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काव्यशास्त्र notes

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काव्यशास्त्र is a topic in Medieval poetry (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

काव्यशास्त्र काव्य के स्वरूप, अंग और सौंदर्य का शास्त्र है। विषय चार स्तंभ हैं। पहला काव्य पद — अर्थ, परिभाषा, हेतु, प्रयोजन, गुण, दोष, शब्दशक्ति,…

इकाई 2 · काव्यशास्त्र

काव्यशास्त्र काव्य के स्वरूप, अंग और सौंदर्य का शास्त्र है। विषय चार स्तंभ हैं। पहला काव्य पद — अर्थ, परिभाषा, हेतु, प्रयोजन, गुण, दोष, शब्दशक्ति, नायक-नायिका भेद। दूसरा रस — अर्थ, महत्त्व, रसावयव, प्रकार और उदाहरण। तीसरा छंद — तात्पर्य, भेद, निर्धारित दस छंद। चौथा अलंकार — अर्थ, महत्त्व, शब्द-पक्ष और अर्थ-पक्ष के निर्धारित नाम। भक्तिकाल रस-छंद का व्यवहार करता है; रीतिकाल उन्हीं लक्षणों को ग्रंथ बनाता है। रामचरितमानस चौपाई-दोहा का महाकाव्य है। सूर ब्रज पद गाते हैं। बिहारी दोहे में शृंगार बाँधते हैं। भूषण कवित्त में वीर रस गाते हैं।

आधार भागीरथ मिश्र का काव्यशास्त्र; नरोत्तमदास स्वामी का अलंकार पारिजात; मम्मट का काव्यप्रकाश और विश्वनाथ का साहित्यदर्पण संस्कृत भूमि हैं; केशवदास की रसिकप्रिया-कविप्रिया हिन्दी लक्षण की भूमि हैं। पूरे संस्कृत शास्त्र का इतिहास यहाँ नहीं है। केंद्र निर्धारित अंग हैं — तीन गुण, तीन शब्दशक्ति, नव रस, दस छंद, दस अलंकार, चार नायक, अष्ट नायिका।

सार: काव्य = शब्द-अर्थ का रसात्मक वाक्य। गुण = माधुर्य-ओज-प्रसाद। दोष = रस का अपकर्ष। शब्दशक्ति = अभिधा-लक्षणा-व्यंजना। रस = स्थायी भाव का परिपाक। छंद-अलंकार-नायक-नायिका = रूप और पात्र।

1 काव्यशास्त्र — आशय

काव्यशास्त्र पूछता है काव्य क्या है, कैसे बनता है, किससे शोभित होता है, किससे गिरता है। संस्कृत में भरत रस देते हैं, भामह-दंडी अलंकार और लक्षण, वामन रीति, आनंदवर्धन ध्वनि, अभिनवगुप्त रस-आनंद, मम्मट संकलन, विश्वनाथ रसात्मक वाक्य। हिन्दी में केशवदास, चिन्तामणि, देव, पद्माकर लक्षण-ग्रंथ लिखते हैं। भक्तिकाल के कवि लक्षण-ग्रंथ नहीं रचते, पर वे रस, छंद और अलंकार का व्यवहार करते हैं। शास्त्र सिद्धांत है; काव्य उसका आचरण है।

वामन कहते हैं — रीतिरात्मा काव्यस्य। रीति यहाँ गुणों की अवस्थित शैली है, युग का नाम नहीं। आनंदवर्धन ध्वनि को आत्मा कहते हैं। विश्वनाथ रस को आत्मा कहते हैं। तीन सूत्र विरोध नहीं; वे काव्य के अलग द्वार हैं — शैली, व्यंग्य, आस्वाद। मम्मट इन्हें गुण-दोष-अलंकार के साथ एक लक्षण में बाँधते हैं। भागीरथ मिश्र हिन्दी पाठक को यही संकलन देते हैं।

हिन्दी मध्यकाल इसी शास्त्र को दो तरह जीता है। भक्ति रस को गाती है — मानस प्रसाद, सूर माधुर्य, विनय दैन्य। रीति लक्षण को ग्रंथ बनाती है — नायिका-भेद, अलंकार, कवित्त-सवैया। बिहारी दोहे में शास्त्र सिद्ध करते हैं। भूषण ओज में वीर गाते हैं। घनानंद विप्रलंभ में प्रेम खोलते हैं। गिरिधर कुंडलिया में नीति बाँधते हैं। शास्त्र उनके पीछे है; निर्धारित पद उनके आगे हैं।

गलत वाक्य: काव्यशास्त्र केवल अलंकार की सूची है। सही वाक्य: काव्य शब्द-अर्थ का सहित भाव है; गुण नित्य शोभा हैं; दोष अपकर्ष हैं; शब्दशक्ति अर्थ का मार्ग है; रस आस्वाद है; छंद गति है; अलंकार आहार्य शोभा हैं; नायक-नायिका पात्र हैं।

2 काव्य का अर्थ और परिभाषा

भामह का लक्षण है — शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्। काव्य शब्द और अर्थ का सहित भाव है; केवल शब्द या केवल अर्थ काव्य नहीं। सहित का अर्थ साथ-साथ शोभित होना है, दो वस्तुओं का ढेर नहीं। दंडी कहते हैं — शरीरं तावदिष्टार्थ व्यवच्छिन्ना पदावली। अभीष्ट अर्थ को व्यंजित करने वाली पद-पद्धति काव्य का शरीर है। शरीर कहा, आत्मा बाद के आचार्य देते हैं। वामन रीति को आत्मा कहते हैं। आनंदवर्धन ध्वनि को आत्मा मानते हैं।

मम्मट का लक्षण है — तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि। काव्य दोष-रहित शब्दार्थ है, गुणों से युक्त है; अलंकार प्रायः रहते हैं, कहीं बिना अलंकार के भी काव्य हो सकता है। यह संतुलन महत्त्वपूर्ण है। गुण अनिवार्य हैं। अलंकार प्रायः हैं, नित्य नहीं। विश्वनाथ का लक्षण है — वाक्यं रसात्मकं काव्यम्। रसात्मक वाक्य ही काव्य है। पंडितराज जगन्नाथ कहते हैं — रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्। रमणीय अर्थ का प्रतिपादक शब्द काव्य है।

हिन्दी भक्ति-काव्य विश्वनाथ के निकट बैठता है, क्योंकि भक्ति, वात्सल्य और शृंगार रस के बिना मानस और सूर अधूरे रह जाते हैं। रीतिकाव्य मम्मट और केशव के लक्षण-मार्ग के निकट है — गुण, अलंकार और नायिका-भेद वहाँ प्रधान हैं। जगन्नाथ की रमणीयता दोनों को छूती है — मानस का लोकहित भी रमणीय है, बिहारी का चमत्कार भी। परिभाषा एक आचार्य से बंद नहीं होती; भामह सहित, मम्मट गुण-दोष, विश्वनाथ रस — तीनों सूत्र साथ रहें।

काव्य का अर्थ मात्र सुंदर वाक्य नहीं। वह शब्द और अर्थ का योग है, रस से आस्वाद्य है, गुण से शोभित है। बिना लक्षण के छंद और अलंकार औजार रह जाते हैं, काव्य पद नहीं खुलता।

आचार्यलक्षण
भामहशब्दार्थौ सहितौ काव्यम्
दंडीइष्टार्थ पद-पद्धति = शरीर
वामनरीतिरात्मा काव्यस्य
आनंदवर्धनध्वनि = आत्मा
मम्मटदोष-रहित, सगुण शब्दार्थ; अलंकार प्रायः
विश्वनाथवाक्यं रसात्मकं काव्यम्
जगन्नाथरमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्

3 काव्य-हेतु और काव्य-प्रयोजन

हेतु कारण हैं — काव्य किससे बनता है। मम्मट तीन हेतु कहते हैं — शक्ति (प्रतिभा), निपुणता (लोक और शास्त्र का ज्ञान) तथा अभ्यास (गुरु के उपदेश से बार-बार रचना)। अकेले अभ्यास से कवि नहीं बनता; अकेली प्रतिभा बिना निपुणता के शिथिल रहती है। तीनों का योग काव्य-हेतु है। हिन्दी में केशवदास आदि इसी त्रयी को रीति-ग्रंथ में दोहराते हैं। भक्त कवि शक्ति और भक्ति-अनुभव को हेतु मानते हैं; निपुणता लोकभाषा और कथा-स्मृति से आती है। सूर की निपुणता ब्रज और भागवत है। तुलसी की निपुणता अवधी, राम-कथा और शास्त्र है।

प्रयोजन फल हैं — काव्य किसके लिए है। मम्मट यश, अर्थ, व्यवहार-ज्ञान, अमंगल का नाश (शिवेतरक्षतिः) और तत्काल आनंद कहते हैं। आनंद प्रधान प्रयोजन है। यश कवि की कीर्ति है। अर्थ आश्रय से भी जुड़ता है। व्यवहार-ज्ञान लोक और नीति सिखाता है। शिवेतरक्षति अमंगल का हरण है। भक्तिकाव्य में प्रयोजन लोकहित और भगवत्-प्रेम है — तुलसी कीर्ति को गंगा जैसा हितकारी कहते हैं। रीतिकाव्य में यश, आश्रय और शृंगार-आनंद प्रधान दिखते हैं। गिरिधर के यहाँ व्यवहार-ज्ञान साफ है।

हेतु और प्रयोजन एक नहीं। हेतु कवि के पास हैं — प्रतिभा, ज्ञान, अभ्यास। प्रयोजन पाठक और लोक तक जाते हैं — आनंद, यश, हित। बिना हेतु के रचना नहीं बनती। बिना प्रयोजन के काव्य केवल खेल रह सकता है; मम्मट आनंद को प्रधान कहकर खेल को भी आस्वाद बनाते हैं। भक्ति आनंद को प्रेम बनाती है। रीति आनंद को रस-चमत्कार बनाती है।

लक्षण, हेतु और प्रयोजन मिलकर काव्य पद पूरा करते हैं। गुण और दोष उसी पद के अगले अंग हैं। शब्दशक्ति अर्थ का मार्ग खोलती है। रस आस्वाद है। छंद और अलंकार रूप हैं। नायक-नायिका पात्र हैं। हेतु-प्रयोजन इन सबसे पहले पूछते हैं — काव्य क्यों और किससे।

4 काव्य-गुण

गुण काव्य के नित्य शोभाकारक धर्म हैं। मम्मट काव्य को सगुण कहते हैं — गुण के बिना शब्दार्थ काव्य की कोटि तक नहीं पहुँचता। अलंकार आहार्य शोभा हैं; हटाने पर काव्य रह सकता है। गुण हटाने पर रस फीका पड़ता है। वामन गुण को काव्य का धर्म मानते हैं और रीति को गुणों की अवस्थिति। निर्धारित परिचय तीन गुणों का है — माधुर्य, ओज और प्रसाद। ये तीनों शब्द और अर्थ दोनों पर बैठते हैं। चित्त पर असर से पहचाने जाते हैं, केवल कठिन शब्द गिनने से नहीं।

माधुर्य चित्त को द्रवित करता है। वर्ण कोमल होते हैं — ट-ठ-ड-ढ का बोझ नहीं। संयुक्त व्यंजन कम। रस शृंगार, करुण और शांत इसके अनुकूल हैं। सूर का वात्सल्य और बिहारी का शृंगार-दोहा माधुर्य के हिन्दी प्रमाण हैं। घनानंद की पीर भी माधुर्य पर टिकती है। ओज चित्त को दीप्त करता है। समास, संयुक्त व्यंजन और पद-घनता वीर, रौद्र, बीभत्स को उठाते हैं। भूषण का कवित्त ओज का प्रमाण है। प्रसाद वह गुण है जिससे अर्थ चित्त में शीघ्र व्यापता है — सरल पद, बिना कष्ट के ग्रहण। तुलसी की चौपाई प्रसाद की बड़ी भूमि है। गिरिधर की कुंडलिया भी प्रसाद से चलती है। प्रसाद सब रसों का सहायक माना गया है; माधुर्य और ओज रस-विशेष से बँधे हैं।

वैदर्भी रीति माधुर्य-प्रधान कही गई, गौड़ी ओज-प्रधान, पांचाली मध्यम। ये तीन नाम गुण की शैली हैं, युग की तीन धाराएँ नहीं। गुण अलंकार नहीं — उपमा तुलना है, माधुर्य चित्त-द्रव है। गुण दोष का उल्टा है, रस का पर्याय नहीं। तीन नाम और तीन चित्त-व्यापार — द्रव, दीप्ति, शीघ्र व्याप्ति — गुण का पूरा परिचय हैं।

गुणचित्तअनुकूल रस / शैली
माधुर्यद्रवशृंगार, करुण, शांत; वैदर्भी
ओजदीप्तिवीर, रौद्र, बीभत्स; गौड़ी
प्रसादशीघ्र व्याप्तिसब रस; सरल पद

5 काव्य-दोष

दोष काव्य के अपकर्षक धर्म हैं। मम्मट काव्य को तददोषौ कहते हैं — दोष-रहित शब्दार्थ ही काव्य है। गुण शोभा बढ़ाते हैं; दोष रस को घटाते हैं या अर्थ को उलझाते हैं। आचार्य दोषों को मुख्यतः शब्द-दोष, अर्थ-दोष और रस-दोष में बाँटते हैं। केंद्र तीन वर्ग और कुछ स्पष्ट नाम हैं। जान-बूझकर रचा चमत्कार दोष नहीं ठहरता — लाटानुप्रास की आवृत्ति इसका उदाहरण है। गुण नित्य धर्म हैं। दोष हटाए जाने योग्य बाधा हैं।

शब्द-दोष पद की बनावट पर हैं। श्रुतिकटु — कान को कर्कश वर्ण-समूह। च्युतसंस्कृति — व्याकरण या प्रयोग की चूक। न्यूनपदता — वाक्य में आवश्यक पद की कमी से अर्थ अधूरा। अधिकपदता — व्यर्थ शब्द का बोझ। अर्थ-दोष अर्थ की योजना पर हैं। अप्रतीत — ऐसा संकेत जो सहृदय के रूढ़ ज्ञान से बाहर हो। ग्राम्य — लोक-भदेस वचन जहाँ काव्य की मर्यादा न माँगे। संदिग्ध — दो अर्थ ऐसे लटके कि तात्पर्य न खुलें। रस-दोष रस-व्यापार की हानि हैं — विरुद्ध भाव का अनावश्यक प्रवेश, स्थायी का शिथिल पड़ना, या ऐसे वर्णन से जो आस्वाद्य को काट दे।

पुनरुक्ति सदा दोष नहीं; लाटानुप्रास में वही आवृत्ति अलंकार है। केशव की कठिनता शुक्ल को खटकती है, पर रीति उसे ओज या समास भी कह सकती है; दोष और शैली का फैसला रस से होता है, केवल कठिन शब्द से नहीं। मम्मट के लक्षण में सगुण और अदोष एक साथ बैठते हैं। दोष शब्द, अर्थ या रस को अपकर्षित करते हैं; नाम वर्ग के साथ लिखा जाता है, अकेली निंदा से नहीं।

वर्गउदाहरण-नाम
शब्द-दोषश्रुतिकटु, च्युतसंस्कृति, न्यूनपदता, अधिकपदता
अर्थ-दोषअप्रतीत, ग्राम्य, संदिग्ध
रस-दोषविरुद्ध-भाव, स्थायी का शिथिलन

6 शब्दशक्ति — अभिधा, लक्षणा, व्यंजना

शब्दशक्ति शब्द की वह क्षमता है जिससे अर्थ ग्रहण होता है। काव्य शब्द और अर्थ का सहित भाव है; शक्ति बताती है अर्थ किस मार्ग से आता है। तीन शक्तियाँ मानी गई हैं — अभिधा, लक्षणा, व्यंजना। क्रम बँधा है। पहले मुख्यार्थ। मुख्यार्थ रुक जाए तो लक्ष्यार्थ। वाच्य और लक्ष्य से अधिक खुलता है व्यंग्यार्थ। आनंदवर्धन व्यंग्य को काव्य का प्राण कहते हैं — ध्वनि। विश्वनाथ रस को आत्मा कहते हैं। दोनों का पुल व्यंजना है, क्योंकि रस वाच्य सूची नहीं, व्यंग्य आस्वाद है।

अभिधा मुख्यार्थ की शक्ति है। संकेतग्रह से जो अर्थ सबसे पहले बैठता है, वही वाच्यार्थ है। गौः कहने पर पशु गाय अभिधा है। हरि कहने पर विष्णु या कृष्ण का रूढ़ नाम अभिधा है, यदि वही संकेतित अर्थ हो। अभिधा तीन मानी गई — रूढ़ि (संकेत से सिद्ध मुख्य अर्थ), यौगिक (अवयव से बना अर्थ), योगरूढ़ (अवयव भी, समुदाय-रूढ़ि भी — पंकज)। काव्य का पहला पाठ अभिधा पर टिकता है। बिना वाच्य के लक्ष्य और व्यंग्य टिकते नहीं। तुलसी की चौपाई बहुत जगह अभिधा से कथा चलाती है।

लक्षणा तब चलती है जब मुख्यार्थ बाधित हो और रूढ़ि या प्रयोजन लक्ष्यार्थ तक ले जाए। गङ्गायां घोषः — घोष अर्थात् बस्ती गंगा-प्रवाह के जल पर नहीं बसती; तात्पर्य तट है। मुख्यार्थ बाध, प्रयोजन समीपता, लक्ष्यार्थ तीर। मुकुट चला — मुकुट नहीं चलता; राजा चलता है। यह उपमा नहीं, लक्ष्य से आरोप है। लक्षणा के दो बड़े हाथ हैं — रूढ़ि (लक्ष्य लोक-प्रसिद्ध) और प्रयोजन (वक्ता का हेतु)। उपादान लक्षणा में मुख्य का अंश रहता है; लक्षण-लक्षणा में मुख्य बिलकुल छूटता है। लक्षणा अलंकार नहीं। रूपक अभेद-आरोप है; लक्षणा अर्थ-मार्ग है।

व्यंजना तीसरी शक्ति है। वाच्य और लक्ष्य कह चुकें, तब भी जो अर्थ सहृदय को अतिरिक्त मिलता है, वह व्यंग्य है। सायंकाल कमल संकुचित हैं — अभिधा फूल का बंद होना है; व्यंग्य दिन बीत चुका, विरह लंबा हुआ। ध्वनि काव्य वही जहाँ व्यंग्य प्रधान हो। मम्मट गुणीभूतव्यंग्य और चित्रकाव्य भी मानते हैं — व्यंग्य गौण या केवल वाच्य-चमत्कार। बिहारी का दोहा कभी लक्ष्य-श्लेष पर चमकता है, कभी व्यंग्य पर। भक्ति-पद व्यंजना से रस जगाता है; नाम की सूची अभिधा है। तीनों शक्तियाँ काव्य में साथ रहती हैं। भेद मार्ग से पहचाने जाते हैं — मुख्य, बाधित-मुख्य से लक्ष्य, फिर व्यंग्य।

शक्तिअर्थसंकेत
अभिधावाच्य / मुख्यसंकेतग्रह; गौः = गाय
लक्षणालक्ष्यमुख्यार्थ-बाध; गङ्गायां घोषः = तट
व्यंजनाव्यंग्यअतिरिक्त ध्वनि; रस का मार्ग

7 रस — अर्थ, महत्त्व और रसावयव

रस काव्य का आस्वाद्य आनंद है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में रस नाटक का प्राण है; बाद में वह समस्त काव्य का प्राण माना गया। विश्वनाथ काव्य को रसात्मक वाक्य कहते हैं — वाक्यं रसात्मकं काव्यम्; रस के बिना वाक्य काव्य नहीं। स्थायी भाव चित्त का मूल भाव है। जब वह विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से परिपक्व होता है, तब रस कहलाता है। महत्त्व यही है: काव्य सूचना नहीं, आस्वाद है। अभिनवगुप्त रस को आनंद मानते हैं, कभी ब्रह्मानंद-सहोदर भी कहा गया। आनंदवर्धन व्यंग्य को काव्य का प्राण कहते हैं; रस वाच्य सूची नहीं, व्यंजना से जगा आस्वाद है।

भरत का सूत्र है — विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः। विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। स्थायी भाव चित्त में मूल रूप से रहता है। विभाव उसे उद्बुद्ध करते हैं। अनुभाव शरीर और चेष्टा पर प्रकट करते हैं। संचारी भाव लहर की तरह आते-जाते हैं। इनके परिपाक से स्थायी भाव रस बनता है। रसावयव चार हैं — स्थायी, विभाव, अनुभाव, संचारी। बिना एक के निष्पत्ति अधूरी है।

विभाव दो हैं। आलंबन वह पात्र या वस्तु है जिस पर भाव टिकता है — राम शृंगार में सीता के आलंबन, वीर में रावण; बिहारी में नायिका, भूषण में शिवाजी, घनानंद में सुजान। उद्दीपन वह देश, काल और चेष्टा है जो भाव बढ़ाती है — चांदनी, वन, वसंत, युद्ध-दुंदुभि, कुंज-भ्रमर। अनुभाव कार्य हैं — हाव-भाव, चेष्टा। आठ सात्विक अनुभाव माने गए हैं — स्तंभ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, वेपथु, वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय। व्यभिचारी या संचारी भाव तैंतीस हैं; वे स्थायी के सहायक लहर हैं — निर्वेद, ग्लानि, शंका, असूया, मद, श्रम, हर्ष, विषाद आदि।

आचार्य भट्टनायक साधारणीकरण कहते हैं — पाठक या दर्शक अपना अहं छोड़कर भाव को सामान्य रूप में भोगता है। राम का शोक पाठक का निजी शोक नहीं रह जाता; वह सामान्य करुण बनता है। बिना साधारणीकरण के रस व्यक्तिगत दुख-सुख रह जाएगा, काव्य नहीं। मध्यकालीन काव्य इन्हीं अंगों का व्यवहार है। मानस में भक्ति, करुण, वीर और शांत प्रधान हैं। सूर में वात्सल्य और माधुर्य। बिहारी शृंगार। भूषण वीर। घनानंद विप्रलंभ। केवल रस का नाम लिखना अधूरा है; स्थायी, आलंबन और उद्दीपन साथ हों।

8 रस के प्रकार और उदाहरण

भरत आठ रस कहते हैं। अभिनवगुप्त शांत को नवें रस के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। हिन्दी आचार्य प्रायः नव रस मानते हैं। वात्सल्य को कभी दसवाँ रस कहा जाता है; सूर का बाल-कृष्ण वात्सल्य का प्रमाण है, यद्यपि शास्त्र की मूल नव-संख्या आठ-नौ पर टिकी है। प्रत्येक रस का एक स्थायी भाव है। शृंगार का स्थायी रति है, हास्य का हास, करुण का शोक, रौद्र का क्रोध, वीर का उत्साह, भयानक का भय, बीभत्स का जुगुप्सा, अद्भुत का विस्मय, शांत का निर्वेद (वैराग्य)। रस का नाम लिखते समय स्थायी भाव साथ रहता है। बिना स्थायी के रस केवल विशेषण रह जाता है।

शृंगार के दो भेद हैं — संयोग और वियोग (विप्रलंभ)। संयोग मिलन का शृंगार है; विप्रलंभ बिछोह का। रीतिकाल दोनों पर लक्षण लिखता है। बिहारी संयोग-विप्रलंभ दोनों के दोहे रचते हैं। घनानंद विप्रलंभ प्रधान हैं। सूर के भ्रमरगीत में वियोग भक्ति बनकर आता है। मानस में शृंगार संयत और गौण है; भक्ति, करुण, वीर और शांत प्रधान हैं। भूषण वीर रस के कवि हैं — उत्साह स्थायी, शिवाजी-छत्रसाल आलंबन, सेना-भुजा उद्दीपन।

उदाहरण से प्रकार खुलते हैं। करुण — अयोध्याकांड का वन-गमन, भरत का विलाप; स्थायी शोक। वीर — लंकाकांड और भूषण का शौर्य; स्थायी उत्साह। शांत — विनय पत्रिका का वैराग्य-स्वाद; स्थायी निर्वेद। अद्भुत — मानस के दिव्य प्रसंग; स्थायी विस्मय। हास्य रीति-मुक्तक में कभी आता है, इस पत्र के शिखर-स्वर में प्रधान नहीं। रौद्र-भयानक-बीभत्स युद्ध-वर्णन के किनारे रह सकते हैं; निर्धारित केंद्र शृंगार, वीर, भक्ति-वात्सल्य और शांत हैं।

भक्ति को कभी रस माना गया, कभी शांत-शृंगार का योग। हिन्दी सगुण में भक्ति प्रधान आस्वाद है — तुलसी दास्य, सूर माधुर्य, मीरा अनन्यता। शास्त्र की नव-तालिका उसे अलग खाना दे या न दे, मध्यकाल का अनुभव भक्ति को रस की तरह भोगता है। प्रकार लिखते समय नव रस और उनके स्थायी पहले आते हैं; हिन्दी प्रमाण बाद में।

रसस्थायी भावहिन्दी संकेत
शृंगाररतिबिहारी; सूर-माधुर्य
हास्यहासमुक्तक का विनोद
करुणशोकमानस वन-गमन
रौद्रक्रोधयुद्ध-चित्र
वीरउत्साहभूषण; लंकाकांड
भयानकभययुद्ध-उद्दीपन
बीभत्सजुगुप्सायुद्ध-विवरण
अद्भुतविस्मयदिव्य लीला
शांतनिर्वेदविनय; गिरिधर-नीति

9 छंद — तात्पर्य और मात्रिक छंद

छंद काव्य की नियमित गति है। मात्रा या वर्ण की गिनती से पंक्ति बँधती है; यति विश्राम देती है। हिन्दी छंद दो वर्गों में बँटते हैं — मात्रिक और वर्णिक। मात्रिक में लघु एक मात्रा, गुरु दो मात्रा। वर्णिक में वर्णों और गणों की व्यवस्था प्रधान है। बिना जाति और गणना के छंद केवल नाम रह जाता है। निर्धारित मात्रिक छंद दोहा, चौपाई, कुंडलिया, रोला, उल्लाला हैं; गीतिका और हरिगीतिका मात्रिक-गेय हैं।

दोहा मात्रिक छंद है। दो पक्ष होते हैं। गणना 13+11 है — प्रथम पद तेरह मात्रा, द्वितीय ग्यारह; फिर तृतीय तेरह, चतुर्थ ग्यारह। प्रत्येक पद के छठे और अंतिम वर्ण गुरु माने जाते हैं। तुलसी, रहीम, बिहारी दोहे के प्रतिनिधि हैं। सतसई दोहा-काव्य है। दोहा अर्थ बाँधता है, लंबी कथा नहीं चलाता। चौपाई चार चरणों का मात्रिक छंद है। प्रत्येक चरण सोलह मात्रा का होता है। अंत में प्रायः दो गुरु रहते हैं। रामचरितमानस की कथा चौपाई चलाती है, दोहा सूत्र बाँधता है।

रोला दो चरणों का मात्रिक छंद है। प्रत्येक चरण 24 मात्रा का है। ग्यारहवीं और तेरहवीं मात्रा गुरु होती है। कुंडलिया दोहा और रोला का योग है। छह पंक्तियाँ होती हैं। दोहे का अंतिम अंश रोला के आरंभ में दोहराया जाता है; अंतिम पंक्ति प्रायः पहली से जा मिलती है — इसी घुमाव से नाम कुंडलिया है। गिरिधर कविराय कुंडलिया के लिए प्रसिद्ध हैं। उल्लाला दो चरणों का छंद है। प्रथम चरण 15 मात्रा, द्वितीय 13 मात्रा। केशव और भूषण ने उल्लाला का प्रयोग किया है।

मात्रिक परिवार की पहचान मात्रा-संख्या से है, केवल कवि-नाम से नहीं। दोहा 13+11, चौपाई 16×4, रोला 24, कुंडलिया दोहा+रोला, उल्लाला 15+13। मानस दोहा-चौपाई का योग है। सतसई दोहे का कोष है। गिरिधर कुंडलिया का लोक-कंठ है।

दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान।

तुलसी दया न छूटीए, जब लग घट में प्रान॥

दोहा · तुलसी · संक्षिप्त उद्धरण

10 वर्णिक और गेय छंद — कवित्त, सवैया, द्रुत विलंबित, गीतिका, हरिगीतिका

वर्णिक छंद में वर्णों की गणना और गणों की व्यवस्था प्रधान है। कवित्त (घनाक्षरी कवित्त) चार चरणों का वर्णिक छंद है। प्रत्येक चरण में प्रायः 31 या 32 वर्ण होते हैं। यति बीच में पड़ती है। रीतिकाल का यह प्रधान छंद है। भूषण के वीर-पद्य कवित्त में प्रसिद्ध हैं। घनानंद भी कवित्त-सवैया गाते हैं। सवैया चार चरणों का वर्णिक छंद है। उसकी कई जातियाँ हैं; रीति में मत्तगयंद सवैया सर्वाधिक प्रचलित है। कवित्त और सवैया आश्रय-काव्य, वीर और विप्रलंभ तीनों में चलते हैं।

द्रुत विलंबित संस्कृत का वर्णिक छंद है। गण-क्रम भगण, भगण, भगण, रगण है — प्रत्येक चरण बारह वर्णों का। भगण लघु-लघु-गुरु (द्रुत का आभास), रगण गुरु-लघु-लघु (विलंबित का आभास) — इसी से नाम द्रुत विलंबित है। हिन्दी रीति-काव्य में इसका प्रयोग कवित्त-सवैया से कम है; लक्षण यही है, व्यवहार का शिखर नहीं।

गीतिका और हरिगीतिका वर्णिक नहीं, मात्रिक-गेय हैं। गीतिका में प्रत्येक चरण 26 मात्रा का माना जाता है; चौदहवीं मात्रा पर यति है; चार चरण होते हैं। हरिगीतिका में प्रत्येक चरण 28 मात्रा का है; सोलहवीं मात्रा पर यति है; चार चरण हैं। भक्ति-पद और आधुनिक गीत दोनों में हरिगीतिका आई है। सूर-मीरा का पद-गीत शास्त्रीय गीतिका का हूबहू रूप नहीं, गेयता की दिशा वही है।

निर्धारित दस छंद दो जातियों में बँटते हैं। मात्रिक — दोहा, चौपाई, रोला, कुंडलिया, उल्लाला, गीतिका, हरिगीतिका। वर्णिक — कवित्त, सवैया, द्रुत विलंबित। लक्षण संख्या, यति और गण से पहचाना जाता है। भूषण-घनानंद कवित्त के कवि हैं। बिहारी दोहे के। गिरिधर कुंडलिया के। तुलसी चौपाई-दोहा के।

छंदजातिपहचान
दोहामात्रिक13+11; दो पक्ष
चौपाईमात्रिक16 मात्रा × चार चरण
रोलामात्रिक24 मात्रा; 11वीं-13वीं गुरु
कुंडलियामात्रिकदोहा + रोला; छह पंक्ति
उल्लालामात्रिक15+13 मात्रा
गीतिकामात्रिक-गेय26 मात्रा; यति 14
हरिगीतिकामात्रिक-गेय28 मात्रा; यति 16
कवित्तवर्णिक31–32 वर्ण × चार चरण
सवैयावर्णिकचार चरण; मत्तगयंद प्रसिद्ध
द्रुत विलंबितवर्णिकभगण×3 + रगण

11 अलंकार — अर्थ, महत्त्व और शब्दालंकार

अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्म हैं। महत्त्व आहार्य शोभा का है — गुण नित्य हैं, अलंकार प्रायः। मम्मट कहते हैं कहीं बिना अलंकार के भी काव्य हो सकता है; फिर भी रीति अलंकार को अध्याय बनाती है। नरोत्तमदास स्वामी अलंकार पारिजात में हिन्दी उदाहरण बाँधते हैं। दो बड़े वर्ग हैं — शब्दालंकार और अर्थालंकार। शब्दालंकार शब्द पर टिकते हैं; शब्द बदलते ही अलंकार टूटता है। अर्थालंकार अर्थ पर टिकते हैं; पर्याय से भी टिक सकते हैं।

शब्द-पक्ष के निर्धारित नाम अनुप्रास, यमक और श्लेष हैं। अनुप्रास व्यंजन-वर्ण की आवृत्ति है। छेकानुप्रास स्वल्प आवृत्ति है, वृत्यनुप्रास बार-बार की आवृत्ति है, लाटानुप्रास शब्द और अर्थ की आवृत्ति भिन्न तात्पर्य से है। सूर की पंक्ति तरनि तनूजा तट तमाल — अनुप्रास का प्रसिद्ध उदाहरण है। भूषण का चाक चक चमू वृत्यनुप्रास के निकट ओज देता है। भक्तिकाव्य में अनुप्रास गेयता बढ़ाता है।

यमक में एक शब्द या शब्द-समूह दो बार आता है, अर्थ दोनों जगह भिन्न है। क्रम और आवृत्ति साफ हों तभी यमक है; केवल दोहरा शब्द पर्याप्त नहीं। श्लेष में एक ही शब्द एक साथ दो अर्थ देता है। बिहारी का कनक-कनक ते सौ गुनी श्लेष का प्रमाण है — सोना और धतूरा दोनों अर्थ एक साथ। मेरी भव बाधा हरो में हरि-हरित का खेल भी श्लेष की ओर है। वक्रोक्ति संबंधित शब्दालंकार है — काकु से स्वर का घुमाव, श्लेष से वक्र उत्तर; निर्धारित सूची में अनुप्रास-यमक-श्लेष प्रधान हैं।

यमक-श्लेष केशव-बिहारी में अधिक हैं। अनुप्रास सूर-तुलसी की गेयता और भूषण के ओज दोनों में है। शब्दालंकार शब्द की सतह पर चमकते हैं; अर्थालंकार चित्र बनाते हैं। दोनों का महत्त्व शोभा का है, रस का स्थानापन्न नहीं।

12 अर्थालंकार — उपमा से अतिशयोक्ति

उपमा में उपमेय की उपमान से तुलना होती है। चार अंग हैं — उपमेय, उपमान, साधारण धर्म और वाचक शब्द (सा, जैसे, सम, समान)। पूर्णोपमा में चारों अंग रहते हैं; लुप्तोपमा में कोई अंग छिपता है। तुलसी का पीपर पात सरिस मन डोला — उपमा है; मन उपमेय, पीपल-पात उपमान, डोलना धर्म, सरिस वाचक। रूपक में उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप होता है; सा नहीं रहता। चरण-कमल — रूपक है; चरण ही कमल माने गए, तुलना नहीं, तादात्म्य है। उपमा भेद कहती है, रूपक अभेद।

उत्प्रेक्षा में उपमेय को उपमान होने की संभावना की जाती है। वाचक शब्द मनु, मानो, जानो, इव, निश्चय हैं। कवि कहता है — यह वस्तु मानो वह हो गई। संदेह में उपमेय को देखकर उपमान का निश्चय नहीं हो पाता — यह है या वह। वाचक किं, या, किंवा हैं। मुख देखकर कवि पूछता है — यह मुख है या चंद्र? विकल्प खुले रहते हैं। भ्रांतिमान में विकल्प नहीं रहते; उपमेय पर उपमान का भ्रम बैठ जाता है — मुख को चंद्र समझ लेना। संदेह संशय है, भ्रांतिमान गलत निश्चय है।

दृष्टांत में सामान्य बात के समर्थन में विशेष उदाहरण आता है। दो स्वतंत्र वाक्य समान धर्म से जुड़ते हैं — ज्ञान से मोह मिटे, जैसे दीप से अंधकार। गिरिधर की नीति-कुंडलिया दृष्टांत के निकट चलती है। अतिशयोक्ति लोक-सीमा का अतिक्रमण है। छोटी वस्तु को विराट या असंभव व्यापार से कहना अतिशयोक्ति है। भूषण के वीर-वर्णन — पगड़ी खुलती ऊँचाई, दिशाओं के राजा — और बिहारी का पत्रा होइ तिथि पाइयै इसी पर चलते हैं।

पहचान का सूत्र यह है — तुलना उपमा, अभेद रूपक, संभावना उत्प्रेक्षा, संशय संदेह, भ्रम भ्रांतिमान, उदाहरण दृष्टांत, सीमा-भंग अतिशयोक्ति। मध्यकालीन काव्य दोनों वर्गों का व्यवहार है — सूर-तुलसी गेयता में, बिहारी-भूषण चमत्कार और ओज में।

अलंकारकेंद्र
अनुप्रासव्यंजन-आवृत्ति
यमकशब्द एक, अर्थ दो
श्लेषएक शब्द, युगपत् दो अर्थ
उपमासाधर्म्य से तुलना
रूपकअभेद आरोप
उत्प्रेक्षासंभावना
संदेहयह या वह; निश्चय नहीं
भ्रांतिमानउपमेय पर उपमान का भ्रम
दृष्टांतसामान्य के साथ विशेष उदाहरण
अतिशयोक्तिलोकातिक्रम

13 नायक-भेद

नाट्यशास्त्र और साहित्यदर्पण नायक को चार वर्गों में रखते हैं — धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित, धीरप्रशांत। धीरोदात्त गंभीर, सहनशील, उत्तम कुल का है — राम इसका आदर्श हैं। धीरोद्धत अहंकारी और चंड है — रावण या भीम के कुछ चित्र इस ओर जाते हैं। धीरललित निश्चिंत, कला-विलास में रमण करने वाला है — कृष्ण का माधुर्य-रूप यहाँ बैठता है। धीरप्रशांत शांत स्वभाव और वैराग्य-सम्पन्न है। ये चार नाम काव्यशास्त्र की मूल सूची हैं। स्वभाव यहाँ कुल और मन का है, केवल युद्ध का नहीं।

शृंगार-शास्त्र नायक के व्यवहार से भी भेद करता है। अनुकूल एक नायिका के प्रति एकनिष्ठ है। दक्षिण कई नायिकाओं में चतुर और मधुर है। शठ छिपकर अन्य नायिकाओं से राग रखता है। धृष्ट पकड़े जाने पर भी लज्जित नहीं होता। पति, उपपति और वैशिक का भेद संबंध की दृष्टि से है — विवाह, प्रेम, गणिका। राम धीरोदात्त और अनुकूल के निकट हैं। कृष्ण लीला में धीरललित और कभी दक्षिण माने जाते हैं। रीतिकाल के नायक प्रायः धीरललित-दक्षिण हैं। भूषण का नायक शिवाजी धीरोदात्त-वीर की ओर है, शृंगारी नायक नहीं।

नायक-भेद काव्य के पात्र को नापता है। बिना स्वभाव के राम केवल कथा-नाम रह जाते हैं। बिना व्यवहार के रीति-नायक केवल शृंगार-विशेषण रह जाते हैं। चार धीर स्वभाव हैं; अनुकूल-दक्षिण-शठ-धृष्ट व्यवहार हैं। दोनों स्तर साथ लिखे जाते हैं। मध्यकाल में राम और कृष्ण दो आदर्श हैं; रीति का नायक तीसरा व्यवहार है; भूषण का वीर चौथा।

14 नायिका-भेद

नायिका तीन वर्गों में बँटती है — स्वकीया, परकीया, सामान्या। स्वकीया पत्नी है। उसके तीन अवस्था-भेद हैं — मुग्धा (नवोढ़ा, लज्जा-प्रधान), मध्या, प्रगल्भा (प्रौढ़, अभिव्यक्ति-सम्पन्न)। परकीया दूसरे की स्त्री है; राधा-कृष्ण के माधुर्य में परकीया-भाव भक्ति बनकर आता है, रीति का व्यभिचार नहीं। सामान्या गणिका है; रीति-ग्रंथ उसे भी लक्षण में रखते हैं। केशवदास की रसिकप्रिया हिन्दी में नायिका-भेद का बड़ा ग्रंथ है। बिहारी के दोहे इन्हीं भेदों पर उदाहरण हैं। अजौं तर्यौना ही रह्यौ मुग्धा के निकट है।

अवस्था और मिलन-वियोग से आठ नायिकाएँ कही गई हैं। वासकसज्जा शृंगार-सज्जा कर प्रिय की प्रतीक्षा करती है। विरहोत्कंठिता विरह में व्याकुल है। स्वाधीनपतिका का पति उसके अधीन-सा रहता है। कलहांतरिता मान-कलह के बाद पश्चात्ताप में है। खंडिता नायक के अन्य-रति के चिह्न देखकर कुपिता है। विप्रलब्धा संकेतों पर आकर नायक को न पाकर खिन्न है। प्रोषितपतिका का पति परदेश गया है। अभिसारिका स्वयं नायक के पास जाती है — कृष्ण-भक्ति के पदों में अभिसार प्रसिद्ध है।

आठों नाम और एक-एक लक्षण नायिका-भेद का पूरा परिचय हैं। जाति स्वकीया-परकीया-सामान्या, अवस्था मुग्धा-मध्या-प्रगल्भा, और अष्ट नायिका — तीन स्तर। हिन्दी प्रमाण केशव की रसिकप्रिया और बिहारी के दोहे हैं। भक्ति-पद इन्हीं अवस्थाओं को प्रेम का रूप देते हैं, लक्षण-ग्रंथ का अभ्यास नहीं। सूर की गोपी विरहोत्कंठिता के निकट भक्ति बनती है। घनानंद की पीर विप्रलंभ है, नायिका-अध्याय नहीं।

सार: गुण — माधुर्य द्रव, ओज दीप्ति, प्रसाद व्याप्ति। दोष — शब्द-अर्थ-रस का अपकर्ष। शब्दशक्ति — अभिधा वाच्य, लक्षणा लक्ष्य, व्यंजना व्यंग्य। विश्वनाथ — रसात्मक वाक्य। दोहा 13+11। उपमा तुलना, रूपक अभेद, संदेह संशय, भ्रांतिमान भ्रम, दृष्टांत उदाहरण। नायक चार धीर; अष्ट नायिका।

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