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परीक्षा उत्तर

Exam answers is a topic in Medieval poetry (Practice) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

Written-style answers for Medieval poetry at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

Exam answers

1. सगुण भक्ति से क्या आशय है?8 अंक

सगुण भक्ति उस भक्ति-मार्ग को कहते हैं जिसमें ईश्वर साकार और सगुण माना जाता है — रूप, गुण, नाम और लीला से युक्त। हिन्दी भक्तिकाल में प्रधान आराध्य राम और कृष्ण हैं। भक्त नाम जपता है, कथा सुनता है, सेवा करता है और पद गाता है। लीला में जन्म, वन, युद्ध, रास और वात्सल्य आते हैं। निर्गुण निराकार ब्रह्म पर टिकता है; सगुण विग्रह और कथा पर। आचार्य रामचंद्र शुक्ल सगुण को रामभक्ति और कृष्णभक्ति में बाँटते हैं। राम-शाखा मर्यादा, लोकसंग्रह और राम-राज्य की है। कृष्ण-शाखा माधुर्य, वात्सल्य और लीला की है। सगुण का अर्थ केवल मंदिर-मूर्ति नहीं; मूल अर्थ साकार संबंध है।

रामानुज का विशिष्टाद्वैत राम-शाखा से जुड़ा है — ब्रह्म सविशेष है। रामानंद ने राम-नाम लोक तक पहुँचाया। तुलसीदास रामचरितमानस में अवधी महाकाव्य गाते हैं। वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैत और पुष्टिमार्ग कृष्ण-शाखा की भूमि हैं। सूरदास बाल-कृष्ण को वात्सल्य देते हैं। अष्टछाप पुष्टि का सेवक-मंडल है। भाषा अवधी और ब्रज है। कथा स्मृति-पुराण से आती है, वाणी लोक की है। आचार्य सिद्धांत बाँधते हैं, कवि गाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि सगुण भक्ति साकार ईश्वर, आचार्य-संप्रदाय और लोकभाषा का योग है। आशय विग्रह और प्रेम का है। राम मर्यादा देते हैं, कृष्ण लीला।

2. सगुण भक्ति की पृष्ठभूमि लिखिए।8 अंक

सगुण भक्ति की पृष्ठभूमि चार स्तरों पर है — राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और साहित्यिक। राजनीतिक पृष्ठभूमि सल्तनत से मुगल स्थायित्व तक है। नगर, बाजार और सांस्कृतिक संपर्क बढ़े। सामाजिक पृष्ठभूमि जाति, कर्मकांड और ऊँच-नीच का दबाव है। सगुण ईश्वर को लोक और पंथ में प्रतिष्ठित करता है। राम सर्वसाधारण के आराध्य बनते हैं। कृष्ण ग्वाल-बाल के साथ गोकुल-कथा में उतरते हैं। तुलसी मर्यादा और राम-राज्य गाते हैं। सूर बाल-कृष्ण का वात्सल्य गाते हैं। लोक-स्वीकृति दोनों शाखाओं में है।

धार्मिक पृष्ठभूमि दक्षिण की आचार्य-परंपरा और उत्तर की रामानंदी तथा पुष्टिमार्गी पंक्ति है। आलवार-नायनार, रामानुज, मध्व, निंबार्क, वल्लभ और चैतन्य से भक्ति अखिल भारतीय सिद्ध होती है, केवल काशी-ब्रज की घटना नहीं। साहित्यिक पृष्ठभूमि देशी भाषा का उत्कर्ष है। रामचरितमानस अवधी में रचा गया, सूर के पद ब्रज में। संस्कृत कथा-सूत्र देती है; हिन्दी उसे लोकभाषा में गाती है। हजारीप्रसाद द्विवेदी भक्ति को सिद्ध-नाथ-जैन साधना की दीर्घ तैयारी का फल कहते हैं। रामचंद्र शुक्ल भक्तिकाल को हिन्दी का हृदय कहते हैं। सगुण उसी हृदय का साकार पक्ष है।

निष्कर्ष यह है कि सगुण भक्ति राजनीतिक-सामाजिक संपर्क, आचार्य-परंपरा और अवधी-ब्रज भाषा की भूमि पर खड़ी है। चार स्तर बिना लिखे पृष्ठभूमि अधूरी रह जाती है।

3. सगुण भक्ति के दार्शनिक आधार और आचार्य-संप्रदाय स्पष्ट कीजिए।20 अंक

सगुण भक्ति आचार्य-संप्रदाय पर आधारित वैष्णव साधना है। इसमें ईश्वर साकार और सगुण माना जाता है — रूप, गुण, नाम और लीला से युक्त। शंकर का अद्वैत निर्गुण चिंतन को भाषा देता है; सगुण भक्त जगत् और लीला को मिथ्या कहकर नहीं गाते। वैष्णव आचार्यों के चतुः संप्रदाय प्रसिद्ध हैं। श्री संप्रदाय के आचार्य रामानुज हैं, सिद्धांत विशिष्टाद्वैत। ब्रह्म संप्रदाय के आचार्य मध्व हैं, सिद्धांत द्वैत। रुद्र संप्रदाय की परंपरा में वल्लभाचार्य शुद्धाद्वैत और पुष्टिमार्ग प्रतिष्ठित करते हैं। सनकादि संप्रदाय के आचार्य निंबार्क हैं, सिद्धांत द्वैताद्वैत। रामानंद की रामानंदी पंक्ति उत्तर भारत में राम-नाम को लोक तक ले गई। चैतन्य महाप्रभु का गौड़ीय मार्ग अचिंत्य भेदाभेद और संकीर्तन से कृष्ण-भक्ति फैलाता है। आलवार और नायनार की दक्षिण-वाणी सिद्ध करती है कि यह धारा अखिल भारतीय है, केवल काशी-ब्रज की घटना नहीं।

विशिष्टाद्वैत के अनुसार ब्रह्म सविशेष है। चित् और अचित् ब्रह्म के शरीर माने जाते हैं, ब्रह्म उनका आत्मा है। यही राम-भक्ति की दार्शनिक भूमि है। रामानंद ने उसी भूमि को उत्तर के घर और घाट तक पहुँचाया। तुलसीदास रामानंदी पंक्ति के शिखर हिन्दी कवि हैं। उनके पास शास्त्र भी है, अवधी भी। रामचरितमानस अवधी में राम-कथा का महाकाव्य है। राम-शाखा का दार्शनिक क्रम रामानुज, रामानंद, तुलसी है। ईश्वरदास, अग्रदास और नाभादास भक्तमाल-पंक्ति के कवि हैं; वे आचार्य नहीं, वाणी के वाहक हैं। आचार्य सिद्धांत बाँधते हैं, कवि लोकभाषा में गाते हैं। दोनों का योग ही सगुण को साधना बनाता है, केवल कथा नहीं।

कृष्ण-भक्ति का प्रधान दार्शनिक आधार वल्लभ का शुद्धाद्वैत है। जगत् ब्रह्म का वास्तविक प्रकाश है, माया-मात्र या केवल विवर्त नहीं। पुष्टिमार्ग में जीव साधन-कर्म से अधिक प्रभु की कृपा अर्थात् पुष्टि से बँधता है। सेवक समर्पण करता है — शृंगार, भोग, कथा, कीर्तन। श्रीनाथजी की गोवर्धन-सेवा इस पंथ का केंद्र रही। अष्टछाप पुष्टि के आठ सेवक-कवि हैं। शिखर सूरदास हैं; साथ कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास, गोविंदस्वामी, छीतस्वामी, नंददास और चतुर्भुजदास। नंददास रास-पंचाध्यायी से प्रसिद्ध हैं। मध्व जीव और ब्रह्म को नित्य दो मानते हैं। निंबार्क भेद और अभेद दोनों स्वीकार करते हैं। चैतन्य कीर्तन की अलग शाखा हैं; पुष्टि-सेवा और गौड़ीय कीर्तन एक नाम नहीं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल सगुण को रामभक्ति और कृष्णभक्ति दो शाखाओं में रखते हैं। आचार्यों के मूल ग्रंथ मुख्यतः संस्कृत में हैं; हिन्दी भक्त अवधी और ब्रज में गाते हैं। तुलसी विशिष्टाद्वैत-रामानंदी आधार पर मर्यादा और राम-राज्य गाते हैं। सूर शुद्धाद्वैत-पुष्टि पर वात्सल्य और माधुर्य गाते हैं। बिना इन संप्रदायों के सगुण केवल लीला-वर्णन रह जाता; आचार्य उसे दार्शनिक साधना बनाते हैं। मध्व और निंबार्क हिन्दी शिखर-कवि उतने नहीं देते, सिद्धांत की पूर्णता देते हैं।

निष्कर्ष यह है कि सगुण का दार्शनिक आधार चतुः संप्रदाय हैं — विशिष्टाद्वैत, द्वैत, शुद्धाद्वैत और द्वैताद्वैत — तथा रामानंद व चैतन्य की पंक्तियाँ। हिन्दी में राम-पक्ष तुलसी तक और कृष्ण-पक्ष सूर तथा अष्टछाप तक आता है। नाम, सिद्धांत, संप्रदाय और हिन्दी कवि — इन्हीं के योग से सगुण का दार्शनिक स्वरूप पूरा होता है।

4. सगुण और निर्गुण भक्ति में साम्य और वैषम्य लिखिए।20 अंक

निर्गुण और सगुण आचार्य रामचंद्र शुक्ल के भक्तिकाल-विभाजन के दो खंड हैं। निर्गुण में ज्ञानाश्रयी संत-शाखा और प्रेमाश्रयी सूफी-प्रेमाख्यान हैं। सगुण में रामभक्ति और कृष्णभक्ति हैं। साम्य भूमि पर है, वैषम्य मार्ग पर। साम्य पाँच बिंदुओं पर लिखा जाता है। प्रथम, दोनों एक ही युग — भक्तिकाल — की धाराएँ हैं, दो युग नहीं। द्वितीय, दोनों ईश्वर-प्रेम को बाहरी कर्मकांड से बड़ा मानते हैं। तृतीय, दोनों देशी भाषा में गाते हैं — सधुक्कड़ी, अवधी, ब्रज। चतुर्थ, दोनों में गुरु मार्ग है। पञ्चम, पंडित या क़ाज़ी का आडंबर दोनों की दृष्टि में संदिग्ध है। संत में आलोचना तीखी है; सगुण में मर्यादा-भक्ति के रूप में नरम। संगीत, पद, दोहा और चौपाई दोनों के प्रचार-माध्यम हैं। शुक्ल इन्हें एक युग के दो हाथ कहते हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी दोनों को भारतीय साधना की निरंतरता में रखते हैं, अचानक चमत्कार नहीं।

वैषम्य तत्त्व पर है। निर्गुण निराकार राम है — जाति से असंबद्ध, मूर्ति से बड़ा, वेद-पुराण की बाहरी सत्ता से टकराने वाला। सगुण साकार राम और कृष्ण है। लीला, विग्रह, कथा, सेवा और शृंगार-भक्ति उसके अंग हैं। कबीर फटकारते हैं और अनुभव को शास्त्र से ऊपर कहते हैं। तुलसी उन्हीं वेद-पुराण को अवधी में घर करते हैं; फटकार नहीं, मर्यादा है। सूर बाल-कृष्ण का वात्सल्य गाते हैं — यह सगुण का घर-रूप है, मंदिर-पूजा मात्र नहीं। संत सहज और फटकार पर टिकते हैं। सगुण भक्त कथा और संप्रदाय पर। अंतर नाम और विग्रह का है, भक्ति-हृदय का नहीं।

सामाजिक स्थिति भी भिन्न है। संत प्रायः श्रमशील वर्ग से आए। सगुण भक्त कई परतों से आए — रामानंदी पंक्ति, पुष्टि-सेवक, तुलसी जैसे शास्त्र-सम्पन्न कवि। फिर भी दोनों लोकभाषा में उतरे, इसी से युग एक बना। काव्य-रूप वैषम्य को और खोलता है। निर्गुण की पहचान साखी, सबद और उलटबाँसी है। प्रेमाख्यान निर्गुण का कथा-रूप है — जायसी आदि अवधी में प्रेम-मार्ग चलाते हैं। राम-सगुण की पहचान चौपाई-दोहा का महाकाव्य रामचरितमानस है। कृष्ण-सगुण की पहचान ब्रज पद है — सूर, अष्टछाप। एक को केवल नीति और दूसरे को केवल लीला कहना अधूरा है।

रस और आचार्य-सूत्र भी भेद करते हैं। निर्गुण में शांत, व्यंग्य और निर्वेद प्रधान हैं। राम-सगुण में भक्ति, वीर, करुण और शांत लोकसंग्रह करते हैं; शृंगार संयत है। कृष्ण-सगुण में वात्सल्य और माधुर्य प्रधान हैं। निर्गुण आचार्य-संप्रदाय को उतना नहीं गाता; सगुण रामानुज-रामानंद और वल्लभ-पुष्टि पर खड़ा है। शुक्ल का विभाजन प्रवृत्ति का है, युग-विच्छेद का नहीं। दोनों धाराएँ मिलकर भक्तिकाल पूर्ण होता है। एक हाथ काटने से हृदय अधूरा रह जाता है।

निष्कर्ष यह है कि साम्य युग, प्रेम, लोकभाषा और गुरु पर है। वैषम्य निराकार-साकार, फटकार-मर्यादा तथा साखी-प्रेमाख्यान बनाम मानस-पद पर है। अंतर विग्रह और मार्ग का है, भक्ति-युग का नहीं।

5. रामभक्ति शाखा का परिचय दीजिए।8 अंक

रामभक्ति सगुण भक्तिकाल की मर्यादा-शाखा है। आराध्य दशरथ-सुत राम हैं, जो मर्यादा-पुरुषोत्तम भी हैं। दार्शनिक आधार रामानुज का विशिष्टाद्वैत है — ब्रह्म सविशेष है। उत्तर भारत में रामानंद ने राम-नाम का द्वार खोला। तुलसीदास इस शाखा के शिखर कवि हैं। ईश्वरदास, अग्रदास और नाभादास भक्तमाल-पंक्ति के अन्य नाम हैं। विषय राम-कथा, सीता, भरत, हनुमान और राम-राज्य हैं। रस शांत, भक्ति, वीर और करुण हैं। शृंगार गौण और संयत है। सामाजिक स्वर कुटुंब, राज्य, भाई और प्रजा है। तुलसी राम को लोक का धर्म बनाते हैं।

शिखर-ग्रंथ रामचरितमानस है। भाषा अवधी है। छंद मुख्यतः चौपाई और दोहा हैं। सात कांड हैं — बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किंधा, सुंदर, लंका, उत्तर। कथा वाल्मीकि और अध्यात्म रामायण की भूमि से आती है; वाणी लोक की है। वन का राम दरबार का राम नहीं रह जाता। शुक्ल मानस को लोकनायक का काव्य कहते हैं। भक्ति समाज से कटती नहीं। सीता, भरत और हनुमान मर्यादा के प्रतिनिधि हैं; रावण अहंकार है।

निष्कर्ष यह है कि रामभक्ति आचार्य रामानुज-रामानंद, कवि तुलसी और ग्रंथ रामचरितमानस से पहचानी जाती है। मर्यादा, लोकसंग्रह और राम-राज्य इसके सूत्र हैं।

6. रामचरितमानस का परिचय देते हुए उसका महत्त्व लिखिए।20 अंक

रामचरितमानस गोस्वामी तुलसीदास का अवधी महाकाव्य है। रचना का पारंपरिक वर्ष विक्रम संवत् 1631 अर्थात् ईसवी 1574 के आसपास कहा जाता है। कथा वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण की भूमि से आती है; वाणी लोक की अवधी है। सात कांड हैं — बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किंधा, सुंदर, लंका और उत्तर। छंद मुख्यतः चौपाई और दोहा हैं; स्थान-स्थान पर सोरठा, स्तुति और अन्य छंद भी हैं। चौपाई कथा चलाती है, दोहा अर्थ बाँधता है। बालकांड में जन्म, विश्वामित्र, धनुष-यज्ञ और विवाह हैं। अयोध्याकांड वन-गमन और भरत-त्याग पर केंद्रित है। अरण्यकांड में पंचवटी और सीता-हरण हैं। किष्किंधाकांड सुग्रीव-मैत्री है। सुंदरकांड हनुमान और लंका-प्रवेश का है। लंकाकांड युद्ध और रावण-वध है। उत्तरकांड राज्याभिषेक और राम-राज्य है; इसके कुछ अंशों पर पाठ-विवाद भी है।

उद्देश्य कीर्ति और लोकहित साथ हैं। तुलसी कहते हैं — कीरति भनिति भूति भलि सोई, सुरसरि सम सब कहँ हित होई। कीर्ति, वाणी और समृद्धि वही भली जो गंगा की भाँति सबका हित करे। यही सगुण का सामाजिक सूत्र है। राम मर्यादा-पुरुषोत्तम हैं — कामनाओं के पूरक और काम के शासक भी। सीता शक्ति और पतिव्रता के मध्यकालीन आदर्श में हैं। भरत त्याग हैं। हनुमान सेवक-भक्ति के आदर्श हैं। रावण अहंकार है, ज्ञान के बिना। शैली सरल, दृष्टांत-बहुल और गेय है। घर और घाट पर पाठ हुआ। रामलीला, रामानंदी पंथ और अवधी लोक-कंठ ने ग्रंथ को कंठस्थ बनाया।

साहित्यिक महत्त्व यह है कि हिन्दी रामकाव्य का शिखर यही ग्रंथ है। अवधी का उत्कर्ष और चौपाई-दोहा की कथा-शक्ति यहीं सिद्ध होती है। भाषा संस्कृत-मिश्रित है, पर बोली की गर्मी वाली। आचार्य रामचंद्र शुक्ल इसे लोकनायक का काव्य कहते हैं। भक्ति समाज से कटती नहीं; समाज भक्ति से जुड़ता है। धार्मिक महत्त्व यह है कि सगुण राम-भक्ति का प्रधान ग्रंथ यही बना — रामानुज-रामानंद की भूमि पर लोक-महाकाव्य। सामाजिक महत्त्व कुटुंब, भाई, प्रजा और राम-राज्य के आदर्श में है। रामभक्ति केवल क्षत्रिय-आदर्श नहीं रह जाती; तुलसी राम को लोक का धर्म बनाते हैं। वन का राम दरबार का राम नहीं रह जाता।

काव्य-वैशिष्ट्य रस, चरित्र और सीमा से भी पहचाना जाता है। रस भक्ति प्रधान है; वीर, करुण और शांत सहायक हैं। शृंगार गौण और संयत है — कृष्ण-काव्य का माधुर्य यहाँ लक्ष्य नहीं। विषय मर्यादा, भक्ति, राज्य और कुटुंब एक साथ हैं। सीमाएँ छिपानी नहीं — उत्तरकांड का पाठ-भेद, स्त्री-चित्र मध्यकालीन मर्यादा के भीतर, राक्षस-चित्र युग के। इन सीमाओं से लोक-प्रसार कम नहीं होता। हिन्दी में राम-कथा का सबसे बड़ा घर यही ग्रंथ बना। स्वरूप कांड-विभाजन, अवधी भाषा, चौपाई-दोहा, मर्यादा और लोकहित से पहचाना जाता है।

निष्कर्ष यह है कि रामचरितमानस सगुण रामभक्ति का प्रमाण-ग्रंथ है। परिचय के सूत्र हैं — तुलसीदास, अवधी, सप्त कांड, चौपाई-दोहा, संवत् 1631। महत्त्व के सूत्र हैं — साहित्यिक शिखर, धार्मिक प्रतिष्ठा, सामाजिक राम-राज्य, शुक्ल का लोकनायक-आग्रह और लोक-प्रसार।

7. रामचरितमानस की काव्यगत विशेषताएँ लिखिए।8 अंक

रामचरितमानस की प्रधान भाषा अवधी है। वह संस्कृत-शब्दों से समृद्ध है, किंतु बोलचाल की गर्मी रखती है। कथा चौपाई चलाती है, दोहा अर्थ स्थिर करता है। स्थान-स्थान पर सोरठा और स्तुति हैं। सात कांड कथा को क्रम देते हैं — बाल से उत्तर तक। शैली सरल, दृष्टांत-बहुल और गेय है। इसी कारण ग्रंथ रामलीला और लोक-पाठ तक पहुँचा। चरित्र मर्यादा के प्रतिनिधि हैं — राम, सीता, भरत, हनुमान। रावण अहंकार का चित्र है। उद्देश्य वाणी को लोकहितकारी बनाना है — कीरति भनिति भूति वही भली जो सुरसरि-सम हित करे।

रस भक्ति प्रधान है। वीर, करुण और शांत सहायक रस हैं। शृंगार संयत और गौण है। विषय मर्यादा, भक्ति, राज्य और कुटुंब एक साथ हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल मानस को लोकनायक का काव्य कहते हैं। भाषा प्रसाद गुण की भूमि है — अर्थ शीघ्र हृदय में बैठता है। सीमाएँ भी हैं — उत्तरकांड का पाठ-भेद, स्त्री-चित्र मध्यकालीन मर्यादा के भीतर। इन सीमाओं से लोक-प्रसार कम नहीं होता। हिन्दी राम-कथा का सबसे बड़ा ग्रंथ यही बना।

निष्कर्ष यह है कि काव्यगत विशेषताएँ अवधी महाकाव्य, सप्त कांड, चौपाई-दोहा, भक्ति-रस, मर्यादा और लोकहित हैं। रूप कथा और आचरण दोनों का है।

8. पुष्टिमार्ग किसे कहते हैं? कृष्णभक्ति से उसका संबंध लिखिए।8 अंक

पुष्टिमार्ग वल्लभाचार्य का भक्ति-मार्ग है। यह रुद्र संप्रदाय की परंपरा से जुड़ा है। दार्शनिक आधार शुद्धाद्वैत है। जगत् मिथ्या नहीं; वह ब्रह्म का वास्तविक प्रकाश है, केवल विवर्त नहीं। पुष्टि का अर्थ प्रभु की कृपा है। जीव साधन-कर्म से अधिक समर्पण और सेवा से बँधता है। सेवक शृंगार, भोग, कथा और कीर्तन से सेवा करता है। श्रीनाथजी की गोवर्धन-सेवा इस पंथ का केंद्र रही। आराध्य कृष्ण हैं। हिन्दी काव्य में गोकुल-वात्सल्य और ब्रज-माधुर्य प्रधान हैं। बाल-कृष्ण, माखन, यशोदा और ग्वाल-बाल इसी मार्ग के विषय हैं।

हिन्दी कृष्णभक्ति पुष्टिमार्ग से सूरदास और अष्टछाप तक आती है। सूर पुष्टि-सेवक माने जाते हैं। राधा-कृष्ण का शृंगार भक्ति है, रीतिकालीन नायिका-भेद नहीं। अष्टछाप पुष्टिमार्ग के आठ सेवक-कवि हैं; सूर उनमें शिखर हैं। नंददास रास-पंचाध्यायी से जुड़े। चैतन्य का गौड़ीय संप्रदाय कीर्तन की अलग शाखा है; पुष्टि-सेवा और गौड़ीय कीर्तन एक नाम नहीं। पुष्टिमार्ग साहित्य को सेवक-सेवा और वात्सल्य का बनाता है। कृष्ण शास्त्र से अधिक कृपा और लीला में उतरते हैं।

निष्कर्ष यह है कि पुष्टिमार्ग कृष्णभक्ति को सिद्धांत शुद्धाद्वैत, साधना सेवा-कृपा और कवि-मंडल अष्टछाप-सूर तीनों देता है। बिना पुष्टि के हिन्दी कृष्ण-काव्य अधूरा रह जाता है।

9. अष्टछाप का परिचय दीजिए।8 अंक

अष्टछाप पुष्टिमार्ग के आठ कृष्ण-भक्त कवि हैं। अष्टछाप का अर्थ आठ स्वीकृत कवि-कंठ है। चार वल्लभाचार्य के समकालीन माने जाते हैं — कुंभनदास, सूरदास, परमानंददास और कृष्णदास। चार विट्ठलनाथ गुसाईं जी के समय के माने जाते हैं — गोविंदस्वामी, छीतस्वामी, चतुर्भुजदास और नंददास। शिखर सूरदास हैं। नंददास रास-पंचाध्यायी और अनुवाद-कर्म से प्रसिद्ध हैं। कुंभनदास सेवा और पदों से जुड़े हैं। भाषा सबकी ब्रज है। विषय कृष्ण-लीला है। सेवा का केंद्र गोवर्धन-श्रीनाथजी रहा। यह दरबार की रीति नहीं, सेवकों का कीर्तन-मंडल है।

सूर वात्सल्य, माधुर्य और लीला-पद के कवि हैं। रीतिकाल का नायिका-भेद इनका लक्ष्य नहीं। राधा-कृष्ण का शृंगार भक्ति बनकर आता है। पहचान चार बिंदुओं से है — शिखर सूर, भाषा ब्रज, भूमि पुष्टि, विषय लीला। मीरा अष्टछाप में नहीं; वे राजस्थान की स्वतंत्र कृष्ण-भक्त हैं। रसखान भी कृष्ण-भक्त हैं, अष्टछाप के बाहर। पुष्टि का सेवक होना और कृष्ण-प्रेम गाना एक बात नहीं। अष्टछाप नाम पंथ-स्वीकृति का है। आठ छाप दो पीढ़ियों में बँटती हैं — वल्लभ और विट्ठलनाथ।

निष्कर्ष यह है कि अष्टछाप पुष्टिमार्ग का कवि-समूह है। सूर शिखर हैं, भाषा ब्रज है, विषय लीला है, मार्ग पुष्टि है। आठ नाम और दो पीढ़ियाँ परिचय के अंग हैं।

10. रामभक्ति और कृष्णभक्ति का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।20 अंक

रामभक्ति और कृष्णभक्ति सगुण भक्तिकाल की दो प्रधान शाखाएँ हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल सगुण को इन्हीं दो उपखंडों में रखते हैं। साम्य ये हैं — आराध्य साकार है, भाषा लोक की है, आचार्य-संप्रदाय है, कथा स्मृति-पुराण से आती है, भक्ति-रस प्रधान है। तुलसीदास और सूरदास हिन्दी के दो शिखर एक ही शताब्दी के आसपास माने जाते हैं। दोनों में गुरु, नाम और सेवा का स्थान है। दोनों कथा पुराण-स्मृति से आती है, वाणी लोकभाषा की है। अंतर आराध्य के स्वरूप, सिद्धांत, विधा और सामाजिक स्वर का है। एक शाखा दूसरी की प्रतिद्वंद्वी नहीं, पूरक है। सगुण इन दोनों स्वरों में पूरा होता है।

रामभक्ति मर्यादा, कर्तव्य, वन और राज्य पर टिकती है। आराध्य दशरथ-सुत राम हैं, जो मर्यादा-पुरुषोत्तम भी हैं। दार्शनिक क्रम रामानुज का विशिष्टाद्वैत, रामानंद की रामानंदी पंक्ति और तुलसी है। ईश्वरदास, अग्रदास और नाभादास भक्तमाल-पंक्ति के अन्य नाम हैं। शिखर-ग्रंथ रामचरितमानस है — अवधी, चौपाई-दोहा, सात कांड। सामाजिक आदर्श राम-राज्य, कुटुंब, भाई और प्रजा है। रस भक्ति, वीर, करुण और शांत हैं। शृंगार संयत और गौण है। राम धनुष, वन-गमन और राज्याभिषेक से जुड़े हैं। लोकसंग्रह यहाँ लक्ष्य है।

कृष्णभक्ति माधुर्य, वात्सल्य और लीला पर टिकती है। आराध्य गोलोक-कृष्ण, गोकुल-कृष्ण और द्वारका-कृष्ण हैं; हिन्दी काव्य में गोकुल-वात्सल्य और ब्रज-माधुर्य प्रधान हैं। दार्शनिक आधार वल्लभ का शुद्धाद्वैत और पुष्टिमार्ग है — जगत् ब्रह्म का वास्तविक प्रकाश, जीव पुष्टि अर्थात् कृपा से बँधा। कवि-मंडल अष्टछाप है। शिखर सूरदास हैं; नंददास रास-पंचाध्यायी से जुड़े। भाषा ब्रज है। रूप पद है, महाकांड-कथा नहीं। सामाजिक आदर्श कृपा, समर्पण और सेवा है। रस वात्सल्य और माधुर्य प्रधान हैं। राधा-कृष्ण का शृंगार भक्ति है, रीतिकालीन नायिका-भेद नहीं। कृष्ण माखन, रास और यशोदा से जुड़े हैं। चैतन्य कीर्तन की अलग शाखा हैं; अष्टछाप ब्रज-पुष्टि से जुड़े हैं।

तुलना के बिंदु स्थिर हैं। आराध्य: राम मर्यादा-पुरुषोत्तम, कृष्ण लीला-पुरुष। सिद्धांत: विशिष्टाद्वैत बनाम शुद्धाद्वैत-पुष्टि। भाषा: अवधी बनाम ब्रज। विधा: महाकाव्य बनाम पद। रस: लोकसंग्रह-करुण-वीर बनाम वात्सल्य-माधुर्य। छंद: चौपाई-दोहा बनाम गेय पद। राम-भक्ति राज्य और वन सोचती है; कृष्ण-भक्ति प्रेम और सेवा। पुष्टिमार्ग कृपा है; रामानंदी पंक्ति नाम और मर्यादा है। एक शाखा को केवल नीति और दूसरी को केवल शृंगार कहना अधूरा है। सूर की वात्सल्य भक्ति है। तुलसी की मर्यादा भक्ति है। राम-शाखा लोकसंग्रह सोचती है; कृष्ण-शाखा सेवा और लीला। दोनों सगुण हैं; स्वभाव अलग है। चैतन्य कीर्तन और पुष्टि-सेवा कृष्ण-पक्ष के दो मार्ग हैं, रामानुज-रामानंद राम-पक्ष के एक क्रम हैं।

निष्कर्ष यह है कि साम्य सगुण प्रेम, आचार्य-संप्रदाय और लोकभाषा पर है। वैषम्य मर्यादा बनाम लीला, अवधी महाकाव्य बनाम ब्रज पद, रामानुज-रामानंद-तुलसी बनाम वल्लभ-पुष्टि-सूर-अष्टछाप पर है। सगुण भक्ति इन दोनों शाखाओं के योग से पूर्ण होती है।

11. काव्य के प्रमुख लक्षण लिखिए।20 अंक

काव्य के लक्षण संस्कृत आचार्यों ने शब्द, अर्थ, गुण, अलंकार और रस के आधार पर दिए हैं। भामह कहते हैं — शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्। शब्द और अर्थ का सहित भाव काव्य है; अकेला शब्द-चमत्कार या अकेला अर्थ काव्य नहीं। दंडी काव्य का शरीर अभीष्ट अर्थ की व्यवच्छिन्न पदावली मानते हैं। वामन रीति को काव्य की आत्मा कहते हैं — रीतिरात्मा काव्यस्य। आनंदवर्धन ध्वनि को आत्मा कहते हैं। ये लक्षण काव्य के भिन्न अंगों पर बल देते हैं, एक-दूसरे को काटते नहीं।

मम्मट का लक्षण व्यापक है — तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि। काव्य दोष-रहित शब्दार्थ है, गुणयुक्त है; अलंकार सामान्यतः रहते हैं, कहीं अलंकार के बिना भी काव्य संभव है। काव्य-हेतु तीन हैं — शक्ति अर्थात् प्रतिभा, निपुणता अर्थात् लोक-शास्त्र का ज्ञान, अभ्यास अर्थात् गुरु-उपदेश से बार-बार रचना। तीनों का योग हेतु है। प्रयोजन यश, अर्थ, व्यवहार-ज्ञान, शिवेतरक्षति और तत्काल आनंद हैं; आनंद प्रधान है। तीन गुण नित्य शोभाकारक धर्म हैं। माधुर्य चित्त को द्रवित करता है — शृंगार, करुण, शांत; सूर और बिहारी प्रमाण हैं। ओज चित्त को दीप्त करता है — वीर, रौद्र, बीभत्स; भूषण का कवित्त प्रमाण है। प्रसाद अर्थ को शीघ्र हृदय में बैठाता है; सब रसों का सहायक; तुलसी की चौपाई इसकी भूमि है। अलंकार आहार्य शोभा हैं; गुण काव्य के बिना नहीं चलते।

दोष अपकर्षक धर्म हैं। वर्ग तीन हैं — शब्द-दोष, अर्थ-दोष, रस-दोष। श्रुतिकटु, च्युतसंस्कृति, न्यूनपदता, अधिकपदता शब्द पक्ष हैं। अप्रतीत, ग्राम्य, संदिग्ध अर्थ पक्ष हैं। विरुद्ध भाव का अनावश्यक प्रवेश या स्थायी का शिथिलन रस पक्ष है। पुनरुक्ति सदा दोष नहीं; लाटानुप्रास में वही आवृत्ति अलंकार है। शब्दशक्ति बताती है अर्थ किस मार्ग से आता है। अभिधा मुख्यार्थ-वाच्य देती है — गौः कहने पर गाय। लक्षणा तब चलती है जब मुख्यार्थ बाधित हो — गङ्गायां घोषः का तात्पर्य तट है। व्यंजना वाच्य-लक्ष्य के बाद का अतिरिक्त व्यंग्य है; रस व्यंग्य आस्वाद है, वाच्य सूची नहीं। आनंदवर्धन व्यंग्य-प्रधान काव्य को ध्वनि कहते हैं।

विश्वनाथ का लक्षण रस-केंद्रित है — वाक्यं रसात्मकं काव्यम्। पंडितराज जगन्नाथ कहते हैं — रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्। विश्वनाथ भक्तिकाव्य के अनुकूल हैं, क्योंकि भक्ति-वात्सल्य बिना मानस और सूर अधूरे रह जाते हैं। जगन्नाथ रीति और रमणीयता दोनों को छूते हैं। मम्मट रीतिकाव्य के निकट हैं — गुण, अलंकार, नायिका-भेद। हिन्दी मध्यकाल इन सूत्रों का व्यवहार दिखाता है। मानस प्रसाद और रस की ओर है। सूर माधुर्य की ओर है। भूषण ओज की ओर है। बिहारी शृंगार और श्लेष की ओर है। बिना लक्षण, गुण, दोष और शब्दशक्ति के छंद-अलंकार केवल सजावट रह जाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि भामह सहित, मम्मट गुण-दोष-अलंकार, विश्वनाथ रस और जगन्नाथ रमणीयता — ये सूत्र काव्य का स्वरूप बाँधते हैं। तीन गुण माधुर्य-ओज-प्रसाद हैं; दोष शब्द-अर्थ-रस के अपकर्ष हैं; शब्दशक्ति अभिधा-लक्षणा-व्यंजना है। हेतु शक्ति-निपुणता-अभ्यास हैं; प्रयोजन में आनंद प्रधान है।

12. रस से क्या तात्पर्य है? रस-निष्पत्ति के अंग स्पष्ट कीजिए।20 अंक

रस काव्य का आस्वाद्य आनंद है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में रस नाटक का प्राण है; बाद में वह समस्त काव्य का प्राण माना गया। विश्वनाथ काव्य को रसात्मक वाक्य कहते हैं — वाक्यं रसात्मकं काव्यम्; रस के बिना वाक्य काव्य नहीं। स्थायी भाव चित्त का मूल भाव है। जब वह विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से परिपक्व होता है, तब रस कहलाता है। पाठक या दर्शक अपना अहं छोड़कर भाव को सामान्य रूप में भोगता है — भट्टनायक इसे साधारणीकरण कहते हैं। अभिनवगुप्त रस को आनंद मानते हैं, कभी ब्रह्मानंद-सहोदर भी कहा गया। आनंदवर्धन व्यंग्य को काव्य का प्राण कहते हैं; रस वाच्य सूची नहीं, व्यंजना से जगा आस्वाद है। बिना स्थायी के रस केवल विशेषण रह जाता है।

भरत का सूत्र है — विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः। विभाव कारण हैं। आलंबन वह पात्र या वस्तु है जिस पर भाव टिकता है — राम शृंगार में सीता के आलंबन, वीर में रावण। उद्दीपन वह देश, काल और चेष्टा है जो भाव बढ़ाती है — चांदनी, वन, वसंत, युद्ध-दुंदुभि। अनुभाव कार्य हैं — हाव-भाव, चेष्टा। आठ सात्विक अनुभाव माने गए हैं — स्तंभ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, वेपथु, वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय। व्यभिचारी या संचारी भाव तैंतीस हैं; वे स्थायी के सहायक लहर हैं — निर्वेद, ग्लानि, शंका, असूया, मद, श्रम, हर्ष, विषाद आदि। संयोग से स्थायी रस बनता है। सूत्र के चार अंग — स्थायी, विभाव, अनुभाव, संचारी — बिना एक के निष्पत्ति अधूरी है।

स्थायी भाव नव रस के मूल हैं। भरत आठ रस कहते हैं; अभिनवगुप्त शांत को नवें के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। हिन्दी आचार्य प्रायः नव रस मानते हैं। रति से शृंगार, हास से हास्य, शोक से करुण, क्रोध से रौद्र, उत्साह से वीर, भय से भयानक, जुगुप्सा से बीभत्स, विस्मय से अद्भुत, निर्वेद से शांत। शृंगार के दो भेद संयोग और विप्रलंभ हैं; रीतिकाल दोनों पर लक्षण लिखता है। वात्सल्य को कभी दसवाँ रस कहा जाता है; सूर का बाल-कृष्ण उसका हिन्दी प्रमाण है, यद्यपि शास्त्र की मूल संख्या आठ-नौ पर टिकी है। रस का नाम लिखते समय स्थायी भाव साथ रहता है।

मध्यकालीन काव्य इन अंगों का व्यवहार है। रामचरितमानस में भक्ति, करुण, वीर और शांत प्रधान हैं; शृंगार संयत है। सूर में वात्सल्य और माधुर्य प्रधान हैं। बिहारी शृंगार के दोहे लिखते हैं — रति स्थायी, नायक-नायिका आलंबन, कुंज-भ्रमर उद्दीपन। भूषण वीर रस के कवि हैं — उत्साह स्थायी, शिवाजी-छत्रसाल आलंबन, सेना-भुजा उद्दीपन। घनानंद विप्रलंभ-प्रेम गाते हैं। केवल शृंगार लिखना अधूरा है; रति, आलंबन और उद्दीपन साथ हों तभी उत्तर पूरा है। गुण रस के सहायक हैं — माधुर्य शृंगार-करुण का, ओज वीर-रौद्र का, प्रसाद सब रसों का।

निष्कर्ष यह है कि रस स्थायी भाव का परिपाक है। अंग चार हैं — स्थायी, विभाव, अनुभाव, संचारी। सूत्र भरत का है, साधारणीकरण भट्टनायक का है, नव रस अभिनव-परंपरा का है। हिन्दी प्रमाण तुलसी-सूर-बिहारी-भूषण हैं।

13. नव रस और उनके स्थायी भाव लिखिए।8 अंक

रस स्थायी भाव का परिपाक है। भरत आठ रस कहते हैं। अभिनवगुप्त शांत को जोड़कर नव रस प्रतिष्ठित करते हैं। शृंगार का स्थायी भाव रति है। हास्य का हास है। करुण का शोक है। रौद्र का क्रोध है। वीर का उत्साह है। भयानक का भय है। बीभत्स का जुगुप्सा है। अद्भुत का विस्मय है। शांत का निर्वेद है। शृंगार के दो भेद संयोग और विप्रलंभ हैं। वात्सल्य को कभी दसवाँ रस कहा जाता है; सूर का बाल-कृष्ण उसका हिन्दी प्रमाण है, यद्यपि शास्त्र की मूल संख्या आठ-नौ पर टिकी है।

रस का नाम लिखते समय स्थायी भाव साथ रहता है। बिना स्थायी के रस केवल विशेषण रह जाता है। रामचरितमानस में भक्ति, करुण, वीर और शांत प्रधान हैं; शृंगार संयत है। सूर वात्सल्य के कवि हैं। बिहारी शृंगार के दोहे लिखते हैं — रति स्थायी। भूषण वीर रस के हैं — उत्साह स्थायी। गुण रस के सहायक हैं — माधुर्य शृंगार-करुण का, ओज वीर-रौद्र का, प्रसाद सब रसों का। दोष रस का अपकर्ष करते हैं; स्थायी का शिथिलन रस-दोष है।

निष्कर्ष यह है कि नव रस नौ स्थायी भावों के परिपाक हैं। नाम और स्थायी दोनों अंग हैं। जोड़ा बिना तोड़े लिखा जाता है।

14. दोहा और चौपाई छंद का लक्षण लिखिए।8 अंक

दोहा मात्रिक छंद है। दो पक्ष होते हैं। गणना 13+11 है — प्रथम पद तेरह मात्रा, द्वितीय ग्यारह; फिर तृतीय तेरह, चतुर्थ ग्यारह। प्रत्येक पद के छठे और अंतिम वर्ण गुरु माने जाते हैं। लघु एक मात्रा, गुरु दो मात्रा। भाषा अवधी और ब्रज दोनों में दोहा चलता है। तुलसी, रहीम और बिहारी दोहे के प्रतिनिधि कवि हैं। बिहारी सतसई दोहा-काव्य है — समास और चमत्कार की छोटी इकाई। दोहा अर्थ बाँधता है, कथा नहीं चलाता।

चौपाई चार चरणों का मात्रिक छंद है। प्रत्येक चरण सोलह मात्रा का होता है। अंत में प्रायः दो गुरु रहते हैं। रामचरितमानस की कथा चौपाई में चलती है; दोहा कांडों में सूत्र बाँधता है। यही जोड़ी आगे रीतिकाल तक चलती है। शैली गेय और दृष्टांत-बहुल हो तो चौपाई लोक-पाठ बन जाती है। रोला और कुंडलिया मात्रिक परिवार के अन्य छंद हैं; दोहा-चौपाई उनसे अलग पहचाने जाते हैं। मात्रा और वर्ण का भेद लिखे बिना छंद-लक्षण अधूरा रह जाता है। दोहा द्विपदी है, चौपाई चतुष्पदी।

निष्कर्ष यह है कि दोहा 13+11 का द्विपदी मात्रिक छंद है, चौपाई सोलह मात्रा का चतुष्पदी छंद है। मानस दोनों का योग है; सतसई दोहे का कोष है।

15. निर्धारित छंदों का परिचय दीजिए।20 अंक

निर्धारित दस छंद हैं — दोहा, चौपाई, कुंडलिया, कवित्त, गीतिका, हरिगीतिका, रोला, उल्लाला, सवैया और द्रुत विलंबित। इनमें मात्रिक और वर्णिक दोनों जातियाँ हैं। मात्रिक छंद मात्रा गिनते हैं — लघु एक, गुरु दो। वर्णिक छंद वर्ण और गण गिनते हैं। मध्यकाल में भक्ति-पक्ष दोहा-चौपाई-गीत पर टिका है; रीति-पक्ष कवित्त-सवैया पर। मात्रा और वर्ण का भेद लिखे बिना छंद-परिचय अधूरा रह जाता है। छंद केवल गणना नहीं; वह कवि की विधा है।

दोहा मात्रिक द्विपदी है। गणना 13+11 है — प्रथम पद 13 मात्रा, द्वितीय 11; फिर तीसरा 13, चौथा 11। प्रत्येक पद के छठे और अंतिम वर्ण गुरु माने जाते हैं। तुलसी, रहीम, बिहारी दोहे के बड़े कवि हैं; बिहारी सतसई दोहा-काव्य है। चौपाई चार चरणों का मात्रिक छंद है; प्रत्येक चरण 16 मात्रा; अंत में प्रायः दो गुरु। रामचरितमानस की कथा चौपाई चलाती है, दोहा सूत्र बाँधता है। रोला दो चरण, प्रत्येक 24 मात्रा; ग्यारहवीं और तेरहवीं मात्रा गुरु। कुंडलिया दोहा और रोला का योग है; छह पंक्तियाँ; दोहे का अंतिम अंश रोला के आरंभ में दोहराया जाता है; अंतिम पंक्ति प्रायः पहली से जा मिलती है — इसी घुमाव से नाम कुंडलिया है। गिरिधर कविराय कुंडलिया के लिए प्रसिद्ध हैं। उल्लाला दो चरण — प्रथम 15 मात्रा, द्वितीय 13; केशव और भूषण ने प्रयोग किया है।

गीतिका और हरिगीतिका मात्रिक-गेय हैं। गीतिका प्रत्येक चरण 26 मात्रा, चौदहवीं मात्रा पर यति, चार चरण। हरिगीतिका प्रत्येक चरण 28 मात्रा, सोलहवीं मात्रा पर यति, चार चरण; भक्ति-पद और आधुनिक गीत दोनों में आई है। कवित्त अर्थात् घनाक्षरी वर्णिक छंद है। चार चरण, प्रत्येक में प्रायः 31 या 32 वर्ण; यति बीच में। रीतिकाल का यह प्रधान छंद है। भूषण के वीर-पद्य और घनानंद के प्रेम-पद्य कवित्त में प्रसिद्ध हैं। सवैया भी चार चरणों का वर्णिक छंद है; जातियाँ कई हैं, मत्तगयंद सर्वाधिक प्रचलित। कवित्त-सवैया आश्रय-काव्य, वीर और शृंगार दोनों में चलते हैं।

द्रुत विलंबित संस्कृत का वर्णिक छंद है। गण-क्रम भगण, भगण, भगण, रगण है — प्रत्येक चरण बारह वर्ण। भगण लघु-लघु-गुरु द्रुत का आभास देता है; रगण गुरु-लघु-लघु विलंबित का — इसी से नाम द्रुत विलंबित है। हिन्दी रीति-काव्य में इसका प्रयोग कवित्त-सवैया से कम है; निर्धारित सूची में लक्षण यही है। तुलसी चौपाई-दोहा में राम-कथा गाते हैं। सूर गेय पदों में कृष्ण गाते हैं। बिहारी दोहे में शृंगार बाँधते हैं। भूषण-घनानंद कवित्त में वीर और पीर गाते हैं। गिरिधर कुंडलिया में नीति गाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि निर्धारित छंद दो जातियों में बँटते हैं। मात्रिक — दोहा, चौपाई, रोला, कुंडलिया, उल्लाला, गीतिका, हरिगीतिका। वर्णिक — कवित्त, सवैया, द्रुत विलंबित। लक्षण संख्या, यति और गण से पहचाना जाता है, केवल नाम से नहीं।

16. अनुप्रास से अतिशयोक्ति तक अलंकारों का सोदाहरण विवेचन कीजिए।20 अंक

अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्म हैं। दो बड़े वर्ग हैं — शब्दालंकार और अर्थालंकार। शब्दालंकार शब्द पर टिकते हैं; शब्द बदलते ही अलंकार टूटता है। अर्थालंकार अर्थ पर टिकते हैं; पर्याय से भी टिक सकते हैं। गुण नित्य धर्म हैं; अलंकार आहार्य शोभा हैं — मम्मट कहते हैं कहीं बिना अलंकार के भी काव्य हो सकता है। निर्धारित विस्तार अनुप्रास से अतिशयोक्ति तक है। शब्द-पक्ष में अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति आते हैं। अर्थ-पक्ष में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति आते हैं। रीतिकाल के कवित्त-सवैया में शब्दालंकार घने हैं। भक्तिकाव्य में अनुप्रास गेयता बढ़ाता है; यमक-श्लेष केशव-बिहारी में अधिक हैं।

अनुप्रास व्यंजन-वर्ण की आवृत्ति है। छेकानुप्रास स्वल्प आवृत्ति है, वृत्यनुप्रास बार-बार की आवृत्ति है, लाटानुप्रास शब्द और अर्थ की आवृत्ति भिन्न तात्पर्य से है — जान-बूझकर रची आवृत्ति दोष नहीं। सूर की पंक्ति तरनि तनूजा तट तमाल में त-कार अनुप्रास है। भूषण का चाक चक चमू ओज के साथ अनुप्रास है। यमक में एक शब्द या शब्द-समूह दो बार आता है, अर्थ दोनों जगह भिन्न है। श्लेष में एक ही शब्द एक साथ दो अर्थ देता है — बिहारी का कनक-कनक ते सौ गुनी सोना और धतूरा दोनों अर्थ देता है; मेरी भव बाधा हरो में हरि-हरित श्लेष है। वक्रोक्ति दो प्रकार की है — काकु वक्रोक्ति स्वर के घुमाव से अर्थ बदलती है, श्लेष वक्रोक्ति श्लेष द्वारा उत्तर देती है।

उपमा में उपमेय की उपमान से तुलना होती है। चार अंग हैं — उपमेय, उपमान, साधारण धर्म और वाचक शब्द सा, जैसे, सम, सरिस, समान। पूर्णोपमा में चारों अंग रहते हैं; लुप्तोपमा में कोई अंग छिपता है। तुलसी का पीपर पात सरिस मन डोला उपमा है — मन उपमेय, पीपर-पात उपमान, डोलना धर्म, सरिस वाचक। रूपक में उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप होता है; सा नहीं रहता। चरण-कमल रूपक है; चरण ही कमल माने गए, तुलना नहीं, तादात्म्य है। उपमा भेद कहती है, रूपक अभेद। मोह-फांस भी रूपक है — मोह को फंदे का अभेद आरोप।

उत्प्रेक्षा में उपमेय को उपमान होने की संभावना की जाती है। वाचक मनु, मानो, जानो, इव, निश्चय हैं। कवि कहता है — यह वस्तु मानो वह हो गई। अतिशयोक्ति लोक-सीमा का अतिक्रमण है। छोटी वस्तु को विराट या असंभव व्यापार से कहना अतिशयोक्ति है। भूषण के वीर-वर्णन — देखत ऊँचाई उघरत पाघ — और बिहारी का पत्रा होइ तिथि पाइयै इसी पर चलते हैं। पहचान का सूत्र यह है। व्यंजन दुहराना अनुप्रास। शब्द दुहराना अर्थ बदलना यमक। एक शब्द के युगपत् दो अर्थ श्लेष। स्वर या श्लेष से घुमाव वक्रोक्ति। तुलना उपमा। तादात्म्य रूपक। संभावना उत्प्रेक्षा। लोक-सीमा का बढ़ाव अतिशयोक्ति। प्रत्येक का एक लक्षण और एक उदाहरण साथ रहता है।

निष्कर्ष यह है कि आठ अलंकार दो वर्गों में बँटते हैं। शब्दालंकार अनुप्रास-यमक-श्लेष-वक्रोक्ति। अर्थालंकार उपमा-रूपक-उत्प्रेक्षा-अतिशयोक्ति। मध्यकालीन काव्य दोनों वर्गों का व्यवहार है — सूर-तुलसी गेयता में, बिहारी-भूषण चमत्कार और ओज में।

17. उपमा और रूपक में अंतर स्पष्ट कीजिए।8 अंक

उपमा साधर्म्य-मूलक अर्थालंकार है। उपमेय की उपमान से तुलना होती है। चार अंग हैं — उपमेय, उपमान, साधारण धर्म और वाचक शब्द सा, जैसे, सम, सरिस, समान। पीपर पात सरिस मन डोला में मन उपमेय है, पीपर-पात उपमान, डोलना धर्म, सरिस वाचक। पूर्णोपमा में चारों अंग रहते हैं। लुप्तोपमा में कोई अंग छिपता है। उपमा भेद बनाए रखती है — यह उसके समान है, वही नहीं हो गया। तुलसी की यह पंक्ति भक्ति-महाकाव्य में भी तुलना का शास्त्र पूरा करती है।

रूपक आरोप-मूलक अर्थालंकार है। उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप होता है। वाचक सा नहीं रहता। चरण-कमल में चरण ही कमल हैं; तुलना नहीं, तादात्म्य है। मोह-फांस भी रूपक है — मोह को फंदे का अभेद आरोप। अंतर तीन बिंदुओं पर है। उपमा में भेद, रूपक में अभेद। उपमा में वाचक शब्द, रूपक में आरोप। उपमा तुलना कहती है, रूपक एकत्व। दोनों अर्थालंकार हैं, शब्दालंकार नहीं। अनुप्रास व्यंजन दुहराता है; उपमा-रूपक अर्थ सजाते हैं। गुण माधुर्य चित्त-द्रव है, उपमा अलंकार है — दोनों एक नहीं।

निष्कर्ष यह है कि उपमा साधर्म्य है, रूपक तादात्म्य। चार अंग और वाचक उपमा की पहचान हैं; अभेद-आरोप रूपक की। भेद-अभेद का यह अंतर परीक्षा का सूत्र है।

18. नायक-भेद का परिचय दीजिए।8 अंक

काव्यशास्त्र नायक के चार स्वभाव-भेद करता है। ये भेद नाट्यशास्त्र और साहित्यदर्पण से हिन्दी में आए। धीरोदात्त गंभीर, क्षमाशील, उत्तम कुल का है — राम आदर्श हैं। धीरोद्धत गर्वी, प्रचंड और अहंकारी है — रावण तथा भीम के कुछ चित्र इस ओर जाते हैं। धीरललित कला, विलास और माधुर्य में रमण करता है — कृष्ण का लीला-रूप यहाँ बैठता है। धीरप्रशांत शांत, क्षमा-प्रधान और वैराग्य-सम्पन्न है — जनक या बुद्ध के चित्र इसके उदाहरण हैं। स्वभाव-भेद चरित्र की भूमि है। बिना चार नाम के नायक केवल नायक रह जाता है।

शृंगार की दृष्टि से नायक अनुकूल, दक्षिण, शठ और धृष्ट भी कहे जाते हैं। अनुकूल एकनिष्ठ है। दक्षिण अनेक में मधुर है। शठ छल से अन्य-रति रखता है। धृष्ट लज्जाहीन है। राम धीरोदात्त-अनुकूल हैं। रीतिकाल का नायक प्रायः धीरललित-दक्षिण है। भूषण का शिवाजी धीरोदात्त-वीर है, शृंगारी नायक नहीं। बिहारी के दोहे दक्षिण-नायक और नायिका-व्यापार दिखाते हैं। नायिका आलंबन है; नायक के भेद उसी शृंगार को पूरा करते हैं। धीर चार स्वभाव हैं, अनुकूल चार व्यवहार।

निष्कर्ष यह है कि नायक-भेद स्वभाव और व्यवहार दो स्तरों पर लिखा जाता है। चार धीर स्वभाव हैं; अनुकूल-दक्षिण-शठ-धृष्ट व्यवहार हैं। राम और रीति-नायक इसी तालिका में बैठते हैं।

19. नायिका-भेद पर प्रकाश डालिए।20 अंक

नायिका काव्य की वह नारी-पात्र है जिसके आलंबन से शृंगार रस निष्पन्न होता है। मूल तीन वर्ग हैं — स्वकीया, परकीया, सामान्या। स्वकीया पत्नी है। परकीया दूसरे की स्त्री है। सामान्या गणिका है; रीति-ग्रंथ उसे भी लक्षण में रखते हैं। केशवदास की रसिकप्रिया हिन्दी में नायिका-भेद का बड़ा लक्षण-ग्रंथ है। बिहारी के दोहे इन्हीं भेदों के उदाहरण देते हैं; कवि आचार्य नहीं, दोहा स्वयं प्रमाण है। कृष्ण-भक्ति में राधा-भाव परकीया को भक्ति का माधुर्य बनाता है, रीति का व्यभिचार नहीं। नाट्यशास्त्र और साहित्यदर्पण से ये भेद हिन्दी रीति में उतरे। बिना जाति-नाम के नायिका केवल शृंगार की नारी रह जाती है।

स्वकीया की तीन अवस्थाएँ हैं। मुग्धा नवोढ़ा है, लज्जा-प्रधान, हाव कम; बिहारी का अजौं तर्यौना ही रह्यौ किशोर-मुग्धा का संकेत है। मध्या युवा है, मिलन-वियोग दोनों सँभालती है। प्रगल्भा प्रौढ़ है, अभिव्यक्ति साहसपूर्ण है। ये अवस्थाएँ आयु और अनुभव से बँधी हैं। रीति-ग्रंथ प्रत्येक पर लक्षण और उदाहरण देते हैं। भक्तिकाव्य मुग्धा-वात्सल्य यशोदा और प्रगल्भा-राधा दोनों चित्र देता है; लक्ष्य वहाँ भक्ति है, नायिका-अभ्यास नहीं। नायक-भेद साथ याद रहे — धीरोदात्त राम, धीरललित कृष्ण; रीति का नायक प्रायः धीरललित-दक्षिण है।

मिलन-वियोग की अवस्था से आठ नायिकाएँ कही गई हैं। वासकसज्जा शृंगार-सज्जा कर पति की प्रतीक्षा करती है। विरहोत्कंठिता विरह में व्याकुल है। स्वाधीनपतिका का पति उसके अधीन-सा रहता है। कलहांतरिता मान-कलह के बाद पश्चात्ताप में है। खंडिता नायक के अन्य-रति के चिह्न देखकर कुपिता है। विप्रलब्धा संकेत-स्थल पर आकर नायक को न पाकर खिन्न है। प्रोषितपतिका का पति परदेश गया है। अभिसारिका स्वयं नायक के पास जाती है — कृष्ण-भक्ति के पदों में अभिसार प्रसिद्ध है, रीति उसे लक्षण बनाती है।

आठों नाम एक-एक व्यापार से बँधे हैं — सज्जा, उत्कंठा, स्वामित्व, कलह, खंडन, विप्रलंभ, प्रोषिता, अभिसार। बिहारी खंडिता, वासकसज्जा और नैन-संवाद के दोहे लिखते हैं — कहत, नटत, रीझत, खिझत दृष्टि का व्यापार है। दृग उरझत टूटत कुटुम प्रीति और कुल का द्वंद्व है। सूर के पदों में अभिसार और विरह भक्ति बनकर आते हैं; बिहारी में वे रीति-शास्त्र के भीतर शृंगार हैं। केशव अध्याय बाँधते हैं, इसलिए रीतिबद्ध हैं; बिहारी दोहा सिद्ध करते हैं, इसलिए रीतिसिद्ध हैं। अष्ट नायिका के आठ नाम और एक-एक लक्षण बिना लिखे उत्तर अधूरा रह जाता है। नायिका आलंबन है; उद्दीपन ऋतु, कुंज, सज्जा और संकेत हैं।

निष्कर्ष यह है कि नायिका-भेद तीन स्तरों पर पूरा होता है — जाति स्वकीया-परकीया-सामान्या, अवस्था मुग्धा-मध्या-प्रगल्भा, और अष्ट नायिका। हिन्दी प्रमाण केशव की रसिकप्रिया और बिहारी के दोहे हैं; भक्ति-पद इन्हीं अवस्थाओं को प्रेम का रूप देते हैं, लक्षण-ग्रंथ का अभ्यास नहीं।

20. शब्दशक्ति के भेद सोदाहरण लिखिए।8 अंक

शब्दशक्ति शब्द की वह क्षमता है जिससे अर्थ ग्रहण होता है। तीन शक्तियाँ हैं — अभिधा, लक्षणा, व्यंजना। अभिधा मुख्यार्थ या वाच्यार्थ देती है। संकेतग्रह से जो अर्थ सबसे पहले बैठता है, वही अभिधा है। गौः कहने पर पशु गाय अभिधा है। अभिधा के तीन प्रकार हैं — रूढ़, यौगिक और योगरूढ़; पंकज योगरूढ़ का उदाहरण है। बिना वाच्य के लक्ष्य और व्यंग्य टिकते नहीं। काव्य-गुण नित्य शोभाकारक धर्म हैं — माधुर्य चित्त को द्रवित करता है, ओज दीप्त करता है, प्रसाद अर्थ को शीघ्र व्यापता है।

लक्षणा तब चलती है जब मुख्यार्थ बाधित हो और रूढ़ि या प्रयोजन लक्ष्यार्थ तक ले जाए। गङ्गायां घोषः में बस्ती जल पर नहीं; तात्पर्य तट है। मुकुट चला में राजा चलता है। व्यंजना तीसरी शक्ति है। वाच्य और लक्ष्य के बाद जो अर्थ सहृदय को अतिरिक्त मिलता है, वह व्यंग्य है। सायंकाल कमल संकुचित — अभिधा फूल का बंद होना; व्यंग्य दिन का बीतना। आनंदवर्धन व्यंग्य-प्रधान काव्य को ध्वनि कहते हैं। काव्य-दोष अपकर्षक धर्म हैं — श्रुतिकटु, अप्रतीत, संदिग्ध, स्थायी का शिथिलन।

निष्कर्ष यह है कि अभिधा वाच्य है, लक्षणा लक्ष्य है, व्यंजना व्यंग्य है। गुण शोभा बढ़ाते हैं, दोष घटाते हैं, शब्दशक्ति अर्थ का मार्ग खोलती है।

21. रीतिकाल के नामकरण की समस्या स्पष्ट कीजिए।20 अंक

हिन्दी साहित्येतिहास में भक्तिकाल के बाद का युग एक संज्ञा से नहीं बँधा। आचार्य रामचंद्र शुक्ल इसे रीतिकाल कहते हैं। आधार यह है कि कवि रीति अर्थात् काव्य-लक्षण के ग्रंथ लिखते हैं और उन्हीं लक्षणों के अनुसार शृंगार-काव्य रचते हैं। सीमा लगभग संवत् 1700 से 1900 अर्थात् ईसवी 1643–1843 के आसपास मानी जाती है। आरंभ चिन्तामणि त्रिपाठी के कविकुलकल्पतरु के आसपास रखा जाता है। केशवदास को कोई भक्तिकाल के अंत में रखते हैं, कोई रीति के प्रवर्तक — रसिकप्रिया, कविप्रिया, रामचंद्रिका उन्हीं के द्वार हैं। शुक्ल की संज्ञा विधि पर टिकी है — लक्षण-ग्रंथ प्रधान विधा है। वामन का सूत्र रीतिरात्मा काव्यस्य हिन्दी में नायिका-भेद और अलंकार-शिक्षा तक संकीर्ण हो जाता है।

विश्वनाथ प्रसाद मिश्र इस युग को शृंगारकाल कहना चाहते हैं। उनका आधार विषय है। प्रधान रस शृंगार है; नायिका-भेद, संयोग-विप्रलंभ और दरबारी विलास काव्य का केंद्र हैं। रीति साधन है, युग का नाम नहीं — यह मिश्र का तर्क है। मिश्रबंधु आदि अलंकृतकाल जैसी संज्ञा देते हैं। कुछ आचार्य कलाकाल कहते हैं। ये नाम अलंकार, कवित्त-सवैया और भाषा-सजावट पर बल देते हैं। राजनीतिक पृष्ठभूमि मुगल उत्तरार्ध और आमेर-बूंदी-पन्ना जैसे क्षेत्रीय दरबार हैं। आश्रय शृंगार, वीर-प्रशस्ति और लक्षण-ग्रंथ माँगता है। भक्ति की तीव्र सार्वजनिक लहर ढीली पड़ती है; काव्य का केंद्र दरबार हो जाता है।

विवाद विधि और विषय का है। शुक्ल देखते हैं — केशव की रसिकप्रिया-कविप्रिया, चिन्तामणि का कविकुलकल्पतरु, मतिराम का रसराज, देव के भावविलास, पद्माकर के जगद्विनोद-पद्माभरण, भिखारीदास का काव्यनिर्णय। मिश्र देखते हैं — बिहारी सतसई का शृंगार, रीतिबद्ध कवित्त का नायिका-चित्र। दोनों प्रमाण सत्य के अंश हैं। एक संज्ञा पूरे युग को नहीं घेरती। भाषा परिष्कृत ब्रज है। मुक्तक प्रधान विधा है। काव्यशास्त्र के रस, अलंकार और नायिका-भेद अब ग्रंथ के अध्याय बनते हैं।

सीमाएँ स्पष्ट हैं। केवल रीतिकाल कहने से घनानंद का स्वच्छंद प्रेम दब सकता है; वह रीतिमुक्त है, सूत्र अति सुधो सनेह को मारग है। केवल शृंगारकाल कहने से भूषण हाशिए पर चले जाते हैं; वे वीर रस और शिवाजी-छत्रसाल की प्रशस्ति के कवि हैं, शिवराजभूषण लक्षण और वीर दोनों हैं। गिरिधर कविराय की कुंडलिया नीति-पक्ष है, शृंगार नहीं। युग की प्रचलित संज्ञा रीतिकाल है और विभाजन तीन धाराओं में है — रीतिबद्ध आचार्य-कवि, रीतिसिद्ध बिहारी, रीतिमुक्त घनानंद। यही विभाजन नामकरण की एकांगिता का समाधान है।

निष्कर्ष यह है कि शुक्ल रीतिकाल कहते हैं, मिश्र शृंगारकाल, अन्य अलंकृत या कलाकाल। विधि लक्षण है, विषय शृंगार है, अपवाद वीर और स्वच्छंद प्रेम हैं। पूर्ण परिचय संज्ञा और तीन धाराएँ दोनों से होता है।

22. रीतिकाल की पृष्ठभूमि लिखिए।8 अंक

रीतिकाल की राजनीतिक पृष्ठभूमि मुगल साम्राज्य का उत्तरार्ध और क्षेत्रीय राजदरबार हैं — आमेर, बूंदी, पन्ना, दतिया तथा औरंगजेब-काल के बाद की रियासतें। कवि आश्रय चाहते हैं। आश्रय शृंगार, वीर-प्रशस्ति और लक्षण-ग्रंथ माँगता है। सामाजिक पृष्ठभूमि दरबारी विलास और नायिका-चित्रण है। भक्ति की तीव्र सार्वजनिक लहर ढीली पड़ती है; मंदिर और पंथ चलते रहते हैं, काव्य का केंद्र दरबार हो जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल सीमा संवत् 1700 से 1900 अर्थात् ईसवी 1643–1843 के आसपास रखते हैं। आरंभ चिन्तामणि के कविकुलकल्पतरु के आसपास कहा जाता है।

साहित्यिक पृष्ठभूमि काव्यशास्त्र है — रस, अलंकार, नायक-नायिका भेद अब ग्रंथ के अध्याय बनते हैं। वामन का सूत्र रीतिरात्मा काव्यस्य हिन्दी में लक्षण-शिक्षा तक संकीर्ण हो जाता है। भाषा परिष्कृत ब्रज है। मुक्तक प्रधान विधा है — दोहा, कवित्त, सवैया। सांस्कृतिक संपर्क फारसी शृंगार और संस्कृत साहित्यदर्पण दोनों से है। विश्वनाथ प्रसाद मिश्र युग को शृंगारकाल कहना चाहते हैं; विधि रीति है, विषय शृंगार। तीन धाराएँ — रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त — इसी पृष्ठभूमि की उपज हैं। भूषण वीर का अपवाद इसी दरबार में खड़ा होता है।

निष्कर्ष यह है कि रीतिकाल आश्रय, परिष्कृत ब्रज, लक्षण-ग्रंथ और शृंगार की भूमि पर खड़ा है। राजनीतिक दरबार और काव्यशास्त्र की अध्याय-पद्धति दोनों पृष्ठभूमि के अंग हैं।

23. रीतिबद्ध काव्यधारा का विवेचन कीजिए।20 अंक

रीतिबद्ध वह धारा है जिसमें कवि आचार्य भी है। वह काव्य के लक्षण रचता है और उन्हीं लक्षणों के उदाहरण के रूप में काव्य रचता है। क्रम प्रायः लक्षण फिर उदाहरण है। रीति का अर्थ विशिष्ट पद-रचना है; वामन कहते हैं — रीतिरात्मा काव्यस्य। हिन्दी में यह अर्थ नायिका-भेद, रस, अलंकार और छंद के लक्षण-ग्रंथ तक संकीर्ण हो जाता है। धारा का युग रीतिकाल है। भाषा परिष्कृत ब्रज है। छंद कवित्त, सवैया, दोहा हैं। मुक्तक प्रधान विधा है; महाकाव्य दुर्लभ हैं। आश्रयदाता के बिना यह धारा नहीं चलती। रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त इसी युग के दूसरे मार्ग हैं, तीन युग नहीं।

केशवदास रीति के प्रवर्तक माने जाते हैं। रसिकप्रिया नायिका-भेद का ग्रंथ है। कविप्रिया अलंकार और काव्य-शिक्षा का है। रामचंद्रिका कथा-काव्य है, कठिन काव्य के लिए प्रसिद्ध; शुक्ल ने केशव पर कठोर टिप्पणी की है, पर रीति का द्वार उन्हीं से खुलता है। चिन्तामणि त्रिपाठी कविकुलकल्पतरु और काव्यविवेक लिखते हैं; शुक्ल के रीतिकाल-आरंभ से जुड़े हैं। मतिराम रसराज और ललितललाम लिखते हैं — रस-निरूपण का प्रतिनिधि। देव भावविलास, अष्टयाम और काव्य-रचना दोनों करते हैं; किसी इन्हें भाव-पक्ष से रीतिसिद्ध कहते हैं, प्रचलित वर्गीकरण आचार्य-कवि का है। पद्माकर जगद्विनोद और पद्माभरण से उत्तर रीति के प्रतिनिधि हैं। भिखारीदास काव्यनिर्णय लिखते हैं।

भूषण इसी धारा के वीर-पक्ष हैं। शिवराजभूषण लक्षण और प्रशस्ति दोनों हैं। शिवाबावनी शिवाजी-विषयक वीर-कवित्त है। रस वीर है, स्थायी उत्साह है; आलंबन शिवाजी और छत्रसाल हैं। रीतिकाल शृंगार-प्रधान कहा जाता है; भूषण उस सूत्र के अपवाद हैं, चौथी धारा नहीं। बिहारी सतसई लिखते हैं, लक्षण-ग्रंथ नहीं — इसलिए रीतिसिद्ध हैं, रीतिबद्ध के केंद्र नहीं। घनानंद नायिका-अध्याय नहीं गाते — इसलिए रीतिमुक्त हैं। गिरिधर कुंडलिया-नीति के कवि हैं; तीन धाराओं के किनारे हैं।

प्रवृत्तियाँ ये हैं — परिष्कृत ब्रज, जान-बूझकर अलंकार, नायिका-भेद के अध्याय, आश्रय-प्रथा, शृंगार प्रधान रस। गुण यह है कि हिन्दी में काव्यशास्त्र लोकभाषा में उतरता है। सीमा यह है कि अनुभव कभी लक्षण के नीचे दब जाता है। केशव की रामचंद्रिका मानस जैसा लोक-ग्रंथ नहीं, कठिन कथा-काव्य है। दरबारी संकीर्णता और नारी-चित्र का भोग-पक्ष युग की सीमाएँ हैं। शुक्ल रीतिकाल को भक्तिकाल से निम्न मानते हैं; बाद के आचार्य कला-मूल्य अलग से देखते हैं। धारा का काम लक्षण लिखकर उदाहरण देना है। चिन्तामणि आरंभ हैं, पद्माकर उत्तर रीति हैं, केशव द्वार हैं, भूषण वीर-पक्ष हैं।

निष्कर्ष यह है कि रीतिबद्ध आचार्य-कवियों की धारा है। पहचान लक्षण-ग्रंथ है। प्रमुख नाम केशव, चिन्तामणि, मतिराम, देव, पद्माकर, भिखारीदास और वीर-पक्ष में भूषण हैं। भाषा ब्रज है, रस शृंगार प्रधान है, अपवाद वीर है।

24. रीतिसिद्ध काव्य किसे कहते हैं?8 अंक

रीतिसिद्ध वह धारा है जिसमें रीति कवि के अलग लक्षण-ग्रंथ में नहीं, काव्य के व्यवहार में सिद्ध है। कवि आचार्य नहीं बनता। अध्याय-क्रम से नायिका-भेद नहीं लिखता। फिर भी दोहा रस, अलंकार और नायिका स्वयं सिद्ध कर देते हैं। केंद्र बिहारीलाल हैं। ग्रंथ-रूप सतसई जैसा मुक्तक-कोष है, रसिकप्रिया जैसा लक्षण-ग्रंथ नहीं। भाषा परिष्कृत ब्रज है। शैली समास और चमत्कार की है। छंद दोहा है — प्रत्येक पक्ष 13+11 मात्रा। आश्रय आमेर-जयसिंह से जोड़ा जाता है। नायिका, ऋतु, मान और नेत्र दोहे में सिमटते हैं।

रीतिबद्ध से अंतर रूप का है — वहाँ लक्षण फिर उदाहरण, यहाँ केवल मुक्तक। केशव और चिन्तामणि आचार्य-कवि हैं, इसलिए रीतिबद्ध हैं। रीतिमुक्त से अंतर स्वर का है — रीतिसिद्ध नायिका-शास्त्र के भीतर शृंगार गाती है, रीतिमुक्त उस शास्त्र से निकलकर प्रेम की पीर गाती है। घनानंद सूधा स्नेह कहते हैं; बिहारी बाँक दोहा रखते हैं। निर्विवाद नाम बिहारी है।

निष्कर्ष यह है कि रीतिसिद्ध का अर्थ सिद्ध रीति है। प्रतिनिधि बिहारी हैं, पहचान मुक्तक दोहा है, ग्रंथ सतसई है। लक्षण-ग्रंथ का अभाव और व्यवहार में रीति — यही परिभाषा है।

25. रीतिमुक्त काव्यधारा पर प्रकाश डालिए।20 अंक

रीतिमुक्त वह धारा है जो काव्य-लक्षण के बंधन से मुक्त प्रेम-काव्य रचती है। इसे स्वच्छंदतावादी धारा भी कहा जाता है। रीतिबद्ध लक्षण लिखता है और उदाहरण देता है। रीतिसिद्ध लक्षण बिना लिखे नायिका-शास्त्र सिद्ध करता है। रीतिमुक्त नायिका-भेद के अध्याय को बाधा मानता है। विषय प्रेम की अनुभूति है, विशेषतः वियोग और पीर। युग रीतिकाल ही है; यह भक्तिकाल की सगुण धारा नहीं। भाषा ब्रज है। छंद कवित्त-सवैया हैं, पर चाल स्वच्छंद है। मुक्तक रूप प्रधान है। दरबार से सर्वथा कटी नहीं; अंतर स्वर का है।

प्रधान कवि घनानंद हैं। आलंबन सुजान है। स्वर लौकिक और भक्ति दोनों छवियों में पढ़ा जाता है; आराध्य कृष्ण-लीला का पुष्टि-पद नहीं। प्रसिद्ध सूत्र है — अति सुधो सनेह को मारग है, जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं। प्रेम का मार्ग सीधा है; सयानापन रीति का टेढ़ापन है। रूपनिधान सुजान सखी जब ते इन नैननि नेकु निहारे — देखने मात्र से बंधन। तब तौ छवि पीवत जीवत है, अब सोचन लोचन जात जरे — पहले दर्शन, अब दाह। भए अति निठुर, मिटाय पहिचानि डारी — पहिचान टूटी। कारी कूर कोकिला — उद्दीपन शत्रु बना। रावरे रूप की रीति अनूप — रूप नित नया। साथ के कवि बोधा, आलम और ठाकुर हैं।

घनानंद इस धारा के शिखर हैं। बिहारी शृंगार को दोहे में बाँधते हैं; घनानंद शृंगार को पीर बनाते हैं। केशव रसिकप्रिया में अध्याय बाँधते हैं; घनानंद अध्याय नहीं बाँधते। सूर का माधुर्य कृष्ण-भक्ति है — गोपी-ऊधो, माखन-चोर, पुष्टिमार्ग। घनानंद की पीर रीतिकाल के भीतर स्वच्छंद प्रेम है। दोनों ब्रज गाते हैं; आराध्य और रीति-बंधन अलग हैं। भूषण ओज और भुजा देखते हैं; घनानंद नेत्र और वेदना देखते हैं। संपादन विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के घनानंद कवित्त से जुड़ा है; सुजानहित के पद इसी स्वर के द्वार हैं।

प्रवृत्तियाँ ये हैं — विप्रलंभ प्रधान रस, नायिका-लक्षण का अभाव, अनुभव की प्रधानता, मुहावरेदार ब्रज, मुक्तक रूप। गुण यह है कि रीतिकाल केवल दरबारी अभ्यास नहीं रह जाता। सीमा यह है कि कवि-संख्या छोटी है और आश्रय से संबंध पूरी तरह टूटा नहीं। शुक्ल रीतिमुक्त को मुख्य धारा नहीं बनाते; बाद के आचार्य स्वच्छंदता का मूल्य अलग से देखते हैं। तीन धाराएँ तीन युग नहीं, एक युग के तीन मार्ग हैं। रीतिमुक्त उनमें प्रेम का मार्ग है। बोधा, आलम, ठाकुर साथ गाते हैं; सूत्र और शिखर घनानंद के हैं।

निष्कर्ष यह है कि रीतिमुक्त रीतिकाल की स्वच्छंद प्रेम-धारा है। पहचान घनानंद, बोधा, आलम, ठाकुर हैं। सूत्र सूधा स्नेह है, नायिका-भेद नहीं। रस विप्रलंभ है, भाषा ब्रज है, छंद कवित्त है।

26. रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।20 अंक

तीन धाराएँ तीन युग नहीं, एक रीतिकाल के तीन मार्ग हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल इन्हें भक्तिकाल के बाद के कालखंड में रखते हैं — प्रायः संवत् 1700–1900। साम्य चार बिंदुओं पर है। प्रथम, युग एक है। द्वितीय, प्रधान भाषा ब्रज है। तृतीय, काव्य-रूप मुख्यतः मुक्तक है — दोहा, कवित्त, सवैया। चतुर्थ, पीछे काव्यशास्त्र है — रस और अलंकार से कोई धारा खाली नहीं। तीनों धाराएँ दरबार और ब्रज-संस्कृति में स्थित हैं। शुक्ल इन्हें एक कालखंड में रखते हैं, तीन काल में नहीं। नामकरण चाहे रीतिकाल हो या मिश्र का शृंगारकाल, विभाजन इन्हीं तीन मार्गों से पूरा होता है।

रीतिबद्ध कवि-आचार्य की धारा है। पहचान लक्षण-ग्रंथ है। क्रम प्रायः लक्षण फिर उदाहरण है। केशवदास रसिकप्रिया, कविप्रिया और रामचंद्रिका लिखते हैं — नायिका, अलंकार, कठिन कथा। चिन्तामणि कविकुलकल्पतरु से जुड़े हैं; शुक्ल रीतिकाल का आरंभ इन्हीं के आसपास रखते हैं। मतिराम रसराज और ललितललाम लिखते हैं। देव भावविलास से आचार्य-कवि हैं; पद्माकर जगद्विनोद से उत्तर रीति के; भिखारीदास काव्यनिर्णय से। रस शृंगार प्रधान है। भूषण इसी धारा के वीर-पक्ष हैं — शिवराजभूषण लक्षण और शिवाजी-प्रशस्ति दोनों। वे शृंगार-सूत्र के अपवाद हैं, चौथी धारा नहीं। भाषा परिष्कृत ब्रज है। आश्रय-प्रथा प्रधान है।

रीतिसिद्ध में रीति काव्य के व्यवहार में सिद्ध है, अध्याय-क्रम में नहीं। केंद्र बिहारीलाल हैं। ग्रंथ सतसई है — सात सौ दोहों का शृंगार-कोष। छंद दोहा है — 13+11, दो पक्ष। कवि आचार्य नहीं बनता; नायिका, ऋतु, मान, नेत्र और अभिसार दोहे में स्वयं सिद्ध होते हैं। शैली समास, श्लेष और चमत्कार की है। आश्रय आमेर-जयसिंह से जोड़ा जाता है। रीतिबद्ध से अंतर ग्रंथ-रूप का है — वहाँ लक्षण-ग्रंथ, यहाँ मुक्तक। रीतिमुक्त से अंतर स्वर का है — बिहारी नायिका-शास्त्र के भीतर शृंगार गाते हैं, घनानंद उस शास्त्र से निकलते हैं। सेनापति या देव को कोई इस कोटि में रखता है; निर्विवाद नाम बिहारी है।

रीतिमुक्त लक्षण को बाधा मानती है और प्रेम की अनुभूति गाती है। केंद्र घनानंद हैं; साथ बोधा, आलम, ठाकुर। रस वियोग-वेदना है। सूत्र अति सुधो सनेह को मारग है — मार्ग सीधा, सयानप बाँक नहीं। सूर की भक्ति से यह धारा इसलिए अलग है कि यह रीतिकाल का स्वच्छंद प्रेम है, पुष्टिमार्ग की लीला नहीं। वैषम्य कवि-धर्म पर बैठता है — लक्षण लिखना, लक्षण सिद्ध करना, लक्षण से मुक्त प्रेम गाना। रस में रीतिबद्ध-रीतिसिद्ध शृंगार-नायिका पर टिकते हैं; रीतिमुक्त विप्रलंभ पर। गिरिधर कविराय की कुंडलिया नीति-पक्ष है; तीन धाराओं का चौथा नाम नहीं।

निष्कर्ष यह है कि साम्य युग, ब्रज और मुक्तक पर है। वैषम्य कवि-धर्म पर है — लक्षण, सिद्ध रीति, मुक्त प्रेम। प्रतिनिधि क्रमशः केशव-चिन्तामणि, बिहारी और घनानंद हैं। भूषण रीतिबद्ध वीर के अपवाद हैं, गिरिधर नीति के किनारे।

27. रीति का अर्थ स्पष्ट करते हुए काव्यशास्त्र से उसका संबंध लिखिए।8 अंक

संस्कृत में रीति काव्य की पद-रचना की विशिष्ट शैली है। वामन रीति को काव्य की आत्मा कहते हैं — रीतिरात्मा काव्यस्य। गुण ओज, प्रसाद, माधुर्य रीति से बँधे हैं। वैदर्भी माधुर्य-प्रधान, गौड़ी ओज-प्रधान, पांचाली मध्यम कही गई। ये गुण की शैली हैं। हिन्दी रीतिकाल में रीति का अर्थ लक्षण-ग्रंथ हो जाता है — नायिका-भेद, रस-निरूपण, अलंकार और छंद के उदाहरण। केशव की रसिकप्रिया और कविप्रिया, चिन्तामणि का कविकुलकल्पतरु, मतिराम का रसराज, देव का भावविलास, पद्माकर का जगद्विनोद इसी अर्थ की रीति हैं। शुक्ल युग को इसी विधि से रीतिकाल कहते हैं।

काव्यशास्त्र सिद्धांत है — भरत का रस-सूत्र, उपमा-रूपक, शब्दशक्ति अभिधा-लक्षणा-व्यंजना, तीन गुण, शब्द-अर्थ-रस दोष, धीरोदात्त और अष्ट नायिका। रीतिकाल वे सिद्धांत कविता में उतारता है। रीतिबद्ध सिद्धांत लिखकर उदाहरण देता है। रीतिसिद्ध सिद्धांत लिखे बिना उदाहरण सिद्ध करता है। रीतिमुक्त सिद्धांत से आगे प्रेम का अनुभव रखता है। रीति शब्द तीनों धाराओं का केंद्र है; अंतर बंधन और मुक्ति का है। बिना शास्त्र के रीति केवल नाम रह जाती है; बिना रीति के शास्त्र केवल सूत्र।

निष्कर्ष यह है कि रीति वामन की शैली और हिन्दी के लक्षण-ग्रंथ दोनों हैं। काव्यशास्त्र उसका स्रोत है, तीन धाराएँ उसका व्यवहार। गुण-दोष-रस उसी संबंध के अंग हैं।

28. बिहारी को रीतिसिद्ध कवि क्यों माना जाता है?8 अंक

बिहारीलाल को रीतिसिद्ध इसलिए माना जाता है कि उन्होंने केशवदास और चिन्तामणि की तरह लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखा, फिर भी नायिका, ऋतु, मान और नेत्र दोहे के व्यवहार से रीति सिद्ध की। कवि आचार्य नहीं। अध्याय-क्रम नहीं। दोहा स्वयं प्रमाण है। भाषा परिष्कृत ब्रज है। शैली समास, श्लेष और चमत्कार की है। आश्रय जयसिंह आमेर से जोड़ा जाता है। रीति सिद्ध हो चुकी थी; बिहारी उसे दोहराते नहीं, काव्य में उतारते हैं। गागर में सागर का आशय यही है कि लघु छंद में पूर्ण दृश्य बैठता है।

केशव रसिकप्रिया में नायिका बाँधते हैं, इसलिए रीतिबद्ध हैं। चिन्तामणि कविकुलकल्पतरु लिखते हैं, इसलिए आचार्य-कवि हैं। घनानंद नायिका-शास्त्र से निकलकर सुजान-पीर गाते हैं, इसलिए रीतिमुक्त हैं। बिहारी दोनों के बीच हैं — शास्त्र के भीतर, ग्रंथ-लक्षण के बिना। कहत नटत रीझत खिझत दृष्टि का व्यापार दिखाता है, अध्याय नहीं लिखता। मेरी भव बाधा हरो श्लेष से नायिका और भक्ति एक दोहे में सिद्ध करता है। कारण दो हैं — रीति का दोहा-व्यवहार, और लक्षण-ग्रंथ का अभाव।

निष्कर्ष यह है कि बिहारी रीतिसिद्ध इसलिए हैं कि रीति उनके दोहे में सिद्ध है, अध्याय में नहीं। प्रतिनिधि मुक्तक-शृंगार यही है; आचार्य-कवि और स्वच्छंद प्रेमी दोनों से वे अलग हैं।

29. घनानंद की रीतिमुक्तता स्पष्ट कीजिए।8 अंक

घनानंद रीतिमुक्त इसलिए हैं कि उनका काव्य नायिका-भेद और अलंकार-अभ्यास का ग्रंथ नहीं, प्रेम की अनुभूति है। आलंबन सुजान है। वियोग और पीर प्रधान हैं। भाषा ब्रज है, शैली मुहावरेदार। छंद कवित्त-सवैया हैं, चाल स्वच्छंद है। सूत्र है — अति सुधो सनेह को मारग है, जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं। सयानप रीति का बंधन है; सूधा स्नेह उससे मुक्त मार्ग है। बोधा, आलम, ठाकुर इसी स्वर के साथ के कवि हैं; शिखर घनानंद हैं। संपादन विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के घनानंद कवित्त से जुड़ा है।

केशव लक्षण लिखते हैं, इसलिए रीतिबद्ध हैं। बिहारी दरबारी शृंगार और नायिका-शास्त्र के भीतर रहते हैं, इसलिए रीतिसिद्ध हैं। घनानंद उस शास्त्र से निकलते हैं। रूपनिधान सुजान नैन-बंधन है; तब तौ छवि पीवत जीवत है फिर लोचन-दाह है। कारी कूर कोकिला उद्दीपन को शत्रु बनाती है। रस विप्रलंभ है; स्थायी रति का वियोग-पक्ष। रीतिमुक्त का अर्थ लक्षण से शून्य काव्य नहीं, बंधन से मुक्त प्रेम-काव्य है। युग रीतिकाल है; यह सगुण लीला-पद नहीं। दरबार से सर्वथा कटे नहीं; अंतर स्वर का है।

निष्कर्ष यह है कि रीतिमुक्तता सीधा स्नेह, वियोग-वेदना और लक्षण-ग्रंथ का अभाव है। प्रतिनिधि घनानंद हैं। सूत्र सूधा स्नेह है, नायिका-अध्याय नहीं।

30. रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ लिखिए।8 अंक

रीतिकाल की प्रधान प्रवृत्ति शृंगार है — संयोग और विप्रलंभ दोनों। नायक-नायिका भेद काव्यांग बन जाता है। अलंकार सजाने की प्रवृत्ति है। भाषा परिष्कृत ब्रज है। छंद में दोहा, कवित्त, सवैया प्रधान हैं। मुक्तक प्रधान विधा है; महाकाव्य दुर्लभ हैं। केशव की रामचंद्रिका कथा-काव्य है, लोक-महाकाव्य नहीं। आश्रय-प्रथा कवि को दरबार से बाँधती है। तीन धाराएँ — रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त — एक युग के तीन मार्ग हैं, तीन युग नहीं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल सीमा संवत् 1700–1900 के आसपास रखते हैं। मिश्र युग को शृंगारकाल कहना चाहते हैं।

वीर रस भूषण तक उत्कर्ष पाता है — शिवाजी-छत्रसाल की प्रशस्ति, ओज गुण, अतिशयोक्ति। नीति और कुंडलिया गिरिधर की ओर हैं; वे तीन धाराओं का चौथा नाम नहीं। गुण ये हैं — भाषा-सजावट, छंद-अभ्यास, शास्त्र का लोकभाषा में अवतरण। सीमा ये हैं — दरबारी संकीर्णता, नारी-चित्र का भोग-पक्ष, अनुभव पर लक्षण का बोझ। शुक्ल रीतिकाल को भक्तिकाल से निम्न मानते हैं; कला-मूल्य बाद के आचार्य अलग देखते हैं। प्रवृत्ति विधि और विषय दोनों छूती है — लक्षण-ग्रंथ और शृंगार-रस।

निष्कर्ष यह है कि प्रवृत्तियाँ परिष्कृत ब्रज, शृंगार, मुक्तक, आश्रय और तीन धाराएँ हैं। भूषण वीर का अपवाद हैं, गिरिधर नीति के किनारे।

31. विनय पत्रिका का परिचय दीजिए।8 अंक

विनय पत्रिका गोस्वामी तुलसीदास की ब्रज प्रार्थना है। निर्धारित संपादन वियोगी हरि का है। पत्रिका का अर्थ निवेदन का पत्र है। भक्त दोष, मोह और दीनता राम के आगे रखता है। आराध्य रघुनाथ, माधव, केशव — सब राम-रूप हैं। दास्य भाव प्रधान है। पद गेय हैं, कथा-चौपाई नहीं। रस भक्ति और दैन्य हैं; करुण सहायक है। शैली स्वीकृति और अनुनय की है। कबीर खंडन करते हैं; तुलसी यहाँ झुकते हैं।

विषय मन की मूढ़ता, नाम-जप, मोह की फांस, अवसर का बीतना और संसार की पहिचान हैं। राम जपु राम जपु राम जपु बावरे — मन को बावरा कहकर जप का आदेश। ऐसी मूढ़ता या मन की — चित्त की जड़ता। माधव मोह फांस क्यों टूटे — मोह का फंदा, रूपक। मन पछितैहै अवसर बीते — काल का भय। मैं तोहि अब जान्यो संसार — विनय का ज्ञान। केशव कहि न जाइ का कहिये — महिमा कथन के बाहर। जौ निज मन परिहरै बिकारा — विकार-त्याग साधन है। अलंकार सहज हैं — पुनरुक्ति और अनुप्रास। नायक प्रार्थना का स्वामी है, कथा-नायक नहीं।

निष्कर्ष यह है कि विनय पत्रिका तुलसी की दास्य-प्रार्थना है। संपादक वियोगी हरि हैं, भाषा ब्रज है, आराध्य राम हैं। स्तोत्र निवेदन है, कथा नहीं।

32. राम जपु, राम जपु, राम जपु, बावरे की व्याख्या कीजिए।8 अंक

प्रसंग गोस्वामी तुलसीदास की विनय पत्रिका है। निर्धारित संपादन वियोगी हरि का है। भक्त अपने चित्त को बावरा कहकर संबोधित करता है। अन्वय यह है — हे बावरे मन, राम का नाम जप, बार-बार जप। तीन बार राम जपु नाम की महिमा दुहराता है। मन संसार के मोह में भटका है; एकमात्र उपाय राम-नाम है। बावरे फटकार नहीं, करुण चेतावनी है। पुनरुक्ति आदेश को दृढ़ करती है। छंद पद-गीत है। भाषा ब्रज है। रस भक्ति और दैन्य हैं। आलंबन राम हैं; उद्दीपन मन की मूढ़ता है।

भाव यह है कि बिना नाम के चित्त पागल है; जप साधन है, शास्त्र-वाद नहीं। दास्य भाव प्रधान है। आराध्य रघुनाथ, माधव, केशव — राम-रूप हैं। ऐसी मूढ़ता या मन की — चित्त की जड़ता का स्वीकार। मन पछितैहै अवसर बीते — काल बीतने का भय। माधव मोह फांस क्यों टूटे — मोह फंदा। केशव कहि न जाइ का कहिये — महिमा कथन के बाहर। शैली स्वीकृति की है, खंडन की नहीं। गुण प्रसाद है — अर्थ बिना कष्ट के बैठता है।

निष्कर्ष यह है कि इस पद का केंद्र नाम-जप, मन की बावराई और दास्य-प्रार्थना है। आवृत्ति ही आदेश है। पहली पंक्ति से पद पहचाना जाता है।

33. विनय पत्रिका की काव्यगत विशेषताएँ लिखिए। रामचरितमानस से अंतर स्पष्ट कीजिए।20 अंक

विनय पत्रिका गोस्वामी तुलसीदास की ब्रज स्तोत्र-प्रार्थना है। संपादक वियोगी हरि हैं। पत्रिका का अर्थ निवेदन का पत्र है। भक्त दोष, मोह और दीनता राम के आगे रखता है। आराध्य रघुनाथ, माधव, केशव — सब राम-रूप हैं। दास्य भाव प्रधान है। पद गेय हैं, चौपाई-कथा नहीं। शैली स्वीकृति और अनुनय की है। कबीर खंडन करते हैं; तुलसी यहाँ झुकते हैं। शुक्ल तुलसी को लोकनायक कहते हैं; पत्रिका उस लोकनायक का अंतःस्वर है, राज्याभिषेक का ग्रंथ नहीं। विषय मन की मूढ़ता, नाम-जप, मोह की फांस, अवसर का बीतना और संसार की पहिचान हैं।

भाषा ब्रज है। रस भक्ति और दैन्य प्रधान हैं; करुण सहायक है। शृंगार गौण है। अलंकार सहज हैं — मोह-फांस रूपक, राम-जप की पुनरुक्ति और अनुप्रास। नायक कथा का धीरोदात्त नहीं, प्रार्थना का स्वामी है। तुलसी अपने को दास कहते हैं। निर्धारित पहली पंक्तियाँ द्वार हैं। राम जपु, राम जपु, राम जपु, बावरे — मन को बावरा कहकर नाम-जप। ऐसी मूढ़ता या मन की — चित्त की जड़ता। अस कछु समुझि परत रघुराया — दीनता, लीला बुद्धि से नहीं बँधती। माधव! मोह फांस क्यों टूटे — मोह फंदा, भक्त स्वयं नहीं काट पाता। केशव, कहि न जाइ का कहिये — महिमा कथन के बाहर। जौ निज मन परिहरै बिकारा — विकार-त्याग साधन है। ऐसो को उदार जग माहीं — राम की करुणा अद्वितीय। कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो — दास्य-रहनि की अभिलाषा। मन पछितैहै अवसर बीते — काल बीतने का भय। मैं तोहि अब जान्यो संसार — संसार पहिचान; आसक्ति का ज्ञान नहीं, विनय का ज्ञान।

रामचरितमानस अवधी महाकाव्य है। सात कांड हैं — बाल से उत्तर तक। कथा वाल्मीकि और अध्यात्म रामायण की भूमि से आती है। चौपाई कथा चलाती है, दोहा अर्थ बाँधता है। उद्देश्य लोकहित और राम-राज्य है — कीरति भनिति भूति वही भली जो गंगा-सम हित करे। चरित्र मर्यादा के प्रतिनिधि हैं — राम, सीता, भरत, हनुमान; रावण अहंकार। शुक्ल इसे लोकनायक का काव्य कहते हैं। पत्रिका स्तोत्र है, कथा नहीं। भाषा ब्रज है, अवधी नहीं। स्वर व्यक्तिगत निवेदन है, राज्याभिषेक नहीं। साम्य आराध्य राम, दास्य, मर्यादा और भक्ति-रस हैं। एक कवि की दो विधाएँ हैं, एक ग्रंथ का टुकड़ा नहीं।

अंतर तीन स्थिर बिंदुओं पर है। विधा — महाकाव्य बनाम स्तोत्र। भाषा — अवधी बनाम ब्रज। स्वर — लोकसंग्रह बनाम व्यक्तिगत निवेदन। मानस वन, युद्ध और राम-राज्य चलाता है; पत्रिका मन झुकाती है। मानस घर और घाट पर रामलीला बनता है; पत्रिका भक्त के कंठ की प्रार्थना है। पत्रिका को मानस का सारांश कहना अधूरा है। एक ग्रंथ कथा और आचरण का काव्य है; दूसरा दास्य और नाम-जप का काव्य है। व्याख्या प्रसंग, अन्वय-भाव और काव्य-सौंदर्य माँगती है; पहली पंक्ति से पद पहचाना जाता है, पूरा ग्रंथ नहीं उतारा जाता।

निष्कर्ष यह है कि विनय पत्रिका की विशेषताएँ ब्रज-स्तोत्र, दास्य, नाम-जप, दैन्य-रस और वियोगी हरि-संपादन हैं। रामचरितमानस से अंतर महाकाव्य बनाम प्रार्थना, अवधी बनाम ब्रज, लोकसंग्रह बनाम निवेदन है। दोनों तुलसी हैं, रूप अलग हैं।

34. भ्रमरगीत सार का परिचय दीजिए।8 अंक

भ्रमरगीत सार सूरदास के पदों का चयन है। निर्धारित संपादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल हैं। सूर कृष्णभक्ति और पुष्टिमार्ग के शिखर हैं; अष्टछाप में वल्लभ-काल के सेवक माने जाते हैं। प्रसंग भागवत के उद्धव-आख्यान से आता है। कृष्ण मथुरा गए। ऊधो योग और निर्गुण-संदेश लेकर ब्रज आए। गोपियाँ सगुण प्रेम से उत्तर देती हैं। भ्रमर मधुकर दूत या संबोधन है। सार का अर्थ चयन है, पूरा सूर-सागर नहीं। विवाद तत्त्व का है — निराकार ब्रह्म बनाम साकार गोपाल।

भाषा ब्रज है। पद गेय हैं। रस वियोग और भक्ति हैं; वात्सल्य स्मृति में है — उर में माखन चोर अड़े। गोपियाँ निर्गुण का ठिकाना नहीं मानतीं — निर्गुण कौन देस को वासी। चित्त एक श्याम पर है — ऊधो मन नाहीं दस-बीस। आयो घोस बड़ो व्यापारी — ज्ञान को सौदा कहा गया। बिन गोपाल बैरिन भई कुंजैं — वियोग में कुंज शत्रु। रीति का नायिका-शास्त्र लक्ष्य नहीं; गोपी भक्त है। ऊधो ज्ञान लाते हैं, गोपियाँ प्रेम रखती हैं।

निष्कर्ष यह है कि भ्रमरगीत सार शुक्ल-संपादित सूर-चयन है। केंद्र ऊधो-गोपी संवाद और सगुण प्रेम है। निर्गुण-योग का उत्तर लीला-स्मृति से दिया गया है।

35. भ्रमरगीत के आधार पर गोपियों के प्रेम और निर्गुण-खंडन का विवेचन कीजिए।20 अंक

भ्रमरगीत सूरदास का वह काव्य है जिसमें गोपियाँ ऊधो के निर्गुण-योग का उत्तर सगुण प्रेम से देती हैं। संपादन आचार्य रामचंद्र शुक्ल का भ्रमरगीत सार निर्धारित है। मूल प्रसंग भागवत के उद्धव-आख्यान से आता है। कृष्ण मथुरा चले गए। ऊधो योग और निर्गुण-संदेश लेकर ब्रज आते हैं। गोपियाँ साकार श्याम, माखन-चोर और कुंज-नायक मानती हैं। भ्रमर मधुकर दूत या संबोधन बनता है। सार चयन है, पूरा सूर-सागर नहीं। सूर अष्टछाप के शिखर और पुष्टिमार्ग से जुड़े हैं। शुद्धाद्वैत लीला को सत्य प्रकाश मानता है; यही दार्शनिक पृष्ठ संत-निर्गुण से अलग करती है। विवाद तत्त्व का है — निराकार ब्रह्म बनाम साकार गोपाल।

प्रेम एकनिष्ठ है। ऊधो मन नाहीं दस-बीस — योग चित्त को बाँटता है, गोपी-मन दस-बीस नहीं; एक श्याम पर्याप्त है। ऊधो अँखियाँ अति अनुरागी — नेत्र तर्क से नहीं, राग से देखते हैं। हमारे हरि हारिल की लकरी — कृष्ण हारिल-पक्षी की लकड़ी हैं, आसक्ति छूटती नहीं। उर में माखन चोर अड़े — बाल-लीला हृदय का आलंबन है; वात्सल्य वियोग के भीतर स्मृति बनकर रह जाता है। मधुकर श्याम हमारे चोर — भ्रमर को संबोधित कर श्याम को मन हर लेने वाला कहा गया। रीति का नायिका-शास्त्र लक्ष्य नहीं; गोपी भक्त है, अभिसारिका-अभ्यास नहीं। भाषा ब्रज है। पद गेय हैं। रस विप्रलंभ-भक्ति है।

निर्गुण-खंडन सीधा और व्यंग्य-भरा है। निर्गुण कौन देस को वासी — निराकार का गाँव गोपियाँ नहीं जानतीं; उनका हरि ब्रज, वेणु, यमुना और गोपी-नेत्र में है। आयो घोस बड़ो व्यापारी — ऊधो को घोस-व्यापारी कहकर ज्ञान को सौदा माना गया। ऊधो भली करी ब्रज आए — स्वागत में व्यंग्य और आग्रह दोनों हैं। सगुण का हरि योग के दस-बीस मन से बड़ा है। सूर पुष्टि-सेवक हैं; अनुभव शास्त्र-वाद से बड़ा नहीं, साकार लीला से बड़ा है। तुलसी राम-नाम से मन झुकाते हैं; सूर गोपी-प्रेम से निर्गुण काठते हैं। दोनों सगुण हैं; आराध्य और स्वर अलग हैं।

वियोग का दृश्य कुंज और यमुना पर बैठता है। बिन गोपाल बैरिन भई कुंजैं — वियोग में कुंज शत्रु हो गई। लखियत कालिन्दी अति कारी — यमुना भी श्याम के बिना काली-शून्य दीखती है। आलंबन गोपाल हैं; उद्दीपन कुंज, कालिन्दी, भ्रमर और ऊधो का आगमन हैं। दस पद एक संवाद हैं — ऊधो ज्ञान लाते हैं, गोपियाँ प्रेम रखती हैं। व्याख्या प्रसंग, अन्वय-भाव और काव्य-सौंदर्य माँगती है; पहली पंक्ति से पद पहचाना जाता है। पूरा भागवत नहीं उतारा जाता।

निष्कर्ष यह है कि गोपियों का प्रेम साकार श्याम पर एकनिष्ठ है और निर्गुण-योग का खंडन व्यंग्य, प्रश्न और लीला-स्मृति से होता है। भ्रमरगीत सार शुक्ल-संपादित सूर-चयन है; केंद्र ऊधो-गोपी संवाद और सगुण कृष्णभक्ति है।

36. ऊधो मन नाहीं दस-बीस की व्याख्या कीजिए।8 अंक

प्रसंग सूरदास के भ्रमरगीत सार का है। निर्धारित संपादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल हैं। ऊधो मथुरा से योग और निर्गुण-संदेश लेकर ब्रज आए हैं। गोपी उत्तर देती है। अन्वय यह है — हे ऊधो, हमारा मन दस-बीस नहीं; एक श्याम पर्याप्त है। संख्या का निषेध एकनिष्ठा का विधान है। योग चित्त को बाँटता है; सगुण प्रेम एक आलंबन रखता है। आलंबन गोपाल हैं। रस विप्रलंभ-भक्ति है। भाषा ब्रज है। छंद पद-गीत है। दस-बीस लोकोक्ति-सा व्यंग्य है।

भाव सगुण प्रेम की एकता है। यही पद निर्गुण-खंडन का लघु सूत्र भी है — निराकार ब्रह्म के अनेक उपाय गोपी नहीं मानती। निर्गुण कौन देस को वासी उसी संवाद का अगला द्वार है। उर में माखन चोर अड़े — बाल-लीला हृदय का आलंबन। हमारे हरि हारिल की लकरी — आसक्ति छूटती नहीं। ऊधो अँखियाँ अति अनुरागी — नेत्र राग से देखते हैं। रीति की अभिसारिका यहाँ लक्ष्य नहीं; गोपी भक्त है।

निष्कर्ष यह है कि व्याख्या का केंद्र एक मन और एक श्याम है। दस-बीस का निषेध सगुण एकनिष्ठा है; ऊधो का योग उत्तर पाता है, विजय नहीं।

37. मीराबाई के काव्य की विशेषताएँ लिखिए।20 अंक

मीराबाई राजस्थान की कृष्ण-भक्त हैं। मेवाड़ से जोड़ी जाती हैं। संपादन शंभुसिंह मनोहर की मीरां पदावली निर्धारित है। आराध्य गिरधर गोपाल हैं — गोवर्धन उठाने वाला कृष्ण; गिरिधर कविराय से नाम-मात्र का साम्य है, वे नीति के कुंडलिया-कवि हैं। मीरा अष्टछाप की सेविका नहीं; स्वतंत्र सगुण कंठ हैं। सूर पुष्टि-सेवक हैं; मीरा पंथ-मंडल के बाहर हैं। भाषा राजस्थानी और ब्रज का मिश्रण है। पद गेय हैं। रस भक्ति और विप्रलंभ हैं। गुरु-भाव कहीं रैदास-स्मृति से जुड़ा कहा जाता है; निर्धारित पदों का केंद्र गिरधर है। पति-कुल और राजसी मर्यादा से टकराती वाणी लोक में गिनी गई।

पहली विशेषता एकनिष्ठा है। मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई — दूसरा देव नहीं; कुल-देव और राज-देव का विकल्प बंद है। बसो मेरे नैनन में नन्दलाल — नेत्र मंदिर हैं, राजसभा नहीं। नैना निपट बंकट छबि अटके — रूप ही बंधन है। दूसरी विशेषता गुणगान है। माई म्हां गोविन्द गुण गास्यां — माँ से निवेदन, गोविंद-गुणगान व्रत है। मीरां मगन भई हरि के गुण गाय — मग्नता गान से आती है। मन रे परसि हरि के चरण — मन को चरण-स्पर्श का आदेश। तीसरी विशेषता राजसी दबाव से टकराहट है। राणाजी थे जहर दियौ म्हैं जाणी — विष भी प्रसाद; भक्ति भय से बड़ी। राणा-प्रसंग इतिहास का विवरणमात्र नहीं, भक्ति की कसौटी है।

विरह अंग है। जोगिया जी निसदिन जोऊँ बाट — योगी-प्रभु की प्रतीक्षा रात-दिन है। सखी म्हारी नींद नसानी हों — विरह नींद हरता है। हरि बिन कूँण गती — बिना हरि गति नहीं। दस पंक्तियाँ एक सूत्र हैं — गिरधर, गुणगान, विष-भय का अतिक्रमण, विरह और नैन-निवास। व्याख्या प्रसंग, भाव और सौंदर्य माँगती है; पहली पंक्ति से पद पहचाना जाता है। रीति का नायिका-भेद लक्ष्य नहीं। अभिसारिका-लक्षण यहाँ साधना है, दरबारी अभ्यास नहीं। नन्दलाल नैनों में बसें — यही साधना है, राजसभा नहीं। योगी की बाट और नींद का टूटना विरह के अंग हैं, इतिहास का विवरण नहीं।

तुलना से स्वर खुलता है। सूर की गोपी-वाणी सामूहिक ब्रज-प्रेम है; मीरा एक स्त्री-भक्त की एकनिष्ठ वाणी है। तुलसी राम-दास्य गाते हैं, मन को बावरा कहकर नाम जपवाते हैं; मीरा कृष्ण को पति-प्रभु बनाती हैं। रसखान ब्रज-जन्म और ग्वाल-वेश माँगते हैं; मीरा जन्म-कुल में रहकर भी गिरधर को एकमात्र रखती हैं। भ्रमरगीत निर्गुण काठता है; मीरा राणा और भय काठती हैं। चारों सगुण हैं; मीरा का केंद्र अनन्यता और निर्भयता है।

निष्कर्ष यह है कि मीरा-काव्य की विशेषताएँ गिरधर-एकनिष्ठा, राजस्थानी-ब्रज पद, गुणगान, विरह और राणा-प्रसंग की निर्भयता हैं। निर्धारित पदावली मनोहर-संपादन पर पहचानी जाती है। आराध्य गिरधर गोपाल हैं, दूसरा कोई नहीं।

38. मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई की व्याख्या कीजिए।8 अंक

प्रसंग मीराबाई की मीरां पदावली है। निर्धारित संपादक शंभुसिंह मनोहर हैं। मीरा राजस्थान की कृष्ण-भक्त हैं, मेवाड़ से जोड़ी जाती हैं। आराध्य गिरधर गोपाल हैं — गोवर्धन उठाने वाला कृष्ण। यह आराध्य गिरिधर कविराय से भिन्न है; कविराय नीति के कुंडलिया-कवि हैं। अन्वय यह है — मेरे तो गिरधर गोपाल हैं, दूसरा कोई नहीं। दूसरो न कोई अनन्यता का विधान है। कुल-देव और राज-देव का विकल्प यहाँ बंद है। रस भक्ति है। भाषा राजस्थानी-ब्रज मिश्रण है। छंद पद-गीत है। मीरा अष्टछाप की सेविका नहीं; स्वतंत्र सगुण कंठ हैं।

भाव एकनिष्ठ कृष्ण-भक्ति है। बसो मेरे नैनन में नन्दलाल — नेत्र मंदिर हैं। माई म्हां गोविन्द गुण गास्यां — गुणगान व्रत है। राणाजी थे जहर दियौ म्हैं जाणी — विष भी प्रसाद, भक्ति भय से बड़ी। जोगिया जी निसदिन जोऊँ बाट — योगी-प्रभु की प्रतीक्षा। सखी म्हारी नींद नसानी हों — विरह नींद हरता है। नैना निपट बंकट छबि अटके — रूप ही बंधन है। तुलसी राम-दास्य गाते हैं; मीरा कृष्ण को पति-प्रभु रखती हैं।

निष्कर्ष यह है कि व्याख्या का केंद्र अनन्य गिरधर गोपाल है। दूसरी सत्ता का निषेध ही पद का प्राण है। गुणगान, नैन-निवास और निर्भयता उसी अनन्यता की ओर हैं।

39. रसखान के कृष्ण-प्रेम का स्वरूप लिखिए।8 अंक

रसखान कृष्ण-भक्त कवि हैं। निर्धारित संपादन विद्यानिवास मिश्र और सत्यदेव मिश्र की रचनावली है। परंपरा उन्हें पठान कुल से जोड़ती है; आराध्य ब्रज-कृष्ण हैं। वे अष्टछाप के बाहर हैं। पुष्टि-सेवक और रसखान का अंतर पंथ का है, प्रेम का नहीं। भाषा ब्रज है। छंद कवित्त-सवैया प्रधान हैं। रस माधुर्य और भक्ति हैं। प्रेम की कामना मनुष्य-जन्म और ब्रज-वेश की है। राज्य और कुल का अहंकार यहाँ गौण है। भक्ति देह और ग्वाल-वेश माँगती है।

मानुस हौं तो वही रसखान — जन्म ब्रज का हो। या लकुटी अरु कामरिया पर — ग्वाल की लकड़ी और कंथा वैभव हैं। मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं — मयूर-मुकुट अभिलाषा है। खेलत फाग सुहाग भरी — होली कृष्ण-रास की। कान्ह भये बस बाँसुरी के — वेणु नायक को भी बाँधती है। प्रेम पगे जु रँगे रँग साँवरे — प्रेम साँवले रंग में पगा। आवत हैं बन ते मनमोहन — दर्शन का क्षण। सूर गोपी की ओर से बोलते हैं; रसखान भक्त अपनी जीभ से ब्रज माँगते हैं।

निष्कर्ष यह है कि रसखान का कृष्ण-प्रेम ब्रज-जन्म, ग्वाल-वेश और माधुर्य है। आराध्य कान्ह हैं, पंथ-छाप नहीं। कवित्त-ब्रज उसकी वाणी है।

40. तुलसी, सूर, मीरा और रसखान का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।20 अंक

तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई और रसखान निर्धारित सगुण भक्तिकाल के चार कवि हैं। साम्य साकार आराध्य, लोकभाषा, गेय मुक्तक और भक्ति-रस पर है। रीतिबद्ध लक्षण-ग्रंथ इनका काम नहीं; केशव-बिहारी की नायिका-सूची यहाँ लक्ष्य नहीं। संपादक अलग हैं — वियोगी हरि विनय पत्रिका, रामचंद्र शुक्ल भ्रमरगीत सार, शंभुसिंह मनोहर मीरां पदावली, विद्यानिवास मिश्र और सत्यदेव मिश्र रसखान रचनावली। वैषम्य आराध्य और स्वर पर है। तुलसी राम कहते हैं; सूर-मीरा-रसखान कृष्ण कहते हैं। यही सबसे बड़ा भेद है। चारों भक्तिकाल के कंठ हैं, रीतिकाल के नहीं।

तुलसी रामभक्त हैं। ग्रंथ विनय पत्रिका ब्रज स्तोत्र है। स्वर दास्य और नाम-जप है। राम जपु, राम जपु, राम जपु, बावरे मन को बावरा कहकर जप का आदेश है। माधव! मोह फांस क्यों टूटे मोह का फंदा है। मन पछितैहै अवसर बीते काल का भय है। रामचरितमानस उनकी अवधी कथा-विधा है; पत्रिका व्यक्तिगत निवेदन है — दो विधाएँ, एक आराध्य। सूर कृष्णभक्त और अष्टछाप-शिखर हैं। ग्रंथ भ्रमरगीत सार। स्वर गोपी-प्रेम और निर्गुण-खंडन। ऊधो मन नाहीं दस-बीस एकनिष्ठा है। निर्गुण कौन देस को वासी निराकार का निषेध है। उर में माखन चोर अड़े वात्सल्य-स्मृति है। भाषा साहित्यिक ब्रज है। पुष्टिमार्ग की भूमि है।

मीरा कृष्णभक्त हैं, अष्टछाप के बाहर। ग्रंथ मीरां पदावली। स्वर अनन्य गिरधर और राजसी दबाव से टकराहट। मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई अनन्यता है। राणाजी थे जहर दियौ म्हैं जाणी निर्भयता है। बसो मेरे नैनन में नन्दलाल नैन-निवास है। भाषा राजस्थानी-ब्रज मिश्रण है। स्त्री-स्वर केवल यहीं केंद्र है। रसखान कृष्णभक्त हैं, अष्टछाप के बाहर। ग्रंथ रचनावली। स्वर मनुष्य-जन्म और ग्वाल-वेश। मानुस हौं तो वही रसखान जन्म ब्रज का माँगता है। या लकुटी अरु कामरिया पर ग्वाल की लकड़ी और कंथा वैभव हैं। मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं मयूर-मुकुट की अभिलाषा है। कान्ह भये बस बाँसुरी के वेणु-माधुर्य है। छंद कवित्त-सवैया हैं, सूर का पद-गीत अलग चाल का है। परंपरा उन्हें पठान कुल से जोड़ती है; आराध्य ब्रज-कृष्ण हैं।

तुलना के बिंदु स्थिर हैं। आराध्य: राम बनाम कृष्ण। पंथ: रामानंदी-तुलसी, पुष्टि-सूर, स्वतंत्र मीरा, पंथ-बाह्य रसखान। विधा: स्तोत्र, भ्रमर-संवाद, पदावली, कवित्त। भाषा: पत्रिका-ब्रज, साहित्यिक ब्रज, राजस्थानी-ब्रज, कवित्त-ब्रज। निर्गुण-खंडन सूर में सबसे स्पष्ट है। दास्य तुलसी में सबसे स्पष्ट है। अनन्यता और राणा-टकराहट मीरा में सबसे स्पष्ट है। ब्रज-वेश रसखान में सबसे स्पष्ट है। सूर समूह की गोपी-वाणी हैं; रसखान व्यक्तिगत ब्रज-कामना हैं। मीरा एक स्त्री-भक्त की जीभ हैं; तुलसी दास की जीभ हैं।

निष्कर्ष यह है कि साम्य सगुण प्रेम, लोकभाषा और भक्ति-रस पर है। वैषम्य राम-कृष्ण, दास्य-गोपी-गिरधर-ग्वाल, और चार संपादित ग्रंथों पर है। निर्धारित पाठ इन्हीं चार कंठों से पूरा होता है — विनय, भ्रमर, गिरधर, ब्रज-जन्म।

41. बिहारी को रीतिसिद्ध कवि क्यों माना जाता है? सतसई का परिचय दीजिए।8 अंक

बिहारीलाल रीतिसिद्ध इसलिए हैं कि उन्होंने केशव-चिन्तामणि की तरह लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखा, दोहे में रीति सिद्ध की। सतसई सात सौ दोहों का शृंगार-कोष मानी जाती है। निर्धारित संपादन जगन्नाथ दास रत्नाकर का बिहारी रत्नाकर है। भाषा परिष्कृत ब्रज है। छंद दोहा है — प्रत्येक पक्ष 13+11 मात्रा, दो पक्ष। शैली समास और चमत्कार की है। आश्रय जयसिंह आमेर से जोड़ा जाता है। नायिका, ऋतु, नेत्र और मान दोहे में सिमटते हैं। कवि आचार्य नहीं; दोहा स्वयं प्रमाण है। ग्रंथ अध्याय-लक्षण नहीं, मुक्तक-कोष है।

मेरी भव बाधा हरो, राधा नागरी सोइ — नायिका-आलंबन और हरि-हरित श्लेष एक ही दोहे में सिद्ध हैं। कहत नटत रीझत खिझत — नैन-संवाद, अध्याय नहीं। कनक-कनक ते सौ गुनी — सोना और धतूरा, श्लेष का प्रमाण। पत्रा होइ तिथि पाइयै — मुख की पूर्णिमा, अतिशयोक्ति। केशव रसिकप्रिया में बाँधते हैं, इसलिए रीतिबद्ध हैं। घनानंद पीर गाते हैं, इसलिए रीतिमुक्त हैं। बिहारी शास्त्र के भीतर, ग्रंथ-लक्षण के बिना हैं।

निष्कर्ष यह है कि रीतिसिद्ध का अर्थ बिहारी का दोहा-व्यवहार है। ग्रंथ सतसई है, संपादन रत्नाकर है, छंद 13+11 है। सात सौ मुक्तक स्वयं रीति का प्रमाण हैं।

42. मेरी भव बाधा हरो की व्याख्या कीजिए।8 अंक

प्रसंग बिहारीलाल की सतसई है। निर्धारित पाठ जगन्नाथ दास रत्नाकर का बिहारी रत्नाकर है। भक्त राधा से निवेदन करता है। अन्वय यह है — मेरी भव-बाधा हरो, वह राधा नागरी है जिसके तन की झाई पड़ते ही श्याम की दुति हरित हो जाए। आलंबन राधा हैं; हरि-संबंधिनी वही बाधा भी काटती हैं। छंद दोहा है — 13+11, दो पक्ष। रस शृंगार और भक्ति एक दोहे में मिलते हैं। प्रधान अलंकार श्लेष है — हरि और हरित दोनों अर्थ एक शब्द-छाया पर टिकते हैं। भाषा परिष्कृत ब्रज है। गुण माधुर्य है।

भाव यह है कि राधा की छाया श्याम को हरित करती है; वही छाया भव काटती है। रीतिसिद्धता यही है — नायिका-आलंबन बिना लक्षण-ग्रंथ के सिद्ध। तो पर वारौ उरबसी उसी श्लेष-कुल का दूसरा द्वार है। कनक-कनक ते सौ गुनी धन-मादकता का श्लेष है। कहत नटत रीझत खिझत नैन का व्यापार है। भूषण की अतिशयोक्ति वीर की है; यह अति सूक्ष्म शृंगार की है।

निष्कर्ष यह है कि व्याख्या का केंद्र राधा-निवेदन और हरि-हरित श्लेष है। दोहा रीति सिद्ध करता है, अध्याय नहीं। भव-बाधा और तन-झाई एक ही नागरी पर टिकते हैं।

43. बिहारी की काव्यगत विशेषताएँ लिखिए।20 अंक

बिहारीलाल रीतिसिद्ध शृंगार के कवि हैं। ग्रंथ सतसई है — सात सौ दोहों का मुक्तक-कोष। निर्धारित संपादन जगन्नाथ दास रत्नाकर का बिहारी रत्नाकर है। छंद दोहा है — प्रत्येक पक्ष 13+11 मात्रा, दो पक्ष; छठे और अंतिम वर्ण गुरु। भाषा परिष्कृत ब्रज है। आश्रय आमेर-जयपुर के मिर्जा राजा जयसिंह से जुड़ा कहा जाता है। कवि लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखता। नायिका-भेद, ऋतु, मान, दूती और नेत्र दोहे के व्यवहार में आते हैं। केशव रसिकप्रिया में अध्याय बाँधते हैं, इसलिए रीतिबद्ध हैं; बिहारी दोहा स्वयं प्रमाण बनाते हैं, इसलिए रीतिसिद्ध हैं। घनानंद नायिका-शास्त्र से निकलकर पीर गाते हैं, इसलिए रीतिमुक्त हैं। बिहारी शास्त्र के भीतर रहते हैं।

शैली समास की है। छोटा छंद लंबा अर्थ रखता है — गागर में सागर का आशय यही है कि लघु दोहे में पूर्ण दृश्य बैठता है। श्लेष प्रधान अलंकार है। मेरी भव बाधा हरो — राधा-निवेदन; तन की झाई पड़ते ही श्याम हरित; हरि-हरित श्लेष। तो पर वारौ उरबसी — राधा उर-बसी, उर्वशी श्लेष। कनक-कनक ते सौ गुनी — सोना और धतूरा; एक खाए बौराए, एक पाए बौराए। उपमा सोहत ओढ़े पीत पट में है — पीत वस्त्र श्याम गात, नीलमणि-शैल पर प्रभात। अतिशयोक्ति पत्रा होइ तिथि पाइयै में है — मुख के चारों ओर नित पूर्णिमा। कहत, नटत, रीझत, खिझत — नैन-संवाद; कहना, मुकरना, रीझना, खिझना एक दृष्टि में। दृग उरझत टूटत कुटुम — नेत्र उलझते, कुटुंब टूटता, प्रीति की गाँठ दूनी।

रस शृंगार प्रधान है; रति स्थायी, नायक-नायिका आलंबन। कुछ दोहे नीति और भक्ति छूते हैं। स्वारथु सुकृतु न श्रम वृथा — बाज पराये हाथ, हिंसा न नीति न यश। नर की अरु नलनीर की — जितना नीचे चलै उतना ऊँचा; विनम्रता। तंत्री नाद कवित्त-रस — पूर्ण रस में तरना, अधूरा डूबना। कब को टेरत दीन रट — दानि बिना माँगे देते हैं। अजौं तर्यौना ही रह्यौ मुग्धा-किशोर अवस्था है। रनित भृंग घंटावली कुंज-उद्दीपन है। नहिं परागु नहिं मधुर मधु कली-अलि का भविष्य है। ये दोहे शृंगार के किनारे भक्ति, नीति और काव्य-सिद्धांत भी रखते हैं।

तुलना से विशेषता और खुलती है। सूर पद में फैलते हैं; बिहारी दोहे में सिमटते हैं। सूर का शृंगार कृष्ण-भक्ति है; बिहारी का शृंगार रीति है। भूषण वीर-अतिशयोक्ति करते हैं, ओज गुण; बिहारी शृंगार-श्लेष करते हैं, माधुर्य। घनानंद सीधा स्नेह गाते हैं; बिहारी बाँक चमत्कार रखते हैं। गिरिधर कुंडलिया में नीति गाते हैं; बिहारी दोहे में नायिका नापते हैं। सीमा दरबारी संकीर्णता और चमत्कार-लोभ है। फिर भी हिन्दी मुक्तक का शिखर सतसई मानी जाती है। व्याख्या पहली पंक्ति से दोहा पहचान कर प्रसंग, भाव, सौंदर्य लिखती है।

निष्कर्ष यह है कि विशेषताएँ दोहा 13+11, परिष्कृत ब्रज, समास, श्लेष, रीतिसिद्ध शृंगार और रत्नाकर-पाठ हैं। कवि आचार्य नहीं; दोहा स्वयं रीति का प्रमाण है। नाम, छंद, अलंकार और नायिका-व्यवहार विशेषता के अंग हैं।

44. भूषण के वीर काव्य का विवेचन कीजिए।20 अंक

भूषण रीतिबद्ध धारा के वीर कवि हैं। निर्धारित संपादन विश्वनाथ प्रसाद मिश्र की भूषण ग्रंथावली है। दो शीर्षक निर्धारित हैं — शिवाजी का शौर्य वर्णन और छत्रसाल का प्रताप वर्णन। शिवराजभूषण लक्षण और प्रशस्ति दोनों हैं; शिवाबावनी शिवाजी-विषयक कवित्त है। छंद कवित्त है — चार चरण, प्रायः 31–32 वर्ण। रस वीर है। स्थायी भाव उत्साह है। आलंबन शिवाजी और छत्रसाल हैं। उद्दीपन सेना, भुजा, पगड़ी, दिशा और तेज हैं। भाषा ब्रज है। गुण ओज है — समास, संयुक्त व्यंजन, पद-घनता। अलंकार में अतिशयोक्ति प्रधान है; अनुप्रास चाल है। आश्रय मराठा और बुंदेल वीरता से जुड़ा है। रीतिकाल शृंगार-प्रधान कहा जाता है; भूषण उस सूत्र के अपवाद हैं, चौथी धारा नहीं।

शिवाजी-खंड अतिशयोक्ति से ऊँचाई गाता है। देखत ऊँचाई उघरत पाघ, सुधी राह — कद देखते ही पगड़ी खुलती-सी लगे; सुधी भी ठिठके। पूरब के, उत्तर के, प्रबल पछाँह हू के — दिशाओं के राजा उनके सामने हैं। साजि चतुरंग सेन अंग में उमंग धार — हाथी, घोड़ा, रथ, पैदल और अंग की उमंग। बेद राखे विदित, पुरान राखे सार युत — धर्म और सार दोनों रक्षा। ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहनवारी — उच्च शिखर-नदी की महिमा से तुलना। सबन के ऊपर ही ठाड़ो रहिबे के जोग — सर्वोपरि स्थिति। नायक धीरोदात्त-वीर है, शृंगारी नायक नहीं।

छत्रसाल-खंड भुजा और सेना गाता है। भुज भुजगेस की वै संगिनी भुजंगिनी सी — भुजा शेष की संगी सर्पिणी-सी; उपमा और अनुप्रास साथ। चाक चक चमू के अचाकचक चहुँ ओर — सेना चकाचौंध, अचानक चारों ओर; ओज का प्रमाण। रैया राव चम्पति को चढ़ो छत्रसाल सिंह — चम्पति-पुत्र सिंहवत चढ़े। राजत अखंड तेज छाजत सुजस बड़ो — तेज अखंड, यश बड़ा। दोनों खंड प्रशस्ति हैं, इतिहास-ग्रंथ नहीं। वीर रस का आलंबन शिवाजी और छत्रसाल हैं; फैसला उत्साह से होता है, वंशावली से नहीं। उल्लाला का प्रयोग केशव-भूषण दोनों में कहा गया; प्रधान चाल कवित्त है।

तुलना से वीर-काव्य खुलता है। बिहारी नायिका और नेत्र देखते हैं; भूषण भुजा और चतुरंगिणी देखते हैं। घनानंद सूधा स्नेह और लोचन-दाह गाते हैं; भूषण पगड़ी और दिशा गाते हैं। गिरिधर व्यवहार और चिंता गाते हैं; भूषण तेज गाते हैं। रामचरितमानस का वीर मर्यादा और राम-राज्य का है; भूषण का वीर राजप्रशस्ति का है — आराध्य राम नहीं, आश्रय-नायक शिवाजी-छत्रसाल हैं। सीमा प्रशस्ति की अति है; पूरा ऐतिहासिक चरित्र नहीं, काव्य का उत्साह है। केशव लक्षण लिखकर कठिन कथा गाते हैं; भूषण लक्षण लिखकर वीर गाते हैं — दोनों रीतिबद्ध, रस अलग।

निष्कर्ष यह है कि भूषण का वीर काव्य कवित्त, ओज, अतिशयोक्ति, शिवाजी-छत्रसाल और मिश्र-संपादन से पहचाना जाता है। रस वीर है, स्थायी उत्साह है, धारा रीतिबद्ध है। रीतिकाल के शृंगार-सूत्र का यह अपवाद शिखर है।

45. देखत ऊँचाई उघरत पाघ की व्याख्या कीजिए।8 अंक

प्रसंग भूषण ग्रंथावली का शिवाजी-शौर्य है। निर्धारित संपादक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र हैं। अन्वय यह है — ऊँचाई देखते ही पगड़ी उघरती जान पड़े; सुधी राह देखने वाला भी ठिठके। अतिशयोक्ति कद को सामान्य माप से बड़ा बनाती है। आलंबन शिवाजी हैं। उद्दीपन ऊँचाई, पगड़ी और राह की ठिठकन हैं। रस वीर है; स्थायी भाव उत्साह है। छंद कवित्त है। भाषा ब्रज है। गुण ओज है — समास, संयुक्त व्यंजन, पद-घनता। नायक धीरोदात्त-वीर है, शृंगारी नायक नहीं। शिवराजभूषण लक्षण और प्रशस्ति दोनों हैं।

भाव यह है कि नायक का कद सामान्य मनुष्य की माप के बाहर है। साजि चतुरंग सेन अंग में उमंग धार — चतुरंगिणी और अंग की उमंग। पूरब के उत्तर के प्रबल पछाँह हू के — दिशाओं के राजा उनके सामने। सबन के ऊपर ही ठाड़ो रहिबे के जोग — सर्वोपरि स्थिति। बिहारी का चमत्कार शृंगार-श्लेष का है; भूषण का चमत्कार वीर-अतिशयोक्ति का है। रीतिकाल शृंगार-प्रधान कहा जाता है; यह पंक्ति उस सूत्र का अपवाद है।

निष्कर्ष यह है कि व्याख्या का केंद्र शिवाजी की ऊँचाई और पगड़ी की अतिशयोक्ति है। रस वीर है, गुण ओज है, धारा रीतिबद्ध है। प्रशस्ति उत्साह का काव्य है।

46. घनानंद की रीतिमुक्तता और काव्य-वैशिष्ट्य लिखिए।20 अंक

घनानंद रीतिमुक्त धारा के प्रधान कवि हैं। निर्धारित पाठ घनानंद कवित्त है। संपादक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र हैं; सुजानहित से जुड़े पद निर्धारित हैं। आलंबन सुजान है। विषय प्रेम की पीर है। नायिका-भेद का अध्याय नहीं। भाषा ब्रज है, मुहावरा सीधा है। छंद कवित्त-सवैया हैं। रस विप्रलंभ है; स्थायी रति का वियोग-पक्ष। बोधा, आलम और ठाकुर साथ की पंक्ति हैं; शिखर घनानंद हैं। रीतिमुक्त का अर्थ लक्षण से शून्य काव्य नहीं, बंधन से मुक्त प्रेम-काव्य है। युग रीतिकाल है; यह सूर की पुष्टि-लीला नहीं। दरबार से सर्वथा कटे नहीं; अंतर स्वर का है।

रीतिमुक्तता का सूत्र है — अति सुधो सनेह को मारग है, जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं। मार्ग सीधा है; चतुराई टेढ़ नहीं चलती। सयानप रीति का बाँकपन है; सूधा स्नेह उससे मुक्त है। केशव रसिकप्रिया में लक्षण लिखते हैं, इसलिए रीतिबद्ध हैं। बिहारी दोहे में नायिका सिद्ध करते हैं, इसलिए रीतिसिद्ध हैं। घनानंद अनुभव को बाधा से बड़ा मानते हैं, इसलिए रीतिमुक्त हैं। सूर का वियोग गोपी-भक्ति है — ऊधो, माखन-चोर, कुंज-शत्रु। घनानंद का वियोग सुजान-पीर है, साकार कृष्ण-संप्रदाय का पद नहीं। दोनों ब्रज गाते हैं; आराध्य और रीति-बंधन अलग हैं।

निर्धारित पंक्तियाँ पीर खोलती हैं। रूपनिधान सुजान सखी जब ते इन नैननि नेकु निहारे — देखने मात्र से बंधन। हीन भए जल मीन अधीन कहा कछु मो अकुलानि समानै — जल बिना मीन; प्रिय बिना प्राण। तब तौ छवि पीवत जीवत है, अब सोचन लोचन जात जरे — पहले छवि पीकर जीते, अब सोच से लोचन जलते। भए अति निठुर, मिटाय पहिचानि डारी — पहिचान मिटा दी। कारी कूर कोकिला, कहाँ को बैर काढ़ति री — कोयल भी शत्रु-सी; उद्दीपन उलटा। वहै मुसक्यानि, वहै मृदु बतरानि, वहै — वही मुस्कान, वही बोली; अंतर हृदय का है। रावरे रूप की रीति अनूप, नयो नयो लागत ज्यों ज्यों निहारिये — रूप नित नया। चोप चाह चावनि चकोर भयो चाहत ही — चाह से चकोर। आँखिन मूंदिवो बात दिखावत — मूँदे नेत्र भी बात दिखाते हैं। दस पंक्तियाँ एक पीर हैं।

काव्य-वैशिष्ट्य मुहावरेदार ब्रज, विप्रलंभ-रस, नेत्र-चित्र और सीधी चाल हैं। बिहारी बाँक दोहा रखते हैं; घनानंद बाँक को काटते हैं। भूषण ओज और पगड़ी गाते हैं; घनानंद माधुर्य की पीर गाते हैं। गिरिधर कुंडलिया में नीति गाते हैं; घनानंद कवित्त में स्नेह गाते हैं। शुक्ल रीतिमुक्त को मुख्य धारा नहीं बनाते; बाद के आचार्य स्वच्छंदता का मूल्य अलग से देखते हैं। सीमा यह है कि कवि-संख्या छोटी है और आश्रय से संबंध पूरी तरह टूटा नहीं। व्याख्या पहली पंक्ति से कवित्त पहचान कर प्रसंग, भाव, सौंदर्य लिखती है।

निष्कर्ष यह है कि वैशिष्ट्य सुजान-पीर, सूधा स्नेह, कवित्त-ब्रज, निर्धारित पंक्तियाँ और लक्षण-मुक्ति हैं। संपादन मिश्र का है। धारा रीतिमुक्त है। रस विप्रलंभ है, आलंबन सुजान है।

47. अति सुधो सनेह को मारग है की व्याख्या कीजिए।8 अंक

प्रसंग घनानंद कवित्त का है। निर्धारित संपादक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र हैं; सुजानहित से जुड़े पद इसी स्वर के हैं। आलंबन सुजान-प्रेम है। अन्वय यह है — स्नेह का मार्ग अति सूधा अर्थात् सीधा है; जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं, वहाँ चतुराई टेढ़ नहीं चलती। रीति का बाँकपन यहाँ निषेध है। रस विप्रलंभ है; नायिका-लक्षण का अध्याय नहीं। छंद कवित्त है। भाषा मुहावरेदार ब्रज है। सूधा और बाँक विरोधाभास से अर्थ खोलते हैं। बोधा, आलम, ठाकुर इसी स्वर के साथ हैं; सूत्र घनानंद का है।

भाव यह है कि सच्चा प्रेम सरल है। बिहारी बाँक दोहा रखते हैं; यह पद बाँक को काटता है। केशव लक्षण लिखते हैं; घनानंद अनुभव को बाधा से बड़ा मानते हैं। रूपनिधान सुजान सखी जब ते इन नैननि नेकु निहारे — देखने मात्र से बंधन। तब तौ छवि पीवत जीवत है, अब सोचन लोचन जात जरे — पहले दर्शन, अब दाह। कारी कूर कोकिला — उद्दीपन शत्रु। रावरे रूप की रीति अनूप — रूप नित नया। युग रीतिकाल है; यह स्वच्छंद प्रेम है, नायिका-अभ्यास नहीं।

निष्कर्ष यह है कि व्याख्या का केंद्र सूधा स्नेह और सयानप का निषेध है। रीतिमुक्तता इसी सूत्र से पहचानी जाती है। मार्ग सीधा है, अध्याय टेढ़ नहीं।

48. गिरिधर कविराय की कुंडलिया का परिचय दीजिए।8 अंक

गिरिधर कविराय नीति और लोक-व्यवहार के कवि हैं। निर्धारित संपादन किशोरीलाल गुप्त की ग्रंथावली है। छंद कुंडलिया है — दोहा और रोला का योग। छह पंक्तियाँ होती हैं। दोहे का अंतिम अंश रोला के आरंभ में दुहराया जाता है; अंतिम पंक्ति प्रायः पहली से जा मिलती है — इसी घुमाव से नाम कुंडलिया है। विषय चिंता, समय, धन, गुण, विचार और अतीत-भविष्य हैं। भाषा सरल ब्रज-लोक की है। रस शांत-नीति है। शृंगार लक्ष्य नहीं। वे रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध या रीतिमुक्त का चौथा नाम नहीं।

चिन्ता ज्वाल शरीर की — चिंता की दाह बुझती नहीं। साईं बैर न कीजिए गुरु पंडित कवि यार — इनसे वैर हानि है। साईं समय न चूकिए — समय चूकना अनीति है। दौलत पाय न कीजिए सपने हूँ अभिमान — धन पर गर्व स्वप्न-दोष है। पानी बाढ़ौ नाव में — अति धन की हानि। गुण के गाहक सहस नर — गुण के बिना ग्राहक नहीं। बिना विचारे जो करे सो पीछे पछताय — अविचार पश्चात्ताप। बीती ताहि बिसारि दे — भविष्य की सुधि।

निष्कर्ष यह है कि गिरिधर कुंडलिया-नीति के कवि हैं। संपादन गुप्त का है, छंद दोहा-रोला का योग है, विषय व्यवहार है। तीन रीति-धाराओं के किनारे लोक-कंठ यही है।

49. पानी बाढ़ौ नाव में, घर में बाढ़ौ दाम की व्याख्या कीजिए।8 अंक

प्रसंग गिरिधर कविराय की कुंडलिया है। निर्धारित संपादक किशोरीलाल गुप्त हैं। अन्वय यह है — नाव में जल बढ़े तो डूबती है; कोश में धन बढ़े तो वही भार बनता है। दोनों अतियाँ नाश की ओर हैं। उपमा लोक-दृष्टांत की है। नीति यह है कि अति सर्वत्र दोष है। रस शांत है। छंद कुंडलिया के दोहे का अंग है — पीछे रोला उसी बात को घुमाकर बाँधता है। भाषा सरल ब्रज है। गुण प्रसाद है — अर्थ बिना कष्ट के बैठता है। आलंबन धन की अति है; दृष्टांत नाव का जल है।

भाव संयम है; वैराग्य का नाटकीय प्रदर्शन नहीं। दौलत पाय न कीजिए सपने हूँ अभिमान — धन पर गर्व स्वप्न-दोष है। चिन्ता ज्वाल शरीर की — चिंता भी अति है, दाह बुझती नहीं। गुण के गाहक सहस नर — धन नहीं, गुण ग्राहक पाता है। बिना विचारे जो करे — अविचार पश्चात्ताप। बिहारी का कनक-कनक धन-मादकता का श्लेष है; गिरिधर का यह पद भार का दृष्टांत है। भूषण धन नहीं, भुजा नापते हैं; गिरिधर व्यवहार नापते हैं।

निष्कर्ष यह है कि व्याख्या का केंद्र अति धन की हानि है। नाव का जल और कोश का दाम एक नीति हैं। संयम प्राण है, संग्रह नहीं।

50. बिहारी, भूषण, घनानंद और गिरिधर का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।20 अंक

बिहारीलाल, भूषण, घनानंद और गिरिधर कविराय रीतिकाल के आसपास के चार निर्धारित कवि हैं। साम्य ब्रज भाषा, मुक्तक रूप और दरबारी-लोक परिवेश पर है। संपादक अलग हैं — जगन्नाथ दास रत्नाकर बिहारी रत्नाकर, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र भूषण ग्रंथावली, मिश्र ही घनानंद कवित्त सुजानहित सहित, किशोरीलाल गुप्त गिरिधर ग्रंथावली। वैषम्य धारा, रस और छंद पर है। तीन रीति-धाराएँ बिहारी-भूषण-घनानंद पर बैठती हैं; गिरिधर किनारे नीति पर हैं, चौथा धारा-नाम नहीं। तुलसी-सूर-मीरा-रसखान भक्ति गाते हैं; ये चार रीति और नीति गाते हैं। सूर का शृंगार भक्ति है; बिहारी का शृंगार रीति है। सूर का वियोग गोपी-भक्ति है; घनानंद का वियोग सुजान-पीर है।

बिहारीलाल रीतिसिद्ध शृंगार के कवि हैं। ग्रंथ सतसई है। छंद दोहा है — प्रत्येक पक्ष 13+11 मात्रा। शैली समास और श्लेष की है। नायिका, नेत्र, ऋतु और मान दोहे के व्यवहार में सिद्ध होते हैं; लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखा गया। आश्रय आमेर-जयसिंह से जोड़ा जाता है। मेरी भव बाधा हरो हरि-हरित श्लेष से भक्ति और शृंगार एक दोहे में बाँधता है। कहत, नटत, रीझत, खिझत नैन-संवाद है। कनक-कनक ते सौ गुनी श्लेष का प्रमाण है। गागर में सागर लघु छंद का पूरा दृश्य है। केशव अध्याय बाँधते हैं; बिहारी दोहा सिद्ध करते हैं।

भूषण रीतिबद्ध वीर कवि हैं। ग्रंथ ग्रंथावली है। छंद कवित्त है। रस वीर है; स्थायी उत्साह है। आलंबन शिवाजी और छत्रसाल हैं। अलंकार में अतिशयोक्ति प्रधान है; गुण ओज है; अनुप्रास चाल है — चाक चक चमू, भुज भुजगेस। शिवराजभूषण लक्षण और प्रशस्ति दोनों हैं। रीतिकाल शृंगार-प्रधान कहा जाता है; भूषण उस सूत्र के अपवाद हैं। देखत ऊँचाई उघरत पाघ उसी ओज का द्वार है। बिहारी नायिका देखते हैं; भूषण भुजा देखते हैं। यह राम-काव्य का मर्यादा-वीर नहीं, राजप्रशस्ति का वीर है।

घनानंद रीतिमुक्त प्रेम के कवि हैं। ग्रंथ कवित्त है। आलंबन सुजान है। रस विप्रलंभ है। सूत्र अति सुधो सनेह को मारग है — सयानप बाँक नहीं। नायिका-भेद का अध्याय नहीं। रूपनिधान सुजान नेत्र-बंधन है; अब सोचन लोचन जात जरे दाह है। बिहारी बाँक रखते हैं; घनानंद बाँक काटते हैं। गिरिधर कविराय नीति के कवि हैं। छंद कुंडलिया है — दोहा और रोला का योग, छह पंक्तियाँ, दोहे का अंत रोला के आरंभ में दुहराया जाता है। विषय चिंता, धन, गुण, समय और विचार हैं — चिन्ता ज्वाल शरीर की, पानी बाढ़ौ नाव में, बिना विचारे जो करे, बीती ताहि बिसारि दे। शृंगार लक्ष्य नहीं। भाषा सरल ब्रज-लोक की है। बिहारी नायिका देखते हैं, भूषण भुजा, घनानंद नेत्र-पीर, गिरिधर व्यवहार।

निष्कर्ष यह है कि साम्य ब्रज-मुक्तक पर है। वैषम्य रीतिसिद्ध शृंगार-दोहा, रीतिबद्ध वीर-कवित्त, रीतिमुक्त प्रेम-कवित्त और कुंडलिया-नीति पर है। निर्धारित पाठ इन्हीं चार चालों से पूरा होता है। संपादक रत्नाकर, मिश्र और गुप्त पाठ के द्वार हैं।

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