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निर्धारित पाठ — तुलसी, सूर, मीरा, रसखान notes
Readyनिर्धारित पाठ — तुलसी, सूर, मीरा, रसखान is a topic in Medieval poetry (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.
यह इकाई निर्धारित सगुण पाठ है। चार रचनाएँ हैं। विनय पत्रिका — तुलसीदास, संपादक वियोगी हरि। भ्रमरगीत सार — सूरदास, संपादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल। मीरां…
इकाई 4 · निर्धारित पाठ — तुलसी, सूर, मीरा, रसखान
यह इकाई निर्धारित सगुण पाठ है। चार रचनाएँ हैं। विनय पत्रिका — तुलसीदास, संपादक वियोगी हरि। भ्रमरगीत सार — सूरदास, संपादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल। मीरां पदावली — संपादक शंभुसिंह मनोहर। रसखान रचनावली — संपादक विद्यानिवास मिश्र और सत्यदेव मिश्र। रामभक्ति और कृष्णभक्ति यहाँ पद बनती हैं। पूरी ग्रंथ-पाठ नहीं; प्रत्येक पद अपनी पहली पंक्ति से पहचाना जाता है।
आधार विश्वनाथ त्रिपाठी का लोकवादी तुलसीदास और मीरां का काव्य; उदयभानु सिंह की तुलसी काव्य मीमांसा; ब्रजेश्वर वर्मा का सूरदास; मनमोहन गौतम की सूर की काव्यकला; शंकरदेव अवतरे का सूर का भ्रमरगीत; नंदकिशोर आचार्य का सूर सौरभ; नरोत्तमदास स्वामी की मीरा मंदारिनी; माधव हाड़ा; देवेंद्रप्रताप उपाध्याय का रसखान: जीवन और कृतित्व। चार कंठ चार स्वर हैं — दास्य, गोपी-प्रेम, गिरधर-एकनिष्ठा, ब्रज-जन्म।
1 निर्धारित पाठ का स्वरूप
इतिहास और आचार्य धारा देते हैं। यह इकाई कवि की वाणी देती है। रामचरितमानस लोक का महाकाव्य है; विनय पत्रिका भक्त की व्यक्तिगत प्रार्थना है। अष्टछाप पुष्टि-सेवा का मंडल है; भ्रमरगीत उसी सूर का ज्ञान-भक्ति विवाद है। मीरा अष्टछाप में नहीं। रसखान भी अष्टछाप के बाहर कृष्ण-भक्त हैं। चारों सगुण हैं। तुलसी राम की ओर हैं। सूर, मीरा, रसखान कृष्ण की ओर हैं।
पद कवि और ग्रंथ की स्थिति से पहचाना जाता है, फिर पंक्ति का सीधा अर्थ, फिर भाषा-रस-अलंकार। भाषा तुलसी में ब्रज-प्रार्थना की है, मानस की अवधी नहीं। सूर साहित्यिक ब्रज गाते हैं। मीरा राजस्थानी-ब्रज मिलाती हैं। रसखान कवित्त-ब्रज रखते हैं। रस भक्ति प्रधान है; सूर में वात्सल्य और विप्रलंभ भी हैं। रीतिकाल का नायिका-भेद इन पदों का लक्ष्य नहीं।
संपादक पाठ के द्वार हैं। वियोगी हरि विनय पत्रिका बाँधते हैं। शुक्ल भ्रमरगीत सार चुनते हैं — चयन, पूरा सूरसागर नहीं। मनोहर मीरां पदावली देते हैं। मिश्र-युग्म रसखान रचनावली देते हैं। व्याख्या प्रसंग, अन्वय-भाव और काव्य-सौंदर्य पर टिकती है। पहली पंक्ति पद की कुंजी है, पूरे पद का पर्याय नहीं।
2 तुलसीदास और विनय पत्रिका
गोस्वामी तुलसीदास रामभक्ति शाखा के शिखर हैं। रामचरितमानस अवधी महाकाव्य है। विनय पत्रिका ब्रज में रचित स्तोत्र-प्रार्थना है। संपादन वियोगी हरि का निर्धारित है। पत्रिका का अर्थ निवेदन का पत्र है। भक्त अपने दोष, मोह और दीनता राम के आगे रखता है। आराध्य रघुनाथ, माधव, केशव — सब राम-रूप हैं। दास्य भाव प्रधान है। मानस में राम लोक के राजा भी हैं; पत्रिका में राम व्यक्तिगत स्वामी हैं।
विषय मन की मूढ़ता, नाम-जप, मोह की फांस, अवसर का बीतना और संसार की पहिचान हैं। शैली विनय, स्वीकार और अनुनय की है। छंद पद-गीत हैं, चौपाई-कथा नहीं। शुक्ल तुलसी को लोकनायक कहते हैं; पत्रिका उस लोकनायक का अंतःस्वर है। त्रिपाठी लोकवादी दृष्टि से तुलसी पढ़ते हैं — पत्रिका में लोक का दैन्य व्यक्तिगत हो जाता है। उदयभानु सिंह काव्य-मीमांसा से छंद और रस देखते हैं।
मानस से अंतर तीन बिंदुओं पर है। विधा — महाकाव्य बनाम स्तोत्र। भाषा — अवधी बनाम ब्रज। स्वर — लोकसंग्रह बनाम व्यक्तिगत निवेदन। साम्य आराध्य राम, दास्य, मर्यादा और भक्ति-रस हैं। पत्रिका को मानस का सारांश कहना अधूरा है। एक ग्रंथ कथा चलाता है, दूसरा मन झुकाता है। दोनों एक कवि की दो विधाएँ हैं, एक ग्रंथ का टुकड़ा नहीं।
3 विनय पत्रिका — निर्धारित पद
राम जपु, राम जपु, राम जपु, बावरे — मन को बावरा कहकर नाम-जप का आदेश है। आवृत्ति तीन बार है; बिना नाम के चित्त अटका रहता है। ऐसी मूढ़ता या मन की — उसी मन की जड़ता का स्वीकार है। भक्त दूसरे को नहीं कोसता, अपने चित्त को देखता है। अस कछु समुझि परत रघुराया — दीनता है; प्रभु की लीला बुद्धि से नहीं बँधती। माधव! मोह फांस क्यों टूटे — मोह फंदा है; भक्त उसे स्वयं नहीं काट पाता। केशव, कहि न जाइ का कहिये — महिमा कथन के बाहर है; स्तोत्र अपनी सीमा मानता है।
जौ निज मन परिहरै बिकारा — साधन का सूत्र है; विकार छूटे तब भक्ति ठहरती है। ऐसो को उदार जग माहीं — राम की करुणा को जगत् में अद्वितीय मानता है। दास्य यहाँ याचना है, गर्व नहीं। कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो — दास्य-जीवन की अभिलाषा है; रहनी आचरण है, केवल कथन नहीं। मन पछितैहै अवसर बीते — काल बीतने का भय है; पश्चात्ताप बाद का है, साधन अब का है। मैं तोहि अब जान्यो संसार — संसार पहिचान लिया गया; आसक्ति का नहीं, विनय का ज्ञान।
दस पंक्तियाँ दस द्वार हैं; केंद्र दास्य और नाम हैं। रस भक्ति और दैन्य हैं; करुण सहायक है। अलंकार सहज हैं — रूपक मोह-फांस में, पुनरुक्ति राम-जप में। नायक धीरोदात्त राम हैं, पत्रिका उन्हें स्वामी बनाती है। शैली स्वीकृति की है, फटकार की नहीं। कबीर का स्वर खंडन है; तुलसी का स्वर विनय है। प्रत्येक पद अलग है; एक कविता में नहीं गूँथा जाता।
| पहली पंक्ति | भाव |
|---|---|
| राम जपु, राम जपु, राम जपु, बावरे | नाम-जप; मन बावरा |
| ऐसी मूढ़ता या मन की | चित्त की जड़ता |
| अस कछु समुझि परत रघुराया | दीनता, अकथ महिमा |
| माधव! मोह फांस क्यों टूटे | मोह का फंदा |
| केशव, कहि न जाइ का कहिये | कथन की सीमा |
| जौ निज मन परिहरै बिकारा | विकार-त्याग |
| ऐसो को उदार जग माहीं | राम की उदारता |
| कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो | दास्य-अभिलाषा |
| मन पछितैहै अवसर बीते | काल और पश्चात्ताप |
| मैं तोहि अब जान्यो संसार | संसार की पहिचान |
4 विनय पत्रिका की काव्य-विशेषताएँ
भाषा ब्रज है, मानस की अवधी नहीं। पद गेय हैं। रस भक्ति और दैन्य हैं; करुण सहायक है। शृंगार गौण है। अलंकार सहज हैं — रूपक, पुनरुक्ति, अनुप्रास गेयता बढ़ाते हैं। नायक धीरोदात्त राम हैं। तुलसी अपने को दास कहते हैं। शैली स्वीकृति की है। संपादन वियोगी हरि का है। विशेषताएँ स्तोत्र-विधा, दास्य, नाम-जप और व्यक्तिगत निवेदन हैं।
मानस से अंतर विधा, भाषा और स्वर पर है। साम्य आराध्य और मर्यादा पर है। पत्रिका लोकनायक का अंतःस्वर है, लोक-महाकाव्य नहीं। त्रिपाठी लोक देखते हैं; उदयभानु काव्य-अंग देखते हैं। दोनों दृष्टि पत्रिका को मानस का टुकड़ा नहीं बनने देतीं। रामभक्ति यहाँ प्रार्थना बनती है, कथा नहीं।
5 सूरदास और भ्रमरगीत सार
सूरदास कृष्णभक्ति और पुष्टिमार्ग के शिखर कवि हैं। अष्टछाप में वे वल्लभ-काल के सेवक माने जाते हैं। भ्रमरगीत सार आचार्य रामचंद्र शुक्ल का संपादित चयन है। मूल प्रसंग भागवत के उद्धव-आख्यान से आता है। कृष्ण मथुरा चले गए। ऊधो योग और निर्गुण-संदेश लेकर ब्रज आते हैं। गोपियाँ प्रेम से उत्तर देती हैं। भ्रमर मधुकर के रूप में दूत या प्रतीक बनता है। सार का अर्थ चयन है, पूरा सूरसागर नहीं। अवतरे भ्रमरगीत को इसी संवाद से खोलते हैं। गौतम काव्यकला देखते हैं। ब्रजेश्वर वर्मा सूर को वात्सल्य की भूमि पर रखते हैं।
विवाद ज्ञान और प्रेम का है। ऊधो निर्गुण, योग, दस-बीस मन की बात कहते हैं। गोपियाँ साकार श्याम, माखन-चोर और ब्रज-कुंज कहती हैं। सूर सगुण की ओर हैं। वात्सल्य यहाँ स्मृति बनकर आता है — उर में माखन चोर अड़े। वियोग प्रधान रस है। भाषा ब्रज है। पद गेय हैं। रीति का नायिका-शास्त्र लक्ष्य नहीं; गोपी भक्त है, अभिसारिका-अभ्यास नहीं।
भ्रमरगीत सगुण का उत्तर है, निर्गुण का निषेध-काव्य नहीं मात्र। गोपियाँ ऊधो को व्यापारी कहती हैं — ज्ञान सौदा बन गया। एक मन एक श्याम पर टिका है। कुंज वियोग में शत्रु हो जाती है। कालिंदी काली दीखती है। ये बिंब विप्रलंभ को ब्रज की भूमि पर बिठाते हैं। शुक्ल चयन इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि पाठ एक संवाद बनता है, पदों का ढेर नहीं।
6 भ्रमरगीत — निर्धारित पद
ऊधो अँखियाँ अति अनुरागी — नेत्र प्रेम से भीगे हैं, योग-उपदेश सूखे हैं। आँखें तर्क नहीं, आसक्ति बोलती हैं। आयो घोस बड़ो व्यापारी — ऊधो को घोस-व्यापारी कहकर गोपियाँ ज्ञान को सौदा मानती हैं। व्यंग्य स्वागत से बड़ा है। ऊधो मन नाहीं दस-बीस — चित्त एक श्याम पर टिका है; योग के अनेक मन नहीं। सगुण एकनिष्ठा यही है। निर्गुण कौन देस को वासी — निराकार का ठिकाना गोपियाँ नहीं मानतीं; उनका हरि ब्रज का है। देश पूछकर निराकार को बिना ठिकाने का कहा गया है। हमारे हरि हारिल की लकरी — कृष्ण हारिल-पक्षी की लकड़ी हैं, जिससे जीव छूटता नहीं। आसक्ति अटूट है, दोष नहीं, साधना है।
उर में माखन चोर अड़े — बाल-लीला हृदय में अटक गई है। वात्सल्य वियोग की स्मृति बनता है। मधुकर श्याम हमारे चोर — भ्रमर को संबोधित कर श्याम को चोर कहती हैं — मन हर लेने वाले। ऊधो भली करी ब्रज आए — आगमन पर व्यंग्य और आग्रह दोनों हैं। बिन गोपाल बैरिन भई कुंजैं — वियोग में कुंज शत्रु हो गई; उद्दीपन उल्टा पड़ गया। लखियत कालिन्दी अति कारी — यमुना भी श्याम के बिना काली-शून्य दीखती है। प्रकृति सहचरी नहीं, विरह की साक्षी है।
दस पद एक संवाद हैं — ऊधो ज्ञान लाते हैं, गोपियाँ प्रेम रखती हैं। रस विप्रलंभ-भक्ति है। भाषा ब्रज है। अलंकार व्यंग्य, रूपक और स्वाभावोक्ति हैं। आलंबन कृष्ण हैं; उद्दीपन कुंज, यमुना, माखन-स्मृति हैं। प्रत्येक पद अपनी पहली पंक्ति से पहचाना जाता है।
| पहली पंक्ति | भाव |
|---|---|
| ऊधो अँखियाँ अति अनुरागी | प्रेम-नेत्र, योग-खंडन |
| आयो घोस बड़ो व्यापारी | ज्ञान का सौदा |
| ऊधो मन नाहीं दस-बीस | एकनिष्ठ प्रेम |
| निर्गुण कौन देस को वासी | निराकार का निषेध |
| हमारे हरि हारिल की लकरी | अटूट आसक्ति |
| उर में माखन चोर अड़े | वात्सल्य-स्मृति |
| मधुकर श्याम हमारे चोर | भ्रमर-संबोधन |
| ऊधो भली करी ब्रज आए | व्यंग्य-स्वागत |
| बिन गोपाल बैरिन भई कुंजैं | वियोग, कुंज-शत्रु |
| लखियत कालिन्दी अति कारी | यमुना-शून्य |
7 मीरां पदावली
मीराबाई राजस्थान की कृष्ण-भक्त हैं। मेवाड़ से जोड़ी जाती हैं। आराध्य गिरधर गोपाल हैं। संपादन शंभुसिंह मनोहर की मीरां पदावली निर्धारित है। वे अष्टछाप की सेविका नहीं; स्वतंत्र सगुण स्वर हैं। पति-कुल और राजसी मर्यादा से टकराती वाणी लोक में गिनी गई। भाषा राजस्थानी-ब्रज का मिश्रण है। पद गेय हैं। रस भक्ति और विप्रलंभ हैं। विश्वनाथ त्रिपाठी मीरा के काव्य को इसी एकनिष्ठा से पढ़ते हैं। नरोत्तमदास स्वामी मंदारिनी में वाणी की गेयता देखते हैं। माधव हाड़ा पदों की लोक-पंक्ति खोलते हैं।
सूर की गोपी-वाणी सामूहिक ब्रज-प्रेम है। मीरा का स्वर एक स्त्री-भक्त का एकनिष्ठ निवेदन है। तुलसी दास्य राम के आगे झुकाते हैं। मीरा गिरधर को पति-प्रभु बनाती हैं। राणा का जहर भक्ति की कसौटी बनता है, इतिहास का विवरणमात्र नहीं। योगी की बाट और नींद का टूटना विरह के अंग हैं। नन्दलाल नैनों में बसें — यही साधना है, राजसभा नहीं। गुरु-भाव कहीं रैदास-स्मृति से जुड़ा कहा जाता है; निर्धारित पदों का केंद्र गिरधर है।
मीरा अष्टछाप में नहीं, कृष्णभक्ति में हैं। पुष्टिमार्ग की सेवा-छाप उनके पद का द्वार नहीं। द्वार गिरधर-गुणगान है। राजस्थानी क्रियाएँ — गास्यां, दियौ, कूँण — भाषा की पहचान हैं। ब्रज का माधुर्य उसमें घुला है। स्वतंत्र कंठ यही है।
8 मीरा — निर्धारित पद
नैना निपट बंकट छबि अटके — नेत्र छबि पर अटक गए; रूप ही बंधन है। भक्ति यहाँ नेत्र से शुरू होती है, शास्त्र से नहीं। माई म्हां गोविन्द गुण गास्यां — माँ से निवेदन, गोविंद-गुणगान व्रत है। कुल की आपत्ति सामने है, गान नहीं रुकता। राणाजी थे जहर दियौ म्हैं जाणी — विष भी प्रसाद; भक्ति भय से बड़ी। मीरां मगन भई हरि के गुण गाय — मग्नता गान से आती है, योग-क्रिया से नहीं। जोगिया जी निसदिन जोऊँ बाट — योगी-प्रभु की प्रतीक्षा रात-दिन है। हरि बिन कूँण गती — बिना हरि गति नहीं; प्रश्न उत्तर बन जाता है।
सखी म्हारी नींद नसानी हों — विरह नींद हरता है। सखी साक्षी है, आराध्य नहीं। मन रे परसि हरि के चरण — मन को चरण-स्पर्श का आदेश; साधन भीतर का है। बसो मेरे नैनन में नन्दलाल — नेत्र मंदिर हैं; निवास माँगा गया है, राज्य नहीं। मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई — एकमात्र आराध्य; दूसरा देव नहीं। अनन्यता पद का प्राण है। दस पद एक सूत्र पर हैं — गिरधर, गुणगान, विष-भय का अतिक्रमण, विरह और नैन-निवास। प्रत्येक पद अलग है।
रस भक्ति-विप्रलंभ है। भाषा राजस्थानी-ब्रज है। आलंबन गिरधर हैं। उद्दीपन गुणगान, जहर-प्रसंग, नींद-हरण हैं। सूर सामूहिक गोपी हैं; मीरा अकेली भक्त हैं। तुलसी राम-स्वामी कहते हैं; मीरा गिरधर-पति कहते हैं। दोनों दास्य के रूप हैं, आराध्य अलग हैं।
| पहली पंक्ति | भाव |
|---|---|
| नैना निपट बंकट छबि अटके | रूप-बंधन |
| माई म्हां गोविन्द गुण गास्यां | गुणगान-व्रत |
| राणाजी थे जहर दियौ म्हैं जाणी | विष भी प्रसाद |
| मीरां मगन भई हरि के गुण गाय | गान से मग्नता |
| जोगिया जी निसदिन जोऊँ बाट | प्रतीक्षा |
| हरि बिन कूँण गती | बिना हरि गति नहीं |
| सखी म्हारी नींद नसानी हों | विरह, नींद-हरण |
| मन रे परसि हरि के चरण | चरण-स्पर्श |
| बसो मेरे नैनन में नन्दलाल | नैन-निवास |
| मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई | अनन्य आराध्य |
9 रसखान रचनावली
रसखान कृष्ण-भक्त कवि हैं। परंपरा उन्हें पठान / मुसलमान कुल से जोड़ती है; आराध्य ब्रज-कृष्ण हैं। संपादन विद्यानिवास मिश्र और सत्यदेव मिश्र की रसखान रचनावली निर्धारित है। वे अष्टछाप में नहीं। पुष्टिमार्ग के सेवक-कवि और रसखान का अंतर पंथ का है, प्रेम का नहीं। भाषा ब्रज है। छंद कवित्त-सवैया अधिक हैं, सूर का पद-गीत अलग चाल का है। रस माधुर्य और भक्ति हैं। देवेंद्रप्रताप उपाध्याय जीवन और कृतित्व से इसी प्रेम को खोलते हैं। गुरुदेव प्रसाद वर्मा हिन्दी के मुसलमान कवियों के प्रेमकाव्य में उन्हें रखते हैं।
कामना मनुष्य-जन्म की है, और उसी जन्म में ब्रज-सेवा की। लकुटी और कामरिया ग्वाल-वेश हैं। मोरपखा शिखर-मुकुट है। फाग होली-रास है। बाँसुरी कान्ह को बाँधती है। साँवरा रंग प्रेम का रंग है। बन से मनमोहन का आना लीला-दर्शन है। सूर गोपियों की ओर से बोलते हैं। रसखान भक्त अपनी जीभ से ब्रज माँगते हैं। कुल और मजहब का अहंकार यहाँ गौण है।
मीरा गिरधर को पति बनाती हैं। रसखान ग्वाल-वेश माँगते हैं। दोनों कृष्ण-भक्त अष्टछाप के बाहर हैं। स्वर अलग है — एक अनन्यता, दूसरा ब्रज-जन्म। कवित्त की चाल रीति के निकट लग सकती है; विषय भक्ति है, नायिका-भेद नहीं।
10 रसखान — निर्धारित पद
मानुस हौं तो वही रसखान — यदि मनुष्य जन्म मिले तो वही रसखान बनूँ जो ब्रज का है। कामना जाति की नहीं, जन्म और भूमि की है। या लकुटी अरु कामरिया पर — ग्वाल की लकड़ी और कंथा ही वैभव हैं; राजसी वैभव गौण है। मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं — मयूर-मुकुट धारण की अभिलाषा; शिखर-कृष्ण का चिह्न। खेलत फाग सुहाग भरी — होली कृष्ण-रास की; रंग लीला है। कान्ह भये बस बाँसुरी के — वेणु नायक को भी बाँधती है; शक्ति प्रेम की है, दंड की नहीं।
काह कहूँ सजनी संग की — सखी-संग कहने से बड़ा है; अनुभव वाणी से आगे है। प्रेम पगे जु रँगे रँग साँवरे — प्रेम साँवले रंग में पगा; रंग और राग एक हो गए। आवत हैं बन ते मनमोहन — वन से कृष्ण का आगमन; दर्शन का क्षण। आठ पद ब्रज-वास की कामना पर हैं, एक कविता नहीं। राज्य, कुल और मजहब का अहंकार यहाँ गौण है। भक्ति मनुष्य-देह और ग्वाल-वेश माँगती है।
रस माधुर्य-भक्ति है। छंद कवित्त-सवैया हैं। आलंबन कान्ह हैं। उद्दीपन लकुटी, मोरपखा, फाग, बाँसुरी, वन हैं। सूर गोपी-कंठ हैं। रसखान भक्त-कंठ हैं। दोनों सगुण कृष्ण गाते हैं; पंथ-छाप अलग है।
| पहली पंक्ति | भाव |
|---|---|
| मानुस हौं तो वही रसखान | मनुष्य-जन्म, ब्रज-वास |
| या लकुटी अरु कामरिया पर | ग्वाल-वेश |
| मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं | मयूर-मुकुट |
| खेलत फाग सुहाग भरी | होली-रास |
| कान्ह भये बस बाँसुरी के | वेणु-बंधन |
| काह कहूँ सजनी संग की | सखी-संग |
| प्रेम पगे जु रँगे रँग साँवरे | साँवला रंग |
| आवत हैं बन ते मनमोहन | वन से आगमन |
मानुस हौं तो वही रसखान
रसखान · निर्धारित पहली पंक्ति
11 चार कवियों का साम्य-वैषम्य
साम्य सगुण प्रेम, लोकभाषा और गेय मुक्तक पर है। चारों भक्तिकाल के कवि हैं, रीतिकाल के लक्षण-ग्रंथ नहीं। आराध्य साकार है। रस भक्ति प्रधान है। तुलसी राम कहते हैं; सूर-मीरा-रसखान कृष्ण कहते हैं। यही सबसे बड़ा वैषम्य है। दूसरा वैषम्य स्वर का है। तुलसी दास्य और विनय। सूर गोपी-वात्सल्य और निर्गुण-खंडन। मीरा एकनिष्ठ गिरधर और राजसी टकराहट। रसखान ब्रज-जन्म और ग्वाल-वेश।
भाषा में तुलसी पत्रिका-ब्रज, सूर साहित्यिक ब्रज, मीरा राजस्थानी-ब्रज, रसखान कवित्त-ब्रज। ग्रंथ-रूप स्तोत्र, चयनित भ्रमर-पद, पदावली और रचनावली हैं। संपादक क्रमशः वियोगी हरि, शुक्ल, मनोहर, मिश्र-युग्म हैं। बिहारी-भूषण-घनानंद-गिरिधर रीति और नीति की ओर हैं; ये चार भक्ति की ओर हैं। निर्धारित पाठ सगुण के दो आराध्य और चार कंठ हैं — राम का विनय, सूर का भ्रमर, मीरा का गिरधर, रसखान का ब्रज।
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