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भारतीय साहित्य परंपरा और हिन्दी साहित्येतिहास notes

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भारतीय साहित्य परंपरा और हिन्दी साहित्येतिहास is a topic in Ancient poetry (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

इस इकाई के दो खंड हैं। पहला खंड भारतीय साहित्य परंपरा है — वैदिक साहित्य, प्राकृत, पालि, लौकिक संस्कृत, अपभ्रंश और तमिल का संक्षिप्त परिचय। दूसरा खंड…

इकाई 1 · भारतीय साहित्य परंपरा और हिन्दी साहित्येतिहास

इस इकाई के दो खंड हैं। पहला खंड भारतीय साहित्य परंपरा है — वैदिक साहित्य, प्राकृत, पालि, लौकिक संस्कृत, अपभ्रंश और तमिल का संक्षिप्त परिचय। दूसरा खंड साहित्येतिहास है — साहित्य का इतिहास-दर्शन, हिन्दी साहित्येतिहास की लेखन-परंपरा, और उस लेखन की समस्याएँ। हिन्दी को अकेला विषय न मानकर वैदिक से तमिल तक की धारा में बैठाना है, फिर देखना है कि हिन्दी का इतिहास किन ग्रंथों से लिखा गया।

आधार डॉ. नगेन्द्र का भारतीय साहित्य का समेकित इतिहास; मूलचंद गौतम, श्रीभगवान सिंह और रामचभिल त्रिपाठी के भारतीय-साहित्य ग्रंथ; आचार्य रामचंद्र शुक्ल का हिन्दी साहित्य का इतिहास; आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की हिन्दी साहित्य की भूमिका; डॉ. बच्चन सिंह का हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास; डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी का हिन्दी साहित्य एवं संवेदना का विकास।

सार: प्रत्येक शाखा पर भाषा, प्रमुख ग्रंथ और हिन्दी से संबंध। इतिहास-भाग में शुक्ल की प्रवृत्ति-विधि और द्विवेदी की चौड़ाई।

1 भारतीय साहित्य परंपरा — आशय

भारतीय साहित्य परंपरा का अर्थ किसी एक भाषा का इतिहास नहीं। वह उस पूरे रचना-संसार का नाम है जो वेद, श्रमण-वाङ्मय, लौकिक संस्कृत, प्राकृत-अपभ्रंश और द्रविड़ साहित्य में फैला है। भाषाएँ अलग हैं। लिपियाँ अलग हैं। राज्याश्रय अलग रहे। फिर भी कथा-सूत्र बार-बार मिलते हैं — राम, कृष्ण, पंचतंत्र-जातक, विरह-दूत, नीति और भक्ति। रस-विधान संस्कृत नाट्यशास्त्र से देशी काव्य तक चलता है। अहिंसा और करुणा श्रमण धारा से संत-काव्य तक पूछी जाती हैं। आचार्य नगेन्द्र इसी को समेकित भारतीय साहित्य कहते हैं। विस्तार कई नदियों का है; समुद्र एक है। श्रीभगवान सिंह इसे साहित्य की भारतीय परंपरा कहते हैं — एक परंपरा, कई वाणियाँ।

एकात्मता का अर्थ एकरूपता नहीं। तमिल संगम की तिणै और ऋग्वेद का सूक्त एक छंद में नहीं बँधे। जैन आगम और कालिदास एक रस में नहीं बैठते। एकात्मता कथा, मूल्य और काव्य-रीति के आदान-प्रदान में है। विविधता भाषा, प्रदेश और संप्रदाय में है। गलत वाक्य यह है कि भारतीय साहित्य केवल संस्कृत है। सही वाक्य यह है कि संस्कृत सांस्कृतिक केंद्र रही, पर पालि, प्राकृत, अपभ्रंश और तमिल स्वतंत्र साहित्य हैं, टिप्पणी नहीं।

हिन्दी इसी महादेश की एक उत्तर-भारतीय धारा है। सांस्कृतिक जड़ वैदिक और लौकिक संस्कृत में है — विषय, मिथक, रस-शास्त्र। भाषा की निकटतम जड़ प्राकृत-अपभ्रंश में है — दोहा, चौपाई, लोक-शब्द। दक्षिण का तमिल संगम यह सिद्ध करता है कि भारतीय साहित्य केवल गंगा-यमुना का मैदान नहीं। नगेन्द्र हिन्दी को अकेले न पढ़ने का आग्रह करते हैं; मूलचंद गौतम भारतीय साहित्य को कई केंद्रों वाला बताते हैं। हिन्दी से पहले भारत का वाङ्मय यहीं बैठता है।

परिचय संक्षिप्त है, पूरे वेद या पूरे संगम का पाठ नहीं। प्रत्येक शाखा पर भाषा, दो-तीन ग्रंथ, एक शैली-लक्षण, और हिन्दी से संबंध पर्याप्त हैं।

शाखाभाषाहिन्दी से मुख्य संबंध
वैदिकवैदिक संस्कृतचिंतन और श्रुति-स्मृति का अंतर
प्राकृतमहाराष्ट्री, शौरसेनी, मागधी, अर्धमागधीलोक-भाषा का पुल
पालिथेरवाद की साहित्यिक पालिश्रमण संवेदना; भाषा-वंश समांतर
लौकिक संस्कृतलौकिक संस्कृतराम-कृष्ण कथा, रस-शास्त्र, महाकाव्य-नाटक
अपभ्रंशअपभ्रंशपुरानी हिन्दी का निकटतम रूप; दोहा-चौपाई
तमिलसंगम तमिलस्वतंत्र द्रविड़ केंद्र; भक्ति की अखिल भारतीय कड़ी

2 वैदिक साहित्य — संहिताएँ

वैदिक वाङ्मय श्रुति है — गुरु-शिष्य परंपरा में सुना और स्मरण रखा गया ज्ञान। स्मृति इससे अलग कोटि है: रामायण, महाभारत, पुराण, धर्मशास्त्र। श्रुति को अपौरुषेय माना गया; स्मृति मनुष्य-रचित मानी गई। यह भेद साहित्येतिहास का भी है। श्रुति मंत्र और यज्ञ की दुनिया है। स्मृति कथा, राज्य और आचार की। हिन्दी का राम-कृष्ण काव्य स्मृति-कथा से अधिक जुड़ता है; निर्गुण चिंतन श्रुति-उपनिषद की लंबी रेखा पर खड़ा है।

चार संहिताएँ वैदिक साहित्य का द्वार हैं। ऋग्वेद सूक्तों का सबसे प्राचीन उपलब्ध संग्रह है। दस मंडल, सहस्राधिक सूक्त। इंद्र, अग्नि, सोम, उषा, वरुण की स्तुति के साथ नासदीय जैसे दार्शनिक सूक्त भी हैं, जो सृष्टि के आरंभ पर प्रश्न करते हैं। प्राकृतिक शक्ति का मानवीकरण और जिज्ञासा साथ-साथ हैं। यजुर्वेद यज्ञ की प्रक्रिया का ग्रंथ है — मंत्र के साथ कर्म। शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद दो बड़ी शाखाएँ हैं। सामवेद अधिकांशतः ऋग्वैदिक मंत्रों का गान-रूप है; साहित्य यहाँ स्वर और विधि का है, नई कथा का नहीं। अथर्ववेद लोक-जीवन के निकट है — रोग, रक्षा, आशीष, गृह-कर्म, शांति। चारों वेद चार काम करते हैं: स्तुति, यज्ञ, गान, लोक-रक्षा।

भाषा वैदिक संस्कृत है, लौकिक संस्कृत नहीं। कालिदास की भाषा वेद की भाषा नहीं मानी जाती। वैदिक रूप पुराने हैं; लौकिक संस्कृत पाणिनि के बाद की साहित्यिक मानक भाषा है। हिन्दी से सीधा शब्द-वंश यहाँ गौण है। महत्त्व चिंतन का है: ऋत, यज्ञ, स्तुति, प्रश्न। नगेन्द्र वैदिक वाङ्मय को समेकित भारतीय साहित्य की पहली परत कहते हैं। गलत वाक्य: हिन्दी वैदिक संस्कृत से सीधी निकली। सही वाक्य: हिन्दी उसी सांस्कृतिक जड़ की उत्तर-भारतीय शाखा है; भाषा का पुल प्राकृत-अपभ्रंश है।

वेदप्रधान कामसंकेत
ऋग्वेदसूक्त / स्तुतिसबसे प्राचीन संहिता; उषा, अग्नि, नासदीय
यजुर्वेदयज्ञ-विधिमंत्र के साथ कर्म
सामवेदगानऋग्वैदिक मंत्रों का स्वर-रूप
अथर्ववेदलोक-रक्षा, आशीषगृह और रोग के निकट

3 वैदिक साहित्य — ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद, वेदांग

प्रत्येक वेद चार स्तरों में व्यवस्थित माना जाता है। पहला स्तर संहिता है — मंत्र और सूक्त का पाठ। दूसरा ब्राह्मण है — मंत्र की गद्य व्याख्या और यज्ञ का अर्थ। शतपथ ब्राह्मण और ऐतरेय ब्राह्मण स्मरणीय नाम हैं। यहाँ साहित्य गद्य का है, काव्य का नहीं; आख्यान और संवाद बाद की कथा-शैली की भूमि देते हैं। तीसरा स्तर आरण्यक है — वन में पढ़े जाने वाले चिंतन की ओर संधि। ऐतरेय आरण्यक उदाहरण है। ब्राह्मण यज्ञ-कर्म के ग्रंथ हैं; आरण्यक यज्ञ से ज्ञान की ओर पुल हैं।

चौथा स्तर उपनिषद है — आत्मा, ब्रह्म, जन्म-मरण, विद्या-अविद्या का विवेक। बृहदारण्यक, छांदोग्य, ईश, कठ, मुंडक प्रमुख नाम हैं। याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद पूछता है कि धन और संबंध ज्ञान की सीमा पर कहाँ ठहरते हैं। कठोपनिषद का नचिकेता-प्रसंग मृत्यु और श्रेय-प्रेय का विवेक है। ये संवाद साहित्यिक भी हैं: प्रश्न, उत्तर, मौन, उपमा। उपनिषद ज्ञानकांड कहे जाते हैं; संहिता-ब्राह्मण कर्मकांड की ओर अधिक हैं। चार स्तर चार धर्म नहीं, एक वेद के अंग हैं।

वेदांग वेद को समझने के छह औजार हैं — शिक्षा (उच्चारण), कल्प (विधि), व्याकरण, निरुक्त (अर्थ), छंद, ज्योतिष। ये पाँचवाँ स्तर नहीं, सहायक अंग हैं। निरुक्त यास्क से जुड़ा है। पाणिनि लौकिक संस्कृत के वैयाकरण हैं, वैदिक संहिता के रचयिता नहीं। वेदांग दिखाते हैं कि वेद केवल मंत्र-पाठ नहीं, एक ज्ञान-व्यवस्था है।

हिन्दी से संबंध दो स्तरों पर है। पहला चिंतन-वंश: निर्गुण काव्य का “एक राम” उपनिषदीय अद्वैत का शब्दशः अनुवाद नहीं है, पर दोनों भारतीय चिंतन की लंबी लकीर पर हैं। दूसरा भाषा-वंश: बोलचाल की हिन्दी यहाँ से नहीं फूटती। प्राकृत-अपभ्रंश वह पुल हैं। वैदिक साहित्य श्रुति है; चार वेद और चार स्तर दोनों से परिचय पूरा होता है।

स्तरक्या हैउदाहरण
संहितामंत्र / सूक्तऋग्वेद के उषा-सूक्त
ब्राह्मणयज्ञ की गद्य व्याख्याशतपथ ब्राह्मण
आरण्यकवन-चिंतन, संधिऐतरेय आरण्यक
उपनिषद्आत्मा–ब्रह्म विद्याईश, कठ, छांदोग्य, बृहदारण्यक

4 प्राकृत साहित्य

प्राकृत का अर्थ यहाँ जन की वे भाषाएँ हैं जो संस्कृत के समानांतर साहित्यिक रूप लेती गईं। एक प्राकृत नहीं, कई हैं। महाराष्ट्री गीत और गाथा के लिए प्रसिद्ध हुई। शौरसेनी नाटक के गद्य में विदूषक और स्त्री-पात्र बोलते दिखते हैं; मथुरा-शूरसेन क्षेत्र से नाम जुड़ा। मागधी पूर्वी क्षेत्र से जुड़ी। अर्धमागधी जैन आगम की भाषा मानी जाती है। नाट्यशास्त्र की व्यवस्था: ऊँचे पात्र प्रायः संस्कृत, लोक-पात्र प्राकृत। यह सामाजिक भाषा-चित्र है — कौन किस भाषा में बोले, यह केवल छंद नहीं, समाज है।

साहित्य में हाल की गाथासप्तशती (गाहा सत्तसई) महाराष्ट्री प्राकृत का शृंगार-गीत संग्रह है — प्रेम, गाँव, ऋतु, स्त्री-पुरुष के छोटे चित्र। हाल को सातवाहन नरेश और इस संग्रह का संकलनकर्ता माना जाता है। प्रवरसेन का सेतुबंध (रावणवहो) महाकाव्यात्मक प्राकृत है। वाक्पतिराज का गउडवहो ऐतिहासिक-काव्य है। जैन आगम — आचारांग, सूत्रकृतांग — धर्म, कथा और आचार का भंडार हैं। प्राकृत केवल “टूटी संस्कृत” नहीं; वह स्वतंत्र साहित्य है।

शैली गाथा में संक्षिप्त है, महाकाव्य में विस्तार वाली। विषय प्रेम, राजा की कीर्ति, धर्म-कथा। संस्कृत संस्कृति और शास्त्र देती है; प्राकृत लोक की जीभ को साहित्य बनाती है। हिन्दी इसलिए प्राकृत के बिना अधूरी है कि अपभ्रंश और फिर पुरानी हिन्दी इसी लोक-भाषा रेखा पर आती हैं। द्विवेदी देशी भाषा की इस चौड़ाई को आदिकाल पढ़ते समय नहीं छोड़ते।

गलत वाक्य: प्राकृत एक बोली है और संस्कृत की छाया मात्र है। सही वाक्य: प्राकृत कई साहित्यिक भाषाएँ हैं; गाथासप्तशती, सेतुबंध और जैन आगम उनके प्रमाण हैं; हिन्दी का भाषा-पुल यहीं से शुरू होता है।

प्राकृतप्रधान क्षेत्र / कामग्रंथ-संकेत
महाराष्ट्रीगीत, गाथागाथासप्तशती; सेतुबंध
शौरसेनीनाटक का गद्यविदूषक, स्त्री-पात्र
मागधीपूर्वी क्षेत्रनाट्य-भाषा व्यवस्था
अर्धमागधीजैन आगमआगम-वाङ्मय

5 पालि साहित्य

पालि थेरवाद बौद्ध संघ की साहित्यिक भाषा है। इसे बुद्ध की बोलचाल की मागधी नहीं समझना चाहिए। विद्वान इसे एक मानक बना हुआ रूप मानते हैं, जो मगध-क्षेत्र से जुड़ा तो है, पर हूबहू जन-बोली नहीं। पालि और प्राकृत समांतर धाराएँ हैं, एक की नकल नहीं। श्रमण वाङ्मय का बौद्ध स्तंभ यहीं है; जैन स्तंभ प्राकृत-अर्धमागधी पर अधिक टिकता है।

त्रिपिटक तीन पिटकों में बँटा है। विनय पिटक संघ के नियम हैं — भिक्षु-भिक्षुणी आचार। सुत्त पिटक उपदेश है। दीर्घ निकाय और मज्झिम निकाय लंबे और मझोले सूत्र हैं। धम्मपद गाथाओं में नीति और चित्त की बात कहता है। सुत्तनिपात प्राचीन परत मानी जाती है। थेरीगाथा भिक्षुणियों की वाणी है — स्त्री-स्वर श्रमण साहित्य में यहीं साफ सुनाई देता है। अभिधम्म पिटक चित्त, धर्म और विश्लेषण का ग्रंथ है; काव्य कम, शास्त्र अधिक।

जातक बोधिसत्त्व के पूर्व जन्म की सैकड़ों कथाएँ हैं — लोक-कथा, नीति, पशु-पात्र और पुनर्जन्म का मिश्रण। पंचतंत्र की भारतीय कथा-भूमि से ये कथाएँ बात करती हैं, यद्यपि उद्देश्य बोधिसत्त्व-चरित है। शैली सरल, उपमा-बहुल, उपदेशात्मक है। दुख-सत्य, अहिंसा, करुणा, तृष्णा का क्षय — स्थायी भाव हैं।

हिन्दी से संबंध भाषा-वंश का नहीं, संवेदना का है। गलत वाक्य: हिन्दी संतकाव्य पालि से निकला। सही वाक्य: बौद्ध-जैन श्रमण धारा कर्मकांड की आलोचना, अहिंसा और चित्त-शुद्धि देती है, जो बाद की संत-संवेदना की भूमि बनती है। भाषा-वंश हिन्दी का प्राकृत-अपभ्रंश से है; पालि समांतर है। नगेन्द्र पालि को समेकित इतिहास में इसलिए रखते हैं कि भारतीय साहित्य ब्राह्मण-वाङ्मय तक सीमित नहीं।

पिटक / रूपविषयप्रमुख नाम
विनयसंघ-आचारभिक्षु-नियम
सुत्तउपदेशधम्मपद, सुत्तनिपात, थेरीगाथा
अभिधम्मचित्त-विश्लेषणशास्त्र-गद्य
जातकपूर्व-जन्म कथानीति + लोक-कथा

6 लौकिक संस्कृत साहित्य

लौकिक का अर्थ वेद से इतर वह संस्कृत है जिसमें इतिहास, काव्य, नाटक और गद्य रचे गए। भाषा पाणिनि के बाद की साहित्यिक संस्कृत है। वाल्मीकि रामायण आदिकाव्य कही जाती है — राम-कथा हिन्दी के रामकाव्य तक जाती है। व्यास का महाभारत धर्म, राज्य, युद्ध और मोह का महाकोश है; भगवद्गीता भीष्म पर्व में बैठी है। अठारह पुराणों ने इन्हीं कथाओं को बार-बार नया रूप दिया। हिन्दी का प्रेमाख्यान, रामकाव्य और कृष्णकाव्य बिना इस कथा-भूमि के समझ में नहीं आता। स्मृति यहाँ श्रुति से अलग कोटि है, पर भारतीय कथा का घर यही है।

महाकाव्य की ऊँचाई कालिदास हैं — रघुवंश, कुमारसंभव। खंड-काव्य मेघदूत विरह और दूत-काव्य की आदर्श पंक्ति है; अपभ्रंश का संदेशरासक इसी भारतीय कड़ी पर बाद में आता है। नाटक में अभिज्ञानशाकुंतलम् शृंगार और करुण की संधि है। भास को नाटक का बड़ा पूर्वज माना जाता है — स्वप्नवासवदत्तम् आदि। भवभूति की उत्तररामचरित करुण रस के लिए प्रसिद्ध है। अश्वघोष बौद्ध काव्य (बुद्धचरित) से जुड़े — श्रमण और लौकिक संस्कृत यहाँ मिलते हैं।

गद्य में बाणभट्ट (हर्षचरित, कादंबरी) और दंडी (दशकुमारचरित) आदर्श रहे। हर्षचरित ऐतिहासिक आख्यायिका के निकट है, कादंबरी कथा-कल्पना के। भरतमुनि का नाट्यशास्त्र रस-सूत्र देता है — विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भाव के संयोग से रस-निष्पत्ति। नीति-कथा में पंचतंत्र लोक-शिक्षा का ग्रंथ है।

हिन्दी से संबंध विषय, मिथक और शास्त्र का है। बोलचाल की हिन्दी अपभ्रंश-लोक से अधिक बनती है। कालिदास हिन्दी के शब्द नहीं देते; वे बिंब, दूत-काव्य और रस देते हैं। राम-कथा और कृष्ण-कथा हिन्दी भक्ति की भूमि हैं। गलत वाक्य: लौकिक संस्कृत वैदिक संहिता का ही दूसरा नाम है। सही वाक्य: लौकिक संस्कृत काव्य-नाटक-गद्य की भाषा है; रामायण-महाभारत-कालिदास उसके स्तंभ हैं।

विधानामग्रंथ
आदिकाव्य / महाभारतवाल्मीकि · व्यासरामायण · महाभारत
महाकाव्य / दूतकालिदासरघुवंश, कुमारसंभव, मेघदूत
नाटककालिदास · भास · भवभूतिशाकुंतलम् · स्वप्नवासवदत्तम् · उत्तररामचरित
गद्यबाण · दंडीकादंबरी, हर्षचरित · दशकुमारचरित
शास्त्रभरतनाट्यशास्त्र

7 अपभ्रंश साहित्य

अपभ्रंश प्राकृत के बाद की भाषा-अवस्था है और पुरानी हिन्दी का निकटतम रूप। नाम का अर्थ “भ्रष्ट” या “गिरी हुई” प्राकृत की ओर संकेत करता है, पर साहित्य में यह स्वतंत्र काव्य-भाषा है। हेमचंद्र जैसे वैयाकरणों ने सिद्धहेमशब्दानुशासन में इसे व्याकरणबद्ध किया; उनके उद्धरण अपभ्रंश काव्य के भी साक्ष्य हैं। कविता में दोहा, चौपाई, पज्झटिका यहीं ठहरते हैं — आगे हिन्दी के प्रधान छंद। बिना अपभ्रंश के पुरानी हिन्दी की भाषा-कथा अधूरी है।

जैन कवियों ने राम-कथा और पुराण-कथा अपभ्रंश में लिखी। स्वयंभू का पउमचरिउ जैन रामकाव्य है — पद्म अर्थात् राम की जैन-कथा। पुष्पदंत महापुराण आदि के लिए याद किए जाते हैं। धनपाल की भविसयत्तकहा कथा-काव्य है। ये ग्रंथ सिद्ध करते हैं कि अपभ्रंश केवल दोहा-संग्रह नहीं, चरित-काव्य की भाषा भी है। द्विवेदी चारणों तक सीमित इतिहास इसलिए नहीं लिखते कि यही जैन-अपभ्रंश धारा उनके सामने चौड़ी है।

अद्दहमाण (अब्दुर्रहमान) का संदेशरासक दूत-काव्य है — विरह, ऋतु, पथ। मेघदूत की भारतीय कड़ी यहाँ देशी भाषा में उतरती है। सिद्धों-नाथों की वाणी और लौकिक प्रेम-कथाएँ यहीं चलती हैं। सरहपा आदि की सहज-वाणी बाद के निर्गुण दोहे की भूमि मानी जाती है। अपभ्रंश योग-वाणी का घर भी है।

हिन्दी से संबंध तीन स्तरों पर है। भाषा का पुल: पुरानी हिन्दी अपभ्रंश के निकट है। छंद का पुल: दोहा और चौपाई। विषय का पुल: विरह-दूत, जैन चरित, सिद्ध-वाणी। आचार्य शुक्ल यदि वीरगाथा पर ज़ोर देते हैं तो द्विवेदी अपभ्रंश-जैन-नाथ-लोक को चौड़ाई दिखाते हैं। अपभ्रंश संक्रमण की बोली मात्र नहीं, हिन्दी के आदिकाल की कुंजी है।

कवि / आचार्यग्रंथ / कामसंकेत
हेमचंद्रव्याकरणअपभ्रंश को शास्त्र में बाँधा
स्वयंभूपउमचरिउजैन रामकाव्य
पुष्पदंतमहापुराण आदिपुराण-चरित
धनपालभविसयत्तकहाकथा-काव्य
अद्दहमाणसंदेशरासकदूत-काव्य, विरह

8 तमिल साहित्य

तमिल भारतीय साहित्य परंपरा का स्वतंत्र केंद्र है, हिन्दी की उपभाषा नहीं। संगम तमिल का प्राचीन काव्य-युग है। परंपरा तीन संगमों की कथा कहती है; इतिहास उतने साफ बक्से नहीं देता, पर काव्य-रीति स्थिर है। अकम् भीतरी जीवन, प्रेम, प्रतीक्षा का काव्य है। पुरम् युद्ध, दान, राजा की कीर्ति, वीर की मृत्यु का। अकम्-पुरम् विभाजन भारतीय काव्य में शृंगार और वीर के द्वार से बात करता है, अनुवाद नहीं।

अकम् में पाँच तिणै भाव को भूगोल से बाँधते हैं। कुरिंजि पहाड़ — मिलन। मुल्लै वन — प्रतीक्षा। मरुतम् खेत — कलह-पुनर्मिलन। नेय्तल समुद्र-तट — वियोग। पालै बंजर — विरह-यात्रा। यह रीति नाट्यशास्त्र के रस-सूत्र से अलग रास्ता है, पर काव्य को स्थान और ऋतु से बाँधने की भारतीय आदत दोनों में है। एत्तुतोकै और पत्तुपाट्टु संगम-संग्रह माने जाते हैं। तोल्कप्पियम् व्याकरण और काव्य-रीति दोनों हैं। तिरुवल्लुवर का तिरुक्कुरल लगभग 1330 कुरल में धर्म, अर्थ, काम की नीति कहता है। शैली दोहे जैसी संक्षेप की है, भाषा द्रविड़ है।

बाद की भक्ति में आलवार विष्णु के, नायनार शिव के। भाषा तमिल है, आंदोलन अखिल भारतीय भक्ति का। गलत वाक्य: “हिन्दी तमिल से निकली।” सही वाक्य: भारतीय साहित्य कई केंद्रों वाला है; उत्तर की भक्ति अकेली नहीं।

नगेन्द्र समेकित इतिहास में द्रविड़ वाङ्मय को इसलिए रखते हैं कि एकात्मता संस्कृत-केंद्रित सूची से सिद्ध नहीं होती। रामचभिल त्रिपाठी और मूलचंद गौतम भारतीय साहित्य पढ़ते समय दक्षिण को अध्याय देते हैं, परिशिष्ट नहीं। तमिल परिचय अकम्-पुरम्, तिणै, तिरुक्कुरल और आलवार-नायनार पर पूरा होता है।

तिणैभूगोलप्रधान भाव
कुरिंजिपहाड़मिलन
मुल्लैवनप्रतीक्षा
मरुतम्खेतकलह / पुनर्मिलन
नेय्तलसमुद्र-तटवियोग
पालैबंजरविरह-यात्रा

9 साहित्य का इतिहास-दर्शन

साहित्येतिहास जन्म-मरण और पुस्तक-सूची का पंजीकरण नहीं। दर्शन यहाँ ऊँचा शब्द नहीं, वे सवाल हैं जिनसे इतिहास लिखा जाता है। साहित्य को काल से बाँधें या संवेदना से? केंद्र में कवि हो, ग्रंथ हो या जनता? संस्कृत-मार्गी परंपरा ही “ऊँची” हो या लोक-जैन-बौद्ध भी मुख्य धारा हों? इतिहासकार तटस्थ दर्पण है या उसकी दृष्टि रंग बदल देती है? इन्हीं सवालों को इतिहास-दर्शन कहते हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी संवेदना के विकास से पढ़ते हैं — कालखंड के साथ-साथ अनुभव का रूप भी इतिहास है। बच्चन सिंह पूछते हैं कि शुक्ल का ढाँचा क्यों इतना मान्य हो गया कि दूसरा इतिहास लिखना पड़ा।

आधुनिक हिन्दी साहित्येतिहास पश्चिमी “हिस्ट्री” की आदत और भारतीय चरित-गुण-काव्य परंपरा के बीच लिखा गया। पश्चिमी आदत है: कालखंड, कारण-कार्य, प्रगति-पतन, राष्ट्र-भाषा का विकास। भारतीय आदत है: कवि-वृत्त, गुण-दोष, रस, आचार्य-परंपरा। शुक्ल दोनों को मिलाते हैं — परिस्थिति से प्रवृत्ति, प्रवृत्ति से प्रतिनिधि रचना। द्विवेदी भारतीय साधना और लोक-संस्कृति को केंद्र में लाते हैं, ताकि इतिहास केवल राज्याश्रय की सीढ़ी न रह जाए। नगेन्द्र हिन्दी को भारतीय साहित्य के समेकित ढाँचे में बैठाने को कहते हैं। तीनों एक ही दर्शन नहीं; तीनों इतिहास लिखने के अलग द्वार हैं।

उदाहरण से दर्शन खुलता है। एक ही प्रथम युग शुक्ल के यहाँ वीरगाथाकाल है और द्विवेदी के यहाँ सिद्ध-नाथ-जैन-लोक की चौड़ाई। तथ्य — रासो, सरहपा, पउमचरिउ — कम नहीं बदलते। प्रश्न बदल जाता है कि किसे केंद्र मानें। संज्ञा दृष्टि बताती है, दीवार नहीं। साहित्येतिहास तटस्थ कैमरा नहीं। जो भक्ति को शिखर मानेगा, रीति को स्वतः ढलान लिखेगा। जो लोक को मुख्य मानेगा, चारण को एक अंग बनाएगा।

औपनिवेशिक दृष्टि साहित्य को “कमी” और “नकल” से नापती थी — संस्कृत महान, देशी अधूरी। राष्ट्रीय-सांस्कृतिक दृष्टि का अर्थ गुणगान नहीं, अपनी परंपरा को उसके नियम से समझना है। इतिहास-दर्शन वे प्रश्न हैं जो ग्रंथ चुनने से पहले पूछे जाते हैं। बिना दर्शन के साहित्येतिहास तिथि-सूची रह जाता है।

10 हिन्दी साहित्येतिहास लेखन — प्रारंभिक परत

लेखन की पहली परत सूची और सर्वेक्षण की है, प्रवृत्ति-इतिहास की नहीं। गार्सा द तासी ने हिन्दुस्तानी साहित्य का परिचय यूरोप को दिया। काम उपयोगी है, प्रवृत्ति-इतिहास नहीं। शिवसिंह सेंगर का शिवसिंह सरोज कवि-वृत्त है — जन्म, रचना, प्रशस्ति। इतिहास यहाँ व्यक्ति-सूची है। जॉर्ज ग्रियर्सन का भाषा-सर्वेक्षण भाषाओं के वर्गीकरण के लिए बड़ा है; प्रवृत्ति और मूल्यांकन का इतिहास नहीं। भाषा-विज्ञान साहित्येतिहास का औजार है, स्थानापन्न नहीं।

मिश्रबंधु-विनोद विशाल विवरण देता है — कवि और ग्रंथ बहुत, वैज्ञानिक विन्यास कम। सामग्री बढ़ी, काल-प्रवृत्ति का कंकाल अभी दुर्बल रहा। प्रवृत्ति-इतिहास बाद में शुक्ल से बनता है, विनोद से नहीं। ये नाम इसलिए आवश्यक हैं कि शुक्ल शून्य से नहीं उतरे। उन्होंने सूची को प्रवृत्ति में बदला।

इस परत की सीमा साफ है। यूरोपीय सर्वेक्षण बाहरी दृष्टि से देखता है। कवि-वृत्त गुणगान करता है। मिश्रबंधु सब रख लेते हैं, चुनते कम हैं। बच्चन सिंह बाद में पूछेंगे कि चयन ही इतिहास है। प्रारंभिक परत सामग्री देती है; प्रश्न अभी अधूरे हैं — साहित्य क्यों बदला, कौन सी प्रवृत्ति मुख्य हुई, लोक कहाँ गया।

लेखकग्रंथ / कामसीमा / लाभ
गार्सा द तासीहिन्दुस्तानी साहित्य का परिचययूरोप को द्वार; प्रवृत्ति-इतिहास नहीं
शिवसिंह सेंगरशिवसिंह सरोजकवि-वृत्त; मूल्यांकन पतला
ग्रियर्सनभाषा-सर्वेक्षणभाषा-वर्गीकरण; काव्य-इतिहास अधूरा
मिश्रबंधुमिश्रबंधु-विनोदविस्तार बड़ा; विन्यास कम

11 शुक्ल, द्विवेदी और बाद के इतिहासकार

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का हिन्दी साहित्य का इतिहास (नागरीप्रचारिणी सभा) आज भी हिन्दी साहित्येतिहास का मुख्य ढाँचा है। विधि साफ है: युग की सामाजिक-धार्मिक परिस्थिति → साहित्य की प्रवृत्ति → प्रतिनिधि रचना से सिद्धि। आदिकाल को उन्होंने वीरगाथाकाल कहा, भक्तिकाल को हिन्दी का उत्कर्ष, रीतिकाल को दरबारी शृंगार की ओर, आधुनिक काल को गद्य और नई चेतना से जोड़ा। लाभ: पठनीयता, स्पष्ट कालक्रम। सीमा: लोक-जैन-सिद्ध पतले पड़ते हैं, पृथ्वीराज रासो पर प्रमाण का भार अधिक है, रीति के कला-मूल्य पर कठोरता है। शुक्ल प्रवृत्ति-इतिहास लिखते हैं; सूची नहीं।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी साहित्य की भूमिका और हिन्दी साहित्य का आदिकाल में आदिकाल को चारणों तक सीमित नहीं माना। सिद्ध, नाथ, जैन, अपभ्रंश और लोक-संस्कृति उनके यहाँ मुख्य धारा है। भक्ति अचानक चमत्कार नहीं, लंबी साधना-परंपरा का फल है। वे शुक्ल को रद्द नहीं करते; वे यह पूछते हैं कि प्रवृत्ति चुनते समय किन ग्रंथों को मुख्य कहा गया।

डॉ. नगेन्द्र ने हिन्दी साहित्य का इतिहास संपादित किया और भारतीय साहित्य का समेकित इतिहास इसी पत्र की संदर्भ सूची में है — हिन्दी को अकेले न पढ़ना। डॉ. बच्चन सिंह का हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास शुक्ल-केंद्रित ढाँचे की समीक्षा है: दूसरा इसलिए कि पहला इतना मान्य हो गया कि उसकी छाया में लोक, स्त्री, श्रमण और पुनर्पाठ छूटते गए। डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी संवेदना के विकास से पढ़ते हैं — युग के साथ अनुभव का रूप।

शुक्ल ढाँचा देते हैं, द्विवेदी चौड़ाई, नगेन्द्र भारतीय संदर्भ, बच्चन सिंह पुनर्लेखन का विवेक, चतुर्वेदी संवेदना। एक इतिहासकार को “गलत” कहकर बाकी को छोड़ देना इतिहास-दर्शन नहीं। हिन्दी साहित्येतिहास बहसों की शृंखला है; नया लेखक पुराने को मिटाता नहीं, जाँचता है।

इतिहासकारग्रंथ / कामसंकेत
रामचंद्र शुक्लहिन्दी साहित्य का इतिहासपरिस्थिति → प्रवृत्ति; वीरगाथाकाल
हजारीप्रसाद द्विवेदीभूमिका; आदिकालसिद्ध-नाथ-जैन-लोक
नगेन्द्रसमेकित इतिहास (सं.)समेकित भारतीय दृष्टि
बच्चन सिंहदूसरा इतिहासशुक्ल-ढाँचे की समीक्षा
रामस्वरूप चतुर्वेदीसंवेदना का विकासअनुभव के रूप का इतिहास

12 हिन्दी साहित्येतिहास लेखन की समस्याएँ

पहली समस्या काल-विभाजन की है। आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल, आधुनिक काल अध्ययन की सुविधा हैं, दीवार नहीं। कवि उस तिथि की सुबह पटरी नहीं बदलता। दूसरी समस्या नामकरण की है। आदिकाल, वीरगाथाकाल, चारण-काल, सिद्ध-नाथ काल एक ही समय के कई नाम; अंतर दृष्टि का है। संज्ञा चयन है, पूरा युग-विवेचन नहीं। तीसरी प्रामाणिकता है। पृथ्वीराज रासो की तिथि, प्रक्षेप और रचना-स्तर विवादित रहे। इतिहास ग्रंथ पर टिकता है; ग्रंथ डगमगाए तो निष्कर्ष डगमगाता है। बिना पाठ-परीक्षा के युग-चित्र नहीं बनता।

चौथी समस्या भाषा-रेखा है — अपभ्रंश कहाँ खत्म, पुरानी हिन्दी कहाँ शुरू, सहमति कम। पाँचवीं दृष्टि है: राज्याश्रय और संस्कृत-मानदंड से लोक, स्त्री, श्रमण साहित्य छूट सकता है; द्विवेदी की आपत्ति यही है। छठी सामग्री है — पांडुलिपि, संपादन, खोए ग्रंथ; पूरे युग का दावा अधूरी सामग्री पर होता है। सातवीं, इतिहासकार का रंग: भक्ति को शिखर मानने वाला रीति को स्वतः गिरावट लिखेगा। औपनिवेशिक रंग साहित्य को कमी से नापता था; गुणगान रंग आलोचना को भक्ति बना देता है। दोनों समस्या हैं।

हल बहु-दृष्टि है — ग्रंथ-परीक्षा, और लोक-श्रमण धारा को साथ रखना। शुक्ल से ढाँचा, द्विवेदी से चौड़ाई, नगेन्द्र से भारतीय संदर्भ, बच्चन सिंह से दूसरा इतिहास का विवेक। साहित्येतिहास एक पुस्तक नहीं, बहसों की शृंखला है।

सार: वैदिक और लौकिक संस्कृत सांस्कृतिक जड़ हैं; प्राकृत-अपभ्रंश भाषा का पुल हैं; तमिल स्वतंत्र द्रविड़ केंद्र है; पालि श्रमण संवेदना है। शुक्ल प्रवृत्ति-इतिहास लिखते हैं, द्विवेदी परंपरा की चौड़ाई दिखाते हैं, नगेन्द्र हिन्दी को भारत में बैठाते हैं।

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