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आधुनिक कविता की धाराएँ, काव्यशास्त्र और विमर्श notes
Readyआधुनिक कविता की धाराएँ, काव्यशास्त्र और विमर्श is a topic in Modern poetry (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.
आधुनिक काव्य रीतिकाल के बाद की हिन्दी कविता है। तीन विषय हैं। पहला — युग-धाराएँ: भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, छायावाद, प्रयोगवाद, प्रगतिवाद, नई कविता,…
इकाई 1 · आधुनिक कविता की धाराएँ, काव्यशास्त्र और विमर्श
आधुनिक काव्य रीतिकाल के बाद की हिन्दी कविता है। तीन विषय हैं। पहला — युग-धाराएँ: भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, छायावाद, प्रयोगवाद, प्रगतिवाद, नई कविता, समकालीन कविता। कालक्रम में प्रगतिवाद 1936 है, प्रयोगवाद तार सप्तक 1943 से पहचाना जाता है। दूसरा — काव्यरूप, बिंब, प्रतीक, रस का स्वरूप, निष्पत्ति और साधारणीकरण। तीसरा — स्त्री, दलित और दिव्यांग विमर्श। आचार्य रामचंद्र शुक्ल आधुनिक काल को गद्य के आविर्भाव से जोड़ते हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र सीमा-पुरुष हैं। कविता कुछ काल ब्रज में चली; द्विवेदी युग ने उसे खड़ी बोली पर बैठाया।
आधार डॉ. नगेन्द्र का हिन्दी साहित्य का इतिहास; रामस्वरूप चतुर्वेदी का हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास; डॉ. बच्चन सिंह का हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास; द्वारकाप्रसाद सक्सेना के हिन्दी के प्रतिनिधि आधुनिक कवि; मोहन अवस्थी का आधुनिक हिन्दी काव्यशिल्प; नामवर सिंह की कविता के नए प्रतिमान, आधुनिक काव्य की प्रवृत्तियाँ और छायावाद; हरदयाल की आधुनिक हिन्दी कविता; वेदप्रकाश अमिताभ की हिन्दी कविता आधुनिक और समकालीन; बलदेवप्रसाद उपाध्याय का भारतीय काव्यशास्त्र। यहाँ धारा, शिल्प और दृष्टि का ढाँचा है।
1 आधुनिक हिन्दी कविता — आशय
आधुनिक हिन्दी कविता रीतिकाल के दरबारी शृंगार के बाद की काव्य-धारा है। उसके साथ प्रेस, नवजागरण और राष्ट्र-चेतना आते हैं। शुक्ल आधुनिक काल का आरंभ गद्य से मानते हैं। गद्य पहले खड़ी बोली में स्थिर हुआ। कविता भारतेंदु तक ब्रज-प्रधान रही। द्विवेदी युग ने कविता को भी खड़ी बोली दी। विषय बदल गए — देश की दुर्दशा, आदर्श, आत्मा, वर्ग, व्यक्ति का क्षण, फिर सड़क और पहचान। रूप भी बदले — गीत, प्रगीत, महाकाव्य, खंडकाव्य, मुक्त छंद, गद्य-कविता। नगेन्द्र इतिहास का ढाँचा देते हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी संवेदना के विकास से पढ़ते हैं। बच्चन सिंह शुक्ल-केंद्र की समीक्षा करते हैं। नामवर सिंह छायावाद और नई कविता के प्रतिमान बाँधते हैं।
सात धाराएँ एक सीधी रेखा हैं, पर प्रत्येक अगली पिछली का निषेध और ग्रहण दोनों है। भारतेंदु सार्वजनिक नवजागरण देते हैं। द्विवेदी खड़ी बोली और इतिवृत्त देते हैं। छायावाद कल्पना, प्रगीत और प्रतीक देते हैं। प्रगतिवाद जन-यथार्थ देता है। प्रयोगवाद व्यक्ति और शिल्प देता है। नई कविता लघु मानव और बिंब देती है। समकालीन कविता सड़क और विमर्श देती है। साम्य खड़ी बोली की ओर बढ़ना और आधुनिक मनुष्य का विषय है। वैषम्य आलंबन पर है — देश, आदर्श, आत्मा, वर्ग, क्षण, जटिल व्यक्ति, पहचान।
नगेन्द्र कालक्रम और प्रतिनिधि से इतिहास बाँधते हैं। चतुर्वेदी संवेदना का रूप देखते हैं — विषय के साथ अनुभव का रंग भी बदलता है। बच्चन सिंह शुक्ल के गद्य-केंद्र को काटते हैं, ताकि कविता स्वतंत्र अध्याय रहे। नामवर आंदोलन और प्रतिमान पूछते हैं। सक्सेना कवि-परिचय देते हैं। अवस्थी शिल्प देखते हैं। गलत वाक्य: आधुनिक कविता केवल छायावाद है। सही वाक्य: आधुनिक कविता भारतेंदु से समकालीन तक सात धाराओं वाली खड़ी बोली परंपरा है; छायावाद उसका एक शिखर है, पूरा नाम नहीं।
| धारा | काल (लगभग) | पहचान |
|---|---|---|
| भारतेंदु युग | 1850–1900 | नवजागरण; गद्य खड़ी बोली, कविता ब्रज |
| द्विवेदी युग | 1900–1918 | सरस्वती; खड़ी बोली कविता; इतिवृत्त |
| छायावाद | 1918–1936 | प्रसाद-निराला-पंत-महादेवी; प्रगीत |
| प्रगतिवाद | 1936 | प्रगतिशील लेखक संघ; जन-यथार्थ |
| प्रयोगवाद | 1943 | तार सप्तक; व्यक्ति-शिल्प |
| नई कविता | 1950 के बाद | लघु मानव; बिंब |
| समकालीन | 1970 के बाद | सड़क, पहचान, विमर्श |
2 भारतेंदु युग
भारतेंदु युग आधुनिक हिन्दी का प्रथम उत्थान है। काल प्रायः 1850 से 1900 तक माना जाता है; कुछ इतिहास 1868 से 1900 लिखते हैं। केंद्र भारतेंदु हरिश्चंद्र हैं — जन्म 1850, निधन 1885, स्थान काशी। उन्होंने कविवचनसुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन और बालबोधिनी निकाली। गद्य खड़ी बोली में चला। कविता अभी ब्रज-प्रधान रही। विषय देश की दुर्दशा, समाज-सुधार, स्त्री-शिक्षा, विधवा-पीड़ा, विदेशी वस्त्र और निज भाषा हैं। नाटक भारत दुर्दशा और अंधेर नगरी युग का गद्य-प्रमाण हैं। कविता में निज भाषा उन्नति अहै और चूरन अमल वेद का भारी उसी युग के काव्य-प्रमाण हैं। भारतेंदु मंडल में प्रतापनारायण मिश्र, बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’, ठाकुर जगमोहन सिंह, अंबिकादत्त व्यास और राधाचरण गोस्वामी आते हैं। बालकृष्ण भट्ट गद्य-आलोचना से जुड़े हैं।
प्रवृत्तियाँ पाँच सूत्रों में बैठती हैं। नवजागरण — 1857 के बाद की चेतना, प्रेस और सार्वजनिक गोष्ठी। भाषा — गद्य में खड़ी बोली का अभ्यास, कविता में ब्रज का अवशेष। राष्ट्र — भारत माता, पराधीनता, स्वदेशी। समाज — पाखंड, छुआछूत, स्त्री की दशा पर व्यंग्य और करुण दोनों। रूप — गीत, मुकरियाँ, होली, कवित्त; महाकाव्य नहीं, छोटे गेय और व्यंग्य-रूप। सीमा यह है कि काव्य-भाषा पूरी तरह खड़ी बोली नहीं बनी और सुधार-स्वर कभी उपदेश-भर रह जाता है। शुक्ल भारतेंदु को आधुनिक हिन्दी का केंद्र-पुरुष कहते हैं। द्विवेदी युग उसी भाषा-कार्य को कविता तक ले जाता है।
भारतेंदु मंडल दरबार नहीं, पत्र और नाटक का मंडल है। प्रतापनारायण मिश्र कानपुर से देश-भक्ति और व्यंग्य रखते हैं। प्रेमघन ब्रज और देश-गीत मिलाते हैं। जगमोहन सिंह प्रकृति-शृंगार का परिष्कार रखते हैं। निज भाषा उन्नति अहै और चूरन अमल वेद का भारी इसी युग के काव्य-प्रमाण हैं — एक भाषा का गौरव, दूसरा पाखंड का व्यंग्य। नाटक भारत दुर्दशा सार्वजनिक करुण है; अंधेर नगरी व्यंग्य है। आधुनिक कविता का सार्वजनिक स्वर यहीं से चलता है।
| नाम | संकेत |
|---|---|
| भारतेंदु हरिश्चंद्र | सीमा-पुरुष; पत्र और नाटक; निज भाषा |
| प्रतापनारायण मिश्र | ब्राह्मण, कानपुर; भारतेंदु मंडल |
| प्रेमघन | बदरीनारायण चौधरी; ब्रज और देश-गीत |
| जगमोहन सिंह | शृंगार-प्रकृति; ब्रज का परिष्कार |
3 द्विवेदी युग
द्विवेदी युग लगभग 1900 से 1918 तक माना जाता है। नाम महावीर प्रसाद द्विवेदी से पड़ता है। वे सरस्वती पत्रिका के संपादक रहे — कार्यकाल प्रायः 1903 से 1920 तक कहा जाता है। काम तीन थे। खड़ी बोली को कविता की भाषा बनाना। व्याकरण और शब्द-शुद्धि से वाक्य स्थिर करना। इतिवृत्त, नीति और राष्ट्रीय आदर्श को कविता का विषय बनाना। मैथिलीशरण गुप्त भारत-भारती और साकेत से इस युग के प्रतिनिधि कवि हैं। अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का प्रिय प्रवास खड़ी बोली का पहला बड़ा सफल महाकाव्य माना जाता है। श्रीधर पाठक प्रकृति और स्वच्छंदता की ओर पुल हैं। गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’, नाथूराम शर्मा ‘शंकर’ और रामचरित उपाध्याय अन्य नाम हैं। सोहनलाल द्विवेदी राष्ट्रीय गीत के कवि हैं; वे महावीर प्रसाद द्विवेदी नहीं हैं।
प्रवृत्ति इतिवृत्तात्मकता है — कथा और इतिहास कविता में क्रम से चलते हैं। आदर्शवाद नैतिक और राष्ट्रीय है। नारी सती, माता और जागृति की प्रतिमा है; छायावाद की रहस्य-प्रिया नहीं। भाषा खड़ी बोली है, पर पद-लालित्य बाद के छायावाद जितना नहीं। आचार्य शुक्ल इस काल को गद्य का उत्कर्ष भी कहते हैं; कविता उसी गद्य-अनुशासन की सहचरी है। सीमा उपदेश और घटना-क्रम का बोझ है। कल्पना और लाक्षणिकता द्वितीय पंक्ति में रहती हैं। गुप्त का भारत-भारती जागरण का घोष है। प्रिय प्रवास कृष्ण-विरह को खड़ी बोली महाकाव्य देता है। द्विवेदी युग छायावाद की पृष्ठभूमि है, प्रतिद्वंद्वी नहीं।
भारतेंदु युग में गद्य खड़ी बोली का था, कविता ब्रज की। यह युग वह अंतर मिटाता है। सरस्वती वाक्य स्थिर करती है। गुप्त आदर्श गाते हैं। हरिऔध विस्तार देते हैं। पाठक श्रीधर पाठक को पुल मानता है — प्रकृति बाद के पंत तक जाती है। सोहनलाल द्विवेदी नाम-साम्य से महावीर प्रसाद नहीं हैं; वे गाँधी-गीत के कवि हैं। छायावाद द्विवेदी के आदर्श से विद्रोह करता है, उसकी भाषा लेता है। प्रगतिवाद उसके राष्ट्र-आदर्श को वर्ग-प्रश्न से काटता है। युग पुल भी है, अनुशासन भी है।
| कवि / संपादक | ग्रंथ / काम |
|---|---|
| महावीर प्रसाद द्विवेदी | सरस्वती; भाषा-शुद्धि; आलोचना |
| मैथिलीशरण गुप्त | भारत-भारती; साकेत |
| हरिऔध | प्रिय प्रवास |
| श्रीधर पाठक | प्रकृति; स्वच्छंदता का पुल |
4 छायावाद
छायावाद लगभग 1918 से 1936 तक का काव्य-आंदोलन है। नाम के पीछे मुकुटधर पांडेय का लेख और आचार्य शुक्ल की आपत्ति दोनों याद रहें। शुक्ल रहस्यात्मकता और अस्पष्टता पर कठोर थे। नंददुलारे वाजपेयी, नगेन्द्र और बाद में नामवर सिंह ने इसे स्वच्छंदता, प्रगीत और कल्पना की शक्ति माना। चार स्तंभ जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा हैं। प्रसाद के झरना, आँसू, लहर और कामायनी हैं। निराला के परिमल, अनामिका, गीतिका, राम की शक्ति-पूजा और सरोज-स्मृति हैं। पंत के पल्लव, गुंजन और बाद की ग्राम्या हैं। महादेवी के नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत और यामा हैं। सुभद्राकुमारी चौहान इसी काल के निकट राष्ट्रीय गीत गाती हैं; वे चार स्तंभों में नहीं गिनी जातीं, निर्धारित कवि हैं।
प्रवृत्तियाँ स्थिर हैं। स्थूल इतिवृत्त के स्थान पर सूक्ष्म अनुभूति। प्रकृति आलंबन और उद्दीपन दोनों है। नारी देह से अधिक पीड़ा, करुण और शक्ति है। लाक्षणिकता, संगीत और प्रगीत-रूप प्रधान हैं। रहस्य ब्रह्म और जीवन के बीच का प्रश्न है, केवल अंधकार नहीं। बिंब और प्रतीक — दीप, बादल, झरना, तारा, रात्रि — अर्थ की दूसरी पंक्ति खोलते हैं। कामायनी महाकाव्य छायावाद का शिखर-ग्रंथ कहा जाता है। निराला छंद-मुक्ति और ओज दोनों रखते हैं। पंत सौंदर्य और चित्रण रखते हैं। महादेवी वेदना का प्रगीत रखती हैं। सीमा व्यक्ति-केंद्र और रहस्य का बोझ है; प्रगतिवाद इसी पर यथार्थ का आक्षेप करता है। नामवर की छायावाद पुस्तक आंदोलन को ऐतिहासिक मोड़ मानती है, केवल शैली नहीं।
रमेशचंद्र शाह छायावाद की प्रासंगिकता बाद के समय में भी देखते हैं। प्रभाकर श्रोत्रिय प्रसाद को संस्कृति-कवि कहकर वर्तमान से जोड़ते हैं। रामविलास शर्मा निराला की साधना ओज और सामाजिक दाब दोनों से पढ़ते हैं। नगेन्द्र पंत को प्रकृति-चित्र का शिखर मानते हैं। गणपतिचंद्र गुप्त महादेवी का नया मूल्यांकन वेदना की वाचक पर करते हैं। चार स्तंभ चार स्वर हैं, एक शैली की नकल नहीं। सुभद्रा उसी काल के निकट बोलचाल का गीत गाती हैं; वे स्तंभ नहीं, निर्धारित कवि हैं।
| कवि | पहचान | ग्रंथ-संकेत |
|---|---|---|
| प्रसाद | कल्पना, संस्कृति, महाकाव्य | कामायनी, लहर, आँसू |
| निराला | ओज, मुक्त छंद, विद्रोह | परिमल, गीतिका, अनामिका |
| पंत | सौंदर्य, चित्र, प्रकृति | पल्लव, गुंजन |
| महादेवी | वेदना, प्रगीत, रहस्य | नीहार, नीरजा, यामा |
5 प्रगतिवाद
प्रगतिवाद 1936 के आसपास संगठित स्वर है। उसी वर्ष लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई। प्रेमचंद अध्यक्ष रहे। वैचारिक आधार मार्क्सवाद, वर्ग-संघर्ष और जन-यथार्थ है। कविता महल और रहस्य से खेत, कारखाना, ऋण और भूख की ओर मुड़ती है। प्रतिनिधि नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, त्रिलोचन और रांगेय राघव हैं। रामविलास शर्मा आलोचना के स्तंभ हैं। पंत की ग्राम्या और युगांत छायावाद से प्रगति की ओर पुल हैं। निराला में सामाजिक ओज पहले से था; प्रगतिवाद उसे सिद्धांत देता है। दिनकर का राष्ट्रीय ओज प्रगतिवाद का पर्याय नहीं; वह वीर और जागरण का अलग स्वर है। नागार्जुन प्रगतिवाद के प्रतिनिधि हैं — प्रेत का बयान और यह दंतुरित मुस्कान उनके पाठ हैं।
प्रवृत्ति यथार्थ वर्णन, शोषण-विरोध, किसान-मजदूर का नायकत्व, व्यंग्य और सरल जन-भाषा है। रस में रौद्र, वीर, करुण और हास्य-व्यंग्य प्रधान हो जाते हैं; छायावाद का शांत-रहस्य पीछे हटता है। रूप गीत, व्यंग्य-कविता और कथा-काव्य तक फैलता है। सीमा यह है कि सिद्धांत कभी कविता पर सवार हो जाता है और व्यक्ति की भीतरी जटिलता पतली पड़ती है। प्रयोगवाद और नई कविता उसी कमी से अपना मार्ग निकालते हैं। साम्य छायावाद से भाषा खड़ी बोली पर है। वैषम्य विषय और दृष्टि पर है — आत्मा बनाम समाज, कल्पना बनाम वर्ग।
रामविलास शर्मा आलोचना से प्रगति को साहित्य का दायित्व बताते हैं। केदारनाथ अग्रवाल प्रकृति और श्रम मिलाते हैं। त्रिलोचन गाँव की बोली रखते हैं। सुमन ओज और जन-गीत रखते हैं। पंत की ग्राम्या पुल है, पूरा प्रगतिवाद नहीं। निराला का तोड़ती पत्थर सामाजिक करुण है, संघ का घोषणा-पत्र नहीं। दिनकर का कर्ण जन्म-व्यवस्था पूछता है; वर्ग-सूत्र वहाँ पूरा नहीं। प्रगतिवाद 1936 का संगठित नाम है; जन-स्वर उससे पहले भी कविता में था, सिद्धांत बाद में बैठा।
6 प्रयोगवाद
प्रयोगवाद का घोषित द्वार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का तार सप्तक है, प्रकाशन 1943। सात कवि हैं — अज्ञेय, नेमिचंद्र जैन, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरिजाकुमार माथुर, रामविलास शर्मा और गजानन माधव मुक्तिबोध। सभी एक विचार के नहीं। रामविलास और मुक्तिबोध सामाजिक-वैचारिक छोर रखते हैं। अज्ञेय व्यक्ति, क्षण और शिल्प के छोर रखते हैं। प्रयोग का अर्थ छंद तोड़ना मात्र नहीं। अर्थ नई अनुभूति के लिए नई भाषा, बिंब और मनोविज्ञान आजमाना है। फ्रायड, अस्तित्व-चिंता, युद्ध और नगर का अकेला मन यहाँ विषय बनते हैं। दूसरा सप्तक 1951, तीसरा 1959 — ये नई कविता की ओर खुलते हैं। अज्ञेय के नदी के द्वीप और कलगी बाजरे की प्रयोग और नई कविता के पाठ हैं।
प्रवृत्ति व्यक्तिगत अनुभूति, बौद्धिकता, बिंब-प्रयोग, छंद-स्वातंत्र्य और रहस्य का आंतरिक रूप है। प्रगतिवाद जन को नायक बनाता है। प्रयोगवाद व्यक्ति को प्रयोगशाला बनाता है। दोनों आधुनिक हैं; मार्ग उल्टे हैं। आक्षेप यह रहा कि प्रयोगवाद समाज से कटा, दुरुह और विदेशी प्रभाव का ऋणी है। बचाव यह रहा कि बिना शिल्प-विवेक के यथार्थ भी नारा रह जाता है। मुक्तिबोध दोनों छोरों को जोड़ते हैं — फैंटेसी और वर्ग-चेतना एक साथ। इसलिए प्रयोगवाद को केवल अज्ञेय का पर्याय कहना अधूरा है; तार सप्तक कई दिशाओं का गुच्छा है, एक रंग की पंक्ति नहीं।
नंदकिशोर आचार्य अज्ञेय की काव्यतीर्था व्यक्ति और क्षण पर देखते हैं। देवराज नई कविता को सप्तकों के बाद का नाम देते हैं। शिवकुमार मिश्र नया हिन्दी काव्य प्रयोग से आगे की पीढ़ी बाँधते हैं। अज्ञेय के नदी के द्वीप और कलगी बाजरे की व्यक्ति-संबंध और नया उपमान दिखाते हैं। प्रयोग का अर्थ छंद तोड़ना मात्र नहीं; अर्थ नई अनुभूति के लिए नई भाषा आजमाना है। दूसरा और तीसरा सप्तक द्वार खोलते हैं, प्रयोगवाद को हमेशा के लिए बंद नहीं करते।
| सप्तक | वर्ष | संकेत |
|---|---|---|
| तार सप्तक | 1943 | प्रयोग का द्वार; अज्ञेय संपादन |
| दूसरा सप्तक | 1951 | नई कविता का विस्तार |
| तीसरा सप्तक | 1959 | आगे की पीढ़ी |
7 नई कविता
नई कविता 1950 के दशक की वह धारा है जो सप्तकों के बाद पत्रिकाओं और आलोचना में स्थिर नाम पाती है। केंद्र में लघु मानव है — न छायावाद का विराट रहस्य, न प्रगति का केवल वर्ग-नायक, न प्रयोग का केवल दुर्बोध व्यक्ति। वर्तमान की जटिलता, शहर, संबंध, अकेलापन, राजनीति की थकान और छोटी-छोटी वस्तुएँ कविता का आलंबन बनती हैं। प्रतिनिधि अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण और विजयदेव नारायण साही हैं। नामवर सिंह की कविता के नए प्रतिमान इसी धारा की आलोचना है। देवराज की नई कविता नाम की पुस्तक भी संदर्भ में है। भवानीप्रसाद मिश्र गीत-फरोश और कहीं नहीं बचे से नई कविता के सरल-कठिन दोनों सिरे छूते हैं।
शिल्प में बिंब प्रधान हैं, प्रतीक गौण। छंद मुक्त है, पर लय छोड़ नहीं दी गई। भाषा बोलचाल के निकट है, फिर भी चयन की हुई है। व्यंग्य, नाटकीयता और गद्य-काव्य के स्पर्श मिलते हैं। नई कविता प्रयोगवाद की उत्तराधिकारिणी भी है और उससे व्यापक भी। प्रयोगवाद शिल्प-आंदोलन अधिक है। नई कविता संवेदना और समय का आंदोलन अधिक है। सीमा यह कही गई कि वह मध्यवर्गीय कमरे की कविता रह गई और सड़क की आग बाद की समकालीन कविता ने उठाई। यह आक्षेप आधा सच है; मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय कमरे से बाहर के कवि हैं।
नामवर प्रतिमान बिंब पर रखते हैं — चित्र से अर्थ खुलता है, नारे से नहीं। शमशेर चित्र को संगीत के निकट लाते हैं। केदारनाथ सिंह वस्तु को स्मृति बनाते हैं। कुँवर नारायण संस्कृति और मिथक को वर्तमान पर चढ़ाते हैं। भवानीप्रसाद मिश्र सरल सिरे पर गीत-फरोश और पर्यावरण-क्षय गाते हैं। नरेश मेहता माँ, वृक्षत्व और किरण-धेनु से नैतिक प्रकृति छूते हैं। लघु मानव विराट का निषेध नहीं, उसके स्थान पर जटिल व्यक्ति का स्वीकार है।
8 समकालीन कविता
समकालीन कविता 1970 के आसपास से चलने वाली वह धारा है जो नई कविता के बाद के समय को अपना आलंबन बनाती है। आपातकाल, सड़क का जन-स्वर, स्त्री-आंदोलन, दलित-आंदोलन, बाजार और हिंसा इसके दबाव हैं। धूमिल की संसद से सड़क तक इसी मोड़ की पहचान है। लीलाधर जगूड़ी, विनोद कुमार शुक्ल, राजेश जोशी, ज्ञानेन्द्रपति आगे की पंक्ति हैं। स्त्री-कविता में अनामिका, कात्यायनी, सविता सिंह जैसे स्वर उभरते हैं। दलित कविता में ओमप्रकाश वाल्मीकि, कंवल भारती, मलखान सिंह, जयप्रकाश कर्दम का नाम आलोचना में आता है। दिव्यांग विमर्श सबसे नई परत है — शरीर, पहुँच और अधिकार; सहानुभूति का दया-रूप इसमें स्वीकृत नहीं। राजस्थान में ओम पुरोहित ‘कागद’ समकालीन स्वर हैं — पूछती है बेकलू, तपस्वी रूँख, क्यों भटकती है, हरा कर देगी, बरसो जल उनके पाठ हैं।
प्रवृत्तियाँ जनवादी स्वर, बोलचाल की तेज भाषा, लंबी कविता और गद्य-कविता, पहचान की राजनीति, और छोटी वस्तु से बड़े समय को छूना हैं। नई कविता जटिल व्यक्ति देखती है। समकालीन कविता उस व्यक्ति को भीड़, राज्य और पहचान के बीच रखती है। दोनों में बिंब हैं; समकालीन में नारा और गवाही भी हैं। सीमा दो हैं। पहला — समय इतना पास है कि मूल्यांकन अभी चल रहा है। दूसरा — विमर्श कभी कविता पर सवार हो जाता है, जैसे प्रगतिवाद में सिद्धांत सवार होता था। फिर भी आधुनिक काव्य का अंतिम निर्धारित नाम यही धारा है। भारतेंदु का सार्वजनिक स्वर यहाँ नई शर्तों पर लौटता है।
वेदप्रकाश अमिताभ आधुनिक और समकालीन को दो घेरे कहते हैं, एक निषेध नहीं। हरदयाल आधुनिक हिन्दी कविता का लंबा चाप भारतेंदु से यहीं तक खींचते हैं। राजस्थान साहित्य अकादमी का संयुक्त संपादन प्रदेश के स्वर को इतिहास में जगह देता है; कागद उसी भूमि के कवि हैं — बेकलू, रूँख, जल। स्त्री-दलित-दिव्यांग तीन विमर्श समकालीन आलंबन को तेज करते हैं। धूमिल मोड़ की पहचान हैं, पूरा समकालीन नहीं। मूल्यांकन चल रहा है; धारा बंद नहीं हुई।
9 काव्यरूप
काव्यरूप कविता का शरीर-विधान है — कितने विस्तार में, किस छंद-बंध में, किस वाचक-स्वर में रचना खड़ी होती है। आधुनिक हिन्दी में पुराने रूप नए अर्थ लेते हैं। महाकाव्य लंबी कथा, अनेक सर्ग, उदात्त नायक और संस्कृति-प्रश्न का रूप है। कामायनी, साकेत, प्रिय प्रवास इसी कोटि में गिने जाते हैं। खंडकाव्य एक कथा-खंड या एक नायक-प्रसंग का मध्यम विस्तार है। रश्मिरथी इसी रूप का पूरा खंडकाव्य है। हल्दीघाटी का सर्ग वीर-खंडकाव्य का अंश है। मुक्तक स्वतः पूर्ण छोटी इकाई है — दोहा, गीत, नई कविता की लघु कविता। प्रगीत व्यक्तिगत अनुभूति का गेय रूप है; छायावाद का प्रधान रूप यही है। गीत और नवगीत लोक-लय और आधुनिक भाव का योग हैं। ग़ज़ल उर्दू-सीरी से हिन्दी में आई। गद्य-काव्य और लंबी कविता नई कविता-समकालीन के रूप हैं।
रूप और युग साथ चलते हैं। भारतेंदु मुक्तक, गीत, मुकरी और नाट्य-गीत रखते हैं। द्विवेदी महाकाव्य और इतिवृत्त रखते हैं। छायावाद प्रगीत और महाकाव्य दोनों रखते हैं। प्रगतिवाद गीत और व्यंग्य-कविता रखते हैं। प्रयोगवाद और नई कविता मुक्त छंद, बिंब-कविता और लंबी कविता रखते हैं। समकालीन गवाही, नाट्य-स्वर और गद्य-कविता रखते हैं। काव्यरूप केवल छंद-गणना नहीं। वाचक कौन है, कथा है या क्षण है, गेयता है या कथन है — ये प्रश्न रूप बाँधते हैं। बिना रूप के धारा अधूरी रहती है; बिना धारा के रूप खाली साँचा रह जाता है।
मोहन अवस्थी काव्यशिल्प रूप और युग को साथ बाँधते हैं। महाकाव्य संस्कृति-प्रश्न रखता है; खंडकाव्य एक नायक या एक युद्ध-खंड रखता है। प्रगीत आत्मा का गीत है। मुक्तक छोटी पूर्ण इकाई है। लंबी कविता कथन और फैंटेसी है। रश्मिरथी खंडकाव्य है, कामायनी नहीं। प्रिय प्रवास महाकाव्य है, खंडकाव्य नहीं। हल्दीघाटी का दूसरा सर्ग खंडकाव्य का अंश है, पूरा महाकाव्य नहीं। रूप पहचानने से युग और कवि दोनों स्थिर होते हैं।
| रूप | लक्षण | उदाहरण-संकेत |
|---|---|---|
| महाकाव्य | विस्तार, सर्ग, उदात्त कथा | कामायनी, साकेत, प्रिय प्रवास |
| खंडकाव्य | एक प्रसंग, मध्यम विस्तार | रश्मिरथी; हल्दीघाटी-सर्ग |
| प्रगीत / गीत | व्यक्ति-अनुभूति, गेयता | महादेवी; भवानीप्रसाद मिश्र |
| मुक्तक / लघु | स्वतः पूर्ण छोटी इकाई | नई कविता की छोटी कविता |
| लंबी कविता | कथन, फैंटेसी, नगर-यथार्थ | मुक्तिबोध; समकालीन गवाही |
10 बिंब और प्रतीक
बिंब काव्य में इंद्रिय-ग्राह्य चित्र है। आँख, कान, स्पर्श, गंध और स्वाद से कोई दृश्य मन में बैठता है। वह वर्णन की सूची नहीं, अनुभव का ठोस रूप है। नई कविता बिंब को काव्य का प्राण मानती है। शमशेर और केदारनाथ सिंह चित्र से अर्थ खोलते हैं। प्रतीक वह संकेत है जो अपने प्राथमिक अर्थ से आगे किसी भाव, विचार या स्थिति को प्रतिनिधित्व देता है। दीप केवल तेल-बाती नहीं रह जाता; वह जीवन, ज्ञान या आकांक्षा का प्रतिनिधि बन सकता है। छायावाद प्रतीक-प्रधान कहा जाता है — झरना, बादल, रात्रि, तारा, मधु। भारतेंदु के चूरन और निज भाषा सीधे संबोधन हैं; प्रतीक वहाँ गौण हैं। द्विवेदी युग इतिवृत्त रखता है, इसलिए बिंब-प्रतीक दोनों संयत रहते हैं।
अंतर तीन बिंदुओं पर है। बिंब प्रत्यक्ष चित्र है; प्रतीक अप्रत्यक्ष संकेत है। बिंब एक अनुभव को सघन करता है; प्रतीक कई अर्थों को एक चिह्न पर लाद सकता है। बिंब नई कविता का शिल्प-सूत्र है; प्रतीक छायावाद का शिल्प-सूत्र है। दोनों शत्रु नहीं। कामायनी में श्रद्धा और इड़ा प्रतीक भी हैं, चित्र भी। मुक्तिबोध की फैंटेसी बिंबों की शृंखला से विचार खोलती है। साधारणीकरण तब पूरा होता है जब पाठक बिंब या प्रतीक को अपने अहं से हटाकर सामान्य अनुभव की तरह भोगता है। बिना उदाहरण के परिभाषा अधूरी रहती है; बिना परिभाषा के उदाहरण अधूरे रहते हैं।
नामवर नई कविता का प्राण बिंब कहते हैं। छायावाद झरना-बादल-रात्रि से अर्थ की दूसरी पंक्ति खोलता है। भारतेंदु का चूरन व्यंग्य-वस्तु है, रहस्य-प्रतीक नहीं। दिनकर के सूर्य-रश्मि कर्ण के ओज का बिंब हैं। महादेवी का बादल वेदना का प्रतीक है। अज्ञेय का द्वीप व्यक्ति का बिंब है। प्रतीक कई पाठकों को एक चिह्न देता है; बिंब एक अनुभव को आँख के सामने खड़ा करता है। दोनों का काम अलग है, शत्रुता नहीं।
| पद | काम | धारा |
|---|---|---|
| बिंब | इंद्रिय-चित्र, सघन अनुभव | नई कविता, प्रयोग |
| प्रतीक | संकेत, प्रतिनिधि अर्थ | छायावाद; कामायनी |
11 रस का स्वरूप, निष्पत्ति और साधारणीकरण
रस काव्य का आस्वाद्य आनंद है। विश्वनाथ कहते हैं — वाक्यं रसात्मकं काव्यम्। स्थायी भाव चित्त का मूल भाव है। जब वह विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से परिपक्व होता है, तब रस कहलाता है। भरतमुनि का सूत्र है — विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः। विभाव कारण हैं। आलंबन वह पात्र या वस्तु है जिस पर भाव टिकता है। उद्दीपन देश, काल और चेष्टा हैं जो भाव बढ़ाते हैं। अनुभाव कार्य हैं — अश्रु, रोमांच, स्वरभंग। आठ सात्विक अनुभाव स्तंभ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, वेपथु, वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय हैं। व्यभिचारी अर्थात् संचारी भाव तैंतीस सहायक लहरें हैं। अभिनवगुप्त रस को आनंद मानते हैं। नव रस नौ स्थायी भावों के परिपाक हैं — रति-शृंगार, हास-हास्य, शोक-करुण, क्रोध-रौद्र, उत्साह-वीर, भय-भयानक, जुगुप्सा-बीभत्स, विस्मय-अद्भुत, निर्वेद-शांत।
साधारणीकरण भट्टनायक का पद है। पाठक या दर्शक अपना निजी अहं छोड़कर भाव को सामान्य रूप में भोगता है। राम का शोक केवल राम का नहीं रह जाता; वह करुण रस बनकर सहृदय तक पहुँचता है। आधुनिक कविता रस का निषेध नहीं करती; वह उसके आलंबन बदल देती है। छायावाद करुण, शांत और शृंगार के सूक्ष्म रूप रखता है। प्रगतिवाद रौद्र, वीर और व्यंग्य रखता है। नई कविता कभी रस-शास्त्र से मुक्ति माँगती है, फिर भी अकेलापन और करुण पाठक को साधारणीकरण से ही छूते हैं। विमर्श-काव्य में क्रोध और वेदना व्यक्तिगत शिकायत नहीं रह जाते; वे सामान्य अन्याय का अनुभव बनते हैं — यही साधारणीकरण का नया व्यवहार है। नाम, सूत्र, अंग और एक आधुनिक उदाहरण साथ रहते हैं।
बलदेवप्रसाद उपाध्याय भारतीय काव्यशास्त्र इन्हीं अंगों पर बाँधते हैं। भट्टलोल्लट उत्पत्ति कहते हैं — रस नाटक में पैदा होता है। शंकुक अनुमिति कहते हैं — अनुमान से रस जाना जाता है। भट्टनायक भुक्ति कहते हैं — साधारणीकरण से आस्वाद। अभिनवगुप्त अभिव्यक्ति कहते हैं — रस चित्त में पहले से है, व्यंग्य से खुलता है। आधुनिक पाठ इन्हीं सूत्रों से चलता है। कर्ण का अपमान व्यक्तिगत नहीं रह जाता, अन्याय का सामान्य अनुभव बनता है। महादेवी की वेदना एक स्त्री की शिकायत नहीं रह जाती, करुण का आस्वाद बनती है। नागार्जुन का भूख-व्यंग्य निजी गाली नहीं रह जाता, रौद्र-हास्य का सार्वजनिक रूप बनता है।
| अंग | कार्य |
|---|---|
| स्थायी भाव | चित्त का मूल; रस का बीज |
| विभाव | आलंबन + उद्दीपन; कारण |
| अनुभाव | शरीर-चेष्टा; कार्य |
| संचारी | सहायक लहर; तैंतीस |
| साधारणीकरण | अहं छोड़कर सामान्य आस्वाद; भट्टनायक |
12 स्त्री, दलित और दिव्यांग विमर्श
विमर्श का अर्थ केवल विषय जोड़ना नहीं, उस दृष्टि से काव्य पढ़ना है जो सत्ता, शरीर और वाणी के अधिकार को पूछती है। स्त्री विमर्श पूछता है कि कविता में स्त्री आलंबन है या वाचक। भारतेंदु युग स्त्री-शिक्षा और विधवा-दशा सुधार की दृष्टि से देखता है। द्विवेदी युग माता-सती-जागृति की प्रतिमा बनाता है। छायावाद में महादेवी वेदना की वाचक हैं, केवल नायिका नहीं; सुभद्राकुमारी चौहान राष्ट्रीय ओज की वाचक हैं। समकालीन स्त्री-कविता देह, श्रम, घर के भीतर की हिंसा और भाषा के अधिकार को विषय बनाती है। नाम अनामिका, कात्यायनी, सविता सिंह आलोचना में आते हैं। महादेवी को केवल रहस्य-कवि कहना स्त्री विमर्श की दृष्टि से अधूरा है; वेदना वहाँ वाचक की है।
दलित विमर्श जाति, श्रम, छुआछूत और वाणी के अधिकार से काव्य पढ़ता है। आधुनिक काल के आरंभ में सुधार-स्वर है, पर वाचक प्रायः सवर्ण नवजागरण का है। समकालीन दलित कविता अनुभव को गवाही बनाती है। ओमप्रकाश वाल्मीकि, कंवल भारती, मलखान सिंह, सुशीला टाकभौरे प्रतिनिधि पंक्ति हैं। नागार्जुन का जन-स्वर दलित विमर्श का पर्याय नहीं, निकट का सामाजिक स्वर है। दिव्यांग विमर्श शरीर की भिन्न क्षमता, पहुँच और दया बनाम अधिकार का प्रश्न है। सरकारी पद दिव्यांग बाद का है; साहित्य उस पद से पुराना अनुभव रखता है — लंगड़ा, अंधा, बाधिर प्रायः करुण या हास्य के उपकरण रहे। नया विमर्श उन्हें उपकरण नहीं, वाचक और नागरिक मानता है। तीनों विमर्श काव्य के रस को रद्द नहीं करते; आलंबन और वाचक को बदलते हैं। बिना वाचक-प्रश्न के विमर्श केवल विषय-सूची रह जाता है।
स्त्री विमर्श महादेवी को रहस्य की नायिका नहीं, वेदना की वाचक पढ़ता है; सुभद्रा को केवल वीर-गीत की गायिका नहीं, राष्ट्रीय ओज की वाचक पढ़ता है। दलित विमर्श पूछता है कि श्रम और जाति कविता में दया के पात्र हैं या गवाही देने वाले मुख। दिव्यांग विमर्श दया को अधिकार से काटता है। तीनों अलग प्रश्न हैं, एक नारा नहीं। रस रद्द नहीं होता; आलंबन और वाचक बदलते हैं। विमर्श विषय-सूची नहीं, पढ़ने की दृष्टि है।
| विमर्श | प्रश्न | काव्य-संकेत |
|---|---|---|
| स्त्री | आलंबन या वाचक? | महादेवी, सुभद्रा; समकालीन स्त्री-कविता |
| दलित | जाति, श्रम, गवाही | समकालीन दलित कविता; नागार्जुन का जन-स्वर निकट |
| दिव्यांग | शरीर, पहुँच, अधिकार | दया के उपकरण से वाचक तक; नई परत |
13 सात धाराओं का क्रम और संबंध
सात नाम एक सीधी रेखा हैं, पर प्रत्येक अगला पिछले का निषेध और ग्रहण दोनों है। भारतेंदु सार्वजनिक नवजागरण देते हैं; भाषा कविता में अभी ब्रज है। द्विवेदी खड़ी बोली और इतिवृत्त देते हैं; कल्पना पतली है। छायावाद कल्पना, प्रगीत और प्रतीक देते हैं; समाज पीछे छूटता है। प्रगतिवाद समाज और यथार्थ देते हैं; व्यक्ति की जटिलता पतली पड़ती है। प्रयोगवाद व्यक्ति और शिल्प देते हैं; आक्षेप दुरुहता का है। नई कविता लघु मानव और बिंब देती है; सड़क बाद में तेज होती है। समकालीन कविता सड़क, पहचान और विमर्श देती है; मूल्यांकन चल रहा है। साम्य खड़ी बोली की ओर बढ़ना, प्रेस-युग की चेतना और आधुनिक मनुष्य का विषय है। वैषम्य आलंबन पर है — देश, आदर्श, आत्मा, वर्ग, क्षण, जटिल व्यक्ति, पहचान।
इतिहासकार इन्हीं मोड़ों को अलग-अलग सूत्र से बाँधते हैं। नगेन्द्र कालक्रम और प्रतिनिधि देते हैं। चतुर्वेदी संवेदना का विकास देखते हैं। बच्चन सिंह शुक्ल के ढाँचे की समीक्षा करते हैं। नामवर छायावाद को आंदोलन कहते हैं और नई कविता के प्रतिमान बिंब पर रखते हैं। द्वारकाप्रसाद सक्सेना प्रतिनिधि कवियों का परिचय देते हैं। रस भरत के सूत्र और भट्टनायक के साधारणीकरण से पहचाना जाता है; आधुनिक कविता आलंबन बदलती है, अंग नहीं। विमर्श तीन अलग प्रश्न हैं — स्त्री में वाचक, दलित में जाति-गवाही, दिव्यांग में शरीर और अधिकार। धारा, शिल्प और दृष्टि यहीं पहचानी जाती हैं।
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