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रीतिकाल notes

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रीतिकाल is a topic in Medieval poetry (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

रीतिकाल हिन्दी काव्य का वह युग है जिसमें लक्षण, शृंगार और दरबार केंद्र हैं। विषय हैं — पृष्ठभूमि, नामकरण, प्रवर्तक कवि, प्रमुख रचनाकार और रचनाएँ, तीन…

इकाई 3 · रीतिकाल

रीतिकाल हिन्दी काव्य का वह युग है जिसमें लक्षण, शृंगार और दरबार केंद्र हैं। विषय हैं — पृष्ठभूमि, नामकरण, प्रवर्तक कवि, प्रमुख रचनाकार और रचनाएँ, तीन काव्य-धाराएँ रीतिबद्ध-रीतिसिद्ध-रीतिमुक्त, प्रवृत्तियाँ, साम्य-वैषम्य। आचार्य रामचंद्र शुक्ल इसे भक्तिकाल के बाद का युग कहते हैं। बिहारी रीतिसिद्ध हैं, भूषण रीतिबद्ध वीर, घनानंद रीतिमुक्त। तुलसी, सूर, मीरा, रसखान भक्ति के कवि हैं, रीति-कवि नहीं।

आधार शुक्ल का हिन्दी साहित्य का इतिहास; डॉ. नगेन्द्र की रीतिकाव्य की भूमिका; नंदकिशोर नवल का रीतिकाव्य; विश्वनाथ प्रसाद मिश्र का शृंगारकाल-आग्रह; बच्चन सिंह का बिहारी का नया मूल्यांकन; रामदेव शुक्ल का घनानंद का काव्य; मनोहरलाल गौड़ की स्वच्छंद काव्यधारा और घनानंद। यहाँ युग, नामकरण, रचनाकार और तीन धाराएँ हैं।

सार: रीतिबद्ध = आचार्य-कवि, लक्षण-ग्रंथ। रीतिसिद्ध = रीति कंठस्थ, बिहारी। रीतिमुक्त = प्रेम की पीर, घनानंद। भाषा ब्रज। रस शृंगार प्रधान, भूषण में वीर।

1 रीतिकाल — आशय

रीतिकाल हिन्दी काव्य का वह युग है जिसमें कवि काव्यशास्त्र के लक्षणों के अनुसार रचना करते हैं। रीति का अर्थ विशिष्ट पद-रचना है। वामन कहते हैं — रीतिरात्मा काव्यस्य। संस्कृत में रीति शैली है। हिन्दी में केशवदास, चिन्तामणि, मतिराम, देव और पद्माकर लक्षण-ग्रंथ लिखते हैं। बिहारी लक्षण नहीं लिखते, दोहे में रीति सिद्ध करते हैं। घनानंद लक्षण से बँधते नहीं, प्रेम की पीर गाते हैं। ये तीन व्यवहार ही तीन धाराएँ हैं। नगेन्द्र रीतिकाव्य की भूमिका इसी ढाँचे से खोलते हैं।

सगुण भक्ति और रीति दोनों मध्यकाल हैं, स्वर अलग हैं। भक्ति लोक और संप्रदाय की है। रीति दरबार और लक्षण की है। भाषा दोनों में ब्रज और अवधी है; रीति का प्रधान माध्यम ब्रज है। छंद में दोहा, कवित्त और सवैया प्रधान हैं। चौपाई मानस की है, रीति की मुख्य चाल नहीं। सूर का शृंगार भक्ति है। बिहारी का शृंगार रीति है। अंतर आराध्य और लक्षण-बंधन का है।

नवल रीतिकाव्य को कला और दरबार से पढ़ते हैं। मिश्र प्रधान रस शृंगार देखते हैं। शुक्ल विधि देखते हैं — लक्षण-ग्रंथ। तीनों एक युग को नापते हैं। आशय यही है: रीतिकाल भक्ति के बाद का कला-युग है, जिसमें लक्षण, शृंगार और आश्रय केंद्र हैं; वीर और स्वच्छंद प्रेम उसके भीतर के स्वर हैं, अलग युग नहीं।

2 पृष्ठभूमि

आचार्य शुक्ल रीतिकाल की सीमा लगभग संवत् 1700 से 1900 (ईसवी 1643–1843 के आसपास) मानते हैं। आरंभ चिन्तामणि के आसपास रखा जाता है। केशवदास को कोई भक्तिकाल के अंत में रखते हैं, कोई रीति के प्रवर्तक। राजनीतिक पृष्ठभूमि मुगल साम्राज्य का उत्तरार्ध और क्षेत्रीय राजदरबार हैं — आमेर, बूंदी, पन्ना, दतिया, औरंगजेब-काल के बाद की छोटी रियासतें। कवि आश्रय चाहते हैं। आश्रय शृंगार, वीर-प्रशस्ति और लक्षण-ग्रंथ माँगता है। भूषण मराठा-बुंदेल वीरता से जुड़ते हैं। बिहारी आमेर-जयपुर से जोड़े जाते हैं।

सामाजिक पृष्ठभूमि दरबारी विलास और नायिका-चित्रण है। भक्ति की तीव्र सार्वजनिक लहर ढीली पड़ती है; मंदिर और पंथ चलते रहते हैं, पर काव्य का केंद्र दरबार हो जाता है। नारी-चित्र भोग और शृंगार के निकट आता है; भक्ति का दास्य यहाँ प्रधान नहीं। फिर भी घनानंद का प्रेम दरबारी नायिका-अभ्यास से निकलता है। गिरिधर लोक-नीति गाते हैं — दरबार के किनारे का स्वर।

साहित्यिक पृष्ठभूमि काव्यशास्त्र है — रस, अलंकार, नायिका-भेद अब ग्रंथ के अध्याय बनते हैं। ब्रजभाषा परिष्कृत काव्य-भाषा है। सांस्कृतिक संपर्क फारसी शृंगार और संस्कृत साहित्यदर्पण दोनों से है। रीतिकाल अचानक नहीं टूटता; भक्ति के बाद कला का युग है। पृष्ठभूमि चार स्तरों पर लिखी जाती है — राजनीतिक आश्रय, सामाजिक दरबार, धार्मिक लहर का ढीला पड़ना, साहित्यिक लक्षण-ग्रंथ।

गलत वाक्य: रीतिकाल केवल विलास है, काव्य नहीं। सही वाक्य: आश्रय और शृंगार केंद्र हैं, पर शास्त्र लोकभाषा में उतरता है; बिहारी-भूषण-घनानंद तीन ऊँचाइयाँ उसी भूमि पर हैं।

3 नामकरण

आचार्य रामचंद्र शुक्ल इस युग को रीतिकाल कहते हैं। आधार यह है कि कवि रीति अर्थात् काव्य-लक्षण के ग्रंथ लिखते हैं और उन्हीं के अनुसार शृंगार-काव्य रचते हैं। विश्वनाथ प्रसाद मिश्र इसे शृंगारकाल कहना चाहते हैं, क्योंकि प्रधान रस शृंगार है और रीति साधन है, नाम नहीं। मिश्रबंधु आदि अलंकृतकाल जैसी संज्ञाएँ भी देते हैं — अलंकार और कला की प्रधानता से। कुछ आचार्य कलाकाल कहते हैं। नगेन्द्र शुक्ल की संज्ञा को प्रचलित मानते हुए भूमिका खोलते हैं।

नामकरण का विवाद विषय और विधि का है। शुक्ल विधि देखते हैं — लक्षण-ग्रंथ। मिश्र विषय देखते हैं — शृंगार। दोनों सत्य के अंश हैं। भूषण वीर रस के कवि हैं; केवल शृंगारकाल कहने से वे हाशिए पर चले जाते हैं। केवल रीतिकाल कहने से घनानंद का स्वच्छंद प्रेम दब सकता है। गिरिधर नीति गाते हैं; वे भी एक रस के खाने में नहीं समाते। युग की प्रचलित संज्ञा रीतिकाल है और विभाजन तीन धाराओं में है।

पूर्ण परिचय संज्ञा और आपत्ति दोनों से होता है। शुक्ल का नाम विधि देता है। मिश्र का शृंगारकाल रस देता है। अलंकृतकाल कला देता है। तीन धाराएँ — रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त — नाम के भीतर विविधता बचाती हैं। बिना इस विवाद के युग एक विशेषण रह जाता है।

संज्ञाआधार
रीतिकाल (शुक्ल)लक्षण-ग्रंथ और रीति-बद्ध रचना
शृंगारकाल (विश्वनाथ प्रसाद मिश्र)प्रधान रस शृंगार
अलंकृतकाल / कलाकालअलंकार और कला-विवेक

4 रीति का अर्थ और प्रवर्तक

संस्कृत में रीति काव्य की पद-रचना की विशिष्ट शैली है। वामन रीति को काव्य की आत्मा कहते हैं। गुण — ओज, प्रसाद, माधुर्य — रीति से बँधे हैं। हिन्दी रीतिकाल में रीति का अर्थ और संकीर्ण हो जाता है। यहाँ रीति नायिका-भेद, रस-लक्षण, अलंकार और छंद के उदाहरण-ग्रंथ हैं। केशवदास की रसिकप्रिया नायिका-भेद का ग्रंथ है। कविप्रिया अलंकार और काव्य-शिक्षा का। चिन्तामणि का कविकुलकल्पतरु लक्षण-संग्रह है। मतिराम का रसराज रस-निरूपण है।

प्रवर्तक कवि केशवदास माने जाते हैं। रामचंद्रिका, रसिकप्रिया, कविप्रिया उनके स्तंभ हैं। शुक्ल केशव को कठिन काव्य कहते हैं, पर रीति का द्वार उन्हीं से खुलता है। काल-सीमा के आरंभ से चिन्तामणि जुड़े हैं — कविकुलकल्पतरु। प्रवर्तक और आरंभ-कवि एक नहीं हो सकते: केशव प्रवृत्ति खोलते हैं, चिन्तामणि शुक्ल की तिथि से जुड़े हैं। दोनों नाम साथ रहें।

काव्यशास्त्र सिद्धांत देता है — रस-सूत्र, उपमा-रूपक, धीरोदात्त, अष्ट नायिका। रीतिकाल वे सिद्धांत कविता में उतारता है। रीतिबद्ध कवि सिद्धांत लिखकर उदाहरण देते हैं। रीतिसिद्ध कवि सिद्धांत लिखे बिना उदाहरण सिद्ध करते हैं। रीतिमुक्त कवि सिद्धांत से आगे प्रेम का अनुभव रखते हैं। रीति शब्द तीनों धाराओं का केंद्र है; अंतर बंधन और मुक्ति का है।

5 प्रमुख रचनाकार और रचनाएँ

रीतिबद्ध पंक्ति में केशवदास — रसिकप्रिया, कविप्रिया, रामचंद्रिका। चिन्तामणि — कविकुलकल्पतरु, काव्यविवेक। मतिराम — रसराज, ललितललाम। देव — भावविलास, अष्टयाम। पद्माकर — जगद्विनोद, पद्माभरण। भिखारीदास — काव्यनिर्णय। भूषण — शिवराजभूषण, शिवाबावनी; वीर और प्रशस्ति। ये आचार्य-कवि लक्षण और काव्य दोनों रचते हैं।

रीतिसिद्ध का निर्विवाद नाम बिहारीलाल है — सतसई। बच्चन सिंह बिहारी का नया मूल्यांकन करते हैं — चमत्कार के नीचे काव्य भी देखते हैं। विश्वनाथ प्रसाद मिश्र बिहारी की वाग्विभूति खोलते हैं। रीतिमुक्त में घनानंद शिखर हैं; बोधा, आलम, ठाकुर साथ के नाम हैं। रामदेव शुक्ल और मनोहरलाल गौड़ घनानंद को स्वच्छंद धारा से पढ़ते हैं। गिरिधर कविराय कुंडलिया-नीति के कवि हैं; तीन धाराओं का चौथा खाना नहीं।

रचनाएँ विधा से पहचानी जाती हैं। लक्षण-ग्रंथ अध्याय बाँधते हैं। सतसई मुक्तक दोहा है। शिवराजभूषण लक्षण और प्रशस्ति है। घनानंद कवित्त अनुभव है। कुंडलिया नीति-सूत्र है। बिना ग्रंथ-नाम के रचनाकार सूची अधूरी रहती है। बिना धारा के नाम अकेले नहीं बैठते।

कविग्रंथ / संकेतधारा
केशवदासरसिकप्रिया, कविप्रिया, रामचंद्रिकाप्रवर्तक, रीतिबद्ध
चिन्तामणिकविकुलकल्पतरुशुक्ल के आरंभ से जुड़े
मतिरामरसराज, ललितललामरीतिबद्ध
देवभावविलासआचार्य-कवि
पद्माकरजगद्विनोदउत्तर रीति
भिखारीदासकाव्यनिर्णयरीतिबद्ध
भूषणशिवराजभूषण, शिवाबावनीरीतिबद्ध वीर
बिहारीसतसईरीतिसिद्ध
घनानंदकवित्त / सुजानहितरीतिमुक्त
गिरिधरकुंडलियानीति; धारा-किनारा

6 तीन धाराओं का सूत्र

रीतिबद्ध वह धारा है जिसमें कवि आचार्य भी है। वह लक्षण रचता है और काव्य रचता है। क्रम प्रायः लक्षण फिर उदाहरण है। केशव, चिन्तामणि, मतिराम, देव, पद्माकर, भिखारीदास इसी कोटि में हैं। भूषण वीर रस में रीतिबद्ध हैं — शिवराजभूषण लक्षण और प्रशस्ति दोनों हैं। रीतिसिद्ध वह धारा है जिसमें रीति अलग लक्षण-ग्रंथ में नहीं, काव्य के व्यवहार में सिद्ध है। बिहारी सतसई इसका शिखर है। दोहा छोटी इकाई है; नायिका, ऋतु, मान, अभिसार सब एक दोहे में सिमटते हैं।

रीतिमुक्त वह धारा है जो दरबारी लक्षण से बँधती नहीं। प्रेम अनुभूति है, नायिका-भेद का अभ्यास नहीं। घनानंद, बोधा, आलम और ठाकुर प्रधान नाम हैं। भाषा ब्रज है, पर शैली स्वच्छंद है। वियोग और पीर प्रधान हैं। देव को कोई रीतिबद्ध आचार्य-कवि मानते हैं, कोई उनके भाव-पक्ष को रीतिसिद्ध कहते हैं। प्रचलित वर्गीकरण यह है — बिहारी रीतिसिद्ध, घनानंद रीतिमुक्त, चिन्तामणि-मतिराम-पद्माकर रीतिबद्ध। तीन धाराएँ तीन युग नहीं, एक युग के तीन मार्ग हैं।

सूत्र कवि-धर्म पर है। लक्षण लिखना रीतिबद्ध है। लक्षण न लिखकर रीति सिद्ध करना रीतिसिद्ध है। लक्षण को बाधा मानकर प्रेम गाना रीतिमुक्त है। रस, भाषा और मुक्तक तीनों में साम्य है; अंतर बंधन का है।

7 रीतिबद्ध काव्य

रीतिबद्ध काव्य की पहली पहचान लक्षण-ग्रंथ है। केशवदास रीति के प्रवर्तक माने जाते हैं। रसिकप्रिया नायिका-भेद है, कविप्रिया अलंकार-शिक्षा, रामचंद्रिका कथा-काव्य और कठिन काव्य। चिन्तामणि त्रिपाठी कविकुलकल्पतरु से शुक्ल के रीतिकाल-आरंभ से जुड़े हैं। मतिराम रसराज और ललितललाम लिखते हैं। देव भावविलास, अष्टयाम और काव्य-रचना दोनों करते हैं। पद्माकर जगद्विनोद और पद्माभरण से उत्तर रीति के प्रतिनिधि हैं। भिखारीदास काव्यनिर्णय लिखते हैं।

प्रवृत्तियाँ स्पष्ट हैं। भाषा परिष्कृत ब्रज है। छंद कवित्त, सवैया, दोहा हैं। रस शृंगार प्रधान है; भूषण में वीर और राजप्रशस्ति हैं। अलंकार जान-बूझकर सजाए जाते हैं। नायिका-भेद अध्याय का विषय है। आश्रयदाता के बिना यह धारा नहीं चलती। गुण यह है कि हिन्दी में काव्यशास्त्र लोकभाषा में उतरता है। सीमा यह है कि अनुभव कभी लक्षण के नीचे दब जाता है। केशव की रामचंद्रिका कठिनता के लिए प्रसिद्ध है; शुक्ल ने केशव पर कठोर टिप्पणी की है, पर रीति का द्वार उन्हीं से खुलता है।

भूषण रीतिबद्ध होते हुए अपवाद हैं — शृंगार नहीं, वीर। वे आचार्य-कवि की रीति पर उत्साह गाते हैं। शिवाजी और छत्रसाल आलंबन हैं। ओज गुण है, अतिशयोक्ति अलंकार है, कवित्त छंद है। रीतिबद्ध को केवल नायिका-ग्रंथ कहना भूषण को काट देता है। धारा लक्षण है; रस शृंगार प्रधान है, वीर उसका शिखर-अपवाद है।

8 रीतिसिद्ध काव्य

रीतिसिद्ध का अर्थ है — रीति सिद्ध हो चुकी है, कवि उसे दोहराता नहीं। बिहारीलाल रीतिसिद्ध के केंद्र हैं। सतसई सात सौ दोहों का शृंगार-कोष मानी जाती है। कवि आचार्य नहीं; दोहा स्वयं लक्षण का प्रमाण है। भाषा ब्रज है, शैली समास और चमत्कार की है। आश्रय जयपुर-आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह से जोड़ा जाता है। नायिका के भेद, ऋतु, मान, दूती, नेत्र-वर्णन — सब दोहा की छोटी इकाई में आते हैं। बच्चन सिंह चमत्कार के नीचे नया मूल्यांकन माँगते हैं। मिश्र वाग्विभूति देखते हैं।

रीतिसिद्ध को रीतिबद्ध से अलग यह बात करती है कि ग्रंथ का ढाँचा अध्याय-लक्षण नहीं, मुक्तक दोहा है। रीतिमुक्त से अलग यह बात करती है कि बिहारी दरबारी शृंगार और नायिका-शास्त्र के भीतर रहते हैं; घनानंद उस शास्त्र से निकलकर प्रेम की पीर पर जाते हैं। कुछ इतिहासकार सेनापति या देव के एक पक्ष को रीतिसिद्ध कहते हैं; निर्विवाद नाम बिहारी है। गागर में सागर वाली उक्ति इन्हीं दोहों के लिए प्रसिद्ध है — लघु छंद में पूर्ण दृश्य।

शृंगार प्रधान रस है; कुछ दोहे भक्ति और नीति भी रखते हैं। मेरी भव बाधा हरो राधा-कृष्ण का द्वार खोलता है। कनक-कनक श्लेष का शिखर है। रीतिसिद्धता यही है — लक्षण नहीं, उदाहरण सिद्ध। सतसई मुक्तक-शृंगार का शिखर है।

9 रीतिमुक्त काव्य

रीतिमुक्त काव्य रीति के बंधन से मुक्त प्रेम-काव्य है। इसे स्वच्छंदतावादी धारा भी कहा जाता है। प्रधान कवि घनानंद हैं। सुजान के प्रति उनका प्रेम भक्ति और लौकिक दोनों छवियों में पढ़ा जाता है। बोधा, आलम और ठाकुर साथ के नाम हैं। भाषा ब्रज है। शैली सीधी और वेदना-भरी है; नायिका-भेद के अध्याय नहीं। वियोग प्रधान रस है। वाक्य मुहावरेदार हैं — अति सुधो सनेह को मारग है। प्रेम का मार्ग सीधा है, रीति का टेढ़ा नहीं। गौड़ इसे स्वच्छंद काव्यधारा कहते हैं। रामदेव शुक्ल काव्य की पीर खोलते हैं।

रीतिमुक्त दरबार से सर्वथा कटा नहीं; कवि आश्रय-जगत में भी रहे। अंतर विषय और स्वर का है। रीतिबद्ध नायिका को लक्षण से नापता है। रीतिमुक्त प्रेम को अनुभव से नापता है। रीतिमुक्त को भक्तिकाल की सगुण प्रेम-धारा से मिला देना गलत है। सूर का माधुर्य कृष्ण-भक्ति है। घनानंद की पीर रीतिकाल के भीतर स्वच्छंद प्रेम है। दोनों ब्रज गाते हैं; आराध्य और रीति-बंधन अलग हैं।

छंद कवित्त-सवैया हैं, दोहा प्रधान नहीं। आलंबन सुजान है। उद्दीपन नेत्र, कोकिला, मुसकान हैं। रीतिमुक्तता लक्षण से शून्य होना नहीं, बंधन से मुक्त प्रेम होना है। सूत्र सूधा स्नेह है, नायिका-अध्याय नहीं।

अति सुधो सनेह को मारग है, जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं।

घनानंद · संक्षिप्त उद्धरण

10 तीन धाराओं का साम्य और वैषम्य

साम्य युग, भाषा और काव्य-रूप पर है। तीनों रीतिकाल की धाराएँ हैं। तीनों की प्रधान भाषा ब्रज है। तीनों मुक्तक या छोटे छंदों में अधिक चलती हैं — दोहा, कवित्त, सवैया। तीनों के पीछे रस और अलंकार का शास्त्र है। तीनों धाराएँ दरबार और ब्रज-संस्कृति में स्थित हैं। शुक्ल इन्हें एक कालखंड में रखते हैं, तीन काल में नहीं। नगेन्द्र भूमिका में विविधता को युग के भीतर रखते हैं।

वैषम्य कवि-धर्म पर है। रीतिबद्ध लक्षण लिखता है और उदाहरण देता है। रीतिसिद्ध लक्षण नहीं लिखता, उदाहरण से रीति सिद्ध करता है। रीतिमुक्त रीति को बाधा मानकर प्रेम की पीर गाता है। रस में रीतिबद्ध-रीतिसिद्ध शृंगार-नायिका पर टिकते हैं; रीतिमुक्त वियोग-वेदना पर। भूषण रीतिबद्ध होते हुए वीर हैं — यह शृंगार-सूत्र का अपवाद है, धारा का चौथा नाम नहीं। गिरिधर की कुंडलिया नीति-पक्ष है; वे तीन धाराओं के केंद्र में नहीं।

प्रतिनिधि क्रमशः केशव-चिन्तामणि, बिहारी और घनानंद हैं। साम्य ब्रज-मुक्तक पर है। वैषम्य लक्षण, सिद्ध रीति और मुक्त प्रेम पर है। बिना दोनों के धारा-परिचय अधूरा रह जाता है।

11 रीतिकाल की प्रवृत्तियाँ

प्रधान प्रवृत्ति शृंगार है — संयोग और विप्रलंभ दोनों। नायक-नायिका भेद काव्यांग बन जाता है। अलंकार की प्रधानता है। ब्रज परिष्कृत काव्य-भाषा है। छंद में दोहा, कवित्त, सवैया प्रधान हैं। मुक्तक प्रधान विधा है; महाकाव्य दुर्लभ हैं। केशव की रामचंद्रिका कथा-काव्य है, मानस जैसा लोक-ग्रंथ नहीं। आश्रय-प्रथा कवि को दरबार से बाँधती है। वीर रस भूषण तक उत्कर्ष पाता है। नीति और कुंडलिया गिरिधर की ओर हैं। स्वच्छंद प्रेम घनानंद की ओर है।

गुण ये हैं — भाषा की सजावट, छंद का अभ्यास, शास्त्र का लोकभाषा में अवतरण। सीमा ये हैं — दरबारी संकीर्णता, नारी-चित्र का भोग-पक्ष, अनुभव पर लक्षण का बोझ। शुक्ल रीतिकाल को भक्तिकाल से निम्न मानते हैं। बाद के आचार्य कला-मूल्य अलग से देखते हैं — नवल, नगेन्द्र, बच्चन सिंह। काम गुण-दोष का न्याय है, युग को रद्द करना नहीं। भक्ति और रीति मध्यकाल के दो स्वर हैं।

चार निर्धारित रीति-कवि इन प्रवृत्तियों पर बैठते हैं। बिहारी रीतिसिद्ध शृंगार के दोहे हैं। भूषण रीतिबद्ध वीर और प्रशस्ति हैं। घनानंद रीतिमुक्त प्रेम हैं। गिरिधर कुंडलिया और नीति हैं। सूर का शृंगार भक्ति है, बिहारी का शृंगार रीति है। रीतिकाल तीन मार्गों वाला एक युग है — लक्षण, सिद्ध रीति, और मुक्त प्रेम।

सार: शुक्ल — रीतिकाल। मिश्र — शृंगारकाल। रीतिबद्ध आचार्य-कवि। रीतिसिद्ध बिहारी। रीतिमुक्त घनानंद। ब्रज, शृंगार, मुक्तक; भूषण वीर।

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