Skip to content
noteswale

Units

संतकाव्य और प्रेमाख्यान notes

Ready

संतकाव्य और प्रेमाख्यान is a topic in Ancient poetry (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

इकाई 2 में भक्तिकाल का ढाँचा आया — निर्गुण और सगुण। यह इकाई निर्गुण के दोनों उपखंड खोलती है। पहला उपखंड ज्ञानाश्रयी संतकाव्य है: पृष्ठभूमि, प्रमुख संतकवि…

इकाई 3 · संतकाव्य और प्रेमाख्यान

इकाई 2 में भक्तिकाल का ढाँचा आया — निर्गुण और सगुण। यह इकाई निर्गुण के दोनों उपखंड खोलती है। पहला उपखंड ज्ञानाश्रयी संतकाव्य है: पृष्ठभूमि, प्रमुख संतकवि और रचनाएँ, वैशिष्ट्य, काव्य-प्रवृत्तियाँ। दूसरा उपखंड प्रेमाश्रयी सूफी प्रेमाख्यान है: उद्गम-स्रोत और पूर्व-परंपरा, प्रमुख कवि-रचनाएँ, वैशिष्ट्य और प्रवृत्तियाँ। यहाँ धारा का इतिहास है; निर्धारित पद और सिंहलद्वीप खंड पंक्ति-पाठ हैं। आचार्य शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, परशुराम चतुर्वेदी, पीतांबरदत्त बड़थ्वाल और श्यामनमोहर पांडेय इसी भूमि के मानक नाम हैं।

सार: संतकाव्य नाम-ज्ञान और रूढ़ि-खंडन की वाणी है; प्रेमाख्यान इश्क और विरह की कथा है। दोनों निर्गुण हैं, मार्ग अलग हैं। कबीर संत-शिखर हैं, जायसी प्रेमाख्यान-शिखर।

1 संतकाव्य की पृष्ठभूमि

संतकाव्य भक्तिकाल की ज्ञानाश्रयी निर्गुण धारा है। उसका ईश्वर निराकार है, मंदिर-मूर्ति से बड़ा, जाति से असंबद्ध। यह धारा अचानक चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में नहीं फूटी। उपनिषद का अद्वैत चिंतन को भाषा देता है, यद्यपि संत शास्त्र का अद्वैत नहीं दोहराते। बौद्ध-जैन श्रमण धारा अहिंसा, करुणा और बाहरी कर्मकांड की आलोचना दे चुकी थी। सिद्धों की सहज-वाणी और नाथों का हठयोग गुरु, देह और खिचड़ी भाषा पहले से चला रहे थे। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी संत को इसी लंबी तैयारी का फल मानते हैं। आचार्य शुक्ल संतकाव्य को भक्तिकाल के भीतर ज्ञानाश्रयी शाखा कहते हैं। दोनों बातें साथ बैठती हैं — युग भक्तिकाल का है, जड़ आदिकाल की सिद्ध-नाथ भूमि में है।

सामाजिक पृष्ठभूमि वर्ण-व्यवस्था, कर्मकांड और ऊँच-नीच का दबाव है। संत प्रायः तथाकथित निम्न या श्रमण जातियों से आए — कबीर जुलाहे, रैदास चमार माने जाते हैं। रामानंद उत्तर भारत में राम-नाम को लोक तक ले गए; संत उसी खुले द्वार से गुजरते हैं, यद्यपि वे सगुण राम को ज्यों का त्यों नहीं अपनाते। इस्लाम का स्थायी संपर्क एकेश्वर और मूर्ति-खंडन को नया दबाव देता है; सूफी खानकाहें और संत-पंथ एक ही नगर में चलते हैं। डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल निर्गुण संप्रदाय को हिन्दी काव्य की स्वतंत्र साधना-धारा मानते हैं। परशुराम चतुर्वेदी उत्तर भारत की संत-परंपरा को पंथ, वाणी और लोक से जोड़कर देखते हैं। साहित्यिक पृष्ठभूमि देशी भाषा है — सधुक्कड़ी, खिचड़ी हिन्दी — संस्कृत का आग्रह यहाँ टूटता है।

2 प्रमुख संतकवि और रचनाएँ

कबीर इस धारा के शिखर हैं। वाणी साखी, सबद और रमैनी में बँटी मानी जाती है। कबीर पंथ का बीजक एक संकलन है; श्यामसुंदर दास संपादित कबीर ग्रंथावली निर्धारित पाठ है। विषय हैं — निराकार राम, गुरु, माया, जाति-पांति का खंडन, हिन्दू-मुसलमान दोनों के आडंबर की आलोचना, प्रेम और विरह। आचार्य द्विवेदी कबीर की वाणी की प्रभविष्णुता और सामाजिक चौड़ाई पर बल देते हैं; शुक्ल उनकी निर्गुण भक्ति और फटकार को युग-धर्म से जोड़ते हैं। गुरु नानक पंजाब की संत-भूमि और सिख पंथ दोनों से जुड़े। जपुजी और आदि ग्रंथ की बाणी निर्गुण नाम-सिमरन की भाषा है। दादू दयाल राजस्थान-अजमेर क्षेत्र के संत हैं; दादू-वाणी साखी-पद में है, निर्गुण और समभाव उनकी पहचान है।

रैदास / रविदादास रामानंदी परिधि के निकट माने जाते हैं, पर वाणी निर्गुण-भक्ति और श्रम-गरिमा की है; रैदास बानी पदों का संग्रह है। सुंदरदास दादू-शिष्य माने जाते हैं; सुंदर ग्रंथावली में ज्ञान, वैराग्य और नीति का अधिक व्यवस्थित काव्य है। मलूकदास, पलटूदास, धरमदास, गरीबदास आगे की पंक्ति हैं। नानक को केवल पंजाबी कवि कहकर हिन्दी संतकाव्य से काटना अधूरा है; शुक्ल उन्हें ज्ञानाश्रयी शाखा में रखते हैं। यहाँ युग के नाम और ग्रंथ हैं।

संतप्रमुख वाणी / ग्रंथसंकेत
कबीरसाखी-सबद-रमैनी; बीजक; ग्रंथावलीनिर्गुण राम, फटकार, प्रेम
गुरु नानकजपुजी; आदि ग्रंथ की बाणीनाम, एक ओंकार
दादू दयालदादू-वाणीसमभाव, निर्गुण
रैदासरैदास बानीपद, श्रम-गरिमा
सुंदरदाससुंदर ग्रंथावलीज्ञान-वैराग्य, दादू-शिष्य

3 संतकाव्य का वैशिष्ट्य

वैशिष्ट्य सबसे पहले ब्रह्म का है। संत का राम निराकार, अवर्णनीय और अंतःस्थित है। मूर्ति, तीर्थ और व्रत साधन नहीं, प्रायः बंधन माने गए। गुरु संत-मार्ग का द्वार है — बिना गुरु ज्ञान नहीं, पर गुरु व्यक्ति-पूजा से बड़ा अनुभव है। सहज साधना कर्मकांड और हठ के दिखावे के विरुद्ध है। नाम-सिमरन हृदय की वृत्ति है। माया, मन और त्रिविध ताप संत-काव्य के स्थायी शत्रु हैं। अनुभव शास्त्र से ऊपर है; वेद-कुरान दोनों को संत तभी मानते हैं जब वे जीवन में उतरें। यही बात उन्हें पंडित और काजी दोनों से टकराती है।

सामाजिक वैशिष्ट्य कम बड़ा नहीं। जाति, वर्ण और छुआछूत का खंडन संतकाव्य की रीढ़ है। हिन्दू और मुसलमान के बाहरी भेद को वे एक राम / एक अल्लाह में विलीन करते हैं। भाषा लोक की है — सधुक्कड़ी, पंजाबी-राजस्थानी-पूर्वी का मेल। वाणी गेय है, पंथों में चलती है, दरबार की वस्तु नहीं। परशुराम चतुर्वेदी इसी को संत-परंपरा की सामाजिक प्रासंगिकता कहते हैं। सीमा भी लिखनी चाहिए: पंथ बाद में संप्रदाय बन जाते हैं, वाणी प्रक्षिप्त होती है, और निराकार राम कभी-कभी सगुण संबोधन में भी बोल पड़ता है। वैशिष्ट्य शुद्ध खाना नहीं, प्रवृत्ति का केंद्र है।

4 संतकाव्य की काव्य प्रवृत्तियाँ

रूप की प्रधान प्रवृत्ति साखी या दोहा है — नीति, अनुभव और चोट एक ही पंक्ति में। सबद या पद गेय हैं, संगति में गाए जाते हैं। रमैनी कबीर-पंथ में लंबी रचना का रूप है। उलटबाँसी उलटी प्रतीक-भाषा है — नदी जलती है, मछली थल पर चढ़ती है — सहज समाधि का संकेत, पहेली नहीं मात्र। प्रतीक घर के हैं: चादर, कछिया, बानी, हंस, कस्तूरी। रूपक व्यापार और जुलाहे के औजार से बनते हैं। भाषा मिलाजुली है; व्याकरण दरबार का नहीं, मुहावरा लोक का है। अलंकार जान-बूझकर नहीं लाए गए, फिर भी अनुप्रास और विरोधाभास बार-बार आते हैं।

रस की दृष्टि से शांत और भक्ति प्रधान हैं; वीर और शृंगार यहाँ राज्याश्रय वाले अर्थ में नहीं। व्यंग्य और फटकार कबीर की पहचान हैं — यह भी एक काव्य-वृत्ति है, केवल उपदेश नहीं। मौखिक प्रचार प्रवृत्ति का अंग है; पाठ बाद में संकलन हैं। सुंदरदास में दोहा-पद के साथ अधिक व्यवस्थित निरूपण मिलता है। नानक की बाणी संगीत-राग से बँधी है। प्रवृत्तियों का सार यही है कि संतकाव्य मंदिर-शास्त्र की भाषा छोड़कर घर, घाट और पंथ की भाषा में ज्ञान गाता है। कला उनके यहाँ साधन है, लक्ष्य नहीं; फिर भी दोहा की मार और पद की लय हिन्दी की स्थायी संपत्ति बनी।

5 प्रेमाख्यान: उद्गम स्रोत और पूर्व परंपरा

प्रेमाख्यान भक्तिकाल की प्रेमाश्रयी निर्गुण शाखा है। सूफी साधक लौकिक प्रेम-कथा के भीतर ईश्वरीय इश्क कहते हैं। उद्गम एक नहीं, कई स्रोत हैं। फारसी मसनवी-परंपरा — लैला-मजनूँ, यूसुफ-जुलेखा — विरह, यात्रा और फना का ढाँचा देती है। इश्क मजाजी से इश्क हकीकी तक की सीढ़ी सूफी साधना की है: शरीअत, तरीकत, हकीकत, मारिफत। भारतीय स्रोत पुराण-कथा, लोक-कथा और राजस्थानी आख्यान हैं — पद्मावती-रातनसेन जैसी कथाएँ इतिहास और किंवदंती की संधि पर हैं। अपभ्रंश का संदेशरासक और लौकिक प्रेम-काव्य विरह-दूत की भूमि पहले से दे चुके थे। चंदायन (मुल्ला दाऊद) हिन्दी का प्रायः पहला बड़ा सूफी प्रेमाख्यान माना जाता है।

पूर्व परंपरा इसलिए दो धाराओं की संधि है। एक धारा इस्लामी रहस्य और खानकाह की; दूसरी धारा भारतीय कथा, चौपाई-दोहा और योग-नाथ के प्रतीक की। जायसी पद्मावत में सिंहलद्वीप, सात समुद्र, योगिनी-वेश और नागमती-विरह भारतीय हैं; पीर, इश्क और फना सूफी हैं। डॉ. श्यामनमोहर पांडेय मध्यकालीन प्रेमाख्यान को इसी संधि का साहित्य मानते हैं। रामपूजन तिवारी हिन्दी सूफी काव्य की भूमिका खानकाह, भाषा और कथा-विधान से खोलते हैं। गलत वाक्य: “प्रेमाख्यान केवल फारसी की नकल है।” सही वाक्य: फारसी ढाँचा और भारतीय कथा एक दूसरे में घुलकर हिन्दी की नई जाति बनाते हैं।

6 प्रमुख प्रेमाख्यान कवि और रचनाएँ

मुल्ला दाऊद का चंदायन / चंदायन लोरिक-चंदा की कथा है — हिन्दी प्रेमाख्यान की पहली बड़ी कड़ी। कुतुबन की मृगावती प्रेम, विरह और योग-यात्रा का आख्यान है; शुक्ल इसे प्रेमाश्रयी शाखा का प्रतिनिधि ग्रंथ मानते हैं। मंझन की मधुमालती स्वप्न, विरह और रहस्य की कथा है; भाषा और कल्पना दोनों में ऊँचाई है। मलिक मुहम्मद जायसी इस धारा के शिखर हैं। पद्मावत सिंहलद्वीप, रत्नसेन, पद्मावती और नागमती की कथा है; अखरावट और आखिरी कलाम अन्य रचनाएँ मानी जाती हैं। आचार्य शुक्ल ने जायसी ग्रंथावली संपादित कर पद्मावत को हिन्दी के महाकाव्य-समीप रखा। विजयदेव नारायण साही जायसी की संवेदना को आधुनिक आलोचना से खोलते हैं।

उसमान की चित्रावली, कासिम शाह का हंस जवाहर, नूर मुहम्मद की इंद्रावती आगे की कड़ियाँ हैं। कथा-सूत्र प्रायः एक से हैं — नायक का प्रस्थान, समुद्र-यात्रा, योगी-वेश, नायिका की प्राप्ति, विरहिणी का संदेश। वैविध्य भाषा, स्थानीय रंग और रहस्य के घनत्व में है। यहाँ कवि-सूची और वैशिष्ट्य हैं; सिंहलद्वीप खंड निर्धारित पंक्ति-पाठ है। प्रेमाख्यान की सूची रासो जितनी छोटी नहीं, पर शिखर-ग्रंथ पद्मावत ही रहा।

कविरचनासंकेत
मुल्ला दाऊदचंदायनप्रथम बड़ा हिन्दी प्रेमाख्यान
कुतुबनमृगावतीविरह, योग-यात्रा
मंझनमधुमालतीस्वप्न, रहस्य
जायसीपद्मावत; अखरावटशिखर-ग्रंथ, नागमती-विरह
उसमान / नूर मुहम्मदचित्रावली; इंद्रावतीपरंपरा की अगली कड़ी

7 प्रेमाख्यान का वैशिष्ट्य

वैशिष्ट्य कथा का नहीं, कथा के भीतर के अर्थ का है। नायक साधक है, नायिका परम तत्त्व, वियोग मार्ग, संगम सिद्धि। जायसी के यहाँ चित्तौड़ शरीर, सिंहल हृदय, पद्मावती बुद्धि या ईश्वरीय ज्योति — आलोचक प्रतीक अलग-अलग बाँधते हैं; स्थिर बात यह है कि आख्यान दोहरे पाठ देता है। लौकिक प्रेम बिना मिटाए आध्यात्मिक हो जाता है। विरह सूफी काव्य का प्राण है; नागमती का विरह हिन्दी की स्थायी संपत्ति माना गया। प्रकृति, बारहमासा और लोक-चित्र भारतीय मिट्टी के हैं। चौपाई कथा कहती है, दोहा ठहरकर अर्थ बाँधता है — यही छंद-युग्म आगे रामचरितमानस तक जाता है।

दूसरा वैशिष्ट्य सांस्कृतिक संधि है। पीर की स्तुति, इस्लामी एकेश्वर और हिन्दू योग-पुराण एक ही ग्रंथ में हैं। भाषा अवधी है, दरबारी फारसी नहीं। रहस्य भय से नहीं, प्रेम से खुलता है। सीमा भी है: प्रतीक कभी इतने घने हो जाते हैं कि कथा दब जाती है; ऐतिहासिक पद्मावती और काव्य-पद्मावती को एक मान लेना भ्रम है। वैशिष्ट्य यही है कि प्रेमाख्यान न केवल सूफी मत का अनुवाद है, न केवल लोक-कथा का छंद — वह दोनों का हिन्दी रूप है।

8 प्रेमाख्यान की प्रवृत्तियाँ और संत-धारा से संबंध

प्रवृत्तियों में प्रेम केंद्र है — लौकिक आख्यान, पारमार्थिक लक्ष्य। विरह, यात्रा, समुद्र, योगिनी-वेश, स्वप्न और गुरु-पीर स्थायी रूपक हैं। शृंगार और करुण दोनों चलते हैं; शांत रहस्य के तल पर है। भाषा अवधी-पूर्वी काव्यभाषा है, सधुक्कड़ी से अधिक कथात्मक। अतिशयोक्ति और रूपक प्रधान अलंकार हैं। नायिका-भेद रीति जैसा शास्त्र नहीं, कथा का चरित्र है। बारहमासा लोक-काव्य से गृहीत प्रवृत्ति है। ये प्रवृत्तियाँ संतकाव्य से मिलती भी हैं और अलग भी। मिलती हैं निर्गुण भूमि, गुरु-महिमा, लोकभाषा और आडंबर से दूरी पर। अलग हैं मार्ग पर — संत ज्ञान और फटकार से चलते हैं, सूफी कथा और विरह से।

शुक्ल दोनों को निर्गुण के दो खाने देते हैं: ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी। द्विवेदी संत को सिद्ध-नाथ की फसल कहते हैं; प्रेमाख्यान उनके विवेचन में भारतीय कथा और सूफी इश्क की संधि है। कबीर में प्रेम भी है, जायसी में ज्ञान भी — खाने सुविधा हैं। सामाजिक दृष्टि से संत जाति-व्यवस्था पर सीधा वार करते हैं; प्रेमाख्यान प्रायः राजकथा के भीतर रहस्य कहता है, फिर भी नागमती लोक-स्त्री के विरह की भाषा बोलती है। निर्गुण हिन्दी एक नहीं, दो शैलियों में गाया गया — साखी की चोट और चौपाई की कथा। दोनों के बिना भक्तिकाल का निर्गुण अधूरा है।

सार: संत = निराकार नाम, गुरु, जाति-खंडन, साखी-पद। प्रेमाख्यान = इश्क, विरह, मसनवी+भारतीय कथा, चौपाई-दोहा। कबीर और जायसी दो शिखर।

© noteswale.com — for personal exam prep only

More in Units

These Ancient poetry notes for B.A. Hindi belong to the B.A. Hindi syllabus on noteswale.