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अज्ञेय, नरेश मेहता, नागार्जुन, भवानीप्रसाद मिश्र, कागद notes

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अज्ञेय, नरेश मेहता, नागार्जुन, भवानीप्रसाद मिश्र, कागद is a topic in Modern poetry (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

इकाई 5 छायावाद के बाद का निर्धारित पाठ है। पाँच कवि हैं — सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, नरेश मेहता, नागार्जुन, भवानीप्रसाद मिश्र और ओम पुरोहित…

इकाई 5 · अज्ञेय, नरेश मेहता, नागार्जुन, भवानीप्रसाद मिश्र, कागद

इकाई 5 छायावाद के बाद का निर्धारित पाठ है। पाँच कवि हैं — सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, नरेश मेहता, नागार्जुन, भवानीप्रसाद मिश्र और ओम पुरोहित ‘कागद’। अज्ञेय — नदी के द्वीप, कलगी बाजरे की। नरेश मेहता — माँ, वृक्षत्व, किरण धेनुएँ। नागार्जुन — प्रेत का बयान, यह दंतुरित मुस्कान। मिश्र — गीत फरोश, कहीं नहीं बचे। कागद — पूछती है बेकलू, तपस्वी रूँख, क्यों भटकती है, हरा कर देगी, बरसो जल। धाराएँ प्रयोगवाद, नई कविता, प्रगतिवाद और समकालीन कविता छूती हैं। प्रत्येक कविता शीर्षक और आलंबन से पहचानी जाती है। इन कवियों की रचनाएँ अभी सर्वाधिकार में हैं; भाव और प्रसंग लिखे जाते हैं, पूरी पंक्ति नहीं उतारी जाती।

सार: अज्ञेय = द्वीप और बाजरे की कलगी; उपन्यास नदी के द्वीप कविता नहीं। मेहता = माँ, वृक्षत्व, किरण-धेनु। नागार्जुन = प्रेत-व्यंग्य और शिशु-मुस्कान। मिश्र = गीत-बाजार और पर्यावरण। कागद = बेकलू, रूँख, भटकन, हरियाली, जल; बेक्यू शीर्षक नहीं।

1 इकाई का घेरा — प्रयोग से समकालीन

यह छायावाद के बाद का पाठ-घेरा है। प्रयोगवाद का घोषित आरंभ तार सप्तक 1943 है; संपादक अज्ञेय हैं, पर सप्तक केवल उन्हीं का नहीं — मुक्तिबोध और रामविलास शर्मा सामाजिक छोर रखते हैं। नई कविता 1950 के दशक में लघु मानव और बिंब पर बैठती है; मिश्र उसके सरल सिरे के कवि हैं। प्रगतिवाद 1936 का जन-यथार्थ है; नागार्जुन उसके प्रतिनिधि हैं, दिनकर उसके पर्याय नहीं। समकालीन कविता 1970 के बाद सड़क, पहचान और मरुस्थल का समय उठाती है; कागद राजस्थान के स्वर हैं। नरेश मेहता मिथक और प्रकृति दोनों छूते हैं; निर्धारित तीन पाठ माँ, वृक्षत्व और किरण धेनुएँ हैं, संशय की एक रात नहीं।

साम्य खड़ी बोली, मुक्त छंद और आधुनिक मनुष्य है। वैषम्य आलंबन पर है — व्यक्ति-द्वीप, मातृ-श्रम, प्रेत-गवाही, गीत-बाजार, मरु की प्यास। छायावाद का प्रगीत यहाँ बिंब और व्यंग्य से कटता है। रूप छोटी कविता प्रधान है; महाकाव्य-सर्ग नहीं। रस शांत, करुण, वात्सल्य और व्यंग्य मिलते हैं; रीति-शृंगार केंद्र नहीं। कवि धारा और शीर्षक साथ पहचाने जाते हैं।

नामवर नई कविता के प्रतिमान बिंब पर रखते हैं। देवराज नई कविता नाम बाँधते हैं। शिवकुमार मिश्र नया हिन्दी काव्य प्रयोग से आगे की पीढ़ी देखते हैं। नंदकिशोर आचार्य अज्ञेय की काव्यतीर्था व्यक्ति और क्षण पर हैं। वेदप्रकाश अमिताभ आधुनिक और समकालीन दो घेरे कहते हैं। राजस्थान साहित्य अकादमी प्रदेश के स्वर को इतिहास में जगह देती है; कागद उसी भूमि के हैं। पाँच कवि पाँच धारा-छोर हैं, एक स्वर नहीं। भाव और प्रसंग लिखे जाते हैं; पूरी पंक्ति सर्वाधिकार के कारण नहीं उतारी जाती।

2 अज्ञेय — कवि का परिचय

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जन्म 7 मार्च 1911। निधन 4 अप्रैल 1987। उपनाम अज्ञेय प्रसिद्ध है; पूरा नाम सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन है। तार सप्तक 1943 का संपादन उनकी बड़ी ऐतिहासिक भूमिका है। दूसरा सप्तक 1951, तीसरा 1959 नई कविता की ओर पुल हैं। उपन्यास शेखर एक जीवनी और नदी के द्वीप अलग कृतियाँ हैं। निर्धारित नदी के द्वीप कविता है, उपन्यास नहीं। काव्य-संग्रह हरी घास पर क्षण भर में दोनों निर्धारित कविताएँ गिनी जाती हैं। अन्य स्मरण इत्यलम् और बावरा अहेरी — ये निर्धारित पाठ नहीं। भाषा खड़ी बोली, शिल्प बिंब और मनोविज्ञान, गुण वैयक्तिकता।

प्रवृत्ति व्यक्ति की स्वतंत्र सत्ता, क्षण का अनुभव, नए उपमान और प्रयोग है। वे प्रयोगवाद के केंद्र-नाम हैं, अकेले मालिक नहीं। मुक्तिबोध सप्तक में रहकर भी फैंटेसी और सामाजिक दाब रखते हैं। आक्षेप दुरुहता और समाज-कटान का रहा। गुण यह है कि साधारण वस्तु — बाजरे की कलगी — काव्य का आलंबन बन सकती है। सीमा रहस्य और आत्म-केंद्र कभी अर्थ ढक देते हैं। पूरा नाम, तार सप्तक 1943, और उपन्यास-कविता का भेद परिचय के अंग हैं।

उपन्यास शेखर एक जीवनी और नदी के द्वीप अलग कृतियाँ हैं। कविता नदी के द्वीप शीर्षक-साधर्म्य से उपन्यास नहीं बनती। हरी घास पर क्षण भर दोनों कविताएँ गिनी जाती हैं। इत्यलम् और बावरा अहेरी स्मरण हैं, पाठ नहीं। भाषा खड़ी बोली, शिल्प बिंब और मनोविज्ञान। नंदकिशोर आचार्य व्यक्ति-क्षण देखते हैं। नामवर बिंब-प्रतिमान अज्ञेय से भी चलते हैं। अज्ञेय सप्तक के संपादक हैं, सप्तक के अकेले कवि नहीं।

पाठपहचानकेंद्र
नदी के द्वीपकविता; उपन्यास नहींव्यक्ति और समाज
कलगी बाजरे कीनया उपमानग्रामीण सौंदर्य
तार सप्तक1943 संपादनप्रयोग का आरंभ

3 नदी के द्वीप

प्रसंग अज्ञेय की निर्धारित कविता है, उपन्यास नदी के द्वीप नहीं। आलंबन द्वीप और नदी हैं। द्वीप व्यक्ति हैं। नदी समाज, समय और संबंध हैं। द्वीप नदी के प्रवाह से बनते हैं, उसी जल में रहते हैं, पूरी तरह विलीन भी नहीं हो जाते। आशय यह नहीं कि व्यक्ति समाज से कटकर कुछ है। आशय यह भी नहीं कि व्यक्ति नदी में घुलकर नाम खो दे। संबंध और वैयक्तिकता साथ चलते हैं। रस शांत है; चिंतन प्रधान है। रूप प्रतीकात्मक कविता है, इतिवृत्त नहीं।

भाव यह है कि अकेला दावा अधूरा है, विलय का दावा भी अधूरा है। द्वीप नदी के बिना किनारा नहीं बाँधते; नदी द्वीपों के बिना केवल प्रवाह रह जाती है। नई कविता का लघु मानव यहीं व्यक्ति की मर्यादा माँगता है। प्रगति का केवल वर्ग-नायक यह पाठ नहीं। प्रतीक द्वीप-नदी हैं, रस शांत है। शीर्षक समान होने से उपन्यास और कविता एक नहीं हो जाते।

आलंबन द्वीप और नदी हैं। द्वीप व्यक्ति हैं। नदी समाज, समय और संबंध हैं। द्वीप प्रवाह से बनते हैं, उसी जल में रहते हैं, पूरी तरह विलीन भी नहीं होते। रूप प्रतीकात्मक कविता है, इतिवृत्त नहीं। चिंतन प्रधान है। कलगी बाजरे की नया बिंब है; यह पाठ संबंध का प्रतीक है। दोनों अज्ञेय हैं, काम अलग है। उपन्यास का कथानक यहाँ नहीं खुलता।

4 कलगी बाजरे की

प्रसंग अज्ञेय की दूसरी निर्धारित कविता है। आलंबन बाजरे की कलगी है — तुरा, साधारण ग्रामीण बिंब। परंपरा प्रेयसी को संध्या के अकेले तारे या गुलाब से नापती रही। कवि उस रीति को छोड़कर बाजरे की कलगी को नया उपमान देता है। लघु वस्तु में सौंदर्य पूरा हो सकता है — यही प्रयोग और नई कविता का ठोस चित्र है। उद्दीपन हरियाली, पवन, गाँव का दृश्य हैं। रस शृंगार का सूक्ष्म रूप और अद्भुत मिला है। रूप छोटी कविता है, प्रगीत-रहस्य नहीं।

भाव यह है कि काव्य का उपमान महल और पुष्प-वाटिका से बँधा नहीं। साधारण अन्न-पौधे की कलगी भी प्रिय के रूप की नाप बनती है। नदी के द्वीप चिंतन है; यह कविता दृष्टि और नया बिंब है। दोनों हरी घास पर क्षण भर से जुड़ी गिनी जाती हैं। नया उपमान ग्रामीण आलंबन है; परंपरा का तारा-गुलाब यहाँ नहीं दोहराया जाता। नाम बाजरे की कलगी है।

आलंबन बाजरे की कलगी है — तुरा, साधारण ग्रामीण बिंब। परंपरा प्रेयसी को तारे या गुलाब से नापती रही। प्रयोग साधारण वस्तु को नाप बनाता है। रस शृंगार का सूक्ष्म रूप और अद्भुत मिला है। रूप छोटी कविता है, प्रगीत-रहस्य नहीं। पंत का एक तारा नभ का बिंदु है; यह कलगी खेत की है। नामवर बिंब को प्राण कहते हैं; यह पाठ उसी सूत्र का ठोस चित्र है।

5 नरेश मेहता — कवि का परिचय

नरेश मेहता का जन्म 15 फ़रवरी 1922। निधन 22 नवम्बर 2000। ज्ञानपीठ 1992। प्रयाग और आधुनिक हिन्दी काव्य-नाट्य से जुड़े। संशय की एक रात, महाप्रस्थान, प्रवाद पर्व मिथकीय आधुनिक कृतियाँ हैं; ये निर्धारित पाठ नहीं। निर्धारित तीन कविताएँ हैं — माँ, वृक्षत्व, किरण धेनुएँ। भाषा खड़ी बोली, बिंब वैदिक-ग्रामीण और नैतिक। वे प्रयोग और नई कविता के निकट प्रकृति-मनुष्य का संबंध रखते हैं। अज्ञेय व्यक्ति-द्वीप बाँधते हैं; मेहता माँ, वृक्ष और किरण को कर्म और प्रकाश देते हैं।

प्रवृत्ति तीन सूत्रों की है। पहला — मातृ-संबंध श्रम और आँगन से पहचाना जाता है। दूसरा — वृक्षत्व एक नैतिक अवस्था है, केवल वनस्पति-वर्णन नहीं। तीसरा — प्रातः का आलोक धेनु-बिंब से खुलता है। सीमा यह कि मिथक-नाट्य की प्रसिद्धि छोटे पाठों पर छा जाती है। गुण यह है कि प्रकृति केवल उद्दीपन नहीं, आचरण का प्रश्न बनती है। ज्ञानपीठ, प्रयाग और तीन शीर्षक परिचय के अंग हैं; संशय की एक रात पाठ नहीं।

संशय की एक रात, महाप्रस्थान, प्रवाद पर्व मिथकीय आधुनिक कृतियाँ हैं; तीन कविताएँ वे नहीं। माँ आँगन-श्रम है। वृक्षत्व नैतिक होना है। किरण धेनुएँ प्रभात का ग्वाला-बिंब हैं। अज्ञेय व्यक्ति-द्वीप बाँधते हैं; मेहता माँ, वृक्ष और किरण को कर्म और प्रकाश देते हैं। भाषा खड़ी बोली, बिंब वैदिक-ग्रामीण। ज्ञानपीठ 1992 प्रशस्ति है; पाठ तीन शीर्षक हैं।

पाठआलंबनस्वर
माँश्रम करती स्त्रीवात्सल्य; आँगन-कर्म
वृक्षत्ववृक्ष-होनानैतिक स्थिरता
किरण धेनुएँप्रभात की किरणेंआलोक; ग्वाला-बिंब

6 माँ, वृक्षत्व, किरण धेनुएँ

माँ में वाचक कहता है कि उसने माँ को एक रूप में बाँधकर नहीं देखा; माँ उन स्त्रियों में बसती है जो आँगन लीपती हैं, अल्पना रचती हैं, रसोई का श्रम करती हैं, चिंता की आँखों से पथ निहारती हैं। आलंबन माँ का कर्म है, केवल ममता का शब्द नहीं। रस वात्सल्य और करुण मिला है। यह महादेवी की आराध्य-वेदना नहीं। यह गुप्त की यशोधरा-प्रश्न भी नहीं। यह देहात के रोज के काम से बनी माँ है।

वृक्षत्व वृक्ष जैसे होने की अवस्था है — सुगंध देना, ठहराव, दूसरे को छूना। कवि अनुभव करता है कि वृक्षत्व अधूरा रह जाता है जब उपेक्षा किसी दीन के पास ठहरती है। प्रत्येक का अपना वृक्षत्व है — यही नैतिक अर्थ है। किरण धेनुएँ प्रातः का चित्र हैं। प्रभात का ग्वाला किरणों को धेनुओं की तरह हाँकता है। आलोक दूध-सा फैलता है। अंधकार चर जाता है। आलंबन किरण और उषा हैं। रस शांत और अद्भुत हैं। वैदिक गौ-बिंब आधुनिक प्रभात पर बैठता है। तीन पाठ तीन छोर हैं — श्रम, नैतिकता, प्रकाश। संशय की एक रात यहाँ नहीं खुलती।

माँ वाचक की स्मृति है — आँगन लीपना, अल्पना, रसोई, पथ निहारना। आलंबन माँ का कर्म है, केवल ममता का शब्द नहीं। रस वात्सल्य-करुण है। महादेवी की आराध्य-वेदना यह नहीं। यशोधरा का सखी-प्रश्न यह नहीं। वृक्षत्व आचरण है, कागद का रूँख मरु-तप है; दोनों वृक्ष हैं, भूमि अलग है। किरण धेनुएँ उषा का ग्वाला हैं। तीन शीर्षक तीन छोर हैं, एक पर्याय नहीं।

7 नागार्जुन — कवि का परिचय

वैद्यनाथ मिश्र ‘नागार्जुन’ का जन्म 30 जून 1911, मिथिला-दरभंगा-मधुबनी क्षेत्र। निधन 5 नवम्बर 1998। मैथिली में यात्री नाम से लिखते हैं। हिन्दी में नागार्जुन। प्रगतिशील लेखक संघ 1936 के बाद के जन-कवि हैं। विषय भूख, ऋण, नेता, गाँव, शासन की विडंबना। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली, व्यंग्य तेज, रूप गवाही और लंबी कविता तक। वे निर्धारित दो पाठों से पहचाने जाते हैं — प्रेत का बयान और यह दंतुरित मुस्कान। पहला व्यंग्य है, दूसरा वात्सल्य। दोनों एक कवि के दो सिरे हैं; एक को दूसरे पर चढ़ाना अधूरा है।

प्रवृत्ति यथार्थ, व्यंग्य और जन-नायकत्व है। दिनकर का राष्ट्रीय ओज प्रगतिवाद नहीं। अज्ञेय का व्यक्ति-शिल्प इसका वैषम्य है। नागार्जुन सड़क और पेट से बोलते हैं। सीमा सिद्धांत और नारे का बोझ कभी कहा गया; गुण यह है कि करुण और हास्य एक साथ चलते हैं। यात्री मैथिली नाम है; जन्म-निधन 1911–1998, मिथिला। प्रेत शिक्षक की गवाही है; दंतुरित शिशु की मुस्कान है।

प्रगतिशील लेखक संघ 1936 के बाद वे जन-कवि हैं। विषय भूख, ऋण, नेता, गाँव, शासन की विडंबना। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली। रामविलास शर्मा आलोचना से प्रगति को दायित्व कहते हैं; नागार्जुन कविता से वही दायित्व गाते हैं। केदारनाथ अग्रवाल श्रम-प्रकृति मिलाते हैं; नागार्जुन व्यंग्य तेज रखते हैं। दो पाठ दो सिरे हैं — व्यंग्य और वात्सल्य। एक को दूसरे पर चढ़ाना अधूरा है।

नामसंकेत
नागार्जुनहिन्दी; प्रगतिवाद
यात्रीमैथिली नाम
प्रेत का बयानव्यंग्य; भूख की विडंबना
यह दंतुरित मुस्कानवात्सल्य; शिशु

8 प्रेत का बयान और दंतुरित मुस्कान

प्रेत का बयान व्यंग्य-कविता है। वाचक एक प्रेत है — प्राथमिक पाठशाला का शिक्षक। यम के सामने बयान चलता है। वह भूख या अकाल को मृत्यु का आधिकारिक कारण नहीं बनने देता; पेचिश जैसी बीमारी का नाम लेता है। आशय यह है कि स्वाधीन देश में भूख छिपती है, कागज़ पर कारण और बदल जाता है। आलंबन वह शिक्षक-प्रेत है। उद्दीपन दरिद्रता, तंत्र और मृत्यु हैं। रस हास्य-व्यंग्य और करुण मिला है। रूप गवाही है, शोक-गीत नहीं।

यह दंतुरित मुस्कान वात्सल्य है। आलंबन छोटे बच्चे की दाँत निकली मुस्कान है। धूल सने गात कमल जैसे लगते हैं। मुस्कान मृतप्राय मन में भी जान डालती है। कवि माँ के माध्यम बिना बच्चे को पूरा नहीं पहचान पाता — वात्सल्य कुटुंब से बँधा है। रस वात्सल्य प्रधान है। दोनों पाठ एक कवि के हैं, स्वर उलटा है। प्रेत शासन और पेट पूछता है; मुस्कान जीवन का बचाव पूछती है। व्यंग्य और वात्सल्य दो स्वर हैं। शीर्षक बदलकर एक नहीं कहे जाते।

प्रेत का बयान में वाचक प्राथमिक पाठशाला का शिक्षक-प्रेत है। यम के सामने बयान चलता है। भूख आधिकारिक कारण नहीं बनने दी जाती। आशय यह है कि स्वाधीन देश में भूख छिपती है। रस हास्य-व्यंग्य और करुण मिला है। रूप गवाही है। दंतुरित शिशु की मुस्कान है। सुभद्रा का इसका रोना भी वात्सल्य है; नागार्जुन का वात्सल्य धूल-सने गात पर है। दिनकर का ओज इन दो स्वरों का पर्याय नहीं।

9 भवानीप्रसाद मिश्र और गीत फरोश

भवानीप्रसाद मिश्र का जन्म 29 मार्च 1913, होशंगाबाद-नर्मदापुरम क्षेत्र। निधन 20 फ़रवरी 1985। गाँधी-सरल भाषा के कवि कहे जाते हैं। नई कविता के सरल सिरे पर खड़े हैं — दुर्बोध प्रयोग नहीं, बोलचाल का चयन। निर्धारित दो पाठ गीत फरोश और कहीं नहीं बचे हैं। रूप मुक्त छंद के निकट गेय-कथन। गुण सादगी। वे अज्ञेय जितने दुरुह नहीं, नागार्जुन जितने नारेबाज नहीं।

गीत फरोश में वाचक गीत बेचने वाला है। फेरी पर तरह-तरह के गीत हैं — सुबह, ग़ज़ल, पहाड़ी, दवा, प्रेम; छंद और बे-छंद; रेशमी और खादी। कलम और कंधा दोनों लगते हैं। अंत में मजबूरी है — गीत बेचना पाप जैसा लगता है, फिर भी पेट माँगता है। आलंबन कवि-फेरीवाला है। रस व्यंग्य और करुण हैं। भाव यह है कि बाजार कविता की कीमत तय करता है। छायावाद का प्रगीत बिकने नहीं आता था; यहाँ गीत दुकान बन जाता है। केंद्र फेरी, मजबूर बिक्री और व्यंग्य हैं।

मिश्र गाँधी-सरल भाषा के कवि हैं। नई कविता के सरल सिरे पर खड़े हैं — दुर्बोध प्रयोग नहीं, बोलचाल का चयन। अज्ञेय जितने दुरुह नहीं, नागार्जुन जितने नारेबाज नहीं। गीत फरोश बाजार है; कहीं नहीं बचे पर्यावरण है। दोनों आधुनिक लोभ के दो चेहरे हैं। रूप मुक्त छंद के निकट गेय-कथन। गुण सादगी। देवराज नई कविता के इस सरल सिरे को भी धारा में रखते हैं।

10 कहीं नहीं बचे

प्रसंग मिश्र की दूसरी निर्धारित कविता है। आलंबन लुप्त होती प्रकृति है — हरे वृक्ष, सागर, नदियाँ, पहाड़, झरने। कहीं ठीक-ठाक नहीं बचे। कंक्रीट और लालसा ने जगह ले ली है। सूरज-चाँद धुँधले पड़ते हैं। ऋतु का नियम टूटता है। पक्षी के घोंसले और निर्मल धारा घटते हैं। रस करुण है; व्यंग्य मनुष्य के स्वार्थ पर चिपकता है। रूप सरल कथन है, फैंटेसी नहीं।

भाव पर्यावरण और मूल्य दोनों के क्षय का है। गीत फरोश बाजार में कविता बेचता है; यह पाठ प्रकृति के न बचने का हिसाब है। दोनों आधुनिक लोभ के दो चेहरे हैं। पंत का मौन निमंत्रण प्रकृति को बुलाता है; मिश्र कहता है वह बची ही नहीं। कागद मरु में जल माँगते हैं; मिश्र हरियाली के अभाव पर ठहरते हैं। आलंबन वृक्ष, सागर, नदी, पहाड़ हैं; रस करुण है। भाव प्रकृति-प्रेम मात्र नहीं, ‘नहीं बचे’ का निषेध है।

हरे वृक्ष, सागर, नदियाँ, पहाड़, झरने ठीक-ठाक नहीं बचे। कंक्रीट और लालसा ने जगह ले ली है। सूरज-चाँद धुँधले पड़ते हैं। ऋतु का नियम टूटता है। रूप सरल कथन है, फैंटेसी नहीं। रस करुण; व्यंग्य मनुष्य के स्वार्थ पर चिपकता है। पंत बुलाते हैं; मिश्र गिनती बताते हैं — नहीं बचे। कागद जल माँगते हैं। तीन प्रकृति-स्वर तीन भूमि हैं।

11 ओम पुरोहित ‘कागद’ — कवि का परिचय

ओम पुरोहित ‘कागद’ का जन्म 5 जुलाई 1957, केसरीसिंहपुर। निधन 12 अगस्त 2016। राजस्थानी और हिन्दी दोनों में लिखते हैं। हास्य-व्यंग्य से पहचान बनी; बाद में मरु, जल, वृक्ष और गाँव का गंभीर स्वर बढ़ा। निर्धारित पाँच कविताएँ समकालीन पाठ हैं — पूछती है बेकलू, तपस्वी रूँख, क्यों भटकती है, हरा कर देगी, बरसो जल। पाठ्यक्रम की कुछ फ़ाइलों में बेक्यू लिखा मिलता है; कविता का शीर्षक बेकलू है, भोज्य पदार्थ नहीं। बरसो जल आज्ञार्थ है — जल बरस; बरसों जल काल-गणना नहीं।

प्रवृत्ति मरुधरा, प्यास, प्रतीक्षा और लोक-बिंब है। भाषा राजस्थानी-हिन्दी की संधि पर चलती है। वे धूमिल के सड़क-नारे नहीं; नागार्जुन के प्रेत नहीं; थार की प्यास और गाँव की प्रतीक्षा हैं। संग्रहों में धूप क्यों छेड़ती है जैसे हिन्दी शीर्षक याद किए जाते हैं; पाँच कविताएँ अलग हैं। जन्म-निधन, केसरीसिंहपुर, दो भाषाएँ और बेकलू का शुद्ध शीर्षक परिचय के अंग हैं।

हास्य-व्यंग्य से पहचान बनी; बाद में मरु, जल, वृक्ष और गाँव का गंभीर स्वर बढ़ा। राजस्थान साहित्य अकादमी प्रदेश के आधुनिक हिन्दी साहित्य में ऐसे स्वर जगह देती है। बेकलू चिड़िया है, बेक्यू नहीं। रूँख वृक्ष है। बरसो जल आज्ञार्थ है — जल बरस; बरसों जल काल-गणना नहीं। पाँच पाठ समकालीन हैं, नई कविता के कमरे नहीं, थार की प्यास हैं।

पाठकेंद्र
पूछती है बेकलूखेत की चिड़िया; प्रतीक्षा
तपस्वी रूँखरूँख = वृक्ष; सूखे में ठहराव
क्यों भटकती हैप्यास; धूल; खोज
हरा कर देगीमरुधरा; वर्षा की आशा
बरसो जलथार; जल की प्रार्थना

12 कागद की पाँच निर्धारित कविताएँ

पूछती है बेकलू में बेकलू खेत की चिड़िया है। वह पूछती है — गाँव से हल जोतने वाला कब आएगा, बीनणी भाता लेकर कब आएगी, तपती देह पर शीतल बूँद कब गिरेगी। आलंबन वह चिड़िया और सूना खेत हैं। रस करुण और प्रतीक्षा है। यह बारबेक्यू नहीं। तपस्वी रूँख में रूँख राजस्थानी में वृक्ष है। सूखे में खड़ा वृक्ष तपस्वी जैसा है — सहन, कम माँग, फिर भी खड़ा रहना। आलंबन वह वृक्ष है। रस शांत और करुण मिला है। मेहता का वृक्षत्व नैतिक सुगंध है; कागद का रूँख मरु का तप है।

क्यों भटकती है प्यास और खोज है। खाली पेट, चार दिशा, धूल, पृथ्वी कब तृप्त करे — यही प्रश्न है। आलंबन भटकती प्यास है। हरा कर देगी में मरुधरा स्वयं प्यासी है, आकाश का जल पीती है, फिर भी अंकुर की आशा बाँधे रहती है। ठहरो, पेट भरने दो, तब हरियाली आएगी। बरसो जल थार को धारदार जल की प्रार्थना है। बरसों की सूखी प्यास पर जल उतरे, ठूँठ हरे हों, कलंक मिटे। पाँच पाठ एक सूत्र के हैं — प्रतीक्षा, तप, भटकन, आशा, प्रार्थना। आलंबन बेकलू, रूँख और थार हैं।

बेकलू खेत की चिड़िया है — हल, बीनणी, शीतल बूँद की प्रतीक्षा। तपस्वी रूँख सूखे में खड़ा वृक्ष है। मेहता का वृक्षत्व नैतिक सुगंध है; यह रूँख मरु का तप है। क्यों भटकती है धूल और प्यास है। हरा कर देगी अंकुर की आशा है। बरसो जल प्रार्थना है, वर्ष-गणना नहीं। पाँच शीर्षक पाँच क्षण हैं, एक पर्याय नहीं। पूरी पंक्ति नहीं उतारी जाती; भाव और प्रसंग से पाठ पहचाना जाता है।

13 पाँच कवियों का साम्य और वैषम्य

साम्य आधुनिक खड़ी बोली और छायावाद के बाद का समय है। रूप छोटी कविता, बिंब, मुक्त छंद के निकट कथन। विषय दरबारी नायिका नहीं। अज्ञेय व्यक्ति और नया उपमान देते हैं। मेहता माँ-वृक्ष-किरण देते हैं। नागार्जुन जन और शिशु देते हैं। मिश्र बाजार और पर्यावरण देते हैं। कागद मरु और प्रतीक्षा देते हैं। पाँचों निर्धारित शीर्षक अपनी धारा के साथ पहचाने जाते हैं।

वैषम्य स्वर पर है। चिंतन, श्रम-प्रकाश, व्यंग्य-वात्सल्य, फेरी-क्षय, थार-प्यास — पाँच कोण हैं। अज्ञेय उपन्यास नदी के द्वीप से नहीं पहचाने जाते, कविता से पहचाने जाते हैं। नागार्जुन यात्री भी हैं। कागद बेक्यू नहीं, बेकलू हैं। मिश्र गीत बेचते हैं, मेहता वृक्ष होना सिखाते हैं। सीमाएँ दुरुहता, मिथक की छाया, नारा, सादगी और लोक-शब्द पर हैं। रस शांत से व्यंग्य तक फैलता है।

सार: द्वीप = कविता, उपन्यास नहीं। कलगी = बाजरा, तारा नहीं। माँ = आँगन-श्रम। वृक्षत्व = नैतिक होना। किरण = धेनु-बिंब। प्रेत = शिक्षक-व्यंग्य। दंतुरित = वात्सल्य। फरोश = गीत-बाजार। कहीं नहीं बचे = पर्यावरण। बेकलू = चिड़िया, बेक्यू नहीं। रूँख = वृक्ष। बरसो जल = प्रार्थना।

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