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निर्धारित पाठ — बिहारी, भूषण, घनानंद, गिरिधर notes

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निर्धारित पाठ — बिहारी, भूषण, घनानंद, गिरिधर is a topic in Medieval poetry (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

यह इकाई रीतिकाल का निर्धारित पाठ है। चार रचनाएँ हैं। बिहारी रत्नाकर — संपादक जगन्नाथ दास रत्नाकर। भूषण ग्रंथावली — संपादक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र। घनानंद…

इकाई 5 · निर्धारित पाठ — बिहारी, भूषण, घनानंद, गिरिधर

यह इकाई रीतिकाल का निर्धारित पाठ है। चार रचनाएँ हैं। बिहारी रत्नाकर — संपादक जगन्नाथ दास रत्नाकर। भूषण ग्रंथावली — संपादक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र। घनानंद कवित्त — संपादक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र; सुजानहित से जुड़े पद। गिरिधर कविराय ग्रंथावली — संपादक किशोरीलाल गुप्त। बिहारी रीतिसिद्ध हैं। भूषण रीतिबद्ध वीर हैं। घनानंद रीतिमुक्त हैं। गिरिधर कुंडलिया और नीति हैं; वे तीन धाराओं का चौथा नाम नहीं। पूरी सतसई नहीं; प्रत्येक दोहा और कवित्त अपनी पहली पंक्ति से पहचाना जाता है।

आधार मिश्र की बिहारी की वाग्विभूति; बच्चन सिंह का बिहारी का नया मूल्यांकन; मिश्र-संपादित भूषण ग्रंथावली; रामदेव शुक्ल का घनानंद का काव्य; मनोहरलाल गौड़ की स्वच्छंद काव्यधारा और घनानंद; नगेन्द्र की रीतिकाव्य की भूमिका। चार चालें हैं — दोहा-शृंगार, कवित्त-वीर, कवित्त-पीर, कुंडलिया-नीति।

सार: बिहारी = दोहा, शृंगार, रीतिसिद्ध। भूषण = कवित्त, वीर, शिवाजी-छत्रसाल। घनानंद = सुजान, पीर, रीतिमुक्त। गिरिधर = कुंडलिया, नीति। संपादक — रत्नाकर, मिश्र, गुप्त।

1 निर्धारित पाठ का स्वरूप

भक्ति का पाठ तुलसी-सूर-मीरा-रसखान हैं। यह इकाई रीति और नीति का पाठ है। भाषा चारों की ब्रज है। छंद में बिहारी दोहा रखते हैं, भूषण-घनानंद कवित्त-सवैया, गिरिधर कुंडलिया। रस में बिहारी शृंगार, भूषण वीर, घनानंद विप्रलंभ-प्रेम, गिरिधर शांत-नीति हैं। आश्रय बिहारी का आमेर-जयपुर से जोड़ा जाता है। भूषण शिवाजी और छत्रसाल की प्रशस्ति गाते हैं। घनानंद सुजान के प्रेम में बँधे हैं। गिरिधर लोक-कंठ की नीति गाते हैं।

काव्यशास्त्र यहाँ उतरता है। दोहा 13+11 बिहारी की इकाई है। कवित्त भूषण-घनानंद की चाल है। कुंडलिया दोहा-रोला का योग गिरिधर की पहचान है। अतिशयोक्ति भूषण का प्रधान अलंकार है। श्लेष और समास बिहारी के औजार हैं। नायिका-भेद बिहारी के दोहे में सिद्ध है, लक्षण-ग्रंथ में नहीं। सूर का शृंगार भक्ति है; बिहारी का शृंगार रीति है। घनानंद का वियोग सुजान-पीर है; सूर का वियोग गोपी-भक्ति है।

संपादक पाठ के द्वार हैं। रत्नाकर सतसई बाँधते हैं। मिश्र भूषण और घनानंद दोनों देते हैं। गुप्त गिरिधर देते हैं। व्याख्या प्रसंग, भाव और काव्य-सौंदर्य पर टिकती है। पहली पंक्ति कुंजी है।

2 बिहारीलाल और रत्नाकर

बिहारीलाल रीतिसिद्ध शृंगार के कवि हैं। सतसई सात सौ दोहों का कोष मानी जाती है। निर्धारित संपादन जगन्नाथ दास रत्नाकर का बिहारी रत्नाकर है। कवि आचार्य नहीं; दोहा स्वयं रीति का प्रमाण है। आश्रय मिर्जा राजा जयसिंह आमेर से जोड़ा जाता है। भाषा परिष्कृत ब्रज है। शैली समास, चमत्कार और अर्थ-गांभीर्य की है। एक दोहे में नायिका, ऋतु, नेत्र, मान और नीति सिमटते हैं। मिश्र वाग्विभूति कहते हैं। बच्चन सिंह नया मूल्यांकन माँगते हैं — चमत्कार के नीचे काव्य भी है।

केशव-चिन्तामणि लक्षण लिखते हैं, इसलिए रीतिबद्ध हैं। बिहारी लक्षण नहीं लिखते, इसलिए रीतिसिद्ध हैं। घनानंद नायिका-शास्त्र से निकलकर पीर गाते हैं, इसलिए रीतिमुक्त हैं। बिहारी शास्त्र के भीतर रहते हैं। शृंगार प्रधान रस है; कुछ दोहे भक्ति और नीति भी रखते हैं। मेरी भव बाधा हरो — राधा-कृष्ण का शृंगार-भक्ति द्वार है। प्रत्येक दोहा अपनी पहली पंक्ति से पहचाना जाता है; पूरे दोहे का अर्थ उसी पंक्ति से खुलता है।

गागर में सागर वाली उक्ति इन्हीं दोहों के लिए प्रसिद्ध है। आशय यह है कि लघु छंद में पूर्ण दृश्य बैठता है। सीमा दरबारी संकीर्णता और कभी चमत्कार-मात्र है। हिन्दी मुक्तक का शिखर फिर भी सतसई मानी जाती है।

3 बिहारी — शृंगार के निर्धारित दोहे

मेरी भव बाधा हरो — राधा से निवेदन; उसके तन की छाया पड़ते ही श्याम हरित हो जाएँ, भव भी हरे। श्लेष हरि-हरित पर है। भक्ति और शृंगार एक दोहे में मिलते हैं। सोहत ओढ़े पीत पट — पीत वस्त्र श्याम गात पर; उपमा नीलमणिशैल पर प्रभात की। रंग-संग योग रूपक-उपमा दोनों छूता है। अजौं तर्यौना ही रह्यौ — नायिका अभी अंकुर है; बार-बार समझाने पर भी किशोरी नहीं बनी। मुग्धा अवस्था का चित्र है। तो पर वारौ उरबसी — राधा मोहन के उर बसती है; उर्वशी के प्राण राधा पर — श्लेष उर-बसी / उरबसी।

नेह न नैननि को कछू — नेत्र सदा नीर भरे, प्यास नहीं बुझती। रति नेत्रों में ठहरी है। या अनुरागी चित की — श्याम-रंग में जितना डूबे, चित्त उतना उज्ज्वल। प्रेम मल नहीं, प्रकाश है। लिखन बैठि जाकी सबी — रूप लिखने का गर्व टूटता है; सौंदर्य लेख से बड़ा है। दृग उरझत टूटत कुटुम — नेत्र उलझते हैं, कुटुंब टूटता है, प्रीति की गाँठ दिन-दिन दूनी। सामाजिक बंधन और नेत्र-बंध एक दोहे में। रनित भृंग घंटावली — भ्रमर घंटा-सी झंकार; कुंज में मंद समीर — उद्दीपन पूरा है। कहत, नटत, रीझत, खिझत — सारा संवाद नैनों से; कहना, मुकरना, रीझना, खिझना एक ही दृष्टि में।

ये दोहे नायिका, नेत्र, ऋतु और श्लेष पर टिकते हैं। रस शृंगार है, स्थायी रति है। छंद दोहा 13+11 है। रीति सिद्ध है, अध्याय नहीं। प्रत्येक दोहा अलग मुक्तक है।

पहली पंक्तिभाव
मेरी भव बाधा हरोराधा-निवेदन; हरि-हरित श्लेष
सोहत ओढ़े पीत पटपीत-श्याम; उपमा
अजौं तर्यौना ही रह्यौमुग्धा / किशोर अवस्था
तो पर वारौ उरबसीउर-बसी श्लेष
नेह न नैननि को कछूनेत्र-प्यास
या अनुरागी चित कीश्याम-रंग, उज्ज्वल चित्त
लिखन बैठि जाकी सबीरूप लेख से बड़ा
दृग उरझत टूटत कुटुमनेत्र-प्रीति, कुटुंब-विरोध
रनित भृंग घंटावलीउद्दीपन, कुंज
कहत, नटत, रीझत, खिझतनैन-संवाद

4 बिहारी — भक्ति, नीति और चमत्कार

कब को टेरत दीन रट — दानि महान बिना माँगे देते हैं; दीन की रट अतिरिक्त है। दान याचना से बड़ा है। स्वारथु सुकृतु न श्रम वृथा — बाज पराये हाथ में है, पक्षी मत मारो; हिंसा न नीति है न यश। नहिं परागु नहिं मधुर मधु — कली से अलि बँधा; विकास और मधु आगे हैं, भविष्य अज्ञात। मंगल बिन्दु सुरंगु — माँग-बिंदु और अश्रु साथ; आँसू फूटे नहीं, शृंगार टिका। नेत्र का जल शृंगार का अंग है, केवल करुण नहीं।

तंत्री नाद कवित्त-रस — तन्त्री, नाद, कवित्त और राग में जो पूरा डूबे वही तिरे; अधूरा डूबने वाला डूबता है। यह काव्य-सिद्धांत का दोहा है — रस में तन्मयता। कनक-कनक ते सौ गुनी — धतूरे की कनक और सोने की कनक; एक खाए बौराए, एक पाए बौराए — श्लेष का शिखर। नर की अरु नलनीर की — जितना नीचे चलै, उतना ऊँचा होए; विनम्रता की गति। पत्रा होइ तिथि पाइयै — उस मुख के चारों ओर नित पूर्णिमा; चंद्र-आनन की अतिशयोक्ति। ये दोहे शृंगार के किनारे भक्ति, नीति और काव्य-सिद्धांत भी रखते हैं।

बिहारी केवल नायिका-कवि नहीं। सतसई में दान, अहिंसा, विनम्रता और रस-तन्मयता भी हैं। रीतिसिद्धता शृंगार से पहचानी जाती है; पूरा कवि इन दोहों से भी पहचाना जाता है। श्लेष और अतिशयोक्ति यहाँ औजार हैं, लक्ष्य नहीं।

पहली पंक्तिभाव
कब को टेरत दीन रटदानि, बिना माँगे दान
स्वारथु सुकृतु न श्रम वृथाहिंसा-निषेध, नीति
नहिं परागु नहिं मधुर मधुकली-अलि, भविष्य
मंगल बिन्दु सुरंगुबिंदु-अश्रु, शृंगार
तंत्री नाद कवित्त-रसपूर्ण रस में तरना
कनक-कनक ते सौ गुनीसोना-धतूरा श्लेष
नर की अरु नलनीर कीविनम्रता, ऊँचाई
पत्रा होइ तिथि पाइयैमुख-चंद्र, पूर्णिमा

5 बिहारी की काव्य-विशेषताएँ

छंद दोहा है — 13+11, दो पक्ष। भाषा मंजी हुई ब्रज है। समास लंबा अर्थ छोटी इकाई में भरता है। श्लेष, उपमा और अतिशयोक्ति बार-बार आते हैं। नायिका के नेत्र, मान, ऋतु और अभिसार एक-एक दोहे के विषय हैं। रीतिसिद्धता यही है — लक्षण नहीं, उदाहरण सिद्ध। संपादन रत्नाकर का है। नाम, छंद, अलंकार और नायिका-व्यवहार विशेषता के अंग हैं।

सीमा भी स्पष्ट है। दरबारी शृंगार संकीर्ण हो सकता है। कुछ दोहे चमत्कार के लिए चमत्कार हैं। बच्चन सिंह इसी सीमा के बाद काव्य माँगते हैं। फिर भी हिन्दी मुक्तक का शिखर सतसई मानी जाती है। सूर का पद गेय विस्तार है; बिहारी का दोहा संक्षेप है। भूषण वीर में फैलते हैं; बिहारी शृंगार में सिमटते हैं। घनानंद पीर की सीधी चाल चलते हैं; बिहारी बाँक चाल चलते हैं।

6 भूषण का वीर काव्य

भूषण रीतिबद्ध धारा के वीर कवि हैं। शिवराजभूषण लक्षण और प्रशस्ति दोनों हैं। शिवाबावनी शिवाजी-विषयक कवित्त हैं। निर्धारित संपादन विश्वनाथ प्रसाद मिश्र की भूषण ग्रंथावली है। दो शीर्षक निर्धारित हैं — शिवाजी का शौर्य वर्णन और छत्रसाल का प्रताप वर्णन। आश्रय मराठा और बुंदेल वीरता से जुड़ा है। रस वीर है, स्थायी भाव उत्साह है। अलंकार में अतिशयोक्ति प्रधान है। छंद कवित्त है। गुण ओज है।

रीतिकाल शृंगार-प्रधान कहा जाता है; भूषण उस सूत्र के अपवाद हैं। वे आचार्य-कवि की रीति पर वीर रस गाते हैं। बिहारी नायिका नापते हैं; भूषण भुजा और सेना नापते हैं। घनानंद नेत्र और पीर देखते हैं; भूषण पगड़ी, चतुरंगिणी और तेज देखते हैं। भाषा ब्रज है। अनुप्रास भूषण की चाल है — चाक चक चमू, भुज भुजगेस। नायक धीरोदात्त-वीर है, शृंगारी नहीं। आलंबन शिवाजी और छत्रसाल हैं। उद्दीपन सेना, दिशा, भुजा और तेज हैं।

प्रशस्ति इतिहास-ग्रंथ नहीं। काव्य उत्साह का है। अतिशयोक्ति लोक-सीमा तोड़ती है — पगड़ी खुलती ऊँचाई, दिशाओं के राजा सामने। धर्म-रक्षा — वेद और पुराण — भी प्रशस्ति का अंग है। रीतिबद्धता लक्षण-ग्रंथ और कवित्त-रीति दोनों से है।

7 भूषण — निर्धारित पद

शिवाजी-खंड। देखत ऊँचाई उघरत पाघ, सुधी राह — कद देखते ही पगड़ी खुलती-सी लगे; ऊँचाई की अतिशयोक्ति। पूरब के, उत्तर के, प्रबल पछाँह हू के — दिशाओं के राजा उनके सामने हैं; दिग्विजय का आभास। साजि चतुरंग सेन अंग में उमंग धार — हाथी, घोड़ा, रथ, पैदल और अंग की उमंग; उद्दीपन सेना है। बेद राखे विदित, पुरान राखे सार युत — धर्म और सार दोनों रक्षा; वीर केवल शस्त्र नहीं। ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहनवारी — उच्च शिखर-नदी की महिमा से तुलना। सबन के ऊपर ही ठाड़ो रहिबे के जोग — सबके ऊपर खड़े रहने योग्य; धीरोदात्त की मुद्रा।

छत्रसाल-खंड। भुज भुजगेस की वै संगिनी भुजंगिनी सी — भुजा शेष की संगी सर्पिणी-सी; रूपक और अनुप्रास साथ। चाक चक चमू के अचाकचक चहुँ ओर — सेना चकाचौंध, अचानक चारों ओर; वृत्यनुप्रास ओज देता है। रैया राव चम्पति को चढ़ो छत्रसाल सिंह — चम्पति-पुत्र सिंहवत चढ़े; उपमा और वीर-गर्व। राजत अखंड तेज छाजत सुजस बड़ो — तेज अखंड, यश बड़ा। दोनों खंड प्रशस्ति हैं। प्रत्येक कवित्त अलग है।

रस वीर है। गुण ओज है। अलंकार अतिशयोक्ति और अनुप्रास हैं। छंद कवित्त है। धारा रीतिबद्ध है। व्याख्या इन्हीं अंगों से पूरी होती है, इतिहास की तिथि-सूची से नहीं।

खंडपहली पंक्ति
शिवाजी का शौर्यदेखत ऊँचाई उघरत पाघ, सुधी राह
शिवाजी का शौर्यपूरब के, उत्तर के, प्रबल पछाँह हू के
शिवाजी का शौर्यसाजि चतुरंग सेन अंग में उमंग धार
शिवाजी का शौर्यबेद राखे विदित, पुरान राखे सार युत
शिवाजी का शौर्यऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहनवारी
शिवाजी का शौर्यसबन के ऊपर ही ठाड़ो रहिबे के जोग
छत्रसाल का प्रतापभुज भुजगेस की वै संगिनी भुजंगिनी सी
छत्रसाल का प्रतापचाक चक चमू के अचाकचक चहुँ ओर
छत्रसाल का प्रतापरैया राव चम्पति को चढ़ो छत्रसाल सिंह
छत्रसाल का प्रतापराजत अखंड तेज छाजत सुजस बड़ो

8 घनानंद की रीतिमुक्तता

घनानंद रीतिमुक्त प्रेम के कवि हैं। निर्धारित संपादन विश्वनाथ प्रसाद मिश्र का घनानंद कवित्त है; सुजानहित से जुड़े पद निर्धारित हैं। आलंबन सुजान है। स्वर वियोग और पीर है। नायिका-भेद के अध्याय नहीं। भाषा ब्रज है, मुहावरा सीधा है। छंद कवित्त-सवैया हैं। बिहारी चमत्कार बाँधते हैं; घनानंद अनुभव खोलते हैं। भूषण ओज गाते हैं; घनानंद माधुर्य की पीर गाते हैं। रामदेव शुक्ल काव्य की पीर पढ़ते हैं। गौड़ स्वच्छंद धारा कहते हैं।

रीतिमुक्त का अर्थ लक्षण से शून्य काव्य नहीं, बंधन से मुक्त प्रेम-काव्य है। सूत्र निर्धारित है — अति सुधो सनेह को मारग है। सयानप बाँक नहीं। रूप की रीति अनूप है, नित नई। नेत्र छवि पीते थे, अब लोचन जलते हैं। कोकिला कारी-कूर दीखती है। मुसकान और मृदु बतरान वही हैं, प्रिय निठुर हो गए। सूर का वियोग भक्ति है; घनानंद का वियोग रीतिकाल का स्वच्छंद प्रेम है। दोनों ब्रज गाते हैं; आराध्य और रीति-बंधन अलग हैं।

सुजान लौकिक प्रिय भी पढ़े गए, कृष्ण-छवि भी। निर्धारित पाठ सुजानहित से जुड़ा है; आलंबन नाम से सुजान है। रस विप्रलंभ है। स्थायी रति वियोग में है। उद्दीपन नेत्र, कोकिला, मुसकान हैं। धारा रीतिमुक्त है।

अति सुधो सनेह को मारग है

घनानंद · निर्धारित पहली पंक्ति

9 घनानंद — निर्धारित कवित्त

रूपनिधान सुजान सखी जब ते इन नैननि नेकु निहारे — सुजान को नेत्रों से देखा, रूपनिधान पहिचाना। दर्शन से प्रेम शुरू होता है। हीन भए जल मीन अधीन कहा कछु मो अकुलानि समानै — जल बिना मीन; प्रिय बिना प्राण की अकुलान। उपमा विरह को प्राण बनाती है। तब तौ छवि पीवत जीवत है, अब सोचन लोचन जात जरे — पहले छवि पीकर जीते, अब सोच से लोचन जलते। संयोग की स्मृति वियोग का उद्दीपन बनती है। भए अति निठुर, मिटाय पहिचानि डारी — पहिचान मिटा दी, निष्ठुरता आई।

कारी कूर कोकिला, कहाँ को बैर काढ़ति री — कोयल भी शत्रु-सी; प्रकृति उलटी पड़ गई। वहै मुसक्यानि, वहै मृदु बतरानि, वहै — वही मुस्कान, वही बोली; अंतर हृदय का है, रूप का नहीं। अति सुधो सनेह को मारग है — सीधा स्नेह, सयानप नहीं; रीतिमुक्तता का सूत्र। रावरे रूप की रीति अनूप, नयो नयो लागत ज्यों ज्यों निहारिये — रूप नित नया; रीति यहाँ लक्षण नहीं, रूप की चाल है। चोप चाह चावनि चकोर भयो चाहत ही — चाह से चकोर। आँखिन मूंदिवो बात दिखावत — आँख मूँदने पर भी बात दिखती है; वियोग की तन्मयता।

दस कवित्त एक पीर पर हैं, एक कविता नहीं। रस विप्रलंभ है। भाषा ब्रज है। छंद कवित्त है। आलंबन सुजान है। प्रत्येक कवित्त अपनी पहली पंक्ति से पहचाना जाता है।

पहली पंक्तिभाव
रूपनिधान सुजान सखी जब ते इन नैननि नेकु निहारेसुजान-दर्शन
हीन भए जल मीन अधीन कहा कछु मो अकुलानि समानैमीन-अकुलान
तब तौ छवि पीवत जीवत है, अब सोचन लोचन जात जरेछवि फिर सोच
भए अति निठुर, मिटाय पहिचानि डारीनिष्ठुरता
कारी कूर कोकिला, कहाँ को बैर काढ़ति रीकोकिला-शत्रु
वहै मुसक्यानि, वहै मृदु बतरानि, वहैवही मुस्कान, अंतर हृदय
अति सुधो सनेह को मारग हैसीधा स्नेह-मार्ग
रावरे रूप की रीति अनूप, नयो नयो लागत ज्यों ज्यों निहारियेरूप नित नया
चोप चाह चावनि चकोर भयो चाहत हीचाह-चकोर
आँखिन मूंदिवो बात दिखावतवियोग की तन्मयता

10 गिरिधर कविराय की कुंडलिया

गिरिधर कविराय नीति और लोक-व्यवहार के कवि हैं। निर्धारित संपादन किशोरीलाल गुप्त की ग्रंथावली है। छंद कुंडलिया है — दोहा और रोला का योग; छह पंक्तियाँ; दोहे का अंत रोला के आरंभ में दुहराया जाता है। वे रीतिबद्ध-रीतिसिद्ध-रीतिमुक्त का चौथा खाना नहीं। शृंगार उनका लक्ष्य नहीं। विषय चिंता, समय, धन, गुण, विचार और अतीत-भविष्य हैं। भाषा सरल ब्रज-लोक की है। चमत्कार बिहारी-सा नहीं; बात सीधे बैठती है। गुण प्रसाद है। रस शांत-नीति है।

चिन्ता ज्वाल शरीर की, दाह लगै न बुझाय — चिंता की ज्वाला बुझती नहीं। फूटै घर को यूँ भयो, जानत सकल जहान — चिंता से व्यवस्था टूटती है, जग जानता है। साईं बैर न कीजिए, गुरु, पंडित, कवि, यार — इनसे वैर हानि है। बैरी, बंधुवा, बानियाँ, ज्वारी, चोर, लबार — इन स्वभावों पर भरोसा नहीं। साईं समय न चूकिए, यथाशक्ति सम्मान — समय चूकना अनीति है। दौलत पाय न कीजिए, सपने हूँ अभिमान — धन पर गर्व स्वप्न-दोष है। पानी बाढ़ौ नाव में, घर में बाढ़ौ दाम — नाव में जल और कोश में अति धन दोनों डुबाते हैं। गुण के गाहक सहस नर, बिनु गुण लहै न कोय — गुण के बिना ग्राहक नहीं। बिना विचारे जो करे सो पीछे पछताय — अविचार पश्चात्ताप है। बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेइ — बीते को छोड़ो, आगे सँभालो।

दस कुंडलिया दस अलग नीति-सूत्र हैं। दृष्टांत यहाँ सहज है — नाव का जल, कोश का दाम। अति का निषेध केंद्रीय नीति है। संयम प्राण है, संग्रह नहीं। गिरिधर तीन रीति-धाराओं के किनारे लोक-कंठ हैं।

पहली पंक्तिभाव
चिन्ता ज्वाल शरीर की, दाह लगै न बुझायचिंता की ज्वाला
फूटै घर को यूँ भयो, जानत सकल जहानव्यवस्था टूटना
साईं बैर न कीजिए, गुरु, पंडित, कवि, यारगुरु-यार से वैर नहीं
बैरी, बंधुवा, बानियाँ, ज्वारी, चोर, लबारइन पर भरोसा नहीं
साईं समय न चूकिए, यथाशक्ति सम्मानसमय न चूकना
दौलत पाय न कीजिए, सपने हूँ अभिमानधन पर गर्व नहीं
पानी बाढ़ौ नाव में, घर में बाढ़ौ दामअति धन डुबाता है
गुण के गाहक सहस नर, बिनु गुण लहै न कोयगुण के ग्राहक
बिना विचारे जो करे सो पीछे पछतायअविचार, पश्चात्ताप
बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेइबीते को छोड़ो

11 चार कवियों का साम्य-वैषम्य

साम्य युग और भाषा पर है। चारों रीतिकाल के आसपास के निर्धारित कवि हैं। प्रधान भाषा ब्रज है। मुक्तक रूप प्रधान है। काव्यशास्त्र पीछे है। वैषम्य धारा और रस पर है। बिहारी रीतिसिद्ध शृंगार-दोहा। भूषण रीतिबद्ध वीर-कवित्त। घनानंद रीतिमुक्त प्रेम-कवित्त। गिरिधर नीति-कुंडलिया। संपादक क्रमशः जगन्नाथ दास रत्नाकर, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, मिश्र (सुजानहित सहित), किशोरीलाल गुप्त हैं।

तुलसी-सूर-मीरा-रसखान भक्ति हैं। बिहारी-भूषण-घनानंद-गिरिधर रीति-नीति हैं। सूर का वियोग गोपी-भक्ति है; घनानंद का वियोग सुजान-पीर है। बिहारी का शृंगार नायिका-शास्त्र है; रसखान का शृंगार कृष्ण-माधुर्य है। भूषण का वीर राम-काव्य का वीर नहीं, राजप्रशस्ति का वीर है। निर्धारित पाठ चार चालें हैं — दोहा-शृंगार, कवित्त-वीर, कवित्त-पीर, कुंडलिया-नीति।

सार: रत्नाकर — बिहारी दोहा। मिश्र — भूषण वीर और घनानंद पीर। गुप्त — गिरिधर कुंडलिया। प्रत्येक दोहा और कवित्त अपनी पहली पंक्ति से पहचाना जाता है।

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