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निर्धारित पाठ — कबीर, जायसी, सुंदरदास, रैदास notes

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निर्धारित पाठ — कबीर, जायसी, सुंदरदास, रैदास is a topic in Ancient poetry (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

यह इकाई निर्गुण काव्य का निर्धारित पाठ है। चार संकलन हैं। कबीर ग्रंथावली — श्यामसुंदर दास; पद और साखियाँ। जायसी का सिंहलद्वीप खंड — आचार्य रामचंद्र शुक्ल…

इकाई 5 · निर्धारित पाठ — कबीर, जायसी, सुंदरदास, रैदास

यह इकाई निर्गुण काव्य का निर्धारित पाठ है। चार संकलन हैं। कबीर ग्रंथावली — श्यामसुंदर दास; पद और साखियाँ। जायसी का सिंहलद्वीप खंड — आचार्य रामचंद्र शुक्ल का संपादन। सुंदर ग्रंथावली — पुरोहित हरिनारायण शर्मा। रैदास बानी — डॉ. शुक्देव सिंह। ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी धाराएँ यहीं पंक्ति बनती हैं। व्याख्या प्रसंग, अन्वय-भाव और काव्य-सौंदर्य पर टिकती है। पूरी ग्रंथावली यहाँ नहीं है; जो पहली पंक्तियाँ पाठ्यक्रम में हैं, उन्हीं का अर्थ और संदर्भ है।

सार: कबीर = पद और साखी — ज्ञान, गुरु, विरह, मृत्यु-भय का खंडन। जायसी = सिंघलदीप का रूपक-आख्यान। सुंदरदास = पल, काम, वैराग्य, वाणी। रैदास = भरम-भक्ति, राम-रट, शरण, पांडे की दीवार।

1 कबीर और कबीर ग्रंथावली

कबीर भक्तिकाल की ज्ञानाश्रयी निर्गुण धारा के शिखर हैं। जुलाहा माने जाते हैं; काशी से जुड़े। शुक्ल उन्हें निर्गुण का प्रतिनिधि कहते हैं। द्विवेदी उनकी जड़ सिद्ध-नाथ, श्रमण और लोक में देखते हैं — भक्ति अचानक चमत्कार नहीं। विजयेंद्र स्नातक और द्विवेदी का “कबीर” इस दृष्टि के दो बड़े ग्रंथ हैं; बड़थ्वाल निर्गुण संप्रदाय को स्वतंत्र साधना कहते हैं। भाषा सधुक्कड़ी है — पूर्वी हिन्दी, राजस्थानी, खड़ी बोली और फारसी-अरबी का मेल। रूप साखी, सबद (पद) और रमैनी हैं। साखी दोहे का ज्ञान-सूत्र है; पद गेय अनुभव है।

निर्धारित संपादन श्यामसुंदर दास की कबीर ग्रंथावली है — नागरीप्रचारिणी सभा का निर्धारित पाठ। बीजक दूसरी शाखा का संग्रह है; ग्रंथावली और बीजक एक ही पुस्तक नहीं। वाणी मौखिक रही, इसलिए पाठ-भेद हैं। व्याख्या निर्धारित पंक्ति के भाव पर टिकती है, पूरे पंथ-शास्त्र पर नहीं। कबीर का राम निराकार है — मंदिर का विग्रह नहीं, घट के भीतर का नाम। हिन्दू और मुसलमान दोनों के आडंबर पर चोट है। गुरु लोहार है, शिष्य लोहा। प्रेम चाखना है, पढ़ना नहीं। विरह संयोग से बड़ा है। मृत्यु का भय संसारी का है; राम को जानने वाला नहीं मरता।

2 निर्धारित पद — पहली पंक्तियाँ

ये छह अलग पदों की पहली पंक्तियाँ हैं, एक पद की छह कड़ियाँ नहीं। पाठ्यक्रम पूरा पद नहीं छापता; व्याख्या पहचाने पद के भाव पर टिकती है।

दुलहिनी गावहु मंगलचार।

बहुत दिनन थैं मैं प्रीतम पाये।

संतौ भाई आई ग्यान की आंधी रे।

मन रे जागत रहिये भाई।

पांडे कौन कुमति तोहि लागी।

हम न मरैं मरिहैं संसारा।

पद · कबीर ग्रंथावली · श्यामसुंदर दास · छह पदों की पहली पंक्तियाँ

पाठ्यक्रम पहली पंक्ति देता है; व्याख्या उसी पहचाने पद के भाव पर है। “दुलहिनी गावहु मंगलचार” आत्मा को दुल्हन बनाता है। मंगलचार विवाह-गीत हैं। घर में राजा राम भरतार आए हैं — निराकार राम पति है, जीव स्त्री। तन-मन की तैयारी लौकिक शृंगार नहीं, घट की शुद्धि है। बहुत दिनन थैं प्रीतम पाये — वियोग लंबा था, मिलन आज का है। संत-काव्य में विवाह रूपक सूफी इश्क से अलग घर बोलता है, पर दोनों में प्रिय परम है।

“संतौ भाई आई ग्यान की आंधी रे” ज्ञान को आँधी बनाता है। भ्रम की टाटी उड़ जाती है, माया बाँध नहीं पाती। हित-चित्त के खंभे गिरते हैं, मोह टूटता है, तृष्णा की छानी गिरती है, कुबुद्धि का भाँडा फूटता है। योग-युक्ति से छत बाँधी जाए तो पानी न चुए। आँधी के बाद प्रेम की वर्षा है; सूर्य निकलता है, तम क्षीण होता है। उलटबाँसी यहाँ घर के बिंब से काम लेती है — टाटी, थूनी, भाँडा। ज्ञान शास्त्र की सूची नहीं, तूफान है।

“मन रे जागत रहिये भाई” जागरण का आदेश है। गाफिल सोए तो काल ले जाता है। पांडे कौन कुमति — पंडित की लकीर पर वार है। कागद की लेखी आँखिन देखी के सामने छोटी पड़ती है; मूर्ति, तीर्थ और जाति का अभिमान कुमति है। “हम न मरैं मरिहैं संसारा” मृत्यु-भय का खंडन है। जियावनहारा मिल गया। जो राम नहीं जानते, वे जीते-जी मरे। साकत मरै, संत जन जीवै। हरि न मरै तो हम काहे को मरें। काया मरती है; नाम और आत्मा की रेखा अमर है। छह पद मिलकर कबीर का पूरा स्वर देते हैं — मिलन, ज्ञान, जागरण, शास्त्र-खंडन, अमरत्व।

3 निर्धारित साखियाँ — पहली पंक्तियाँ

ये बारह अलग साखियों की पहली पंक्तियाँ हैं। साखी सूत्र है; व्याख्या उसी सूत्र के भाव पर है।

हसैं न बोलै उनमनी, चंचल मेल्ह्या मारि।

सतगुर सांचा सूरिवां, तातैं लोहिं लुहार।

कबीर निरभै राम जपि जब लग दीवै बाति।

जिहि घटि प्रीति न प्रेम रस।

कबीर प्रेम न चाखिया, चखि न लीया साव।

रात्यूं रूंनी बिरहनी ज्यूँ वच्चां कूं कुंज।

विरहनि ऊभी पंथ सिरि पंथी बूझै धाइ।

सब रग तंत रबाब तन, विरह बजावै नित्त।

आंखड़ियाँ झाई पड़ी, पंथ निहारि निहारी।

पिंजर प्रेम प्रकाशिया, अंतरि भया उजास।

मन लागा उनमन सों, उनमन मनहि बिलग।

सुरति समांणी निरति मैं, निरति रही निरधार।

साखियाँ · कबीर ग्रंथावली · श्यामसुंदर दास · बारह साखियों की पहली पंक्तियाँ

साखी पद से अधिक सूत्र है। पहली साखी उनमनी अवस्था की है — हँसी-बोल बंद, चंचल मन मारा गया। योग की भाषा संत के घर में उतरती है। सतगुरु सांचा सूरियाँ / लुहार है। शिष्य लोहा है। गुरु पीटता है, तपाता है, तारे की धार चलाता है — कनक-कुंदन तभी बनता है। यह प्रेम की मिठास नहीं, साधना की चोट है। द्विवेदी गुरु को कबीर की भूमि कहते हैं; बिना गुरु के निर्गुण केवल इनकार रह जाता है।

निरभै राम जपि जब लग दीवै बाति — नाम तब तक, जब तक तेल और बाती हैं। बुझने के बाद सोना दिन-रात हो जाता है। जीवन की सीमा के भीतर जपो। जिहि घटि प्रीति न प्रेम रस — वह घट श्मशान है। प्रेम न चाखिया, चखि न लीया साव — प्रेम स्वाद है, ग्रंथ नहीं। बिना भाव का नाता नाता नहीं। ये तीन साखियाँ नाम, प्रेम और समय को एक सूत्र में बाँधती हैं।

फिर विरह का समूह है। रात्यूं रूंनी बिरहनी — रात को विरहिणी रोती है जैसे कुंज अपने बच्चों को। ऊभी पंथ सिरि — राह पर खड़ी पंथी से पूछती है। रग तंत हैं, तन रबाब है, विरह नित्य बजाता है। आँखें झाई पड़ गईं, पंथ निहारते-निहारते। पिंजर प्रेम से प्रकाशता है, अंतर उजास हो जाता है। विरह सूफी काव्य का प्राण भी है; कबीर उसे साखी की चोट में लाते हैं — कथा नहीं, एक पंक्ति। मन लागा उनमन सों — मन उस पार चला, इस मन से बिलग। सुरति निरति में समाई, निरति निराधार रही। यह नाथ-योग की शब्दावली है; कबीर उसे अनुभव बनाते हैं, तंत्र नहीं। साखियों का वैशिष्ट्य घर, कारीगरी, पक्षी और वाद्य के बिंब हैं। रस शांत और करुण; व्यंग्य पदों में अधिक, साखी में गुरु और विरह अधिक।

4 जायसी और सिंहलद्वीप खंड

मलिक मुहम्मद जायसी प्रेमाश्रयी निर्गुण धारा के शिखर हैं। पद्मावत उनकी प्रसिद्ध रचना है; अखरावट अन्य। निर्धारित संपादन आचार्य रामचंद्र शुक्ल का है। शुक्ल ने ग्रंथ को हिन्दी के महाकाव्य-समीप रखा। विजयदेव नारायण साही जायसी को भीतर से पढ़ते हैं — प्रतीक की सूची से अधिक कविता। रामपूजन तिवारी सूफी काव्य की भूमिका देते हैं; श्यामनमोहर पांडेय मध्यकालीन प्रेमाख्यान की संधि बताते हैं। भाषा अवधी है। छंद चौपाई कथा कहती है, दोहा अर्थ बाँधता है।

कथा रत्नसेन, पद्मावती, सिंहलद्वीप और चित्तौड़ की है। सिंहलद्वीप खंड द्वीप का वर्णन है — जहाँ पद्मावती है, जहाँ साधक पहुँचना चाहता है। लौकिक पाठ द्वीप, सरोवर, गढ़, राजसभा और रनिवास है। पारमार्थिक पाठ में सिंघल हृदय या आध्यात्मिक भूमि है, पद्मावती बुद्धि या ईश्वरीय ज्योति, समुद्र साधना का पथ। आलोचक प्रतीक एक-से नहीं बाँधते; स्थिर बात यह है कि आख्यान दोहरे पाठ देता है। ऐतिहासिक पद्मावती और काव्य-पद्मावती को एक मान लेना भ्रम है। निर्धारित अंश पूरे खंड की कथा नहीं, द्वीप के सौंदर्य और गढ़ के वैभव का चित्र है — यात्रा का लक्ष्य दिखाई देता है।

5 सिंघलदीप — निर्धारित चौपाइयाँ

सिंघलदीप कथा अब गावौं।

मानसरोदक बरनौं काहा।

पानि भरै आवहिं पनिहारी।

आस-पास बहु अमृत बारी।

पुनि फुलवारि लागि चहुँ पासा।

पुनि आए सिंघल गढ़ पासा।

नव पौरी पर दसवँ दुवारा।

पुनि बाँधे रजबार तुरंगा।

राजसभा पुनि देख बइठी।

बरनौं राजमँदिर रनिवासू।

सिंहलद्वीप खंड · पद्मावत · रामचंद्र शुक्ल

अन्वय। अब सिंघलदीप की कथा गाता हूँ। मानसरोवर का वर्णन क्या कहूँ। पनिहारियाँ जल भरकर आती हैं। आस-पास बहुत अमृत-बारियाँ हैं। फिर चारों ओर फुलवारी लगी है। फिर सिंघल गढ़ के पास आए। नौ पौरी पर दसवाँ द्वार है। फिर रजबार में तुरंग बँधे हैं। राजसभा बैठी देखी। राजमंदिर और रनिवास का वर्णन करता हूँ। जायसी की पंक्ति में नाम सिंघलदीप है; पाठ्यक्रम-शीर्षक सिंहलद्वीप खंड है — एक ही स्थान का दो रूप।

भाव द्वीप को लोक-स्वर्ग बनाने का है। मानसरोवर तीर्थ और सौंदर्य दोनों है। पनिहारी लोक-चित्र है; अमृत बारी अतिशयोक्ति है। फुलवारी चारों ओर — द्वीप बंद स्वर्ग है, सूखा मरु नहीं। गढ़ नौ-दस द्वारों वाला दुर्ग है; रजबार शक्ति है; राजसभा व्यवस्था है; रनिवास उस सौंदर्य का अंतःपुर है जहाँ पद्मावती की कथा आगे खुलती है। चौपाई की गति सूची नहीं, यात्रा है — सरोवर से गढ़ तक आँख चलती है। अवधी मधुर है, डिंगल की कठोरता नहीं। शृंगार यहाँ रूपक की भूमि है। सूफी आख्यान में लक्ष्य पहले दिखाई देता है, साधक बाद में चलता है। सिंघलदीप वही लक्ष्य है। नागमती का विरह आगे का खंड है; निर्धारित पंक्तियाँ द्वीप की ज्योति दिखाती हैं, वियोग नहीं। व्याख्या में दोनों परतें रखनी होती हैं — वर्णन का सौंदर्य और रहस्य का संकेत — बिना कथा को केवल रूपक की हड्डी बना दिए।

6 सुंदरदास और सुंदर ग्रंथावली

सुंदरदास दादू-पंथ से जुड़े संत माने जाते हैं। राजस्थान की भूमि है। कबीर की फटकार के बाद यह वाणी अधिक व्यवस्थित है — नीति, वैराग्य, योग और भक्ति एक साथ। परशुराम चतुर्वेदी संत-परंपरा में उन्हें इसी पंक्ति में रखते हैं। निर्धारित संपादन पुरोहित हरिनारायण शर्मा की सुंदर ग्रंथावली है। पाठ्यक्रम पूरे पद नहीं छापता। नीचे आठ अलग रचनाओं की पहली पंक्तियाँ हैं — एक पद की आठ कड़ियाँ नहीं।

पलु ही में मरिजात पलु ही में जीवत है।

काम जब जागै तब गनत न कोऊ साँप।

रंक को नचावे अभिलाषा धन पाइबे की।

जोग करै जाग करै बेद विधि त्याग करै।

गेह तज्यो अरु नेह तज्यो।

बोलिए तो तब जब।

पति सूं ही प्रेम होय।

सुनत नगारे चोट।

सुंदर ग्रंथावली · पुरोहित हरिनारायण शर्मा · आठ रचनाओं की पहली पंक्तियाँ

पलु ही में मरिजात — अनित्य का सूत्र; संसार क्षण में उलटा होता है, अहंकार की इमारत पल की है। काम जब जागै — वासना जागे तो साँप कोई नहीं गिनता; भय और विवेक सो जाते हैं। रंक को नचावे — धन की अभिलाषा निर्धन को भी नचाती है; तृष्णा नाच है। जोग करै जाग करै — सच्ची साधना जागरण है, केवल वेद-विधि का दिखावा नहीं। गेह तज्यो अरु नेह तज्यो — घर छूटना अधूरा है जब तक नेह न छूटे। बोलिए तो तब जब — वाणी तब, जब अंतर में अर्थ हो और बोल हित करे। पति सूं ही प्रेम होय — प्रेम एक के साथ; पति निराकार राम है। सुनत नगारे चोट — नगाड़ा काल या सतगुरु की चोट; सुनते ही नींद टूटती है।

सुंदरदास कबीर को रद्द नहीं करते; वे उसी निर्गुण को अनुशासन देते हैं। राजस्थानी-सधुक्कड़ी मिश्रण उनकी भाषा है। ज्ञानाश्रयी वैशिष्ट्य यहीं नीति-काव्य बनता है।

7 रैदास बानी

रैदास / रविदास ज्ञानाश्रयी धारा के बड़े संत हैं। चर्मकार माने जाते हैं; काशी से जुड़े। कबीर के निकट हैं, स्वर अलग है — फटकार से अधिक विनय, श्रम की गरिमा, राम-नाम की रट। मीरा की परंपरा उन्हें गुरु-समान स्मरण करती है। निर्धारित संपादन डॉ. शुक्देव सिंह की रैदास बानी है। पद गेय हैं। राम निराकार है; कहीं कान्हा-माधो का संबोधन सगुण भाषा छूता है — संत की वाणी एक खाने में बंद नहीं। पाठ्यक्रम पूरे पद नहीं छापता। नीचे नौ अलग पदों की पहली पंक्तियाँ हैं।

भाई रे भरम-भगति सूं जानि।

अब कैसे छूटै राम रट लागी।

आजु दिवस लेऊं बलिहारा।

कान्हा हो जग जीवन मोरा।

राम मैं पूजा कहाँ चढ़ाऊँ।

माधो! संगति सरनि तुम्हारी।

रथ को चतुर चलावन हारो।

जो तुम तोरौ राम मैनही तोरौं।

पांडे! हरी विचि अंतर डाढ़ा।

पद · रैदास बानी · शुक्देव सिंह · नौ पदों की पहली पंक्तियाँ

भाई रे भरम-भगति सूं जानि — भरम और भक्ति एक नहीं; पहली माँग विवेक की है। अब कैसे छूटै राम रट लागी — नाम ऐसी आदत है कि छोड़ना संभव नहीं; यह बंधन मुक्ति का है। आजु दिवस लेऊं बलिहारा — मिलन या जागरण के दिन पर बलिहार। कान्हा हो जग जीवन मोरा — जग का जीवन कान्हा है; निर्गुण संत का सगुण संबोधन प्रेम की भाषा है, मंदिर का विग्रह नहीं। राम मैं पूजा कहाँ चढ़ाऊँ — फूल-पत्र नहीं; पूजा घट में, श्रम में, नाम में है। जाति का अपमान यहाँ उत्तर बनता है — पूजा का अधिकार वस्तु नहीं, प्रेम है।

माधो संगति सरनि तुम्हारी — शरण संगति की है; अकेला पंडित-मार्ग नहीं। रथ को चतुर चलावन हारो — शरीर रथ है, इंद्रियाँ घोड़े हैं, सारथि राम हैं। जो तुम तोरौ राम मैनही तोरौं — प्रभु तोड़ें तो भी भक्त नहीं तोड़ता; प्रेम की जिद कबीर की फटकार से कोमल है। पांडे हरी विचि अंतर डाढ़ा — पंडित और हरि के बीच दीवार है — कर्मकांड, अभिमान, छुआछूत। स्वर विनय का है, वार का नहीं। श्रम-गरिमा रैदास की स्थायी संपत्ति है। निर्धारित पद भक्ति को जाति से बड़ा बनाते हैं।

8 चार निर्धारित स्वर

कबीर ज्ञान की आँधी, गुरु-लुहार, विरह-रबाब और मृत्यु का खंडन हैं। सुंदरदास उसी धारा को पल, काम, वाणी और पति-प्रेम का अनुशासन देते हैं। रैदास भरम-भक्ति का विवेक, राम-रट, शरण और पांडे की दीवार हैं। तीनों ज्ञानाश्रयी हैं; स्वर फटकार, नीति और विनय में बँटते हैं। जायसी चौथे हैं — प्रेमाश्रयी। सिंघलदीप कथा गाता है, साखी नहीं चलाता। अवधी चौपाई सधुक्कड़ी दोहे से अलग घर है। निर्गुण भूमि एक है, मार्ग दो हैं।

शुक्ल के दो खाने यहीं पूरे उतरते हैं। द्विवेदी की निरंतरता भी — कबीर-रैदास लोक और श्रमण की फसल हैं; जायसी भारतीय कथा और सूफी इश्क की संधि हैं। व्याख्या प्रसंग, अन्वय और सौंदर्य पर टिकती है। रस शांत, भक्ति, करुण और व्यंग्य हैं। निर्धारित पाठ पूरे ग्रंथ का स्थानापन्न नहीं।

सार: व्याख्या में संपादक का नाम, धारा (ज्ञानाश्रयी / प्रेमाश्रयी) और पंक्ति का बिंब साथ रहें। कबीर साखी-पद, जायसी द्वीप-वर्णन, सुंदर नीति, रैदास विनय।

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