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निर्धारित पाठ — रासो, ढोला मारू, विद्यापति, खुसरो notes

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निर्धारित पाठ — रासो, ढोला मारू, विद्यापति, खुसरो is a topic in Ancient poetry (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

यह इकाई युग का ढाँचा नहीं, निर्धारित पंक्तियों का पाठ है। चार रचनाएँ हैं। पृथ्वीराज रासो का पद्मावती समय — माताप्रसाद गुप्त का संपादन। ढोला मारू रा दूहा…

इकाई 4 · निर्धारित पाठ — रासो, ढोला मारू, विद्यापति, खुसरो

यह इकाई युग का ढाँचा नहीं, निर्धारित पंक्तियों का पाठ है। चार रचनाएँ हैं। पृथ्वीराज रासो का पद्मावती समय — माताप्रसाद गुप्त का संपादन। ढोला मारू रा दूहा का मरुधर परिचय — नरोत्तमदास स्वामी, सूर्यकरण पारीक, रामसिंह। भनै विद्यापति — कृष्णमोहन झा। अमीर खुसरो — भोलानाथ तिवारी; दोहे, मुकरियाँ और गीत। व्याख्या प्रसंग, अन्वय-भाव और काव्य-सौंदर्य पर टिकती है। पूरी कृति यहाँ नहीं है; जो पंक्तियाँ पाठ्यक्रम में हैं, उन्हीं का अर्थ और संदर्भ है।

सार: रासो = पद्मावती का रूप और चौहान-गोरी युद्ध। ढोला मारू = मरुधरा की कठोर भूमि। विद्यापति = शिव-वंदना और राधा-कृष्ण। खुसरो = दोहा, मुकरी, गीत — हिन्दवी की ठिठोली और प्रेम।

1 पृथ्वीराज रासो और पद्मावती समय

पृथ्वीराज रासो चंदबरदाई से जोड़ा जाता है। चंद पृथ्वीराज चौहान के दरबारी चारण माने गए। शुक्ल के वीरगाथाकाल का केंद्रीय ग्रंथ यही रहा। भाषा डिंगल है — पुरानी राजस्थानी का साहित्यिक रूप, अपभ्रंश से सटी हुई। छंद रासो-शैली के हैं; वीर रस प्रधान, शृंगार साथ चलता है। निर्धारित संपादन प्रो. माताप्रसाद गुप्त का है; पाठ्यक्रम का संदर्भ-ग्रंथ “रासो विमर्श” भी उन्हीं का है। प्रामाणिकता लंबी बहस का विषय रही — रचना-काल, प्रक्षेप, कई स्तर। इतिहास ग्रंथ पर टिकता है; ग्रंथ विवादित हो तो युग-चित्र डगमगाता है। दोनों बातें साथ रहती हैं: रासो आदिकाल का प्रतिनिधि काव्य है, और इसका पाठ एक ही पत्थर की लकीर नहीं।

पद्मावती समय पृथ्वीराज की रानी पद्मावती के प्रसंग का खंड है। निर्धारित अंश दो चित्र देता है। पहला चित्र रूप का है — सोलह कला, केश, पुष्प, प्रिय का चित्त। दूसरा चित्र युद्ध का है — गजनी की आवाज, सहाबुद्दीन, चौहान की रान, हार-जीत का मिटना। एक ही समय में शृंगार और वीर — यही रासो की पहचान है।

2 पद्मावती का रूप — निर्धारित पंक्तियाँ

मनहु कला ससिभान, कला सोलह सो बन्निय।

कुटिल केस, सुदेस, पौहप रचियत पिक्क सद।

सोधि जुगति कौ कंत कियौ तब चित्त चहौं दिसि।

प्रिय पृथ्वीराज नरेश, जोग लिखि कग्गर दिन्ना।

पद्मावती समय · पृथ्वीराज रासो · माताप्रसाद गुप्त

अन्वय यह है। मानो चंद्रमा की सोलह कलाएँ उसी रूप में बाँधी गईं। केश कुटिल हैं, देश सुंदर है, पुष्प रचे गए हैं, स्वर पके-मधुर हैं। विधि सोचकर प्रिय ने तब चारों दिशाओं में चित्त डाला। प्रिय पृथ्वीराज नरेश ने उस योग को कग्गर पर लिख दिया। कग्गर यहाँ लेखन-पट्ट या कागद का संकेत है — रूप का स्थिर चित्र।

भाव नख-शिख नहीं, पूरा बिंब है। सोलह कला पूर्ण चंद्र का रूपक है; पद्मावती अधूरी सुंदरता नहीं। कुटिल केश शृंगार का स्थिर लक्षण है। पौहप और पिक्क सद प्रकृति को रूप से बाँधते हैं। कंत का चित्त चारों ओर जाता है — प्रेम एक दिशा का नहीं, व्याप्त है। वीरगाथा के ग्रंथ में यह शृंगार दरबार की स्त्री को युद्ध से पहले पूरा मनुष्य बनाता है। अतिशयोक्ति चारण-काव्य की शैली है, दोष नहीं। डिंगल की संक्षिप्त पंक्तियाँ चित्र को ठोककर बैठा देती हैं।

3 सहाबुद्दीन और चौहान — युद्ध-चित्र

उहै घटी उहै पलनी उहै दिन वैर उहै सजि।

सुनि गज्जनै आवाज, चढ़्यौ सहाबुद्दीन बर।

बज्जिय घोर निसान, रान चौहान चहौं दिसि।

निकट नगर जब जान, जाय वर बिंद उभय भय।

भई जु आनि अवाज, आप साहबुद्दीन सुर।

ना को हार नह जित्त, रहै न रहहि सूरवर।

पद्मावती समय · पृथ्वीराज रासो · माताप्रसाद गुप्त

अन्वय। वही घड़ी, वही पल, वही दिन — वैर सजा हुआ है। गजनी की आवाज सुनकर सहाबुद्दीन वर चढ़ आए। घोर निसान बज उठे; चौहान की सेना चारों दिशाओं में है। नगर निकट जानकर दोनों ओर भय है। तब आवाज आई — साहबुद्दीन स्वयं सुर हैं। न कोई हार है न जीत; सूरवर रहता भी नहीं, रह पाता भी नहीं।

भाव समय की एकता है। रूप-वर्णन के बाद युद्ध अचानक नहीं, उसी घड़ी का दूसरा मुख है। गज्जनै आवाज तुर्क-आक्रमण का शब्द-चित्र है। निसान नगाड़ा है; रान रण है। उभय भय दोनों सेनाओं की मानवीयता है — चारण केवल एक पक्ष की डींग नहीं गाता। अंतिम पंक्ति वीर रस को करुण के किनारे ले जाती है: इस लड़ाई में जीत का हिसाब छोटा पड़ जाता है। अनुप्रास, पुनरुक्ति और डिंगल की गति युद्ध का वेग बनाती हैं। रासो की उपलब्धि यही है कि शृंगार और वीर एक समय में पूरे उतरते हैं।

4 ढोला मारू रा दूहा

ढोला मारू रा दूहा राजस्थानी का लोक-प्रेमाख्यान है। ढोला पूंगल-नरेश का पुत्र, मारू मारवाड़ की कन्या। बाल-विवाह, वियोग, दूती, पुनर्मिलन — कथा लोक में गाई जाती रही। संपादन नरोत्तमदास स्वामी, सूर्यकरण पारीक और रामसिंह का निर्धारित है। भाषा डिंगल-राजस्थानी है, रासो से अधिक घर की। छंद दूहा है। वीरगाथा के साथ-साथ यह ग्रंथ शृंगार, विरह और मरुभूमि का काव्य है। आदिकाल को केवल तलवार का युग कहने पर ढोला मारू बाहर रह जाता है; द्विवेदी की लोक-दृष्टि इसे भीतर रखती है।

निर्धारित अंश “मरुधर परिचय” है — मारवाड़ की भूमि का परिचय। पानी कुएँ में, गर्मी, साँप, कँटीली वनस्पति, कंबल का वस्त्र, बहुत गहरे नीर। बाप से विनय है कि मारु देश न दिया जाए। यह भूगोल का निबंध नहीं, विरह और दाम्पत्य की आशंका का चित्र है। राजस्थान की कठोर प्रकृति यहाँ अलंकार नहीं, जीवन की शर्त है।

5 मरुधर परिचय — निर्धारित दूहे

देस विरंगउ ढोलणा दुखी हुया ईहाँ आई।

करहा देस सुहामणउ जे मूँ सासरवाड़ि।

करहा लंब-कराड़िया, बे-बे अंगुल कन्न।

बाळऊं, बाबा देसड़उ, पाँणी जिहाँ कुवाँह।

बाळऊं, बाबा देसड़उ, पाँणी सन्दी ताति।

बाबा, म देइस मारुवाँ, सूधा एवाळाँह।

बाबा म देइस मारुवाँ, वर कूँआरि रहेसि।

मारु, थाँकइ देसड़इ, एक न भाजइ रिड्ड।

जिण भुई पन्नग पीयणा, कयर-कँटाळा रूँख।

पहिरण-ओढण कंबळा, साठे पुरिसे नीर।

मरुधर परिचय · ढोला मारू रा दूहा

अन्वय। ढोलणा, यह देश विरंग लगता है; यहाँ आकर दुख हुआ। कैसा सुहावना देश है मेरा सासर। कैसे लंबे कर्ण-आभरण, दो-दो अंगुल के कान। बाबा, उस देसड़े में पानी कुएँ में है; पानी तप्त है। बाबा, मुझे मारु देश न देना; वहाँ सीधे-सादे एवाळे हैं। वर नहीं तो कुँवारी रहूँ। मारु, उस देसड़े में एक भी बाजरा नहीं उगता। जिस भूमि पर सर्प पानी पीते हैं, पेड़ कड़वे-कँटीले हैं। पहनना-ओढ़ना कंबल है; नीर साठ पुरुष गहरा है।

भाव मरुधरा की सचाई है। विरह केवल नायक-नायिका का नहीं, जलवायु का भी है। कुआँ, ताता पानी, गहरी जमीन — ये बिंब बाद के राजस्थानी काव्य तक जाते हैं। “कूँआरि रहेसि” स्त्री-स्वर है; चारण-रासो की रानी से यह दूहा अलग घर बोलता है। भाषा ठेठ है, संस्कृत-मार्गी नहीं। करुण और शृंगार एक दूहे में मिलते हैं। आदिकाल की उपलब्धि लोक-कथा को साहित्य की पंक्ति में लाना भी है — ढोला मारू उसी उपलब्धि का प्रमाण है।

6 विद्यापति

विद्यापति मैथिल कोकिल कहे जाते हैं। मिथिला के दरबार से जुड़े; भाषा अवहट्ठ और मैथिली। आदिकाल और भक्ति की संधि पर खड़े हैं। शुक्ल उन्हें आदिकाल के अंत में शृंगार-कवि की तरह रखते हैं; राधा-कृष्ण के पद सगुण भक्ति की भूमि भी बनते हैं। निर्धारित संकलन “भनै विद्यापति”, संपादक कृष्णमोहन झा। पद गेय हैं। शिव-वंदना और राधा-कृष्ण-लीला एक ही कंठ से निकलते हैं। संस्कृत काव्य की छाया है, पर जीभ देशी है। मैथिली की कोमलता हिन्दी क्षेत्र के पूर्वी सिरे की पहचान है।

पाठ्यक्रम पूरे पद नहीं छापता। नीचे आठ पहली पंक्तियाँ आठ अलग पदों की हैं — एक गीत की लगातार आठ पंक्तियाँ नहीं। व्याख्या पहली पंक्ति से पद पहचानकर भाव पर टिकती है।

7 निर्धारित पद — पहली पंक्तियाँ

जय जय संकर जय त्रिपुरारि।

नंदक नंदन कदम्बक तरु-तर।

देख देख राधा रूप अपार।

आज पेखल नंद किसोर।

सजनी कान्ह कें कहब बुझाई।

पथ-गति पेखलि मएँ राधा।

सैसव जोबन दुहु मिलि गेल।

अनुखन माधव माधव सुमरइते।

भनै विद्यापति · कृष्णमोहन झा · आठ पदों की पहली पंक्तियाँ

जय जय संकर जय त्रिपुरारि — शिव-वंदना है। त्रिपुरारि तीन पुरों के नाशक शंकर हैं। यह मंगलाचरण का पद है, राधा-कृष्ण का नहीं। नंदक नंदन कदम्बक तरु-तर — नंद-पुत्र कृष्ण कदम्ब के नीचे हैं; लीला का स्थान तरु-छाया है। देख देख राधा रूप अपार — रूप का निमंत्रण है; शास्त्र नहीं, आँख है। आज पेखल नंद किसोर — पेखल देखना है; आज नंद-किसोर दिखाई दिए। सजनी कान्ह कें कहब बुझाई — सखी से कान्ह को समझाकर कहने का संकल्प। पथ-गति पेखलि मएँ राधा — पथ पर चलती राधा; लोक की स्त्री, केवल देवी नहीं। सैसव जोबन दुहु मिलि गेल — बाल और यौवन एक साथ मिल गए; संधि का पद। अनुखन माधव माधव सुमरइते — हर क्षण माधव-नाम; शृंगार के भीतर स्मरण।

सात पंक्तियाँ कृष्ण-राधा की हैं, पहली शिव की। पेखल घटना को स्पर्श करता है। अनुप्रास, पुनरुक्ति और मैथिली की लय पद को गेय बनाती हैं। सूर से पहले यह पूर्वी कंठ बज चुका है।

8 अमीर खुसरो — दोहा, मुकरी, गीत

अमीर खुसरो तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी के कवि-संगीतकार हैं; निजामुद्दीन औलिया से जुड़े। फारसी के साथ हिन्दवी में दोहे, पहेलियाँ, मुकरियाँ और गीत। आदिकाल और भक्ति की संधि-रेखा के कवि — इस्लामी दरबार और देशी जीभ एक कंठ में। निर्धारित संपादन भोलानाथ तिवारी का है। पाठ्यक्रम पूरे गीत नहीं छापता; पहली पंक्ति से कविता पहचानी जाती है। व्याख्या उसी पहचानी रचना के भाव पर टिकती है।

रूपनिर्धारित पहली पंक्तिभाव
दोहाअपनी छवि बनाइ केरूप सजाकर भी प्रिय के सिवा और किसी को क्या देना
दोहाआ साजन मोरे नयनन मेंप्रिय पलकों के भीतर बसे; आँख खुलते ही समा जाते हैं
दोहाखुसरो रैन, सुहाग कीसुहाग-रात; तन-मन एक रंग
दोहागोरी सोवे सेज परकेश मुख पर, रात चारों ओर, कवि घर लौटे
दोहाखुसरो दरिया प्रेम काधार उलटी; तैरने वाला डूबे, डूबने वाला पार
मुकरीआप हिले और मोहे हिलाएउत्तर: पालना
मुकरीऊँची अटारी पलंग बिछायोउत्तर: कबूतर
मुकरीलिपट लिपट के वा के सोईउत्तर: चादर
मुकरीसेज पड़ी मोरे आँखों आएउत्तर: नींद
मुकरीशोभा सदा बढ़ावन हाराउत्तर: आईना
गीतछाप तिलक सब छीनी रेनैन-मिलाप; पीर की दीक्षा तिलक से बड़ी
गीतजब यार देखा नैन भरप्रिय का दर्शन; नयन भर आना
गीतसकल बन फूल रही सरसोंबसंत का देशी गीत; वन सरसों से भरा

गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस।

चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस।।

खुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वाकी धार।

जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।

छाप तिलक सब छीनी रे, मोसे नैन मिलाइके।

सकल बन फूल रही सरसों।।

पाठ्यक्रम दोहे, मुकरी और गीत की केवल पहली पंक्ति देता है — पूरे दोहे एक रचना नहीं। “अपनी छवि बनाइ के” रूप सजाने का दोहा है; प्रिय के सिवा और किसी को वह छवि नहीं दी जाती। “आ साजन मोरे नयनन में” प्रिय को पलकों के भीतर बसाना है। “खुसरो रैन, सुहाग की” सुहाग-रात का दोहा है; तन और मन एक रंग हो जाते हैं। “गोरी सोवे” में केश मुख पर हैं, रात चारों ओर है; कवि स्वयं को घर लौटने कहता है — शृंगार के भीतर वैराग्य की ठिठोली। “दरिया प्रेम” सूफी इश्क है: तैरने वाला डूबता है, डूबने वाला पार होता है।

मुकरी पहेली है। सुनने वाला प्रेम समझे, उत्तर घरेलू वस्तु निकलता है — पालना, कबूतर, चादर, नींद, आईना। हास्य और लोक-बुद्धि एक साथ हैं। “छाप तिलक” में गुरु-पीर के नैन दीक्षा से बड़े हैं; निजामुद्दीन का संदर्भ यही गीत खोलता है। “जब यार देखा नैन भर” दर्शन का गीत है। “सरसों” बसंत का देशी गीत है, दरबारी फारसी नहीं। खुसरो की उपलब्धि हिन्दवी को दरबार और दरगाह दोनों की भाषा बनाना है। संधि-रेखा का कवि यहीं कविता बनता है।

सार: व्याख्या = प्रसंग + अन्वय-भाव + सौंदर्य। रासो में रूप और युद्ध। ढोला मारू में मरुभूमि। विद्यापति में शिव और राधा। खुसरो में दोहा-मुकरी-गीत।

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