख आलोचना करती है। पहले डर है। बिंदा की पिटाई और गिरफ्तारी पर भ्रम टूटता है। सबूत साथ ले जाती हैं। स्त्री यहाँ केवल करुण दृश्य नहीं, तंत्र के सामने खड़ी साक्षी है। जमुना बहन दा साहब की पत्नी हैं — सादगी का स्वर, गीता-घर का पूरक, कथा का केंद्र नहीं। नारी-केंद्र आपका बंटी जितना नहीं; वहाँ माता शकुंत और बच्चा बंटी हैं। गुण यह कि रुक्मा निर्णय बदलती है — डर से सबूत तक। सीमा यह कि कुछ सहायक स्त्री-नाम सूची रह सकते हैं। वाचक सर्वज्ञ है; अनुभव बस्ती और थाने तक स्त्री का भी है।
तुलना से पहचान बैठती है। मृणाल इंकार की नायिका है। सोफिया प्रेम और गंगा चुनती है। जाबाला नेह की कर्ता है, सत्यकाम-माता नहीं। सुमन सेवासदन की नगर-नैतिकता है। रुक्मा लाश और फाइल के बीच है। बिना बिंदा के उसकी भूमिका पतली रहती है। बिना बिसू की हत्या के सबूत का अर्थ नहीं खुलता। नाटक-रूपांतर दृश्य बढ़ाता है; निर्धारित रूप उपन्यास है।
निष्कर्ष यह है कि नारी-पात्र रुक्मा से पहचानी जाती है; भूमिका सबूत और प्रतिरोध है, केवल करुण दृश्य या परिवार-केंद्र नहीं।
65. महाभोज में सत्ता और अपराध का गठजोड़ लिखिए।20 अंक
महाभोज में सत्ता और अपराध का गठजोड़ तीन सिरों का है। जोरावर हिंसा करता है — बस्ती की आग, बिसू की मृत्यु से जुड़ा हित, स्थानीय बाहुबली। दा साहब संरक्षण देते हैं — मुख्यमंत्री, गृह का प्रभार, सादगी का मुखौटा, गीता और शांत वाणी; स्वयं हाथ नहीं लगाते, इशारा काफी है। पुलिस और प्रेस फाइल चलाते हैं — सक्सेना सत्य लिखते हैं तो निलंबित होते हैं, डीआईजी सिंहा रपट बदलते हैं तो पद पाते हैं, दत्ता बाबू कागज-कोटा से अनुकूल खबर देते हैं। बिसू की हत्या अपराध है; उसे चुनाव बनाना राजनीति है। लखनसिंह विश्वासपात्र प्रत्याशी है। सदाशिव अत्रे पार्टी के अध्यक्ष हैं। तंत्र कई कमरों में बँटा है, एक दैत्य में नहीं। जॉन सेवक लोभ का पूँजीपति है; यह पद का प्रबंधक है। खलनायक-दैत्य नहीं, गठजोड़ का चेहरा है।
बिंदा को अपराधी बनाया जाता है। बिंदेश्वरी प्रतिरोध रखता है; पुलिस मारती है, झूठा हत्या-आरोप चलाती है। अपराध पुरस्कृत होता है, सत्य दंडित। रुक्मा सबूत आगे ले जाती हैं। परिजन अंत्येष्टि रोकते हैं — लाश चुप समझौता नहीं। सुकुल बाबू प्रतिपक्ष हैं, फिर भी लाश से सभा और वोट चाहते हैं। दोनों दल मृतक से शक्ति माँगते हैं, हक नहीं। बच्चन सिंह उपन्यास को अपराध और राजनीति के गठजोड़ पर रखते हैं। आलोचना उसे अपराध का राजनीतिकरण कहती है। नाम व्यंग्य है। भोज उत्सव है; उत्सव लाश की पूँजी पर है। वोट, प्रेस और जाँच उसी मेज के आसन हैं। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण सत्ता-रक्षा है, संयोग नहीं। बेलछी प्रेरणा है; कथा सरोहा की है, रिपोर्ट नहीं।
रंगभूमि में क्लार्क गोली है; राज्य खुली हिंसा है। यहाँ इशारा काफी है। गोदान महाजनी तंत्र है; ऋण और मर्यादा। यह चुनावी तंत्र है; फाइल और संरक्षण। राग दरबारी कार्यालय की सड़ांध है; केंद्र लाश नहीं। तमस दंगा है; यह उपचुनाव है। त्यागपत्र मर्यादा-दंड है, हत्या-गठजोड़ नहीं। अनामदास का पोथा ज्ञान का अहं है, वोट का नहीं। लुबॉक दृष्टि कहते हैं; गठजोड़ कई कमरों से दिखता है — थाना, मंत्रालय, अखबार, सभा। वाचक सर्वज्ञ घटना है। भाषा सरल खड़ी बोली व्यंग्य ढोती है। बिना जोरावर के हिंसा अधूरी है। बिना दा साहब के संरक्षण अधूरा है। बिना सिंहा-दत्ता के कागज अधूरा है। तीनों मिलकर भोज पूरा होता है।
सीमा यह कि दा साहब स्वयं हाथ नहीं लगाते, प्रबंधक रह जाते हैं; आकर्षण पीड़ा को ढक सकता है। ईमानदार अफसर आशा का स्पर्श दे सकता है। व्यवस्था नहीं टूटती, प्रश्न खुलता है। गुण यह कि गठजोड़ बिना उपदेश के दिखता है। नरोत्तम खबर लाता है; संपादन सत्ता देखता है — प्रेस स्वतंत्र नहीं, आसन है। जाति वोट है, न्याय नहीं। दिल्ली की आशा पतली है। नाटक-रूपांतर गठजोड़ को दृश्य बनाता है; निर्धारित रूप उपन्यास है। आपका बंटी इस गठजोड़ की कृति नहीं। पूरी कथा पढ़नी है; सार हिंसा, संरक्षण और फाइल याद रखने के लिए है।
निष्कर्ष यह है कि सत्ता संरक्षण है और अपराध हिंसा है; गठजोड़ लाश को वोट और फाइल बनाता है, निजी द्वंद्व या कारखाना-गोली नहीं।
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