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कहानी का शास्त्र और हिन्दी कहानी का इतिहास notes

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कहानी का शास्त्र और हिन्दी कहानी का इतिहास is a topic in Hindi short story (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

विषय कहानी का शास्त्र और इतिहास है। तीन सूत्र हैं। पहला — अर्थ, परिभाषा, स्वरूप, तत्त्व और शिल्प। दूसरा — हिन्दी कहानी का उद्भव, विकास और सोपान। तीसरा —…

इकाई 1 · कहानी का शास्त्र और हिन्दी कहानी का इतिहास

विषय कहानी का शास्त्र और इतिहास है। तीन सूत्र हैं। पहला — अर्थ, परिभाषा, स्वरूप, तत्त्व और शिल्प। दूसरा — हिन्दी कहानी का उद्भव, विकास और सोपान। तीसरा — प्रमुख कहानीकारों का सामान्य परिचय। आचार्य रामचंद्र शुक्ल गद्य के आविर्भाव को आधुनिक काल का चिह्न कहते हैं। कहानी उसी गद्य का संक्षिप्त कथा-रूप है। नामवर सिंह नई कहानी पर लिखते हैं। मधुरेश विकास के सोपान बाँधते हैं। लक्ष्मीनारायण लाल शिल्प देखते हैं। राजेंद्र यादव समानांतर संसार बाँधते हैं। प्रमुख धारा — सप्रे-गुलेरी का आरंभ, प्रेमचंद का यथार्थ, जैनेन्द्र-अज्ञेय का मन, नई कहानी का व्यक्ति, फिर स्त्री-दलित स्वर। निर्धारित कहानियाँ आगे की इकाइयों में खुलती हैं; यहाँ प्रवृत्ति, तत्त्व और नाम स्थिर रहें।

सार: शास्त्र = परिभाषा, उपन्यास से अंतर, छह तत्त्व, एक प्रभाव, शिल्प। इतिहास = सप्रे-गुलेरी से समकालीन तक सोपान। कहानीकार = प्रेमचंद केंद्र; नई कहानी व्यक्ति; स्त्री-दलित निर्धारित नाम।

1 कहानी — अर्थ और परिभाषा

कहानी गद्य की संक्षिप्त कथा है। उसमें एक घटना या एक प्रभाव केंद्र रहता है। उपन्यास समय और समाज फैलाता है। कहानी एक बैठक में पूरी होती है। पश्चिम में एडगर एलन पो एक प्रभाव की माँग करते हैं — कहानी एक चोट छोड़े, कई स्वाद नहीं। हिन्दी में नगेन्द्र उसे जीवन के एक खंड का कलात्मक चित्र कहते हैं। नामवर कसाव और नया अनुभव देखते हैं। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; कहानी उसी चिह्न का छोटा कथा-सिरा है। अंग्रेज़ी short story और बंगला छोटी गल्प से रूप आया। हिन्दी ने उसे अपनी भाषा और अपने प्रश्न दिए।

परिभाषा तीन बिंदुओं पर बैठती है। रूप गद्य है, पद्यात्मक आख्यान नहीं। विस्तार संक्षिप्त है; दीर्घ उपन्यास नहीं। केंद्र एक स्थिति, एक द्वंद्व, एक प्रभाव है। उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं; चित्रण, मूल्यांकन और प्रश्न भी हैं। तिलिस्मी कथा कौतुक प्रधान रही। प्रेमचंद ने उसे समाज का प्रश्न बनाया। जैनेन्द्र ने मन का प्रश्न बनाया। नई कहानी ने व्यक्ति का अनुभव बनाया। बिना परिभाषा के इतिहास नामों की सूची रह जाता है। बिना इतिहास के परिभाषा सूखी रहती है।

आलोचकसूत्र
पोएक प्रभाव; एक बैठक
शुक्लगद्य = आधुनिक चिह्न
नगेन्द्रजीवन-खंड का कलात्मक चित्र
नामवरकसाव; नया अनुभव; कहानी नई कहानी
मधुरेशहिन्दी कहानी का विकास — सोपान
लक्ष्मीनारायण लालहिन्दी कहानियों का शिल्प

2 स्वरूप — उपन्यास, नाटक, एकांकी से अंतर

स्वरूप पूछता है कि कहानी कौन-सा कथा-शरीर है। उपन्यास से अंतर विस्तार और प्रभाव पर है। उपन्यास कई बिंदु जोड़ता है। कहानी एक बिंदु पर चोट करती है। पात्र उपन्यास में बदलते हैं; कहानी में संकेत रह सकते हैं, पर द्वंद्व पूरा होता है। देशकाल उपन्यास में दबाव का फैलाव है; कहानी में एक स्थिति का दबाव है। गोदान ऋण को फैलाता है। कफन एक रात और एक लाश पर सिमटता है। नाटक से अंतर प्रदर्शन पर है। नाटक रंगमंच, संवाद और दृश्य माँगता है। कहानी पढ़ी जाती है। एकांकी एक अंक का दृश्य-रूप है, कहानी का पर्याय नहीं। अंधेर नगरी खेली जाती है। उसने कहा था पढ़ी जाती है।

कहानी के भीतर उपभेद हैं। सामाजिक, ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक, आंचलिक, व्यंग्य, स्त्री-स्वर, दलित। ये जातियाँ शत्रु नहीं। एक कृति दो जातियाँ छू सकती है। चीफ की दावत मध्यवर्ग और दिखावे की है। गदल जाति और प्रेम की है। फुलवा दलित अनुभव की है। स्वरूप तीन प्रश्नों से नापा जाता है। कथा कितनी सिमटती है। प्रभाव एक है या कई। वाचक वर्णन करता है या केवल संकेत देता है। इन्हीं से कहानी उपन्यास, नाटक और एकांकी से कटती है।

रूपपहचानउदाहरण-संकेत
उपन्यासगद्य, विस्तार, चरित्र-विकासगोदान, त्यागपत्र
नाटकदृश्य, संवाद, रंगमंचअंधेर नगरी
एकांकीएक अंक, खेला जातावर्मा; अश्क
कहानीएक प्रभाव, संक्षिप्त गद्यगुलेरी; प्रेमचंद-कहानी

3 तत्त्व — कथावस्तु और एक प्रभाव

कथावस्तु घटना-क्रम है। कहानी में वह पतली और कसी होती है। आरंभ स्थिति खोलता है। मध्य द्वंद्व बढ़ाता है। अंत निर्णय, भंग या चोट देता है। फॉर्स्टर उपन्यास में कथा को क्रम और कथानक को कारण कहते हैं। कहानी में कारण और भी सघन है। संयोग का बोझ दोष है। उपकथा का बिखराव एक प्रभाव तोड़ता है। प्रेमचंद की कथावस्तु सामाजिक कारण से बँधी है — ऋण, भूख, मर्यादा। जैनेन्द्र की कथावस्तु भीतर के निर्णय पर मुड़ती है। नई कहानी की कथावस्तु अनुभव के एक टुकड़े पर टिकती है।

एक प्रभाव पो का सूत्र है। अर्थ यह है कि कहानी एक रस, एक आघात, एक प्रश्न छोड़े। कई उपदेश और कई अंत कहानी को उपन्यास की कटी पूँछ बना देते हैं। उसने कहा था युद्ध-स्मृति और वचन की चोट है। ईदगाह बाल-मन और मेले की चोट है। परिंदे अकेलेपन की चोट है। गुण तीन हैं। कारण-शृंखला। चरित्र से घटना का निकलना। अंत का दबाव। ढीली कथावस्तु भ्रम पैदा करती है। कसी कथावस्तु याद रहती है।

4 तत्त्व — चरित्र, संवाद, देशकाल

चरित्र वह मनुष्य है जो स्थिति को अर्थ देता है। कहानी में पात्र कम हैं। सपाट चरित्र एक गुण पर टिकता है। गोल चरित्र छोटे विस्तार में भी द्वंद्व रखता है। प्रेमचंद के हामिद, घीसू-मधू सामाजिक दबाव में बनते हैं। प्रसाद के चंपा जैसे पात्र आदर्श और त्याग छूते हैं। नई कहानी का व्यक्ति अधूरा, शहरी, अकेला हो सकता है। नायक देवता नहीं। सहायक पात्र कथा चलाते हैं; वे केवल नाम न रह जाएँ। बिना नाम के चरित्र-विवेचन अधूरा है।

संवाद कहानी में अंग है, पूरा शरीर नहीं। नाटक संवाद से चलता है; कहानी वर्णन और संकेत से भी चलती है। प्रेमचंद का संवाद बोलचाल का है। जैनेन्द्र का संवाद विचार का है। निर्मल वर्मा का संवाद अधूरा और मौन का है। देशकाल देश, समय और वातावरण है। वह पृष्ठ नहीं, दबाव है। पूस की रात ठंड का देशकाल है। चीफ की दावत मध्यवर्गीय दिखावे का देशकाल है। गदल जाति-गाँव का देशकाल है। बिना देशकाल के प्रभाव हवा में लटकता है।

तत्त्वकाम
कथावस्तुघटना और कारण; कसाव
एक प्रभावएक चोट; कई स्वाद नहीं
चरित्रकम पात्र; द्वंद्व
संवादवाणी; नाटक जितना प्रधान नहीं
देशकालएक स्थिति का दबाव

5 भाषा, उद्देश्य और शिल्प

भाषा शैली है — सरल खड़ी बोली, संस्कृत-गर्भित, आंचलिक शब्द, व्यंग्य, मौन। प्रेमचंद बोलचाल रखते हैं। प्रसाद काव्य-गद्य छूते हैं। अज्ञेय और वर्मा संकेत रखते हैं। अमरकांत सादी भाषा में करुण-यथार्थ रखते हैं। उद्देश्य नैतिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक या कलात्मक हो सकता है। शुक्ल उद्देश्य को जीवन की आलोचना से जोड़ते हैं। कहानी उपदेश-पुस्तिका नहीं। उद्देश्य चित्र से निकलता है, नारे से नहीं। छह तत्त्व शास्त्र की सूची हैं — कथावस्तु, चरित्र, संवाद, देशकाल, भाषा-शैली, उद्देश्य — साथ एक प्रभाव। एक तत्त्व लिखकर छूट जाना अधूरा विवेचन है। लक्ष्मीनारायण लाल शिल्प को तत्त्व से अलग विन्यास कहते हैं। बटरोही रचना-प्रक्रिया को स्वरूप से जोड़ते हैं।

शिल्प इन तत्त्वों को बाँधने का ढंग है — दृष्टि, संरचना, प्रतीक, अंत। सर्वज्ञ वाचक सब मन पढ़ता है — प्रेमचंद प्रायः यहीं हैं। उत्तम पुरुष मैं-कथन है। सीमित दृष्टि एक पात्र के साथ चलती है। चेतना-प्रवाह भीतर की धारा है — जैनेन्द्र और अज्ञेय के निकट। प्रतीक दीपक, दावत, जोंक, फुलवा शीर्षक में बैठ सकते हैं। अंत खुला या चोटदार हो सकता है। तत्त्व सामग्री हैं। शिल्प विन्यास है। बिना शिल्प के तत्त्व ढेर हैं। बिना तत्त्व के शिल्प खाली प्रयोग है। नाम, उदाहरण और एक सीमा के बिना तत्त्व केवल गिनती रह जाते हैं।

शिल्प-अंगकाम
दृष्टिसर्वज्ञ / उत्तम / सीमित
संरचनाआरंभ-मध्य-अंत; कसाव
प्रतीकशीर्षक और वस्तु का दबाव
अंतचोट या खुला प्रश्न

6 उद्भव — सप्रे, गुलेरी और पहला विवाद

हिन्दी कहानी का उद्भव बीसवीं शताब्दी के आरंभ में है। पृष्ठभूमि प्रेस, शिक्षा, सरस्वती जैसी पत्रिकाएँ, बंगला-अंग्रेज़ी गल्प और नवजागरण है। माधवराव सप्रे — 1871–1926 — की एक टोकरी भर मिट्टी 1901 प्रायः प्रथम हिन्दी कहानी मानी जाती है। विषय ज़मीन, कर और निर्धन किसान है। भाषा खड़ी बोली गद्य है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी — 7 जुलाई 1883, जयपुर; निधन 1922, काशी — की उसने कहा था 1915 सरस्वती में छपी। आलोचना उसे पहली पूर्ण कलात्मक आधुनिक कहानी कहती है — वचन, युद्ध-स्मृति, कसाव। कुछ इतिहास दुलाईवाली जैसे और आरंभिक पाठ जोड़ते हैं। इंशा अल्ला खाँ की रानी केतकी की कहानी गद्य-कथा है, आधुनिक कहानी का पूरा रूप नहीं।

उद्भव का अर्थ एक तिथि नहीं। अर्थ यह है कि हिन्दी गद्य ने संक्षिप्त कला-कथा अपनाई। भारतेंदु युग नाटक और निबंध में अधिक शक्ति रखता है; कहानी अभी सीख रही है। द्विवेदी युग सरस्वती से भाषा-शुद्धि और पाठक देता है। मधुरेश इन्हीं सोपानों से विकास बाँधते हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी गद्य के विन्यास से कहानी को पढ़ते हैं। सहमति दो सिरों पर है। पहला — सप्रे 1901 आरंभ का स्वीकृत नाम। दूसरा — गुलेरी 1915 कला का स्वीकृत नाम। बिना विवाद लिखे उद्भव अधूरा, बिना सहमति के विवाद अधूरा। निर्धारित उसने कहा था इकाई 2 का पाठ है; यहाँ स्थान और वर्ष स्थिर रहें।

कृतिवर्षलेखक
एक टोकरी भर मिट्टी1901सप्रे; प्रायः प्रथम
उसने कहा था1915गुलेरी; सरस्वती; कला-चिह्न
रानी केतकी की कहानीउन्नीसवीं पूर्वइंशा; पूरा आधुनिक रूप नहीं

7 प्रेमचंद युग

धनपत राय ‘प्रेमचंद’ का जन्म 31 जुलाई 1880, लमही, वाराणसी। निधन 8 अक्टूबर 1936, वाराणसी। हिन्दी कहानी का केंद्र-नाम वही हैं। नमक का दारोगा, पंच परमेश्वर, ईदगाह, पूस की रात, कफन, बड़े घर की बेटी, शतरंज के खिलाड़ी — ये युग के स्थिर संकेत हैं। दृष्टि यथार्थ है। भाषा खड़ी बोली बोलचाल की है। नायक किसान, बालक, स्त्री, निर्धन कर्मचारी हो सकता है। आदर्श अंत में कभी झलकता है; चित्र कठोर है। गोदान और रंगभूमि उपन्यास हैं, कहानी-युग की कृति नहीं। कहानी-संग्रह मानसरोवर की चर्चा इतिहास में आती है। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष रहे।

युग का अर्थ केवल एक लेखक नहीं। जयशंकर प्रसाद — 30 जनवरी 1889–15 जनवरी 1937, काशी — आकाशदीप जैसी कहानी में आदर्श, त्याग और काव्य-गद्य रखते हैं। निर्धारित आकाशदीप इकाई 2 है। विश्वंभरनाथ शर्मा ‘कौशिक’, सुदर्शन साथ की पंक्ति हैं। प्रेमचंद युग का स्वर समाज और करुण-यथार्थ है। सीमा आदर्श का बोझ है। गुण यह कि हिन्दी कहानी को किसान, मेला, ठंड और मर्यादा मिले। बिना प्रेमचंद के हिन्दी कहानी का इतिहास अधूरा है।

नामकहानी-संकेतस्वर
प्रेमचंदईदगाह, कफन, पूस की रातयथार्थ, करुण
प्रसादआकाशदीपआदर्श, काव्य-गद्य
कौशिक / सुदर्शनयुग की पंक्तिसामाजिक

8 प्रेमचंदोत्तर — मन, प्रगति, इतिहास

प्रेमचंदोत्तर कहानी 1936 के बाद का मोड़ है। सामाजिक यथार्थ रहता है, पर मन और शिल्प आगे आते हैं। जैनेन्द्र कुमार — 2 जनवरी 1905, कौड़ियागंज, अलीगढ़; निधन 24 दिसंबर 1988 — पाजेब 1942 की कहानी; उपन्यास त्यागपत्र अलग कृति है। अज्ञेय — 7 मार्च 1911–4 अप्रैल 1987 — शरणदाता निर्धारित इकाई 3; उपन्यास शेखर एक जीवनी अलग है। यशपाल — 1903–1976 — प्रगतिशील स्वर, दिव्या उपन्यास अलग। उपेन्द्रनाथ अश्क — 1910–1996 — मध्यवर्ग; एकांकी अलग विधा है। भीष्म साहनी — 8 अगस्त 1915, रावलपिंडी–11 जुलाई 2003, दिल्ली — चीफ की दावत निर्धारित; तमस उपन्यास अलग। रांगेय राघव — 17 जनवरी 1923, आगरा–12 सितंबर 1962 — मूल नाम तिरूमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य; गदल निर्धारित; मुर्दों का टीला उपन्यास अलग।

यह सोपान प्रेमचंद का निषेध नहीं, उसकी अगली परत है। प्रेमचंद बाहर का समाज दिखाते हैं। जैनेन्द्र भीतर का निर्णय दिखाते हैं। अज्ञेय व्यक्ति और नैतिक द्वंद्व दिखाते हैं। यशपाल और राघव वर्ग और इतिहास दिखाते हैं। साहनी मध्यवर्ग के दिखावे पर व्यंग्य करते हैं। साम्य खड़ी बोली और आधुनिक मनुष्य है। वैषम्य आलंबन पर है — खेत, मन, जाति, दावत। सीमा यह कि मनोविज्ञान कभी समाज से कट जाता है। गुण यह कि चरित्र गोल होता है।

कहानीकारनिर्धारित संकेतनहीं मिलाएँ
जैनेन्द्रपाजेबत्यागपत्र उपन्यास
अज्ञेयशरणदाताशेखर; नदी के द्वीप उपन्यास
साहनीचीफ की दावततमस; कबीरा नाटक
राघवगदलमुर्दों का टीला

9 नई कहानी

नई कहानी स्वतंत्रता के बाद, विशेषकर 1950 के दशक का मोड़ है। केंद्र व्यक्ति, शहर, दांपत्य, अकेलापन और नए शिल्प हैं। मोहन राकेश — 1925–1972 — कहानी और नाटक दोनों; आधे-अधूरे नाटक अलग विधा है। राजेंद्र यादव — 1929–2013 — संपादन, कहानी; सारा आकाश उपन्यास अलग; पति मन्नू भंडारी। कमलेश्वर — 1932–2007 — राजा निरबंसिया; बाद में समांतर कहानी। निर्मल वर्मा — 3 अप्रैल 1929, शिमला–25 अक्टूबर 2005 — परिंदे 1959 प्रायः नई कहानी का कला-चिह्न; मौन, यूरोप-स्पर्श, भीतर की रिक्तता। मन्नू भंडारी — 3 अप्रैल 1931, भानपुरा–15 नवंबर 2021 — अकेली निर्धारित इकाई 4; महाभोज उपन्यास अलग। नामवर सिंह कहानी नई कहानी में इस मोड़ को बाँधते हैं। यादव एक दुनिया समानांतर संकलन से स्वर जोड़ते हैं।

नई कहानी प्रेमचंद का निषेध पूरी तरह नहीं। वह आदर्श और केवल ग्राम-यथार्थ से मुड़ती है। अनुभव निजी हो सकता है, पर सामाजिक दबाव रहता है। शिल्प संकेत, फ्लैशबैक, अधूरा संवाद माँगता है। सीमा यह कि व्यक्ति कभी समाज से कटकर कमरे का चित्र रह जाता है। गुण यह कि हिन्दी कहानी को शहर और स्त्री-मन मिला। परिंदे कविता नहीं। सारा आकाश कहानी-संग्रह नहीं। अकेली महाभोज नहीं।

नामपहचान
राकेश, यादव, कमलेश्वरनई कहानी के तीन स्थिर केंद्र
निर्मल वर्मापरिंदे 1959; मौन-शिल्प
मन्नूस्त्री-स्वर; अकेली
नामवरकहानी नई कहानी — आलोचना

10 साठोत्तरी, समांतर, अकहानी

साठोत्तरी कहानी 1960 के बाद का मोड़ है। ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह जैसे नाम शहर, दफ्तर, विद्रोह और कटु यथार्थ लाते हैं। भाषा तेज होती है। आदर्श पतला पड़ता है। समांतर कहानी कमलेश्वर से जुड़ी चर्चा है — आम आदमी, सड़क, तंत्र, समाचार-गद्य का दबाव। अकहानी प्रयोग का सिरा है — घटना का निषेध, विखंडन, अर्थ का टूटना; गंगा प्रसाद विमल जैसे नाम प्रयोग-सिरा पर संकेत रहते हैं। ये तीनों नई कहानी के बाद की परतें हैं, उसकी जगह नहीं।

सोपान का अर्थ सीढ़ी है — प्रत्येक अगली को संभव बनाती है, स्वयं अंतिम नहीं। प्रेमचंद समाज देते हैं। नई कहानी व्यक्ति देती है। साठोत्तरी गुस्सा और कटुता देती है। समांतर भीड़ और तंत्र देता है। अकहानी रूप तोड़ती है। सीमा यह कि प्रयोग कभी कथा को खा जाता है। गुण यह कि कहानी एक चाल पर नहीं रुकती। अमरकांत इसी चौड़े समय में सादी भाषा से करुण-यथार्थ रखते हैं — ज़िंदगी और जोंक निर्धारित इकाई 4; वे अकहानी नहीं, यथार्थ की अगली साँस हैं।

11 स्त्री-स्वर, दलित और समकालीन

स्त्री-स्वर पूछता है कि नारी आलंबन है या वाचक। मन्नू अकेली में स्त्री-स्थिति खोलती हैं। राजी सेठ — पाठ्यक्रम-नाम राजे सेठ — जन्म 1935, नौशेरा छावनी; गलत होता पंचतंत्र निर्धारित इकाई 4। मालती जोशी — 4 जून 1934, औरंगाबाद — स्नेहबंध निर्धारित इकाई 5; परिवार और स्नेह का दबाव। मैत्रेयी पुष्पा — 1944 — फैसला निर्धारित; ग्रामीण स्त्री और निर्णय। कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग, ममता कालिया आगे की पंक्ति हैं। दलित कहानी अनुभव को गवाही बनाती है। ओमप्रकाश वाल्मीकि आत्मकथा जूठन से गद्य-प्रमाण देते हैं; कहानी भी लिखते हैं। रतनकुमार सांभरिया राजस्थान के दलित कथाकार हैं; फुलवा निर्धारित इकाई 5 — जाति और आत्मसम्मान। आदिवासी और हाशिए का स्वर समकालीन परत है।

यह परत इतिहास का अंतिम सोपान है, मूल्यांकन अभी चल रहा है। विमर्श तत्त्व नहीं बदलता; वाचक और आलंबन बदलता है। फुलवा तिलिस्म नहीं। स्नेहबंध नई कहानी का कमरा-मात्र नहीं। फैसला पंचायत-नाटक नहीं, कहानी है। सीमा यह कि विमर्श कभी कथा पर सवार हो जाता है। गुण यह कि जिनके नाम इतिहास में पतले थे, वे केंद्र आते हैं। निर्धारित तीन इकाई-5 नाम इसी परत के निर्धारित पाठ हैं।

नामकृतिप्रश्न
मन्नू भंडारीअकेलीस्त्री-स्थिति
राजे सेठगलत होता पंचतंत्रनीति और यथार्थ
मालती जोशीस्नेहबंधपरिवार, स्नेह
मैत्रेयी पुष्पाफैसलाग्रामीण स्त्री
सांभरियाफुलवाजाति, दलित अनुभव

12 प्रमुख कहानीकार — क्रम और संबंध

प्रमुख नाम एक पंक्ति में बाँधे जाते हैं। उद्भव — सप्रे, गुलेरी। यथार्थ — प्रेमचंद; साथ प्रसाद, कौशिक, सुदर्शन। मन और प्रगति — जैनेन्द्र, अज्ञेय, यशपाल, अश्क, साहनी, राघव। नई कहानी — राकेश, यादव, कमलेश्वर, निर्मल वर्मा, मन्नू। साठोत्तरी-समांतर — ज्ञानरंजन, अमरकांत का यथार्थ-सिरा। स्त्री-दलित — सेठ, जोशी, पुष्पा, सांभरिया। प्रत्येक नाम के साथ एक कृति और एक धारा लिखी जाती है। बिना वर्ष के इतिहास कमजोर है। बिना धारा के नाम कमजोर है।

संबंध निषेध और ग्रहण दोनों है। सप्रे आरंभ देते हैं, गुलेरी कला देते हैं। प्रेमचंद समाज देते हैं, प्रसाद आदर्श-काव्य देते हैं। जैनेन्द्र मन देते हैं, अज्ञेय व्यक्ति देते हैं। नई कहानी शहर देती है, दलित गवाही देती है। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं। नामवर नई कहानी बाँधते हैं। निर्धारित बारह कहानियाँ इसी पंक्ति के पाठ हैं; परिचय यहीं से उनके पाठ तक जाता है।

13 इकाई 1 का सार

इकाई 1 शास्त्र और इतिहास है। परिभाषा गद्य, संक्षेप और एक प्रभाव पर बैठती है। स्वरूप उपन्यास, नाटक और एकांकी से कटता है। तत्त्व छह हैं — कथावस्तु, चरित्र, संवाद, देशकाल, भाषा-शैली, उद्देश्य — साथ एक प्रभाव। शिल्प दृष्टि, संरचना, प्रतीक और अंत है। उद्भव सप्रे 1901 और गुलेरी 1915 से पहचाना जाता है। सोपान प्रेमचंद-यथार्थ, प्रेमचंदोत्तर मन-प्रगति, नई कहानी, साठोत्तरी-समांतर, फिर स्त्री-दलित हैं। प्रमुख नाम इन्हीं सोपानों से बँधे हैं। गोदान, त्यागपत्र, तमस, महाभोज उपन्यास हैं। अंधेर नगरी नाटक है। आकाशदीप कहानी है, स्कंदगुप्त नाटक है।

शास्त्र बिना इतिहास के सूखा रहता है। इतिहास बिना शास्त्र के नामों की सूची रह जाता है। निर्धारित कहानियों का प्रसंग आगे खुलता है; पहचान और स्थान यहीं बैठते हैं।

सार: सप्रे 1901। गुलेरी 1915, सरस्वती। प्रेमचंद 1880–1936। नई कहानी 1950 के दशक; परिंदे 1959। तत्त्व छह + एक प्रभाव। निर्धारित बारह कहानियाँ इकाइयाँ 2–5।

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