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प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, सुभद्रा notes
Readyप्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, सुभद्रा is a topic in Modern poetry (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.
इकाई 4 छायावाद का निर्धारित पाठ है। चार स्तंभ जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा हैं। सुभद्राकुमारी चौहान चार…
इकाई 4 · प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, सुभद्रा
इकाई 4 छायावाद का निर्धारित पाठ है। चार स्तंभ जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा हैं। सुभद्राकुमारी चौहान चार स्तंभों में नहीं; वे राष्ट्रीय गीत और वात्सल्य की वाचक हैं, निर्धारित कवि हैं। प्रसाद — पेशोला की प्रतिध्वनि, बीती विभावरी, प्रलय की छाया। निराला — कौन तुम शुभ्र-किरण वसना / गीतिका, जुही की कली / परिमल, संध्या सुंदरा / अपरा। पंत — मौन निमंत्रण / पल्लव, एक तारा, नौका विहार / गुंजन। महादेवी — जो तुम आ जाते एक बार / नीहार, तुम मुझमें प्रिय फिर क्या परिचय / नीरजा, मैं नीर भरी दुख की बदली / यामा। सुभद्रा — जीवन फूल, कोयल, उल्लास, इसका रोना। प्रत्येक कविता संग्रह-नाम और आलंबन से पहचानी जाती है।
1 छायावाद का पाठ-घेरा
छायावाद लगभग 1918 से 1936 तक का आंदोलन है। नाम के पीछे मुकुटधर पांडेय और शुक्ल की आपत्ति दोनों याद रहें। शुक्ल रहस्य और अस्पष्टता पर कठोर थे। नंददुलारे वाजपेयी, नगेन्द्र और नामवर सिंह इसे स्वच्छंदता, प्रगीत और कल्पना की शक्ति मानते हैं। चार स्तंभ संस्कृति, ओज, चित्र और वेदना बाँटते हैं। प्रसाद कामायनी और लहर देते हैं। निराला मुक्त छंद और विद्रोह देते हैं। पंत प्रकृति का चित्र देते हैं। महादेवी वेदना का प्रगीत देती हैं। सुभद्रा उसी काल के निकट बोलचाल का गीत गाती हैं। द्विवेदी युग का इतिवृत्त यहाँ सूक्ष्म अनुभूति बनता है।
साम्य खड़ी बोली, लाक्षणिकता और प्रगीत है। वैषम्य स्वर पर है। प्रसाद ऐतिहासिक प्रतिध्वनि और नाट्य-गीत रखते हैं। निराला शृंगार-प्रकृति और संध्या का मानवीकरण रखते हैं। पंत मौन, तारा और नौका रखते हैं। महादेवी अनुपस्थित प्रिय रखते हैं। सुभद्रा फूल, कोयल, उल्लास और बच्चे का रोना रखते हैं। कामायनी प्रसाद की पहचान का शिखर-ग्रंथ है, 1936; पाठ लहर के तीन गीत हैं। झाँसी की रानी सुभद्रा की प्रसिद्ध कविता है; पाठ चार छोटे गीत हैं।
प्रभाकर श्रोत्रिय प्रसाद को संस्कृति-कवि कहते हैं। रामविलास शर्मा निराला की साधना ओज और विद्रोह से पढ़ते हैं। नगेन्द्र पंत को प्रकृति-चित्र का शिखर मानते हैं। गणपतिचंद्र गुप्त महादेवी का नया मूल्यांकन वेदना की वाचक पर करते हैं। दूधनाथ सिंह भी महादेवी को प्रगीत से बाँधते हैं। नामवर छायावाद को आंदोलन कहते हैं, केवल शैली नहीं। रमेशचंद्र शाह प्रासंगिकता बाद के समय में भी देखते हैं। चार स्तंभ चार स्वर हैं; सुभद्रा स्तंभ नहीं, गीत की वाचक हैं।
2 जयशंकर प्रसाद — कवि का परिचय
जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1889, काशी। निधन 15 जनवरी 1937, काशी। काव्य-संग्रह कानन कुसुम, झरना, आँसू, लहर। महाकाव्य कामायनी 1936। नाटक स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी। कहानी आकाशदीप याद की जाती है। भाषा खड़ी बोली, संस्कृत-गर्भित। गुण प्रसाद और माधुर्य। रस शांत, करुण, वीर और शृंगार के सूक्ष्म रूप। वे छायावाद के संस्कृति-कवि हैं। आँसू वैयक्तिक वियोग है। लहर प्रगीत और नाट्य-गीत का संग्रह है; निर्धारित तीन पाठ यहीं से हैं।
प्रवृत्ति कल्पना, प्रतीक, ऐतिहासिक स्मृति और नारी का आत्मगौरव है। श्रद्धा कामायनी में विश्वास की शक्ति है; इड़ा बुद्धि की। पाठ कामायनी नहीं। पेशोला मेवाड़ की प्रतिध्वनि है। बीती विभावरी उषा का जागरण है। प्रलय की छाया कमला की कथा है। सीमा रहस्य और समास का बोझ कभी अर्थ ढक देता है। गुण यह है कि इतिहास केवल तिथि नहीं रह जाता, भाव बन जाता है।
काशी कर्म-भूमि है। नाटक स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी इतिहास को रंगमंच देते हैं। आँसू वैयक्तिक वियोग है। लहर प्रगीत और नाट्य-गीत का संग्रह है; तीन पाठ यहीं से हैं। गुण प्रसाद और माधुर्य। भाषा संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली। वे छायावाद के संस्कृति-कवि हैं। निराला विद्रोह हैं; पंत चित्र हैं; महादेवी वेदना हैं। प्रसाद स्मृति हैं।
| पाठ | संग्रह | केंद्र |
|---|---|---|
| पेशोला की प्रतिध्वनि | लहर | पिछोला; मेवाड़ की गूँज |
| बीती विभावरी | लहर | उषा; जागो |
| प्रलय की छाया | लहर | कमला; गुजरात; रूप और प्रलय |
3 पेशोला की प्रतिध्वनि
पेशोला उदयपुर की पिछोला झील है, मराठा पेशवा नहीं। प्रसंग लहर का है। संध्या में अरुण बिंब पश्चिम व्योम पर लटकता है। झील की उर्मियाँ शांत हैं। तट के तरु चित्रित हैं। दुन्दुभि-मृदंग मौन हैं। फिर भी व्योम में पुकार गूँजती है — कौन लेगा भार? मेवाड़ में ऊँची छाती कर कौन कहेगा मैं हूँ? आलंबन पिछोला और मेवाड़ की स्मृति हैं। उद्दीपन संध्या, शांत जल, अरावली और मौन वाद्य हैं। रस वीर और करुण मिला है। गौरव की काया पड़ी है; प्रताप की प्रतिध्वनि कहाँ है — यही प्रश्न कविता का कंकाल है।
भाव यह है कि प्रकृति स्मृति रखती है, वर्तमान उत्तर नहीं देता। पांडे हल्दीघाटी में युद्ध गाते हैं; प्रसाद झील पर युद्ध के बाद की खामोशी गाते हैं। दोनों मेवाड़ हैं, रूप अलग है। झील पिछोला है, गूँज मेवाड़-प्रताप की है, रस वीर-करुण है। पेशवा कहना भूल है।
संध्या में अरुण बिंब पश्चिम व्योम पर लटकता है। उर्मियाँ शांत हैं। दुन्दुभि-मृदंग मौन हैं। फिर भी व्योम में पुकार है — कौन लेगा भार? आलंबन पिछोला और मेवाड़ की स्मृति हैं। उद्दीपन संध्या, शांत जल, अरावली हैं। प्रतीक गूँज है, युद्ध का वर्णन नहीं। संग्रह लहर है। मराठा पेशवा नाम-साम्य मात्र है, आलंबन नहीं।
अरुण करुण बिम्ब!
वह निर्धूम भस्म रहित ज्वलन पिंड!
जयशंकर प्रसाद — पेशोला की प्रतिध्वनि · लहर
4 बीती विभावरी जाग री
विभावरी रात्रि है। कविता संबोधन है — जाग री। अंबर पनघट बनता है। ऊषा नागरी तारा-घट डुबोती है। खग-कुल बोलता है। आलंबन उषा और सोई हुई श्रोता हैं। उद्दीपन तारा, अंबर, पक्षी हैं। रस शृंगार का संयोग-पक्ष और जागरण का उत्साह मिला है। रूप छोटा प्रगीत है, नाट्य-विस्तार नहीं। प्रतीक दो पंक्तियाँ खोलता है — रात्रि बीती, जल भरने वाली उषा आई। निजी निद्रा भी जाग सकती है, सार्वजनिक निद्रा भी। अर्थ एक ही कुंजी से बंद नहीं होता।
पेशोला संध्या और मौन है। यह उषा और आह्वान है। दोनों लहर के प्रगीत हैं, दिशा उलटी है। महादेवी के प्रिय नहीं आते; यहाँ उषा आकर जगाती है। संग्रह लहर है, संबोधन जाग री है, बिंब पनघट-ताराघट है, रस जागरण है। पहचान पहली पंक्ति से खुलती है।
विभावरी रात्रि है। अंबर पनघट बनता है। ऊषा नागरी तारा-घट डुबोती है। खग-कुल बोलता है। आलंबन उषा और सोई श्रोता हैं। प्रतीक दो पंक्तियाँ खोलता है — रात्रि बीती, जल भरने वाली उषा आई। निजी निद्रा भी जाग सकती है, सार्वजनिक निद्रा भी। रूप छोटा प्रगीत है, प्रलय की छाया का नाट्य-विस्तार नहीं।
बीती विभावरी जाग री!
अंबर पनघट में डुबो रही तारा-घट ऊषा नागरी।
जयशंकर प्रसाद — बीती विभावरी जाग री · लहर
5 प्रलय की छाया
यह लहर का लंबा नाट्य-गीत है। वाचक कमला है — गुजरात की रूप-रानी। पति गुर्जरेश हैं। सुलतान के आक्रमण में देश जलता है। पति युद्ध में आगे बढ़ते हैं, कमला बंदी होती है। वह पद्मिनी की गाथा से अपनी तुलना करती है — जलाऊँगी जिसमें सुलतान जले। रंगमहल सुवर्ण पिंजरा बनता है। बालसखा मानिक मृत्युदंड से बचता है, बाद में प्रतिशोध का चक्र काफूर-खुसरो तक मुड़ता है। आलंबन कमला हैं। उद्दीपन पराजय, रूप, लोभ और रक्त-संध्या हैं। रस शृंगार, वीर, करुण और वीभत्स छूते हैं।
भाव यह है कि रूप विजय भी है, अभिशाप भी। स्वाभिमान पद्मिनी-मार्ग माँगता है; जीवन-लोभ दूसरी पंक्ति खोलता है। अंत में पुण्य-हीन सौंदर्य प्रलय की छाया में गिरता नक्षत्र है। यह बीती विभावरी का छोटा जागरण नहीं। यह पेशोला की मौन गूँज भी नहीं। नारी यहाँ केवल आलंबन नहीं, वाचक है — ग्लानि सहित। केंद्र कमला, गुजरात, सुलतान और पद्मिनी-स्पर्धा हैं; संग्रह लहर है।
वाचक कमला है। पति गुर्जरेश युद्ध में हैं। सुलतान के आक्रमण में देश जलता है। रंगमहल सुवर्ण पिंजरा बनता है। रस शृंगार, वीर, करुण और वीभत्स छूते हैं। रूप नाट्य-गीत है, छोटा प्रगीत नहीं। कामायनी का सर्ग यह नहीं। स्त्री विमर्श वाचक-ग्लानि यहीं पढ़ सकता है। केंद्र रूप और प्रलय हैं, उषा-जागरण नहीं।
थके हुए दिन के निराशा भरे जीवन की
संध्या हैं आज भी तो धूसर क्षितिज में!
जयशंकर प्रसाद — प्रलय की छाया · लहर
6 निराला — कौन तुम शुभ्र-किरण वसना
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म 21 फरवरी 1896, महिषादल-मेदिनीपुर। निधन 15 अक्टूबर 1961, प्रयाग। उन्हें महाप्राण कहा जाता है। मुक्त छंद का विधान उनका बड़ा काम है। संग्रह परिमल 1930, गीतिका 1936, अपरा। अन्य कृतियाँ अनामिका, तुलसीदास, राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति, कुकुरमुत्ता। ओज और कोमलता एक साथ हैं। तोड़ती पत्थर सामाजिक करुण है; निर्धारित पाठ प्रकृति-शृंगार और संध्या के हैं।
कौन तुम शुभ्र-किरण वसना गीतिका का गीत है। संबोधन ज्योतिर्मयी आकृति को है — किरण का वसन, प्रश्न कौन हो तुम, सीखा केवल हँसना। आलंबन वह शुभ्र स्त्री-आकृति है। उद्दीपन प्रकाश और हास्य हैं। रस शृंगार और अद्भुत मिला है। रूप गेय प्रगीत है, जुही जितना दृश्य-विस्तार नहीं। रहस्य नाम नहीं खोलता; प्रश्न ही गीत है। संग्रह गीतिका है; संबोधन शुभ्र-किरण-वसना है; ज्ञान केवल हँसना है।
निराला महाप्राण हैं। मुक्त छंद उनका बड़ा काम है। परिमल 1930, गीतिका 1936, अपरा तीन संग्रह पाठ के हैं। राम की शक्तिपूजा और सरोज स्मृति ओज-करुण के शिखर हैं, पाठ नहीं। तोड़ती पत्थर सामाजिक करुण है; तीन पाठ प्रकृति-शृंगार और संध्या के हैं। रामविलास शर्मा साधना ओज और विद्रोह दोनों से पढ़ते हैं। पंत चित्र हैं; निराला स्पर्श और प्रश्न हैं।
कौन तुम शुभ्र-किरण-वसना?
सीखा केवल हँसना—केवल हँसना—
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ — गीतिका
7 जुही की कली और संध्या सुंदरी
जुही की कली परिमल की कविता है। निर्जन लता पर सुहागिन-सुकुमारी सोती है — जुही की कली। मलय पवन नायक बनकर आता है। आलिंगन से कली जागती है, खिलती है। आलंबन कली है। उद्दीपन रात्रि, वन-वल्लरी, पवन हैं। रस शृंगार है। प्रकृति नायिका बनती है, केवल दृश्य नहीं। द्विवेदी युग फूल का नाम गिनता; निराला फूल को प्रेम का शरीर देते हैं। मुक्त छंद गति देता है।
संध्या सुंदरी अपरा की कविता है। पाठ्यक्रम में संध्या सुंदरा लिखा है; प्रचलित शीर्षक संध्या सुंदरी है। दिवसावसान पर वह मेघमय आसमान से उतरती है। मानवीकरण पूरा है — संध्या स्त्री है, चुप, कोमल, थके जीवों को सुलाती। आलंबन संध्या हैं। रस शांत और विप्रलंभ छूता है। जुही रात्रि-मिलन है; संध्या अवसान है। दोनों प्रकृति को नारी-आकृति देते हैं। जुही परिमल की है, संध्या अपरा की है।
जुही की कली निर्जन लता पर सुहागिन-सुकुमारी है। मलय पवन नायक बनकर आता है। कली जागती है, खिलती है। आलंबन कली है। रस शृंगार है। द्विवेदी युग फूल का नाम गिनता; निराला फूल को प्रेम का शरीर देते हैं। मुक्त छंद गति देता है। संध्या दिवसावसान का मानवीकरण है। दोनों पाठ प्रकृति-नारी हैं; गीतिका का शुभ्र-किरण प्रश्न तीसरा पाठ है, इन दो का पर्याय नहीं।
विजन वन-वल्लरी पर
सोती थी सुहागिन सुकुमारी —
निराला — जुही की कली · परिमल
दिवसावसान का समय—
मेघमय आसमान से उतर रही है
निराला — संध्या सुंदरी · अपरा
8 पंत — मौन निमंत्रण
सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई 1900, कौसानी, अल्मोड़ा। निधन 28 दिसंबर 1977। उन्हें प्रकृति के सुकुमार कवि कहा जाता है। पल्लव 1926 छायावाद की भाषा और चित्र का बड़ा संग्रह है। गुंजन 1932। बाद में ग्राम्या और लोकायतन प्रगति और दर्शन की ओर मुड़ते हैं। निर्धारित तीन पाठ छायावादी चित्र के हैं। भाषा खड़ी बोली, गुण माधुर्य, शिल्प चित्रात्मकता। प्रसाद इतिहास रखते हैं; पंत दृश्य रखते हैं।
मौन निमंत्रण पल्लव की कविता है। स्तब्ध ज्योत्स्ना में संसार शिशु-सा चकित रहता है। नक्षत्र, फूल, लहर और पक्षी शब्द से नहीं, मौन से बुलाते हैं। आलंबन प्रकृति का मौन है। उद्दीपन चाँदनी, तारे, वसंत हैं। रस शांत है। निमंत्रण वाक्य नहीं; संकेत है। निराला की जुही स्पर्श से खिलती है; पंत की प्रकृति बिना छुए बुलाती है। संग्रह पल्लव है; निमंत्रण मौन है; रस शांत है।
कौसानी जन्म-भूमि प्रकृति का पहला पाठ है। पल्लव 1926 भाषा और चित्र का बड़ा संग्रह है। गुंजन 1932। ग्राम्या और लोकायतन बाद के मोड़ हैं, पाठ नहीं। नगेन्द्र पंत को सुकुमार चित्रकार कहते हैं। प्रसाद इतिहास रखते हैं; पंत दृश्य रखते हैं। गुण माधुर्य। शिल्प चित्रात्मकता। तीन पाठ छायावादी चित्र के हैं — मौन, तारा, नौका।
9 एक तारा और नौका विहार
एक तारा गुंजन की कविता है। सांध्य आकाश में एक बिंदु बचता है। आलंबन वह अकेला तारा है। उद्दीपन संध्या, शेष ज्योति, विस्तीर्ण नभ हैं। रस शांत है; करुण एकाकीपन से चिपकता है। महादेवी बादल बनकर बरसना चाहती हैं; पंत एक तारे को देखकर चित्र बाँधते हैं। भाव यह नहीं कि तारा केवल खगोल है। भाव यह है कि शेष प्रकाश भी पूरा सौंदर्य हो सकता है।
नौका विहार भी गुंजन की है। ग्रीष्म की चाँदनी रात, नदी की धारा, नाव का मंथर चलना। जल दर्पण जैसा है। आलंबन नदी और नौका हैं। रस शांत है। चित्र इतना सघन है कि कवि प्रवाह में अपना बोझ भूलता है। मौन निमंत्रण स्थल-ज्योत्स्ना है; नौका विहार जल-यात्रा है; एक तारा नभ का बिंदु है। तीनों प्रकृति के तीन छोर हैं — मौन, बिंदु, प्रवाह। एक तारा और नौका विहार दोनों गुंजन के हैं।
एक तारा सांध्य आकाश का शेष बिंदु है। आलंबन अकेला तारा है। रस शांत; करुण एकाकीपन से चिपकता है। महादेवी बादल बनकर बरसना चाहती हैं; पंत तारे को देखकर चित्र बाँधते हैं। नौका विहार ग्रीष्म-चाँदनी की नदी है। तीन पाठ तीन छोर हैं, एक पर्याय नहीं। मौन निमंत्रण पल्लव का है; ये दो गुंजन के हैं। प्रसाद का मेवाड़ और महादेवी की वेदना यहाँ प्रधान नहीं।
| पाठ | संग्रह | आलंबन |
|---|---|---|
| मौन निमंत्रण | पल्लव | चाँदनी का मौन संकेत |
| एक तारा | गुंजन | सांध्य का एक बिंदु |
| नौका विहार | गुंजन | नदी, नाव, चाँदनी |
10 महादेवी — जो तुम आ जाते एक बार
महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907, फर्रुखाबाद। निधन 11 सितंबर 1987, प्रयाग। उन्हें आधुनिक मीरा कहा जाता है। नीहार 1930, रश्मि 1932, नीरजा 1935 के आसपास, सांध्यगीत, यामा 1940। यामा पर मंगलाप्रसाद पुरस्कार याद किया जाता है। गद्य में श्रृंखला की कड़ियाँ। भाषा खड़ी बोली, रूप प्रगीत, रस करुण और शांत। प्रिय आराध्य है, देह-नायक नहीं। वेदना वाचक की है, केवल नायिका की नहीं।
जो तुम आ जाते एक बार नीहार का गीत है। शर्त एक आगमन की है। आलंबन अनुपस्थित प्रिय हैं। उद्दीपन प्रतीक्षा, रात्रि, अधूरी भेंट हैं। रस विप्रलंभ और करुण हैं। प्रसाद की उषा आकर जगाती है; महादेवी का प्रिय आता नहीं। गुप्त की यशोधरा पति के जाने पर प्रश्न करती है; महादेवी आने की एक कल्पना से पूरा गीत भरती हैं। संग्रह नीहार है; सूत्र एक आगमन है; वेदना वाचक की है।
आधुनिक मीरा कहना भक्ति का रूपक है; प्रिय आराध्य है, देह-नायक नहीं। नीहार 1930, नीरजा, यामा 1940। श्रृंखला की कड़ियाँ गद्य हैं। गणपतिचंद्र गुप्त नया मूल्यांकन वेदना की वाचक पर करते हैं। दूधनाथ सिंह प्रगीत बाँधते हैं। स्त्री विमर्श उन्हें रहस्य की नायिका नहीं, वाचक पढ़ता है। तीन गीत तीन संग्रह से हैं; एक स्वर वेदना का है, तीन सूत्र अलग हैं।
11 तुम मुझमें प्रिय और दुख की बदली
तुम मुझमें प्रिय फिर क्या परिचय नीरजा का गीत है। प्रिय बाहर का अतिथि नहीं; भीतर बसता है। परिचय की रीति टूटती है। आलंबन अंतर्वर्ती प्रिय हैं। रस शांत और भक्ति-शृंगार मिला है। रहस्य यहाँ अंधकार नहीं, अभेद है। जो तुम आ जाते दूरी माँगता है; यह गीत दूरी मिटाता है। दोनों एक कवयित्री के दो छोर हैं — प्रतीक्षा और तादात्म्य।
मैं नीर भरी दुख की बदली यामा का गीत है। वाचक अपने को बादल कहती है — नीर दुख का है, बरसना स्वभाव है। आलंबन कवयित्री स्वयं हैं। उद्दीपन मेघ, जल, वेदना हैं। रस करुण है। पंत का एक तारा बाहर टिमटिमाता है; महादेवी का मेघ भीतर से बरसता है। प्रसाद की कमला रूप से लड़ती है; महादेवी वेदना से पहचान बनाती हैं। तुम मुझमें प्रिय नीरजा का है; दुख की बदली यामा की है। एक अभेद है, दूसरी मेघ-स्वभाव। सीमा यह कही गई कि वेदना कभी एक स्वर पर ठहर जाती है। गुण यह है कि स्त्री वाचक है।
नीरजा का गीत दूरी मिटाता है — प्रिय भीतर बसता है, परिचय की रीति टूटती है। नीहार का गीत दूरी माँगता है — एक आगमन। यामा का गीत स्वभाव बताता है — दुख का नीर, बरसना। तीन सूत्र प्रतीक्षा, तादात्म्य, मेघ हैं। रहस्य अंधकार नहीं, अभेद और वेदना है। पंत चित्र बाहर रखते हैं; महादेवी अनुभव भीतर रखती हैं। दोनों छायावाद हैं, आलंबन अलग है।
| गीत | संग्रह | सूत्र |
|---|---|---|
| जो तुम आ जाते एक बार | नीहार | एक आगमन की कल्पना |
| तुम मुझमें प्रिय फिर क्या परिचय | नीरजा | अंतर्वर्ती प्रिय; अभेद |
| मैं नीर भरी दुख की बदली | यामा | वेदना का मेघ-स्वभाव |
12 सुभद्राकुमारी चौहान
सुभद्राकुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त 1904, निहालपुर, इलाहाबाद। निधन 15 फरवरी 1948। संग्रह मुकुल। झाँसी की रानी उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता है; निर्धारित पाठ वह नहीं है। निर्धारित चार पाठ हैं — जीवन फूल, कोयल, उल्लास, इसका रोना। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली है। रूप सरल गीत है। वे छायावाद के चार स्तंभों में नहीं। स्वर राष्ट्रीय गीत और वात्सल्य का है। रहस्य पतला है; चित्र साफ है।
जीवन फूल जीवन की क्षणभंगुरता और अधूरी अभिलाषा है। कोयल वसंत की वाणी और प्रकृति का उल्लास है। उल्लास मन के हर्ष का गीत है — महादेवी की वेदना का उल्टा छोर। इसका रोना बच्चे का रोना है। कोई कहता है रोना नहीं सुहाता; वाचक कहती है इसी रोने से अनुपम सुख छाता है। आलंबन शिशु हैं। रस वात्सल्य है। करुण दृष्टि हृदय उमड़ती है। चार शीर्षक मुकुल-स्वर के हैं; झाँसी की रानी इनमें नहीं है।
सुभद्रा चार स्तंभों में नहीं। स्वर राष्ट्रीय गीत और वात्सल्य का है। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली है। रहस्य पतला है; चित्र साफ है। झाँसी की रानी प्रसिद्ध है, पाठ नहीं। जीवन फूल, कोयल, उल्लास, इसका रोना चार छोटे गीत हैं। महादेवी वेदना गाती हैं; सुभद्रा हर्ष और शिशु गाती हैं। दोनों स्त्री वाचक हैं; आलंबन अलग है। प्रसाद की कमला इतिहास है; सुभद्रा का रोना घर का वात्सल्य है।
| पाठ | स्वर |
|---|---|
| जीवन फूल | क्षणभंगुरता |
| कोयल | वसंत की वाणी |
| उल्लास | मन का हर्ष |
| इसका रोना | वात्सल्य; शिशु |
तुम कहते हो — मुझको इसका रोना नहीं सुहाता है।
मैं कहती हूँ — इस रोने से अनुपम सुख छा जाता है।
सुभद्राकुमारी चौहान — इसका रोना
13 पाँच कवियों का साम्य और वैषम्य
साम्य छायावाद के आसपास की खड़ी बोली और सूक्ष्म अनुभूति है। प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी चार स्तंभ हैं। सुभद्रा उसी समय का सरल गीत हैं। प्रकृति चारों स्तंभों में आलंबन या उद्दीपन है। नारी प्रसाद की कमला में वाचक है, निराला की कली-संध्या में आकृति है, महादेवी में वाचक वेदना है, सुभद्रा में माता है। रूप प्रगीत प्रधान है; प्रलय की छाया नाट्य-विस्तार है।
वैषम्य स्वर पर है। प्रसाद इतिहास और जागरण रखते हैं। निराला स्पर्श और मानवीकरण रखते हैं। पंत मौन चित्र रखते हैं। महादेवी अनुपस्थिति रखते हैं। सुभद्रा वात्सल्य और बोलचाल रखते हैं। पेशोला मेवाड़ की गूँज है, हल्दीघाटी का युद्ध नहीं। जुही मिलन है, महादेवी का प्रिय आता नहीं। सीमाएँ रहस्य, वेदना का एक स्वर और सुभद्रा की सरलता पर हैं। प्रत्येक पाठ अपने संग्रह-नाम से पहचाना जाता है।
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