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भारतेंदु, गुप्त, हरिऔध, सोहनलाल द्विवेदी, पांडे notes
Readyभारतेंदु, गुप्त, हरिऔध, सोहनलाल द्विवेदी, पांडे is a topic in Modern poetry (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.
इकाई 3 निर्धारित कवि-पाठ है। पाँच नाम हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र — चूरन अमल वेद का भारी, निज भाषा उन्नति अहै। मैथिलीशरण गुप्त — कैकेयी परिताप, सखि वे मुझसे…
इकाई 3 · भारतेंदु, गुप्त, हरिऔध, सोहनलाल द्विवेदी, पांडे
इकाई 3 निर्धारित कवि-पाठ है। पाँच नाम हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र — चूरन अमल वेद का भारी, निज भाषा उन्नति अहै। मैथिलीशरण गुप्त — कैकेयी परिताप, सखि वे मुझसे कहकर जाते, दोनों ओर प्रेम पलता है। अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ — प्रिय प्रवास के तीन अंश: दिवस का अवसान, दुखिया के आँसू, एक बूँद। सोहनलाल द्विवेदी — रे मन, खादी गीत, वंदना। श्यामनारायण पांडे — हल्दीघाटी, दूसरा सर्ग। धारा नवजागरण से राष्ट्रीय गीत और वीर-खंड तक चलती है। भाषा ब्रज से खड़ी बोली तक मुड़ती है। प्रत्येक कविता अपने शीर्षक और आलंबन से पहचानी जाती है।
1 नवजागरण से राष्ट्रीय गीत तक
पाँच निर्धारित कवि नवजागरण से राष्ट्रीय गीत और वीर-खंड तक हैं। भारतेंदु सार्वजनिक नवजागरण देते हैं — निज भाषा और पाखंड-व्यंग्य। गुप्त द्विवेदी युग के प्रतिनिधि हैं — आदर्श, इतिवृत्त, नारी का पश्चात्ताप और स्वाभिमान। हरिऔध खड़ी बोली महाकाव्य देते हैं — कृष्ण का मथुरा-प्रवास, गोपियों का विरह। सोहनलाल महावीर प्रसाद द्विवेदी नहीं हैं; वे गाँधी-युग के गीतकार हैं — मन, खादी, वंदना। पांडे वीर-खंडकाव्य देते हैं — महाराणा प्रताप, हल्दीघाटी 1576। पाँचों एक काल नहीं; एक प्रश्न हैं — आधुनिक हिन्दी कविता सार्वजनिक विषय कैसे गाती है।
साम्य देश, समाज और खड़ी बोली की ओर बढ़ना है। वैषम्य स्वर पर है। भारतेंदु व्यंग्य और घोष रखते हैं। गुप्त नैतिक करुण रखते हैं। हरिऔध विप्रलंभ-शृंगार रखते हैं। सोहनलाल सरल गीत रखते हैं। पांडे ओज और युद्ध रखते हैं। रश्मिरथी कर्ण का खंड है; हल्दीघाटी प्रताप का खंड है — नायक अलग, रस दोनों में वीर हो सकता है। छायावाद का प्रतीक-जाल यहाँ प्रधान नहीं।
नगेन्द्र और बच्चन सिंह इन्हीं कवियों को नवजागरण और द्विवेदी-युग के प्रतिनिधि कहते हैं। द्वारिकाप्रसाद सक्सेना प्रतिनिधि आधुनिक कवि में परिचय देते हैं। शुक्ल भारतेंदु को केंद्र-पुरुष कहते हैं। गुप्त आदर्श गाते हैं। हरिऔध खड़ी बोली महाकाव्य सिद्ध करते हैं। सोहनलाल गाँधी-गीत हैं। पांडे राष्ट्रीय वीर-खंड हैं। पाँच नाम एक धारा नहीं; सार्वजनिक विषय गाने के पाँच ढंग हैं।
2 भारतेंदु — निज भाषा उन्नति अहै
भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 1850, निधन 1885, स्थान काशी। पत्र कविवचनसुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन, बालबोधिनी। नाटक भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी। निर्धारित पहला पाठ निज भाषा उन्नति अहै है। कविता ब्रज-प्रधान है; विषय आधुनिक है। सूत्र यह है कि अपनी भाषा की उन्नति सब उन्नति का मूल है। बिना निज भाषा-ज्ञान के हृदय का सूल नहीं मिटता। अंग्रेज़ी शिक्षा और दरबारी ब्रज दोनों के सामने यह दावा सार्वजनिक है। आलंबन निज भाषा है। उद्दीपन पराधीनता और विदेशी ज्ञान का बोझ है। रस वीर-जागरण और करुण मिला है।
पहचान दो पंक्तियों से है — निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। अन्वय यही है: अपनी भाषा बढ़े तो शेष उन्नति जड़ पकड़े। शुक्ल भारतेंदु को आधुनिक हिन्दी का केंद्र-पुरुष कहते हैं। यह पद उसी केंद्र का काव्य-प्रमाण है। सीमा यह है कि स्वयं कविता अभी पूरी खड़ी बोली नहीं। दावा भाषा का है, शिल्प संक्रमण का है। आधुनिक हिन्दी का भाषा-आग्रह यहीं से टिकता है।
प्रसंग नवजागरण है। आलंबन निज भाषा है। उद्दीपन पराधीनता और विदेशी ज्ञान का बोझ है। रस वीर-जागरण और करुण मिला है। छंद दोहा-गीत के निकट है। गुण ओज सादगी के साथ है। निज भाषा-ज्ञान के बिना हृदय का सूल नहीं मिटता — यही दूसरी पंक्ति का अन्वय है। चूरन व्यंग्य है; यह पद गौरव है। दोनों भारतेंदु के दो हाथ हैं।
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।
भारतेंदु हरिश्चंद्र — निज भाषा उन्नति अहै
3 चूरन अमल वेद का भारी
दूसरा निर्धारित पाठ चूरन अमल वेद का भारी है। चूरन बाजार का चूर्ण है, अमल स्वाद या नशा, वेद शास्त्र का भार। कवि पंडित-वैद्य-पुरोहित के पाखंड पर हँसते हैं — शास्त्र को चूरन बनाकर बेचना। रूप होली-मुकरी और सार्वजनिक गीत का है, महाकाव्य का नहीं। आलंबन पाखंडी पुरोहित हैं। उद्दीपन बाजार, जड़ी-बूटी और वेद का नाम है। रस हास्य-व्यंग्य है; करुण समाज की ठगी से चिपकता है। रीतिकाल नायिका बेचता था; भारतेंदु पाखंड बेचते दिखाते हैं।
भाव सुधार का है, नास्तिकता का नहीं। वेद का निषेध नहीं; वेद को दवा-दुकान बनाने का निषेध है। निज भाषा ज्ञान माँगती है; चूरन अज्ञान बेचता है। दोनों पाठ एक कवि के दो हाथ हैं — एक भाषा का गौरव, दूसरा समाज का व्यंग्य। नाटक अंधेर नगरी गद्य में वही व्यंग्य चलाता है। प्रसंग भारतेंदु युग है; अन्वय चूरन-व्यापार है; सौंदर्य व्यंग्य और लोक-लय पर है।
रूप होली-मुकरी और सार्वजनिक गीत का है। आलंबन पाखंडी पुरोहित हैं। रस हास्य-व्यंग्य है। रीति नायिका बेचती थी; यह पद शास्त्र का चूरन बेचता दिखाता है। सुधार वेद छोड़ने का नहीं, वेद को बाजार न बनाने का है। निज भाषा ज्ञान की माँग है; चूरन अज्ञान की बिक्री है। दोनों पाठ बिना एक-दूसरे के अधूरे रह जाते।
4 मैथिलीशरण गुप्त — कवि का परिचय
मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886, चिरगाँव, झाँसी। निधन 12 दिसंबर 1964। उन्हें राष्ट्रकवि कहा जाता है। भारत-भारती 1912 जागरण का घोष है। साकेत 1931 राम-कथा का आधुनिक महाकाव्य है; उर्मिला का विप्रलंभ उसकी नई दृष्टि है। यशोधरा 1932 बुद्ध-गृहत्याग पर खंडकाव्य है। जयद्रथ वध और पंचवटी अन्य प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। भाषा खड़ी बोली है। प्रवृत्ति इतिवृत्त, आदर्श और नैतिक करुण है। सरस्वती-युग के अनुशासन में वाक्य स्थिर है। छायावाद का रहस्य उनका मार्ग नहीं।
तीन पाठ तीन कृति-कोण हैं। कैकेयी परिताप साकेत से है। सखि वे मुझसे कहकर जाते यशोधरा से है; साकेत की उर्मिला से मिलाया नहीं जाता। दोनों ओर प्रेम पलता है उभय-पक्ष प्रेम का मुक्तक है। नारी आलंबन भर नहीं; पश्चात्ताप और प्रश्न की वाचक है। सीमा उपदेश का बोझ है। गुण यह है कि पौराणिक स्त्री को आधुनिक सहानुभूति मिलती है।
भारत-भारती 1912 जागरण का घोष है; पाठ वह नहीं। साकेत राम-कथा का आधुनिक महाकाव्य है; उर्मिला उसकी नई दृष्टि है, कैकेयी उसका परिताप है। यशोधरा बुद्ध-गृहत्याग का खंड है। भाषा खड़ी बोली, सरस्वती-अनुशासन। छायावाद का रहस्य मार्ग नहीं। राष्ट्रकवि पद प्रशस्ति है; पाठ कृति-नाम से पहचाना जाता है। दिनकर भी राष्ट्रकवि कहे जाते हैं; स्वर ओज का है, गुप्त का स्वर आदर्श का है।
| कृति | निर्धारित पाठ |
|---|---|
| साकेत | कैकेयी परिताप |
| यशोधरा | सखि वे मुझसे कहकर जाते |
| मुक्तक | दोनों ओर प्रेम पलता है |
5 कैकेयी परिताप
प्रसंग साकेत का है। दो वर मिल चुके हैं। राम वन गए। दशरथ नहीं रहे। भरत राज नहीं लेते। कैकेयी को अपना कर्म दिखाई देता है। परिताप पश्चात्ताप है, सफाई नहीं। आलंबन कैकेयी हैं। उद्दीपन रिक्त राजसिंहासन, राम का वन और भरत का त्याग हैं। रस करुण है; वीभत्स आत्मग्लानि से छूता है। गुप्त कैकेयी को केवल षड्यंत्रिणी नहीं छोड़ते; वे उसे वाचक बनाते हैं। द्विवेदी युग की नारी यहाँ माता-सती की प्रतिमा से आगे पश्चात्ताप की स्त्री है।
अन्वय-भाव यह है कि राज्य-लोभ कुटुंब तोड़ता है; ज्ञान देर से आता है। राम मर्यादा हैं; कैकेयी उस मर्यादा की तोड़। फिर भी कवि दंड के साथ करुण रखते हैं। साधारणीकरण यहीं होता है — पश्चात्ताप निजी कैकेयी का रहकर भी सामान्य लोभ-फल बन जाता है। ग्रंथ साकेत है, कवि गुप्त हैं, रस करुण है। यह यशोधरा का पद नहीं।
दो वर राम-वन और भरत-राज हैं। दशरथ नहीं रहते। भरत राज नहीं लेते। कैकेयी वाचक बनकर अपना कर्म देखती है। आलंबन कैकेयी हैं। उद्दीपन रिक्त सिंहासन और वन हैं। संचारी ग्लानि, विषाद, स्मृति हैं। द्विवेदी युग की नारी यहाँ केवल माता-सती नहीं, पश्चात्ताप की स्त्री है। उर्मिला का विप्रलंभ साकेत का दूसरा कोण है; यह पाठ वह कोण नहीं।
6 सखि वे मुझसे कहकर जाते
प्रसंग यशोधरा का है, प्रकाशन 1932। सिद्धार्थ गृह त्यागते हैं। यशोधरा सखी से बोलती है। अन्वय यह है — वे मुझसे कहकर जाते; क्या मैं उनकी पथ-बाधा हूँ? प्रश्न स्वाभिमान का है, केवल विलाप का नहीं। आलंबन यशोधरा हैं। उद्दीपन रात्रि-त्याग, पुत्र राहुल, मौन पति हैं। रस करुण और वात्सल्य मिला है। गुप्त बुद्ध को महापुरुष रखते हैं; यशोधरा को चुप नायिका नहीं रखते। स्त्री विमर्श का वाचक-प्रश्न यहीं टिक सकता है — वेदना यशोधरा की अपनी है।
साकेत की उर्मिला लक्ष्मण-वियोग है; यह पद वह नहीं। दोनों नारी-वेदना हैं, कथा अलग है। भाषा खड़ी बोली, शैली संबोधन-गीत, छंद गेय है। भाव गृहत्याग की कीमत स्त्री चुकाती है। केंद्र सखी-संबोधन, पथ-बाधा का प्रश्न और यशोधरा का आत्मगौरव है। कृति-नाम यशोधरा है, साकेत नहीं।
सिद्धार्थ गृह त्यागते हैं। यशोधरा सखी से पूछती है — क्या मैं पथ-बाधा हूँ? प्रश्न स्वाभिमान का है, केवल विलाप का नहीं। आलंबन यशोधरा हैं। उद्दीपन रात्रि-त्याग, राहुल, मौन पति हैं। रस करुण-वात्सल्य है। स्त्री विमर्श वाचक-प्रश्न यहीं टिका सकता है। गुप्त बुद्ध को महापुरुष रखते हैं; यशोधरा को चुप नहीं रखते। प्रिय प्रवास का गोपी-विरह यह पद नहीं।
7 दोनों ओर प्रेम पलता है
यह मुक्तक प्रेम का लक्षण है। सूत्र उभय-पक्ष है। एक ओर प्रेम नहीं पलता। दीपक जलता है, पतंग भी जलता है — दोनों आहुति देते हैं। आलंबन प्रेमी-प्रेमिका या त्याग-मिलन के दो छोर हैं। उद्दीपन दीप और पतंग का चित्र है। रस शृंगार का विप्रलंभ-पक्ष और शांत मिला है। बिंब इंद्रिय-चित्र है, छायावाद का रहस्य-प्रतीक नहीं। द्विवेदी युग का आदर्श प्रेम को एकपक्षीय भक्ति नहीं, पारस्परिक धर्म बनाता है।
कैकेयी में प्रेम टूटता है। यशोधरा में एक पक्ष मौन त्याग करता है, दूसरा प्रश्न करता है। यह पद दोनों पाठों का सूत्र भी दे सकता है — बिना उत्तर-प्रेम के संबंध जल जाता है। अन्वय उभय-पक्ष है; उदाहरण दीप-पतंग है; कवि गुप्त हैं। यह प्रिय प्रवास का विरह नहीं; गुप्त का स्वतंत्र प्रतिपाद्य है।
दीपक जलता है, पतंग भी जलता है — दोनों आहुति देते हैं। बिंब इंद्रिय-चित्र है। रस शृंगार का विप्रलंभ-पक्ष और शांत मिला है। द्विवेदी युग प्रेम को एकपक्षीय भक्ति नहीं, पारस्परिक धर्म बनाता है। मुक्तक स्वतः पूर्ण है, साकेत-सर्ग नहीं। आलंबन दो छोर हैं। सूत्र उभय-पक्ष है। बिना उत्तर के प्रेम जल जाता है — यही अन्वय है।
8 हरिऔध — प्रिय प्रवास का स्वरूप
अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का जन्म 1865, निधन 1947। प्रिय प्रवास खड़ी बोली का प्रथम बड़ा सफल महाकाव्य माना जाता है। प्रकाशन 1914 के आसपास कहा जाता है। कथा कृष्ण का गोकुल छोड़ मथुरा जाना है — प्रिय का प्रवास। आलंबन कृष्ण, यशोदा, गोपी, नंद हैं। रस विप्रलंभ-शृंगार और वात्सल्य हैं। भाषा संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली है। छंद पर संस्कृत-वृत्तों का प्रभाव है। सूर ब्रज पद में वही विरह गाते हैं; हरिऔध उसे महाकाव्य का विस्तार देते हैं।
पूरे ग्रंथ नहीं, तीन अंश हैं — दिवस का अवसान, दुखिया के आँसू, एक बूँद। साकेत राम-कथा है; यह कृष्ण-विरह है। दोनों खड़ी बोली की लंबी कथाएँ हैं, स्वर अलग है। सीमा क्लिष्ट समास और इतिवृत्त का बोझ है। गुण यह है कि खड़ी बोली केवल निबंध नहीं रहती, महाकाव्य बनती है। द्विवेदी युग का भाषा-कार्य यहीं कविता के विस्तार तक सिद्ध होता है।
प्रिय प्रवास का अर्थ प्रिय का प्रवास है — कृष्ण गोकुल छोड़ मथुरा जाते हैं। आलंबन कृष्ण, यशोदा, गोपी, नंद हैं। रस विप्रलंभ-शृंगार और वात्सल्य हैं। सूर ब्रज पद में वही विरह गाते हैं; हरिऔध खड़ी बोली महाकाव्य देते हैं। छंद पर संस्कृत-वृत्तों का प्रभाव है। भाषा संस्कृत-गर्भित है। ग्रंथ महाकाव्य है; पाठ तीन अंश हैं, पूरा पर्व नहीं।
9 दिवस का अवसान, दुखिया के आँसू, एक बूँद
दिवस का अवसान संध्या का चित्र है। पहचान की पहली पंक्ति है — दिवस का अवसान समीप था। गगन लोहित होता है, दिन ढलता है। प्रसंग गोकुल की वह संध्या है जब प्रिय-प्रवास निकट है या विरह का समय घिरता है। आलंबन प्रकृति और ब्रज-जीवन हैं। उद्दीपन लोहित गगन, तरु-शिखा, कमलिनी हैं। रस शांत से विप्रलंभ की ओर मुड़ता है। खड़ी बोली में इतना सघन संध्या-चित्र द्विवेदी युग की उपलब्धि है।
दुखिया के आँसू विरह का जल है — यशोदा या गोपी की पीड़ा। एक बूँद शेष बिंदु है; पूरी नदी नहीं, एक बिंदु में विरह सिमटता है। तीनों अंश एक कथा-सूत्र के तीन क्षण हैं — संध्या, अश्रु, बिंदु। प्रसंग प्रिय प्रवास है, कवि हरिऔध हैं, रस विप्रलंभ है। सूर का भ्रमरगीत निर्गुण-खंडन है; यह अंश सगुण विरह का खड़ी बोली रूप है। केंद्र संध्या, अश्रु और बिंदु हैं।
पहचान की पंक्ति है — दिवस का अवसान समीप था। गगन लोहित होता है। आलंबन प्रकृति और ब्रज-जीवन हैं। उद्दीपन लोहित गगन, तरु-शिखा, कमलिनी हैं। दुखिया के आँसू जल हैं; एक बूँद बिंदु है। तीन क्षण एक विरह बाँधते हैं। साकेत का कैकेयी-परिताप यह नहीं। यशोधरा का सखी-प्रश्न यह नहीं। कवि हरिऔध हैं, गुप्त नहीं।
| अंश | क्षण |
|---|---|
| दिवस का अवसान | संध्या; प्रिय-प्रवास निकट |
| दुखिया के आँसू | विरह का जल |
| एक बूँद | एक बिंदु में विरह |
10 सोहनलाल द्विवेदी — रे मन, खादी गीत, वंदना
सोहनलाल द्विवेदी का जन्म 1906, निधन 1988। वे महावीर प्रसाद द्विवेदी नहीं हैं। स्वर गाँधी-युग का राष्ट्रीय गीत है। संग्रहों में युगावतार गाँधी याद किया जाता है। निर्धारित तीन पाठ सरल गीत हैं। रे मन चित्त को संबोधित करता है — हिम्मत, जागरण, अस्त से सुवर्ण विहान तक। आलंबन मन है। रस वीर-जागरण है। शैली संबोधन की है; तुलसी मन को बावरा कहते हैं, सोहनलाल मन को राष्ट्र-कर्तव्य कहते हैं।
खादी गीत स्वदेशी का गीत है। खादी केवल कपड़ा नहीं; नंगों-भुखों की आस और आहत आह का चिह्न है। आलंबन खादी है। उद्दीपन चरखा, गाँव, विदेशी वस्त्र हैं। वंदना प्रार्थना-गीत है — राष्ट्र, जन या महापुरुष के प्रति नमन। तीनों पाठ ओज के सरल रूप हैं, रश्मिरथी के संवाद-ओज नहीं। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली है। कवि सोहनलाल द्विवेदी हैं; सूत्र गाँधी-स्वदेशी है।
रे मन चित्त को हिम्मत और जागरण कहता है। तुलसी मन को बावरा कहते हैं; सोहनलाल मन को राष्ट्र-कर्तव्य कहते हैं। खादी श्रम और आस है। वंदना नमन है। तीनों गीत हैं, महाकाव्य नहीं। महावीर प्रसाद द्विवेदी सरस्वती के संपादक हैं; यह नाम वह नहीं। भारतेंदु व्यंग्य गाते हैं; सोहनलाल गीत गाते हैं। दोनों सार्वजनिक विषय हैं, रूप अलग है।
| पाठ | केंद्र |
|---|---|
| रे मन | चित्त का जागरण |
| खादी गीत | स्वदेशी; श्रम और आस |
| वंदना | नमन; राष्ट्र-भक्ति |
11 श्यामनारायण पांडे — हल्दीघाटी
श्यामनारायण पांडे का जन्म 1907, निधन 1991। अन्य कृतियाँ जौहर, तुमुल याद की जाती हैं। हल्दीघाटी महाराणा प्रताप का खंडकाव्य है। ऐतिहासिक घटना 18 जून 1576 के आसपास की लड़ाई है — प्रताप बनाम मानसिंह, अकबर की सेना। स्थान मेवाड़ की हल्दीघाटी। नायक प्रताप हैं। सहयोगी घोड़ा चेतक कथा का प्राण है। रस वीर प्रधान है; करुण चेतक और घायल मेवाड़ पर है। भाषा खड़ी बोली, गुण ओज, शैली वर्णनात्मक है।
यह रश्मिरथी नहीं। रश्मिरथी कर्ण और जन्म-कर्म है। हल्दीघाटी स्वाधीनता और स्वाभिमान है। दोनों खंडकाव्य हैं, नायक और स्रोत अलग हैं। भारतेंदु व्यंग्य गाते हैं; पांडे युद्ध गाते हैं। गुप्त नारी का परिताप रखते हैं; पांडे पुरुष-वीर का ओज रखते हैं। पाठ पूरा ग्रंथ नहीं, दूसरा सर्ग है।
घटना 18 जून 1576 के आसपास की लड़ाई है — प्रताप बनाम मानसिंह। स्थान मेवाड़ की घाटी। सहयोगी घोड़ा चेतक कथा का प्राण है। रस वीर प्रधान, करुण सहायक। भाषा खड़ी बोली, गुण ओज। जौहर और तुमुल अन्य कृतियाँ हैं। पेशोला झील की गूँज है; यह सर्ग युद्ध का वर्णन है। दोनों मेवाड़ हैं, रूप अलग है।
12 हल्दीघाटी — दूसरा सर्ग
दूसरा सर्ग युद्ध का सर्ग है। प्रताप सुनते हैं, सेना सजती है, घाटी संकरी है। मानसिंह मुगल-पक्ष हैं। बाण, घोड़े, केसरिया वस्त्र, नगाड़ा — उद्दीपन वीर रस के हैं। आलंबन प्रताप और मेवाड़-सेना हैं। चेतक युद्ध में साथ है। ओज वाक्य को गति देता है। करुण पीछे से आता है — क्षय, घाव, अस्त-घोड़ा। कवि इतिहास दोहराते नहीं; स्वाभिमान को काव्य का स्थायी भाव बनाते हैं।
प्रसंग दूसरा सर्ग है, कवि पांडे हैं, रस वीर है, आलंबन प्रताप हैं। सर्ग का कार्य युद्ध का आरंभ, प्रताप का श्रवण और सेना का सन्नद्ध होना है। दिनकर का कर्ण दान और मैत्री से नायक है; प्रताप मैदान और घाटी से नायक है। दोनों ओज हैं, कथा एक नहीं। सीमा इतिहास का चयन और प्रशस्ति का आधिक्य है। गुण राष्ट्रीय स्मृति को खंडकाव्य देना है।
घाटी संकरी है। मानसिंह मुगल-पक्ष हैं। बाण, घोड़े, केसरिया वस्त्र, नगाड़ा उद्दीपन हैं। चेतक साथ है। स्थायी भाव उत्साह है। संचारी गर्व, उत्सुकता, क्रोध हैं। करुण पीछे से आता है — क्षय, घाव, अस्त-घोड़ा। कवि इतिहास दोहराते नहीं; स्वाभिमान को स्थायी भाव बनाते हैं। रश्मिरथी का रंगभूमि-सर्ग यह नहीं।
13 पाँच कवियों का साम्य और वैषम्य
साम्य आधुनिक सार्वजनिक विषय है। भारतेंदु भाषा और पाखंड पर बोलते हैं। गुप्त मर्यादा और नारी-प्रश्न पर बोलते हैं। हरिऔध विरह पर बोलते हैं। सोहनलाल खादी पर बोलते हैं। पांडे स्वाधीनता पर बोलते हैं। दरबारी नायिका-भेद केंद्र नहीं रह जाता। भाषा खड़ी बोली की ओर बढ़ती है; भारतेंदु अभी ब्रज रखते हैं। रूप गीत, मुक्तक, महाकाव्य-अंश और खंड-सर्ग तक फैलता है।
वैषम्य स्वर और नायक पर है। व्यंग्य, परिताप, विप्रलंभ, गीत, वीर — पाँच रस-कोण हैं। गुप्त की यशोधरा वाचक स्त्री है; पांडे का प्रताप वाचक वीर है। हरिऔध का कृष्ण प्रिय है जो जाता है; सोहनलाल का मन श्रोता है जिसे जगना है। सीमाएँ अलग हैं — भारतेंदु की ब्रज, गुप्त का उपदेश, हरिऔध का समास, सोहनलाल की सरलता, पांडे की प्रशस्ति। प्रत्येक कवि अपने पाठ से पहचाना जाता है।
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