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परीक्षा उत्तर

Exam answers is a topic in Ancient poetry (Practice) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

Written-style answers for Ancient poetry at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

Exam answers

1. भारतीय साहित्य परंपरा से क्या आशय है? हिन्दी साहित्य उससे कैसे जुड़ता है?8 अंक

भारतीय साहित्य परंपरा से अभिप्राय उस समग्र वाङ्मय से है जो वैदिक काल से तमिल संगम तक अनेक भाषाओं में रचा गया। इसमें वैदिक संहिताएँ और उपनिषद, पालि त्रिपिटक तथा जातक, प्राकृत गाथाएँ एवं जैन आगम, लौकिक संस्कृत के रामायण-महाभारत तथा कालिदास का काव्य, अपभ्रंश के चरित-काव्य और तमिल के अकम्-पुरम् सम्मिलित हैं। भाषाएँ और लिपियाँ भिन्न हैं, फिर भी राम-कृष्ण कथा, रस, भक्ति, अहिंसा और नीति बार-बार मिलते हैं। आचार्य नगेन्द्र ने इसी एकसूत्रता को समेकित भारतीय साहित्य कहा है।

हिन्दी इसी परंपरा की उत्तर भारतीय शाखा है। सांस्कृतिक जड़ वैदिक और लौकिक संस्कृत में है, जहाँ से कथा और रस-सिद्धांत आते हैं। भाषा की निकटतम जड़ प्राकृत-अपभ्रंश में है। पालि समांतर श्रमण-धारा है; तमिल स्वतंत्र द्रविड़ केंद्र है। गलत धारणा यह है कि हिन्दी अकेली पूरी भारतीय परंपरा है। सही धारणा यह है कि वह एक समृद्ध धारा की महत्त्वपूर्ण कड़ी है। भरतमुनि का नाट्यशास्त्र रस-सूत्र देता है; प्राकृत-व्यवस्था लोक-पात्र की भाषा दिखाती है — दोनों आगे हिन्दी तक जाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि भारतीय साहित्य परंपरा वैदिक से तमिल तक की समेकित धारा है और हिन्दी उसकी उत्तर भारतीय कड़ी है। संस्कृति संस्कृत से जुड़ती है, भाषा प्राकृत-अपभ्रंश से।

2. वैदिक साहित्य का संक्षिप्त परिचय दीजिए।20 अंक

वैदिक साहित्य भारतीय वाङ्मय की सबसे प्राचीन उपलब्ध परत है। यह श्रुति है, अर्थात् गुरु-शिष्य परंपरा में सुना और स्मरण रखा गया ज्ञान। स्मृति — रामायण, महाभारत, पुराण, धर्मशास्त्र — इससे भिन्न कोटि है। केंद्र चार संहिताएँ हैं। ऋग्वेद सूक्तों का संग्रह है; इंद्र, अग्नि, सोम और उषा की स्तुति के साथ नासदीय जैसे दार्शनिक सूक्त भी हैं। यजुर्वेद यज्ञ की प्रक्रिया और कर्मकांड का ग्रंथ है। सामवेद अधिकांशतः ऋग्वैदिक मंत्रों का गान-रूप है। अथर्ववेद लोक-जीवन के निकट है — रोग, रक्षा, आशीष और गृह-कर्म। प्रत्येक वेद का काम एक वाक्य में लिखना परीक्षा का पहला कदम है।

प्रत्येक वेद चार स्तरों में व्यवस्थित है। संहिता मंत्र-पाठ है। ब्राह्मण ग्रंथ, जैसे शतपथ ब्राह्मण, मंत्र की गद्य व्याख्या और यज्ञ का अर्थ प्रस्तुत करते हैं। आरण्यक वन-चिंतन की ओर ले जाते हैं; ऐतरेय आरण्यक नाम के लिए पर्याप्त है। उपनिषद आत्मा, ब्रह्म, जन्म-मरण तथा विद्या-अविद्या का विवेक हैं। बृहदारण्यक, छांदोग्य, ईश, कठ और मुंडक प्रमुख हैं। याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद ज्ञान की सीमा पूछता है; कठोपनिषद का नचिकेता-प्रसंग मृत्यु और ब्रह्मविद्या का संवाद है। वेदांग — शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष — वेद को समझने के सहायक अंग हैं। भाषा वैदिक संस्कृत है, लौकिक संस्कृत नहीं; कालिदास की भाषा वेद की भाषा नहीं मानी जाती।

काव्य की दृष्टि से उषा-सूक्त प्रकृति और सौंदर्य का मानवीकरण है तथा नासदीय सूक्त सृष्टि के आरंभ पर जिज्ञासा और विस्मय है। उपनिषद प्रतीक और संवाद के माध्यम से चिंतन करते हैं। मूल्य की दृष्टि से ऋत, सत्य और बाद में विकसित अद्वैत-चिंतन भारतीय धर्म और काव्य दोनों की भूमि बने। सामाजिक पृष्ठभूमि यज्ञ-केंद्रित है, किंतु अथर्ववेद में लोक-जीवन स्पष्ट है। आचार्य नगेन्द्र वैदिक वाङ्मय को समेकित भारतीय साहित्य की पहली परत कहते हैं; हिन्दी उसी महादेश की एक शाखा है, पूरा वृक्ष नहीं।

हिन्दी से वैदिक वाङ्मय का संबंध भाषा-वंश का कम और चिंतन-वंश का अधिक है। निर्गुण संत-काव्य का एक राम उपनिषदीय अद्वैत का शब्दशः अनुवाद नहीं है, पर दोनों भारतीय चिंतन की एक लंबी रेखा पर खड़े हैं। रामायण और महाभारत स्मृति हैं, श्रुति नहीं; फिर भी उनकी मर्यादा वैदिक मूल्य-संसार से जुड़ी है। भक्तिकाल में कबीर की वेद-आलोचना और तुलसी की वैदिक-पुराण मर्यादा — दोनों का संदर्भ यही प्राचीन परत है। प्राकृत-अपभ्रंश भाषा का पुल हैं; वेद चिंतन का स्रोत है। गलत वाक्य यह है कि हिन्दी वैदिक संस्कृत से सीधी निकली; सही वाक्य यह है कि हिन्दी उसी जड़ से निकली एक उत्तर-भारतीय शाखा है।

निष्कर्ष यह है कि वैदिक साहित्य केवल पुरोहिती कर्मकांड नहीं, भारतीय काव्य और चिंतन की जड़ है। चार वेद, चार स्तर, प्रमुख उपनिषद, वेदांग और हिन्दी से यह चिंतन-संबंध वैदिक परिचय के स्थायी बिंदु हैं। परीक्षा-उत्तर में श्रुति-स्मृति का भेद और उपनिषद के दो संवाद बिना रटे पूरे नहीं होते।

3. प्राकृत और पालि साहित्य में अंतर स्पष्ट कीजिए। दोनों का हिन्दी के लिए महत्त्व लिखिए।8 अंक

पालि और प्राकृत दोनों संस्कृत से भिन्न जन-साहित्य की भाषाएँ हैं, किंतु स्वरूप और प्रयोजन अलग हैं। पालि थेरवाद बौद्ध संघ की साहित्यिक भाषा है। त्रिपिटक — विनय, सुत्त और अभिधम्म — तथा धम्मपद, सुत्तनिपात, जातक और थेरीगाथा इसी में रचे गए। यह मुख्यतः धर्म-उपदेश और संघ-आचार का वाङ्मय है। प्राकृत एक भाषा नहीं, कई रूपों का समूह है — महाराष्ट्री में हाल की गाथासप्तशती, शौरसेनी नाट्य-गद्य में, मागधी पूर्वी क्षेत्र से जुड़ी, अर्धमागधी जैन आगम की भाषा मानी जाती है। इसमें धर्म के साथ लौकिक प्रेम-गाथा, प्रवरसेन का सेतुबंध और नाटक का संवाद भी मिलता है।

हिन्दी के विकास में प्राकृत भाषा-वंश की कड़ी है। प्राकृत से अपभ्रंश और अपभ्रंश से पुरानी हिन्दी बनी। दोहा-चौपाई और लोक-काव्य की भूमि यहीं तैयार हुई। पालि भाषा-वंश नहीं, भाव-वंश है। अहिंसा, करुणा और तृष्णा के क्षय का स्वर बाद के संत-काव्य में गूँजता है। गलत वाक्य यह है कि कबीर पालि से निकले; सही वाक्य यह है कि श्रमण धारा संवेदना देती है और प्राकृत-अपभ्रंश भाषा का पुल बनते हैं।

निष्कर्ष यह है कि पालि संघ और भाव का वाङ्मय है, प्राकृत भाषा और लोक-काव्य का पुल। हिन्दी प्राकृत-अपभ्रंश से बनती है; संत-संवेदना श्रमण धारा से भी सींचित होती है।

4. अपभ्रंश साहित्य की विशेषताएँ लिखकर हिन्दी आदिकाल से उसका संबंध स्पष्ट कीजिए।8 अंक

अपभ्रंश प्राकृत के बाद की भाषा-अवस्था है और पुरानी हिन्दी का निकटतम रूप है। हेमचंद्र जैसे वैयाकरणों ने इसे व्याकरणबद्ध किया। काव्य में दोहा, चौपाई और पज्झटिका यहीं स्थिर हुए, जो आगे हिन्दी के प्रधान छंद बने। विषय की तीन धाराएँ स्पष्ट हैं — जैन चरित-काव्य, सिद्ध-नाथ वाणी तथा लौकिक प्रेम और दूत-काव्य। स्वयंभू का पउमचरिउ जैन राम-कथा है। पुष्पदंत पुराण-काव्य से जुड़े। धनपाल की भविसयत्तकहा कथा-काव्य है। अद्दहमाण का संदेशरासक विरह-प्रधान दूत-काव्य है, जो मेघदूत की परंपरा और हिन्दी विरह-काव्य के बीच सेतु है।

हिन्दी आदिकाल से संबंध भाषा, छंद और विषय तीनों स्तरों पर है। रासो शैली, संत-दोहे और प्रेमाख्यान की भूमि अपभ्रंश में दिखाई देती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल आदिकाल को वीरगाथाकाल कहकर रासो पर बल देते हैं, जबकि आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी अपभ्रंश, जैन, नाथ और लोक को आदिकाल की वास्तविक चौड़ाई मानते हैं। सिद्धों की वाणी आगे निर्गुण दोहे की पृष्ठभूमि बनती है। बिना इस कड़ी के आदिकाल केवल चारण-सूची रह जाता है।

निष्कर्ष यह है कि अपभ्रंश संक्रमण की बोली मात्र नहीं, आदिकाल की कुंजी है। भाषा, छंद और विषय तीनों यहीं से हिन्दी में उतरते हैं।

5. लौकिक संस्कृत साहित्य का परिचय देते हुए हिन्दी से उसका संबंध लिखिए।8 अंक

लौकिक संस्कृत वह साहित्य है जो वेद-श्रुति से इतर इतिहास, महाकाव्य, नाटक और गद्य में रचा गया। वाल्मीकि रामायण आदिकाव्य मानी जाती है तथा व्यास का महाभारत धर्म, राज्य और जीवन-संघर्ष का महाकोश है; गीता भीष्म पर्व में है। इन्हीं कथाओं से हिन्दी का रामकाव्य, कृष्णकाव्य और बहुत-सा प्रेमाख्यान फलता है। महाकाव्य-नाटक में अश्वघोष, भास, कालिदास — अभिज्ञानशाकुंतलम्, मेघदूत, रघुवंश, कुमारसंभव — तथा भवभूति की उत्तररामचरित प्रमुख हैं। गद्य में बाणभट्ट का हर्षचरित और कादंबरी तथा दंडी का दशकुमारचरित आदर्श रहे। भरतमुनि का नाट्यशास्त्र रस-सूत्र प्रस्तुत करता है, जो आगे हिन्दी काव्यशास्त्र की जड़ बना।

हिन्दी से संबंध विषय, मिथक और शास्त्र का है, बोलचाल की भाषा का नहीं। राम-कथा और कृष्ण-कथा संस्कृत परंपरा से आती हैं, पर देशी काव्य की जीभ अपभ्रंश-लोक से बनती है। जायसी का प्रेमाख्यान भारतीय कथा-रूढ़ि और सूफी संवेदना का मेल है। मेघदूत का दूत-विधान संदेशरासक और हिन्दी विरह-काव्य तक जाता है। पुराणों ने कथा को बार-बार नया रूप दिया।

निष्कर्ष यह है कि लौकिक संस्कृत हिन्दी को कथा, मिथक और रस देती है; प्राकृत-अपभ्रंश उसे भाषा देते हैं। दोनों कड़ियाँ अलग काम करती हैं, एक-दूसरे का स्थान नहीं लेतीं।

6. तमिल संगम साहित्य की विशेषताएँ लिखिए। पाठ्यक्रम में इसे क्यों रखा गया है?8 अंक

संगम तमिल का प्राचीन काव्य-युग है। परंपरा तीन संगमों की कथा कहती है; परीक्षा के लिए अकम् और पुरम् का विभाजन पक्का है। अकम् प्रेम, प्रतीक्षा और मिलन का आंतरिक काव्य है। पाँच तिणै भाव को भूगोल से बाँधते हैं — कुरिंजि पर्वत, मुल्लै वन, मरुतम् खेत, नेय्तल समुद्र-तट और पालै बंजर प्रदेश। पुरम् युद्ध, दान, राजकीर्ति और वीर-मृत्यु का सार्वजनिक काव्य है। एत्तुतोकै तथा पत्तुपाट्टु प्रमुख संग्रह माने जाते हैं। तोल्कप्पियम् व्याकरण और काव्य-रीति दोनों है। तिरुवल्लुवर का तिरुक्कुरल धर्म, अर्थ और काम की संक्षिप्त नीति है। बाद में आलवार विष्णु-भक्ति और नायनार शिव-भक्ति द्रविड़ भाषा में वही अखिल भारतीय भक्ति चलाते हैं जो उत्तर में भक्तिकाल कहलाती है।

पत्र में तमिल इसलिए है कि भारतीय साहित्य परंपरा को केवल हिन्दी या संस्कृत तक सीमित न माना जाए। तमिल हिन्दी की जननी नहीं, स्वतंत्र द्रविड़ केंद्र है। आचार्य नगेन्द्र की समेकित दृष्टि के अनुसार भारतीय साहित्य कई केंद्रों वाला है। गलत वाक्य यह है कि हिन्दी तमिल से निकली।

निष्कर्ष यह है कि संगम साहित्य अकम्-पुरम्, तिणै और तिरुक्कुरल से पहचाना जाता है। इसे रखने का अर्थ विविधता का प्रमाण है, हिन्दी का पूर्वज घोषित करना नहीं।

7. साहित्येतिहास-दर्शन से क्या अभिप्राय है? उदाहरण सहित समझाइए।8 अंक

साहित्येतिहास-दर्शन से अभिप्राय उस सिद्धांत से है जिसके आधार पर साहित्य का काल-विभाजन, चयन और मूल्यांकन किया जाता है। इतिहासकार यह निश्चय करता है कि रचना को युग की परिस्थिति से देखा जाए या संवेदना से; केंद्र में राज्याश्रय हो या लोक; संस्कृत-मार्गी ग्रंथ ही मुख्य धारा हों अथवा जैन, बौद्ध और नाथ साहित्य भी समकक्ष माने जाएँ। तटस्थ दर्पण संभव है या इतिहासकार की दृष्टि स्वयं अर्थ बदल देती है — इन्हीं प्रश्नों का समुच्चय इतिहास-दर्शन है।

उदाहरण स्पष्ट हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल परिस्थिति से प्रवृत्ति निकालते हैं और आदिकाल को वीरगाथाकाल कहते हैं, जिससे रासो केंद्र में आ जाता है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी उसी काल को सिद्ध, नाथ, जैन, अपभ्रंश और लोक की निरंतरता में पढ़ते हैं, जिससे भक्ति अचानक चमत्कार नहीं रहती। डॉ. नगेन्द्र हिन्दी को भारतीय समेकित क्षितिज पर रखते हैं तथा डॉ. बच्चन सिंह शुक्ल-केंद्रित ढाँचे की समीक्षा कर दूसरा इतिहास प्रस्तुत करते हैं। एक ही सामग्री पर भिन्न प्रश्न भिन्न इतिहास बनाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि साहित्येतिहास तथ्यों की सूची नहीं, चयन और दृष्टि का परिणाम है। शुक्ल स्पष्टता देते हैं, द्विवेदी चौड़ाई; दोनों को साथ रखने पर दर्शन समझ में आता है।

8. हिन्दी साहित्येतिहास लेखन की परंपरा का विकास लिखिए।20 अंक

हिन्दी साहित्येतिहास का लेखन क्रमिक विकास का परिणाम है। प्रारंभिक प्रयास सूची और परिचय के रूप में हुए। गार्सा द तासी ने यूरोप को हिन्दुस्तानी साहित्य से परिचित कराया। शिवसिंह सेंगर का शिवसिंह सरोज कवि-वृत्त प्रधान ग्रंथ है। जॉर्ज ग्रियर्सन का भाषा-सर्वेक्षण भाषाओं के वर्गीकरण के लिए महत्त्वपूर्ण है, किंतु प्रवृत्ति और मूल्यांकन का इतिहास नहीं। मिश्रबंधु-विनोद ने कवियों और ग्रंथों का विशाल विवरण प्रस्तुत किया। सामग्री बढ़ी, पर वैज्ञानिक काल-प्रवृत्ति विन्यास अभी दुर्बल रहा।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का हिन्दी साहित्य का इतिहास नागरीप्रचारिणी सभा से प्रकाशित आधुनिक हिन्दी साहित्येतिहास का केंद्र-ग्रंथ है। उनकी विधि यह है कि युग की सामाजिक-धार्मिक परिस्थिति से साहित्य की प्रवृत्ति निकले और वह प्रतिनिधि रचना से सिद्ध हो। उन्होंने आदिकाल को वीरगाथाकाल, भक्तिकाल को हिन्दी का उत्कर्ष, रीतिकाल को दरबारी श्रृंगार तथा आधुनिक काल को गद्य और नई चेतना से जोड़ा। इस ग्रंथ की विशेषताएँ हैं — स्पष्ट कालखंड, पठनीय विवेचन और व्यवस्थित ढाँचा। सीमाएँ भी हैं — लोक, जैन और सिद्ध धारा अपेक्षाकृत पतली रह जाती है तथा पृथ्वीराज रासो पर प्रमाण का भार अधिक है। रीति के कला-मूल्य पर शुक्ल की दृष्टि कठोर रही।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी साहित्य की भूमिका और हिन्दी साहित्य का आदिकाल लिखकर इस ढाँचे की छूटी धाराएँ जोड़ीं। उनके यहाँ आदिकाल केवल चारण-वीरगाथा नहीं; सिद्ध, नाथ, जैन, अपभ्रंश और लोक-संस्कृति मुख्य हैं। भक्ति अचानक आंदोलन नहीं, भारतीय साधना की दीर्घ निरंतरता है। यह शुक्ल का निषेध नहीं, विस्तार है। डॉ. नगेन्द्र ने इतिहास का संपादन कर हिन्दी को भारतीय साहित्य के समेकित क्षितिज पर रखा। डॉ. बच्चन सिंह का हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास शुक्ल-केंद्रित आख्यान की समीक्षा है। डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी संवेदना के विकास से साहित्य पढ़ते हैं। रामकुमार वर्मा तथा गणपतिचंद्र गुप्त आगे की कड़ियाँ हैं।

इस विकास को तीन मोड़ों में देखा जा सकता है। पहला मोड़ संग्रह का है — नाम, ग्रंथ और भाषा-रेखा। दूसरा मोड़ शुक्ल का है — कारण, प्रवृत्ति और मूल्यांकन। तीसरा मोड़ द्विवेदी से बच्चन सिंह तक है — हाशिए की धारा, प्रामाणिकता का प्रश्न और बहु-दृष्टि का स्वीकार। नगेन्द्र का समेकन इन मोड़ों को भारतीय क्षितिज से बाँधता है, तभी वैदिक और तमिल एक साथ इस इकाई में आते हैं। रामकुमार वर्मा नाम देते हैं, गणपतिचंद्र गुप्त विन्यास; दोनों शुक्ल के बाद की कड़ी हैं।

निष्कर्ष यह है कि हिन्दी साहित्येतिहास बहसों की शृंखला है। शुक्ल ढाँचा देते हैं, द्विवेदी चौड़ाई, नगेन्द्र भारतीय संदर्भ और बच्चन सिंह आलोचनात्मक विवेक। नया लेखक पुराने को रद्द नहीं करता, उसे जाँचता और पूरा करता है। इतिहास एक बार लिखकर समाप्त नहीं होता; वह पुनः लिखा जाता है।

9. आचार्य शुक्ल और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की इतिहास-दृष्टि का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।20 अंक

आधुनिक हिन्दी साहित्येतिहास के दो प्रमुख स्तंभ आचार्य रामचंद्र शुक्ल और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी हैं। दोनों आदिकाल, भक्ति और हिन्दी की जड़ों पर विचार करते हैं, किंतु प्रश्न भिन्न पूछते हैं। शुक्ल का केंद्र-ग्रंथ हिन्दी साहित्य का इतिहास है, नागरीप्रचारिणी सभा से प्रकाशित। द्विवेदी के केंद्र-ग्रंथ हिन्दी साहित्य की भूमिका और हिन्दी साहित्य का आदिकाल हैं। तुलना विरोध के नाटक से नहीं, पूरकता से पूरी होती है।

शुक्ल की विधि परिस्थिति, प्रवृत्ति और रचना की है। युग के समाज और धर्म से साहित्य की मुख्य प्रवृत्ति निकाली जाती है, फिर वह प्रतिनिधि कवि से सिद्ध होती है। आदिकाल को उन्होंने वीरगाथाकाल कहा; सीमा लगभग संवत् 1050–1375। चारण और रासो केंद्र में आए। भक्तिकाल उनके यहाँ हिन्दी का उत्कर्ष है। रीतिकाल दरबार, श्रृंगार और लक्षण-ग्रंथों की ओर मुड़ता दिखाई देता है। आधुनिक काल गद्य और नई चेतना का युग है। यह ढाँचा स्पष्ट और व्यवस्थित है। इसकी सीमा यह है कि जो वस्तु वीरगाथा में नहीं समाती — सिद्ध, नाथ, जैन, विस्तृत अपभ्रंश और लोक — वह हाशिए पर चली जाती है। पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता विवादित रही, फिर भी युग का नाम बहुत अंशों में उसी पर टिका। रीति के कला-विवेक पर शुक्ल कठोर रहे।

द्विवेदी उसी काल को दूसरी दृष्टि से देखते हैं। हिन्दी उनके लिए केवल राज्याश्रय और संस्कृत-मार्गी ऊँचाई नहीं; वह लोक, श्रमण परंपरा, सिद्ध-नाथ और अपभ्रंश की निरंतरता है। आदिकाल वीरगाथा मात्र नहीं, सांस्कृतिक संधि-काल है जिसमें अनेक धाराएँ मिलती हैं। भक्ति तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी का अचानक चमत्कार नहीं, भारतीय साधना और लोक-धर्म की दीर्घ तैयारी का फल है। कबीर इसी चौड़े संदर्भ में समझे जाते हैं। रामकुमार वर्मा जैसे इतिहासकार युग का तटस्थ नाम आदिकाल रखना चाहते हैं, ताकि एक रस पूरे युग पर न चढ़े। द्विवेदी शुक्ल को रद्द नहीं करते; वे यह पूछते हैं कि प्रवृत्ति चुनते समय किन ग्रंथों को मुख्य कहा गया।

तुलना के चार आधार स्पष्ट हैं। आदिकाल की परिभाषा में शुक्ल वीरगाथा देखते हैं, द्विवेदी बहुधारा संधि। स्रोत में शुक्ल रासो-केंद्रित हैं, द्विवेदी अपभ्रंश-जैन-नाथ-लोक केंद्रित। भक्ति शुक्ल के यहाँ उत्कर्ष-युग है, द्विवेदी के यहाँ निरंतरता का फल। विधि में शुक्ल कारण-कार्य और प्रवृत्ति पर चलते हैं, द्विवेदी संस्कृति-चिंतन की व्यापक जड़ पर। शैली में शुक्ल निबंधकार-आलोचक हैं, द्विवेदी संस्कृति-व्याख्याता। सीमाएँ उलटी दिशा की हैं — शुक्ल संकीर्ण किंतु स्पष्ट, द्विवेदी व्यापक किंतु कभी सांस्कृतिक विस्तार में अधिक।

निष्कर्ष यह है कि दोनों दृष्टियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं। शुक्ल काल-बोध और प्रवृत्ति देते हैं, द्विवेदी परंपरा की चौड़ाई। एक दृष्टि इतिहास को कुछ दिखाती है और कुछ छिपाती है। संपूर्ण बोध दोनों को साथ रखने से संभव होता है।

10. हिन्दी साहित्येतिहास लेखन की प्रमुख समस्याएँ लिखिए।20 अंक

हिन्दी साहित्येतिहास केवल तथ्यों की पंक्ति नहीं। प्रत्येक पंक्ति एक निर्णय है, इसलिए समस्याएँ तकनीकी भी हैं और दार्शनिक भी। पहली समस्या काल-विभाजन की है। आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल अध्ययन की सुविधा हैं। साहित्य उस तिथि की सुबह पटरी नहीं बदलता। शुक्ल ने आदिकाल की सीमा लगभग संवत् 1050 से 1375 मानी; ये संकेत हैं, दीवार नहीं। विद्यापति और अमीर खुसरो जैसे संधि-कवि दो खंडों में बँट जाते हैं। इकाई 1 का भारतीय वाङ्मय-संदर्भ याद रहे — हिन्दी अकेली नहीं, पर इतिहास लिखते समय उसे काट कर बाँधना पड़ता है।

दूसरी समस्या नामकरण की है। एक ही प्रारंभिक युग आदिकाल, वीरगाथाकाल, चारण-काल और सिद्ध-नाथ काल कहलाता है। नाम दृष्टि बताता है। वीरगाथाकाल कहने पर रासो केंद्र में आता है, सिद्ध-नाथ कहने पर योग-वाणी, आदिकाल कहने पर लेबल तटस्थ किंतु अस्पष्ट रह जाता है। तीसरी समस्या प्रामाणिकता की है। पृथ्वीराज रासो की तिथि, रचना-स्तर और प्रक्षेप लंबे विवाद के विषय रहे हैं। इतिहास ग्रंथ पर टिकता है; ग्रंथ संदिग्ध हो तो युग-चित्र डगमगाता है। चौथी समस्या सामग्री की है — पांडुलिपि, संपादन और खोए ग्रंथ। पूरे युग का दावा अधूरी सामग्री पर होता है। कबीर की वाणी भी पंथ-संकलन में प्रक्षिप्त हो सकती है; इतिहासकार किस पाठ को प्रतिनिधि माने, यही प्रश्न है।

पाँचवीं समस्या भाषा-रेखा की है। अपभ्रंश कहाँ समाप्त होती है और पुरानी हिन्दी कहाँ आरंभ होती है, इस पर पूर्ण सहमति नहीं। रेखा शीघ्र खींचने पर पउमचरिउ और संदेशरासक बाहर हो जाते हैं; देर तक अपभ्रंश कहने पर आदिकाल पतला पड़ जाता है। छठी समस्या दृष्टि की है। राज्याश्रय, पुरुष कवि और संस्कृत-मार्गी मानदंड से लोक, स्त्री-वाणी तथा जैन-बौद्ध-नाथ धारा छूट सकती है। द्विवेदी की आपत्ति शुक्ल-धारा से इसी बिंदु पर थी। तमिल संगम और आलवार-नायनार बिना रखे भक्ति का अखिल भारतीय स्वरूप अधूरा रहता है, पर हिन्दी-इतिहास उन्हें गौण भी कर सकता है।

सातवीं समस्या इतिहासकार के रंग की है। भक्ति को शिखर मानने पर रीति स्वतः पतन की कथा बन जाती है, जबकि कला-मूल्य से रीति समृद्धि भी दिखाई दे सकती है। आधुनिक काल को केवल प्रगति कहना भी एक रंग है। गार्सा द तासी और ग्रियर्सन की दृष्टि भाषा-वर्गीकरण में तीव्र थी, मूल्यांकन में बाहरी आँख रही। मिश्रबंधु-विनोद विशाल है, प्रवृत्ति-विधि दुर्बल। नगेन्द्र समेकित भारतीय साहित्य की माँग करते हैं; बच्चन सिंह शुक्ल-केंद्रित आख्यान की समीक्षा करते हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी संवेदना से पढ़ते हैं। ये नाम समस्याएँ नहीं, समस्या के उत्तर की दिशा हैं।

निष्कर्ष यह है कि समाधान एक अंतिम ग्रंथ नहीं, बहु-दृष्टि है। शुक्ल से ढाँचा, द्विवेदी से चौड़ाई, नगेन्द्र से भारतीय संदर्भ और बच्चन सिंह से पुनर्लेखन का विवेक ग्रहण करना आवश्यक है। प्रत्येक दावे पर ग्रंथ की प्रामाणिकता जाँचनी होती है। साहित्येतिहास एक पुस्तक नहीं, बहसों की शृंखला है; परीक्षक समस्या के नाम के साथ एक उदाहरण और एक हल दोनों माँगता है।

11. आदिकाल के नामकरण की समस्या पर प्रकाश डालिए।8 अंक

हिन्दी साहित्य के प्रथम युग को एक सर्वस्वीकृत नाम नहीं मिला। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे वीरगाथाकाल कहा। आधार चारणों का रासो-काव्य और वीर रस है; पृथ्वीराज रासो इस दृष्टि का केंद्र रहा। मिश्रबंधु आदि चारणकाल कहते हैं, जो राज्याश्रय पर बल देता है। आचार्य रामकुमार वर्मा तथा बाद के अनेक इतिहासकार आदिकाल नाम को अधिक उपयुक्त मानते हैं, क्योंकि यह युग केवल वीरगाथा नहीं। नाम दृष्टि बताता है। वीरगाथाकाल कहने पर रासो केंद्र में आता है; चारणकाल कहने पर दरबार।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी सिद्ध, नाथ, जैन और अपभ्रंश-लोक को इस युग की मुख्य धारा मानते हैं। उनके विवेचन में वीरगाथा एक अंग है, पूरा युग नहीं। सिद्ध-नाथ काल जैसी संज्ञाएँ योग-वाणी को केंद्र में लाती हैं। प्रत्येक नाम एक धारा चुनता है और दूसरी को हाशिए पर धकेलता है। रासो की प्रामाणिकता विवादित हो तो वीरगाथाकाल का आधार काँपता है। अपेक्षाकृत तटस्थ संज्ञा आदिकाल है, बशर्ते उसके भीतर रासो और सिद्ध-नाथ दोनों रखे जाएँ।

निष्कर्ष यह है कि नामकरण की समस्या एक शब्द की नहीं, दृष्टि की है। परीक्षा में शुक्ल और द्विवेदी दोनों का तर्क साथ रखना पड़ता है; केवल एक नाम रटना पर्याप्त नहीं।

12. आदिकाल की परिस्थितियों और सीमांकन का परिचय दीजिए।8 अंक

आदिकाल की राजनीतिक परिस्थिति राजपूत राज्यों, पारस्परिक संघर्ष और तुर्क-आक्रमणों की है। शासन अस्थिर रहा, युद्ध सामान्य हुआ, चारण राजा की कीर्ति गाते रहे। सामाजिक दृष्टि से वर्ण-व्यवस्था कठोर थी और नारी की स्थिति संकुचित रही। धार्मिक दृष्टि से ब्राह्मण-कर्मकांड के साथ नाथ, सिद्ध, जैन धाराएँ और इस्लाम का प्रवेश एक साथ दिखता है। साहित्यिक दृष्टि से अपभ्रंश से पुरानी हिन्दी का संक्रमण है; डिंगल, पिंगल और देशी छंद साथ-साथ चलते हैं। ये परिस्थितियाँ शुक्ल को वीर रस तक ले जाती हैं; द्विवेदी इन्हीं में लोक-श्रमण वाणी भी देखते हैं।

शुक्ल ने सीमा लगभग संवत् 1050 से 1375 मानी है, जो ईस्वी 993–1318 के आसपास बैठती है। भक्तिकाल उनके यहाँ इसके बाद आता है। ये तिथियाँ सुविधा हैं, दीवार नहीं। आरंभ अपभ्रंश और आरंभिक रासो से जोड़ा जाता है; अंत भक्ति के उदय की संधि पर विवादित रहता है। विद्यापति और अमीर खुसरो संधि-रेखा के कवि हैं। भाषा, विषय और शासन एक दिन में नहीं बदलते।

निष्कर्ष यह है कि आदिकाल की परिस्थितियाँ युद्ध, वर्ण और भाषा-संक्रमण की हैं, सीमांकन अध्ययन की सुविधा है। कालखंड कवि की जीवनी नहीं, पढ़ने का ढाँचा है।

13. आदिकाल के प्रमुख कवि और रचनाओं का परिचय दीजिए।8 अंक

आदिकाल एक धारा नहीं, कई धाराओं का युग है। सिद्धों में सरहपा, शबरपा की सहज-वाणी है — गुरु, काया-साधना, कर्मकांड की आलोचना। नाथों में गोरखनाथ हठयोग, षट्चक्र और लोक-भाषा के केंद्र हैं। जैन कवियों ने अपभ्रंश में चरित-काव्य लिखे; स्वयंभू का पउमचरिउ जैन राम-कथा है। ये तीन धाराएँ द्विवेदी की आदिकाल-दृष्टि का आधार हैं। रासो-परंपरा चारण-काव्य है। पृथ्वीराज रासो चंदबरदाई से, बीसलदेव रासो नरपति नाल्ह से, परमाल रासो जगनिक से, खुमाण रासो दलपति विजय से और हम्मीर रासो शारंगधर से जोड़ा जाता है। ढोला मारू रा दूहा राजस्थानी प्रेम-कथा है।

विद्यापति मैथिल कोकिल हैं — राधा-कृष्ण शृंगार, अवहट्ठ और मैथिली। अमीर खुसरो हिन्दवी गीत, पहेली और मुकरी के लिए स्मरणीय हैं। आदिकाल की पहचान यही है कि दरबारी वीरगाथा और लोक-श्रमण वाणी एक ही समय में चलती हैं। शुक्ल पहले स्तंभ पर बल देते हैं, द्विवेदी दूसरे पर। दोनों स्तंभों के बिना कवि-सूची अधूरी रहती है।

निष्कर्ष यह है कि आदिकाल के कवि रासो, सिद्ध-नाथ-जैन और संधि-रेखा — विद्यापति, खुसरो, ढोला मारू — तीन पंक्तियों में बैठते हैं। एक पंक्ति छोड़ने पर युग संकीर्ण हो जाता है।

14. आदिकाल की प्रवृत्तियाँ और उपलब्धियाँ लिखिए।8 अंक

आदिकाल की प्रधान प्रवृत्ति वीर रस मानी गई है — युद्ध, अतिशयोक्ति, राजप्रशस्ति, अश्व-वर्णन और युद्ध-भूमि का चित्र। शृंगार विद्यापति, ढोला मारू और कुछ रासो-अंशों में स्पष्ट है। ऐतिहासिक-आख्यान रासो की पहचान है। भाषा अपभ्रंश, डिंगल, पुरानी राजस्थानी और अवहट्ठ का मिश्रण दिखाती है। राज्याश्रय चारण-काव्य का आधार है। सिद्ध-नाथ धारा इसके विपरीत गुरु, देह-योग और रूढ़ि-खंडन की भाषा बोलती है। जैन चरित-काव्य अपभ्रंश में पुराण-कथा कहते हैं। दो शैलियाँ एक शताब्दी में हैं — दरबारी वीरगाथा और लोक-श्रमण वाणी।

उपलब्धि भाषा के स्तर पर अपभ्रंश से हिन्दी की ओर संक्रमण और दोहा-चौपाई की स्थिरता है। विषय के स्तर पर वीर, शृंगार और योग का साथ-साथ विकास है। परंपरा के स्तर पर भक्तिकाल के संत-दोहे और राम-कृष्ण काव्य दोनों को भूमि मिलती है। सीमा प्रामाणिक पाठों की कमी, प्रक्षेप और राज्याश्रय की अतिशयोक्ति है। स्त्री-लोक स्वर अपेक्षाकृत पतला रहा, किंतु ढोला मारू उसे घर की जीभ देता है।

निष्कर्ष यह है कि आदिकाल की प्रवृत्तियाँ वीर-शृंगार-योग की हैं और उपलब्धि भाषा-संक्रमण है। युग अधूरा और विवादित है, पर हिन्दी का आरंभ अपरिहार्य है।

15. भक्तिकाल की परिस्थितियों का वर्णन कीजिए।8 अंक

भक्तिकाल हिन्दी साहित्य का उत्कर्ष माना जाता है। राजनीतिक दृष्टि से उत्तर भारत में सल्तनत और बाद में मुगल सत्ता स्थिर हो रही थी। युद्ध और प्रशासन के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी बढ़ा। सामाजिक दृष्टि से जाति-पाँति, कर्मकांड और ऊँच-नीच का दबाव जनता पर था। धार्मिक दृष्टि से इस्लाम का स्थायी संपर्क, सूफी खानकाहें और हिन्दू साधना की पुरानी धाराएँ एक साथ सक्रिय थीं। साहित्यिक दृष्टि से देशी भाषा अब केवल चारण की नहीं, संत, सूफी और सगुण भक्त की भाषा बनी। भक्ति राजसभा से निकलकर घर, घाट और पंथ में उतरती है।

यह केवल काव्य-प्रवृत्ति नहीं, सामाजिक-धार्मिक आंदोलन है। कबीर जुलाहा हैं, रैदास चमार माने जाते हैं, जायसी सूफी हैं; सगुण पंक्ति में रामानंदी और पुष्टिमार्गी भक्त भी उसी युग के हैं। इतनी सामाजिक चौड़ाई आदिकाल के चारण-केंद्र से भिन्न है। शुक्ल इसे हिन्दी का हृदय कहते हैं। द्विवेदी इसे अचानक चमत्कार नहीं, सिद्ध-नाथ-जैन और दक्षिण भक्ति की लंबी तैयारी का फल मानते हैं। रामानंद ने राम-नाम का द्वार लोक के लिए खोला।

निष्कर्ष यह है कि भक्तिकाल की परिस्थितियाँ सत्ता-संपर्क, जाति-दबाव और देशी भाषा की हैं। आंदोलन और परिस्थिति साथ रखने पर ही यह उत्कर्ष समझ में आता है।

16. भक्तिकाल के दार्शनिक आधार स्पष्ट कीजिए।8 अंक

सगुण भक्ति आचार्य-संप्रदायों से जुड़ी है। शंकर का अद्वैत निर्गुण चिंतन को दार्शनिक भाषा देता है, यद्यपि सगुण भक्त उसे ज्यों का त्यों नहीं दोहराते। रामानुज का विशिष्टाद्वैत राम-भक्ति की भूमि बना; रामानंद उसे उत्तर भारत के लोक तक ले गए। वल्लभ का शुद्धाद्वैत और पुष्टिमार्ग कृष्ण-भक्ति से जुड़े; सूर और अष्टछाप इसी मार्ग के कवि हैं। मध्व का द्वैत, निंबार्क का द्वैताद्वैत तथा चैतन्य का अचिंत्य भेदाभेद कृष्ण-भक्ति की अन्य शाखाएँ हैं। ये सूत्र सगुण काव्य को शास्त्र से बाँधते हैं, पर काव्य शास्त्र का अनुवाद नहीं रहता।

निर्गुण संत-काव्य शास्त्र से अधिक अनुभव, गुरु और सहज साधना पर टिकता है। कबीर में अद्वैत की गूँज जुलाहे की भाषा में उतरती है; वह वेद-पुराण की बाहरी सत्ता से अधिक नाम और अनुभव पर चलता है। सूफी प्रेमाख्यान इश्क, पीर, विरह और फना के रूपक से ईश्वर-प्रेम कहता है; जायसी पद्मावत में यही भूमि भारतीय कथा से मिलती है। भक्तिकाल दर्शन का लोक-रूप है। कई सूत्र एक युग में गुँथे हैं — यही विशेषता है।

निष्कर्ष यह है कि भक्तिकाल का दार्शनिक आधार एक मत नहीं, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, पुष्टि और सूफी इश्क का गुच्छा है। निर्गुण और सगुण दो रास्ते हैं, दो धर्म नहीं।

17. भक्तिकाल का वर्गीकरण और प्रमुख प्रवृत्तियाँ लिखिए।8 अंक

आचार्य शुक्ल का प्रचलित वर्गीकरण दो खंडों में है — निर्गुण और सगुण। निर्गुण के दो उपखंड हैं: ज्ञानाश्रयी संत-काव्य — कबीर, नानक, दादू, रैदास — और प्रेमाश्रयी सूफी-काव्य — कुतुबन, मंझन, जायसी। सगुण के दो उपखंड हैं: रामभक्ति जिसमें तुलसीदास प्रधान हैं, और कृष्णभक्ति जिसमें सूर, मीरा तथा अष्टछाप आते हैं। मीरा कृष्ण-भक्ति में हैं, पर उनकी वाणी लोक और विद्रोह दोनों छूती है। यह वर्गीकरण अध्ययन के लिए उपयोगी है। कवि की पूरी सत्ता एक खाने में नहीं समाती; कबीर में प्रेम भी है, तुलसी में ज्ञान भी।

प्रवृत्तियों में ईश्वर-प्रेम केंद्र है — सगुण साकार लीला के रूप में, निर्गुण नाम और अनुभव के रूप में। लोकभाषा का उत्कर्ष हुआ; संस्कृत का आग्रह टूटा। गुरु-महिमा संत और सूफी दोनों में है। रूढ़ि, आडंबर और जाति-अभिमान का खंडन निर्गुण धारा की पहचान है। रामकाव्य मर्यादा और लोकसंग्रह गाता है। सूर वात्सल्य और माधुर्य से कृष्ण-लीला को घर में उतारते हैं। सूफी प्रेमाख्यान विरह और रहस्य से ईश्वर कहते हैं। संगीत, पद और दोहा प्रचार के वाहन बने।

निष्कर्ष यह है कि भक्तिकाल का वर्गीकरण निर्गुण-सगुण और चार उपधाराओं का है, प्रवृत्ति जन-भाषा और ईश्वर-प्रेम की है। खाने सुविधा हैं, कवि की सत्ता उनसे बड़ी है।

18. भक्ति आंदोलन के अखिल भारतीय स्वरूप पर प्रकाश डालिए।8 अंक

भक्ति केवल हिन्दी क्षेत्र की घटना नहीं। दक्षिण में आलवार विष्णु-भक्त और नायनार शिव-भक्त तमिल में वही भक्ति गाते हैं; भाषा द्रविड़ है, आंदोलन भक्ति का। कर्नाटक में बसवन्ना और वीरशैव धारा है। महाराष्ट्र में ज्ञानेश्वर, नामदेव और तुकाराम वारकरी पंथ की जड़ हैं। बंगाल में चैतन्य कृष्ण-भक्ति को कीर्तन बनाते हैं। पंजाब में गुरु नानक निर्गुण-संत भूमि और सिख पंथ दोनों से जुड़े। कश्मीर में लल्लद्यद की वाख परंपरा है। गुजरात में नरसी मेहता कृष्ण-भक्ति गाते हैं। राजस्थान में मीरा उसी लहर की कड़ी हैं।

अखिल भारतीय स्वरूप का अर्थ एक भाषा नहीं, एक प्रवृत्ति है — ईश्वर से सीधा संबंध, लोकभाषा, जाति-बंधन का दबाव तोड़ना या उसे भक्ति में ढालना, और संगीत। संगम के बाद आलवार-नायनार यही अर्थ पूरा करते हैं। हिन्दी भक्तिकाल इस महादेशीय लहर की उत्तर भारतीय अभिव्यक्ति है, उसका एकमात्र स्रोत नहीं। कबीर, जायसी और सगुण शिखर इसी लहर के हिन्दी रूप हैं। भक्ति को केवल काशी-ब्रज की घटना मानना इतिहास को संकीर्ण करता है।

निष्कर्ष यह है कि भक्ति आंदोलन दक्षिण से पंजाब तक एक प्रवृत्ति है। हिन्दी उसका उत्तर भारतीय स्वर है, पूरा महादेश नहीं।

19. आदिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ लिखते हुए शुक्ल और द्विवेदी की दृष्टि का अंतर स्पष्ट कीजिए।20 अंक

आदिकाल हिन्दी साहित्य का प्रथम युग है। इसकी प्रवृत्तियाँ एक नहीं। चारण-रासो में वीर रस, राजप्रशस्ति, युद्ध-वर्णन, अश्व-वर्णन और अतिशयोक्ति प्रधान हैं। पृथ्वीराज रासो चंदबरदाई से जोड़ा जाता है; भाषा डिंगल है। शृंगार विद्यापति, ढोला मारू रा दूहा और कुछ रासो-अंशों में है। अमीर खुसरो हिन्दवी गीत, पहेली और मुकरी से जुड़े। भाषा अपभ्रंश, डिंगल, पुरानी राजस्थानी और अवहट्ठ का मिश्रण दिखाती है। राज्याश्रय चारण-काव्य का प्राण है। इसके समानांतर सिद्ध-नाथ वाणी गुरु, हठयोग, सहज साधना और कर्मकांड-खंडन की भाषा बोलती है। जैन चरित-काव्य — स्वयंभू का पउमचरिउ — अपभ्रंश में राम-पुराण कथा कहते हैं। दो शैलियाँ एक युग में हैं — दरबारी वीरगाथा और लोक-श्रमण वाणी।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस युग को वीरगाथाकाल कहा। उन्होंने परिस्थिति से प्रवृत्ति निकाली — युद्ध और राजपूत जीवन से वीर रस, चारण से रासो। सीमा लगभग संवत् 1050–1375 मानी। इस दृष्टि का लाभ स्पष्टता है; प्रश्नपत्र का ढाँचा बहुत अंशों में यही है। सीमा यह है कि सिद्ध, नाथ, जैन और अपभ्रंश हाशिए पर चले जाते हैं। पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता विवादित रही, फिर भी युग का नाम बहुत कुछ उसी पर टिका। शुक्ल की विधि कारण-कार्य की है: परिस्थिति, प्रवृत्ति, प्रतिनिधि रचना। बीसलदेव रासो, खुमाण रासो, परमाल रासो इसी वीरगाथा-पंक्ति के अन्य नाम हैं; निर्धारित पाठ पद्मावती समय है।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी आदिकाल को चारणों तक सीमित नहीं मानते। सिद्ध, नाथ, जैन, अपभ्रंश और लोक उनके यहाँ मुख्य धारा हैं। संदेशरासक का विरह-दूत, ढोला मारू का लोक-शृंगार और सिद्ध-वाणी की सहजता उनके तर्क को सामग्री देती है। भक्तिकाल उनके विवेचन में अचानक चमत्कार नहीं, इसी भूमि की फसल है। रासो एक अंग है, पूरा युग नहीं। द्विवेदी की दृष्टि चौड़ाई देती है; शुक्ल की दृष्टि काल-प्रवृत्ति की साफ रेखा देती है। दोनों एक सामग्री पर भिन्न प्रश्न पूछते हैं, इसलिए इतिहास भिन्न बनता है।

प्रवृत्तियाँ इसलिए दो स्तंभों में लिखी जानी चाहिए। एक स्तंभ वीर, शृंगार, ऐतिहासिक आख्यान, राज्याश्रय। दूसरा स्तंभ योग-वाणी, जैन चरित, लोक-कथा, भाषा-संक्रमण। उपलब्धियाँ भाषा के संक्रमण, दोहा-चौपाई की स्थिरता और भक्ति की पूर्व-पीठिका हैं। सीमा प्रामाणिकता, प्रक्षेप और अतिशयोक्ति हैं। नामकरण की समस्या इन्हीं दो स्तंभों से जन्म लेती है।

निष्कर्ष यह है कि आदिकाल का सही चित्र शुक्ल और द्विवेदी को साथ रखने से बनता है। केवल वीरगाथा कहने पर युग संकीर्ण हो जाता है; केवल सिद्ध-नाथ कहने पर रासो की ऐतिहासिक उपस्थिति धुंधली पड़ती है। हिन्दी का बचपन दोनों हाथों से पकड़ना पड़ता है। प्रवृत्तियाँ युग की हैं, दृष्टि इतिहासकार की; दोनों का विवेक परीक्षा-उत्तर की रीढ़ है।

20. भक्तिकाल हिन्दी साहित्य का उत्कर्ष क्यों माना जाता है? दार्शनिक आधार, वर्गीकरण और अखिल भारतीय स्वरूप सहित विवेचन कीजिए।20 अंक

भक्तिकाल हिन्दी साहित्य का उत्कर्ष इसलिए माना जाता है कि इसमें भाषा, विषय और सामाजिक पहुँच तीनों समृद्ध हुए। देशी भाषा काव्य की मुख्य वाहक बनी। ईश्वर-प्रेम व्यक्तिगत अनुभव बना, केवल शास्त्र नहीं रहा। संत, सूफी और सगुण भक्त भिन्न जातियों और पंथों से आकर एक युग की संवेदना रचते हैं। शुक्ल इसे हिन्दी का हृदय कहते हैं। द्विवेदी इसे अचानक चमत्कार नहीं, सिद्ध-नाथ-जैन और दक्षिण भक्ति की लंबी तैयारी का फल मानते हैं। आदिकाल के चारण-केंद्र से यह युग जन की जीभ पर उतरता है।

परिस्थितियाँ इस उत्कर्ष की भूमि हैं। सल्तनत-मुगल काल में सांस्कृतिक संपर्क बढ़ा। जाति और कर्मकांड का दबाव भक्ति को जन-आंदोलन बनाता है। सूफी खानकाहें और हिन्दू साधना एक ही नगर में चलती हैं। साहित्य राजसभा से निकलकर घर, घाट और पंथ में उतरता है। कबीर जुलाहा, रैदास श्रमण-लोक भूमि, जायसी सूफी, तुलसी रामानंदी भक्त, सूर पुष्टिमार्गी — सामाजिक चौड़ाई स्वयं उत्कर्ष का प्रमाण है। रामानंद ने राम-नाम का द्वार लोक के लिए खोला; दक्षिण के आलवार-नायनार पहले से सिद्ध कर चुके थे कि भक्ति संस्कृत की दीवार तोड़ सकती है।

दार्शनिक आधार कई सूत्रों का है। रामानुज का विशिष्टाद्वैत राम-भक्ति की भूमि है; रामानंद उसे लोक तक ले जाते हैं; तुलसी उसी पंक्ति के महाकवि हैं। वल्लभ का शुद्धाद्वैत और पुष्टिमार्ग सूर तथा अष्टछाप की भूमि है। मध्व, निंबार्क और चैतन्य कृष्ण-भक्ति की अन्य शाखाएँ हैं। शंकर का अद्वैत निर्गुण चिंतन को भाषा देता है, यद्यपि कबीर शास्त्र का अद्वैत नहीं दोहराते। सूफी इश्क भारतीय प्रेमाख्यान से जायसी में मिलता है। भक्तिकाल दर्शन का अनुवाद नहीं, दर्शन का लोक-रूप है। निर्गुण और सगुण दो रास्ते हैं, दो धर्म नहीं।

वर्गीकरण शुक्ल ने निर्गुण और सगुण में किया। निर्गुण ज्ञानाश्रयी संत (कबीर, नानक, दादू, रैदास) और प्रेमाश्रयी सूफी (कुतुबन, मंझन, जायसी) में बँटा। सगुण राम (तुलसी) और कृष्ण (सूर, मीरा, अष्टछाप) में बँटा। प्रवृत्तियाँ हैं — नाम-प्रेम, गुरु, लोकभाषा, आडंबर-खंडन, लीला-गान, मर्यादा, वात्सल्य और विरह। वर्गीकरण कक्षा की सुविधा है; कवि की पूरी सत्ता एक खाने में नहीं समाती।

निष्कर्ष यह है कि भक्तिकाल उत्कर्ष इसलिए है कि देशी भाषा, जन-पहुँच और दार्शनिक लोक-रूप एक साथ बैठे। आलवार-नायनार तमिल में, बसवन्ना कर्नाटक में, वारकरी महाराष्ट्र में, चैतन्य बंगाल में, गुरु नानक पंजाब में, लल्लद्यद कश्मीर में, नरसी मेहता गुजरात में और मीरा राजस्थान में एक ही प्रवृत्ति की क्षेत्रीय भाषाएँ हैं। हिन्दी भक्तिकाल इस लहर की उत्तर भारतीय अभिव्यक्ति है, उसका एकमात्र स्रोत नहीं। शुक्ल इसे हिन्दी का हृदय कहते हैं, द्विवेदी तैयारी का फल; दोनों वाक्य साथ लिखने पर उत्तर पूरा होता है।

21. संतकाव्य की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालिए।8 अंक

संतकाव्य भक्तिकाल की ज्ञानाश्रयी निर्गुण धारा है। उसका ईश्वर निराकार है, जाति से असंबद्ध, मंदिर से बड़ा। यह धारा अचानक नहीं फूटी। उपनिषद अद्वैत चिंतन को भाषा देते हैं, यद्यपि संत शास्त्र का अद्वैत नहीं दोहराते। बौद्ध-जैन श्रमण धारा अहिंसा और कर्मकांड-आलोचना दे चुकी थी। सिद्धों की सहज-वाणी और नाथों का योग गुरु, देह और लोक-भाषा पहले से चला रहे थे। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी संत को इसी लंबी तैयारी का फल मानते हैं। आचार्य शुक्ल इसे भक्तिकाल के भीतर ज्ञानाश्रयी शाखा कहते हैं।

सामाजिक पृष्ठभूमि वर्ण-व्यवस्था और कर्मकांड का दबाव है। संत प्रायः श्रमण या तथाकथित निम्न जातियों से आए — कबीर जुलाहा, रैदास चमार माने जाते हैं। रामानंद ने राम-नाम का द्वार लोक के लिए खोला। इस्लाम का संपर्क एकेश्वर और मूर्ति-खंडन को नया संदर्भ देता है; सूफी खानकाहें एक ही नगर में चलती हैं। डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल निर्गुण संप्रदाय को स्वतंत्र साधना-धारा मानते हैं। परशुराम चतुर्वेदी संत-परंपरा को पंथ और लोक से जोड़ते हैं। भाषा सधुक्कड़ी है, संस्कृत का आग्रह टूटा हुआ है।

निष्कर्ष यह है कि संतकाव्य की पृष्ठभूमि चिंतन, समाज और भाषा तीनों की है। द्विवेदी जड़ दिखाते हैं, शुक्ल युग-खाता; दोनों वाक्य साथ लिखने पर उत्तर पूरा होता है।

22. संतकाव्य के प्रमुख कवि और रचनाओं का परिचय दीजिए।8 अंक

कबीर संतकाव्य के शिखर हैं। वाणी साखी, सबद और रमैनी में बँटी मानी जाती है। बीजक पंथ-संकलन है; श्यामसुंदर दास की कबीर ग्रंथावली मानक पाठ है। विषय निराकार राम, गुरु, माया, जाति-खंडन और दोनों धर्मों के आडंबर की आलोचना हैं। गुरु नानक जपुजी और आदि ग्रंथ की बाणी से जुड़े; नाम-सिमरन और एक ओंकार उनकी भूमि है। दादू दयाल राजस्थान के संत हैं; दादू-वाणी में निर्गुण और समभाव है। रैदास की बानी पदों में श्रम-गरिमा और राम-नाम है। सुंदरदास दादू-शिष्य माने जाते हैं; सुंदर ग्रंथावली ज्ञान-वैराग्य का अधिक व्यवस्थित काव्य है।

मलूकदास, पलटूदास, धरमदास आगे की पंक्ति हैं। नानक को हिन्दी संतकाव्य से काटना अधूरा है; शुक्ल उन्हें ज्ञानाश्रयी शाखा में रखते हैं। संतकाव्य की पहचान यही है कि वाणी पंथ और घर में चलती है, राजसभा में नहीं। कबीर शिखर हैं, शेष पंक्ति उसकी चौड़ाई है। द्विवेदी कबीर की प्रभविष्णुता पर बल देते हैं; चतुर्वेदी पूरी पंक्ति को लोक से बाँधते हैं।

निष्कर्ष यह है कि संतकाव्य के प्रमुख कवि कबीर, नानक, दादू, रैदास और सुंदरदास हैं। शिखर एक है, धारा कई कंठों की है।

23. संतकाव्य का वैशिष्ट्य लिखिए।8 अंक

वैशिष्ट्य सबसे पहले ब्रह्म का है। संत का राम निराकार, अवर्णनीय और अंतःस्थित है। मूर्ति, तीर्थ और व्रत प्रायः बंधन माने गए। गुरु मार्ग का द्वार है — बिना गुरु ज्ञान नहीं, पर गुरु व्यक्ति-पूजा से बड़ा अनुभव है। सहज साधना दिखावे के विरुद्ध है। नाम-सिमरन हृदय की वृत्ति है। अनुभव शास्त्र से ऊपर है; वेद और कुरान दोनों तभी मान्य हैं जब जीवन में उतरें। माया, चंचल मन और त्रिविध ताप स्थायी शत्रु हैं। यही बात संत को पंडित और काजी दोनों से टकराती है।

सामाजिक वैशिष्ट्य जाति, वर्ण और छुआछूत का खंडन है। हिन्दू-मुसलमान का बाहरी भेद एक राम में विलीन होता है। भाषा लोक की सधुक्कड़ी है। वाणी गेय है, पंथों में चलती है, दरबार की वस्तु नहीं। परशुराम चतुर्वेदी इसी को सामाजिक प्रासंगिकता कहते हैं। बड़थ्वाल इसे स्वतंत्र साधना-धारा कहते हैं। सीमा यह है कि पंथ बाद में संप्रदाय बन जाते हैं और वाणी प्रक्षिप्त भी होती है। निराकार राम कभी सगुण संबोधन में भी बोल पड़ता है, पर केंद्र निर्गुण ही रहता है।

निष्कर्ष यह है कि संतकाव्य का वैशिष्ट्य निराकार नाम, गुरु, सहज साधना और सामाजिक फटकार है। सिद्धांत खाना नहीं, प्रवृत्ति का केंद्र है।

24. संतकाव्य की काव्य प्रवृत्तियाँ लिखिए।8 अंक

रूप की प्रधान प्रवृत्ति साखी या दोहा है — अनुभव और चोट एक पंक्ति में। सबद या पद गेय हैं, संगति में गाए जाते हैं। रमैनी लंबी रचना का रूप है। उलटबाँसी उलटी प्रतीक-भाषा है — सहज का संकेत, पहेली मात्र नहीं। प्रतीक घर और कारीगरी के हैं — चादर, कछिया, हंस, कस्तूरी, लुहार। भाषा मिलाजुली है; मुहावरा लोक का है, व्याकरण दरबार का नहीं। अलंकार जान-बूझकर नहीं लाए गए, फिर भी अनुप्रास और विरोधाभास आते हैं। नानक की बाणी राग से बँधी है। सुंदरदास में निरूपण अधिक व्यवस्थित है।

रस की दृष्टि से शांत और भक्ति प्रधान हैं। व्यंग्य और फटकार कबीर की काव्य-वृत्ति हैं, केवल उपदेश नहीं। मौखिक प्रचार प्रवृत्ति का अंग है; लिखित संकलन बाद के हैं। कला साधन है, लक्ष्य नहीं; फिर भी दोहा की मार और पद की लय हिन्दी की संपत्ति बनी। प्रेमाख्यान की अवधी चौपाई से यह सधुक्कड़ी दोहा अलग घर है; दोनों निर्गुण हैं, मार्ग अलग है।

निष्कर्ष यह है कि संतकाव्य की काव्य प्रवृत्तियाँ साखी-पद, उलटबाँसी, लोक-प्रतीक और शांत-भक्ति रस हैं। शास्त्र की भाषा छोड़कर घर और पंथ की भाषा में ज्ञान गाया गया है।

25. प्रेमाख्यान का उद्गम स्रोत और पूर्व परंपरा स्पष्ट कीजिए।8 अंक

प्रेमाख्यान भक्तिकाल की प्रेमाश्रयी निर्गुण शाखा है। सूफी साधक लौकिक कथा के भीतर ईश्वरीय इश्क कहते हैं। उद्गम कई स्रोत हैं। फारसी मसनवी — लैला-मजनूँ, यूसुफ-जुलेखा — विरह, यात्रा और फना का ढाँचा देती है। इश्क मजाजी से इश्क हकीकी तक की सीढ़ी शरीअत, तरीकत, हकीकत, मारिफत की है। भारतीय स्रोत पुराण, लोक-कथा और राजस्थानी आख्यान हैं। अपभ्रंश का संदेशरासक विरह-दूत की भूमि पहले दे चुका था। मुल्ला दाऊद का चंदायन हिन्दी का प्रायः पहला बड़ा सूफी प्रेमाख्यान माना जाता है।

पूर्व परंपरा दो धाराओं की संधि है — इस्लामी रहस्य-खानकाह और भारतीय कथा-छंद। जायसी पद्मावत में सिंहल, समुद्र और नागमती-विरह भारतीय हैं; पीर और फना सूफी हैं। श्यामनमोहर पांडेय प्रेमाख्यान को इसी संधि का साहित्य मानते हैं। रामपूजन तिवारी भूमिका खानकाह, भाषा और कथा-विधान से खोलते हैं। गलत धारणा यह है कि ये ग्रंथ फारसी की नकल हैं; सही धारणा यह है कि ढाँचा फारसी और कथा-छंद भारतीय हैं।

निष्कर्ष यह है कि प्रेमाख्यान का उद्गम मसनवी और भारतीय कथा दोनों हैं। चंदायन पहली बड़ी कड़ी है; संधि से हिन्दी की नई जाति बनती है।

26. प्रेमाख्यान के प्रमुख कवि और रचनाओं का परिचय दीजिए।8 अंक

मुल्ला दाऊद का चंदायन लोरिक-चंदा की कथा है — हिन्दी प्रेमाख्यान की पहली बड़ी कड़ी। कुतुबन की मृगावती विरह और योग-यात्रा का आख्यान है; शुक्ल इसे प्रेमाश्रयी शाखा का प्रतिनिधि ग्रंथ मानते हैं। मंझन की मधुमालती स्वप्न और रहस्य की कथा है। मलिक मुहम्मद जायसी शिखर हैं। पद्मावत सिंहलद्वीप, रत्नसेन, पद्मावती और नागमती की कथा है; अखरावट अन्य रचना मानी जाती है। शुक्ल ने जायसी ग्रंथावली संपादित कर पद्मावत को हिन्दी के महाकाव्य-समीप रखा। विजयदेव नारायण साही संवेदना को आधुनिक आलोचना से खोलते हैं।

उसमान की चित्रावली, कासिम शाह का हंस जवाहर, नूर मुहम्मद की इंद्रावती आगे की कड़ियाँ हैं। कथा-सूत्र प्रायः एक से हैं — प्रस्थान, समुद्र, योगी-वेश, प्राप्ति, विरहिणी का संदेश। वैविध्य भाषा और रहस्य के घनत्व में है। शिखर-ग्रंथ पद्मावत रहा। कुतुबन और मंझन पंक्ति हैं, जायसी शिखर। निर्धारित सिंहलद्वीप खंड इसी शिखर का द्वार है। भाषा अवधी है; कथा राजकथा के भीतर रहस्य कहती है।

निष्कर्ष यह है कि प्रेमाख्यान के प्रमुख कवि दाऊद, कुतुबन, मंझन और जायसी हैं। सूची लंबी है, केंद्र पद्मावत है।

27. प्रेमाख्यान का वैशिष्ट्य और प्रमुख प्रवृत्तियाँ लिखिए।8 अंक

वैशिष्ट्य कथा के भीतर के अर्थ का है। नायक साधक है, नायिका परम तत्त्व, वियोग मार्ग, संगम सिद्धि। आख्यान दोहरे पाठ देता है — लौकिक प्रेम बिना मिटाए आध्यात्मिक हो जाता है। विरह प्राण है; नागमती का विरह हिन्दी की स्थायी संपत्ति माना गया। प्रकृति, बारहमासा और लोक-चित्र भारतीय मिट्टी के हैं। चौपाई कथा कहती है, दोहा अर्थ बाँधता है। पीर-स्तुति, एकेश्वर और योग-पुराण एक ग्रंथ में मिलते हैं। भाषा अवधी है, दरबारी फारसी नहीं। रहस्य भय से नहीं, प्रेम से खुलता है।

प्रवृत्तियाँ हैं — इश्क, यात्रा, स्वप्न, योगिनी-वेश, रूपक और अतिशयोक्ति। शृंगार और करुण दोनों चलते हैं; शांत रहस्य के तल पर है। नायिका-भेद रीति जैसा शास्त्र नहीं, कथा का चरित्र है। सीमा यह है कि प्रतीक कभी कथा दबा देते हैं; ऐतिहासिक पद्मावती और काव्य-पद्मावती एक नहीं। आलोचक चित्तौड़-सिंहल के रूपक अलग-अलग बाँधते हैं; स्थिर बात दोहरा पाठ है।

निष्कर्ष यह है कि प्रेमाख्यान का वैशिष्ट्य दोहरे अर्थ और विरह है, प्रवृत्ति इश्क-यात्रा-रूपक की है। यह न केवल सूफी मत का अनुवाद है, न केवल लोक-कथा — दोनों का हिन्दी रूप है।

28. संतकाव्य और प्रेमाख्यान में साम्य-वैषम्य स्पष्ट कीजिए।8 अंक

शुक्ल दोनों को निर्गुण भक्ति के दो खंड देते हैं — ज्ञानाश्रयी संत और प्रेमाश्रयी सूफी। साम्य कई हैं। दोनों का ईश्वर निराकार है। गुरु या पीर मार्ग दिखाते हैं। लोकभाषा माध्यम है। आडंबर, कर्मकांड और बाह्य भेद दोनों में संदिग्ध हैं। भक्तिकाल की भूमि दोनों की एक है। कबीर में प्रेम भी है, जायसी में ज्ञान भी; खाने सुविधा हैं। द्विवेदी संत को सिद्ध-नाथ की फसल कहते हैं; प्रेमाख्यान उनके यहाँ भारतीय कथा और सूफी इश्क की संधि है।

वैषम्य मार्ग का है। संत साखी, पद और फटकार से चलते हैं; प्रेमाख्यान चौपाई-दोहा की कथा और विरह से। संत जाति-व्यवस्था पर सीधा वार करते हैं; प्रेमाख्यान प्रायः राजकथा के भीतर रहस्य कहता है, फिर भी नागमती लोक-स्त्री का विरह बोलती है। संत की भाषा सधुक्कड़ी है, सूफी की अवधी-कथात्मक। संत अनुभव का उपदेश गाते हैं, सूफी रूपक की कथा। एक चोट है, दूसरा आख्यान।

निष्कर्ष यह है कि संतकाव्य और प्रेमाख्यान निर्गुण भूमि पर मिलते हैं, मार्ग पर अलग हैं। दोनों के बिना भक्तिकाल का निर्गुण अधूरा रहता है।

29. संतकाव्य की पृष्ठभूमि, प्रमुख कवि और काव्य प्रवृत्तियों का विवेचन कीजिए।20 अंक

संतकाव्य भक्तिकाल की ज्ञानाश्रयी निर्गुण धारा है। ईश्वर निराकार है, जाति से असंबद्ध, मंदिर से बड़ा। शुक्ल इसे भक्तिकाल के भीतर रखते हैं; द्विवेदी इसकी जड़ सिद्ध, नाथ, श्रमण और लोक में देखते हैं। दोनों बातें पूरक हैं। इकाई 1 का वैदिक-उपनिषद चिंतन भाषा देता है, संत उसे शास्त्र की नकल नहीं बनाते। पालि-प्राकृत की श्रमण धारा अहिंसा और कर्मकांड-आलोचना दे चुकी थी। रामानंद ने उत्तर भारत में राम-नाम का द्वार लोक तक खोला; संत उसी द्वार से गुजरते हैं, यद्यपि सगुण राम को ज्यों का त्यों नहीं अपनाते। सामाजिक दबाव वर्ण और छुआछूत का था। इस्लाम का संपर्क एकेश्वर को नया संदर्भ देता है। भाषा सधुक्कड़ी है। बड़थ्वाल निर्गुण संप्रदाय को स्वतंत्र साधना कहते हैं; परशुराम चतुर्वेदी संत-परंपरा को उत्तर भारत के पंथ से बाँधते हैं।

कबीर शिखर हैं। साखी, सबद, रमैनी; बीजक और श्यामसुंदर दास की ग्रंथावली प्रमुख संकलन हैं। निराकार राम, गुरु, माया, जाति-खंडन और हिन्दू-मुसलमान दोनों के आडंबर की आलोचना उनकी भूमि है। निर्धारित पद दुलहिनी-मंगलचार, ज्ञान की आँधी, जागत रहिये, पांडे कुमति, हम न मरैं इसी स्वर के द्वार हैं। नानक जपुजी से जुड़े; शुक्ल उन्हें ज्ञानाश्रयी शाखा में रखते हैं। दादू-वाणी समभाव की है। रैदास बानी श्रम-गरिमा और पद-भक्ति की है; शुक्देव सिंह का संपादन निर्धारित है। सुंदरदास दादू-शिष्य माने जाते हैं; ग्रंथावली में ज्ञान-वैराग्य अधिक व्यवस्थित है। मलूकदास, पलटूदास आगे की पंक्ति हैं।

वैशिष्ट्य निराकार ब्रह्म, गुरु, सहज, नाम और सामाजिक फटकार हैं। अनुभव शास्त्र से ऊपर है। काव्य प्रवृत्तियाँ साखी-दोहा, गेय पद, रमैनी और उलटबाँसी हैं। प्रतीक कारीगरी और घट के हैं — लुहार, टाटी, भाँडा, रबाब। रस शांत और भक्ति प्रधान हैं; कबीर में व्यंग्य अलग वृत्ति है। कला साधन है, लक्ष्य नहीं। मौखिक प्रचार पाठ से पहले है। प्रेमाख्यान की अवधी चौपाई से यह सधुक्कड़ी दोहा अलग घर है; दोनों निर्गुण हैं, मार्ग अलग है।

सीमाएँ भी हैं। वाणी प्रक्षिप्त होती है। पंथ संप्रदाय बन जाते हैं। निराकार राम कभी सगुण संबोधन में बोल पड़ता है — रैदास के कान्हा-माधो इसी सीमा के उदाहरण हैं, मंदिर-विग्रह नहीं। फिर भी संतकाव्य हिन्दी की वह धारा है जिसने साहित्य को पंडित की भाषा से निकालकर जुलाहे और चमार की जीभ पर ला दिया। इकाई 5 का निर्धारित पाठ इकाई 3 की परिभाषा का प्रमाण है। निर्गुण का एक हाथ साखी है; दूसरा हाथ प्रेमाख्यान है।

निष्कर्ष यह है कि संतकाव्य चिंतन की निरंतरता और समाज की चोट दोनों है। पृष्ठभूमि बिना लिखे कवि-सूची बन जाती है; कवि बिना लिखे प्रवृत्तियाँ अमूर्त रहती हैं। तीनों को साथ रखने पर ज्ञानाश्रयी धारा पूरी उतरती है।

30. प्रेमाख्यान का उद्गम, प्रमुख कवि और वैशिष्ट्य लिखिए। संतकाव्य से उसका संबंध भी स्पष्ट कीजिए।20 अंक

प्रेमाख्यान भक्तिकाल की प्रेमाश्रयी निर्गुण शाखा है। सूफी साधक लौकिक प्रेम के भीतर हकीकी इश्क कहते हैं। उद्गम एक स्रोत नहीं। फारसी मसनवी — लैला-मजनूँ, यूसुफ-जुलेखा — विरह, यात्रा और फना का ढाँचा देती है। इश्क मजाजी से हकीकी तक शरीअत-तरीकत-हकीकत-मारिफत की सीढ़ी है। भारतीय स्रोत पुराण, लोक-कथा, राजस्थानी आख्यान और अपभ्रंश विरह-काव्य हैं; संदेशरासक दूत-विधान पहले दे चुका था। मुल्ला दाऊद का चंदायन / चंदायन लोरिक-चंदा की कथा हिन्दी का प्रायः पहला बड़ा सूफी प्रेमाख्यान माना जाता है। श्यामनमोहर पांडेय इसी संधि को मध्यकालीन प्रेमाख्यान कहते हैं; रामपूजन तिवारी खानकाह, भाषा और कथा-विधान से भूमिका खोलते हैं। गलत धारणा यह है कि ये ग्रंथ फारसी की नकल हैं; सही धारणा यह है कि ढाँचा फारसी और कथा-छंद भारतीय हैं।

कुतुबन की मृगावती प्रेम, विरह और योग-यात्रा का आख्यान है; शुक्ल इसे प्रेमाश्रयी शाखा का प्रतिनिधि ग्रंथ मानते हैं। मंझन की मधुमालती स्वप्न, विरह और रहस्य की कथा है। जायसी शिखर हैं। पद्मावत सिंहलद्वीप, रत्नसेन, पद्मावती और नागमती की कथा है; अखरावट और आखिरी कलाम अन्य रचनाएँ मानी जाती हैं। शुक्ल ने ग्रंथावली संपादित कर इसे हिन्दी के महाकाव्य-समीप रखा। विजयदेव नारायण साही संवेदना को आधुनिक आलोचना से खोलते हैं। उसमान की चित्रावली, कासिम शाह का हंस जवाहर, नूर मुहम्मद की इंद्रावती परंपरा बढ़ाते हैं। कथा-सूत्र प्रायः प्रस्थान, समुद्र, योगी-वेश, प्राप्ति और विरहिणी-संदेश का है। निर्धारित सिंहलद्वीप खंड इकाई 5 का पाठ है; यहाँ युग का पूरा चित्र नहीं, कवि-सूची और वैशिष्ट्य हैं।

वैशिष्ट्य दोहरे पाठ का है — नायक साधक, नायिका परम तत्त्व, वियोग मार्ग, संगम सिद्धि। आलोचक प्रतीक एक-से नहीं बाँधते; स्थिर बात यह है कि आख्यान दो अर्थ देता है। विरह प्राण है; नागमती का विरह हिन्दी की स्थायी संपत्ति माना गया। चौपाई कथा कहती है, दोहा अर्थ बाँधता है — यही युग्म आगे रामचरितमानस तक जाता है। अवधी भाषा है। पीर, योग और पुराण एक ग्रंथ में मिलते हैं। प्रवृत्तियाँ इश्क, बारहमासा, रूपक, अतिशयोक्ति, शृंगार और करुण हैं। सीमा प्रतीक-घनत्व और इतिहास-काव्य का भ्रम है — ऐतिहासिक पद्मावती और काव्य-पद्मावती एक नहीं।

संतकाव्य से साम्य निर्गुण भूमि, गुरु-पीर, लोकभाषा और आडंबर-दूरी पर है। वैषम्य मार्ग पर है — साखी की चोट बनाम कथा का विरह; सधुक्कड़ी बनाम अवधी आख्यान; जाति पर वार बनाम राजकथा के भीतर रहस्य। कबीर फटकार चलाते हैं, जायसी रूपक गाते हैं। शुक्ल के दो खाने अध्ययन की सुविधा हैं, कवि की पूरी सत्ता नहीं। दोनों इकाई 3 की दो भुजाएँ हैं; मिलाकर एक नाम मत लिखना।

निष्कर्ष यह है कि प्रेमाख्यान हिन्दी का वह रूप है जिसमें इश्क कथा बनकर बोलता है। संतकाव्य के बिना निर्गुण केवल आख्यान रह जाता; प्रेमाख्यान के बिना निर्गुण केवल फटकार। दोनों मिलकर भक्तिकाल के निर्गुण खंड को पूरा करते हैं।

31. पृथ्वीराज रासो का संक्षिप्त परिचय दीजिए। पद्मावती समय का महत्त्व लिखिए।8 अंक

पृथ्वीराज रासो चंदबरदाई से संबद्ध चारण-काव्य है। पृथ्वीराज चौहान के दरबार से जोड़ा जाता है। भाषा डिंगल है — पुरानी राजस्थानी का साहित्यिक रूप। रस वीर प्रधान, शृंगार साथ है। आचार्य शुक्ल के वीरगाथाकाल का केंद्र यही ग्रंथ रहा। निर्धारित पाठ माताप्रसाद गुप्त के संपादन पर है; रासो विमर्श भी उन्हीं का संदर्भ-ग्रंथ है। प्रामाणिकता विवादित रही — रचना-काल, प्रक्षेप, कई स्तर। इतिहास ग्रंथ पर टिकता है; ग्रंथ विवादित हो तो युग-चित्र डगमगाता है। फिर भी आदिकाल का प्रतिनिधि आख्यान यही माना जाता है। चारण राजा की कीर्ति गाता है; युद्ध और रूप दोनों उसकी सामग्री हैं।

पद्मावती समय रानी पद्मावती के प्रसंग का खंड है। निर्धारित अंश दो चित्र देता है — सोलह कला का रूप और सहाबुद्दीन-चौहान का युद्ध। एक ही समय में शृंगार और वीर रासो की पहचान हैं। रूप-वर्णन केवल विलास नहीं; युद्ध से पहले मनुष्य को पूरा करता है। युद्ध-चित्र में उभय भय और हार-जीत का मिटना वीर रस को करुण के किनारे ले जाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि रासो आदिकाल का चारण-आख्यान है और पद्मावती समय उसे केवल तलवार का ग्रंथ नहीं रहने देता। रूप और रण दोनों साँसें साथ लिखनी होती हैं।

32. “मनहु कला ससिभान…” पंक्तियों की संदर्भ-सहित व्याख्या कीजिए।8 अंक

ये पंक्तियाँ पृथ्वीराज रासो के पद्मावती समय से हैं। संपादन माताप्रसाद गुप्त का निर्धारित है। कवि चंदबरदाई माने जाते हैं। प्रसंग रानी पद्मावती के रूप का है। पहली पंक्ति है — मनहु कला ससिभान, कला सोलह सो बन्निय। अन्वय यह है कि मानो चंद्रमा की सोलह कलाएँ उसी रूप में बाँधी गईं। केश कुटिल हैं, देश सुंदर है, पुष्प रचे गए हैं, स्वर पके-मधुर हैं। विधि सोचकर प्रिय ने चारों दिशाओं में चित्त डाला। पृथ्वीराज नरेश ने उस योग को कग्गर पर लिख दिया। कग्गर लेखन-पट्ट का संकेत है — रूप स्थिर चित्र बन जाता है।

भाव पूर्ण सौंदर्य का है। सोलह कला अधूरे चंद्र की नहीं, पूर्णिमा की हैं। कुटिल केश शृंगार का स्थिर लक्षण है। पौहप और पिक्क सद प्रकृति को रूप से बाँधते हैं। कंत का व्याप्त चित्त प्रेम को एक दिशा तक सीमित नहीं रहने देता। अतिशयोक्ति चारण-शैली है, दोष नहीं। डिंगल की संक्षिप्तता बिंब को ठोककर बैठाती है। वीरगाथा के ग्रंथ में यह शृंगार युद्ध के पूर्व मनुष्य को पूरा करता है।

निष्कर्ष यह है कि ये पंक्तियाँ पद्मावती के पूर्ण रूप का बिंब हैं। नख-शिख की सूची नहीं, सोलह कला का एक चित्र है; रासो यहाँ शृंगार से मनुष्य को पूरा करता है।

33. “उहै घटी उहै पलनी…” पंक्तियों की व्याख्या कीजिए।8 अंक

ये पंक्तियाँ पद्मावती समय के युद्ध-प्रसंग से हैं। संपादन माताप्रसाद गुप्त का है। पहली पंक्ति है — उहै घटी उहै पलनी उहै दिन वैर उहै सजि। गजनी की आवाज पर सहाबुद्दीन चढ़ते हैं; चौहान की रान चारों ओर है। अन्वय। वही घड़ी, वही पल, वही दिन — वैर सजा है। घोर निसान बजते हैं। नगर निकट जानकर दोनों ओर भय है। आवाज आती है — साहबुद्दीन स्वयं सुर हैं। न हार है न जीत; सूरवर रह भी नहीं पाता।

भाव समय की एकता का है। रूप के बाद युद्ध उसी घड़ी का दूसरा मुख है। गज्जनै आवाज आक्रमण का शब्द-चित्र है। निसान नगाड़ा है; रान रण है। उभय भय दोनों सेनाओं की मानवीयता है — चारण केवल एक पक्ष की डींग नहीं गाता। अंतिम पंक्ति वीर को करुण से छूती है — इस संग्राम में हिसाब छोटा पड़ जाता है। पुनरुक्ति, अनुप्रास और डिंगल की गति युद्ध का वेग बनाती हैं। ओज गुण प्रधान है; करुण अंत में छूता है।

निष्कर्ष यह है कि ये पंक्तियाँ रासो के वीर रस को करुण के किनारे ले जाती हैं। शृंगार और युद्ध एक समय में पूरे उतरते हैं — यही पद्मावती समय की पहचान है।

34. ढोला मारू रा दूहा का परिचय देते हुए मरुधर परिचय का भाव लिखिए।8 अंक

ढोला मारू रा दूहा राजस्थानी लोक-प्रेमाख्यान है। ढोला पूंगल-नरेश का पुत्र, मारू मारवाड़ की कन्या। बाल-विवाह, वियोग, दूती और मिलन की कथा लोक में गाई जाती रही। संपादन नरोत्तमदास स्वामी, सूर्यकरण पारीक और रामसिंह का निर्धारित है। भाषा डिंगल-राजस्थानी है, छंद दूहा है। रासो की चारण-पंक्ति से हटकर यह ग्रंथ घर, विरह और मरुभूमि का काव्य है। आदिकाल को केवल चारण-वीरगाथा कहने पर यह बाहर रह जाता है; द्विवेदी की लोक-दृष्टि इसे भीतर रखती है।

मरुधर परिचय मारवाड़ की भूमि खोलता है। देश विरंग लगता है; पानी कुएँ में और तप्त है; बाजरा नहीं उगता; सर्प पानी पीते हैं; पेड़ कँटीले हैं; वस्त्र कंबल है; नीर बहुत गहरा है। बाप से विनय है कि मारु देश न दिया जाए, कुँवारी रहना स्वीकार है। भाव जलवायु का विरह है। स्त्री-स्वर चारण-रानी से अलग घर बोलता है। कठोर प्रकृति अलंकार नहीं, जीवन की शर्त है। करुण और शृंगार एक दूहे में मिलते हैं।

निष्कर्ष यह है कि ढोला मारू आदिकाल का लोक-शृंगार है और मरुधर परिचय भूमि की कठोरता को दाम्पत्य की आशंका बनाता है। बिना इसके आदिकाल केवल तलवार रह जाता है।

35. “देस विरंगउ ढोलणा…” दूहों की व्याख्या कीजिए।8 अंक

ये दूहे ढोला मारू रा दूहा के मरुधर परिचय से हैं। संपादन स्वामी, पारीक और रामसिंह का है। पहली पंक्ति है — देस विरंगउ ढोलणा दुखी हुया ईहाँ आई। मारू मरुधरा का चित्र ढोला और बाप के सामने रखती है। अन्वय। ढोलणा, देश विरंग है, यहाँ दुख हुआ। सासर सुहावना लगता है। लंबे कर्ण-आभरण, दो अंगुल के कान। बाबा, पानी कुएँ में है, पानी गरम है। मारु देश मत देना; कूँआरी रहूँ। उस भूमि में बाजरा नहीं; सर्प पीते हैं; रूँख कँटीले हैं; पहिरना-ओढ़ना कंबल; नीर साठ पुरुष गहरा।

भाव मरुभूमि की सचाई और स्त्री की आशंका है। कुआँ, ताता नीर, गहरी जमीन — ये बिंब राजस्थान की काव्य-संपत्ति हैं। म देइस मारुवाँ दाम्पत्य को भूगोल से जोड़ता है। कूँआरि रहेसि स्त्री-स्वर है; चारण-रासो की रानी से यह दूहा अलग घर बोलता है। भाषा ठेठ है, संस्कृत-मार्गी नहीं। करुण और शृंगार एक दूहे में मिलते हैं। लोक-कथा साहित्य की पंक्ति में यहीं उतरती है।

निष्कर्ष यह है कि ये दूहे मरुधरा को विरह बनाते हैं, निबंध नहीं। स्त्री-स्वर और कठोर भूमि आदिकाल की लोक-उपलब्धि हैं।

36. विद्यापति का साहित्यिक परिचय दीजिए।8 अंक

विद्यापति मैथिल कोकिल हैं। मिथिला के दरबार से जुड़े। भाषा अवहट्ठ और मैथिली है। आदिकाल और भक्ति की संधि पर खड़े हैं। शुक्ल उन्हें आदिकाल के शृंगार-कवि की ओर रखते हैं; राधा-कृष्ण के पद आगे सगुण भक्ति की भूमि भी बनते हैं। निर्धारित संकलन भनै विद्यापति है, संपादक कृष्णमोहन झा। पद गेय हैं। संस्कृत काव्य की छाया है, जीभ देशी है। पद-भंगिमा, राधा का रूप, कृष्ण-लीला और शिव-वंदना एक ही कंठ से निकलते हैं। पूर्वी हिन्दी क्षेत्र की कोमलता उनकी पहचान है।

निर्धारित पंक्तियों में शिव-वंदना और राधा-कृष्ण-लीला दोनों हैं। जय जय संकर जय त्रिपुरारि मंगलाचरण है; कदम्ब-तरु, अपार रूप, पथ-गति, शैशव-यौवन और माधव-स्मरण लीला हैं। विद्यापति की आँख घटना को देखती है — पेखल / पेखलि। सूर से पहले यह वाणी बज रही है। संधि-रेखा के कवि का अर्थ यही है कि शृंगार भक्ति बनने को तैयार है। गेयता और अनुप्रास पद को गाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि विद्यापति आदिकाल के अंत के शृंगार-भक्त कवि हैं। मैथिली पद शिव और राधा-कृष्ण दोनों स्वर देता है; संधि उनकी पहचान है, कटौती नहीं।

37. “जय जय संकर जय त्रिपुरारि…” पदों की व्याख्या कीजिए।8 अंक

ये पंक्तियाँ भनै विद्यापति से निर्धारित हैं। संपादक कृष्णमोहन झा हैं। पहली पंक्ति है — जय जय संकर जय त्रिपुरारि। शिव की जय के बाद नंद-नंदन कदम्ब-तरु के नीचे हैं। राधा का रूप अपार है। आज पेखल नंद किसोर — नंद-किसोर दिखाई दिए। सजनी से कान्ह कहने का संकल्प है। राधा पथ-गति पर देखी गई। सैशव जोबन दुहु मिलि गेल — शैशव और यौवन मिल गए। अनुखन माधव माधव सुमरइते — अनुक्षण माधव-नाम स्मरण हो रहा है।

भाव दो स्वरों का मेल है। त्रिपुरारि वंदना है; फिर लीला। पेखल देखना है — आँख घटना को स्पर्श करती है, शास्त्र नहीं पढ़ाती। पथ पर राधा लोक की स्त्री है, केवल देवी नहीं। सैशव-जोबन समय की संधि है — जैसे कवि स्वयं दो युगों की संधि पर है। माधव-स्मरण शृंगार के भीतर भक्ति रखता है। अनुप्रास और मैथिली की लय पद को गेय बनाती हैं। शिव और कृष्ण दोनों स्वर पद में हैं; एक छोड़ने पर पद अधूरा रहता है।

निष्कर्ष यह है कि ये पद विद्यापति के दो ध्रुव खोलते हैं — शिव-वंदना और राधा-कृष्ण लीला। देखना और स्मरण शृंगार को भक्ति के द्वार तक ले जाते हैं।

38. अमीर खुसरो की हिन्दवी काव्य-रूपों — दोहा, मुकरी, गीत — पर प्रकाश डालिए।8 अंक

अमीर खुसरो तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी के कवि-संगीतकार हैं; निजामुद्दीन औलिया से जुड़े। फारसी के साथ हिन्दवी में दोहे, मुकरियाँ और गीत रचे। निर्धारित संपादन भोलानाथ तिवारी का है। दोहे में गोरी सोवे सेज पर शृंगार के भीतर घर लौटने की ठिठोली है — केश मुख पर, रात चारों ओर, चल खुसरो घर आपने। खुसरो दरिया प्रेम का सूफी इश्क है — उलटी धार, डूबने वाला पार होता है। आ साजन मोरे नयनन में प्रिय को नेत्र में बसाना है। अपनी छवि बनाइ के रूप-माया का दोहा है।

मुकरी पहेली है। सुनने वाला प्रेम समझे, उत्तर घर की वस्तु हो — आप हिले पालना, ऊँची अटारी कबूतर, लिपट लिपट चादर, सेज पड़ी नींद, शोभा सदा आईना। हास्य और लोक-बुद्धि साथ हैं। गीत छाप तिलक सब छीनी रे नैन-दीक्षा का है; सकल बन फूल रही सरसों बसंत का देशी गीत है। खुसरो की उपलब्धि हिन्दवी को दरबार और दरगाह दोनों की भाषा बनाना है। संधि-रेखा का कवि यहीं कविता बनता है।

निष्कर्ष यह है कि खुसरो की हिन्दवी दोहा, मुकरी और गीत तीन रूपों में चलती है। ठिठोली, पहेली और प्रेम-गीत आदिकाल को दरगाह की जीभ देते हैं।

39. पद्मावती समय के निर्धारित अंशों की सप्रसंग व्याख्या करते हुए रासो की काव्य-विशेषताएँ लिखिए।20 अंक

पृथ्वीराज रासो चंदबरदाई से जोड़ा जाता है। चंद पृथ्वीराज चौहान के दरबारी चारण माने गए। भाषा डिंगल है — पुरानी राजस्थानी का साहित्यिक रूप, अपभ्रंश की निकटतम साहित्यिक पंक्ति। रस वीर प्रधान, शृंगार साथ है। शुक्ल के वीरगाथाकाल का केंद्र यही ग्रंथ रहा। निर्धारित पाठ माताप्रसाद गुप्त के संपादन पर है; संदर्भ-ग्रंथ रासो विमर्श भी उन्हीं का है। प्रामाणिकता विवादित रही — रचना-काल, प्रक्षेप, कई स्तर। इतिहास ग्रंथ पर टिकता है; ग्रंथ विवादित हो तो युग-चित्र डगमगाता है। फिर भी आदिकाल का प्रतिनिधि आख्यान यही रहा। चारण राजा की कीर्ति गाता है; युद्ध और रूप दोनों उसकी सामग्री हैं। व्याख्या प्रसंग, अन्वय, भाव और सौंदर्य चारों से पूरी होती है।

पद्मावती समय रानी पद्मावती के प्रसंग का खंड है। रूप-चित्र में सोलह कला चंद्र का रूपक है — मनहु कला ससिभान, कला सोलह सो बन्निय। कुटिल केश, सुदेस, पौहप, पिक्क सद प्रकृति और शरीर को एक करते हैं। प्रिय ने विधि सोचकर चारों दिशाओं में चित्त डाला; पृथ्वीराज नरेश ने उस योग को कग्गर पर लिख दिया। यह नख-शिख की सूखी सूची नहीं, पूर्ण बिंब है। अतिशयोक्ति चारण-शैली है। शृंगार युद्ध से पहले मनुष्य को पूरा करता है। अलंकार उपमा और रूपक हैं; अनुप्रास ध्वनि बाँधता है।

युद्ध-चित्र में वही घड़ी, वही वैर है — उहै घटी उहै पलनी उहै दिन वैर। गज्जनै आवाज पर सहाबुद्दीन चढ़ते हैं। घोर निसान बजते हैं, चौहान चारों ओर हैं। नगर निकट जानकर उभय भय है। आवाज आती है — साहबुद्दीन स्वयं सुर हैं। न हार न जीत; सूरवर रह नहीं पाता। वीर रस करुण के किनारे ठहरता है। पुनरुक्ति समय की एकता बाँधती है। रूप के बाद रण उसी समय का दूसरा मुख है। ओज गुण यहाँ प्रधान है; करुण अंत में छूता है।

काव्य-विशेषताएँ स्पष्ट हैं। भाषा डिंगल है। छंद रासो-शैली के हैं। रस वीर और शृंगार साथ हैं। ऐतिहासिक-आख्यान चारण-दृष्टि से गाया गया है। राज्याश्रय प्राण है। अतिशयोक्ति, अनुप्रास और संक्षिप्त बिंब शैली की पहचान हैं। प्रामाणिकता की सीमा भी विशेषता के साथ लिखनी होती है — प्रक्षेप और काल-विवाद। बीसलदेव रासो, खुमाण रासो, परमाल रासो अलग ग्रंथ हैं; निर्धारित खंड पद्मावती समय है। रासो केवल तलवार नहीं; यह खंड उसे रूप का ग्रंथ भी बनाता है। आदिकाल की प्रवृत्तियाँ — वीर, शृंगार, अतिशयोक्ति — यहीं प्रमाणित होती हैं।

निष्कर्ष यह है कि निर्धारित अंश रासो का पूरा महाकाव्य नहीं, उसकी दो साँसें हैं। एक साँस रूप की है, दूसरी रण की। दोनों को साथ रखने पर आदिकाल का चारण-काव्य समझ में आता है। गुप्त का पाठ परीक्षा का आधार है; विवाद इतिहास-दृष्टि का विषय है, पंक्ति के भाव का निषेध नहीं।

40. ढोला मारू, विद्यापति और अमीर खुसरो आदिकाल की संधि-रेखा को कैसे खोलते हैं? निर्धारित पाठ के आधार पर लिखिए।20 अंक

आदिकाल केवल रासो नहीं। संधि-रेखा के तीन स्वर निर्धारित पाठ में हैं — लोक-राजस्थानी, मैथिल शृंगार-भक्ति, और हिन्दवी दरगाह। ढोला मारू रा दूहा मरुधर परिचय में भूमि की कठोरता गाता है। संपादन नरोत्तमदास स्वामी, सूर्यकरण पारीक, रामसिंह का है। देस विरंगउ ढोलणा — पानी कुएँ में है, ताता है, बाजरा नहीं, सर्प पीते हैं, रूँख कँटीले हैं, कंबल वस्त्र है, नीर गहरा है। मारू बाप से कहती है — मारु देश न देना, कुँवारी रहना स्वीकार। चारण-रानी के रूप-वर्णन से यह स्त्री-स्वर घर का है। लोक-कथा साहित्य की पंक्ति में उतरती है। द्विवेदी की आदिकाल-दृष्टि बिना इस ग्रंथ के अधूरी रहती है।

विद्यापति मैथिल कोकिल हैं। अवहट्ठ-मैथिली में शिव की जय और राधा-कृष्ण की लीला एक कंठ से निकलती हैं। निर्धारित संकलन भनै विद्यापति, संपादक कृष्णमोहन झा। जय जय संकर जय त्रिपुरारि वंदना है; नंदक नंदन कदम्ब-तरु, राधा रूप अपार, आज पेखल नंद किशोर, सजनी कान्ह कहब, पथ-गति, सैशव-जोबन मिलन, अनुखन माधव-स्मरण लीला है। शृंगार भक्ति बनने को तैयार है। शुक्ल उन्हें आदिकाल के अंत में रखते हैं; सगुण काव्य आगे इसी भूमि से फलता है। गेयता और कोमलता पूर्वी केंद्र की पहचान हैं। आँख घटना को देखती है — पेखल।

अमीर खुसरो तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी के कवि-संगीतकार हैं; निजामुद्दीन औलिया से जुड़े। फारसी के साथ हिन्दवी दोहा, मुकरी और गीत। निर्धारित संपादन भोलानाथ तिवारी का है। गोरी सोवे सेज पर / चल खुसरो घर आपने — शृंगार के भीतर वैराग्य की ठिठोली। दरिया प्रेम का उलटी धार — सूफी इश्क, डूबने वाला पार। आ साजन मोरे नयनन में — प्रिय नेत्र में। मुकरी पहेली है — प्रेम सुनाई दे, उत्तर पालना-कबूतर-चादर-नींद-आईना निकले। छाप तिलक सब छीनी रे नैन-दीक्षा है; सकल बन फूल रही सरसों बसंत का देशी गीत है। दरबार और दरगाह एक भाषा बोलते हैं।

तीनों मिलकर रासो की एक-धारा को तोड़ते हैं। ढोला मारू लोक और विरह है। विद्यापति शृंगार से भक्ति की देहली है। खुसरो हिन्दवी और सूफी ठिठोली हैं। भाषा डिंगल, मैथिली, हिन्दवी — आदिकाल कई जीभों का युग है। संधि-रेखा का अर्थ कवि का दो युगों में बँटना नहीं, दो स्वरों का एक साथ बजना है। इकाई 2 की परिस्थिति — राजपूत संघर्ष, तुर्क-संपर्क, नाथ-जैन लोक — यहीं कविता बनती है। शुक्ल रासो केंद्र देते हैं; द्विवेदी इन्हीं तीन से चौड़ाई माँगते हैं।

निष्कर्ष यह है कि निर्धारित चार रचनाएँ आदिकाल का चित्र पूरा करती हैं। रासो केंद्र है; ढोला मारू, विद्यापति और खुसरो उसकी चौड़ाई हैं। संधि-रेखा इतिहास की सुविधा है; कविता उस सुविधा से बड़ी है।

41. कबीर ग्रंथावली का परिचय दीजिए। निर्धारित पदों का भाव-संकेत लिखिए।8 अंक

कबीर भक्तिकाल की ज्ञानाश्रयी निर्गुण धारा के शिखर हैं। निर्धारित संपादन श्यामसुंदर दास की कबीर ग्रंथावली है। भाषा सधुक्कड़ी है। रूप साखी, सबद और रमैनी हैं। राम निराकार है। गुरु, माया-खंडन, जाति और आडंबर पर चोट उनकी भूमि है। शुक्ल उन्हें निर्गुण का प्रतिनिधि कहते हैं; द्विवेदी उनकी जड़ सिद्ध-नाथ और लोक में देखते हैं। बीजक अलग शाखा का संग्रह है; परीक्षा का पाठ ग्रंथावली है। व्याख्या निर्धारित पंक्ति के भाव पर टिकती है।

निर्धारित पद पहली पंक्ति से पहचाने जाते हैं। दुलहिनी गावहु मंगलचार — आत्मा दुल्हन, राम भरतार, घट का विवाह। बहुत दिनन थैं प्रीतम पाये — लंबे वियोग के बाद मिलन। संतौ भाई आई ग्यान की आंधी — भ्रम की टाटी उड़ती है, माया नहीं बँधती। मन रे जागत रहिये — गाफिल सोए तो काल ले जाता है। पांडे कौन कुमति — कागद की लेखी के विरुद्ध आँखिन देखी। हम न मरैं मरिहैं संसारा — जियावनहारा मिलने पर मृत्यु-भय टूटता है। छह पद मिलन, ज्ञान, जागरण, शास्त्र-खंडन और अमरत्व देते हैं।

निष्कर्ष यह है कि कबीर ग्रंथावली निर्गुण का मानक पाठ है और निर्धारित पद अनुभव के छह द्वार खोलते हैं। बीजक अलग संग्रह है; भाव पंक्ति की चोट में है।

42. “दुलहिनी गावहु मंगलचार” और “संतौ भाई आई ग्यान की आंधी रे” पदों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।8 अंक

दोनों पद कबीर ग्रंथावली से निर्धारित हैं। संपादन श्यामसुंदर दास का है। पहला पद दुलहिनी गावहु मंगलचार विवाह-रूपक है। दुलहिनी से मंगलचार गवाने को कहा गया है। घर में राजा राम भरतार आए हैं। जीव स्त्री है, निराकार राम पति है। तन-मन की तैयारी लौकिक शृंगार नहीं, घट की शुद्धि है। बहुत दिनन का वियोग मिलन को भारी बनाता है। संत-काव्य का शृंगार परम से विवाह है, दरबारी नायिका-भेद नहीं।

दूसरा पद संतौ भाई आई ग्यान की आंधी रे ज्ञान को आँधी बनाता है। हे संतो, ज्ञान की आँधी आई। भ्रम की टाटी उड़ गई, माया बाँध नहीं पाती। हित-चित्त के खंभे गिरे, मोह टूटा, तृष्णा की छानी गिरी, कुबुद्धि का भाँडा फूटा। योग-युक्ति से बाँधे घर में पानी नहीं चुए। आँधी के बाद प्रेम की वर्षा है; सूर्य उगता है, तम क्षीण होता है। घर के बिंब — टाटी, थूनी, भाँडा — उलटबाँसी को लोक की जीभ देते हैं। ज्ञान शास्त्र की सूची नहीं, तूफान है।

निष्कर्ष यह है कि पहला पद मिलन का रूपक है, दूसरा ज्ञान की आँधी। दोनों में अनुभव ग्रंथ से बड़ा है; निर्गुण यहीं कविता बनता है।

43. कबीर की निर्धारित साखियों में गुरु, नाम और विरह का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।8 अंक

साखी ग्रंथावली का सूत्र-रूप है। संपादन श्यामसुंदर दास का है। गुरु संबंधी साखी सतगुरु को सच्चा सूरियाँ और लुहार कहती है। शिष्य लोहा है। गुरु पीटता और तपाता है; तारे की धार से कनक-कुंदन बनता है। हसैं न बोलै उनमनी — चंचल मन मारा गया, हँसी-बोल बंद। गुरु प्रेम की मिठास नहीं, साधना की चोट है। बिना गुरु के निर्गुण केवल इनकार रह जाता है। द्विवेदी गुरु को कबीर की भूमि कहते हैं।

नाम निरभै राम जपि जब लग दीवै बाति में है। तेल और बाती रहते जपो; बुझने के बाद दिन-रात सोना है। जिहि घटि प्रीति न प्रेम रस — वह घट श्मशान है। प्रेम न चाखिया, चखि न लीया साव — प्रेम स्वाद है, पढ़ाई नहीं। विरह घर और पक्षी से बोलता है। बिरहनी रात को रोती है जैसे कुंज बच्चों को। पंथ पर खड़ी पंथी से पूछती है। रग तंत हैं, तन रबाब है, विरह नित्य बजाता है। आँखें झाई पड़ गईं। पिंजर प्रेम से प्रकाशता है। सुरति निरति में समाती है।

निष्कर्ष यह है कि निर्धारित साखियों में गुरु गढ़ता है, नाम जगाता है, विरह बजाता है। तीनों एक साधना हैं; कबीर का विरह कथा नहीं, एक पंक्ति की चोट है।

44. “हम न मरैं मरिहैं संसारा” और “पांडे कौन कुमति तोहि लागी” की व्याख्या कीजिए।8 अंक

पहला पद हम न मरैं मरिहैं संसारा मृत्यु-भय का खंडन है। ग्रंथावली, श्यामसुंदर दास। कबीर कहते हैं — हम नहीं मरते, संसार मरता है। जियावनहारा मिल गया। जो राम नहीं जानते, वे जीते-जी मरे। साकत मरै, संत जन जीवै; राम-रस पिए रहते हैं। हरि मरें तो हम भी मरें; हरि नहीं मरते तो हम काहे को मरें। काया मरती है। नाम और आत्मा की रेखा अमर है। यह पद निर्गुण के शांत रस को साहस बनाता है।

दूसरा पद पांडे कौन कुमति तोहि लागी पंडित की कुमति पर है। कागद की लेखी आँखिन देखी के सामने छोटी है। मूर्ति, तीर्थ, जाति और कर्मकांड का अभिमान कुमति है। कबीर पंडित को शास्त्र से नहीं, अनुभव से जवाब देते हैं। दोनों पद एक ही भूमि के दो वार हैं — एक काल पर, एक शास्त्र-अभिमान पर। ज्ञानाश्रयी धारा की फटकार यहीं कविता बनती है। भाषा सधुक्कड़ी है; बिंब घर और देह के हैं। रस शांत और व्यंग्य साथ हैं।

निष्कर्ष यह है कि एक पद अमरत्व गाता है, दूसरा पांडे की कुमति काटता है। निराकार राम दोनों का केंद्र है; अनुभव शास्त्र से बड़ा ठहरता है।

45. जायसी के सिंहलद्वीप खंड की निर्धारित पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।8 अंक

ये चौपाइयाँ पद्मावत के सिंहलद्वीप खंड से हैं। संपादन आचार्य रामचंद्र शुक्ल का निर्धारित है। प्रसंग द्वीप का वर्णन है — जहाँ पद्मावती है, जहाँ रत्नसेन की यात्रा का लक्ष्य है। जायसी की पंक्ति में नाम सिंघलदीप है। पहली पंक्ति है — सिंघलदीप कथा अब गावौं। अन्वय। अब सिंघलदीप की कथा गाता हूँ। मानसरोवर का वर्णन क्या कहूँ। पनिहारियाँ जल भरकर आती हैं। आस-पास अमृत-बारियाँ हैं। चारों ओर फुलवारी है। सिंघल गढ़ के पास आए। नौ पौरी पर दसवाँ द्वार है। रजबार में तुरंग बँधे हैं। राजसभा बैठी है। राजमंदिर और रनिवास का वर्णन है।

भाव द्वीप को लोक-स्वर्ग बनाने का है। मानसरोवर तीर्थ और सौंदर्य दोनों है। पनिहारी लोक-चित्र है। नव-दस द्वार, अश्वशाला, सभा और रनिवास वैभव की सीढ़ी हैं। लौकिक पाठ द्वीप का वर्णन है। पारमार्थिक पाठ में सिंघल हृदय या आध्यात्मिक भूमि है, पद्मावती ज्योति, समुद्र मार्ग। प्रतीक एक-से नहीं बाँधे जाते; आख्यान दोहरे पाठ देता है। चौपाई की गति यात्रा है। अवधी मधुर है। निर्धारित अंश नागमती-विरह नहीं, लक्ष्य का चित्र है।

निष्कर्ष यह है कि सिंहलद्वीप खंड लक्ष्य का चित्र है, वियोग का नहीं। वर्णन सौंदर्य है, रहस्य संकेत है; कथा को केवल रूपक की हड्डी नहीं बनाना चाहिए।

46. सुंदर ग्रंथावली के निर्धारित अंशों का भाव लिखिए।8 अंक

सुंदरदास दादू-पंथ से जुड़े संत हैं। संपादन पुरोहित हरिनारायण शर्मा की सुंदर ग्रंथावली है। कबीर की फटकार के बाद यह वाणी अधिक व्यवस्थित है — नीति, वैराग्य, योग और भक्ति एक साथ। परशुराम चतुर्वेदी उन्हें संत-पंक्ति में रखते हैं। पलु ही में मरिजात पलु ही में जीवत है — संसार अनित्य है, अहंकार पल का है। काम जब जागे तो साँप कोई नहीं गिनता — वासना विवेक सो देती है। रंक को धन की अभिलाषा नचाती है। तीनों पंक्तियाँ नीति हैं, उलटबाँसी नहीं।

जोग करै जाग करै बेद विधि त्याग करै — साधना जागरण है, दिखावटी विधि नहीं। गेह तज्यो अरु नेह तज्यो — घर छूटना अधूरा है जब तक स्नेह न छूटे। बोलिए तो तब जब — वाणी तब, जब अंतर में हित हो। पति सूं ही प्रेम होय — प्रेम एक निराकार राम से है। सुनत नगारे चोट — काल या सतगुरु का नगाड़ा नींद तोड़ता है। सुंदरदास निर्गुण को अनुशासन देते हैं। भाषा राजस्थानी-सधुक्कड़ी का मिश्रण है।

निष्कर्ष यह है कि सुंदर ग्रंथावली निर्गुण को नीति और जागरण देती है। पल, काम, वाणी और पति-प्रेम कबीर की आँधी के बाद की शांति हैं।

47. रैदास बानी के निर्धारित पदों की व्याख्या कीजिए।8 अंक

रैदास ज्ञानाश्रयी संत हैं। चर्मकार माने जाते हैं; काशी से जुड़े। संपादन डॉ. शुक्देव सिंह की रैदास बानी है। भाई रे भरम-भगति सूं जानि — भरम और भक्ति अलग हैं। अब कैसे छूटै राम रट लागी — नाम ऐसी रट है कि छूटे नहीं; बंधन मुक्ति का है। आजु दिवस लेऊं बलिहारा — जागरण के दिन पर न्योछावर। कान्हा हो जग जीवन मोरा — जग का जीवन कान्हा है; संबोधन प्रेम की भाषा है, मंदिर का विग्रह नहीं। राम मैं पूजा कहाँ चढ़ाऊँ — फूल-मंदिर नहीं, पूजा घट और नाम में है। जाति का अपमान उत्तर पाता है।

माधो संगति सरनि तुम्हारी — शरण संगति की है। रथ को चतुर चलावन हारो — देह रथ, राम सारथि। जो तुम तोरौ राम मैनही तोरौं — प्रभु तोड़ें तो भी भक्त नहीं तोड़ता। पांडे हरी विचि अंतर डाढ़ा — पंडित और हरि के बीच कर्मकांड की दीवार है। स्वर विनय का है, कबीर की फटकार से कोमल। श्रम-गरिमा रैदास की पहचान है। भक्ति जाति से बड़ी है। पद गेय हैं।

निष्कर्ष यह है कि रैदास बानी निर्गुण को विनय, राम-रट और श्रम-गरिमा देती है। पांडे की दीवार कबीर जैसी है, कंठ हाथ जोड़े हुए है।

48. कबीर और रैदास की निर्गुण वाणी में साम्य और वैषम्य लिखिए।8 अंक

दोनों ज्ञानाश्रयी निर्गुण संत हैं। राम निराकार है। गुरु और नाम साधना के केंद्र हैं। जाति और पांडे के आडंबर पर आपत्ति है। भाषा लोक की है, संस्कृत-मार्गी नहीं। पद गेय हैं। कबीर ग्रंथावली श्यामसुंदर दास की है; रैदास बानी शुक्देव सिंह की। दोनों काशी की श्रम-भूमि से जुड़े माने जाते हैं। निर्गुण की परिभाषा दोनों पर एक-सी बैठती है। शुक्ल दोनों को ज्ञानाश्रयी शाखा में रखते हैं। द्विवेदी दोनों को लोक-श्रमण फसल कहते हैं।

वैषम्य स्वर का है। कबीर फटकारते हैं — पांडे कौन कुमति, ज्ञान की आँधी, हम न मरैं। रैदास विनय करते हैं — राम रट लागी, मैनही तोरौं, पूजा कहाँ चढ़ाऊँ। कबीर में उलटबाँसी और व्यंग्य अधिक हैं; रैदास में शरण और श्रम-गरिमा अधिक हैं। कबीर साखी को हथौड़े की तरह चलाते हैं; रैदास पद को हाथ जोड़कर गाते हैं। कबीर जुलाहे की चोट है, रैदास चर्मकार की गरिमा। साम्य भूमि पर है, वैषम्य कंठ पर।

निष्कर्ष यह है कि कबीर और रैदास निर्गुण भूमि पर मिलते हैं, स्वर पर अलग हैं। फटकार और विनय दोनों के बिना ज्ञानाश्रयी धारा एक कंठ की रह जाती है।

49. निर्धारित पदों और साखियों के आधार पर कबीर का काव्य-वैशिष्ट्य लिखिए।20 अंक

कबीर ज्ञानाश्रयी निर्गुण काव्य के शिखर हैं। निर्धारित पाठ श्यामसुंदर दास की कबीर ग्रंथावली है। शुक्ल उन्हें भक्तिकाल के निर्गुण प्रतिनिधि कहते हैं। द्विवेदी उनकी जड़ सिद्ध-नाथ, श्रमण और लोक में देखते हैं। विजयेंद्र स्नातक और बड़थ्वाल इसी चौड़ाई को साधना-संप्रदाय से बाँधते हैं। परशुराम चतुर्वेदी संत-परंपरा को पंथ और लोक से जोड़ते हैं। वैशिष्ट्य ग्रंथ की मोटाई में नहीं, पंक्ति की चोट में है। भाषा सधुक्कड़ी है। रूप पद और साखी हैं — गेय अनुभव और सूत्र। बीजक पंथ-संकलन है; परीक्षा का आधार ग्रंथावली का निर्धारित अंश है।

पद मिलन, ज्ञान, जागरण, शास्त्र-खंडन और अमरत्व खोलते हैं। दुलहिनी गावहु मंगलचार आत्मा को दुल्हन और राम को भरतार बनाता है। बहुत दिनन थैं प्रीतम पाये वियोग के बाद के मिलन हैं। संतौ भाई आई ग्यान की आंधी भ्रम की टाटी उड़ाती है; माया नहीं बँधती; मोह, तृष्णा और कुबुद्धि घर के बिंब में टूटते हैं। मन रे जागत रहिये गाफिल को जगाता है। पांडे कौन कुमति कागद की लेखी के विरुद्ध आँखिन देखी है। हम न मरैं मरिहैं संसारा — जियावनहारा मिलने पर काल छोटा पड़ जाता है। ये पद मंदिर का भजन नहीं, घट का विद्रोह और विश्वास दोनों हैं। प्रतीक विवाह, आँधी, दीया और घर के हैं।

साखियाँ गुरु, नाम, प्रेम और विरह बाँधती हैं। सतगुरु लुहार है, शिष्य लोहा; तप और चोट बिना कनक नहीं। उनमनी में हँसी-बोल बंद हैं। निरभै राम दीए की बाती तक जपना है। बिना प्रेम-रस का घट श्मशान है; प्रेम चाखना है, पढ़ना नहीं। विरहनी कुंज की तरह रात रोती है, पंथ पर पंथी से पूछती है; तन रबाब है, विरह वादक है; आँखें निहारते झाई पड़ती हैं; पिंजर प्रकाशता है। सुरति निरति में समाती है — नाथ-शब्द अनुभव बन जाते हैं। साखी कथा नहीं चलाती; एक चित्र ठोककर बैठती है।

काव्य की विशेषताएँ यहीं से निकलती हैं। प्रतीक घर, कारीगरी, विवाह, आँधी, दीया, रबाब और पक्षी के हैं। रस शांत और भक्ति प्रधान हैं; व्यंग्य और करुण साथ हैं। उलटबाँसी लोक की जीभ से चलती है। सामाजिक फटकार जाति और पांडे पर है, व्यक्ति-द्वेष पर नहीं। सीमा पाठ-भेद और मौखिक प्रक्षेप की है; बीजक और ग्रंथावली एक नहीं। कला लक्ष्य नहीं, साधन है। मौखिक प्रचार पाठ से पहले है।

निष्कर्ष यह है कि निर्धारित अंश कबीर का पूरा बीजक नहीं, उनकी साँस हैं। पद अनुभव गाते हैं, साखी सूत्र बाँधती है। निराकार राम, गुरु की चोट, ज्ञान की आँधी और विरह का रबाब — यही वैशिष्ट्य है। इकाई 3 की परिभाषा यहीं पंक्ति बनती है। व्याख्या प्रसंग, अन्वय और सौंदर्य के बिना अधूरी रहती है; युग-दृष्टि शुक्ल और द्विवेदी के बिना अधूरी रहती है।

50. जायसी, सुंदरदास और रैदास निर्धारित पाठ के आधार पर निर्गुण काव्य की तीन दिशाएँ कैसे खोलते हैं?20 अंक

निर्गुण भक्तिकाल एक स्वर नहीं। शुक्ल उसे दो खानों में बाँधते हैं — ज्ञानाश्रयी संत और प्रेमाश्रयी सूफी। निर्धारित पाठ में जायसी, सुंदरदास और रैदास ये खाने कविता बनाते हैं। कबीर शिखर अलग प्रश्न है; ये तीन दिशाएँ उसकी चौड़ाई हैं। संपादन क्रमशः रामचंद्र शुक्ल, पुरोहित हरिनारायण शर्मा और शुक्देव सिंह के हैं। विजयदेव नारायण साही पद्मावत की संवेदना खोलते हैं; चतुर्वेदी संत-पंक्ति को लोक से बाँधते हैं। तीनों कवि एक इकाई के तीन द्वार हैं, एक स्वर की नकल नहीं।

जायसी प्रेमाश्रयी दिशा हैं। पद्मावत का सिंहलद्वीप खंड द्वीप गाता है। सिंघलदीप कथा अब गावौं — लक्ष्य पहले दिखाई देता है। मानसरोवर, पनिहारी, अमृत बारी, फुलवारी, नव पौरी और दसवाँ द्वार, रजबार, राजसभा, राजमंदिर-रनिवास — लौकिक स्वर्ग का चित्र है। पारमार्थिक पाठ में द्वीप हृदय या आध्यात्मिक भूमि है, पद्मावती ज्योति, यात्रा साधना। साही कविता को प्रतीक की हड्डी नहीं बनाते; शुक्ल ग्रंथ को महाकाव्य-समीप रखते हैं। अवधी चौपाई सधुक्कड़ी साखी से अलग घर है। विरह आगे नागमती में पूरा होता है; निर्धारित पंक्तियाँ द्वीप की ज्योति हैं।

सुंदरदास ज्ञानाश्रयी धारा को नीति देते हैं। निर्धारित पाठ सुंदर ग्रंथावली है, संपादक पुरोहित हरिनारायण शर्मा। पल में मरना-जीना अनित्य है। काम साँप नहीं गिनने देता। धन की अभिलाषा रंक को नचाती है। जोग-जाग वेद-विधि के दिखावे से बड़ा है। गेह और नेह दोनों छोड़ने पड़ते हैं। बोलना तब, जब हित हो। प्रेम पति-राम से एक है। नगाड़े की चोट जगाती है। दादू-पंथ की व्यवस्थित वाणी कबीर की आँधी के बाद की शांति है। राजस्थानी-सधुक्कड़ी मिश्रण उनकी जीभ है।

रैदास ज्ञानाश्रयी धारा को विनय और श्रम देते हैं। भरम और भक्ति अलग जानो। राम-रट छूटे नहीं। पूजा कहाँ चढ़ाऊँ — मंदिर की वस्तु नहीं, घट का नाम है। माधो की संगति शरण है। रथ का सारथि राम है। तुम तोड़ो, मैं न तोड़ूँ। पांडे और हरि के बीच दीवार है। स्वर कबीर से कोमल है; जाति का उत्तर गरिमा से आता है, गाली से नहीं। पद गेय हैं; कान्हा-माधो संबोधन प्रेम की भाषा है, सगुण मंदिर नहीं।

निष्कर्ष यह है कि जायसी, सुंदरदास और रैदास निर्गुण की तीन दिशाएँ खोलते हैं। जायसी कथा और रूपक हैं। सुंदरदास अनुशासन हैं। रैदास शरण और श्रम हैं। साम्य निराकार भूमि, गुरु-नाम और आडंबर-दूरी पर है। वैषम्य मार्ग पर है — चौपाई का द्वीप, नीति का पल, विनय का पद। बिना जायसी के निर्गुण केवल फटकार रह जाता; बिना सुंदर-रैदास के संतकाव्य केवल कबीर रह जाता। निर्धारित पाठ पूरे ग्रंथ का स्थानापन्न नहीं; तीन दिशाओं का द्वार है।

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