Practice
Exam answers notes
Readyपरीक्षा उत्तर
Exam answers is a topic in Hindi short story (Practice) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.
Written-style answers for Hindi short story at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.
Exam answers
1. कहानी की परिभाषा लिखिए।8 अंक
कहानी गद्य की संक्षिप्त कथा है। उसमें एक घटना या एक प्रभाव केंद्र रहता है। उपन्यास समय फैलाता है; कहानी एक बैठक में पूरी होती है। एडगर एलन पो एक प्रभाव माँगते हैं — एक चोट, कई स्वाद नहीं। नगेन्द्र उसे जीवन के एक खंड का कलात्मक चित्र कहते हैं। नामवर सिंह कसाव और नया अनुभव देखते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; कहानी उसी गद्य का छोटा कथा-सिरा है। रूप गद्य है। विस्तार संक्षिप्त है। केंद्र एक स्थिति, एक द्वंद्व, एक प्रभाव है।
परिभाषा तीन बिंदु माँगती है — गद्य, संक्षेप, एक प्रभाव। उद्देश्य मनोरंजन से आगे चित्रण और प्रश्न है। तिलिस्म कौतुक रहा। प्रेमचंद ने कहानी को समाज का प्रश्न बनाया। जैनेन्द्र ने मन का प्रश्न बनाया। नई कहानी ने व्यक्ति का अनुभव बनाया। गोदान ऋण फैलाता है; कफन एक रात पर सिमटता है। बिना उदाहरण के सूत्र सूखा रहता है। नाटक रंगमंच माँगता है; कहानी पढ़ी जाती है।
निष्कर्ष यह है कि कहानी गद्य का संक्षिप्त कथा-रूप है, जिसके केंद्र में एक प्रभाव और एक स्थिति हैं; विस्तार उपन्यास का काम है, दृश्य नाटक का।
2. कहानी और उपन्यास में अंतर लिखिए।8 अंक
कहानी और उपन्यास दोनों गद्य-कथा हैं, पर विन्यास अलग है। कहानी एक घटना या एक प्रभाव की संक्षिप्त कथा है। उपन्यास दीर्घ गद्य है; उसमें कई बिंदु जुड़ते हैं। कहानी के पात्र संकेत रह सकते हैं, द्वंद्व पूरा होता है। उपन्यास के पात्र बदलते हैं। देशकाल कहानी में एक स्थिति का दबाव है; उपन्यास में फैलाव है। गुलेरी की उसने कहा था वचन और स्मृति पर सिमटती है। प्रेमचंद का गोदान ऋण और किसान-जीवन को फैलाता है। कफन कहानी है, गोदान उपन्यास — यही अंतर स्थिर है।
अंतर केवल लंबाई का नहीं, प्रभाव की एकता का है। छोटी रचना भी बिखर सकती है; कुछ लंबी-सी कहानी भी एक चोट रख सकती है। साम्य दोनों का गद्य होना है। नाटक संवाद और दृश्य माँगता है; एकांकी खेला जाता है — ये अलग भेद हैं। यहाँ प्रश्न कहानी बनाम उपन्यास का है। फॉर्स्टर कथा को क्रम और कथानक को कारण कहते हैं; कहानी में कारण और भी सघन है। उपकथा एक प्रभाव तोड़ती है।
निष्कर्ष यह है कि कहानी एक प्रभाव है, उपन्यास जीवन का विस्तार है; अंतर पन्नों की गिनती भर का नहीं, विन्यास का है।
3. कहानी के स्वरूप का विवेचन कीजिए।20 अंक
स्वरूप पूछता है कि कहानी कौन-सा कथा-शरीर है। वह गद्य है, पद्यात्मक आख्यान नहीं। वह संक्षिप्त है; दीर्घ उपन्यास नहीं। वह एक प्रभाव रखती है — एक चोट, कई स्वाद नहीं। पश्चिम में एडगर एलन पो एक प्रभाव और एक बैठक की माँग करते हैं। हिन्दी में नगेन्द्र उसे जीवन के एक खंड का कलात्मक चित्र कहते हैं। नामवर सिंह कसाव और नया अनुभव देखते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल गद्य के आविर्भाव को आधुनिक काल का चिह्न कहते हैं; कहानी उसी गद्य का छोटा कथा-सिरा है। महाकाव्य पद्य और उदात्त नायक का रूप है — साकेत, कामायनी। नाटक रंगमंच माँगता है। उपन्यास समय फैलाता है। कहानी साधारण मनुष्य को एक स्थिति के भीतर रखती है। गोदान ऋण को फैलाता है। कफन एक रात पर सिमटता है।
उपभेद स्वरूप को काटते नहीं, खोलते हैं। सामाजिक कहानी समाज का प्रश्न है — प्रेमचंद की ईदगाह, कफन। ऐतिहासिक स्मृति को वर्तमान से पढ़ती है — गुलेरी का युद्ध-स्पर्श और वचन। मनोवैज्ञानिक भीतर का निर्णय है — जैनेन्द्र की पाजेब। व्यंग्य दिखावा काटता है — भीष्म साहनी की चीफ की दावत। दलित अनुभव गवाही है — रतनकुमार सांभरिया की फुलवा। स्त्री-स्वर नारी को आलंबन से वाचक तक ले जाता है — मन्नू भंडारी की अकेली, मैत्रेयी पुष्पा का फैसला। एक कृति दो जातियाँ छू सकती है। गदल जाति और प्रेम दोनों छूती है। चीफ की दावत मध्यवर्ग और दिखावे दोनों की है।
एकांकी स्वरूप का दृश्य-भेद है, कहानी का पर्याय नहीं। एकांकी खेली जाती है। कहानी पढ़ी जाती है। अंधेर नगरी खेली जाती है। उसने कहा था पढ़ी जाती है। आकाशदीप कहानी है, स्कंदगुप्त नाटक है; वर्ष दोनों ओर 1928 का स्पर्श है, विधा अलग है। वाचक स्वरूप का अंग है। सर्वज्ञ वाचक सब मन पढ़ता है — प्रेमचंद प्रायः यहीं हैं। उत्तम पुरुष मैं-कथन है। सीमित दृष्टि एक पात्र के साथ चलती है — नई कहानी के निकट। मौन और संकेत निर्मल वर्मा का मार्ग है। परीक्षा तीन प्रश्नों से स्वरूप नापती है। कथा कितनी सिमटती है। प्रभाव एक है या कई। वाचक वर्णन करता है या केवल संकेत देता है।
सीमा दो हैं। पहला — स्वरूप की सूची उपभेदों में खो जाती है, परिभाषा छूट जाती है। दूसरा — पश्चिमी short story का साँचा हिन्दी के ग्राम और जाति-प्रश्न पर ज्यों का त्यों नहीं बैठता। गुण यह है कि स्वरूप कहानी को उपन्यास, नाटक और एकांकी से बचाता है। नामवर कसाव से स्वरूप को बाँधते हैं। निर्धारित बारह कहानियाँ इकाइयाँ 2 से 5 तक इसी स्वरूप के पाठ हैं। गोदान, त्यागपत्र, तमस, महाभोज उपन्यास हैं, कहानी-स्वरूप नहीं। बिना परिभाषा के इतिहास नामों की सूची रह जाता है। बिना इतिहास के स्वरूप सूखा रहता है।
निष्कर्ष यह है कि कहानी का स्वरूप गद्य, संक्षेप, एक प्रभाव और एक स्थिति है; उपभेद सामाजिक से दलित-स्त्री तक उसी स्वरूप के भेद हैं, उपन्यास या नाटक के पर्याय नहीं।
4. कहानी के तत्त्व लिखिए।8 अंक
कहानी के छह तत्त्व स्थिर माने जाते हैं। कथावस्तु घटना और कारण है; आरंभ स्थिति खोलता है, मध्य द्वंद्व बढ़ाता है, अंत चोट देता है। चरित्र वह मनुष्य है जो स्थिति को अर्थ देता है; पात्र कम होते हैं। संवाद वाणी है, नाटक जितना प्रधान नहीं। देशकाल देश, समय और वातावरण है — पृष्ठ नहीं, दबाव है। भाषा-शैली कथन का ढंग है। उद्देश्य चित्रण और प्रश्न है; कहानी उपदेश-पुस्तिका नहीं। साथ एक प्रभाव अनिवार्य है — एक चोट, कई स्वाद नहीं।
तत्त्व सामग्री हैं, शिल्प विन्यास है। प्रेमचंद में कथावस्तु सामाजिक कारण से बँधती है — ऋण, भूख, मर्यादा। जैनेन्द्र में चरित्र भीतर के निर्णय से खुलता है। नई कहानी में भाषा संकेत से चलती है। पूस की रात ठंड का देशकाल है। एक तत्त्व लिखकर छूट जाना अधूरा उत्तर है। पो एक प्रभाव माँगते हैं। शुक्ल उद्देश्य को जीवन की आलोचना से जोड़ते हैं। नामवर कसाव कहते हैं — तत्त्वों को एक दिशा वही देता है।
निष्कर्ष यह है कि कहानी के तत्त्व कथावस्तु, चरित्र, संवाद, देशकाल, भाषा-शैली और उद्देश्य हैं; एक प्रभाव उन्हें बाँधता है, केवल सूची नहीं।
5. कहानी के तत्त्व और शिल्प का विवेचन कीजिए।20 अंक
तत्त्व सामग्री हैं। शिल्प उन्हें बाँधने का ढंग है। छह तत्त्व स्थिर हैं — कथावस्तु, चरित्र, संवाद, देशकाल, भाषा-शैली, उद्देश्य — साथ एक प्रभाव अनिवार्य है। कथावस्तु घटना-क्रम है। कहानी में वह पतली और कसी होती है। आरंभ स्थिति खोलता है। मध्य द्वंद्व बढ़ाता है। अंत निर्णय या चोट देता है। फॉर्स्टर कथा को क्रम और कथानक को कारण कहते हैं; कहानी में कारण और भी सघन है। संयोग का बोझ दोष है। उपकथा एक प्रभाव तोड़ती है। प्रेमचंद की कथावस्तु सामाजिक कारण से बँधी है — ऋण, भूख, मर्यादा। जैनेन्द्र की कथावस्तु भीतर के निर्णय पर मुड़ती है। नई कहानी अनुभव के एक टुकड़े पर टिकती है। कफन में कारण भूख है। उसने कहा था में कारण वचन है।
चरित्र वह मनुष्य है जो स्थिति को अर्थ देता है। कहानी में पात्र कम हैं। सपाट चरित्र एक गुण पर टिकता है। गोल चरित्र छोटे विस्तार में भी द्वंद्व रखता है। प्रेमचंद के हामिद, घीसू-मधू सामाजिक दबाव में बनते हैं। प्रसाद के चंपा जैसे पात्र आदर्श और त्याग छूते हैं। नई कहानी का व्यक्ति अधूरा, शहरी, अकेला हो सकता है। संवाद अंग है, नाटक जितना प्रधान नहीं। प्रेमचंद का संवाद बोलचाल का है। जैनेन्द्र का संवाद विचार का है। निर्मल वर्मा का संवाद अधूरा और मौन का है। देशकाल पृष्ठ नहीं, दबाव है। पूस की रात ठंड का देशकाल है। चीफ की दावत दिखावे का देशकाल है। गदल जाति-गाँव का देशकाल है।
भाषा शैली है — सरल खड़ी बोली, संस्कृत-गर्भित, आंचलिक शब्द, व्यंग्य, मौन। प्रेमचंद बोलचाल रखते हैं। प्रसाद काव्य-गद्य छूते हैं। अज्ञेय और वर्मा संकेत रखते हैं। अमरकांत सादी भाषा में करुण-यथार्थ रखते हैं। उद्देश्य नैतिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक या कलात्मक हो सकता है। शुक्ल उद्देश्य को जीवन की आलोचना से जोड़ते हैं। कहानी उपदेश-पुस्तिका नहीं। उद्देश्य चित्र से निकलता है, नारे से नहीं। शिल्प दृष्टि से खुलता है। सर्वज्ञ वाचक सब मन पढ़ता है। उत्तम पुरुष मैं-कथन है। सीमित दृष्टि एक पात्र के साथ चलती है। प्रतीक दीपक, दावत, जोंक, फुलवा शीर्षक में बैठ सकते हैं। संरचना आरंभ-मध्य-अंत है। अंत चोटदार या खुला हो सकता है।
संबंध यह है कि तत्त्व बिना शिल्प के ढेर हैं, शिल्प बिना तत्त्व के खाली प्रयोग है। प्रेमचंद तत्त्व भरते हैं, दृष्टि सरल रखते हैं। अज्ञेय और वर्मा शिल्प तेज करते हैं। अमरकांत भाषा को सादा रखते हैं। नामवर कसाव पर बोलते हैं। पो एक प्रभाव माँगते हैं — एक रस, एक आघात, एक प्रश्न। कई उपदेश कहानी को उपन्यास की कटी पूँछ बना देते हैं। सीमा शिल्प का कथा पर सवार होना है। गुण यह कि छह तत्त्व और एक प्रभाव परीक्षा की पूरी सूची बनते हैं। एक तत्त्व लिखकर छूट जाना अधूरा उत्तर है। नाम, उदाहरण और एक सीमा — तीनों के बिना तत्त्व-उत्तर गिनती रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि तत्त्व छह हैं, एक प्रभाव उन्हें काटता है, और शिल्प दृष्टि-संरचना-अंत है; दोनों मिलकर कहानी पूरी होती है, अकेले सूची या अकेले प्रयोग नहीं।
6. हिन्दी कहानी के उद्भव पर प्रकाश डालिए।8 अंक
हिन्दी कहानी का उद्भव बीसवीं शताब्दी के आरंभ में है। पृष्ठभूमि प्रेस, शिक्षा, सरस्वती, बंगला-अंग्रेज़ी गल्प और नवजागरण है। माधवराव सप्रे — 1871–1926 — की एक टोकरी भर मिट्टी 1901 प्रायः प्रथम हिन्दी कहानी मानी जाती है। विषय ज़मीन, कर और निर्धन किसान है। भाषा खड़ी बोली गद्य है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी — 1883 जयपुर, निधन 1922 काशी — की उसने कहा था जून 1915 सरस्वती में छपी। आलोचना उसे पहली पूर्ण कलात्मक आधुनिक कहानी कहती है — वचन, युद्ध-स्मृति, कसाव। इंशा अल्ला खाँ की रानी केतकी की कहानी गद्य-कथा है, पूरा आधुनिक रूप नहीं।
उद्भव एक तिथि नहीं। अर्थ यह है कि हिन्दी गद्य ने संक्षिप्त कला-कथा अपनाई। भारतेंदु युग नाटक-निबंध में अधिक शक्ति रखता है; कहानी अभी रूप सीख रही है। द्विवेदी युग सरस्वती से भाषा-शुद्धि और पाठक देता है। सहमति दो सिरों पर है — सप्रे 1901 आरंभ, गुलेरी 1915 कला। राजेंद्र यादव आरंभ का बड़ा नाम गुलेरी पर देखते हैं। बिना सहमति के विवाद अधूरा रहता है।
निष्कर्ष यह है कि उद्भव 1901 सप्रे से पहचाना जाता है और 1915 गुलेरी का कला-विवाद साथ लिखा जाता है; इंशा का गद्य पूरा आधुनिक रूप नहीं।
7. हिन्दी कहानी के उद्भव और विकास का विवेचन कीजिए।20 अंक
हिन्दी कहानी का उद्भव बीसवीं शताब्दी के आरंभ में है। पृष्ठभूमि प्रेस, शिक्षा, सरस्वती जैसी पत्रिकाएँ, बंगला-अंग्रेज़ी गल्प और नवजागरण है। माधवराव सप्रे — 1871–1926 — की एक टोकरी भर मिट्टी 1901 प्रायः प्रथम हिन्दी कहानी मानी जाती है। विषय ज़मीन, कर और निर्धन किसान है। भाषा खड़ी बोली गद्य है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी — 7 जुलाई 1883, जयपुर; निधन 1922, काशी — की उसने कहा था जून 1915 सरस्वती में छपी। आलोचना उसे पहली पूर्ण कलात्मक आधुनिक कहानी कहती है — वचन, युद्ध-स्मृति, कसाव। राजेंद्र यादव आरंभ का बड़ा नाम यहीं देखते हैं। इंशा अल्ला खाँ की रानी केतकी की कहानी गद्य-कथा है, आधुनिक कहानी का पूरा रूप नहीं। भारतेंदु युग नाटक और निबंध में अधिक शक्ति रखता है; कहानी अभी सीख रही है। द्विवेदी युग सरस्वती से भाषा-शुद्धि और पाठक देता है।
दूसरा सोपान प्रेमचंद युग है। धनपत राय प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880, लमही, वाराणसी; निधन 8 अक्टूबर 1936। नमक का दारोगा, पंच परमेश्वर, ईदगाह, पूस की रात, कफन, बड़े घर की बेटी, शतरंज के खिलाड़ी परीक्षा के स्थिर संकेत हैं। दृष्टि यथार्थ है। भाषा खड़ी बोली बोलचाल की है। नायक किसान, बालक, स्त्री, निर्धन कर्मचारी हो सकता है। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। जयशंकर प्रसाद — 30 जनवरी 1889–15 जनवरी 1937, काशी — आकाशदीप जैसी कहानी में आदर्श, त्याग और काव्य-गद्य रखते हैं। विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक, सुदर्शन साथ की पंक्ति हैं। गोदान और रंगभूमि उपन्यास हैं, यह पत्र नहीं। कहानी-संग्रह मानसरोवर की चर्चा इतिहास में आती है।
तीसरा सोपान प्रेमचंदोत्तर है। जैनेन्द्र कुमार — 1905, कौड़ियागंज–1988 — पाजेब 1942। अज्ञेय — 1911–1987 — शरणदाता। यशपाल 1903–1976 प्रगतिशील स्वर। अश्क 1910–1996 मध्यवर्ग। भीष्म साहनी — 1915 रावलपिंडी–2003 — चीफ की दावत। रांगेय राघव — 1923 आगरा–1962 — गदल। मन, व्यक्ति, जाति, व्यंग्य खुलते हैं। त्यागपत्र, शेखर एक जीवनी, तमस, मुर्दों का टीला उपन्यास हैं, यह विकास कहानी का है। चौथा नई कहानी है — स्वतंत्रता के बाद, विशेषकर 1950 का दशक। मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, कमलेश्वर, निर्मल वर्मा का परिंदे 1959, मन्नू भंडारी। नामवर सिंह कहानी नई कहानी में इस मोड़ को बाँधते हैं।
पाँचवाँ साठोत्तरी, समांतर और स्त्री-दलित है। ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह शहर और कटु यथार्थ लाते हैं। समांतर कहानी कमलेश्वर से जुड़ी चर्चा है — आम आदमी, तंत्र, समाचार-गद्य। अकहानी प्रयोग का सिरा है — गंगा प्रसाद विमल जैसे नाम संकेत रहते हैं। अमरकांत सादी भाषा से करुण-यथार्थ रखते हैं — ज़िंदगी और जोंक। राजे सेठ गलत होता पंचतंत्र, मालती जोशी स्नेहबंध, मैत्रेयी पुष्पा फैसला, सांभरिया फुलवा। विकास निषेध और ग्रहण दोनों है। सप्रे आरंभ देते हैं। गुलेरी कला देते हैं। प्रेमचंद यथार्थ देते हैं। नई कहानी व्यक्ति देती है। दलित गवाही देती है। सीमा यह कि हर सोपान को केवल एक नाम से बाँधना अधूरा है। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं।
निष्कर्ष यह है कि उद्भव सप्रे 1901 और गुलेरी 1915 है और विकास प्रेमचंद-यथार्थ, मन-प्रगति, नई कहानी और समकालीन स्त्री-दलित के सोपानों से पहचाना जाता है।
8. प्रेमचंद युग की कहानी का महत्त्व लिखिए।8 अंक
प्रेमचंद युग हिन्दी कहानी का केंद्र-सोपान है। धनपत राय प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880, लमही, वाराणसी; निधन 8 अक्टूबर 1936। नमक का दारोगा, पंच परमेश्वर, ईदगाह, पूस की रात, कफन, बड़े घर की बेटी, शतरंज के खिलाड़ी परीक्षा के स्थिर संकेत हैं। दृष्टि यथार्थ है। भाषा खड़ी बोली बोलचाल की है। नायक किसान, बालक, स्त्री, निर्धन कर्मचारी हो सकता है। आदर्श अंत में कभी झलकता है; चित्र कठोर है। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। कहानी-संग्रह मानसरोवर इतिहास में आता है। गोदान और रंगभूमि उपन्यास हैं, यह युग-महत्त्व कहानी का है।
युग का अर्थ केवल एक लेखक नहीं। जयशंकर प्रसाद आकाशदीप जैसी कहानी में आदर्श, त्याग और काव्य-गद्य रखते हैं — साथ की शाखा, यथार्थ नहीं। विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक और सुदर्शन सामाजिक पंक्ति हैं। महत्त्व यह है कि कहानी तिलिस्म से समाज की ओर मुड़ी। हिन्दी कहानी को किसान, मेला, ठंड और मर्यादा यहीं मिले। सीमा आदर्श का बोझ है। गुण यह कि साधारण मनुष्य केंद्र बैठा। बिना प्रेमचंद के इतिहास अधूरा है।
निष्कर्ष यह है कि प्रेमचंद युग का महत्त्व यथार्थ, साधारण मनुष्य और खड़ी बोली से है; कफन और ईदगाह उसके शिखर-संकेत हैं, उपन्यास-शिखर नहीं।
9. नई कहानी किसे कहते हैं?8 अंक
नई कहानी स्वतंत्रता के बाद, विशेषकर 1950 के दशक का वह मोड़ है जिसमें व्यक्ति, शहर, दांपत्य, अकेलापन और नए शिल्प केंद्र बनते हैं। मोहन राकेश, राजेंद्र यादव और कमलेश्वर तीन स्थिर नाम हैं। निर्मल वर्मा का परिंदे 1959 प्रायः कला-टिक कहा जाता है — मौन, यूरोप-स्पर्श, भीतर की रिक्तता। मन्नू भंडारी स्त्री-स्वर जोड़ती हैं; अकेली उसी परत का निर्धारित पाठ है। नामवर सिंह कहानी नई कहानी में इस मोड़ को बाँधते हैं। यादव एक दुनिया समानांतर संकलन से स्वर जोड़ते हैं। प्रेमचंद का ग्राम-यथार्थ यहाँ केवल आलंबन नहीं रहता; अनुभव निजी और शहरी भी होता है।
शिल्प संकेत, फ्लैशबैक, अधूरा संवाद और मौन माँगता है। नई कहानी प्रेमचंद का पूरा निषेध नहीं; वह आदर्श और केवल ग्राम-यथार्थ से मुड़ती है। सीमा यह कि व्यक्ति कभी समाज से कटकर कमरे का चित्र रह जाता है। गुण यह कि हिन्दी कहानी को शहर और स्त्री-मन मिला। परिंदे कविता नहीं। आधे-अधूरे नाटक है, नई कहानी का पर्याय नहीं। सारा आकाश यादव का उपन्यास है। अकेली महाभोज नहीं।
निष्कर्ष यह है कि नई कहानी व्यक्ति और शिल्प से पहचानी जाती है; प्रतिनिधि राकेश-यादव-कमलेश्वर-वर्मा हैं, नाटक या उपन्यास उसके पर्याय नहीं।
10. हिन्दी कहानी के प्रमुख सोपान लिखिए।20 अंक
सोपान विकास की सीढ़ियाँ हैं। प्रत्येक अगली को संभव बनाती है, स्वयं अंतिम नहीं। पहला सोपान उद्भव है। माधवराव सप्रे की एक टोकरी भर मिट्टी 1901 आरंभ का टिक-नाम है — ज़मीन, कर, खड़ी बोली। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की उसने कहा था जून 1915, सरस्वती, कला का टिक-नाम है — वचन, पूर्वदीप्ति, कसाव। पृष्ठभूमि प्रेस, शिक्षा, सरस्वती, बंगला-अंग्रेज़ी गल्प और नवजागरण है। द्विवेदी युग भाषा-शुद्धि और पाठक जोड़ता है। भारतेंदु युग नाटक-निबंध में अधिक शक्ति रखता है; कहानी अभी रूप सीख रही है। इंशा की रानी केतकी की कहानी गद्य-कथा है, पूरा आधुनिक रूप नहीं। सहमति दो सिरों पर है — सप्रे आरंभ, गुलेरी कला।
दूसरा सोपान प्रेमचंद युग है। यही हिन्दी कहानी का केंद्र-सोपान है। ईदगाह से कफन तक यथार्थ। किसान, बालक, भूख, मर्यादा। खड़ी बोली बोलचाल की। दृष्टि यथार्थ है; आदर्श कभी चित्र के साथ रहता है। प्रेमचंद 1880–1936, लमही। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। प्रसाद आदर्श-शाखा हैं — आकाशदीप 1928, काव्य-गद्य, त्याग। कौशिक और सुदर्शन साथ की पंक्ति हैं। गोदान उपन्यास है, यह सोपान कहानी का है। गुण यह कि हिन्दी कहानी को किसान, मेला, ठंड और मर्यादा मिले। सीमा आदर्श का बोझ है। बिना प्रेमचंद के इतिहास अधूरा है।
तीसरा प्रेमचंदोत्तर मन और प्रगति है। यह प्रेमचंद का निषेध नहीं, उसकी अगली परत है। जैनेन्द्र पाजेब 1942, भीतर का निर्णय। अज्ञेय शरणदाता, व्यक्ति और नैतिक द्वंद्व। यशपाल प्रगति। अश्क मध्यवर्ग। साहनी चीफ की दावत, दिखावे पर व्यंग्य। राघव गदल, जाति-बिरादरी। साम्य खड़ी बोली और आधुनिक मनुष्य है। वैषम्य आलंबन पर है — खेत, मन, जाति, दावत। त्यागपत्र, तमस, मुर्दों का टीला उपन्यास हैं, यह सोपान कहानी का है। सीमा यह कि मनोविज्ञान कभी समाज से कट जाता है। गुण यह कि चरित्र गोल होता है।
चौथा नई कहानी है — 1950 का दशक। केंद्र व्यक्ति, शहर, दांपत्य, अकेलापन और नए शिल्प हैं। राकेश, यादव, कमलेश्वर तीन स्थिर केंद्र। निर्मल वर्मा का परिंदे 1959 कला-टिक; मौन, यूरोप-स्पर्श, भीतर की रिक्तता। मन्नू स्त्री-स्वर, अकेली। नामवर कहानी नई कहानी में बाँधते हैं। यादव एक दुनिया समानांतर से स्वर जोड़ते हैं। पाँचवाँ साठोत्तरी, समांतर, अकहानी और स्त्री-दलित है। ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह गुस्सा और कटुता। कमलेश्वर समांतर — भीड़ और तंत्र। गंगा प्रसाद विमल अकहानी के संकेत हैं। अमरकांत ज़िंदगी और जोंक यथार्थ की अगली साँस हैं, अकहानी नहीं। सेठ, जोशी, पुष्पा, सांभरिया फुलवा। परिंदे कविता नहीं। सारा आकाश कहानी-संग्रह नहीं। अकेली महाभोज नहीं। सीमा यह कि प्रयोग कभी कथा को खा जाता है। गुण यह कि कहानी एक चाल पर नहीं रुकती।
निष्कर्ष यह है कि प्रमुख सोपान उद्भव, प्रेमचंद-यथार्थ, प्रेमचंदोत्तर मन-प्रगति, नई कहानी, फिर समकालीन स्त्री-दलित हैं; प्रत्येक अगला पिछले का निषेध और ग्रहण दोनों है।
11. प्रमुख हिन्दी कहानीकारों का परिचय दीजिए।20 अंक
प्रमुख नाम एक पंक्ति में बाँधे जाते हैं। उद्भव के कहानीकार माधवराव सप्रे और चंद्रधर शर्मा गुलेरी हैं। एक टोकरी भर मिट्टी 1901, उसने कहा था जून 1915 सरस्वती। सप्रे 1871–1926; विषय ज़मीन और कर। गुलेरी 1883 जयपुर–1922 काशी; संस्कृत-प्राकृत-पालि के विद्वान्; सुखमय जीवन और बुद्ध का काँटा अन्य कहानियाँ हैं, निर्धारित उसने कहा था है। आलोचना गुलेरी को पहली पूर्ण कलात्मक आधुनिक कहानी का लेखक कहती है। राजेंद्र यादव आरंभ का बड़ा नाम यहीं देखते हैं। काम संक्षिप्त गद्य-कथा को खड़ी बोली में बैठाना है। बिना वर्ष के इतिहास कमजोर है। बिना धारा के नाम कमजोर है।
यथार्थ के केंद्र-नाम प्रेमचंद हैं — 31 जुलाई 1880, लमही; 8 अक्टूबर 1936। ईदगाह, कफन, पूस की रात, नमक का दारोगा, पंच परमेश्वर। दृष्टि यथार्थ, करुण। भाषा बोलचाल। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष। साथ प्रसाद 1889–1937, काशी — आकाशदीप आदर्श और काव्य-गद्य। कौशिक और सुदर्शन सामाजिक पंक्ति। गोदान उपन्यासकार का शिखर है, कहानी-पत्र का पाठ नहीं। मानसरोवर संग्रह इतिहास में आता है। सामाजिक और आदर्श दो शाखाएँ यहीं से फूटती हैं। बिना प्रेमचंद के परिचय अधूरा है।
मन और प्रगति के नाम जैनेन्द्र, अज्ञेय, यशपाल, अश्क, साहनी, राघव हैं। जैनेन्द्र 1905 कौड़ियागंज–1988, पाजेब 1942; पद्म भूषण 1971; त्यागपत्र उपन्यास अलग। अज्ञेय 1911 कसया–1987, शरणदाता; शेखर एक जीवनी और नदी के द्वीप उपन्यास अलग। यशपाल 1903–1976 प्रगति; दिव्या उपन्यास अलग। अश्क 1910–1996 मध्यवर्ग; एकांकी अलग पत्र है। साहनी 1915 रावलपिंडी–2003 दिल्ली, चीफ की दावत 1956; तमस और कबीरा खड़ा बाजार में अलग। राघव 1923 आगरा–1962, मूल नाम तिरूमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य, गदल 1955; मुर्दों का टीला उपन्यास अलग। व्यक्ति, नैतिक द्वंद्व, मध्यवर्ग, जाति यहीं खुलते हैं।
नई कहानी और समकालीन के नाम राकेश 1925–1972, यादव 1929–2013, कमलेश्वर 1932–2007, निर्मल वर्मा 1929 शिमला–2005 परिंदे 1959, मन्नू 1931 भानपुरा–2021 अकेली हैं। आधे-अधूरे नाटक अलग पत्र है। सारा आकाश यादव का उपन्यास है। महाभोज मन्नू का उपन्यास है। साठोत्तरी-समांतर में ज्ञानरंजन, अमरकांत 1925 बलिया–2014 इलाहाबाद ज़िंदगी और जोंक। स्त्री-दलित — सेठ 1935 नौशेरा गलत होता पंचतंत्र, जोशी 1934 औरंगाबाद स्नेहबंध, पुष्पा 1944 फैसला, सांभरिया फुलवा हंस मई 1997। निर्धारित बारह लेखक-पाठ इसी परिचय की रीढ़ हैं। प्रत्येक के साथ कृति और धारा बिना लिखे परिचय अधूरा है। संबंध निषेध और ग्रहण दोनों है। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं। नामवर नई कहानी बाँधते हैं। कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग, ममता कालिया आगे की पंक्ति हैं, निर्धारित पाठ नहीं।
निष्कर्ष यह है कि प्रमुख कहानीकार सप्रे से सांभरिया तक सोपान के साथ पहचाने जाते हैं; केंद्र प्रेमचंद हैं, आगे मन, नई कहानी और स्त्री-दलित के नाम कृति सहित लिखे जाते हैं।
12. एक प्रभाव से क्या आशय है?8 अंक
एक प्रभाव एडगर एलन पो का सूत्र है। आशय यह है कि कहानी एक चोट, एक रस, एक प्रश्न छोड़े। कई उपकथाएँ और कई उपदेश कहानी को उपन्यास की कटी पूँछ बना देते हैं। कसाव तत्त्वों को एक दिशा देता है। नामवर सिंह उसी कसाव को हिन्दी आलोचना में बाँधते हैं। उपन्यास कई प्रभाव जोड़ सकता है; कहानी एक माँगती है। उसने कहा था वचन की चोट है। ईदगाह बाल-मन की चोट है। परिंदे अकेलेपन की चोट है। फुलवा जाति की चोट है। चार उदाहरण चार स्वाद नहीं, एक-एक पाठ की एक-एक चोट हैं।
आशय लंबाई का नहीं, विन्यास का है। छोटी कहानी भी बिखर सकती है। दीर्घ-सी कहानी भी एक प्रभाव रख सकती है। संयोग का बोझ और उपकथा का फैलाव दोष हैं। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कहानी में कारण और भी सघन है। तत्त्व छह हों, दिशा एक हो। बिना प्रभाव के चरित्र और संवाद ढेर रह जाते हैं। परीक्षा में सूत्र के साथ एक उदाहरण और एक सीमा लिखनी होती है।
निष्कर्ष यह है कि एक प्रभाव कहानी का प्राण-सूत्र है; बिना उसके तत्त्व सामग्री रह जाते हैं, कथा नहीं बनती।
13. प्रेमचंद और नई कहानी का साम्य-वैषम्य लिखिए।20 अंक
प्रेमचंद युग यथार्थ, किसान, बालक और खड़ी बोली का है। धनपत राय 1880–1936, लमही। ईदगाह, पूस की रात, कफन, नमक का दारोगा, पंच परमेश्वर सामाजिक प्रश्न प्रधान हैं। वाचक प्रायः सर्वज्ञ है। आदर्श कभी चित्र के साथ रहता है। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली है। नायक किसान, बालक, स्त्री, निर्धन कर्मचारी हो सकता है। नई कहानी स्वतंत्रता के बाद, विशेषकर 1950 के दशक का मोड़ है। मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, कमलेश्वर स्थिर केंद्र हैं। निर्मल वर्मा का परिंदे 1959 कला-टिक कहा जाता है — मौन, यूरोप-स्पर्श, भीतर की रिक्तता। मन्नू भंडारी स्त्री-स्वर जोड़ती हैं, अकेली निर्धारित पाठ है। नामवर सिंह कहानी नई कहानी में इसे बाँधते हैं। यादव एक दुनिया समानांतर से स्वर जोड़ते हैं।
साम्य आधुनिक मनुष्य, खड़ी बोली और कहानी को जीवन का माध्यम मानना है। दोनों तिलिस्म से कटते हैं। दोनों साधारण नायक रख सकते हैं। कफन का घीसू और अकेली की सोमा दोनों दबाव में हैं, मार्ग अलग हैं। ईदगाह का मेला सामाजिक है; चीफ की दावत का दिखावा भी सामाजिक है, परत नई है। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; दोनों सोपान उसी चिह्न की चालें हैं। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रेमचंद की चोट भूख-मर्यादा है, नई कहानी की चोट अकेलापन-दांपत्य हो सकती है। अमरकांत सादी भाषा से यथार्थ वापस लाते हैं, पर प्रेमचंद का युग नहीं दोहराते। दोनों में उद्देश्य चित्र से निकलता है, नारे से नहीं।
वैषम्य आलंबन और दृष्टि पर है। प्रेमचंद बाहर का समाज और कारण दिखाते हैं — ऋण, ठंड, मेला, लाश। नई कहानी भीतर का अनुभव और संकेत दिखाती है — शहर, दांपत्य, रिक्तता। वर्मा मौन रखते हैं। प्रेमचंद वर्णन रखते हैं। शिल्प प्रेमचंद में सरल सर्वज्ञ है; बाद में दृष्टि, फ्लैशबैक, अधूरा संवाद तेज होते हैं। ग्राम बनाम शहर एक सुविधा है, पूरी सचाई नहीं — प्रेमचंद नगर भी लिखते हैं; नई कहानी गाँव भी छूती है, मन्नू की अकेली गाँव-बुआ पर है। आधे-अधूरे नाटक है, नई कहानी का पर्याय नहीं। परिंदे कविता नहीं। सारा आकाश उपन्यास है। गोदान उपन्यास है, प्रेमचंद-युग की कहानी नहीं।
सीमा दोनों ओर है। प्रेमचंद पर आदर्श और उपदेश का आक्षेप है। नई कहानी पर समाज-कटान या शिल्प-बोझ का आक्षेप है — व्यक्ति कभी कमरे का चित्र रह जाता है। गुण प्रेमचंद का यह कि हिन्दी कहानी को किसान और करुण-यथार्थ मिला। गुण नई कहानी का यह कि शहर और स्त्री-मन मिला। मूल्यांकन एक को रद्द करके नहीं होता; दोनों सोपान हैं। प्रेमचंदोत्तर जैनेन्द्र-अज्ञेय मन देते हैं, फिर नई कहानी व्यक्ति को शहर में खड़ा करती है। निर्धारित अकेली नई कहानी की स्त्री-परत है; कफन प्रेमचंद का शिखर-संकेत है। बिना साम्य के वैषम्य शत्रुता लगती है। बिना वैषम्य के साम्य एक युग रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि साम्य आधुनिक गद्य-कथा और साधारण मनुष्य पर है, वैषम्य समाज-वर्णन बनाम व्यक्ति-शिल्प पर है; प्रेमचंद केंद्र हैं, नई कहानी उसकी अगली परत है।
14. उसने कहा था का नामकरण स्पष्ट कीजिए।8 अंक
उसने कहा था चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी है, जून 1915, सरस्वती। शीर्षक वचन है, व्यक्ति-नाम नहीं। प्रसंग अमृतसर के बचपन से खुलता है। लहना सिंह लगभग बारह वर्ष का है। सहेली बाद में विवाह सूबेदार बोधा सिंह से करती है। जाने से पहले वचन लेती है — पति संकट में हो तो उसे बचाना। नाम कहानी में प्रायः नहीं रहता; सर्वनाम शीर्षक चलता है। अर्थ यह है कि वचन व्यक्ति से बड़ा हो जाता है। भाव यह है कि प्रेम अधिकार नहीं, रक्षा है। लहना रखता है। पलटन उसे प्रथम विश्वयुद्ध के फ्रांस ले जाती है।
रूप कहानी है। शिल्प पूर्वदीप्ति है — वर्तमान युद्ध से स्मृति खुलती है, फिर युद्ध पर लौटती है। पाँच खंड कथा बाँधते हैं। एक प्रभाव त्याग की चोट है। सहेली आलंबन है; कर्म लहना का है। 1960 की फिल्म पाठ नहीं। सुखमय जीवन और बुद्ध का काँटा अन्य कहानियाँ हैं। एक टोकरी भर मिट्टी सप्रे 1901 की है, यह नहीं।
निष्कर्ष यह है कि नामकरण सहेली के वचन से है; कृति 1915 की सरस्वती-कहानी है, फिल्म या सप्रे की मिट्टी-कथा नहीं।
15. चंद्रधर शर्मा गुलेरी का परिचय लिखिए।8 अंक
चंद्रधर शर्मा गुलेरी का जन्म 7 जुलाई 1883, जयपुर। निधन 1922, काशी। संस्कृत, प्राकृत और पालि के विद्वान्। कहानियाँ कम हैं — सुखमय जीवन 1911, बुद्ध का काँटा 1911, उसने कहा था जून 1915 सरस्वती। निर्धारित एक ही है। आलोचना उन्हें हिन्दी की पहली पूर्ण कलात्मक आधुनिक कहानी का लेखक कहती है। राजेंद्र यादव इसी पाठ को हिन्दी कहानी का बड़ा आरंभ मानते हैं। सप्रे 1901 आरंभ-टिक हैं; कला यहीं स्थिर होती है। भाषा खड़ी बोली है, पंजाबी-स्वाद और युद्ध-गद्य मिला है। दृष्टि वचन, स्मृति और त्याग की है।
प्रेमचंद समाज फैलाते हैं; गुलेरी एक वचन सिमटाते हैं। नायक लहना सिंह है। शिल्प पूर्वदीप्ति और पाँच खंड हैं। देशकाल दो — अमृतसर का बचपन, फ्रांस का मोर्चा। सीमा यह कि कहानियाँ थोड़ी हैं, पूरा युग नहीं चलाया। गुण यह कि एक पाठ से रूप बैठ गया। 1960 की फिल्म परिचय नहीं। बिना सरस्वती के यह नाम इतिहास में पतला रहता।
निष्कर्ष यह है कि गुलेरी 1883–1922 के कला-टिक कहानीकार हैं; निर्धारित उसने कहा था है, सप्रे की मिट्टी या अन्य दो कहानियाँ नहीं।
16. उसने कहा था की कथावस्तु लिखिए।20 अंक
उसने कहा था चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी है, जून 1915, सरस्वती। कथावस्तु दो समयों की है, संयोग की नहीं। पहला अमृतसर का बचपन। लहना सिंह लगभग बारह वर्ष का है। सहेली से बात, हँसी, छुपना, बाज़ार और खेल। बाद में वह विवाह सूबेदार बोधा सिंह से करती है। जाने से पहले वचन लेती है — पति संकट में हो तो उसे बचाना। भाव यह है कि प्रेम अधिकार नहीं, रक्षा है। लहना रखता है। वर्ष बीतते हैं। पलटन उसे फ्रांस ले जाती है। शीर्षक सर्वनाम से चलता है; सहेली का नाम प्रायः नहीं रहता। वचन व्यक्ति से बड़ा हो जाता है। रूप कहानी है, उपन्यास नहीं, नाटक नहीं।
दूसरा समय प्रथम विश्वयुद्ध का फ्रांस है। वर्तमान खाई और घाव है। वजीरा सिंह पलटन का हँसोड़ साथी है। लहना मन की बात उसी से कहता है। बोधा सिंह और हजारा सिंह उसी मोर्चे पर हैं। लहना पहचानता है। वचन जागता है। वह अपना कपड़ा-आराम देता है, घाव छिपाता है, दूसरों को बचाता है। गोली और त्याग एक हो जाते हैं। मृत्यु वचन पूरा करती है। प्रभाव करुण और वीर मिला है। यह कफन की भूख नहीं। यह चंपा का दीप नहीं। यह शंका का बाल-मन नहीं। एक सिपाही एक वाक्य के नीचे मरता है।
फॉर्स्टर कारण कहते हैं; यहाँ कारण एक वाक्य है, गोली नहीं। आकाशदीप में कारण दीप और प्रतिशोध है। पाजेब में कारण शंका है। तीनों अलग हैं। पाँच खंड और पूर्वदीप्ति कथा को बाँधते हैं। वर्तमान युद्ध से स्मृति खुलती है, स्मृति से युद्ध पर लौटती है। हिन्दी में यह कसाव 1915 में नया कहा जाता है। बिना बचपन के युद्ध समाचार रह जाता। बिना युद्ध के वचन अधूरा रह जाता। बिना पूर्वदीप्ति के दो देशकाल जुड़ते नहीं। वाचक वर्णन और संवाद मिलाता है। भाषा खड़ी बोली है, पंजाबी-स्वाद और युद्ध-गद्य मिला है। प्रसाद का संस्कृत-गर्भ यहाँ नहीं।
पात्र कम हैं। लहना नायक है। सहेली आलंबन है, पूरी नायिका-कथा नहीं। बोधा सिंह बचाने का लक्ष्य है। हजारा सिंह मोर्चे का साथी है। वजीरा हँसी से दबाव हल्का करता है, फिर चोट बैठती है। सीमा आदर्शीकरण की है। गुण यह कि हिन्दी कहानी को 1915 में युद्ध और वचन मिला। निषेध साफ हैं। एक टोकरी भर मिट्टी सप्रे 1901 की है, यह नहीं। सुखमय जीवन और बुद्ध का काँटा गुलेरी की अन्य कहानियाँ हैं, निर्धारित यह वचन-पाठ है। 1960 की फिल्म उसने कहा था पाठ की जगह नहीं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; बचपन के लंबे संवाद यहाँ नहीं उतारे जाते। पो एक प्रभाव माँगते हैं; यह प्रभाव वचन पूरा होना है।
निष्कर्ष यह है कि कथावस्तु अमृतसर के वचन से फ्रांस की मृत्यु तक चलती है; केंद्र लहना का त्याग है, फिल्म का दृश्य या सप्रे की मिट्टी-कथा नहीं।
17. लहना सिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए।20 अंक
लहना सिंह उसने कहा था का नायक है। बचपन में लगभग बारह वर्ष। युवा में सिपाही। चंद्रधर शर्मा गुलेरी 1883–1922 की जून 1915 सरस्वती-कहानी का केंद्र वही हैं। गुण खेल, स्मृति, स्वाभिमान, त्याग हैं। प्रेम बोलता नहीं, बचाता है। घाव छिपाना नाटक नहीं, वचन है। सपाट वीर केवल मोर्चा मारता। यह वचन के नीचे मरता है। गोल चरित्र है — बचपन का खेल और युद्ध का कर्म एक पुरुष में हैं। सहेली आलंबन है। बोधा सिंह लक्ष्य है। वजीरा सिंह मन खोलता है। हजारा सिंह साथ है। बिना सहेली के वचन नहीं बैठता। बिना बोधा के त्याग दिशा खो देता है।
प्रसंग दो देशकाल बाँधता है। अमृतसर में वह सहेली से खेलता है, वचन लेता है — पति संकट में हो तो बचाना। फ्रांस की खाई में वही वचन जागता है। वह कपड़ा-आराम देता है, घाव छिपाता है, दूसरों को मोर्चे पर बचाता है। मृत्यु वचन पूरा करती है। भाव यह है कि व्यक्ति वाक्य से बड़ा नहीं रह जाता। शीर्षक सर्वनाम सहेली का है; कर्म लहना का है। प्रभाव करुण-वीर मिला है। यह होरी नहीं, किसान-ऋण नहीं। यह सूरदास नहीं, भक्त नहीं। यह शामनाथ नहीं, दिखावा नहीं। देशकाल दो हैं — अमृतसर का बचपन, फ्रांस का प्रथम विश्वयुद्ध; दोनों एक वचन से बँधे हैं। एक सिपाही मनुष्य रहकर शहीद होता है।
तुलना इकाई 2 के तीन नायकों से चरित्र खुलता है। चंपा दीप जलाती है, जीती है। आशुतोष शंका से बचता है, निर्दोष निकलता है। लहना मरता है। तीन नायक तीन अंत — आलोक, निर्दोषता, त्याग। प्रसाद की गरिमा का नायक आदर्श बोलता है। जैनेन्द्र का बालक भीतर काटता है। गुलेरी का सिपाही कर्म से बोलता है। भाषा बोलचाल और युद्ध-संकेत की है। संस्कृत-गर्भ यहाँ नहीं। छोटे विचार-वाक्य यहाँ नहीं। पो एक प्रभाव माँगते हैं; लहना उसी प्रभाव का शरीर है। नामवर कसाव कहते हैं; यही कसाव चरित्र को फैलाता नहीं, काटता है।
सीमा आदर्शीकरण है — वचन इतना शुद्ध हो सकता है कि मनुष्य संदिग्ध न रहे। गुण यह कि 1915 का सिपाही देवता नहीं, स्मृति वाला मनुष्य है। राजेंद्र यादव इसी पाठ को हिन्दी कहानी का बड़ा आरंभ मानते हैं; कला का टिक-नाम गुलेरी पर है, चरित्र का भार लहना पर है। निषेध साफ हैं। फिल्म 1960 का नायक पाठ नहीं। सप्रे के किसान का बोझ यह नहीं। स्कंदगुप्त का रंग-नायक यह नहीं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; युद्ध के पूरे दृश्य यहाँ नहीं उतारे जाते। बिना वजीरा के मन नहीं खुलता। बिना मृत्यु के वचन अधूरा रह जाता।
निष्कर्ष यह है कि लहना सिंह वचन का नायक है; पहचान बचपन, मोर्चा और मृत्यु से है, फिल्म-नायक या आदर्श-देवता से नहीं।
18. पूर्वदीप्ति शिल्प का महत्त्व लिखिए।8 अंक
पूर्वदीप्ति वर्तमान से अतीत खोलने का शिल्प है। उसने कहा था पाँच खंडों में युद्ध से बचपन और फिर युद्ध पर लौटती है। वर्तमान फ्रांस की खाई है। स्मृति अमृतसर का वचन खोलती है। वचन कारण बनता है, संयोग नहीं। हिन्दी में यह कसाव 1915 में नया कहा जाता है। सर्वज्ञ वर्णन और संवाद साथ चलते हैं। एक प्रभाव त्याग की चोट है; स्मृति उसी चोट को कारण बनाती है। बिना बचपन के युद्ध समाचार रह जाता। बिना युद्ध के वचन अधूरा रह जाता।
शिल्प का महत्त्व रूप का आरंभ है, केवल चाल नहीं। लहना का चरित्र इसी लौटने से गोल होता है — खेल और कर्म एक पुरुष में। आकाशदीप का शिल्प संवाद-गरिमा है, पूर्वदीप्ति-केंद्र नहीं। पाजेब घटना-पतली वर्तमान है। पो एक प्रभाव माँगते हैं; पूर्वदीप्ति उसी प्रभाव को गाढ़ती है। नामवर कसाव कहते हैं; गुलेरी उसी कसाव का आरंभ हैं। सीमा आदर्शीकरण की है। गुण यह कि स्मृति कथा चलाती है।
निष्कर्ष यह है कि पूर्वदीप्ति वचन को युद्ध से जोड़ती है; महत्त्व 1915 के रूप-आरंभ का है, केवल स्मृति-चाल का नहीं।
19. आकाशदीप का नामकरण स्पष्ट कीजिए।8 अंक
आकाशदीप जयशंकर प्रसाद की कहानी है, 1928। संग्रह 1929 उसी नाम का है; परीक्षा का पाठ कहानी है, पूरी पुस्तक नहीं। नाम दीपस्तंभ है — समुद्र पर जहाजों का मार्ग। अर्थ कर्तव्य का प्रकाश भी है। रूप ऐतिहासिक-आदर्श कहानी है। देशकाल ताम्रलिप्ति का स्पर्श, पोत, द्वीप, सागर। नायिका चंपा क्षत्रिय-पुत्री है। नायक बुद्धगुप्त ताम्रलिप्ति का क्षत्रिय, जलदस्यु-जीवन से जुड़ा। सेविका जया। पोताध्यक्ष मणिभद्र का प्रस्ताव घृणा जगाता है; यहीं प्रतिशोध का बीज है। चंपा आजीवन आलोक जलाती है। प्रेम साथ चलना चाहता है; कर्तव्य दीप जलाए रखना चाहता है।
शीर्षक वस्तु भी है, मूल्य भी है। बिना दीप के नाम खाली रह जाता। बिना चंपा के आलोक केवल स्तंभ रह जाता। अंत भारत-प्रस्थान पूरा नहीं होता। प्रेम अधिकार की विजय नहीं, प्रकाश की विजय है। स्कंदगुप्त 1928 का नाटक है, यह दीप नहीं। ध्रुवस्वामिनी और चंद्रगुप्त भी नाटक हैं। कामायनी महाकाव्य है। पुरस्कार दूसरी कहानी है। भाषा संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली, गरिमा।
निष्कर्ष यह है कि नामकरण दीपस्तंभ और चंपा के कर्तव्य से है; कृति 1928 की कहानी है, नाटक या संग्रह-मात्र नहीं।
20. चंपा का चरित्र-चित्रण कीजिए।20 अंक
चंपा जयशंकर प्रसाद की आकाशदीप की नायिका है। कहानी 1928; संग्रह 1929 उसी नाम का है, पाठ कहानी है। क्षत्रिय-पुत्री। पिता मणिभद्र के यहाँ प्रहरी रहे। मणिभद्र पोताध्यक्ष है; उसका प्रस्ताव घृणा जगाता है। यहीं प्रतिशोध का बीज है। सेविका जया साथ है। बुद्धगुप्त प्रेमी है, ताम्रलिप्ति से जुड़ा, सागर का पुरुष, जलदस्यु-जीवन का स्पर्श। वह साथ ले जाना चाहता है। चंपा दीप जलाए रखना चाहती है। निर्णय आलोक पर है, विवाह-सुख पर नहीं। ध्रुवस्वामिनी नाटक की नारी है, यह नहीं। चंद्रगुप्त का नायक यह प्रेमी नहीं। रूप ऐतिहासिक-आदर्श कहानी का चरित्र है, रंगमंच की रानी नहीं। प्रसाद प्रेमचंद के शत्रु नहीं; एक समाज देता है, दूसरा आदर्श और सौंदर्य देता है।
प्रसंग समुद्र और बंदी-पोत से खुलता है। शीत, सागर, स्वतंत्रता और प्रेम। द्वीप पर दीपस्तंभ है। जहाज उसी आलोक से मार्ग पाते हैं। भाव दो धाराएँ हैं — प्रेम जो साथ चलना चाहता है, कर्तव्य जो दीप जलाए रखना चाहता है। अंत चंपा आजीवन दीप जलाती है। बुद्धगुप्त के साथ भारत-प्रस्थान पूरा नहीं होता। प्रेम अधिकार की विजय नहीं, प्रकाश की विजय है। बिना मणिभद्र के प्रतिशोध पतला है। बिना दीप के शीर्षक खाली है। बिना जया के एकांत केवल नायिका-नाम रह जाता। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; लंबे काव्य-संवाद यहाँ नहीं उतारे जाते।
गोल चरित्र है। सपाट नायिका केवल त्याग गिनवाती। यह प्रतिशोध भी रखती है, प्रेम भी रखती है, फिर प्रकाश चुनती है। लहना वचन के नीचे मरता है। चंपा दीप के नीचे जीती है। आशुतोष शंका से बचता है। तीन स्त्री-पुरुष तीन चालें — मृत्यु, आलोक, निर्दोषता। भाषा प्रसाद की है — संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली, गरिमा, संवाद का काव्य-स्पर्श। प्रेमचंद की बोलचाल नहीं। जैनेन्द्र के छोटे वाक्य नहीं। रस शृंगार और त्याग मिला है; युद्ध-वीर गुलेरी का है। आदर्श यह है कि व्यक्तिगत प्रेम सार्वजनिक प्रकाश के नीचे झुकता है। नारी आलंबन नहीं, कर्ता है।
सीमा आदर्श का बोझ और दुरुहता है। गुण यह कि 1928 की कहानी नारी को दीप-निर्णय देती है। प्रसाद 30 जनवरी 1889–15 जनवरी 1937, काशी; कवि, नाटककार, कहानीकार; छायावाद के शिखर। निषेध साफ हैं। स्कंदगुप्त 1928 नाटक है, यह दीप नहीं। ध्रुवस्वामिनी 1933 नारी-निर्णय नाटक में है। चंद्रगुप्त 1931 नाटक है। कामायनी महाकाव्य है। पुरस्कार दूसरी कहानी है। एक लेखक दो विधाएँ; मिलाए बिना मूल्यांकन अधूरा, मिलाकर विधा भ्रम। पो एक प्रभाव माँगते हैं; यह प्रभाव प्रकाश की चोट है। नामवर कसाव कहते हैं; प्रसाद का कसाव गरिमा से चलता है।
निष्कर्ष यह है कि चंपा प्रेम और प्रतिशोध के बीच दीप चुनती है; चरित्र आकाशदीप की नायिका का है, नाटक-रानी या पुरस्कार की नायिका का नहीं।
21. आकाशदीप की कथावस्तु लिखिए।20 अंक
आकाशदीप प्रसाद की कहानी है, 1928; संग्रह 1929। कथावस्तु पोत और द्वीप दो स्थानों की है। आरंभ बंदी-पोत, शीत, सागर। चंपा क्षत्रिय-पुत्री और बुद्धगुप्त मिलते हैं। स्वतंत्रता और प्रेम खुलते हैं। पिता मणिभद्र के यहाँ प्रहरी रहे। मणिभद्र का प्रस्ताव घृणित है; अतीत प्रतिशोध का कारण बनता है। सेविका जया साथ है। रूप ऐतिहासिक-आदर्श कहानी है। देशकाल ताम्रलिप्ति का स्पर्श, पोत, द्वीप, सागर। नायक बुद्धगुप्त ताम्रलिप्ति का क्षत्रिय, जलदस्यु-जीवन से जुड़ा। खल दबाव पोत और प्रस्ताव पर है। कहानी और संग्रह दोनों का नाम आकाशदीप है; परीक्षा का पाठ कहानी है, पूरी पुस्तक नहीं। जयशंकर प्रसाद 1889–1937, काशी; छायावाद के शिखर। गुण गरिमा है, सीमा आदर्श का बोझ है।
मध्य द्वीप और दीपस्तंभ है। आकाशदीप नाम दीपस्तंभ है — समुद्र पर जहाजों का मार्ग। अर्थ कर्तव्य का प्रकाश भी है। जहाज आलोक से मार्ग पाते हैं। प्रेम साथ चलना चाहता है। कर्तव्य दीप जलाए रखना चाहता है। द्वंद्व यहीं घन होता है। भाव दो धाराएँ हैं, उपकथाओं का बिखराव नहीं। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण प्रस्ताव और दीप हैं, संयोग नहीं। उसने कहा था में कारण वचन है। पाजेब में कारण शंका है। तीन कथावस्तु तीन केंद्र। बिना मणिभद्र के प्रतिशोध पतला है। बिना दीप के शीर्षक खाली है। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; काव्य-संवाद का ढेर यहाँ नहीं उतरता।
अंत चंपा आलोक जलाती रहती है। भारत-प्रस्थान पूरा नहीं। प्रेम अधिकार की जीत नहीं, प्रकाश की जीत है। एक प्रभाव त्याग की चोट है, युद्ध-वचन नहीं, बाल-शंका नहीं। स्कंदगुप्त की कथा रंग-संघर्ष है। यह सागर-कर्तव्य है। गोदान ऋण है। कफन भूख है। विधा कहानी है, नाटक नहीं। वर्ष 1928 कहानी का टिक है; स्कंदगुप्त भी 1928 का नाटक है — यही भ्रम बैठता है। एक पढ़ी जाती है, एक खेली जाती है। चंपा ध्रुवस्वामिनी नहीं। बुद्धगुप्त चंद्रगुप्त नहीं। स्वरूप प्रेम और प्रतिशोध दो भावों का द्वंद्व है; अंत प्रेम-कर्तव्य की ओर झुकता है।
शिल्प संवाद-गरिमा और संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली है। पूर्वदीप्ति-केंद्र गुलेरी का है, यह नहीं। छोटे वाक्य जैनेन्द्र के हैं, यह नहीं। रस शृंगार और त्याग मिला है। सीमा दुरुहता और आदर्श का बोझ। गुण गरिमा और नारी-कर्ता। निषेध साफ हैं। कामायनी पद्य है। पुरस्कार दूसरी कहानी है। ध्रुवस्वामिनी और चंद्रगुप्त नाटक हैं। प्रेमचंद समाज फैलाते हैं; प्रसाद एक दीप सिमटाते हैं। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; यह चिह्न आदर्श-शाखा से भी चलता है। पो एक प्रभाव माँगते हैं; कई उपदेश कथा को उपन्यास की कटी पूँछ बना देते।
निष्कर्ष यह है कि कथावस्तु पोत से दीपस्तंभ तक प्रेम-प्रतिशोध चलाती है; केंद्र चंपा का आलोक है, स्कंदगुप्त का युद्ध या संग्रह-मात्र नहीं।
22. आकाशदीप और स्कंदगुप्त में अंतर लिखिए।8 अंक
आकाशदीप 1928 की कहानी है। नायिका चंपा। दीपस्तंभ, सागर, पोत, प्रेम और प्रतिशोध। पढ़ी जाती है। एक प्रभाव प्रकाश की चोट है। स्कंदगुप्त 1928 का नाटक है। ऐतिहासिक संघर्ष, रंगमंच, अभिनय, संवाद-दृश्य। खेला जाता है। लेखक एक — जयशंकर प्रसाद, जन्म 30 जनवरी 1889 काशी, निधन 15 जनवरी 1937। वर्ष पास है; विधा अलग है। चंपा ध्रुवस्वामिनी नहीं। बुद्धगुप्त चंद्रगुप्त नहीं। एक नारी-निर्णय नाटक में है, एक दीप-निर्णय कहानी में है। मिलाए बिना मूल्यांकन अधूरा, मिलाकर विधा भ्रम।
और भेद साफ रखे जाते हैं। ध्रुवस्वामिनी 1933 और चंद्रगुप्त 1931 भी नाटक हैं। कामायनी पद्य है। पुरस्कार दूसरी कहानी है। आकाशदीप का शिल्प संवाद-गरिमा और संस्कृत-गर्भ है। स्कंदगुप्त का शरीर रंगमंच है। कहानी एक बैठक में पूरी होती है; नाटक दृश्य माँगता है। प्रसाद कवि, नाटककार, कहानीकार तीनों हैं; पत्र कहानी माँगता है। सीमा आदर्श का बोझ कहानी पर भी है, पर रूप गद्य-कथा का रहता है।
निष्कर्ष यह है कि आकाशदीप कहानी है, स्कंदगुप्त नाटक है; एक नाम और एक वर्ष से दो विधाएँ नहीं ढकतीं।
23. पाजेब का नामकरण स्पष्ट कीजिए।8 अंक
पाजेब जैनेन्द्र कुमार की कहानी है, 1942। पाजेब पैर का गहना है। शीर्षक वस्तु है, प्रतीक भी — चाह, दिखावा, संदेह। प्रसंग मध्यवर्गीय परिवार है। मुन्नी गहना पहनना चाहती है। गहना खो जाता है। चोरी की शंका आशुतोष पर बैठती है। बौजी और परिवार की दृष्टि दबाव चलाती है। घटना पतली है, दबाव घना है। जैनेन्द्र कहते हैं कि केवल शंका पर दंड नहीं चलता। अंत में पाजेब चोरी नहीं, खोई निकली। आशुतोष का बोझ झूठा था। रूप बाल-मनोविज्ञान की कहानी है, पूरा मनोवैज्ञानिक उपन्यास नहीं।
नाम गहने से चलता है, न्याय-कथा से नहीं। एक प्रभाव शंका की चोट है। त्यागपत्र 1937 उपन्यास है, मृणाल-प्रमोद का विस्तार, यह गहना नहीं। सुनीता 1935, परख 1929, कल्याणी 1939 उपन्यास-पंक्ति है। मुक्तिबोध उपन्यास पर अकादमी 1979 निर्धारित नहीं। पद्म भूषण 1971 सम्मान है, कथा नहीं। भाषा छोटे वाक्य, विचार घने। देशकाल घर-परिवार का है। मध्यवर्ग की इज्जत बच्चे के भीतर उतरती है।
निष्कर्ष यह है कि नामकरण गहने और शंका से है; कृति 1942 की कहानी है, त्यागपत्र या अन्य उपन्यास नहीं।
24. जैनेन्द्र कुमार का परिचय लिखिए।8 अंक
जैनेन्द्र कुमार का जन्म 2 जनवरी 1905, कौड़ियागंज, अलीगढ़। बचपन का नाम आनंदीलाल। निधन 24 दिसंबर 1988। पद्म भूषण 1971। साहित्य अकादमी 1979 उपन्यास मुक्तिबोध पर — निर्धारित नहीं। उपन्यास-पंक्ति परख 1929, सुनीता 1935, त्यागपत्र 1937, कल्याणी 1939। पाजेब 1942 की कहानी है, निर्धारित कृति। दृष्टि अंतर्मन, नैतिक द्वंद्व, संकेत की है। भाषा खड़ी बोली; वाक्य छोटे, विचार घने। मध्यवर्ग बच्चे के भीतर से खुलता है। प्रेमचंद किसान देते हैं। प्रसाद आदर्श देते हैं। जैनेन्द्र शंका देते हैं। मुन्नी गहना चाहती है; आशुतोष पर चोरी की शंका बैठती है; अंत निर्दोषता की चोट है।
वे प्रेमचंद के पूरक हैं, विलोम नहीं। बाहर का समाज प्रेमचंद, भीतर का निर्णय जैनेन्द्र। सीमा दुरुहता का आक्षेप है। गुण यह कि घटना पतली है, निर्णय घना है। बौजी परिवार का दबाव है। चेतना-प्रवाह के निकट संकेत हैं, पूरा धारा-प्रयोग नहीं। रूप बाल-मनोविज्ञान की कहानी है, पूरा मनोवैज्ञानिक उपन्यास नहीं। बिना पाजेब काटे परिचय उपन्यास-सूची रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि जैनेन्द्र 1905–1988 के मनोवैज्ञानिक कथाकार हैं; निर्धारित पाजेब है, त्यागपत्र उपन्यास है।
25. पाजेब में बाल-मनोविज्ञान लिखिए।20 अंक
पाजेब जैनेन्द्र कुमार की कहानी है, 1942। बाल-मनोविज्ञान बच्चे की शंका, चाह और निर्दोषता को कथा बनाता है। जैनेन्द्र जन्म 2 जनवरी 1905, कौड़ियागंज, अलीगढ़; बचपन आनंदीलाल; निधन 24 दिसंबर 1988। दृष्टि अंतर्मन, नैतिक द्वंद्व, संकेत की है। भाषा खड़ी बोली; वाक्य छोटे, विचार घने। पाजेब पैर का गहना है। शीर्षक वस्तु है, प्रतीक भी — चाह, दिखावा, संदेह। रूप बाल-मनोविज्ञान की कहानी है, पूरा मनोवैज्ञानिक उपन्यास नहीं। मध्यवर्ग बच्चे के भीतर से खुलता है। प्रेमचंद किसान देते हैं। प्रसाद आदर्श देते हैं। जैनेन्द्र शंका देते हैं। घटना पतली है, दबाव घना है।
प्रसंग मध्यवर्गीय परिवार है। मुन्नी पाजेब पहनना चाहती है। गहना खो जाता है। चोरी का संदेह आशुतोष पर ठहरता है। बौजी और परिवार की दृष्टि शंका चलाती है। जैनेन्द्र कहते हैं कि केवल शंका पर दंड नहीं चलता। अंत में पाजेब चोरी नहीं, खोई निकली। आशुतोष का बोझ झूठा था। मध्यवर्ग की इज्जत बच्चे के भीतर उतरती है। यही बाल-मन से वयस्क दबाव है। एक प्रभाव शंका की चोट है, युद्ध की नहीं, दीप की नहीं। चरित्र कम हैं। संवाद भीतर की हल्की हलचल रखते हैं। देशकाल घर-परिवार का है, फ्रांस नहीं, सागर नहीं। उद्देश्य ईमान और दृष्टि है, नारा नहीं।
तुलना तीन बंधन खोलती है। लहना वचन से बँधता है। चंपा दीप से बँधती है। आशुतोष शंका से बँधता है। तीन बंधन तीन आयु — सिपाही, नायिका, बालक। यह त्यागपत्र 1937 का न्यायाधीश-मन नहीं, मृणाल-प्रमोद का विस्तार नहीं। यह कफन की भूख नहीं। यह सुनीता 1935 नहीं, परख 1929 नहीं, कल्याणी 1939 नहीं। मुक्तिबोध उपन्यास पर अकादमी 1979 निर्धारित नहीं। पद्म भूषण 1971 सम्मान है, कथा नहीं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; पूरा पारिवारिक वर्णन यहाँ नहीं उतारा जाता। बिना आशुतोष के शंका नहीं बैठती। बिना मुन्नी के पाजेब नहीं बैठती।
शिल्प छोटे वाक्य, कम पात्र, एक प्रभाव है। चेतना-प्रवाह के निकट संकेत हैं, पूरा धारा-प्रयोग नहीं। सीमा दुरुहता का आक्षेप है। गुण यह कि छोटी वस्तु बड़ा प्रश्न बनती है। पो एक प्रभाव माँगते हैं; यह प्रभाव निर्दोषता की चोट है। नामवर कसाव कहते हैं; जैनेन्द्र घटना काटकर निर्णय घना करते हैं। प्रेमचंद का पूरक हैं, विलोम नहीं। बाहर का समाज प्रेमचंद, भीतर का निर्णय जैनेन्द्र। निषेध साफ हैं। त्यागपत्र उपन्यास-पत्र की कृति है। सुनीता अलग उपन्यास है। मुक्तिबोध कवि अलग हैं, उपन्यास निर्धारित नहीं। इकाई 2 का तीसरा पाठ मन का सोपान है, आदर्श या युद्ध नहीं।
निष्कर्ष यह है कि पाजेब बाल-मनोविज्ञान इसलिए है कि शंका बच्चे को दंड से पहले काटती है; रूप 1942 की कहानी है, त्यागपत्र या अन्य उपन्यास नहीं।
26. इकाई 2 की तीन कहानियों का साम्य-वैषम्य लिखिए।20 अंक
इकाई 2 निर्धारित तीन कहानियाँ हैं। चंद्रधर शर्मा गुलेरी — उसने कहा था, जून 1915, सरस्वती। जयशंकर प्रसाद — आकाशदीप, 1928; संग्रह 1929। जैनेन्द्र कुमार — पाजेब, 1942। तीन पाठ तीन सोपानों के हैं। गुलेरी कला का टिक हैं — इकाई 1 का उद्भव यहीं कथा बनता है। प्रसाद आदर्श-काव्य गद्य के हैं — प्रेमचंद के साथ की शाखा, यथार्थ नहीं। जैनेन्द्र मन के हैं — प्रेमचंदोत्तर परत। साम्य गद्य-कहानी, एक प्रभाव, खड़ी बोली, तिलिस्म से कटान है। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; तीनों उसी चिह्न की चालें हैं — वचन, दीप, शंका। नायक-नायिका साधारण या आदर्श मनुष्य हैं, देवता नहीं। पो एक प्रभाव माँगते हैं; तीनों एक चोट छोड़ते हैं, कई उपदेश नहीं।
वैषम्य स्वर, देशकाल और शिल्प पर है। उसने कहा था वचन और युद्ध। आकाशदीप दीप और आदर्श। पाजेब शंका और बाल-मन। देशकाल अमृतसर-फ्रांस, सागर-द्वीप-ताम्रलिप्ति, मध्यवर्गीय परिवार। शिल्प पूर्वदीप्ति और पाँच खंड, काव्य-गद्य और संवाद-गरिमा, छोटे वाक्य और भीतर की हलचल। भाषा गुलेरी में बोलचाल-युद्ध, प्रसाद में संस्कृत-गर्भ, जैनेन्द्र में कसाव-विचार। कारण तीन हैं — वचन, प्रस्ताव-दीप, खोया गहना। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; संयोग तीनों में दोष माना जाता है। स्त्री सहेली-वचन है, चंपा कर्ता है, मुन्नी चाह है। पुरुष लहना मरता है, बुद्धगुप्त साथ नहीं ले जाता, आशुतोष बचता है।
अंत तीन मूल्य खोलते हैं। लहना मरकर वचन पूरा करता है। चंपा जीकर प्रकाश पूरा करती है। आशुतोष निर्दोष निकलता है — त्याग, आलोक, निर्दोषता। एक प्रभाव तीन रूप है, एक साँचा नहीं। सीमा तीन ओर है। गुलेरी पर आदर्शीकरण। प्रसाद पर दुरुहता और आदर्श का बोझ। जैनेन्द्र पर दुरुहता और समाज-कटान। गुण तीन ओर है। 1915 में रूप बैठना। नारी को दीप-निर्णय। बच्चे को शंका से पहले दंड का निषेध। नामवर कसाव कहते हैं; तीनों कसाव अलग चाल से चलाते हैं। राजेंद्र यादव गुलेरी को आरंभ का बड़ा नाम कहते हैं; प्रसाद और जैनेन्द्र आगे की परत हैं, नकल नहीं।
निषेध साफ रखे जाते हैं, नहीं तो तीन शीर्षक एक ढेर लगते हैं। एक टोकरी भर मिट्टी सप्रे 1901 की है, गुलेरी की नहीं। 1960 की फिल्म उसने कहा था पाठ नहीं। सुखमय जीवन और बुद्ध का काँटा अन्य कहानियाँ हैं। स्कंदगुप्त 1928 नाटक है; ध्रुवस्वामिनी, चंद्रगुप्त नाटक हैं; कामायनी पद्य है; पुरस्कार दूसरी कहानी है। त्यागपत्र 1937, सुनीता, परख, कल्याणी, मुक्तिबोध उपन्यास हैं, पाजेब नहीं। पद्म भूषण सम्मान है, कथा नहीं। मूल्यांकन एक को रद्द करके नहीं होता; तीन सोपान एक इकाई में हैं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है, पूरा आख्यान नहीं। महत्त्व यह है कि इकाई 2 इतिहास को कथा बनाती है — कला, आदर्श, मन तीनों एक पत्र में।
निष्कर्ष यह है कि साम्य कहानी-रूप और एक प्रभाव पर है, वैषम्य वचन-दीप-शंका पर है; तीनों निर्धारित पाठ हैं, नाटक, उपन्यास या फिल्म नहीं।
27. शरणदाता का नामकरण स्पष्ट कीजिए।8 अंक
शरणदाता सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की कहानी है। देशकाल लाहौर, 1947, विभाजन। शीर्षक फर्ज है — शरण देना। अर्थ यह भी है कि फर्ज टूटता है। नायक देविन्दरलाल हिन्दू है, जालंधर जाना चाहता है। मित्र रफीकुद्दीन मुसलमान वकील है। वह बहुसंख्यक को अल्पसंख्यक की रक्षा का फर्ज बताता है, जाने नहीं देता। दंगा शुरू होता है। लूट, आग, हत्या। देविन्दरलाल का बसा स्थान जलता है। पनाह मित्र के यहाँ बैठती है। नाम देने वाले और टूटने वाले दोनों पर बैठता है। रूप विभाजन-कहानी है, इतिहास-उपन्यास नहीं।
एक प्रभाव इंसानियत की चोट है। रफीकुद्दीन दबाव में अधूरी शरण देता है, फिर शेख अतीउल्लाह की गैरेज तक ले जाता है। सुरक्षित जगह उपद्रव की जड़ भी बनती है। जैबुन्निसा काट करती है। पत्र बाद में अहसान नहीं, इल्तजा है। शेखर एक जीवनी 1941–44 उपन्यास है, व्यक्ति-विकास। नदी के द्वीप उपन्यास अलग है। तमस साहनी का दंगा-उपन्यास है, यह शरण-पाठ नहीं। झूठा सच यशपाल का है, निर्धारित नहीं।
निष्कर्ष यह है कि नामकरण शरण के फर्ज और उसकी विडम्बना से है; कृति 1947 की लाहौर-कहानी है, शेखर या तमस नहीं।
28. अज्ञेय का परिचय लिखिए।8 अंक
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय का जन्म 7 मार्च 1911, कसया, कुशीनगर। निधन 4 अप्रैल 1987। कवि, कथाकार, संपादक। प्रयोग और नई कविता के शिखर-नाम। निर्धारित शरणदाता कहानी है — लाहौर 1947, विभाजन, फर्ज की विडम्बना। नायक देविन्दरलाल हिन्दू है। मित्र रफीकुद्दीन मुसलमान वकील है। जैबुन्निसा इंसानियत की काट है। शेखर एक जीवनी 1941–44 उपन्यास है। नदी के द्वीप उपन्यास अलग है; कविता के पद-संग्रह से नहीं मिलाया जाता। दृष्टि व्यक्ति, निर्णय, नैतिक दबाव की है। भाषा खड़ी बोली; वाक्य कसे, विचार घने। अज्ञेय प्रेमचंद का विलोम नहीं, अगली परत हैं।
प्रेमचंद बाहर का समाज देते हैं। जैनेन्द्र मन देते हैं। अज्ञेय व्यक्ति को संकट में खड़ा करते हैं। शरणदाता उसी दृष्टि की विभाजन-कथा है। सीमा दुरुहता का आक्षेप है। गुण यह कि इंसानियत घटना-सूची नहीं, परीक्षा बनती है। तमस साहनी का दंगा-उपन्यास है, यह शरण-पाठ नहीं। बिना कहानी काटे शेखर परीक्षा में भ्रम है। कविता का बड़ा नाम कथाकार को रद्द नहीं करता।
निष्कर्ष यह है कि अज्ञेय 1911–1987 के प्रयोगशील कथाकार हैं; निर्धारित शरणदाता है, शेखर उपन्यास है।
29. शरणदाता की कथावस्तु लिखिए।20 अंक
शरणदाता सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की कहानी है। देशकाल लाहौर, 1947, विभाजन। अज्ञेय जन्म 7 मार्च 1911, कसया, कुशीनगर; निधन 4 अप्रैल 1987। दृष्टि व्यक्ति, निर्णय, नैतिक दबाव की है। भाषा खड़ी बोली; वाक्य कसे, विचार घने। कथावस्तु इतिहास-उपन्यास नहीं, एक बैठक का फर्ज है। नायक देविन्दरलाल हिन्दू है, जालंधर जाना चाहता है। मित्र रफीकुद्दीन मुसलमान वकील है। वह बहुसंख्यक को अल्पसंख्यक की रक्षा का फर्ज बताता है। जाने नहीं देता। दंगा शुरू होता है। लूट, आग, हत्या। देविन्दरलाल का बसा स्थान जलता है। पनाह मित्र के यहाँ बैठती है। शीर्षक दोनों पर बैठता है — जो देता है, जो नहीं निभा पाता।
मध्य दबाव है। गुंडे शिकार माँगते हैं, धर्म का नारा उनका औजार है। डॉक्टर मरीज देखने जाता है, छुरा पीछे से लगता है। रेल-कर्मचारी शरण देता है, पुलिस उसे मारती है। सिक्ख भी शरण का फर्ज निभाते हैं। ये रेखाएँ दंगे को केवल एक परिवार की कथा नहीं रहने देतीं। रफीकुद्दीन लाचार होता है। अकेले इंसान को झुकना पड़ता है। वह मित्र को निकालता नहीं चाहता, निकालने पर मजबूर होता है। शरण अधूरी रहती है। मित्र को शेख अतीउल्लाह की गैरेज में रखवाता है। शेख पुलिस दफ्तर का हेड क्लर्क है। पत्नी, पुत्री जैबुन्निसा, पुत्र आबिद। सुरक्षित जगह उपद्रव की जड़ भी बनती है।
अंत विष और काट है। खाने की तह में चेतावनी आती है। बिलार मरता है। जैबू प्राण बचाती है। हिन्दुस्तान पहुँचकर रेडियो-अपील होती है। लाहौर से पत्र आता है। भाव अहसान नहीं, इल्तजा है — अल्पसंख्यक मजलूम को इंसान की तरह याद रखना। विडम्बना तीन परत है। एक मित्र रोकता है, फिर निकालता है। दूसरा शरण के साथ विष देता है। तीसरी पुत्री काट करती है। आबिद और शेख संप्रदाय का विष हैं। जैबू मनुष्य है, केवल मुसलमान पात्र नहीं। एक प्रभाव इंसानियत की चोट है, युद्ध-वचन नहीं, दीप नहीं। तमस दंगा फैलाता है। यह फर्ज सिमटाता है। शेखर व्यक्ति-विकास है, यह संकट-एक बैठक है।
शिल्प नैतिक द्वंद्व और कसे वाक्य हैं। घटना दंगा है, केंद्र फर्ज है। गुलेरी पूर्वदीप्ति रखते हैं। प्रसाद गरिमा रखते हैं। अज्ञेय निर्णय और विडम्बना रखते हैं। सीमा यह कि दंगे की चौड़ाई उपन्यास माँग सकती है; कहानी सिमटाती है। गुण यह कि छोटी कथा बड़ा प्रश्न बनाती है। निषेध साफ हैं। शेखर एक जीवनी 1941–44 उपन्यास है। नदी के द्वीप उपन्यास है। तमस 1973 साहनी का विभाजन-उपन्यास है, यह शरण-पाठ नहीं। झूठा सच यशपाल का है, यह पाठ नहीं। चीफ की दावत दिखावे का नाम है, फर्ज का नहीं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; दंगे के दृश्य और पत्र का पाठ यहाँ नहीं उतारे जाते। बिना लाहौर के शीर्षक हवा में रहता। बिना जैबू के अंत केवल भागना रह जाता।
निष्कर्ष यह है कि कथावस्तु लाहौर की शरण से विष और काट तक चलती है; केंद्र फर्ज की विडम्बना है, तमस का विस्तार या शेखर का व्यक्ति-विकास नहीं।
30. रफीकुद्दीन का चरित्र-चित्रण कीजिए।20 अंक
रफीकुद्दीन शरणदाता का नायक-मित्र है। मुसलमान वकील। देशकाल लाहौर, 1947। गुण फर्ज, चिंता, इंसानियत हैं। वह देविन्दरलाल को जालंधर जाने नहीं देता — बहुसंख्यक अल्पसंख्यक की रक्षा करे, यही उसका तर्क है। दंगे में शरण देता है। पराजय महसूस करता है जब शहर जलता है। गोल चरित्र है। सपाट संत केवल बचाता। यह दबाव में झुकता भी है। गुंडे घर जलाने की धमकी देते हैं। अकेला इंसान झुकता है। शरण अधूरी रहती है। शेख अतीउल्लाह के अहाते तक मित्र को ले जाता है। शीर्षक उसी पर भी बैठता है — शरणदाता जो पूरा नहीं निभा पाता। अज्ञेय व्यक्ति को संकट में खड़ा करते हैं; रफीकुद्दीन उसी दृष्टि का मनुष्य है।
प्रसंग दंगे से खुलता है। लूट, आग, हत्या। देविन्दरलाल का बसा स्थान जलता है। मित्रता अभी इंसानियत है। डॉक्टर और रेल-कर्मचारी की रेखाएँ बताती हैं कि फर्ज कई जगह टूटता है। रफीकुद्दीन निकालता नहीं चाहता, निकालने पर मजबूर होता है। भाव यह है कि नेकी अकेले नहीं चलती, दबाव काटता है। शामनाथ माँ को छिपाता है, यह मित्र को छिपाता है। गदल पाँत बचाती है। तीन रक्षा तीन स्वर — दिखावा, फर्ज, बिरादरी। यह होरी नहीं। यह चीफ नहीं। यह लहना नहीं, वचन से बँधा सिपाही नहीं। 1947 का मित्र मनुष्य रहकर हारता है, हैवान नहीं बनता पूरा।
जैबुन्निसा काट करती है; वह चेतावनी है, वकील नहीं। शेख विष देता है; आबिद संप्रदाय की परत है। रफीकुद्दीन इनके बीच फँसा है। पत्र बाद में इल्तजा करता है, अहसान नहीं जताता। चरित्र की परीक्षा यहीं पूरी होती है — शरण अधूरी, इंसानियत बाकी। भाषा कसी खड़ी बोली है। प्रसाद की गरिमा नहीं। साहनी का व्यंग्य नहीं। राघव का आंचल-संवाद नहीं। नैतिक घन अज्ञेय का है। सीमा लाचारी है — झुकना कमजोरी भी कही जा सकती है। गुण यह कि कमजोरी छिपाई नहीं गई। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रभाव फर्ज का टूटना है, दंगा-सूची नहीं।
निषेध साफ हैं। शेखर एक जीवनी उत्तम पुरुष का व्यक्ति-विकास है, यह वकील नहीं। नदी के द्वीप उपन्यास है। तमस साहनी का दंगा-विस्तार है, रफीकुद्दीन वहाँ का पर्याय नहीं। बलराज साहनी अभिनेता हैं, यह चरित्र नहीं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; गुंडों के पूरे दृश्य यहाँ नहीं उतारे जाते। बिना देविन्दरलाल के फर्ज लक्ष्य खो देता है। बिना दबाव के शरण केवल नेकी रह जाती। अज्ञेय 1911–1987 प्रयोग और नई कविता के बड़े नाम हैं; निर्धारित कहानी यही शरण-पाठ है। प्रेमचंद बाहर का समाज देते हैं; यह संकट में व्यक्ति देता है।
निष्कर्ष यह है कि रफीकुद्दीन अधूरी शरण का नायक-मित्र है; पहचान फर्ज और दबाव से है, संत-मूर्ति या तमस के विस्तार से नहीं।
31. जैबुन्निसा की इंसानियत लिखिए।8 अंक
जैबुन्निसा शरणदाता की वह स्त्री है जो हैवानियत के बीच इंसानियत काटती है। शेख अतीउल्लाह पुलिस दफ्तर का हेड क्लर्क है। पुत्री जैबू, पुत्र आबिद। रफीकुद्दीन मित्र देविन्दरलाल को उसी अहाते की गैरेज में रखवाता है। सुरक्षित जगह उपद्रव की जड़ भी बनती है। खाने की तह में चेतावनी आती है। बिलार मरता है। जैबू प्राण बचाती है। पिता विष की परत है। भाई संप्रदाय की परत है। वह मनुष्य है, केवल मुसलमान पात्र नहीं। प्रसंग दंगे का है; भाव यह है कि नेकी अकेले घर में भी बच सकती है।
बाद हिन्दुस्तान पहुँचकर रेडियो-अपील होती है। लाहौर से पत्र आता है। अहसान नहीं जताती; इल्तजा करती है कि अल्पसंख्यक मजलूम को इंसान की तरह याद रखा जाए। एक प्रभाव इंसानियत की चोट है। रफीकुद्दीन अधूरी शरण देता है; जैबू पूरी काट करती है। शेखर की नायिका यह नहीं। तमस का विस्तार यह नहीं। रूप कहानी का पात्र है। बिना चेतावनी के अंत केवल भागना रह जाता। बिना पत्र के इंसानियत नारा रह जाती।
निष्कर्ष यह है कि जैबू विष और दंगे के बीच इंसानियत है; पहचान चेतावनी और इल्तजा से है, संत-मूर्ति या उपन्यास-नायिका से नहीं।
32. चीफ की दावत का नामकरण स्पष्ट कीजिए।8 अंक
चीफ की दावत भीष्म साहनी की कहानी है, 1956। चीफ विभाग का अफसर है, अंग्रेजी-बोल। दावत तरक्की का औजार है। नाम मेहमान का है; केंद्र माँ का है। नायक मिस्टर शामनाथ कर्मचारी-पुत्र है। साथ पत्नी। माँ ग्रामीण बोली, अनपढ़ अंग्रेजी, फुलकारी। खल दबाव दिखावा है। एक बैठक की तैयारी एक प्रभाव बनाती है — इज्जत माँ को छिपाती है। प्रसंग सजावट, पेय, फूल से खुलता है। चिंता यह है कि माँ दिख न जाए — खर्राटे, देसी वेश, ग्रामीण बोली। माँ बरामदे के कोने या पीछे ठहराई जाती है। वह उदास रहकर भी नहीं टोकती।
शीर्षक विडम्बना रखता है। दावत चीफ की कही जाती है; श्रम माँ का है। चीफ आता है, सामना हो जाता है, गाँव और फुलकारी रीझते हैं। अंत उपयोग है — पुत्र तभी गले लगता है जब अफसर खुश होता है। माँ हरिद्वार जाना चाहती है; तरक्की सुनकर रुकती है। रूप मध्यवर्गीय व्यंग्य-कहानी है। तमस 1973 उपन्यास है, यह दावत नहीं। कबीरा खड़ा बाजार में 1981 नाटक है। बलराज साहनी अभिनेता हैं, लेखक भीष्म हैं।
निष्कर्ष यह है कि नामकरण अफसर की दावत से है, अर्थ माँ की उपेक्षा और तरक्की है; कृति 1956 की कहानी है, तमस नहीं।
33. माँ का चरित्र-चित्रण कीजिए।20 अंक
माँ चीफ की दावत की कसौटी है। भीष्म साहनी की कहानी 1956। ग्रामीण बोली। अंग्रेजी नहीं। फुलकारी जानती है। श्रम दावत का है। पुत्र मिस्टर शामनाथ उसे शर्म मानता है — खर्राटे, देसी वेश, ग्रामीण बोली। वह टोकती नहीं, उदास सहती है। बरामदे के कोने या पीछे ठहराई जाती है। गोल चरित्र है। सपाट माँ केवल त्याग गिनवाती। यह हरिद्वार जाना चाहती है, फिर तरक्की सुनकर रुकती है। चीफ रीझता है — नमस्ते, गाँव, गाना, फुलकारी। पुत्र तभी गले लगता है जब अफसर खुश होता है। शीर्षक मेहमान का है; केंद्र माँ का है। बिना माँ के मेज नहीं लगती। बिना चीफ के छिपाना नहीं बैठता।
प्रसंग दावत की तैयारी से खुलता है। सजावट, पेय, फूल। चिंता यह है कि माँ दिख न जाए। पत्नी छिपाने में साथ है। सामना हो ही जाता है। माँ पल्ला रखती है, काँपती है। चीफ मुस्कराता है, गाँव रीझता है। अंत उपयोग है। फुलकारी और अफसर की खुशी से माँ रोकी जाती है। भाव यह है कि त्याग माँ का है, इज्जत पुत्र की भूख है। चीफ खल नहीं, दर्पण है। जैबू काट करती है। गदल मरती है। यह माँ जीती है, इस्तेमाल होती है। तीन स्त्री तीन चालें — चेतावनी, मृत्यु, इस्तेमाल। यह धनिया गोदान की नहीं। यह चंपा दीप की नहीं। यह सोमा बुआ नहीं, न्योता माँगती स्त्री नहीं।
व्यंग्य हँसी से दोष काटता है। यहाँ दोष मध्यवर्ग की गुलामी है — अंग्रेजी, चीफ, तरक्की। माँ आलंबन नहीं, कसौटी है। लहना वचन से मरता है। चंपा दीप जलाती है। यह माँ जीती है, पर शरीर पर इज्जत टिकती है। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली है। प्रसाद की गरिमा नहीं। अज्ञेय का नैतिक घन नहीं। राघव का पाँत-संवाद नहीं। साहनी जन्म 8 अगस्त 1915, रावलपिंडी; निधन 11 जुलाई 2003, दिल्ली। दृष्टि मध्यवर्ग के दिखावे पर व्यंग्य की है। सीमा यह कि व्यंग्य पुत्र पर अधिक बैठता है, माँ संकेत रह सकती है। गुण यह कि हँसी चोट बनती है।
निषेध साफ हैं। तमस 1973 विभाजन का उपन्यास है, यह माँ नहीं। कबीरा खड़ा बाजार में 1981 नाटक है। बलराज साहनी अभिनेता हैं, लेखक भीष्म हैं। शरणदाता दंगा-माँ नहीं, यह ड्राइंग-रूम की माँ है। गोदान ऋण है, यह तरक्की है। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; मेनू और लंबे संवाद यहाँ नहीं उतारे जाते। बिना फुलकारी के चीफ रीझता नहीं। बिना हरिद्वार की जिद के त्याग दिशा खो देता है। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रभाव उपेक्षा की चोट है। नामवर कसाव कहते हैं; साहनी दावत को एक बैठक में काटते हैं। प्रेमचंद का निषेध नहीं; समाज रहता है, स्वर व्यंग्य हो जाता है।
निष्कर्ष यह है कि माँ त्याग और कसौटी है; पहचान छिपने, फुलकारी और तरक्की से है, चीफ के मेहमान या तमस की स्त्री से नहीं।
34. चीफ की दावत की कथावस्तु लिखिए।20 अंक
चीफ की दावत भीष्म साहनी की कहानी है, 1956। कथावस्तु मिस्टर शामनाथ के कर्मचारी-परिवार की है। चीफ विभाग का अफसर है, अंग्रेजी-बोल। दावत तरक्की का औजार है। नाम मेहमान का है, केंद्र माँ का है। रूप मध्यवर्गीय व्यंग्य-कहानी है। देशकाल शहर का कर्मचारी-परिवेश। साथ पत्नी। माँ ग्रामीण बोली, अनपढ़ अंग्रेजी, फुलकारी। खल दबाव दिखावा है, दंगा नहीं। एक बैठक की तैयारी एक प्रभाव बनाती है — इज्जत माँ को छिपाती है। शीर्षक विडम्बना रखता है। दावत चीफ की कही जाती है; श्रम माँ का है। साहनी 1915 रावलपिंडी–2003 दिल्ली; भाषा बोलचाल की खड़ी बोली।
आरंभ तैयारी है। सजावट, पेय, फूल। चिंता माँ को छिपाना है — खर्राटे, देसी वेश, ग्रामीण बोली। माँ बरामदे के कोने या पीछे ठहराई जाती है। वह उदास रहकर भी नहीं टोकती। पत्नी साथ है। मध्य दावत है। चीफ आता है। सामना हो जाता है। माँ पल्ला रखती है, काँपती है। चीफ मुस्कराता है, नमस्ते करता है, गाँव रीझता है, फुलकारी माँगता है, गाना सुनता है, फिर आने का संकेत देता है। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण तरक्की की भूख है, संयोग नहीं। शरणदाता में कारण फर्ज है। गदल में कारण पाँत है। तीन कथावस्तु तीन केंद्र।
अंत उपयोग है। शामनाथ माँ को गले लगाता है जब चीफ रीझता है। माँ हरिद्वार जाना चाहती है; पुत्र फुलकारी और अफसर की खुशी से रोकता है। माँ बेटे की तरक्की सुनकर मान जाती है। भाव यह है कि त्याग माँ का है, इज्जत पुत्र की भूख है। चीफ खल नहीं, दर्पण है। एक प्रभाव उपेक्षा की चोट है, इंसानियत की चोट नहीं, स्वाभिमान की मृत्यु नहीं। शरणदाता दंगा है। गदल पाँत है। यह ड्राइंग-रूम का व्यंग्य है। तमस फैलाव है। रूप कहानी है। गोदान ऋण है, यह तरक्की है। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; मेनू और संवाद का ढेर यहाँ नहीं उतारा जाता।
शिल्प व्यंग्य, बोलचाल, एक बैठक का कसाव है। सीमा यह कि व्यंग्य सपाट लग सकता है। गुण यह कि हँसी चोट बनती है। निषेध साफ हैं। तमस 1973 उपन्यास है। कबीरा खड़ा बाजार में 1981 नाटक है। बलराज साहनी फिल्म-नाम हैं। शेखर और नदी के द्वीप अज्ञेय के उपन्यास हैं, यह दावत नहीं। मुर्दों का टीला राघव का उपन्यास है। बिना माँ के मेज नहीं लगती। बिना चीफ के छिपाना नहीं बैठता। पो एक प्रभाव माँगते हैं; कई उपदेश कथा को तोड़ देते। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; व्यंग्य उसी चिह्न की चाल है। प्रेमचंद समाज देते हैं; साहनी दिखावा काटते हैं।
निष्कर्ष यह है कि कथावस्तु छिपाने से रीझने और इस्तेमाल तक चलती है; केंद्र माँ की उपेक्षा है, तमस का दंगा या नाटक-संत नहीं।
35. चीफ की दावत और तमस में अंतर लिखिए।8 अंक
चीफ की दावत 1956 की कहानी है। मिस्टर शामनाथ, माँ, चीफ। दिखावा, तरक्की, व्यंग्य। एक बैठक, एक प्रभाव — उपेक्षा की चोट। पढ़ी जाती है। तमस 1973 का उपन्यास है। विभाजन, दंगा, विस्तार। कई सूत्र, कई स्थान, दीर्घ विन्यास। लेखक एक — भीष्म साहनी, जन्म 8 अगस्त 1915 रावलपिंडी, निधन 11 जुलाई 2003 दिल्ली। भाषा दोनों ओर बोलचाल की खड़ी बोली हो सकती है; विधा अलग है। दावत ड्राइंग-रूम का व्यंग्य है। तमस इतिहास का फैलाव है। कबीरा खड़ा बाजार में 1981 नाटक है, संत-रंग, यह दावत नहीं।
और नाम साफ काटे जाते हैं। बलराज साहनी अभिनेता हैं, लेखक भीष्म हैं। शरणदाता अज्ञेय की दंगा-कहानी है, तमस साहनी का दंगा-उपन्यास है — दंगा एक विषय दो लेखकों में अलग रूप लेता है। गोदान ऋण का उपन्यास है, यह तरक्की की कहानी है। बिना अंतर के एक लेखक दो कृतियाँ एक ढेर लगती हैं। पत्र कहानी माँगता है, विभाजन-उपन्यास नहीं। सीमा यह कि व्यंग्य सपाट लग सकता है; गुण यह कि हँसी चोट बनती है।
निष्कर्ष यह है कि चीफ की दावत कहानी है, तमस उपन्यास है; एक लेखक दो विधाएँ एक पाठ नहीं बनाते।
36. गदल का नामकरण स्पष्ट कीजिए।8 अंक
गदल रांगेय राघव की कहानी है। जनवरी 1955, पत्रिका कहानी। शीर्षक नायिका का नाम है। वह गुर्जर स्त्री है। विधवा होकर मौनी से ब्याही जाती है। बड़ा बेटा निहाल। नरायन दूसरा पुत्र। चंपा और चमेली ब्याही बेटियाँ। डोड़ी देवर है, पहले पति गुन्ना का भाई। दुल्लो नए कुनबे की स्त्री-रेखा है। रूप बिरादरी और नारी-स्वाभिमान की कहानी है, दलित-आत्मकथा नहीं, प्रेम-त्रिकोण नहीं। दबाव वहाँ घन होता है जहाँ बिरादरी की पाँत और सरकार का कानून आमने-सामने होते हैं। निहाल कायर और सिंधनी कहता है; गदल उसी ताने को सीना ठोंककर लेती है।
नाम स्त्री-नाम है, पर अर्थ पाँत पर पूरा होता है। बिना पाँत के शीर्षक केवल नाम रह जाता। अंत गोली पेट में लगती है, सिर गिरता है। एक प्रभाव स्वाभिमान की मृत्यु है। मुर्दों का टीला उपन्यास अलग है। फुलवा बाद का दलित पाठ है, यह गुर्जर नायिका है। जूठन आत्मकथा है, यह नहीं। भाषा आंचल-स्पर्श की खड़ी बोली, संवाद तेज।
निष्कर्ष यह है कि नामकरण नायिका गदल से है; कृति 1955 की कहानी है, उपन्यास या दलित-आत्मकथा नहीं।
37. रांगेय राघव का परिचय लिखिए।8 अंक
रांगेय राघव का जन्म 17 जनवरी 1923, आगरा। निधन 12 सितंबर 1962। आयु छोटी, लेखन घना। मूल नाम तिरूमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य। निर्धारित गदल जनवरी 1955, पत्रिका कहानी। नायिका गुर्जर स्त्री गदल। विधवा होकर मौनी से ब्याही जाती है। बड़ा बेटा निहाल; डोड़ी देवर। मुर्दों का टीला उपन्यास अलग है। दृष्टि बिरादरी, इतिहास, नारी-स्वाभिमान की है। भाषा आंचल-स्पर्श की खड़ी बोली, संवाद तेज। वे प्रेमचंदोत्तर प्रगति और इतिहास की परत हैं। साहनी व्यंग्य देते हैं; राघव पाँत देते हैं। अज्ञेय व्यक्ति देते हैं; राघव जाति-बिरादरी देते हैं।
प्रसंग कुनबा, पटेल-दरोगा और पाँत से खुलता है। निहाल कायर कहता है; गदल ताना सीना ठोंककर लेती है। राज पिसाता रहा, बिरादरी का धर्म नहीं छोड़ा जाता — यही तर्क है। अंत गोली पेट में लगती है। नारी आलंबन नहीं, कर्ता है। एक प्रभाव स्वाभिमान की मृत्यु है। सीमा यह कि कुनबा और राज दोनों भीड़ करते हैं। गुण यह कि नारी पाँत पर अपना तर्क रखती है। फुलवा बाद का दलित पाठ है, यह गुर्जर नायिका है।
निष्कर्ष यह है कि राघव 1923–1962 के कथाकार हैं; निर्धारित गदल है, मुर्दों का टीला उपन्यास है।
38. गदल में नारी और बिरादरी लिखिए।20 अंक
गदल रांगेय राघव की कहानी है। जनवरी 1955, पत्रिका कहानी। नारी गदल है, गुर्जर। विधवा होकर मौनी से ब्याही जाती है। बड़ा बेटा निहाल। नरायन दूसरा पुत्र। चंपा और चमेली ब्याही बेटियाँ। डोड़ी देवर है, पहले पति गुन्ना का भाई। दुल्लो नए कुनबे की स्त्री-रेखा है। रूप बिरादरी और नारी-स्वाभिमान की कहानी है, दलित-आत्मकथा नहीं, प्रेम-त्रिकोण नहीं। फुलवा इकाई 5 अलग पाठ है। राघव जन्म 17 जनवरी 1923, आगरा; निधन 12 सितंबर 1962; मूल नाम तिरूमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य। दृष्टि बिरादरी, इतिहास, नारी-स्वाभिमान की है। भाषा आंचल-स्पर्श की खड़ी बोली, संवाद तेज।
कुनबे के झगड़े से भी प्रसंग खुलता है — गहने, सौत, पंचायत। दबाव बड़ा वहाँ बैठता है जहाँ बिरादरी की पाँत और सरकार का कानून आमने-सामने होते हैं। पटेल, दरोगा, सिपाही। निहाल कायर कहता है, सिंधनी कहता है। गदल उसी ताने को सीना ठोंककर लेती है। तर्क यह है कि राज पिसाता रहा, बिरादरी का धर्म नहीं छोड़ा जाता। भाव यह है कि नारी बिरादरी की नाक आप बन जाती है। डोड़ी देवर है। पीछे निकालने का आदेश माँ का है, आगे रहना उसी का है। बिना पाँत के शीर्षक केवल स्त्री-नाम रह जाता। बिना ताने के स्वाभिमान कारण खो देता है। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; बंदूक का पूरा दृश्य यहाँ नहीं उतारा जाता।
अंत प्रतिरोध है। पाँत चलती है। पुलिस रोकना चाहती है। गदल निहाल और नरायन को पीछे से निकालने को कहती है, स्वयं आगे रहती है। गोली पेट में लगती है। सिर गिरता है। एक प्रभाव स्वाभिमान की मृत्यु है, दावत की हँसी नहीं, दंगे की शरण नहीं। जैबू बचाती है। माँ दावत में जीती है। गदल पाँत पर मरती है। तीन स्त्री तीन मूल्य — इंसानियत, इस्तेमाल, स्वाभिमान। यह फुलवा नहीं, कोठी की जीत नहीं। यह अकेली नहीं, न्योते का सूनापन नहीं। यह चंपा नहीं, दीप-आलोक नहीं। नारी आलंबन नहीं, कर्ता है।
शिल्प संवाद तेज, आंचल-स्पर्श, कम प्रतीक-बोझ। सीमा यह कि कुनबा और राज दोनों भीड़ करते हैं। गुण यह कि नारी पाँत पर अपना तर्क रखती है। मुर्दों का टीला उपन्यास अलग है। निषेध साफ हैं। जूठन आत्मकथा है, यह नहीं। तमस दंगा-उपन्यास है। कबीरा नाटक है। शरणदाता फर्ज का नाम है। चीफ की दावत अफसर का नाम है। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रभाव पाँत की चोट है। नामवर कसाव कहते हैं; राघव इतिहास और जाति को एक स्त्री में काटते हैं। प्रेमचंदोत्तर प्रगति और इतिहास की परत हैं। साहनी व्यंग्य देते हैं; राघव पाँत देते हैं। आयु छोटी, लेखन घना।
निष्कर्ष यह है कि गदल नारी-स्वाभिमान को बिरादरी की पाँत से बाँधती है; रूप 1955 की कहानी है, उपन्यास या दलित-आत्मकथा नहीं।
39. इकाई 3 की तीन कहानियों का साम्य-वैषम्य लिखिए।20 अंक
इकाई 3 निर्धारित तीन कहानियाँ हैं। अज्ञेय — शरणदाता; देशकाल 1947 का लाहौर, विभाजन। भीष्म साहनी — चीफ की दावत, 1956; मध्यवर्ग और दिखावा। रांगेय राघव — गदल; जनवरी 1955, पत्रिका कहानी; गुर्जर नारी और बिरादरी। तीन पाठ प्रेमचंदोत्तर परत के हैं। अज्ञेय व्यक्ति और नैतिक द्वंद्व देते हैं। साहनी व्यंग्य और मध्यवर्ग देते हैं। राघव जाति-बिरादरी और इतिहास का दबाव देते हैं। साम्य कहानी-रूप, एक प्रभाव, खड़ी बोली, तिलिस्म से कटान है। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; तीनों उसी चिह्न की अगली चालें हैं — शरण, दावत, पाँत। मनुष्य देवता नहीं। इकाई 2 कला-आदर्श-मन थी; यहाँ व्यक्ति, दिखावा, बिरादरी खुलते हैं। पो एक प्रभाव माँगते हैं; तीनों एक चोट छोड़ते हैं।
वैषम्य स्वर, देशकाल और शिल्प पर है। शरणदाता फर्ज और दंगा। चीफ की दावत दिखावा और माँ। गदल पाँत और राज। देशकाल लाहौर, कर्मचारी-परिवार, गुर्जर गाँव। शिल्प नैतिक घन और कसे वाक्य, व्यंग्य और एक बैठक, आंचल-संवाद और पाँत। भाषा अज्ञेय में कसी, साहनी में बोलचाल, राघव में आंचल-स्पर्श। कारण तीन हैं — फर्ज, तरक्की, बिरादरी का धर्म। स्त्री जैबू काट है, माँ कसौटी है, गदल कर्ता है। पुरुष देविन्दरलाल शरणार्थी है, शामनाथ पुत्र-दिखावा है, निहाल डर और आदेश है। एक कृति दो जातियाँ नहीं मिलाई जातीं; तीन स्वर तीन पाठ हैं।
अंत तीन मूल्य खोलते हैं। देविन्दरलाल बचता है, पत्र इंसानियत याद रखवाता है। माँ जीती है, इस्तेमाल होती है। गदल मरती है। इंसानियत, इस्तेमाल, स्वाभिमान। एक प्रभाव तीन रूप है। सीमा तीन ओर है। अज्ञेय पर दुरुहता और दंगे की चौड़ाई। साहनी पर व्यंग्य का सपाट लगना। राघव पर कुनबा-राज की भीड़। गुण तीन ओर है। फर्ज परीक्षा बनता है। हँसी चोट बनती है। नारी पाँत पर तर्क रखती है। नामवर कसाव कहते हैं; तीनों कसाव अलग आलंबन से चलाते हैं। प्रेमचंद बाहर का समाज देते हैं; ये तीन समाज को व्यक्ति, दावत और बिरादरी से काटते हैं।
निषेध साफ रखे जाते हैं। शेखर एक जीवनी 1941–44 और नदी के द्वीप उपन्यास हैं। तमस 1973 साहनी का विभाजन-उपन्यास है, शरणदाता अज्ञेय की कहानी है। कबीरा खड़ा बाजार में 1981 नाटक है। मुर्दों का टीला राघव का उपन्यास है। फुलवा इकाई 5 है, गदल नहीं। बलराज साहनी अभिनेता हैं। झूठा सच यशपाल का है, यह पाठ नहीं। बिना निषेध के तीन शीर्षक एक ढेर लगते हैं। मूल्यांकन एक को रद्द करके नहीं होता; तीन परत एक इकाई में हैं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है, पूरा आख्यान नहीं। महत्त्व यह है कि इकाई 3 इतिहास को व्यक्ति, व्यंग्य और जाति-बिरादरी से कथा बनाती है।
निष्कर्ष यह है कि साम्य कहानी-रूप और एक प्रभाव पर है, वैषम्य शरण-दावत-पाँत पर है; तीनों निर्धारित पाठ हैं, नाटक या उपन्यास नहीं।
40. अकेली का नामकरण स्पष्ट कीजिए।8 अंक
अकेली मन्नू भंडारी की कहानी है। शीर्षक स्थिति है — स्त्री अकेली है। नायिका सोमा बुआ। आरंभ में परित्यक्ता का संकेत है। जवान बेटा मर चुका है। पति संन्यासी हैं, साल में एक महीना आते हैं, शेष हरिद्वार। स्वभाव कर्कश है, प्यार से बात नहीं, बाहर जाना नापसंद है। विवाह का नाम बाकी है, साथ नहीं। पति होते हुए भी सूनापन पूरा है। रूप स्त्री-अकेलापन की कहानी है, विधवा-उपदेश नहीं। एक प्रभाव सूनेपन की चोट है। नाम दोनों ओर काटता है। जो अकेली कही जाती है, वही दूसरों के शुभ-अशुभ में काम करके दिन काटती है।
प्रसंग न्योता है। मृत देवर के रिश्तेदार की बेटी का ब्याह। अंगूठी बेचकर सौगात, साड़ी रंगना, नई चूड़ियाँ। मुहूर्त पाँच बजे का था, सात बज जाते हैं। राधा पूछती है; बुआ कहती है — अभी बना लूँगी। अंत चूल्हा चलता है, दिल बुझा रहता है। महाभोज 1979 उपन्यास है। आपका बंटी 1971 बाल-उपन्यास है। यही सच है दूसरी कहानी है; रजनीगंधा फिल्म अलग है। एक इंच मुस्कान सह-लेखन है। बिना दीवारों का घर नाटक है।
निष्कर्ष यह है कि नामकरण सोमा के अकेलेपन से है; कृति कहानी है, आपका बंटी या महाभोज नहीं।
41. मन्नू भंडारी का परिचय लिखिए।8 अंक
मन्नू भंडारी का जन्म 3 अप्रैल 1931, भानपुरा, मंदसौर, मध्य प्रदेश। निधन 15 नवंबर 2021, गुरुग्राम। बचपन का नाम महेंद्र कुमारी। पति राजेंद्र यादव; सारा आकाश उनकी कृति है, यह पाठ नहीं। अध्यापन दिल्ली के मिरांडा हाउस में। निर्धारित अकेली है — सोमा बुआ, सूनापन। आपका बंटी 1971 उपन्यास है। महाभोज 1979 राजनीति-उपन्यास है। यही सच है कहानी है; रजनीगंधा फिल्म उससे बनी, पाठ नहीं। एक इंच मुस्कान सह-लेखन है। बिना दीवारों का घर नाटक है। दृष्टि स्त्री-मन, परिवार-दबाव, नई कहानी की है। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली।
मन्नू प्रेमचंद का विलोम नहीं, स्त्री-स्वर की अगली परत हैं। प्रेमचंद बाहर का समाज देते हैं। नई कहानी व्यक्ति देती है। मन्नू सूनापन भीतर से दिखाती हैं। सीमा यह कि व्यथा एक स्त्री पर सिमट सकती है। गुण यह कि पति होते हुए भी अकेलापन परीक्षा का प्रश्न बनता है। बिना अकेली काटे परिचय उपन्यास-फिल्म रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि मन्नू 1931–2021 की नई कहानी की कथाकार हैं; निर्धारित अकेली है, महाभोज उपन्यास-पत्र की कृति है।
42. अकेली की कथावस्तु लिखिए।20 अंक
अकेली मन्नू भंडारी की कहानी है। कथावस्तु सोमा बुआ की है। मन्नू जन्म 3 अप्रैल 1931, भानपुरा, मंदसौर; निधन 15 नवंबर 2021, गुरुग्राम; बचपन महेंद्र कुमारी। पति राजेंद्र यादव; सारा आकाश उनकी कृति है, यह पाठ नहीं। दृष्टि स्त्री-मन, परिवार-दबाव, नई कहानी की है। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली। शीर्षक स्थिति है — स्त्री अकेली है। आरंभ में परित्यक्ता का संकेत है। जवान बेटा मर चुका है। पति संन्यासी हैं, साल में एक महीना आते हैं, शेष हरिद्वार। स्वभाव कर्कश है। प्यार से बात नहीं। बाहर जाना नापसंद है। भाव यह है कि विवाह का नाम बाकी है, साथ नहीं। सोमा पति के होते हुए भी अकेली है, विधवा-सूची से नहीं।
दिनचर्या काम की है। गाँव में शादी, मुंडन, गमी — छाती फाड़कर श्रम। हारी-बीमारी नहीं देखती। व्यवधान उसी एक महीने का है जब पति आते हैं। नाम दोनों ओर काटता है। जो अकेली कही जाती है, वही दूसरों के शुभ-अशुभ में काम करके दिन काटती है। चीफ की दावत माँ को छिपाती है। यह स्त्री खुद दिखना चाहती है, बुलावा नहीं आता। बिना सोमा के शीर्षक हवा में रहता। बिना काम के सूनापन केवल रोना रह जाता। एक प्रभाव सूनेपन की चोट है, दावत की हँसी नहीं, पाँत की गोली नहीं। रूप कहानी है, विधवा-उपदेश नहीं।
मध्य न्योता है। मृत देवर के रिश्तेदार की बेटी का ब्याह गाँव में तय होता है। बुआ जान लेती है कि बुलावा आ सकता है। दो चिंताएँ — खाली हाथ न जाना, पहनकर क्या जाना। मृत पुत्र की अंगूठी बेचकर सौगात बनती है। पुरानी साड़ी रंगी जाती है, कलफ और चमक। घिसी चूड़ियाँ उतरती हैं, नई चढ़ती हैं। उत्साह बच्चे जैसा है। विवाह-दिन सुबह से दरवाजे पर टकटकी है। मुहूर्त पाँच बजे का था। शाम सात बज जाते हैं। राधा छत पर छाया-मूर्ति देखकर पूछती है। बुआ यकीन नहीं करती कि सात बज गए। खाने का प्रश्न आने पर निराशा छिपाकर कहती है — अभी बना लूँगी।
अंत इंतजार है। सौगात संदूक में लौटती है। साड़ी तह होती है। नई चूड़ियाँ उतरती हैं। दिल बुझा रहकर भी चूल्हा चलता है। भाव यह है कि स्त्री के दुख पर काम हावी रहता है। महाभोज 1979 राजनीति फैलाता है। आपका बंटी 1971 बच्चे को फैलाता है। यही सच है दूसरी कहानी है; रजनीगंधा फिल्म है। एक इंच मुस्कान सह-लेखन है। बिना दीवारों का घर नाटक है। यह एक दिन का सूनापन सिमटाता है। पाठ प्रसंग-भाव से होता है, पूरा दृश्य नहीं। सीमा यह कि व्यथा एक विवाह-दिन पर सिमट सकती है। गुण यह कि न्योता न आने पर भी चौका नहीं रुकता। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रभाव अकेलेपन की चोट है।
निष्कर्ष यह है कि कथावस्तु संन्यास और न्योता से चूल्हे तक चलती है; केंद्र अकेलापन है, महाभोज का विस्तार या रजनीगंधा का पर्दा नहीं।
43. सोमा बुआ का चरित्र-चित्रण कीजिए।20 अंक
सोमा अकेली की नायिका है। बुआ कही जाती है। मन्नू भंडारी 1931–2021 की नई कहानी की कथाकार हैं; निर्धारित यही स्त्री-पाठ है। श्रम से दिन काटती है। पति संन्यासी हैं। बेटा जवान मर चुका है। आरंभ में परित्यक्ता का संकेत है। गुण काम, उत्साह, निराशा छिपाना हैं। गोल चरित्र है। सपाट विधवा केवल रोती। यह न्योते पर साड़ी रंगती है, अंगूठी बेचती है, दरवाजे पर टकटकी लगाती है। राधा के प्रश्न पर खाना अभी बना लूँगी कहती है। दुख काम से ढकती है। शीर्षक उसी पर बैठता है — अकेली। पति होते हुए भी सूनापन पूरा है। विवाह का नाम बाकी है, साथ नहीं। स्वभाव पति का कर्कश है; बाहर जाना नापसंद है। साल में एक महीना आते हैं, शेष हरिद्वार।
प्रसंग बेटे की मृत्यु से बैठता है। दुख से हारकर पति संन्यासी हो जाते हैं। सोमा निस्संतान रह जाती है। दिन शादी-मुंडन-गमी के काम से कटता है। न्योता आने की संभावना उत्साह जगाती है — बच्चे जैसा। मृत पुत्र की अंगूठी सौगात बनती है। मुहूर्त पाँच बजे का था, सात बज जाते हैं। सौगात संदूक में लौटती है। चूड़ियाँ उतरती हैं। चूल्हा फिर भी जलता है। भाव यह है कि स्त्री दिखना चाहती है, बुलावा नहीं आता। माँ चीफ की दावत में छिपाई जाती है। गदल पाँत पर मरती है। यह दिखना चाहती है, बुलावा नहीं आता। तीन स्त्री तीन सूनापन नहीं; यह अकेलापन पति के रहते है।
नई कहानी व्यक्ति, शहर और दांपत्य खोलती है; सोमा गाँव-बुआ पर वही व्यक्ति-स्वर है। मन्नू प्रेमचंद का विलोम नहीं, स्त्री-स्वर की अगली परत हैं। प्रेमचंद बाहर का समाज देते हैं। साहनी दिखावा देते हैं। मन्नू सूनापन भीतर से दिखाती हैं। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली है। प्रसाद की गरिमा नहीं। जैनेन्द्र के छोटे विचार-वाक्य नहीं। अज्ञेय का नैतिक घन नहीं। सीमा यह कि व्यथा एक विवाह-दिन पर सिमट सकती है। गुण यह कि पति का नाम बाकी रहकर साथ नहीं रहता। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रभाव सूनेपन की चोट है। नामवर कसाव कहते हैं; मन्नू एक दिन में अकेलापन काटती हैं।
निषेध साफ हैं। महाभोज 1979 राजनीति-उपन्यास है, यह चरित्र नहीं। आपका बंटी 1971 बाल-उपन्यास है। एक इंच मुस्कान 1962 सह-लेखन है। यही सच है कहानी है, रजनीगंधा फिल्म अलग है। बिना दीवारों का घर नाटक है। सारा आकाश यादव की कृति है। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; पूरे श्रम-दृश्य यहाँ नहीं उतारे जाते। बिना न्योते के उत्साह नहीं बैठता। बिना चूल्हे के अंत केवल रोना रह जाता। बिना राधा के समय की चोट पतली पड़ती है। अध्यापन दिल्ली के मिरांडा हाउस का स्पर्श परिचय में आता है; चरित्र गाँव की बुआ का है, कॉलेज का नहीं।
निष्कर्ष यह है कि सोमा अकेलेपन की नायिका है; पहचान संन्यासी पति, न्योता और चूल्हे से है, महाभोज की राजनीति या फिल्म-नायिका से नहीं।
44. अकेली और महाभोज में अंतर लिखिए।8 अंक
अकेली कहानी है। नायिका सोमा बुआ। संन्यासी पति, मृत पुत्र, न्योता, सूनापन। एक दिन का इंतजार, एक प्रभाव। पढ़ी जाती है। महाभोज 1979 का उपन्यास है। राजनीति, नौकरशाही, भ्रष्टाचार, आम आदमी। विस्तार कई सूत्रों का है। लेखक एक — मन्नू भंडारी, 1931 भानपुरा–2021 गुरुग्राम। विधा अलग है। अकेली नई कहानी की स्त्री-परत है। महाभोज समकालीन राजनीति का दीर्घ रूप है। आपका बंटी 1971 बाल-उपन्यास है, धर्मयुग-ख्याति अलग। एक इंच मुस्कान 1962 सह-लेखन है। यही सच है कहानी है, रजनीगंधा फिल्म है। बिना दीवारों का घर नाटक है।
भेद आलंबन पर भी है। अकेली में आलंबन बुआ का अकेलापन है। महाभोज में आलंबन तंत्र और सत्ता है। बिना अंतर के एक लेखिका दो कृतियाँ एक नाम लगती हैं। पत्र कहानी माँगता है। सारा आकाश यादव का उपन्यास है, मन्नू का पर्याय नहीं। सीमा यह कि व्यथा एक विवाह-दिन पर सिमट सकती है; गुण यह कि न्योता न आने पर भी चौका नहीं रुकता।
निष्कर्ष यह है कि अकेली कहानी है, महाभोज उपन्यास है; एक नाम से दो विधाएँ नहीं ढकतीं।
45. गलत होता पंचतंत्र का नामकरण स्पष्ट कीजिए।8 अंक
गलत होता पंचतंत्र राजे सेठ की कहानी है। पाठ्यक्रम-नाम राजे सेठ; लेखिका राजी सेठ भी कही जाती हैं — एक ही नाम। पंचतंत्र विष्णु शर्मा की नीति-कथा है — पशु-कथा से जीना सिखाना। शीर्षक कहता है कि वही नीति आधुनिक स्त्री-रिश्ते में गलत बैठती है। रूप आत्मकथात्मक कहानी है, नीति-ग्रंथ नहीं, उपन्यास नहीं। वाचक युवा माँ है। छोटा बच्चा आँचल तक सीमित है। पितृसत्ता पुरुष को जन्मजात फायदा देती है। माँ होना अपने को भूलना — समाज की यह सचाई कथा का दबाव है। वाचक खाना, बर्तन, व्यवस्था और लेखन एक साथ साधना चाहती है। एक प्रभाव स्वप्न और दायित्व के बीच पिसने की चोट है।
नाम व्यंग्य है, उपदेश नहीं। अंत दोहरी हार है — न लिखना चल पाता है, न बच्चे के साझे पल बचते हैं। बचा अपराध-बोध। तत-सम उपन्यास है। निष्कवच उपन्यास है। हिंदी अकादमी सम्मान कथा नहीं। अकेली स्त्री-नाम है। ज़िंदगी और जोंक प्रतीक-नाम है। यह नीति-नाम है जो टूटता है।
निष्कर्ष यह है कि नामकरण नीति के आधुनिक भंग से है; कृति आत्मकथात्मक कहानी है, पंचतंत्र-ग्रंथ या तत-सम नहीं।
46. गलत होता पंचतंत्र की मूल संवेदना लिखिए।20 अंक
गलत होता पंचतंत्र राजे सेठ की कहानी है। पाठ्यक्रम-नाम राजे सेठ; लेखिका राजी सेठ, राज़ी सेठ भी लिखी जाती हैं — एक ही नाम। जन्म अक्तूबर 1935, नौशेरा छावनी; बचपन विभाजन की त्रासदी में। एम.ए. अंग्रेजी। पहली कहानी 1975, अज्ञेय-संपादित नया प्रतीक। दृष्टि मानव-मन, स्त्री-स्वप्न, मनोविज्ञान की है। भाषा तत्सम-स्पर्श, आंतरिक परत। पंचतंत्र विष्णु शर्मा की नीति-कथा है — पशु-कथा से जीना सिखाना। शीर्षक कहता है कि वही नीति आज गलत बैठती है। रूप आत्मकथात्मक कहानी है, नीति-ग्रंथ नहीं, उपन्यास नहीं। वाचक युवा माँ है। छोटा बच्चा आँचल तक सीमित है। एक प्रभाव स्वप्न और दायित्व के बीच पिसने की चोट है।
संवेदना विवाह की व्यवस्था से बैठती है। बच्चा चाह नहीं था, थोप दिया गया। फिर सहज ममता उमड़ती है। पितृसत्ता पुरुष को जन्मजात फायदा देती है। माँ होना अपने को भूलना — समाज की यह सचाई कथा का दबाव है। वाचक खाना, बर्तन, व्यवस्था और लेखन एक साथ साधना चाहती है। दिन-रात अपने से जूझती है। व्यक्तिगत जीवन सँवारने का स्वप्न है। बच्चा छोटी जिज्ञासा तक माँ पर निर्भर है। ध्यान न पाकर धीरे आत्मनिर्भर किशोर की ओर बढ़ता है। उधर लिखना-पढ़ना टूटता है। दोनों साधना टूटती है। नाम व्यंग्य है, उपदेश नहीं। अकेली स्त्री-नाम है। ज़िंदगी और जोंक प्रतीक-नाम है। यह नीति-नाम है जो टूटता है।
अंत दोहरी हार है। न लिखना चल पाता है, न बच्चे के साझे पल बचते हैं। लड़की के स्वप्न का हरण पितृसत्ता करती है। बचा अपराध-बोध। क्षोभ केवल उस युवती पर नहीं, जुड़े हर व्यक्ति पर पड़ता है। अकेली बाहर का न्योता है। जोंक बाहर का अपमान है। यह भीतर का लेखन और मातृत्व है। तत-सम विस्तार है, यह कहानी का एक प्रभाव है। निष्कवच उपन्यास अलग है। हिंदी अकादमी सम्मान; तत-सम पर भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार — सम्मान कथा नहीं। पाठ संवाद-ढेर नहीं उतारता; द्वंद्व यहीं बैठता है। बिना लेखन के कथा केवल माँ-व्याख्यान रह जाती। बिना बच्चे के स्वप्न अकेली जैसा सूनापन रह जाता, नीति-भंग नहीं।
शिल्प आत्मकथात्मक वाचक, आंतरिक परत, मनोविज्ञान है। घटना बड़ी लड़ाई नहीं, दिनचर्या है। अज्ञेय नैतिक घन रखते हैं। साहनी व्यंग्य रखते हैं। सेठ भीतर का द्वंद्व रखती हैं। सीमा दुरुहता का आक्षेप है। गुण यह कि नीति का नाम यथार्थ काट देता है। सेठ मन्नू का विलोम नहीं, अगली स्त्री-परत हैं। मन्नू सूनापन बाहर के न्योते पर दिखाती हैं। सेठ माँ और लेखिका को एक शरीर में काटती हैं। अमरकांत निर्धन बाहर रखते हैं। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रभाव हार और बोध है। नामवर कसाव कहते हैं; सेठ दिनचर्या काटकर प्रश्न घना करती हैं। युगसाक्षी का सह-संपादन परिचय में आता है; निर्धारित पाठ यही नीति-भंग है।
निष्कर्ष यह है कि मूल संवेदना माँ और लेखिका के बीच पिसने की है; रूप आत्मकथात्मक कहानी है, पंचतंत्र-ग्रंथ या तत-सम नहीं।
47. राजे सेठ का परिचय लिखिए।8 अंक
पाठ्यक्रम-नाम राजे सेठ है। लेखिका राजी सेठ, राज़ी सेठ भी लिखी जाती हैं — एक ही नाम। जन्म अक्तूबर 1935, नौशेरा छावनी, अविभाजित भारत। बचपन विभाजन की त्रासदी में बीता। एम.ए. अंग्रेजी। लिखना उत्तरार्ध में। पहली कहानी 1975, अज्ञेय-संपादित नया प्रतीक। निर्धारित गलत होता पंचतंत्र है — आत्मकथात्मक माँ, लेखन, नीति-भंग। तत-सम उपन्यास है, राजकमल; सूक्ष्म शिल्प के लिए जाना जाता है। निष्कवच उपन्यास अलग है। दृष्टि मानव-मन, स्त्री-स्वप्न, मनोविज्ञान की है। भाषा तत्सम-स्पर्श, आंतरिक परत। युगसाक्षी का सह-संपादन। हिंदी अकादमी सम्मान; तत-सम पर भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार।
सेठ मन्नू का विलोम नहीं, अगली स्त्री-परत हैं। मन्नू सूनापन बाहर के न्योते पर दिखाती हैं। सेठ माँ और लेखिका को एक शरीर में काटती हैं। अमरकांत निर्धन बाहर रखते हैं। सीमा दुरुहता का आक्षेप है। गुण यह कि नीति-ग्रंथ का नाम आधुनिक रिश्ते पर उल्टा बैठता है। बिना पंचतंत्र-कहानी काटे परिचय उपन्यास-सम्मान रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि राजे सेठ 1935 की कथाकार हैं; निर्धारित गलत होता पंचतंत्र है, तत-सम उपन्यास है।
48. ज़िंदगी और जोंक का नामकरण स्पष्ट कीजिए।8 अंक
ज़िंदगी और जोंक अमरकांत की कहानी है। शीर्षक दो वस्तुएँ जोड़ता है। जोंक खून चूसती है। अर्थ यह है कि गरीबी और अपमान मनुष्य को चूसते हैं। उल्टा अर्थ भी बैठता है — मध्यवर्ग निर्धन को जोंक कहता है, श्रम चूसता खुद है। नायक रजुआ — निर्धन मजदूर, छोटे काम, बचा खाना, अपमान। वाचक उत्तम पुरुष, मध्यवर्ग, दर्पण। रजुआ साला कहकर पुकारा जाता है। श्रम लिया जाता है, इज्जत नहीं। रूप करुण-यथार्थ की कहानी है, दलित-आत्मकथा का पर्याय नहीं। देशकाल कस्बा-शहर का कर्मचारी-परिवेश, स्टेशन, खंडहर। एक प्रभाव शोषण की चोट है।
प्रसंग बीमारी तक जाता है। मृत्यु पर वाचक को शांति मिलती है, बोझ उतरता है। भाव दया का सुख नहीं, व्यंग्य है — निर्धन की ज़िंदगी काँटा थी, मृत्यु राहत बनती है। डिप्टी कलेक्टरी 1955 की दूसरी कहानी है, नौकरी-दिखावा, यह जोंक नहीं। हत्यारे, बहादुर, फर्क, मूस अन्य हैं। इन्हीं हथियारों से उपन्यास है। इसी नाम का संग्रह भी है; निर्धारित कहानी है।
निष्कर्ष यह है कि नामकरण शोषण के प्रतीक से है; कृति करुण-यथार्थ की कहानी है, डिप्टी कलेक्टरी नहीं।
49. अमरकांत का परिचय लिखिए।8 अंक
अमरकांत का जन्म 1 जुलाई 1925, भगमल पुर, नगरा के पास, बलिया। निधन 17 फरवरी 2014, इलाहाबाद। बचपन का नाम श्रीराम, श्रीराम लाल भी। स्वतंत्रता-आंदोलन 1942 का स्पर्श। पत्रकार, संपादक, कहानीकार। ख्याति 1955 डिप्टी कलेक्टरी से — निर्धारित यह पाठ नहीं। यशपाल उन्हें गोर्की कहते थे। साहित्य अकादमी 2007। पत्नी गिरिजा देवी। निर्धारित ज़िंदगी और जोंक है; नायक रजुआ, वाचक मध्यवर्ग। अन्य कहानियाँ हत्यारे, बहादुर, फर्क, मूस — मिलाएँ नहीं। उपन्यास इन्हीं हथियारों से, सूखा पत्ता अलग हैं। दृष्टि करुण-यथार्थ, मध्यवर्ग की निर्ममता, व्यंग्य की है। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली, उपमा तीखी।
नई कहानी की त्रयी — राकेश, यादव, कमलेश्वर — के शोर में देर तक हाशिये पर रहे। प्रेमचंद का निषेध नहीं, साधारण मनुष्य की अगली परत हैं। गुण यह कि हँसी और करुणा एक साथ काटती हैं। सीमा यह कि करुणा कभी सपाट दया लग सकती है। बिना जोंक काटे परिचय ख्याति-कहानी रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि अमरकांत 1925–2014 के यथार्थवादी कथाकार हैं; निर्धारित ज़िंदगी और जोंक है, डिप्टी कलेक्टरी अन्य कहानी है।
50. रजुआ का चरित्र-चित्रण कीजिए।20 अंक
रजुआ ज़िंदगी और जोंक का नायक है। निर्धन मजदूर। अमरकांत जन्म 1 जुलाई 1925, भगमल पुर, नगरा के पास, बलिया; निधन 17 फरवरी 2014, इलाहाबाद; बचपन श्रीराम, श्रीराम लाल भी। दृष्टि करुण-यथार्थ, मध्यवर्ग की निर्ममता, व्यंग्य की है। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली, उपमा तीखी। छोटे काम, बचा खाना। अपमान रजुआ साला। श्रम लिया जाता है, इज्जत नहीं। वाचक उत्तम पुरुष, मध्यवर्ग, दर्पण है। शीर्षक दो वस्तुएँ जोड़ता है — ज़िंदगी और जोंक। जोंक खून चूसती है। अर्थ यह है कि गरीबी और अपमान मनुष्य को चूसते हैं। उल्टा अर्थ भी बैठता है — मध्यवर्ग निर्धन को जोंक कहता है, श्रम चूसता खुद है। रूप करुण-यथार्थ की कहानी है, दलित-आत्मकथा का पर्याय नहीं।
गोल चरित्र है। सपाट गरीब केवल भीख माँगता। यह पगली, शनीचरी, बरन की बहू, भगत बनना — मनुष्य की परतें रखता है। स्टेशन की पगली रेखा है। शनीचरी डोमिन की रेखा है। बरन की बहू से टूटन के बाद दाढ़ी, भगत बनना, राम-सीता की बात पंडित की दुकान पर — ये प्रसंग मनुष्य को केवल मजदूर नहीं रहने देते। बीमारी और खंडहर तक जाता है। मृत्यु पर वाचक को शांति मिलती है, बोझ उतरता है। भाव दया का सुख नहीं, व्यंग्य है — निर्धन की ज़िंदगी मध्यवर्ग को काँटा थी, मृत्यु राहत बनती है। सोमा सूनी जीती है। पंचतंत्र की माँ हारकर जीती है। यह मरता है। तीन अंत। शामनाथ माँ इस्तेमाल करता है; यह वाचक मजदूर इस्तेमाल करता है।
देशकाल कस्बा-शहर का कर्मचारी-परिवेश, स्टेशन, खंडहर। एक प्रभाव शोषण की चोट है, सूनेपन का न्योता नहीं, नीति का अपराध-बोध नहीं। बिना रजुआ के जोंक केवल जीव-विज्ञान रह जाती। बिना वाचक के व्यंग्य दर्पण खो देता है। यशपाल उन्हें गोर्की कहते थे। ख्याति डिप्टी कलेक्टरी 1955 से — निर्धारित यह पाठ नहीं। साहित्य अकादमी 2007। नई कहानी की त्रयी — राकेश, यादव, कमलेश्वर — के शोर में देर तक हाशिये पर रहे। प्रेमचंद का निषेध नहीं, साधारण मनुष्य की अगली परत हैं। गुण यह कि हँसी और करुणा एक साथ काटती हैं। सीमा यह कि करुणा कभी सपाट दया लग सकती है।
निषेध साफ हैं। डिप्टी कलेक्टरी नौकरी और दिखावे की दूसरी कहानी है, यह चरित्र नहीं। हत्यारे, बहादुर, फर्क, मूस अन्य कहानियाँ हैं। इन्हीं हथियारों से, सूखा पत्ता उपन्यास अलग हैं। फुलवा इकाई 5 है, दलित नायिका का वैभव-उलटन; यह निर्धन-मजदूर का करुण-यथार्थ है। जूठन आत्मकथा है, यह नहीं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; पूरा आख्यान नहीं। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रभाव शांति का कलंक है। नामवर कसाव कहते हैं; अमरकांत सादी भाषा से काटते हैं। पत्नी गिरिजा देवी परिचय में आती हैं; चरित्र रजुआ का है। बिना मृत्यु के जोंक अधूरी। बिना शांति के व्यंग्य दया रह जाता।
निष्कर्ष यह है कि रजुआ शोषित मजदूर है; पहचान जोंक, साला-अपमान और मृत्यु-शांति से है, नौकरी-कहानी के बाबू से नहीं।
51. ज़िंदगी और जोंक की कथावस्तु लिखिए।20 अंक
ज़िंदगी और जोंक अमरकांत की कहानी है। कथावस्तु रजुआ और उत्तम-पुरुष वाचक की है। शीर्षक प्रतीक है। जोंक खून चूसती है। ज़िंदगी निर्धन को चूसती है। उल्टा यह भी कि मध्यवर्ग मजदूर को जोंक कहता है, श्रम खुद चूसता है। रूप करुण-यथार्थ। देशकाल कस्बा-शहर का कर्मचारी-परिवेश। अमरकांत 1925 बलिया–2014 इलाहाबाद; 1942 आंदोलन का स्पर्श; पत्रकार, संपादक। निर्धारित यही जोंक-पाठ है; इसी नाम का संग्रह भी है, परीक्षा कहानी माँगती है। मजदूर छोटे काम करता है। बचा भोजन, हँसी-अपमान। जोंक शीर्षक से पहले बैठती है। रजुआ साला कहकर पुकारा जाता है। श्रम लिया जाता है, इज्जत नहीं।
मध्य हाशिये की रेखाएँ हैं। स्टेशन की पगली। शनीचरी डोमिन। बरन की बहू से टूटन, दाढ़ी, भगत। पंडित की दुकान पर राम-सीता। मनुष्य मजदूर से बड़ा दिखता है, इज्जत नहीं मिलती। पाठ पूरा आख्यान नहीं उतारता; प्रतीक और अपमान यहीं बैठते हैं। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण शोषण है, संयोग नहीं। अकेली में कारण न्योता है। पंचतंत्र में कारण मातृत्व-लेखन है। तीन कथावस्तु तीन केंद्र। एक प्रभाव शोषण की चोट है, सूनेपन का न्योता नहीं, नीति का अपराध-बोध नहीं। बिना रजुआ के जोंक जीव-विज्ञान रह जाती। बिना वाचक के व्यंग्य दर्पण खो देता है।
अंत बीमारी, खंडहर, मृत्यु है। वाचक को शांति और बोझ-उतरना मिलता है। व्यंग्य यही है कि निर्धन की ज़िंदगी काँटा थी। दया का सुख नहीं, कलंक है। चीफ की दावत माँ को इस्तेमाल करती है। यह मजदूर को इस्तेमाल कर के राहत महसूस करती है। गदल पाँत पर मरती है; रजुआ बीमारी और उपेक्षा पर मरता है। तीन मृत्यु-राहत तीन मूल्य नहीं; यहाँ राहत कलंक है। अकेली न्योता है। पंचतंत्र लेखन है। यह शोषण है। डिप्टी कलेक्टरी दिखावा-नौकरी है, यह जोंक नहीं। भाषा बोलचाल, उपमा तीखी। शिल्प व्यंग्य। सीमा यह कि प्रतीक शीर्षक में पहले से खुल जाता है। गुण यह कि शांति का वाक्य परीक्षा का केंद्र बनता है।
निषेध साफ हैं। डिप्टी कलेक्टरी 1955 ख्याति-कहानी है, निर्धारित नहीं। हत्यारे, बहादुर, फर्क, मूस अन्य हैं। इन्हीं हथियारों से उपन्यास है। फुलवा इकाई 5 है। जूठन आत्मकथा है। यशपाल गोर्की कहते थे; साहित्य अकादमी 2007 सम्मान है, कथा नहीं। नई कहानी की त्रयी के शोर में देर हाशिये पर रहे। प्रेमचंद की अगली परत हैं, विलोम नहीं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है। पो एक प्रभाव माँगते हैं; कई उपदेश कथा तोड़ देते। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; करुण-यथार्थ उसी चिह्न की चाल है। बिना मृत्यु के जोंक अधूरी। बिना शांति के व्यंग्य दया रह जाता।
निष्कर्ष यह है कि कथावस्तु अपमान से मृत्यु-शांति तक चलती है; केंद्र जोंक का प्रतीक है, उपन्यास-विस्तार या डिप्टी कलेक्टरी नहीं।
52. इकाई 4 की तीन कहानियों का साम्य-वैषम्य लिखिए।20 अंक
इकाई 4 निर्धारित तीन कहानियाँ हैं। मन्नू भंडारी — अकेली; नायिका सोमा बुआ; पति होते हुए भी अकेलापन। राजे सेठ — गलत होता पंचतंत्र; आत्मकथात्मक माँ और लेखन। अमरकांत — ज़िंदगी और जोंक; नायक रजुआ; जोंक शोषण का प्रतीक। तीन पाठ नई कहानी के बाद की स्त्री-यथार्थ परत हैं। मन्नू नई कहानी की बड़ी स्त्री-नाम हैं — 1931 भानपुरा–2021। सेठ सूक्ष्म मन और मातृत्व का द्वंद्व देती हैं — जन्म 1935, नौशेरा। अमरकांत प्रेमचंद के बाद का करुण-यथार्थ देते हैं — 1925 बलिया–2014। साम्य कहानी-रूप, एक प्रभाव, खड़ी बोली, तिलिस्म से कटान है। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; तीनों उसी चिह्न की स्त्री-यथार्थ चालें हैं — सूनापन, नीति-भंग, जोंक। मनुष्य देवता नहीं। इकाई 3 शरण, दावत, पाँत थी; यहाँ अकेलापन, माँ का लेखन, शोषण खुलते हैं।
वैषम्य स्वर, देशकाल और शिल्प पर है। अकेली सूनापन और न्योता। पंचतंत्र नीति-भंग और मातृत्व। जोंक अपमान और प्रतीक। देशकाल गाँव-बुआ, आत्मकथात्मक परिवार, कस्बा-मजदूर। शिल्प बोलचाल और एक दिन का इंतजार, आंतरिक परत और अपराध-बोध, व्यंग्य और मृत्यु-शांति। वाचक मन्नू में वर्णन, सेठ में युवा माँ, अमरकांत में उत्तम पुरुष मध्यवर्ग। स्त्री कर्ता भी है, पिसती भी है; मजदूर चूसा जाता है। सोमा दिखना चाहती है। सेठ की वाचक लिखना चाहती है। रजुआ इज्जत चाहता है, मिलती नहीं। कारण तीन हैं — बुलावा न आना, मातृत्व-लेखन का द्वंद्व, शोषण।
अंत तीन मूल्य खोलते हैं। सोमा जीती है, सूनी रहती है, चूल्हा चलता है। वाचक-माँ हारती है, बोध रखती है। रजुआ मरता है, वाचक राहत पाता है — राहत कलंक है। एक प्रभाव तीन रूप है। सीमा तीन ओर है। मन्नू पर व्यथा का एक दिन पर सिमटना। सेठ पर दुरुहता। अमरकांत पर करुणा का दया लगना। गुण तीन ओर है। पति रहते अकेलापन प्रश्न बनता है। नीति का नाम यथार्थ काटता है। शांति का वाक्य व्यंग्य बनता है। नामवर कसाव कहते हैं; तीनों कसाव अलग आलंबन से चलाते हैं। प्रेमचंद बाहर का समाज देते हैं; ये तीन स्त्री-मन, मातृत्व और मजदूर से काटते हैं।
निषेध साफ रखे जाते हैं। महाभोज 1979, आपका बंटी 1971, एक इंच मुस्कान 1962, रजनीगंधा फिल्म, बिना दीवारों का घर नाटक — अकेली नहीं। तत-सम और निष्कवच सेठ के उपन्यास हैं। डिप्टी कलेक्टरी 1955, हत्यारे, बहादुर, फर्क, मूस, इन्हीं हथियारों से — जोंक नहीं। फुलवा इकाई 5 है। सारा आकाश यादव का उपन्यास है। यही सच है दूसरी कहानी है। बिना निषेध के तीन शीर्षक एक ढेर लगते हैं। मूल्यांकन एक को रद्द करके नहीं होता; तीन परत एक इकाई में हैं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है, पूरा आख्यान नहीं। महत्त्व यह है कि इकाई 4 नई कहानी की स्त्री और प्रेमचंदोत्तर यथार्थ को एक साथ परीक्षा में बाँधती है।
निष्कर्ष यह है कि साम्य कहानी-रूप और एक प्रभाव पर है, वैषम्य सूनापन-नीति-जोंक पर है; तीनों निर्धारित पाठ हैं, उपन्यास या फिल्म नहीं।
53. स्नेहबंध का नामकरण स्पष्ट कीजिए।8 अंक
स्नेहबंध मालती जोशी की कहानी है। शीर्षक दो शब्द जोड़ता है — स्नेह और बंध। अर्थ अपनापन भी है, नियंत्रण भी है। वाचक माँ है। पुत्र ध्रुव। होनेवाली बहू मीता आधुनिक वेश में आती है। पारंपरिक चौका-कौशल पर माँ चिंतित है। बैठक मेहमानों से भरी है। माँ ध्रुव को आचार-सूची थमाती है — कैसे रहे, क्या पहने, चौका कैसे सँभाले। भाव यह है कि स्नेह पहले नियम बनना चाहता है। ध्रुव सेतु है। मीता कसौटी है, अपराधी नहीं। रूप परिवार-कहानी है, उपन्यास नहीं, धारावाहिक नहीं। एक प्रभाव स्नेह की कसौटी है।
नाम दोनों ओर काटता है। जो स्नेह कहती है, वही नियम-सूची भी थमाती है। अंत गर्व की ओर मुड़ता है। बहू के आचरण पर आशंका कटती है। विवाह-वर्षगाँठ का आश्चर्य उत्सव स्नेह को नियम से बड़ा कर देता है। सात फेरे दूरदर्शन धारावाहिक है, यह नहीं। पद्मश्री 2018 सम्मान है, कृति नहीं। मनोहर श्याम जोशी अलग लेखक हैं। अकेली सूनेपन का नाम है। फैसला निर्णय का नाम है।
निष्कर्ष यह है कि नामकरण स्नेह और नियंत्रण दोनों से है; कृति कहानी है, धारावाहिक या सम्मान-मात्र नहीं।
54. मालती जोशी का परिचय लिखिए।8 अंक
मालती जोशी का जन्म 4 जून 1934, औरंगाबाद। एम.ए. हिन्दी, आगरा विश्वविद्यालय, 1956। कहानी, बाल-कथा, उपन्यास। पद्मश्री 2018, साहित्य-शिक्षा। भवभूति अलंकरण 1998, मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन। निर्धारित स्नेहबंध है। वाचक माँ है। पुत्र ध्रुव सेतु है। होनेवाली बहू मीता कसौटी है। आचार-सूची स्नेह का कठोर सिरा है; वर्षगाँठ गर्व का नरम सिरा है। संग्रह स्नेह बंध तथा अन्य कहानियाँ; पहले मध्यांतर 1977, पटाक्षेप, पराजय। कुछ कथाओं से सात फेरे धारावाहिक बना; गुलज़ार के किरदार में कुछ कथाएँ गईं — निर्धारित यही एक कहानी है। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली, छोटे अनुभव। दृष्टि परिवार, स्नेह, दैनंदिन क्षण की है।
वाचक प्रायः उत्तम पुरुष। मनोहर श्याम जोशी अलग लेखक हैं। जोशी मन्नू का विलोम नहीं, परिवार-परत हैं। मन्नू सूनापन देती हैं। जोशी स्नेह को बंधन और अपनापन दोनों बनाती हैं। पुष्पा गाँव की राजनीति देती हैं। सीमा मध्यवर्ग-सिमटाव। गुण यह कि छोटी अनुभूति परीक्षा का प्रश्न बनती है। बिना स्नेहबंध काटे परिचय पद्मश्री-पर्दा रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि मालती जोशी 1934 की परिवार-कथाकार हैं; निर्धारित स्नेहबंध है, सात फेरे पर्दा है।
55. स्नेहबंध की कथावस्तु लिखिए।20 अंक
स्नेहबंध मालती जोशी की कहानी है। कथावस्तु माँ-वाचक की है। जोशी जन्म 4 जून 1934, औरंगाबाद; एम.ए. हिन्दी, आगरा विश्वविद्यालय, 1956। पद्मश्री 2018, साहित्य-शिक्षा। भवभूति अलंकरण 1998। दृष्टि परिवार, स्नेह, दैनंदिन क्षण की है। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली। वाचक प्रायः उत्तम पुरुष। पुत्र ध्रुव का ब्याह तय है। बहू मीता आधुनिक वेश में आती है। पारंपरिक चौका-कौशल पर माँ चिंतित है। बैठक मेहमानों से भरी है। शीर्षक दो शब्द जोड़ता है — स्नेह और बंध। अर्थ अपनापन भी है, नियंत्रण भी है। रूप परिवार-कहानी है, उपन्यास नहीं, धारावाहिक नहीं। एक प्रभाव स्नेह की कसौटी है, पंचायत का फैसला नहीं, जाति का उलटा दर्पण नहीं।
मध्य आचार-सूची है। माँ ध्रुव को बहू के लिए नियम थमाती है — कैसे रहे, क्या पहने, चौका कैसे सँभाले। स्नेह पहले नियम बनना चाहता है। ध्रुव सेतु है। मीता नई पीढ़ी है। चिंता वेश और कौशल पर है, अपराध पर नहीं। नाम दोनों ओर काटता है। जो स्नेह कहती है, वही नियम-सूची भी थमाती है। अकेली सूनेपन का नाम है। फैसला निर्णय का नाम है। यह बंधन का नाम है जो स्नेह से नरम पड़ता है। बिना माँ के शीर्षक हवा में रहता। बिना मीता के बंधन केवल उपदेश रह जाता। बिना ध्रुव के सेतु टूटता है। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण स्नेह का नियम बनना है, संयोग नहीं।
अंत गर्व की ओर मुड़ता है। माँ की आशंका कटती है। बहू के आचरण पर गर्व बैठता है। विवाह-वर्षगाँठ का आश्चर्य उत्सव स्नेह को नियम से बड़ा कर देता है। भाव यह है कि बंधन नरम पड़कर अपनापन रह जाता है। सात फेरे पर्दे पर विवाह फैलाता है। अकेली सूनापन सिमटाती है। यह एक परिवार का स्नेह-बंधन है। संग्रह स्नेह बंध तथा अन्य कहानियाँ; पहले मध्यांतर 1977, पटाक्षेप, पराजय। कुछ कथाओं से सात फेरे धारावाहिक बना; गुलज़ार के किरदार में कुछ कथाएँ गईं — परीक्षा कहानी माँगती है, धारावाहिक नहीं। मनोहर श्याम जोशी अलग लेखक हैं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है, सूची का पूरा पाठ नहीं।
शिल्प उत्तम पुरुष, छोटे क्षण, परिवार-संवाद है। घटना राजनीति नहीं। अज्ञेय नैतिक घन रखते हैं। साहनी व्यंग्य रखते हैं। जोशी दैनंदिन स्नेह रखती हैं। सीमा मध्यवर्ग-सिमटाव। गुण यह कि शीर्षक दो अर्थ एक साथ काटता है। पद्मश्री सम्मान है, कृति नहीं। निषेध साफ हैं। चाक और इदन्नमम पुष्पा के उपन्यास हैं, यह बैठक नहीं। फुलवा जाति-उलटन है, यह स्नेह है। बिना वर्षगाँठ के स्नेह केवल चिंता रह जाता। बिना सूची के बंधन खाली है। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रभाव बंधन का नरम पड़ना है। नामवर कसाव कहते हैं; जोशी छोटे अनुभव से काटती हैं। जोशी मन्नू का विलोम नहीं, परिवार-परत हैं।
निष्कर्ष यह है कि कथावस्तु चिंता से गर्व तक चलती है; केंद्र स्नेह का बंधन है, धारावाहिक का विस्तार या पद्मश्री-मात्र नहीं।
56. स्नेहबंध में माँ, ध्रुव और मीता लिखिए।20 अंक
स्नेहबंध तीन पात्रों पर चलती है — माँ, ध्रुव, मीता। मालती जोशी 1934, औरंगाबाद की परिवार-कथा है। माँ वाचक है। चिंता वेश और कौशल पर है, अपराध पर नहीं। आचार-सूची स्नेह का कठोर सिरा है — कैसे रहे, क्या पहने, चौका कैसे सँभाले। बाद गर्व नरम सिरा है। शीर्षक दोनों सिरों पर बैठता है। स्नेह अपनापन है। बंधन नियम है। बैठक मेहमानों से भरी है। ब्याह की तैयारी प्रसंग खोलती है। बिना माँ के शीर्षक हवा में रहता। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली, छोटे अनुभव। दृष्टि परिवार और दैनंदिन क्षण की है। पद्मश्री 2018 सम्मान है, चरित्र नहीं।
ध्रुव पुत्र है, सेतु है। वह माँ की सूची और बहू के स्वभाव के बीच खड़ा है। बिना ध्रुव के बंधन केवल उपदेश रह जाता। वह नई पीढ़ी को पुरानी चिंता से जोड़ता है, तोड़ता नहीं। मीता होनेवाली बहू है, कसौटी है, अपराधी नहीं। आधुनिक वेश माँ को डराता है। पारंपरिक चौका-कौशल पर आशंका है। आचरण बाद में गर्व जगाता है। विवाह-वर्षगाँठ का आश्चर्य उत्सव सेतु को सिद्ध करता है। भाव यह है कि स्नेह पहले नियम बनना चाहता है, फिर नियम से बड़ा हो जाता है। तीनों मिलकर परिवार हैं, त्रिकोण-युद्ध नहीं।
तुलना तीन स्त्री खोलती है। वसुमती प्रधान पद पर पिसती है। फुलवा जाति पर जीतती है। यह माँ चिंता से गर्व तक चलती है। तीन स्त्री तीन परत — पंचायत, जाति, बैठक। सोमा अकेली में सूनी जीती है; यह माँ परिवार में भरी बैठक में भी अकेली पड़ सकती है, पर अंत अपनापन है। साहनी की माँ इस्तेमाल होती है; यह माँ गर्व पाती है। जैनेन्द्र का बालक शंका से बँधता है; यहाँ बहू आचरण से खुलती है। सात फेरे यह त्रिकोण नहीं। मनोहर श्याम जोशी यह परिवार नहीं। चाक यह पत्र नहीं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; सूची का पूरा पाठ नहीं उतरता।
शिल्प उत्तम पुरुष, छोटे क्षण। सीमा मध्यवर्ग-सिमटाव। गुण यह कि तीन नाम शीर्षक के दो अर्थ चलाते हैं। निषेध साफ हैं। मध्यांतर 1977, पटाक्षेप, पराजय अन्य संग्रह-पंक्ति है, निर्धारित यही स्नेह-पाठ है। गुलज़ार के किरदार और धारावाहिक परीक्षा नहीं। इदन्नमम, अल्मा कबूतरी उपन्यास हैं। बिना वर्षगाँठ के गर्व कारण खो देता है। बिना आधुनिक वेश के चिंता खाली है। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रभाव बंधन का नरम पड़ना है। नामवर कसाव कहते हैं; जोशी दैनंदिन से काटती हैं। जोशी मन्नू का विलोम नहीं; मन्नू सूनापन देती हैं, जोशी स्नेह को बंधन बनाती हैं।
निष्कर्ष यह है कि माँ चिंता से गर्व तक चलती है, ध्रुव सेतु है, मीता कसौटी है; रूप कहानी है, धारावाहिक या अन्य लेखक का परिवार नहीं।
57. सात फेरे और स्नेहबंध में अंतर लिखिए।8 अंक
स्नेहबंध मालती जोशी की कहानी है। वाचक माँ, पुत्र ध्रुव, होनेवाली बहू मीता। स्नेह और बंधन। आचार-सूची से गर्व तक एक परिवार, एक प्रभाव। पढ़ी जाती है। सात फेरे दूरदर्शन धारावाहिक है। विवाह-कथा का पर्दा-विस्तार, कई कड़ियाँ, दृश्य और अभिनय। जया बच्चन से जुड़ा नाम परीक्षा में भ्रम है। कुछ कथाएँ पर्दे पर गईं; गुलज़ार के किरदार में भी कुछ गईं। निर्धारित यही एक कहानी है, पूरा धारावाहिक नहीं। पद्मश्री 2018 साहित्य-शिक्षा का सम्मान है, कृति नहीं। मनोहर श्याम जोशी अलग लेखक हैं, यह परिवार नहीं।
भेद रूप पर है। कहानी छोटे क्षण और उत्तम पुरुष से चलती है। धारावाहिक विवाह फैलाता है। बिना अंतर के लेखिका का सम्मान पाठ बन जाता है। मध्यांतर 1977, पटाक्षेप, पराजय अन्य संग्रह-पंक्ति है, निर्धारित स्नेह-पाठ अलग है। पत्र गद्य-कहानी माँगता है, पर्दा नहीं। सीमा मध्यवर्ग-सिमटाव कहानी की है; गुण यह कि शीर्षक दो अर्थ एक साथ काटता है।
निष्कर्ष यह है कि स्नेहबंध कहानी है, सात फेरे धारावाहिक है; सम्मान और पर्दा पाठ नहीं बनते।
58. फैसला का नामकरण स्पष्ट कीजिए।8 अंक
फैसला मैत्रेयी पुष्पा की कहानी है। शीर्षक निर्णय है। रूप पत्र-शैली है — नायिका वसुमती गुरु मास्साब को लिखती है। पंचायत-नाटक नहीं। नायिका स्त्रियों के वोट से प्रधान चुनी जाती है। पति रनवीर पहले प्रधान, फिर ब्लॉक प्रमुख। मर्यादा थोपते हैं — चबूतरे पर मत बैठो, बाहर मत निकलो, दस्तखत दो। दस्तखत बसुमती देवी। स्कूल-गली-दवा के सपने कटते हैं। हरदेई फौजी-पति की स्त्री है, बाप का शोषण। वसुमती पंचायत में पक्ष में फैसला देकर लौटती है। रात पति डपटता है। भोर कुएँ की मृत्यु। अर्थ यह भी है कि निर्णय पलटा जाता है।
नाम तीन परत है। पंचायत का फैसला। पति का रोक। अंत में एक वोट का फैसला — रनवीर एक वोट से हारते हैं, पत्नी का वोट नहीं मिला। एक प्रभाव पद की विडम्बना है। चाक 1997 उपन्यास है। इदन्नमम 1994 उपन्यास है। अल्मा कबूतरी, झूला नट उपन्यास हैं। कस्तूरी कुंडल बसै आत्मकथा है। फैसला पर कथा पुरस्कार; इसी नाम का संग्रह भी है, निर्धारित कहानी है।
निष्कर्ष यह है कि नामकरण पंचायत, पति-रोक और एक वोट तीन परतों से है; कृति पत्र-कहानी है, चाक नहीं।
59. फैसला की कथावस्तु लिखिए।20 अंक
फैसला मैत्रेयी पुष्पा की कहानी है। कथावस्तु पत्र की है। पुष्पा जन्म 30 नवंबर 1944, सिकुर्रा, अलीगढ़; बचपन बुंदेलखंड; शिक्षा झाँसी, खिल्ली; एम.ए. हिन्दी, बुंदेलखंड कालेज। दृष्टि ग्रामीण स्त्री, पंचायत, पितृसत्ता की है। भाषा ब्रज-बुंदेली स्पर्श की खड़ी बोली, संवाद तेज। वाचक वसुमती गुरु मास्साब को लिखती है। रूप पत्र-शैली की कहानी है, पंचायत-नाटक नहीं, उपन्यास नहीं। नायिका स्त्रियों के वोट से प्रधान चुनी जाती है। चकित है। पति रनवीर पहले प्रधान, फिर ब्लॉक प्रमुख। मर्यादा थोपते हैं — चबूतरे पर मत बैठो, बाहर मत निकलो, दस्तखत दो। शीर्षक निर्णय है। अर्थ यह भी है कि निर्णय पलटा जाता है, और अंत में वोट का फैसला पति को काटता है।
मध्य स्त्री-मंडल है। ईसुरिया गड़रिया की बहू मुखर मित्र है, बराबरी का ज़माना कहती है। कुसुमा, गोपी, सरूपी साथ हैं। देववीर देवर रोकता है। दस्तखत बसुमती देवी — स्कूल-गली-दवा के सपने कटते हैं। हरदेई फौजी-पति की स्त्री है, बाप का शोषण। वसुमती पंचायत में पक्ष में फैसला देकर लौटती है। रात पति डपटता है। भोर कुएँ की मृत्यु। पिता पति पर इल्जाम रखता है। भाव यह है कि स्त्री का फैसला व्यवस्था पलट देती है। नाम तीन परत है। पंचायत का फैसला। पति का रोक। अंत में एक वोट का फैसला। अकेली स्त्री-नाम है। फुलवा स्त्री-नाम है। यह निर्णय-नाम है। बिना पत्र के शैली हवा में रहती। बिना प्रधान पद के शीर्षक केवल झगड़ा रह जाता।
अंत प्रमुख-चुनाव है। रनवीर एक वोट से हारते हैं — पत्नी का वोट नहीं मिला। एक वोट शीर्षक पूरा करता है। चाक 1997 उपन्यास फैलाता है। इदन्नमम 1994 उपन्यास है। यह पत्र एक फैसला सिमटाता है। फैसला पर कथा पुरस्कार; इसी नाम का संग्रह भी है, परीक्षा कहानी माँगती है। आत्मकथा कस्तूरी कुंडल बसै 2003, गुड़िया भीतर गुड़िया 2008 अलग विधा हैं। अल्मा कबूतरी, झूला नट, बेतवा बहती रही उपन्यास हैं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है, पूरा पत्र नहीं। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण पद और पत्नी-मर्यादा है, संयोग नहीं। स्नेहबंध में कारण स्नेह-नियम है। फुलवा में कारण जाति-उलटन है।
शिल्प पत्र, गाँव-संवाद, स्त्री-मंडल है। घटना चुनाव और पंचायत है, केंद्र फैसला है। जोशी बैठक रखती हैं। पुष्पा चबूतरा रखती हैं। सीमा राजनीति की चौड़ाई। गुण यह कि एक वोट अंत काटता है। हिंदी अकादमी दिल्ली से जुड़ाव की चर्चा रहती है; निर्धारित पाठ यही पत्र-कहानी है। निषेध साफ हैं। बिना हरदेई के शीर्षक केवल पद रह जाता। बिना एक वोट के अंत दया रह जाता, फैसला नहीं। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रभाव पद की विडम्बना है। नामवर कसाव कहते हैं; पुष्पा पत्र से कसाव चलाती हैं। पुष्पा जोशी का विलोम नहीं, गाँव की अगली परत हैं। प्रधान पद स्त्री के हाथ में रहकर भी पति का साया काटता है।
निष्कर्ष यह है कि कथावस्तु जीत से एक वोट तक चलती है; केंद्र स्त्री-निर्णय की चोट है, चाक का विस्तार या आत्मकथा नहीं।
60. चाक और फैसला में अंतर लिखिए।8 अंक
मैत्रेयी पुष्पा का जन्म 30 नवंबर 1944, सिकुर्रा, अलीगढ़; बचपन बुंदेलखंड, शिक्षा झाँसी, खिल्ली। फैसला कहानी है। पत्र-शैली। नायिका वसुमती, पति रनवीर, प्रधान पद, हरदेई, एक वोट। एक प्रभाव पद की विडम्बना है। पढ़ी जाती है, सिमटी कथा है। चाक 1997 का उपन्यास है। ग्रामीण स्त्री का विस्तार, दीर्घ विन्यास, कई परतें। इदन्नमम 1994 उपन्यास है। अल्मा कबूतरी, झूला नट, बेतवा बहती रही उपन्यास-पंक्ति है। कस्तूरी कुंडल बसै 2003, गुड़िया भीतर गुड़िया 2008 आत्मकथा हैं। फैसला पर कथा पुरस्कार। लेखक एक, विधाएँ कई। पत्र कहानी माँगता है।
भेद आलंबन पर भी है। फैसला चबूतरे और पत्र से चलता है। चाक उपन्यास-विस्तार है। जोशी बैठक देती हैं; पुष्पा चबूतरा देती हैं — यह स्वर-भेद है, चाक का पर्याय नहीं। बिना अंतर के एक लेखिका दो कृतियाँ एक ढेर लगती हैं। भाषा ब्रज-बुंदेली स्पर्श की खड़ी बोली दोनों ओर हो सकती है; रूप अलग रहता है।
निष्कर्ष यह है कि फैसला निर्धारित कहानी है, चाक उपन्यास है; एक लेखिका दो विधाएँ एक पाठ नहीं।
61. फुलवा का नामकरण स्पष्ट कीजिए।8 अंक
फुलवा रतनकुमार सांभरिया की कहानी है। हंस, मई 1997। शीर्षक नायिका का नाम है। दलित स्त्री। पति जमींदार के बैल की सींग से मरता है। श्रम उत्तराधिकार जैसा लगता है — टहलुआई। बेटा राधा मोहन पढ़ता है, शहर में एस.पी. बनता है। नायिका दलित विधवा से सम्मान तक जाती है। रामेश्वर जमींदार बलकार सिंह का पुत्र ईर्ष्या से आता है। दोनों एक-दूसरे को नहीं पहचानते। पुरानी कुएँ की घटना याद आती है — पानी माँगा, थूक पड़ा, मटका फूटा। आज नल का पानी उसी स्त्री के पास है। रूप दलित-यथार्थ की कहानी है, आत्मकथा नहीं। एक प्रभाव जाति-उलटन की चोट है।
नाम स्त्री-नाम है, अर्थ आत्मसम्मान पर पूरा होता है। बिना रामेश्वर के शीर्षक केवल सफलता रह जाता। बिना कुएँ के उलटन इतिहास खो देता है। परती पंडिताइन शहर की परत है। जलन सिफारिश माँगती है, मन नहीं मानता। जूठन ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा है, यह नहीं। गदल गुर्जर नायिका है, पाँत पर मरती है; यह जीतती है। अकेली सूनेपन का नाम है।
निष्कर्ष यह है कि नामकरण नायिका और उसके आत्मसम्मान से है; कृति 1997 की कहानी है, जूठन आत्मकथा नहीं।
62. रतनकुमार सांभरिया का परिचय लिखिए।8 अंक
पाठ्यक्रम-नाम रतनकुमार सांभरिया है; रत्नकुमार भी लिखा जाता है — एक ही लेखक। राजस्थान की दलित कथा-परत। निर्धारित फुलवा है; हंस मई 1997। दृष्टि जाति, आत्मसम्मान, पद-पैसे के युग की है। भाषा आंचल-स्पर्श की खड़ी बोली, व्यंग्य तीखा। नायिका फुलवा दलित स्त्री है। पति जमींदार के बैल से मरता है। बेटा राधा मोहन शहर में एस.पी. बनता है। रामेश्वर जमींदार बलकार सिंह का पुत्र ईर्ष्या और सिफारिश लेकर आता है। कुएँ की पुरानी चोट नल के पानी से उलटी होती है। ओमप्रकाश वाल्मीकि जूठन आत्मकथा देते हैं — गद्य-प्रमाण अलग कृति।
गदल राघव का गुर्जर पाठ है, दलित-उलटन नहीं। अमरकांत जोंक में निर्धन मजदूर दिखाते हैं। सांभरिया दलित स्त्री को कोठी और नल तक ले जाते हैं, फिर ईर्ष्या काटते हैं। परती पंडिताइन शहर की परत है। सीमा वर्णन की भीड़। गुण यह कि शोषक सिफारिश माँगने आता है। एक प्रभाव जाति-उलटन की चोट है। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; दलित-गवाही उसी चिह्न की चाल है।
निष्कर्ष यह है कि सांभरिया दलित कथाकार हैं; निर्धारित फुलवा है, जूठन आत्मकथा नहीं।
63. फुलवा और रामेश्वर का संबंध लिखिए।20 अंक
फुलवा रतनकुमार सांभरिया की कहानी है। पाठ्यक्रम-नाम रतनकुमार; रत्नकुमार भी लिखा जाता है — एक ही लेखक। राजस्थान की दलित कथा-परत। हंस, मई 1997। दृष्टि जाति, आत्मसम्मान, पद-पैसे के युग की है। भाषा आंचल-स्पर्श की खड़ी बोली, व्यंग्य तीखा। संबंध दो सिरों का है — फुलवा और रामेश्वर। फुलवा गाँव की दलित स्त्री थी, टहलुआई में। पति जमींदार के बैल की सींग से मरता है। बेटा राधा मोहन पढ़ता है, शहर में एस.पी. बनता है। रामेश्वर जमींदार बलकार सिंह का पुत्र है। शहर में पंडित माताप्रसाद का पता नहीं मिलता; फुलवा का पता सब जानते हैं। एक प्रभाव जाति-उलटन की चोट है। जन्म-वर्ष यहाँ नहीं बाँधा जाता; धारा और पाठ बाँधे जाते हैं।
प्रसंग मिलन का है। दोनों एक-दूसरे को नहीं पहचानते। कोठी, नल, पढ़ते पोते-पोती, बहू संती, नौकरानी कुँवर — वैभव ईर्ष्या जगाता है। पुरानी कुएँ की घटना याद आती है — पानी माँगा, थूक पड़ा, मटका फूटा। आज फुलवा के नल में पानी, रामेश्वर अभी उसी कुएँ पर है। भाव यह है कि जाति का दर्पण उलटा होता है। रूप दलित-यथार्थ की कहानी है, आत्मकथा नहीं। बिना रामेश्वर के शीर्षक केवल सफलता रह जाता। बिना कुएँ के उलटन इतिहास खो देता है। गदल पाँत पर मरती है। यह जीतती है, रामेश्वर जलता है। जोंक निर्धन मजदूर चूसती है। यह दलित स्त्री कोठी तक ले जाती है, फिर ईर्ष्या दिखाती है।
परती पंडिताइन शहर की परत है। गाँव में कपड़े बचाकर चलती थीं; शहर में फुलवा सिरहाने, परती पैताने। चाय एक साथ। रामेश्वर धर्म से फुलवा का पानी नहीं पीता, पंडिताइन की चाय पीता है। बेटा दीपसिंह नौकरी माँगता है। परती कहती है — पद और पैसे का ज़माना है; राधा मोहन एस.पी. हैं; बहू के चरण छुओ। रात छोटे आवास की बदबू और कुत्ता; कदम फुलवा की कोठी की ओर मुड़ते हैं। भाव यह है कि जाति का अहं सिफारिश के आगे झुकता है, मन नहीं मानता। जलन सिफारिश माँगती है। संबंध शोषक-शोषित से सिफारिश-ईर्ष्या तक उलटा है। संती आधुनिक बहू है। कुँवर नौकरानी जाति-उलटन की रेखा है।
शिल्प व्यंग्य, आंचल, वैभव-विस्तार। सीमा वर्णन की भीड़। गुण यह कि हंस 1997 का पाठ परीक्षा का टिक है। निषेध साफ हैं। जूठन ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा है, गद्य-प्रमाण अलग कृति। गदल राघव का गुर्जर पाठ इकाई 3 है, दलित-उलटन नहीं। अकेली सूनेपन का नाम है। चाक उपन्यास है। बिना परती के शहर-मित्रता नहीं बैठती। बिना सिफारिश के ईर्ष्या केवल डाह रह जाती। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रभाव अहं का गिरना है। नामवर कसाव कहते हैं; सांभरिया एक मिलन में जाति काटते हैं। सांभरिया अमरकांत का विलोम नहीं, जाति की अगली परत हैं। गुण यह कि शोषक सिफारिश माँगने आता है।
निष्कर्ष यह है कि संबंध शोषक-शोषित से सिफारिश-ईर्ष्या तक उलटा है; रूप कहानी है, आत्मकथा या इकाई 3 की गदल नहीं।
64. फुलवा की कथावस्तु लिखिए।20 अंक
फुलवा सांभरिया की कहानी है, हंस मई 1997। कथावस्तु नायिका फुलवा की है। दलित स्त्री। पति जमींदार के बैल की सींग से मरता है। श्रम उत्तराधिकार जैसा लगता है — टहलुआई। बेटा राधा मोहन पढ़ता है, एस.पी. बनता है। नायिका दलित विधवा से सम्मान तक जाती है। शीर्षक नायिका का नाम है। रूप दलित-यथार्थ की कहानी है, आत्मकथा नहीं। देशकाल गाँव से शहर, कुआँ से नल, टहलुआई से कोठी। एक प्रभाव जाति-उलटन की चोट है, पाँत की मृत्यु नहीं, जोंक की शांति नहीं। रतनकुमार / रत्नकुमार एक लेखक। राजस्थान की दलित कथा-परत। भाषा आंचल-स्पर्श, व्यंग्य तीखा। जन्म-वर्ष नहीं बाँधा जाता; पाठ बाँधा जाता है।
मध्य रामेश्वर का आगमन है। जमींदार बलकार सिंह का पुत्र। दोनों एक-दूसरे को नहीं पहचानते। कोठी का वैभव, कुएँ की स्मृति, नल का पानी — जाति का दर्पण उलटा होता है। पानी माँगा, थूक पड़ा, मटका फूटा — पुरानी चोट। आज फुलवा के नल में पानी, रामेश्वर उसी कुएँ पर। शहर में पंडित माताप्रसाद खोए हैं; फुलवा का पता सब जानते हैं। पढ़ते पोते-पोती, बहू संती, नौकरानी कुँवर ईर्ष्या जगाते हैं। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण पद-पैसे का ज़माना है, संयोग नहीं। स्नेहबंध में कारण स्नेह-नियम है। फैसला में कारण पद-मर्यादा है। तीन कथावस्तु तीन केंद्र। पाठ प्रसंग-भाव से होता है, वैभव का पूरा दृश्य नहीं।
परती और संती शहर की परत हैं। सिरहाने-पैताने। चाय एक साथ। रामेश्वर धर्म से फुलवा का पानी नहीं पीता, पंडिताइन की चाय पीता है। दीपसिंह की नौकरी। परती कहती है पद और पैसे का ज़माना है, राधा मोहन एस.पी. हैं। रात छोटे आवास की बदबू। कदम कोठी की ओर मुड़ते हैं। जलन सिफारिश माँगती है, मन नहीं मानता। जोंक निर्धन मजदूर चूसती है। यह दलित स्त्री जीतती है, जमींदार-पुत्र जलता है। गदल पाँत पर मरती है। यह उलटन है, मृत्यु नहीं। जूठन आत्मकथा फैलाती है। यह कहानी एक मिलन सिमटाती है। बिना परती के शहर-मित्रता नहीं बैठती। बिना रामेश्वर के शीर्षक केवल सफलता रह जाता।
शिल्प व्यंग्य, आंचल, वैभव-विस्तार। सीमा वर्णन की भीड़। गुण यह कि शोषक सिफारिश माँगने आता है। निषेध साफ हैं। जूठन वाल्मीकि की आत्मकथा है। गदल इकाई 3 है। चाक, इदन्नमम उपन्यास हैं। सात फेरे धारावाहिक है। महाभोज राजनीति-उपन्यास है। डिप्टी कलेक्टरी अन्य कहानी है। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रभाव अहं का उलटा दर्पण है। नामवर कसाव कहते हैं; सांभरिया एक दिन के मिलन से जाति काटते हैं। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; दलित-गवाही उसी चिह्न की अंतिम चालों में है। बिना कुएँ के इतिहास खो जाता। बिना सिफारिश के ईर्ष्या केवल डाह रह जाती।
निष्कर्ष यह है कि कथावस्तु श्रम से कोठी और ईर्ष्या तक चलती है; केंद्र जाति-उलटन है, जूठन का विस्तार या गदल की मृत्यु नहीं।
65. इकाई 5 की तीन कहानियों का साम्य-वैषम्य लिखिए।20 अंक
इकाई 5 निर्धारित तीन कहानियाँ हैं। मालती जोशी — स्नेहबंध; वाचक-माँ, पुत्र ध्रुव, बहू मीता; स्नेह और बंधन। मैत्रेयी पुष्पा — फैसला; पत्र-शैली; नायिका वसुमती, प्रधान पद, पति रनवीर। रतनकुमार सांभरिया — फुलवा; दलित नायिका, बेटा राधा मोहन, जमींदार-पुत्र रामेश्वर। तीन पाठ समकालीन स्त्री-दलित परत के हैं। जोशी 4 जून 1934, औरंगाबाद, परिवार-अनुभव। पुष्पा 30 नवंबर 1944, सिकुर्रा, गाँव की स्त्री और पंचायत। सांभरिया राजस्थान की दलित कथा-परत, हंस मई 1997। साम्य कहानी-रूप, एक प्रभाव, खड़ी बोली, तिलिस्म से कटान है। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; तीनों उसी चिह्न की अंतिम चालें हैं — स्नेह, फैसला, जाति-उलटन। मनुष्य देवता नहीं। इकाई 4 सूनापन, नीति-भंग, जोंक थी; यहाँ बंधन, पद और सम्मान खुलते हैं।
वैषम्य स्वर, देशकाल और शिल्प पर है। स्नेहबंध स्नेह और बंधन, बैठक और वर्षगाँठ। फैसला पत्र और एक वोट, चबूतरा और पंचायत। फुलवा जाति और सिफारिश, कोठी और कुआँ। देशकाल परिवार-बैठक, गाँव-प्रधान चुनाव, गाँव-शहर का मिलन। शिल्प उत्तम पुरुष और छोटे क्षण, पत्र और स्त्री-मंडल, व्यंग्य और वैभव-विस्तार। स्त्री कसौटी है, प्रधान है, दलित नायिका है। पुरुष ध्रुव सेतु है, रनवीर रोक और हार है, रामेश्वर ईर्ष्या और सिफारिश है। कारण तीन हैं — आचार-सूची, पद-मर्यादा, पद-पैसे का ज़माना। भाषा जोशी में बोलचाल, पुष्पा में ब्रज-बुंदेली स्पर्श, सांभरिया में आंचल-व्यंग्य। पो एक प्रभाव माँगते हैं; तीन चोट तीन रूप हैं।
अंत तीन मूल्य खोलते हैं। माँ गर्व पाती है, बंधन नरम पड़ता है। वसुमती पति का चुनाव काटती है, एक वोट शीर्षक पूरा करता है। फुलवा जीती है, रामेश्वर रात कोठरी छोड़ता है, कदम सिफारिश की ओर हैं। स्त्री कर्ता तीन ढंग से है — आचरण, फैसला, आत्मसम्मान। सीमा तीन ओर है। जोशी पर मध्यवर्ग-सिमटाव। पुष्पा पर राजनीति की चौड़ाई। सांभरिया पर वर्णन की भीड़। गुण तीन ओर है। शीर्षक दो अर्थ काटता है। पत्र पद की विडम्बना काटता है। मिलन जाति का दर्पण उलटा करता है। नामवर कसाव कहते हैं; तीनों कसाव अलग आलंबन से चलाते हैं। मन्नू सूनापन देती हैं; ये तीन स्नेह, निर्णय और उलटन देते हैं।
निषेध साफ रखे जाते हैं। सात फेरे धारावाहिक है; पद्मश्री 2018 सम्मान है, कृति नहीं; मनोहर श्याम जोशी अलग नाम हैं। चाक 1997, इदन्नमम 1994, अल्मा कबूतरी, झूला नट उपन्यास हैं। कस्तूरी कुंडल बसै 2003, गुड़िया भीतर गुड़िया 2008 आत्मकथा हैं। जूठन वाल्मीकि की आत्मकथा है। गदल गुर्जर पाठ इकाई 3 है, फुलवा नहीं। बिना निषेध के तीन शीर्षक एक ढेर लगते हैं। मूल्यांकन एक को रद्द करके नहीं होता; तीन परत एक इकाई में हैं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है, पूरा आख्यान नहीं। महत्त्व यह है कि इकाई 5 पत्र को स्त्री-दलित सोपान पर बंद करती है। जन्म-वर्ष सांभरिया का नहीं बाँधा जाता; धारा बाँधी जाती है।
निष्कर्ष यह है कि साम्य कहानी-रूप और एक प्रभाव पर है, वैषम्य स्नेह-फैसला-जाति पर है; तीनों निर्धारित पाठ हैं, उपन्यास, आत्मकथा या धारावाहिक नहीं।
© noteswale.com — for personal exam prep only
These Hindi short story notes for B.A. Hindi belong to the B.A. Hindi syllabus on noteswale.