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सगुण भक्ति, रामभक्ति और कृष्णभक्ति notes
Readyसगुण भक्ति, रामभक्ति और कृष्णभक्ति is a topic in Medieval poetry (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.
इस इकाई के तीन अंग हैं। पहला अंग सगुण भक्ति काव्य है — पृष्ठभूमि, प्रतिष्ठापक आचार्य, सगुण-निर्गुण का साम्य-वैषम्य, और सगुण का वैशिष्ट्य। दूसरा अंग…
इकाई 1 · सगुण भक्ति, रामभक्ति और कृष्णभक्ति
इस इकाई के तीन अंग हैं। पहला अंग सगुण भक्ति काव्य है — पृष्ठभूमि, प्रतिष्ठापक आचार्य, सगुण-निर्गुण का साम्य-वैषम्य, और सगुण का वैशिष्ट्य। दूसरा अंग रामभक्ति काव्य है — पृष्ठभूमि, कवि और प्रमुख रचनाएँ, प्रवृत्तियाँ, रामचरितमानस का महत्त्व। तीसरा अंग कृष्णभक्ति काव्य है — पृष्ठभूमि, कवि और प्रमुख रचनाएँ, पुष्टिमार्ग, अष्टछाप, काव्य-प्रवृत्तियाँ। निर्गुण निराकार नाम पर टिकता है। सगुण विग्रह, लीला और कथा पर। राम मर्यादा देते हैं, कृष्ण माधुर्य।
आधार आचार्य रामचंद्र शुक्ल का हिन्दी साहित्य का इतिहास; डॉ. नगेन्द्र का हिन्दी साहित्य का इतिहास; विश्वनाथ त्रिपाठी का लोकवादी तुलसीदास; उदयभानु सिंह की तुलसी काव्य मीमांसा; ब्रजेश्वर वर्मा का सूरदास; डॉ. मनमोहन गौतम की सूर की काव्यकला। यहाँ धारा, आचार्य, मानस और पुष्टि-अष्टछाप का परिचय है।
1 सगुण भक्ति — आशय और वैशिष्ट्य
सगुण भक्ति उस साधना का नाम है जिसमें ईश्वर गुणों और रूप वाला माना जाता है। आराध्य राम हैं, कृष्ण हैं, कभी सीता और राधा के साथ। भक्त नाम जपता है, कथा सुनता है, सेवा करता है और पद गाता है। लीला इतिहास की नकल नहीं, प्रेम का दृश्य है। उसमें जन्म, वन, युद्ध, रास और वात्सल्य आते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल भक्तिकाल को निर्गुण और सगुण में बाँटते हैं। निर्गुण निराकार राम पर टिकता है। सगुण साकार संबंध पर। दोनों भक्ति हैं, दो युग नहीं।
शुक्ल सगुण को दो शाखाओं में रखते हैं। राम-शाखा मर्यादा, लोकसंग्रह और राम-राज्य की है। कृष्ण-शाखा माधुर्य, वात्सल्य और लीला की है। वैशिष्ट्य चार बिंदुओं पर खुलता है। पहला साकार विग्रह — मूर्ति सहारा हो सकती है, मूल अर्थ रूप और गुण वाला ईश्वर है। दूसरा लीला-कथा — पुराण-स्मृति की कथा लोकभाषा में घर करती है। तीसरा आचार्य-संप्रदाय — रामानुज-रामानंद राम की ओर, वल्लभ कृष्ण की ओर। चौथा देशी भाषा — अवधी मानस की, ब्रज सूर की। गलत वाक्य: सगुण केवल मंदिर की मूर्ति है। सही वाक्य: सगुण साकार संबंध है — मर्यादा का राम, वात्सल्य का कृष्ण।
डॉ. नगेन्द्र सगुण को भक्तिकाल का लोक-प्रसार मानते हैं — कथा और गान जनता तक जाते हैं। विश्वनाथ त्रिपाठी तुलसी को लोकवादी कहते हैं, क्योंकि राम केवल दरबार का देव नहीं रह जाते। उदयभानु सिंह मानस को काव्य-मीमांसा से पढ़ते हैं — छंद, रस और मर्यादा एक साथ। ब्रजेश्वर वर्मा और मनमोहन गौतम सूर को वात्सल्य और काव्यकला से खोलते हैं। सगुण का आशय इन्हीं सूत्रों से पूरा होता है: साकार ईश्वर, दो शाखाएँ, आचार्य की भूमि, लोकभाषा का गान।
मीरा कृष्ण-भक्ति में हैं; उनकी वाणी गिरधर-एकनिष्ठा गाती है, अष्टछाप की सेवा नहीं। रसखान भी कृष्ण-भक्त हैं, पंथ-छाप के बाहर। तुलसी रामभक्ति के शिखर हैं। सूर पुष्टि और अष्टछाप के शिखर हैं। चारों सगुण हैं। अंतर आराध्य और स्वर का है, भक्ति-युग का नहीं।
2 सगुण भक्ति की पृष्ठभूमि
राजनीतिक पृष्ठभूमि सल्तनत से मुगल स्थायित्व तक फैली है। नगर, बाजार और सांस्कृतिक संपर्क बढ़े। उत्तर भारत में कई सत्ताएँ साथ-साथ रही; कवि एक ही दरबार के बंधे नहीं रहे। भक्ति सार्वजनिक गान बनी — घाट, पंथ और कथा-मंच पर। सगुण इस संपर्क में साकार कथा लेकर आता है। राम सबके आराध्य बनते हैं। कृष्ण ग्वाल-बाल के साथ लोक-जीवन में उतरते हैं। पृष्ठभूमि युद्ध-सूची नहीं; वह वह वातावरण है जिसमें साकार भक्ति गाई जा सकी।
सामाजिक पृष्ठभूमि जाति, कर्मकांड और ऊँच-नीच का दबाव है। सगुण भक्ति ईश्वर को कुटुंब और पंथ में लाती है। तुलसी मर्यादा बचाते हैं — भाई, पत्नी, सेवक, प्रजा एक धर्म-चित्र में बैठते हैं। सूर शिशु-कृष्ण को वात्सल्य देते हैं — माँ-बाल का स्नेह भक्ति बन जाता है। वर्ण-व्यवस्था का घोषित खंडन हर सगुण कवि में एक-सा नहीं। रामानंद की पंक्ति द्वार चौड़ी करती है। पुष्टिमार्ग सेवा और समर्पण पर टिकता है। सामाजिक स्वर निर्गुण की फटकार से अलग है, पर लोक से कटा हुआ नहीं।
धार्मिक पृष्ठभूमि दक्षिण की आचार्य-परंपरा और उत्तर की रामानंदी-पुष्टिमार्गी पंक्ति है। आलवार-नायनार, रामानुज, मध्व, निंबार्क, वल्लभ, चैतन्य — भक्ति अखिल भारतीय है, केवल काशी-ब्रज की घटना नहीं। शुक्ल भक्तिकाल को हिन्दी का हृदय कहते हैं। द्विवेदी भक्ति को सिद्ध-नाथ-जैन की लंबी तैयारी का फल कहते हैं। सगुण उसी हृदय का साकार भाग है। सिद्धांत आचार्य देते हैं; गान कवि देते हैं।
साहित्यिक पृष्ठभूमि देशी भाषा का उत्कर्ष है। संस्कृत कथा देती है — वाल्मीकि, भागवत, अध्यात्म रामायण। हिन्दी उसे गाती है। अवधी मानस की भाषा बनी। ब्रज सूर की। पद, चौपाई और दोहा प्रचार के वाहन हैं। गलत वाक्य: सगुण अचानक मुगल दरबार से निकला। सही वाक्य: राजनीतिक संपर्क, सामाजिक दबाव, आचार्य-परंपरा और देशी भाषा चारों मिलकर सगुण की भूमि बनाते हैं।
3 प्रतिष्ठापक आचार्य और संप्रदाय
सगुण की दार्शनिक भूमि आचार्य देते हैं। शंकर का अद्वैत निर्गुण चिंतन को भाषा देता है — ब्रह्म निर्विशेष, जगत् विवर्त। सगुण भक्त जगत् और लीला को मिथ्या कहकर नहीं गाते। वे आराध्य को सविशेष मानते हैं। आचार्य कवि नहीं होते; वे सिद्धांत और संप्रदाय देते हैं। हिन्दी का सगुण इन्हीं संप्रदायों की उत्तर-भारतीय वाणी है। प्रत्येक आचार्य का नाम, सिद्धांत और हिन्दी कवि से संबंध एक सूत्र में बँधा है।
रामानुज का मत विशिष्टाद्वैत है। ब्रह्म सविशेष है। चित् और अचित् उसी के शरीर माने जाते हैं। श्री संप्रदाय यहीं से है। यही राम-भक्ति की दार्शनिक भूमि है। रामानंद उत्तर भारत में राम-नाम को लोक तक ले गए। तुलसी उसी पंक्ति के कवि हैं — उनके पास शास्त्र भी है, अवधी भी। मध्व द्वैत कहते हैं — जीव और ब्रह्म दो; ब्रह्म संप्रदाय। निंबार्क द्वैताद्वैत कहते हैं; सनकादि संप्रदाय। ये चार मिलकर चतुः संप्रदाय कहे जाते हैं।
कृष्ण-पक्ष का प्रधान सूत्र वल्लभ है। उनका मत शुद्धाद्वैत है: जगत् मिथ्या नहीं, ब्रह्म का वास्तविक प्रकाश है। पुष्टिमार्ग कृपा का मार्ग है। सेवक समर्पण और सेवा करता है। अष्टछाप और सूर इसी मत से जुड़े। चैतन्य अचिंत्य भेदाभेद और कीर्तन की अलग शाखा हैं — गौड़ीय भक्ति। रामानंद चतुः संप्रदाय की तालिका में अलग पंक्ति हैं, रामानंदी द्वार हैं। चैतन्य भी चतुः के बाहर कीर्तन-शाखा हैं।
चतुः संप्रदाय चार हैं — श्री (रामानुज, विशिष्टाद्वैत), ब्रह्म (मध्व, द्वैत), रुद्र (वल्लभ, शुद्धाद्वैत-पुष्टि), सनकादि (निंबार्क, द्वैताद्वैत)। हिन्दी में राम-पक्ष तुलसी तक आता है, कृष्ण-पक्ष सूर और अष्टछाप तक। गलत वाक्य: सभी सगुण कवि शंकर-अद्वैत गाते हैं। सही वाक्य: सगुण सविशेष ब्रह्म और लीला को सत्य मानता है; सिद्धांत संप्रदाय से आता है, गान कवि से।
| संप्रदाय | आचार्य | सिद्धांत | हिन्दी संबंध |
|---|---|---|---|
| श्री | रामानुज | विशिष्टाद्वैत | राम-भक्ति की भूमि |
| — | रामानंद | राम-नाम का द्वार | तुलसी की पंक्ति |
| ब्रह्म | मध्व | द्वैत | सगुण द्वैत-धारा |
| रुद्र | वल्लभ | शुद्धाद्वैत, पुष्टि | सूर, अष्टछाप |
| सनकादि | निंबार्क | द्वैताद्वैत | कृष्ण-राधा भाव |
| — | चैतन्य | अचिंत्य भेदाभेद | कीर्तन-शाखा |
4 सगुण और निर्गुण — साम्य और वैषम्य
साम्य भूमि पर है। दोनों भक्तिकाल की धाराएँ हैं। दोनों ईश्वर-प्रेम को कर्मकांड से बड़ा मानती हैं। दोनों लोकभाषा गाती हैं — सधुक्कड़ी, अवधी, ब्रज। गुरु दोनों में मार्ग है। पंडित या क़ाज़ी का आडंबर दोनों की निगाह में संदिग्ध है। संगीत, पद और दोहा प्रचार के वाहन हैं। शुक्ल इन्हें एक युग के दो हाथ कहते हैं, दो युग नहीं। द्विवेदी दोनों को भारतीय साधना की निरंतरता में रखते हैं। नगेन्द्र इन्हें भक्तिकाल के दो मार्ग कहते हैं, दो काट नहीं।
वैषम्य मार्ग पर है। निर्गुण निराकार राम है, जाति से असंबद्ध, मंदिर से बड़ा। सगुण साकार राम-कृष्ण है, लीला और मर्यादा का। संत फटकार और सहज पर टिकते हैं। सगुण भक्त कथा, सेवा और शृंगार-भक्ति पर। निर्गुण वेद-पुराण की बाहरी सत्ता काट सकता है। तुलसी उन्हीं कथाओं को लोकभाषा में घर करते हैं। सूर बाल-कृष्ण का वात्सल्य गाते हैं — यह सगुण का कुटुंब-रूप है, मंदिर-पूजा मात्र नहीं।
काव्य-रूप भी अलग हैं। निर्गुण की पहचान साखी, सबद और उलटबाँसी है। प्रेमाख्यान निर्गुण का कथा-रूप है — इश्क मजाजी से हकीकी तक। रामचरितमानस सगुण का महाकाव्य-रूप है। कृष्ण-सगुण की पहचान ब्रज पद है। रस में निर्गुण शांत-व्यंग्य अधिक है; राम-सगुण में भक्ति-वीर-करुण; कृष्ण-सगुण में वात्सल्य-माधुर्य। शृंगार सगुण में भक्ति बनकर आता है, रीति का नायिका-अभ्यास नहीं।
गलत वाक्य: निर्गुण और सगुण एक-दूसरे के शत्रु युग हैं। सही वाक्य: साम्य प्रेम, लोकभाषा और गुरु पर है; वैषम्य विग्रह, शास्त्र और काव्य-रूप पर है। दोनों धाराएँ मिलकर भक्तिकाल पूरा होता है। कबीर का निराकार राम और तुलसी का साकार राम अंतर नाम और विग्रह का है, भक्ति-हृदय का नहीं।
5 रामभक्ति — पृष्ठभूमि, कवि और रचनाएँ
रामभक्ति सगुण की मर्यादा-शाखा है। आराध्य राम हैं — दशरथ-सुत और मर्यादा-पुरुषोत्तम एक साथ। दार्शनिक पृष्ठभूमि रामानुज का विशिष्टाद्वैत है। उत्तर भारत में रामानंद ने राम-नाम का द्वार खोला। साहित्यिक पृष्ठभूमि वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण की कथा-भूमि है; वाणी लोक की अवधी है। सामाजिक पृष्ठभूमि कुटुंब, राज्य, भाई और प्रजा है। यही स्वर उसे कृष्ण-लीला से अलग पहचान देता है। रामभक्ति केवल क्षत्रिय-आदर्श नहीं; तुलसी राम को लोक का धर्म बनाते हैं। वन का राम दरबार का राम नहीं रह जाता।
शिखर कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। रामचरितमानस अवधी महाकाव्य है। विनय पत्रिका ब्रज-स्तोत्र है — व्यक्तिगत निवेदन, कथा नहीं। कवितावली, गीतावली, दोहावली अन्य राम-काव्य हैं। विश्वनाथ त्रिपाठी तुलसी को लोकवादी कहते हैं। उदयभानु सिंह मानस की काव्य-मीमांसा करते हैं। शुक्ल तुलसी को लोकनायक कहते हैं। धारा का शिखर-ग्रंथ रामचरितमानस है।
पंक्ति के अन्य नाम ईश्वरदास, अग्रदास और नाभादास हैं। नाभादास का भक्तमाल भक्तों का चरित-कोष है — रामभक्ति का परिचय-ग्रंथ, महाकाव्य नहीं। अग्रदास रामानंदी पंक्ति से जुड़े। विषय राम-कथा, सीता, भरत, हनुमान और राम-राज्य हैं। रस भक्ति, वीर, करुण और शांत मिलकर लोकसंग्रह करते हैं। शृंगार मानस में गौण और संयत है। कृष्ण-काव्य का माधुर्य यहाँ लक्ष्य नहीं।
रामभक्ति का प्रमाण-ग्रंथ रामचरितमानस है। बिना मानस के धारा कवि-सूची रह जाती है। बिना रामानुज-रामानंद के दार्शनिक भूमि अधूरी रहती है। बिना तुलसी के हिन्दी राम-काव्य का शिखर नहीं खुलता। पृष्ठभूमि, कवि और रचनाएँ तीनों मिलकर परिचय पूरा करते हैं।
| कवि | प्रमुख रचना | संकेत |
|---|---|---|
| तुलसीदास | रामचरितमानस, विनय पत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली | शिखर; अवधी महाकाव्य + ब्रज-स्तोत्र |
| नाभादास | भक्तमाल | भक्त-चरित |
| अग्रदास · ईश्वरदास | राम-भक्ति पद / पंक्ति | रामानंदी धारा |
6 रामभक्ति की प्रवृत्तियाँ
पहली प्रवृत्ति मर्यादा है। राम कामनाओं के पूरक हैं और काम के शासक भी। राज्य, वन, भाई और पत्नी एक धर्म-रेखा पर बैठते हैं। दूसरी प्रवृत्ति लोकसंग्रह है। भक्ति समाज से कटती नहीं; समाज भक्ति से जुड़ता है। शुक्ल मानस को लोकनायक का काव्य कहते हैं। कीर्ति, वाणी और समृद्धि वही भली जो सबका हित करे — यही सगुण का सामाजिक सूत्र राम-शाखा में उतरता है।
तीसरी प्रवृत्ति दास्य भाव है। भक्त स्वामी के आगे झुकता है। मानस में हनुमान सेवक-भक्ति के आदर्श हैं। विनय पत्रिका उसी दास्य का व्यक्तिगत स्वर है। चौथी प्रवृत्ति कथा-विधान है। सात कांड राम-कथा को लोक-कंठ तक ले जाते हैं। पाँचवीं प्रवृत्ति भाषा है — अवधी महाकाव्य की, ब्रज स्तोत्र की। छंद चौपाई कथा चलाती है, दोहा अर्थ बाँधता है।
रस-विधान में भक्ति प्रधान है; वीर, करुण और शांत सहायक हैं। शृंगार संयत है। सीता शक्ति और पतिव्रता के युग-आदर्श में हैं। भरत त्याग हैं। रावण अहंकार है, ज्ञान के बिना। प्रवृत्तियाँ चरित्र से पहचानी जाती हैं, केवल सिद्धांत-सूची से नहीं। राम-राज्य आदर्श है — प्रजा और धर्म साथ।
कृष्ण-शाखा से अंतर यहीं साफ होता है। राम-प्रवृत्ति कर्तव्य और लोकसंग्रह सोचती है। कृष्ण-प्रवृत्ति लीला, सेवा और वात्सल्य सोचती है। दोनों सगुण हैं। प्रवृत्ति आराध्य के स्वभाव से बनती है, युग-विभाजन से नहीं। रामभक्ति की पहचान मर्यादा, दास्य, मानस और राम-राज्य है।
7 रामचरितमानस — रचना और रूप
रामचरितमानस गोस्वामी तुलसीदास का अवधी महाकाव्य है। रचना का पारंपरिक वर्ष विक्रम संवत् 1631 अर्थात् ईसवी 1574 के आसपास कहा जाता है। कथा वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण की भूमि से आती है; वाणी लोक की अवधी है। सात कांड हैं — बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किंधा, सुंदर, लंका और उत्तर। छंद मुख्यतः चौपाई और दोहा हैं; स्थान-स्थान पर सोरठा और स्तुति भी हैं। चौपाई कथा चलाती है, दोहा अर्थ बाँधता है। स्वरूप कांड, भाषा, उद्देश्य और लोक-महत्त्व से पहचाना जाता है।
बालकांड में जन्म, विश्वामित्र, धनुष-यज्ञ और विवाह हैं। अयोध्याकांड वन-गमन और भरत-त्याग पर केंद्रित है। अरण्यकांड में पंचवटी और सीता-हरण हैं। किष्किंधाकांड सुग्रीव-मैत्री है। सुंदरकांड हनुमान और लंका-प्रवेश का है। लंकाकांड युद्ध और रावण-वध है। उत्तरकांड राज्याभिषेक और राम-राज्य है; उत्तरार्थ के कुछ अंशों पर पाठ-विवाद भी रहा है। कांड-क्रम कथा का ढाँचा है, केवल नाम-सूची नहीं।
उद्देश्य कीर्ति और लोकहित साथ हैं। तुलसी कहते हैं — कीरति भनिति भूति भलि सोई, सुरसरि सम सब कहँ हित होई। कीर्ति, वाणी और समृद्धि वही भली जो गंगा की भाँति सबका हित करे। मानस केवल कथा नहीं, आचरण का काव्य है। राम मर्यादा-पुरुषोत्तम हैं। शैली सरल, दृष्टांत-बहुल और गेय है। घाट और कथा-मंच पर पाठ हुआ। रामलीला इसी ग्रंथ से चलती है।
उदयभानु सिंह मानस को काव्य-मीमांसा से पढ़ते हैं — रस, छंद और चरित्र एक साथ। विश्वनाथ त्रिपाठी लोक की दृष्टि से पढ़ते हैं — राम लोक के बीच उतरते हैं। शुक्ल प्रवृत्ति-इतिहास से पढ़ते हैं — भक्तिकाल का शिखर। तीनों दृष्टि रूप को अलग-अलग खोलती हैं; ग्रंथ एक है।
कीरति भनिति भूति भलि सोई।
सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥
रामचरितमानस · बालकांड · संक्षिप्त उद्धरण
| कांड | केंद्र |
|---|---|
| बाल | जन्म, विश्वामित्र, धनुष-यज्ञ, विवाह |
| अयोध्या | वन-गमन, भरत |
| अरण्य | वन, पंचवटी, सीता-हरण |
| किष्किंधा | सुग्रीव-मैत्री |
| सुंदर | हनुमान, लंका |
| लंका | युद्ध, रावण-वध |
| उत्तर | राज्याभिषेक, राम-राज्य |
8 रामचरितमानस का महत्त्व और काव्य-वैशिष्ट्य
साहित्यिक महत्त्व यह है कि हिन्दी राम-कथा का सबसे बड़ा घर यही ग्रंथ बना। अवधी महाकाव्य की ऊँचाई यहीं है। धार्मिक महत्त्व रामानंदी पंथ, रामलीला और लोक-कंठ है — ग्रंथ पाठ और मंच दोनों बना। सामाजिक महत्त्व राम-राज्य, भाई-धर्म और लोकहित है। शुक्ल इसे लोकनायक का काव्य कहते हैं। महत्त्व एक पंक्ति का विशेषण नहीं; ये चार स्तर साथ हैं।
काव्य-वैशिष्ट्य भाषा से खुलता है। अवधी संस्कृत-मिश्रित है, पर बोली की गर्मी वाली। चौपाई-दोहा की जोड़ी कथा और सूत्र बाँधती है। शैली सरल, दृष्टांत-बहुल और गेय है। विषय मर्यादा, भक्ति, राज्य और कुटुंब एक साथ हैं। रस भक्ति प्रधान है; वीर, करुण और शांत सहायक हैं। शृंगार गौण और संयत है। भाषा में प्रसाद गुण की भूमि है — अर्थ शीघ्र हृदय में बैठता है।
सीमाएँ छिपानी नहीं। उत्तरकांड का पाठ-भेद रहा। स्त्री-चित्र युग की मर्यादा के भीतर है, आधुनिक समता का नहीं। राक्षस-चित्र युग के हैं। इन सीमाओं से लोक-प्रसार कम नहीं होता। विनय पत्रिका भक्त की व्यक्तिगत प्रार्थना है। मानस लोक का महाकाव्य है। दोनों तुलसी हैं, रूप अलग हैं। पत्रिका को मानस का सारांश कहना अधूरा है।
महत्त्व का सूत्र यह है: तुलसीदास, अवधी, सप्त कांड, चौपाई-दोहा, संवत् 1631, लोकनायक, रामलीला। बिना इनके मानस केवल कथा-पुस्तक रह जाता है। रामभक्ति का शिखर-ग्रंथ यही है; कृष्ण-शाखा का शिखर सूर है। सगुण इन दोनों शिखरों से पहचाना जाता है।
9 कृष्णभक्ति — पृष्ठभूमि, शुद्धाद्वैत और पुष्टिमार्ग
कृष्णभक्ति सगुण की माधुर्य-शाखा है। आराध्य गोलोक-कृष्ण, गोकुल-कृष्ण और द्वारका-कृष्ण हैं। हिन्दी काव्य में गोकुल-वात्सल्य और ब्रज-माधुर्य प्रधान हैं। कथा-भूमि भागवत है। साहित्यिक भाषा ब्रज है। धार्मिक भूमि वल्लभ का रुद्र संप्रदाय है। सामाजिक भूमि ब्रज की गोचर-संस्कृति, ग्वाल-बाल और यशोदा का वात्सल्य है। राम-शाखा राज्य और वन सोचती है; कृष्ण-शाखा लीला और सेवा सोचती है।
वल्लभाचार्य का मत शुद्धाद्वैत है। जगत् मिथ्या नहीं। वह ब्रह्म का वास्तविक प्रकाश है, केवल विवर्त नहीं। जीव पुष्टि अर्थात् कृपा से बँधता है। पुष्टिमार्ग साधन की कमाई से अधिक प्रभु-अनुग्रह का मार्ग है। सेवक समर्पण करता है — शृंगार, भोग, कथा, कीर्तन। श्रीनाथजी / गोवर्धन की सेवा इस पंथ का केंद्र रही। सिद्धांत शुद्धाद्वैत है; साधना पुष्टि है; आराध्य कृष्ण हैं।
पुष्टिमार्ग साहित्य को सेवक-सेवा और वात्सल्य का बनाता है। बाल-कृष्ण, माखन, यशोदा, ग्वाल-बाल — वात्सल्य सूर का शिखर है। राधा-कृष्ण का शृंगार भक्ति बनकर आता है; रीतिकालीन नायिका-भेद नहीं। भ्रमरगीत ज्ञान-भक्ति के विवाद का काव्य है — ऊधो निर्गुण लाते हैं, गोपियाँ सगुण रखती हैं। सूर पुष्टिमार्ग से जुड़े और कृष्ण को शास्त्र से अधिक वात्सल्य में उतारा। ब्रजेश्वर वर्मा सूरदास को इसी भूमि पर पढ़ते हैं। मनमोहन गौतम सूर की काव्यकला खोलते हैं।
चैतन्य कीर्तन की अलग शाखा हैं। निंबार्क राधा-कृष्ण के द्वैताद्वैत से जुड़े। हिन्दी निर्धारित परिचय का केंद्र वल्लभ-पुष्टि-अष्टछाप-सूर है। गलत वाक्य: पुष्टिमार्ग केवल मंदिर-पूजा है। सही वाक्य: पुष्टि कृपा है, शुद्धाद्वैत जगत् को सत्य मानता है, अष्टछाप उसी सेवा का गान है।
10 अष्टछाप — कवि और प्रमुख रचनाएँ
अष्टछाप पुष्टिमार्ग के आठ कृष्ण-भक्त कवि हैं। अष्टछाप का अर्थ आठ स्वीकृत कंठ है। यह दरबार की रीति नहीं, सेवकों का कीर्तन-मंडल है। चार वल्लभ के समकालीन सेवक माने जाते हैं, चार विट्ठलनाथ (गुसाईं जी) के समय के। शिखर सूरदास हैं। भाषा सबकी ब्रज है, विषय कृष्ण-लीला। बिना आठ नाम और दो पीढ़ियों के अष्टछाप अधूरा रह जाता है।
वल्लभ-काल के चार — सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास। विट्ठलनाथ-काल के चार — गोविंदस्वामी, छीतस्वामी, नंददास, चतुर्भुजदास। सूर का सूरसागर लीला-पदों का महा-संग्रह माना जाता है; भ्रमरगीत उसी का वियोग-खंड है। नंददास रास-पंचाध्यायी और अनुवाद-कर्म से प्रसिद्ध हैं। कुंभनदास सेवा और पदों से जुड़े। परमानंददास और कृष्णदास लीला-गान से जुड़े। गोविंदस्वामी-छीतस्वामी-चतुर्भुजदास गुसाईं-काल के सेवक-कंठ हैं।
सूर शिखर इसलिए हैं कि वात्सल्य, माधुर्य और भ्रमर-प्रसंग लोक तक गए। अष्टछाप का परिचय चार बिंदुओं से है — शिखर सूर, भाषा ब्रज, भूमि पुष्टि, विषय लीला। मीरा अष्टछाप में नहीं; वे राजस्थान की स्वतंत्र कृष्ण-भक्त हैं। रसखान भी कृष्ण-भक्त हैं, अष्टछाप के बाहर। पंथ की छाप और प्रेम की भक्ति एक नहीं। यहाँ मंडल का ढाँचा है।
काव्य-प्रवृत्तियाँ लीला-गान, सेवा-भाव, ब्रज पद और वात्सल्य-माधुर्य हैं। मुक्तक पद प्रधान विधा है, मानस जैसा महाकाव्य नहीं। गेयता कीर्तन से बँधी है। राम-शाखा चौपाई-दोहा की कथा चलाती है; कृष्ण-शाखा पद गाती है। अष्टछाप उसी पद-धारा का स्वीकृत मंडल है।
| पीढ़ी | कवि | संकेत |
|---|---|---|
| वल्लभ-काल | सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास | सूर शिखर; सूरसागर, भ्रमरगीत |
| विट्ठलनाथ-काल | गोविंदस्वामी, छीतस्वामी, नंददास, चतुर्भुजदास | नंददास — रासपंचाध्यायी |
| बाहर | मीरा, रसखान | कृष्ण-भक्त; अष्टछाप नहीं |
11 कृष्णभक्ति की प्रवृत्तियाँ · राम और कृष्ण का साम्य-वैषम्य
कृष्ण-काव्य की प्रवृत्तियाँ माधुर्य, वात्सल्य, लीला-स्मृति और सेवा हैं। बाल-कृष्ण यशोदा के वात्सल्य में उतरते हैं। गोपी-प्रेम सख्य और माधुर्य है। वियोग भ्रमरगीत में ज्ञान से टकराता है। भाषा ब्रज है। छंद पद-गीत हैं। रस वात्सल्य और शृंगार-भक्ति प्रधान हैं; शांत गौण है। पुष्टिमार्ग कृपा है। अष्टछाप कीर्तन-मंडल है। ये प्रवृत्तियाँ राम-काव्य की मर्यादा-प्रवृत्तियों की पूरक हैं।
साम्य सगुण होना है। दोनों साकार ईश्वर, लोकभाषा, भक्ति-रस, आचार्य-संप्रदाय। दोनों भक्तिकाल के उत्कर्ष हैं। तुलसी और सूर हिन्दी के दो शिखर एक ही शताब्दी के आसपास माने जाते हैं। दोनों कथा पुराण-स्मृति से आती है, वाणी लोकभाषा की है। दोनों लोक तक गए — मानस रामलीला से, सूर पद-कीर्तन से।
वैषम्य स्वभाव का है। राम मर्यादा, कर्तव्य, राज्य और वन हैं। कृष्ण लीला, माखन, रास और वात्सल्य हैं। मानस अवधी चौपाई-दोहा का महाकाव्य है। सूर ब्रज पदों के गायक हैं। राम-भक्ति लोकसंग्रह और राम-राज्य सोचती है। कृष्ण-भक्ति प्रेम और सेवा। पुष्टिमार्ग कृपा है। रामानंदी पंक्ति नाम और मर्यादा है। रस में राम-पक्ष भक्ति-वीर-करुण है; कृष्ण-पक्ष वात्सल्य-माधुर्य।
सगुण इन दोनों स्वरों में पूरा होता है। राम और कृष्ण की धाराएँ एक-दूसरे की पूरक हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं। आचार्य सिद्धांत देते हैं। मानस राम का लोक-महाकाव्य है। पुष्टि-अष्टछाप कृष्ण की सेवा और लीला हैं। निर्गुण से प्रेम एक; विग्रह और कथा सगुण की पहचान हैं।
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- निर्धारित पाठ — तुलसी, सूर, मीरा, रसखान notes — यह इकाई निर्धारित सगुण पाठ है। चार रचनाएँ हैं। विनय पत्रिका — तुलसीदास, संपादक वियोगी हरि। भ्रमरगीत सार — सूरदास, संपादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल। मीरां…
- निर्धारित पाठ — बिहारी, भूषण, घनानंद, गिरिधर notes — यह इकाई रीतिकाल का निर्धारित पाठ है। चार रचनाएँ हैं। बिहारी रत्नाकर — संपादक जगन्नाथ दास रत्नाकर। भूषण ग्रंथावली — संपादक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र। घनानंद…
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