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परीक्षा उत्तर

Exam answers is a topic in Modern poetry (Practice) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

Written-style answers for Modern poetry at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

Exam answers

1. आधुनिक हिन्दी कविता से क्या आशय है?8 अंक

आधुनिक हिन्दी कविता रीतिकाल के दरबारी शृंगार के बाद की काव्य-धारा है। उसके साथ प्रेस, नवजागरण और राष्ट्र-चेतना आते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल आधुनिक काल का आरंभ गद्य के आविर्भाव से मानते हैं। सीमा-पुरुष भारतेंदु हरिश्चंद्र हैं — काशी, 1850–1885। गद्य पहले खड़ी बोली में स्थिर हुआ। कविता कुछ काल ब्रज-प्रधान रही। द्विवेदी युग ने उसे खड़ी बोली पर बैठाया। सात धाराएँ क्रम से हैं — भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता और समकालीन कविता। विषय देश, आदर्श, आत्मा, वर्ग, व्यक्ति और पहचान बनते हैं। रूप गीत, प्रगीत, महाकाव्य, खंडकाव्य, मुक्त छंद और गद्य-कविता तक फैलता है।

आशय तिथि गिनना मात्र नहीं। आशय यह है कि कविता आधुनिक मनुष्य की स्थिति को भाषा देती है। नगेन्द्र इतिहास का ढाँचा देते हैं। नामवर सिंह छायावाद और नई कविता के प्रतिमान बाँधते हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी संवेदना के विकास से पढ़ते हैं। बच्चन सिंह शुक्ल-केंद्र की समीक्षा करते हैं। साम्य खड़ी बोली की ओर बढ़ना है। वैषम्य आलंबन पर है — देश से पहचान तक।

निष्कर्ष यह है कि आधुनिक हिन्दी कविता भारतेंदु से समकालीन तक की खड़ी बोली काव्य-परंपरा है, जिसके केंद्र में नवजागरण, व्यक्ति और समाज तीनों हैं।

2. भारतेंदु युग की प्रमुख प्रवृत्तियाँ लिखिए।8 अंक

भारतेंदु युग आधुनिक हिन्दी का प्रथम उत्थान है। काल प्रायः 1850 से 1900 तक माना जाता है। केंद्र भारतेंदु हरिश्चंद्र हैं — जन्म 1850, निधन 1885, कर्म-भूमि काशी। उन्होंने कविवचनसुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन और बालबोधिनी निकाली। मंडल में प्रतापनारायण मिश्र, प्रेमघन, जगमोहन सिंह और अंबिकादत्त व्यास आते हैं। गद्य खड़ी बोली में चला। कविता अभी ब्रज-प्रधान रही। नाटक भारत दुर्दशा और अंधेर नगरी युग के गद्य-प्रमाण हैं। निर्धारित कविताएँ निज भाषा उन्नति अहै और चूरन अमल वेद का भारी हैं।

प्रवृत्तियाँ पाँच सूत्रों में बैठती हैं। नवजागरण — 1857 के बाद की चेतना, प्रेस और सार्वजनिक गोष्ठी। समाज-सुधार — स्त्री-दशा, विधवा-पीड़ा, पाखंड, स्वदेशी। निज भाषा का आग्रह। गद्य में खड़ी बोली का अभ्यास, कविता में ब्रज का अवशेष। छोटे गेय रूप — गीत, मुकरी, होली, व्यंग्य; महाकाव्य का अभाव। आलंबन देश और समाज हैं, रीति की नायिका नहीं। रस करुण, हास्य-व्यंग्य और वीर-जागरण हैं। सीमा यह है कि काव्य-भाषा पूरी खड़ी बोली नहीं बनी और सुधार कभी उपदेश रह जाता है। द्विवेदी युग उसी भाषा-कार्य को कविता तक ले जाता है।

निष्कर्ष यह है कि भारतेंदु युग की प्रवृत्तियाँ नवजागरण, सुधार, निज भाषा, खड़ी बोली गद्य और ब्रज-कविता का योग हैं।

3. भारतेंदु युग का विवेचन कीजिए।20 अंक

भारतेंदु युग आधुनिक हिन्दी का प्रथम उत्थान है। काल प्रायः 1850 से 1900 तक लिखा जाता है; कुछ इतिहास 1868 से 1900 भी कहते हैं। नाम भारतेंदु हरिश्चंद्र से पड़ता है। जन्म 1850, निधन 1885, कर्म-भूमि काशी। उन्होंने कविवचनसुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन और बालबोधिनी निकाली। गद्य खड़ी बोली में स्थिर होने लगा। कविता अभी ब्रज-प्रधान रही। नाटक भारत दुर्दशा और अंधेर नगरी युग की सार्वजनिक चेतना के प्रमाण हैं। निर्धारित कविताएँ निज भाषा उन्नति अहै और चूरन अमल वेद का भारी हैं। पहली का पहचान-सूत्र है — निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल; बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल। दूसरी पाखंड-व्यंग्य है — शास्त्र को बाजार का चूरन बनाकर बेचना। आचार्य रामचंद्र शुक्ल आधुनिक काल को गद्य के आविर्भाव से जोड़ते हैं और भारतेंदु को आधुनिक हिन्दी का केंद्र-पुरुष कहते हैं।

पृष्ठभूमि 1857 के बाद का राजनीतिक दबाव, प्रेस, अंग्रेज़ी शिक्षा और नगर-गोष्ठी है। सामाजिक पृष्ठभूमि स्त्री-दशा, विधवा-पीड़ा, जाति-पाखंड और विदेशी वस्त्र है। साहित्यिक पृष्ठभूमि रीतिकालीन नायिका-शृंगार से ऊब और लोक-भाषा का नया दावा है। भारतेंदु मंडल प्रतापनारायण मिश्र, बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’, ठाकुर जगमोहन सिंह, अंबिकादत्त व्यास और राधाचरण गोस्वामी को समेटता है। बालकृष्ण भट्ट गद्य-आलोचना से जुड़े हैं। यह दरबार नहीं, पत्र और नाटक का मंडल है। विषय देश की दुर्दशा, समाज-सुधार, स्त्री-शिक्षा और निज भाषा हैं। रूप गीत, मुकरी, होली और कवित्त हैं; महाकाव्य का अभाव है। आलंबन देश और समाज हैं, रीति की नायिका नहीं। रस करुण, हास्य-व्यंग्य और वीर-जागरण हैं।

प्रवृत्ति पाँच बिंदुओं पर खुलती है। पहला — नवजागरण और देश-चेतना, भारत की दुर्दशा का सार्वजनिक स्वर। दूसरा — समाज-सुधार और व्यंग्य; चूरन उसी व्यंग्य का काव्य-प्रमाण है। तीसरा — निज भाषा का गौरव। चौथा — खड़ी बोली गद्य का अभ्यास। पाँचवाँ — छोटे गेय और नाट्य रूप। नगेन्द्र इतिहास का ढाँचा इन्हीं द्वार से खोलते हैं। बच्चन सिंह शुक्ल-केंद्र की समीक्षा करते हुए भी भारतेंदु को आधुनिक हिन्दी का आरंभ मानते हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी संवेदना के विकास में इसे सार्वजनिक नवजागरण की परत कहते हैं। दोनों निर्धारित पाठ एक कवि के दो हाथ हैं — एक भाषा का गौरव, दूसरा समाज का व्यंग्य। अंधेर नगरी गद्य में वही व्यंग्य चलाती है।

सीमाएँ स्पष्ट हैं। कविता की भाषा अभी पूरी खड़ी बोली नहीं बनी। महाकाव्य नहीं रचा गया। सुधार-स्वर कभी उपदेश बन जाता है। वाचक प्रायः पुरुष नवजागरण का है; स्त्री आलंबन अधिक, वाचक कम। फिर भी आधुनिक काव्य का सार्वजनिक स्वर यहीं से चलता है। द्विवेदी युग उसी भाषा-कार्य को कविता तक ले जाता है। छायावाद कल्पना जोड़ता है। भारतेंदु इन दोनों का मार्ग खोलते हैं, स्वयं छायावादी नहीं हैं।

निष्कर्ष यह है कि भारतेंदु युग नवजागरण, पत्र-नाटक, निज भाषा और भारतेंदु मंडल से पहचाना जाता है। गद्य खड़ी बोली का है, कविता ब्रज की है, विषय देश और समाज का है। आधुनिक हिन्दी कविता का प्रथम मोड़ यही युग है।

4. द्विवेदी युग की विशेषताएँ लिखिए।8 अंक

द्विवेदी युग लगभग 1900 से 1918 तक माना जाता है। नाम आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से पड़ता है। सरस्वती पत्रिका उनका कर्म-क्षेत्र रही। संपादन-काल प्रायः 1903 से 1920 तक कहा जाता है। तीन काम स्थिर हैं — खड़ी बोली को कविता की भाषा बनाना, व्याकरण और शब्द-शुद्धि से वाक्य स्थिर करना, नीति और राष्ट्र को विषय बनाना। भारतेंदु युग में गद्य खड़ी बोली का था, कविता ब्रज की। यह युग वह अंतर मिटाता है। आचार्य शुक्ल इसे गद्य का उत्कर्ष भी कहते हैं; कविता उसी अनुशासन की सहचरी है। प्रतिनिधि मैथिलीशरण गुप्त हैं — भारत-भारती 1912, साकेत 1931। अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का प्रिय प्रवास खड़ी बोली का प्रथम बड़ा सफल महाकाव्य माना जाता है।

विशेषताएँ इतिवृत्तात्मकता, नैतिक-राष्ट्रीय आदर्शवाद और भाषा-शुद्धि हैं। नारी माता-सती-जागृति की प्रतिमा है, महादेवी की रहस्य-प्रिया नहीं। रूप महाकाव्य और खंड-कथा की ओर बढ़ता है। रस शांत, वीर-जागरण और करुण हैं। सोहनलाल द्विवेदी राष्ट्रीय गीत के कवि हैं; वे महावीर प्रसाद द्विवेदी नहीं हैं। सीमा उपदेश और घटना-क्रम का बोझ है; लाक्षणिकता पतली है।

निष्कर्ष यह है कि द्विवेदी युग की विशेषताएँ खड़ी बोली, सरस्वती, इतिवृत्त, आदर्श तथा गुप्त-हरिऔध हैं।

5. द्विवेदी युग का विस्तृत विवेचन कीजिए।20 अंक

द्विवेदी युग आधुनिक हिन्दी कविता का दूसरा मोड़ है। काल लगभग 1900 से 1918 तक माना जाता है। नाम आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से पड़ता है। सरस्वती पत्रिका उनका कर्म-क्षेत्र रही। संपादन-काल प्रायः 1903 से 1920 तक कहा जाता है। उन्होंने तीन काम चलाए — खड़ी बोली को कविता की भाषा बनाना, व्याकरण और शब्द-शुद्धि से वाक्य स्थिर करना, नीति और राष्ट्र को कविता का विषय बनाना। भारतेंदु युग में गद्य खड़ी बोली का था, कविता ब्रज की। द्विवेदी युग यह अंतर मिटाता है। कविता अब खड़ी बोली पर बैठती है। आचार्य शुक्ल इस काल को गद्य का उत्कर्ष भी कहते हैं; कविता उसी गद्य-अनुशासन की सहचरी है। रामस्वरूप चतुर्वेदी संवेदना के विकास में इसे जागरण-सुधार की परत कहते हैं।

प्रतिनिधि मैथिलीशरण गुप्त हैं — जन्म 1886 चिरगाँव, निधन 1964, राष्ट्रकवि। भारत-भारती 1912 जागरण और अतीत-गौरव का घोष है। साकेत 1931 राम-कथा का आधुनिक महाकाव्य है; उर्मिला-प्रसंग उसकी नई दृष्टि है; निर्धारित पाठ कैकेयी परिताप यहीं से है। यशोधरा 1932 बुद्ध-गृहत्याग का खंडकाव्य है; सखि वे मुझसे कहकर जाते उसी से है, साकेत से नहीं। दोनों ओर प्रेम पलता है स्वतंत्र मुक्तक है। अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ 1865–1947 का प्रिय प्रवास खड़ी बोली का प्रथम बड़ा सफल महाकाव्य माना जाता है; प्रकाशन 1914 के आसपास; विषय कृष्ण का मथुरा-प्रवास और विरह। निर्धारित अंश दिवस का अवसान, दुखिया के आँसू और एक बूँद हैं। श्रीधर पाठक प्रकृति और स्वच्छंदता की ओर पुल हैं; छायावाद उन्हीं से कुछ लेता है। गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ और नाथूराम शर्मा ‘शंकर’ अन्य नाम हैं।

प्रवृत्ति इतिवृत्तात्मकता, आदर्शवाद, राष्ट्रीयता और भाषा-शुद्धि है। नारी माता-सती-जागृति की प्रतिमा है, महादेवी की रहस्य-प्रिया नहीं; गुप्त उसे पश्चात्ताप और प्रश्न की वाचक तक ले जाते हैं। रूप महाकाव्य और खंड-कथा की ओर बढ़ता है। रस शांत, वीर-जागरण और करुण हैं; सूक्ष्म शृंगार गौण है। सोहनलाल द्विवेदी 1906–1988 खादी-गीत और वंदना के कवि हैं; नाम-साम्य से महावीर प्रसाद से मिलाया नहीं जाता। वे गाँधी-युग के सरल गीतकार हैं, सरस्वती के संपादक नहीं। हरिऔध की भाषा संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली है; सूर ब्रज पद में वही विरह गाते हैं, हरिऔध उसे महाकाव्य का विस्तार देते हैं।

सीमा स्पष्ट है। घटना-क्रम और उपदेश कल्पना को दबाते हैं। लाक्षणिकता और संगीत बाद के छायावाद देते हैं। क्लिष्ट समास प्रिय प्रवास पर आक्षेप रहा। फिर भी बिना इस युग के खड़ी बोली कविता स्थिर नहीं होती। छायावाद द्विवेदी के आदर्श से विद्रोह करता है, उसकी भाषा लेता है। प्रगतिवाद उसके राष्ट्र-आदर्श को वर्ग-प्रश्न से काटता है। युग पुल भी है, अनुशासन भी है। साकेत और यशोधरा दोनों गुप्त की कृतियाँ हैं, कथा एक नहीं — राम-वनवास और बुद्ध-गृहत्याग अलग सूत्र हैं। भारतेंदु व्यंग्य और ब्रज रखते हैं; द्विवेदी खड़ी बोली और इतिवृत्त रखते हैं।

निष्कर्ष यह है कि द्विवेदी युग सरस्वती, खड़ी बोली, इतिवृत्त, गुप्त और हरिऔध से पहचाना जाता है। काल 1900–1918 है। काम भाषा स्थिर करना और आदर्श गाना है। आधुनिक कविता का व्याकरण यहीं बैठता है।

6. छायावाद की परिभाषा और विशेषताएँ लिखिए।8 अंक

छायावाद लगभग 1918 से 1936 तक का काव्य-आंदोलन है। स्थूल इतिवृत्त के स्थान पर सूक्ष्म अनुभूति, कल्पना, लाक्षणिकता और प्रगीत प्रधान हैं। नाम के पीछे मुकुटधर पांडेय का लेख और आचार्य शुक्ल की आपत्ति दोनों याद रहें। शुक्ल रहस्यात्मकता और अस्पष्टता पर कठोर थे। नंददुलारे वाजपेयी, नगेन्द्र और नामवर सिंह ने इसे स्वच्छंदता, प्रगीत और कल्पना की शक्ति माना। चार स्तंभ जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा हैं। प्रसाद के झरना, आँसू, लहर और कामायनी हैं। निराला के परिमल, अनामिका, गीतिका हैं। पंत के पल्लव, गुंजन हैं। महादेवी के नीहार, नीरजा, यामा हैं।

विशेषताएँ प्रकृति-आलंबन, नारी की सूक्ष्म पीड़ा, प्रतीक-विधान, संगीत और रहस्य-जिज्ञासा हैं। दीप, बादल, झरना, तारा अर्थ की दूसरी पंक्ति खोलते हैं। कामायनी 1936 शिखर-ग्रंथ कही जाती है, निर्धारित अंश नहीं। सुभद्राकुमारी चौहान राष्ट्रीय गीत गाती हैं; चार स्तंभों में नहीं हैं। सीमा व्यक्ति-केंद्र और अस्पष्टता का आक्षेप है। प्रगतिवाद 1936 में यथार्थ से इसी पर चोट करता है।

निष्कर्ष यह है कि छायावाद सूक्ष्म अनुभूति, चार स्तंभ, प्रगीत और प्रतीक का आंदोलन है; काल 1918–1936 है।

7. छायावाद का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।20 अंक

छायावाद आधुनिक हिन्दी कविता का तीसरा बड़ा मोड़ है। काल लगभग 1918 से 1936 तक है। द्विवेदी युग के इतिवृत्त और उपदेश के बाद कविता आंतरिक अनुभूति, कल्पना और लाक्षणिकता की ओर मुड़ी। नाम विवादित रहा। मुकुटधर पांडेय के लेख से संज्ञा चली। आचार्य शुक्ल रहस्य और अस्पष्टता पर आपत्ति करते रहे। नंददुलारे वाजपेयी इसे स्वच्छंदतावाद का हिन्दी रूप मानते हैं। नगेन्द्र मनोविज्ञान और कल्पना से पढ़ते हैं। नामवर सिंह की छायावाद पुस्तक इसे ऐतिहासिक आंदोलन सिद्ध करती है, केवल शैली नहीं। स्थूल के स्थान पर सूक्ष्म — यही स्वरूप का पहला सूत्र है। प्रकृति आलंबन और उद्दीपन दोनों है। नारी देह-वर्णन से अधिक भाव-केंद्र है।

चार स्तंभ स्थिर हैं। जयशंकर प्रसाद काशी, 1889–1937 — झरना, आँसू, लहर, कामायनी। संस्कृति, श्रद्धा-इड़ा और महाकाव्य-रूप उनकी पहचान हैं। निर्धारित पाठ लहर से तीन हैं — पेशोला की प्रतिध्वनि, बीती विभावरी, प्रलय की छाया। कामायनी 1936 शिखर-ग्रंथ है, निर्धारित अंश नहीं। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ 1896–1961 — परिमल, अनामिका, गीतिका, राम की शक्ति-पूजा, सरोज-स्मृति। मुक्त छंद, ओज और विद्रोह उनकी पहचान हैं। निर्धारित पाठ कौन तुम शुभ्र-किरण वसना गीतिका से, जुही की कली परिमल से, संध्या सुंदरी अपरा से हैं। सुमित्रानंदन पंत 1900–1977, कौसानी — पल्लव, गुंजन; बाद में ग्राम्या प्रगति की ओर पुल है। सौंदर्य और चित्र उनकी पहचान हैं। निर्धारित पाठ मौन निमंत्रण, एक तारा, नौका विहार हैं। महादेवी वर्मा 1907–1987 — नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, यामा। वेदना और प्रगीत उनकी पहचान हैं। निर्धारित गीत जो तुम आ जाते एक बार, तुम मुझमें प्रिय फिर क्या परिचय, मैं नीर भरी दुख की बदली हैं। सुभद्राकुमारी चौहान इसी समय राष्ट्रीय गीत और वात्सल्य गाती हैं; वे चार स्तंभ नहीं।

स्वरूप की प्रवृत्तियाँ ये हैं। प्रतीक — दीप, बादल, झरना, तारा — अर्थ की दूसरी पंक्ति खोलते हैं। प्रगीत-रूप प्रधान है। रहस्य ब्रह्म और जीवन का प्रश्न है, केवल अंधकार नहीं। रस में करुण, शांत और शृंगार के सूक्ष्म रूप हैं। बिंब यहाँ हैं, पर प्रतीक अधिक बोलते हैं; नई कविता बाद में बिंब को आगे कर देती है। निर्धारित पाठ इन्हीं चार स्तंभों के संग्रहों से हैं।

सीमा व्यक्ति-केंद्र, दुरुह रहस्य और समाज से दूरी का आक्षेप है। प्रगतिशील लेखक संघ 1936 में यथार्थ का दावा करता है। पंत स्वयं ग्राम्या की ओर मुड़ते हैं। निराला में सामाजिक ओज पहले से था। फिर भी आधुनिक प्रगीत की ऊँचाई छायावाद के बिना नहीं लिखी जाती। शुक्ल की आपत्ति इतिहास का अंग है, आंदोलन का निषेध नहीं। नामवर इसे मोड़ मानते हैं। निर्धारित कविताएँ प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी और सुभद्रा की नाम सहित हैं; स्वरूप उन्हीं पाठों का आधार-ढाँचा है। झाँसी की रानी सुभद्रा की प्रसिद्ध कविता है, चार स्तंभों का पाठ नहीं।

निष्कर्ष यह है कि छायावाद 1918–1936 का प्रगीत-आंदोलन है। स्वरूप चार स्तंभ, सूक्ष्म अनुभूति, प्रतीक, प्रकृति और कामायनी से पहचाना जाता है। शुक्ल की आपत्ति और नामवर का मूल्यांकन दोनों इतिहास के अंग हैं।

8. प्रगतिवाद किसे कहते हैं?8 अंक

प्रगतिवाद 1936 के आसपास संगठित स्वर है। उसी वर्ष लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई। प्रेमचंद अध्यक्ष रहे। वैचारिक आधार मार्क्सवाद, वर्ग-संघर्ष और जन-यथार्थ है। कविता महल और रहस्य से खेत, कारखाना, ऋण और भूख की ओर मुड़ती है। प्रतिनिधि नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, त्रिलोचन और रांगेय राघव हैं। रामविलास शर्मा आलोचना के स्तंभ हैं। पंत की ग्राम्या और युगांत छायावाद से प्रगति की ओर पुल हैं। निराला में सामाजिक ओज पहले से था; यह आंदोलन उसे सिद्धांत देता है। नागार्जुन आगे निर्धारित कवि हैं — प्रेत का बयान और यह दंतुरित मुस्कान उनके पाठ हैं।

प्रवृत्ति यथार्थ वर्णन, शोषण-विरोध, किसान-मजदूर का नायकत्व, व्यंग्य और सरल जन-भाषा है। रस में रौद्र, वीर, करुण और हास्य-व्यंग्य प्रधान हो जाते हैं। रामधारी सिंह दिनकर का राष्ट्रीय ओज प्रगतिवाद का पर्याय नहीं; वह वीर और जागरण का अलग स्वर है। प्रयोगवाद व्यक्ति और शिल्प से इस जन-स्वर का वैषम्य रखता है। सीमा यह है कि सिद्धांत कभी कविता पर सवार हो जाता है।

निष्कर्ष यह है कि प्रगतिवाद 1936, प्रगतिशील लेखक संघ, जन-यथार्थ और नागार्जुन-केदार-सुमन से पहचाना जाता है।

9. प्रयोगवाद का परिचय दीजिए।8 अंक

प्रयोगवाद का घोषित द्वार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का तार सप्तक है, प्रकाशन 1943। सात कवि हैं — अज्ञेय, नेमिचंद्र जैन, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरिजाकुमार माथुर, रामविलास शर्मा और गजानन माधव मुक्तिबोध। सभी एक विचार के नहीं। रामविलास और मुक्तिबोध सामाजिक-वैचारिक छोर रखते हैं। अज्ञेय व्यक्ति, क्षण और शिल्प के छोर रखते हैं। प्रयोग का अर्थ छंद तोड़ना मात्र नहीं। अर्थ नई अनुभूति के लिए नई भाषा, बिंब और मनोविज्ञान आजमाना है। फ्रायड, अस्तित्व-चिंता, युद्ध और नगर का अकेला मन यहाँ विषय बनते हैं। दूसरा सप्तक 1951, तीसरा 1959 — ये नई कविता की ओर खुलते हैं। अज्ञेय के नदी के द्वीप और कलगी बाजरे की निर्धारित पाठ हैं।

प्रगतिवाद जन को नायक बनाता है। प्रयोगवाद व्यक्ति को प्रयोगशाला बनाता है। आक्षेप यह रहा कि प्रयोगवाद समाज से कटा और दुरुह है। बचाव यह रहा कि बिना शिल्प-विवेक के यथार्थ भी नारा रह जाता है। मुक्तिबोध फैंटेसी और वर्ग-चेतना एक साथ रखते हैं; इसलिए प्रयोगवाद को केवल अज्ञेय का पर्याय कहना अधूरा है।

निष्कर्ष यह है कि प्रयोगवाद तार सप्तक 1943, अज्ञेय और शिल्प-प्रयोग से पहचाना जाता है; वह नई कविता का द्वार भी है।

10. नई कविता और समकालीन कविता का विवेचन कीजिए।20 अंक

नई कविता 1950 के दशक में स्थिर नाम है। यह प्रयोगवाद की उत्तराधिकारिणी भी है और उससे व्यापक भी। प्रयोगवाद का घोषित द्वार तार सप्तक 1943 है; दूसरा सप्तक 1951 और तीसरा 1959 नई कविता की ओर खुलते हैं। केंद्र लघु मानव है — न छायावाद का विराट रहस्य, न प्रगति का केवल वर्ग-नायक, न प्रयोग का केवल दुर्बोध व्यक्ति। वर्तमान की जटिलता, शहर, संबंध, अकेलापन और छोटी वस्तुएँ आलंबन बनती हैं। प्रतिनिधि अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर, केदारनाथ सिंह और कुँवर नारायण हैं। नामवर सिंह कविता के नए प्रतिमान में बिंब को शिल्प-सूत्र बाँधते हैं। भवानीप्रसाद मिश्र निर्धारित कवि हैं — गीत फरोश, कहीं नहीं बचे। शिल्प में बिंब प्रधान हैं, छंद मुक्त है, भाषा बोलचाल के निकट है।

समकालीन कविता 1970 के आसपास से उस समय को विषय बनाती है जो नई कविता के बाद आता है। आपातकाल, सड़क का जन-स्वर, स्त्री-आंदोलन, दलित-आंदोलन, बाजार और हिंसा दबाव हैं। धूमिल की संसद से सड़क तक मोड़ की पहचान है। लीलाधर जगूड़ी, विनोद कुमार शुक्ल, राजेश जोशी, ज्ञानेन्द्रपति आगे की पंक्ति हैं। स्त्री-स्वर अनामिका, कात्यायनी, सविता सिंह तक खुलता है। दलित कविता गवाही बनती है — ओमप्रकाश वाल्मीकि, कंवल भारती, मलखान सिंह, जयप्रकाश कर्दम। दिव्यांग विमर्श शरीर, पहुँच और अधिकार की नई परत है; दया का रूप स्वीकृत नहीं। ओम पुरोहित ‘कागद’ राजस्थान के निर्धारित समकालीन कवि हैं — पूछती है बेकलू, तपस्वी रूँख, क्यों भटकती है, हरा कर देगी, बरसो जल उनके पाठ हैं। बेकलू खेत की चिड़िया है; बेक्यू शीर्षक नहीं।

साम्य दोनों पर आधुनिक खड़ी बोली, मुक्त छंद और बिंब-प्रयोग है। दोनों छायावाद के रहस्य और द्विवेदी के इतिवृत्त से दूर हैं। वैषम्य आलंबन पर है। नई कविता जटिल व्यक्ति और नगर का सूक्ष्म चित्र रखती है। समकालीन कविता व्यक्ति को राज्य, भीड़ और पहचान के बीच रखती है। नई कविता में व्यंग्य सभ्य है; समकालीन में गवाही और नारा तेज हैं। प्रयोगवाद शिल्प-आंदोलन अधिक है; नई कविता संवेदना का आंदोलन अधिक है; समकालीन समय और विमर्श का आंदोलन अधिक है। मिश्र सादगी से नई कविता के सरल सिरे छूते हैं। कागद थार की प्यास से समकालीन समय छूते हैं। अज्ञेय दोनों धाराओं के पुल भी हैं — व्यक्ति और नया उपमान।

सीमाएँ अलग-अलग कही गई हैं। नई कविता पर मध्यवर्गीय संकोच का आक्षेप है। समकालीन पर यह आक्षेप है कि विमर्श कविता पर सवार हो जाता है और मूल्यांकन अभी अधूरा है। मुक्तिबोध दोनों छोर जोड़ते हैं — फैंटेसी और सामाजिक दाब। रघुवीर सहाय नई कविता को राजनीति के निकट लाते हैं। इसलिए दोनों धाराएँ शत्रु नहीं; समय के दो घेरे हैं।

निष्कर्ष यह है कि नई कविता लघु मानव, बिंब और 1950 के दशक से पहचानी जाती है। समकालीन कविता 1970 के बाद सड़क, पहचान और विमर्श से पहचानी जाती है। साम्य आधुनिक शिल्प पर है, वैषम्य आलंबन और स्वर की तीव्रता पर है।

11. काव्यरूप, बिंब और प्रतीक स्पष्ट कीजिए।20 अंक

काव्यरूप कविता का शरीर-विधान है। वह पूछता है कि रचना कितने विस्तार में है, गेय है या कथ्य, कथा है या क्षण, वाचक कौन है। आधुनिक हिन्दी में महाकाव्य लंबी उदात्त कथा, अनेक सर्ग और संस्कृति-प्रश्न का रूप है — कामायनी, साकेत, प्रिय प्रवास। खंडकाव्य एक प्रसंग या एक नायक का मध्यम विस्तार है — रश्मिरथी कर्ण का खंड है; हल्दीघाटी का दूसरा सर्ग प्रताप का वीर-खंड है। दोनों खंडकाव्य हैं, स्रोत और नायक अलग हैं। प्रगीत व्यक्तिगत अनुभूति का गेय रूप है — छायावाद का प्रधान रूप, महादेवी का स्वर। मुक्तक स्वतः पूर्ण छोटी इकाई है। गीत, नवगीत, ग़ज़ल, गद्य-काव्य और लंबी कविता आगे के रूप हैं। भारतेंदु छोटे गेय, मुकरी और व्यंग्य-रूप रखते हैं। द्विवेदी महाकाव्य और इतिवृत्त रखते हैं। प्रगतिवाद गीत और व्यंग्य-कविता रखते हैं। नई कविता लघु कविता और लंबी कविता दोनों रखती है। समकालीन गवाही और गद्य-कविता रखते हैं।

बिंब इंद्रिय-ग्राह्य चित्र है। अनुभव आँख, कान, स्पर्श, गंध या स्वाद से ठोस हो जाता है। वह वर्णन की सूची नहीं, सघन दृश्य है। नई कविता और प्रयोगवाद बिंब को शिल्प का प्राण मानते हैं। शमशेर और केदारनाथ सिंह चित्र से अर्थ खोलते हैं। मुक्तिबोध की फैंटेसी बिंबों की शृंखला है। अज्ञेय की कलगी बाजरे की साधारण ग्रामीण बिंब को नया उपमान बनाती है। पंत का मौन निमंत्रण चाँदनी का चित्र है। निराला की जुही स्पर्श का चित्र है। बिना बिंब के आधुनिक कविता अमूर्त उपदेश रह जाती है। द्विवेदी युग का इतिवृत्त बिंब से कम चलता है; घटना-क्रम से अधिक चलता है। भारतेंदु का संबोधन सीधा है; चित्र वहाँ गौण हैं।

प्रतीक वह संकेत है जो प्राथमिक अर्थ से आगे भाव या विचार का प्रतिनिधित्व करता है। दीप, बादल, झरना, तारा, रात्रि छायावाद में जीवन, आकांक्षा, प्रवाह और दूरी के प्रतिनिधि बनते हैं। कामायनी में श्रद्धा विश्वास की शक्ति है, इड़ा बुद्धि की — दोनों प्रतीक भी हैं, चित्र भी। महादेवी की बदली वेदना का प्रतीक है। अज्ञेय के नदी और द्वीप संबंध और व्यक्ति के प्रतीक हैं। प्रतीक कई अर्थ लाद सकता है। बिंब एक अनुभव सघन करता है। इसलिए बिंब प्रत्यक्ष चित्र है, प्रतीक अप्रत्यक्ष संकेत है। बिंब नई कविता का शिल्प-सूत्र है; प्रतीक छायावाद का शिल्प-सूत्र है। दोनों शत्रु नहीं।

तीनों का संबंध युग से है। रूप बिना बिंब-प्रतीक के खाली साँचा है। बिंब-प्रतीक बिना रूप के बिखरे चित्र हैं। छायावाद प्रगीत और प्रतीक है। नई कविता लघु रूप और बिंब है। प्रगतिवाद गीत-व्यंग्य और सीधे चित्र है। साधारणीकरण तब होता है जब पाठक इन चित्रों और संकेतों को निजी अहं से हटाकर सामान्य अनुभव की तरह भोगता है। भट्टनायक का यही पद आधुनिक पाठ पर भी लागू होता है। परिभाषा और युग-उदाहरण साथ लिखे बिना उत्तर अधूरा रह जाता है।

निष्कर्ष यह है कि काव्यरूप शरीर-विधान है, बिंब इंद्रिय-चित्र है, प्रतीक प्रतिनिधि संकेत है। महाकाव्य-खंडकाव्य-प्रगीत-मुक्तक रूप हैं। छायावाद प्रतीक प्रधान है। नई कविता बिंब प्रधान है। तीनों आधुनिक काव्य के शिल्प-सूत्र हैं।

12. रस का स्वरूप, निष्पत्ति एवं साधारणीकरण लिखिए।20 अंक

रस काव्य का आस्वाद्य आनंद है। विश्वनाथ का लक्षण है — वाक्यं रसात्मकं काव्यम्। स्थायी भाव चित्त का मूल भाव है। परिपाक के बाद वही रस कहलाता है। अभिनवगुप्त रस को आनंद मानते हैं और आस्वाद को ब्रह्मानंद-सहोदर कहते हैं। भरत आठ रस कहते हैं; अभिनवगुप्त शांत जोड़कर नव रस प्रतिष्ठित करते हैं। रति से शृंगार, हास से हास्य, शोक से करुण, क्रोध से रौद्र, उत्साह से वीर, भय से भयानक, जुगुप्सा से बीभत्स, विस्मय से अद्भुत, निर्वेद से शांत। शृंगार संयोग और विप्रलंभ दो रूपों में आता है। स्वरूप यही है — स्थायी भाव का आस्वाद्य परिपाक। केवल रस का नाम लिखना अधूरा है; स्थायी भाव साथ लिखा जाता है।

निष्पत्ति भरत के सूत्र से समझी जाती है — विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः। विभाव कारण हैं। आलंबन वह पात्र या वस्तु है जिस पर भाव टिकता है। उद्दीपन देश, काल और चेष्टा हैं जो भाव बढ़ाते हैं। अनुभाव कार्य हैं — अश्रु, रोमांच, स्वरभंग। आठ सात्विक अनुभाव स्तंभ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, वेपथु, वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय हैं। व्यभिचारी अर्थात् संचारी भाव तैंतीस सहायक लहरें हैं; वे आते-जाते हैं। स्थायी इनके संयोग से रस बनता है। रश्मिरथी में आलंबन कर्ण हैं, उद्दीपन सभा और युद्ध हैं, रस वीर प्रधान है। महादेवी में आलंबन अनुपस्थित प्रिय हैं, रस करुण है। नागार्जुन के प्रेत का बयान में आलंबन शिक्षक-प्रेत हैं, रस व्यंग्य-करुण है।

साधारणीकरण भट्टनायक का पद है। सहृदय अपना अहं छोड़कर भाव को सामान्य रूप में भोगता है। राम का शोक केवल राम का घटना-शोक नहीं रह जाता; वह करुण का आस्वाद बनता है। कर्ण का अपमान केवल कर्ण का नहीं रह जाता; सभा का अपमान सामान्य अन्याय बन जाता है। बिना साधारणीकरण के रस निजी शिकायत रह जाता है, काव्य-आनंद नहीं बनता। आधुनिक आलोचना में शुक्ल और नगेन्द्र रस को हिन्दी काव्य पर लागू करते हैं। नामवर नई कविता को बिंब से पढ़ते हैं, फिर भी अकेलापन पाठक को साधारणीकरण से ही छूता है।

आधुनिक कविता रस रद्द नहीं करती; आलंबन बदलती है। छायावाद करुण, शांत और सूक्ष्म शृंगार रखता है — महादेवी की वेदना, प्रसाद की श्रद्धा, पंत का शांत चित्र। प्रगतिवाद रौद्र, वीर और व्यंग्य रखता है — नागार्जुन का जन-क्रोध। दिनकर का ओज वीर रस का आधुनिक रूप है, प्रगतिवाद का पर्याय नहीं। नई कविता अकेलेपन को करुण के नए आलंबन पर लाती है। विमर्श-काव्य में क्रोध व्यक्तिगत शिकायत से सामान्य अन्याय का अनुभव बनता है — यही साधारणीकरण का नया व्यवहार है। कागद की प्यास करुण को मरु पर लाती है। मिश्र का गीत फरोश व्यंग्य को बाजार पर लाता है। बिना उदाहरण के शास्त्र सूखा रह जाता है।

निष्कर्ष यह है कि रस स्थायी भाव का परिपाक है। निष्पत्ति विभाव, अनुभाव और संचारी के संयोग से होती है। साधारणीकरण भट्टनायक का अहं-त्याग है, जिससे सहृदय सामान्य आस्वाद भोगता है। आधुनिक काव्य इन्हीं अंगों को नए आलंबन पर चलाता है।

13. आधुनिक काव्य में स्त्री, दलित और दिव्यांग विमर्श लिखिए।20 अंक

विमर्श का अर्थ विषय जोड़ना भर नहीं। अर्थ यह है कि काव्य को सत्ता, शरीर और वाणी के अधिकार से पढ़ा जाए। प्रश्न यह है कि पीड़ित आलंबन है या वाचक। आधुनिक हिन्दी कविता भारतेंदु के सुधार से समकालीन पहचान-स्वर तक इसी प्रश्न को धीरे-धीरे खोलती है। तीन विमर्श तीन अलग प्रश्न हैं; एक अनुच्छेद में मिलाकर छोड़ देना अधूरा उत्तर है। रस रद्द नहीं होता; आलंबन और वाचक बदलते हैं। साधारणीकरण निजी शिकायत को सामान्य अनुभव बनाता है — विमर्श उसी नियम को नए आलंबन पर चलाता है।

स्त्री विमर्श पूछता है कि स्त्री देखी गई है या बोल रही है। भारतेंदु युग स्त्री-शिक्षा और विधवा-दशा सुधार की दृष्टि से देखता है; वाचक प्रायः पुरुष नवजागरण का है। द्विवेदी युग माता, सती और जागृति की प्रतिमा बनाता है — गुप्त की नारी आदर्श है, फिर भी कैकेयी परिताप साकेत में पश्चात्ताप की वाचक है और सखि वे मुझसे कहकर जाते यशोधरा में प्रश्न करने वाली पत्नी है। दोनों कृतियाँ अलग हैं। छायावाद में महादेवी वर्मा वेदना की वाचक हैं, केवल नायिका नहीं; निर्धारित गीत नीहार, नीरजा, यामा से हैं। सुभद्राकुमारी चौहान राष्ट्रीय ओज और वात्सल्य की वाचक हैं; इसका रोना शिशु-करुण का गीत है। प्रसाद की कमला प्रलय की छाया में वाचक है। समकालीन स्त्री-कविता देह, श्रम और भाषा के अधिकार को विषय बनाती है। अनामिका, कात्यायनी, सविता सिंह आलोचना में आते हैं। महादेवी को केवल रहस्य कहना इस विमर्श से अधूरा है।

दलित विमर्श जाति, श्रम, छुआछूत और गवाही से पढ़ता है। नवजागरण सुधार बोलता है, पर वाचक प्रायः सवर्ण है। दिनकर का कर्ण जन्म-व्यवस्था के विरुद्ध आत्मगौरव रखता है; वह दलित आत्मकथा का पर्याय नहीं, निकट का सामाजिक प्रश्न है। समकालीन दलित कविता अनुभव को प्रमाण बनाती है। ओमप्रकाश वाल्मीकि, कंवल भारती, मलखान सिंह, सुशीला टाकभौरे प्रतिनिधि पंक्ति हैं। नागार्जुन का जन-स्वर दलित विमर्श का पर्याय नहीं, निकट का सामाजिक स्वर है — प्रेत का बयान भूख और तंत्र की गवाही है। प्रगतिवाद वर्ग देखता है; दलित विमर्श जाति और छुआछूत को वर्ग में विलीन नहीं होने देता। रस में रौद्र और करुण गवाही बनते हैं, दया के उपकरण नहीं।

दिव्यांग विमर्श शरीर की भिन्न क्षमता, पहुँच और दया बनाम अधिकार का प्रश्न है। पुरानी कविता में अंधा, लंगड़ा, बाधिर प्रायः करुण या हास्य के उपकरण रहे। नया विमर्श उन्हें नागरिक और वाचक मानता है। यह परत स्त्री और दलित जितनी विशाल नहीं; पाठ्यक्रम इसे आधुनिक संवेदना का निर्धारित बिंदु बनाता है। साधारणीकरण यहाँ दया का साधारणीकरण नहीं, अधिकार-बोध का साधारणीकरण माँगता है। तीनों विमर्श काव्य के रस को रद्द नहीं करते। बिना वाचक-प्रश्न के विमर्श केवल विषय-सूची रह जाता है। समकालीन कविता पहचान की राजनीति से इन्हीं तीन दृष्टियों को तेज करती है।

निष्कर्ष यह है कि स्त्री विमर्श वाचक-स्त्री का प्रश्न है, दलित विमर्श जाति-गवाही का प्रश्न है, दिव्यांग विमर्श शरीर और अधिकार का प्रश्न है। आधुनिक काव्य सुधार से पहचान तक इन्हीं तीन दृष्टियों से भी पढ़ा जाता है।

14. रामधारी सिंह दिनकर का साहित्यिक परिचय दीजिए।8 अंक

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म 23 सितंबर 1908 को सिमरिया, बेगूसराय, बिहार में हुआ। निधन 24 अप्रैल 1974, मद्रास। उन्हें राष्ट्रकवि कहा जाता है। प्रमुख काव्य-कृतियाँ रेणुका, हुंकार, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा हैं। उर्वशी पर ज्ञानपीठ पुरस्कार 1972 है। गद्य में संस्कृति के चार अध्याय प्रसिद्ध हैं। भाषा खड़ी बोली है। गुण ओज है। रस वीर और रौद्र प्रधान हैं; करुण साथ चलता है। छायावाद का रहस्य उनका मार्ग नहीं। प्रगतिवाद का वर्ग-सूत्र भी पूरा नहीं। स्वर राष्ट्रीय और अन्याय-विरोधी है। कुरुक्षेत्र युद्ध-दर्शन का काव्य है। रश्मिरथी 1952 कर्ण का खंडकाव्य है, निर्धारित कृति। हुंकार की कृष्ण की चेतावनी वन-वापसी का गीत है; वह रश्मिरथी का सर्ग नहीं।

आलोचना उन्हें छायावादोत्तर ओज का शिखर मानती है। विषय पौराणिक हो सकते हैं; प्रश्न समकालीन हैं — जाति, अपमान, प्रतिभा, मित्रता। कर्ण-चरित्र का उद्धार वे नई मानवता की स्थापना कहते हैं। सीमा प्रशस्ति और ओज का आधिक्य है। निर्धारित पाठ कर्ण के सात सर्ग हैं, उर्वशी नहीं।

निष्कर्ष यह है कि दिनकर 1908–1974, सिमरिया, राष्ट्रकवि हैं; पहचान ओज, खड़ी बोली, कुरुक्षेत्र-रश्मिरथी-उर्वशी से है।

15. रश्मिरथी का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।8 अंक

रश्मिरथी रामधारी सिंह दिनकर का खंडकाव्य है। प्रकाशन 1952। निर्धारित संस्करण लोकभारती प्रकाशन का है। नायक कर्ण हैं। स्रोत महाभारत है; दृष्टि आधुनिक है — जन्म से कर्म बड़ा। सात सर्ग हैं — रंगभूमि, परशुराम-शाप, कृष्ण-कर्ण संवाद, कवच-दान और कुंती-भेंट, सेनापति-युद्ध, घटोत्कच-शक्ति, कर्ण-अर्जुन और पहिया। महाकाव्य अनेक नायकों पर फैलता है; खंडकाव्य एक नायक और निर्णायक प्रसंगों पर सिमटता है। कामायनी और साकेत महाकाव्य हैं; यह कृति कर्ण का खंड है। हल्दीघाटी प्रताप का वीर-खंड है; नायक और स्रोत अलग हैं। भाषा खड़ी बोली, संस्कृत-गर्भित, संवाद-प्रधान है। छंद गेय और ओजस्वी है।

रस वीर प्रधान है; करुण अपमान, दान और मृत्यु पर सहायक है। गुण ओज है। सूत्र जन्म बनाम कर्म, दान और मैत्री हैं। कुरुक्षेत्र विचार का ग्रंथ है; रश्मिरथी चरित्र का है। उर्वशी ज्ञानपीठ की कृति है, यह खंडकाव्य नहीं। हुंकार की कृष्ण की चेतावनी इस कृति का सर्ग नहीं। प्रेमचंद का उपन्यास रंगभूमि यहाँ कथा नहीं; प्रथम सर्ग हस्तिनापुर की शस्त्र-रंगभूमि है।

निष्कर्ष यह है कि स्वरूप खंडकाव्य, सात सर्ग, 1952, लोकभारती, नायक कर्ण और ओज-वीर स्वर से पहचाना जाता है।

16. रश्मिरथी नाम का अर्थ लिखिए।8 अंक

रश्मि किरण है, रथी रथ चलाने वाला। रश्मिरथी सूर्य की किरण-रथ का सवार है। कर्ण सूर्यपुत्र हैं; जन्म कवच-कुंडल के साथ हुआ। नाम चरित्र की पहचान है, केवल अलंकार नहीं। कुंती ने शिशु नदी पर छोड़ा। सूत अधिरथ और राधा ने पालन किया। समाज सूत कहता रहा; कवि सूर्य-संबंध नाम में जगाए रखते हैं। कृति दिनकर की है, प्रकाशन 1952, रूप खंडकाव्य, सात सर्ग। नायक वही कर्ण हैं जिनका नाम शीर्षक बनता है। कामायनी संस्कृति का महाकाव्य है; साकेत राम-कथा है; यह नाम कर्ण का है, प्रताप या कृष्ण का नहीं।

नाम दो अर्थ एक साथ बाँधता है — वंश का प्रकाश और कर्म का रथ। रथ युद्ध तक चलता है। सप्तम सर्ग में पहिया पंक में धँसता है। सूर्यपुत्र अस्त होता है। फिर भी नाम कर्ण को जन्म-अपमान से ऊपर उठाता है। हुंकार का गीत इस नाम का अर्थ नहीं खोलता। रंगभूमि-प्रसंग कौशल दिखाता है; नाम सूर्य-संबंध दिखाता है।

निष्कर्ष यह है कि रश्मिरथी का अर्थ सूर्यपुत्र कर्ण है — किरण-रथ का सवार, खंडकाव्य का नायक।

17. रश्मिरथी का कथानक लिखिए।20 अंक

रश्मिरथी रामधारी सिंह दिनकर का खंडकाव्य है। प्रकाशन 1952, निर्धारित संस्करण लोकभारती प्रकाशन का है। नायक कर्ण हैं। स्रोत महाभारत है, दृष्टि आधुनिक है। सात सर्ग हैं। कथा जन्म से आरंभ होती है। कुंती को सूर्य का वर मिला। कर्ण का जन्म कवच-कुंडल के साथ हुआ। अविवाहित मातृत्व के भय से कुंती ने शिशु नदी पर छोड़ दिया। सूत अधिरथ और राधा ने पालन किया। कर्ण धनुर्धर बना। द्रोण ने सूत कहकर शिष्य नहीं लिया। द्वितीय सर्ग में कर्ण परशुराम के आश्रम जाता है। गुरु क्षत्रिय-द्वेष रखते थे; कर्ण ब्राह्मण-परिचय देकर विद्या लेता है। सत्य खुलने पर गुरु शाप देते हैं — संकट में विद्या साथ न दे। अंतिम युद्ध का बीज यहीं पड़ता है।

प्रथम सर्ग रंगभूमि का है। हस्तिनापुर में राजकुमार शस्त्र दिखाते हैं। अर्जुन की प्रशंसा चलती है। कर्ण चुनौती देता है — जो अर्जुन ने किया, वह वह भी दिखा सकता है। प्रश्न कौशल का नहीं, कुल का उठता है। कृपाचार्य जाति रटते हैं। कर्ण भुजदंड को जाति कहता है। दुर्योधन अंग का राज्य देकर मित्र बनाता है। वचन यहीं बँधता है। तृतीय सर्ग कृष्ण-कर्ण संवाद है। युद्ध निकट है। कृष्ण जन्म का रहस्य खोलते हैं — कर्ण कुंती का ज्येष्ठ है, पांडवों का बड़ा भाई। पांडव-पक्ष आने पर राज और सम्मान दोनों मिल सकते हैं। कर्ण मित्र-धर्म से इंकार करता है। चतुर्थ सर्ग में कुंती भी आती है; कर्ण अर्जुन छोड़ शेष भाइयों को न मारने का वचन देता है, पक्ष नहीं बदलता।

इसी चतुर्थ सर्ग में इंद्र ब्राह्मण बनकर कवच-कुंडल माँग बैठते हैं। कर्ण याचक को पहचान लेता है। जानता है कि दान युद्ध की ढाल उतार देगा। फिर भी खाली हाथ नहीं लौटाता। दान यश नहीं, स्वभाव है। इंद्र शक्ति देकर कुछ चुकाते हैं। पंचम सर्ग में भीष्म और द्रोण के बाद सेनापति कर्ण होते हैं। षष्ठ सर्ग घटोत्कच-वध से मुड़ता है। रात्रि-युद्ध में भीमपुत्र कौरव-सेना तोड़ता है। कर्ण इंद्र-प्रदत्त शक्ति उसी पर चलाता है। अर्जुन के लिए बचा अस्त्र यहीं खर्च होता है। विजय तात्कालिक है; अंतिम द्वंद्व कमजोर पड़ता है।

सप्तम सर्ग कर्ण-अर्जुन का निर्णायक युद्ध है। रथ का पहिया पंक में धँसता है। कर्ण पहिया निकालता है, शस्त्र नहीं संभालता। परशुराम का शाप पूरा होता है। निःशस्त्र कर्ण पर अर्जुन का बाण चलता है। अंत से पहले कर्ण अश्वसेन सर्प का सहयोग ठुकराता है — मनुज मनुज से लड़े, सर्प से नहीं। द्रौपदी-प्रसंग का पश्चात्ताप भी यहीं छूता है। कथा घटनाओं की सूची मात्र नहीं; सूत्र अपमान, दान, मैत्री और मृत्यु हैं। हुंकार की कृष्ण की चेतावनी वन-वापसी का गीत है; वह इस कथानक का सर्ग नहीं। भाषा खड़ी बोली, गुण ओज, रस वीर-करुण हैं।

निष्कर्ष यह है कि कथानक जन्म-त्याग से रंगभूमि, शाप, कृष्ण-संवाद, दान, कुंती, शक्ति और पहिए तक एक नायक — कर्ण — पर सिमटा है। सात सर्ग एक सूत्र बाँधते हैं — जन्म नहीं, कर्म नापा जाता है।

18. रंगभूमि-प्रसंग का सार लिखिए।8 अंक

रंगभूमि-प्रसंग रामधारी सिंह दिनकर के रश्मिरथी का प्रथम सर्ग है। प्रकाशन 1952, नायक कर्ण। यह प्रेमचंद का उपन्यास रंगभूमि नहीं; कथा हस्तिनापुर की शस्त्र-सभा की है। राजकुमार शस्त्र दिखाते हैं। अर्जुन की प्रशंसा चलती है। कर्ण चुनौती देता है — जो अर्जुन ने किया, वह वह भी दिखा सकता है। प्रश्न कौशल का नहीं, कुल का उठता है। कृपाचार्य जाति रटते हैं। कर्ण भुजदंड को जाति कहता है। दुर्योधन अंग का राज्य देकर मित्र बनाता है। वचन यहीं बँधता है। आगे कृष्ण-संवाद और कुंती-भेंट इसी मैत्री की कीमत पूछते हैं।

रस वीर है; करुण अपमान से चिपकता है। आलंबन कर्ण हैं। उद्दीपन सभा, अर्जुन का प्रदर्शन और जाति-प्रश्न हैं। शैली संवाद और ओज की है। सामाजिक पक्ष यह है कि व्यवस्था प्रतिभा नहीं, जन्म नापती है। दुर्योधन उस क्षण सम्मान का दाता भी है। हुंकार की कृष्ण की चेतावनी वन-वापसी का गीत है; यह सर्ग वह गीत नहीं। हल्दीघाटी का दूसरा सर्ग प्रताप का युद्ध है; यह कर्ण की रंगभूमि है।

निष्कर्ष यह है कि रंगभूमि-प्रसंग जन्म बनाम कर्म का पहला सूत्र है और अंगराज-मैत्री यहीं जन्म लेती है।

19. कृष्ण-कर्ण संवाद का विवेचन कीजिए।20 अंक

कृष्ण-कर्ण संवाद रश्मिरथी के तृतीय सर्ग का नैतिक शिखर है। कृति रामधारी सिंह दिनकर की है, प्रकाशन 1952, लोकभारती, नायक कर्ण। युद्ध निकट है। कृष्ण कर्ण से मिलते हैं। रहस्य खोलते हैं — कर्ण कुंती का ज्येष्ठ है, सूर्यपुत्र है, पांडवों का बड़ा भाई है। पांडव-पक्ष आने पर राज और सम्मान दोनों मिल सकते हैं। प्रस्ताव धर्म और लाभ दोनों का है। कर्ण इंकार करता है। यह हुंकार की कृष्ण की चेतावनी नहीं। वह पद वन से लौटे पांडवों को संबोधित गीत है, रश्मिरथी का सर्ग नहीं। यहाँ वाचक कृष्ण हैं, श्रोता कर्ण हैं, विषय पक्ष-परिवर्तन है। यह हल्दीघाटी का युद्ध-सर्ग भी नहीं; नायक प्रताप नहीं, कर्ण हैं।

तर्क मित्रता का है। प्रथम सर्ग की रंगभूमि याद रहती है। जब सभा ने जाति पूछी, कृपाचार्य ने कुल रटा, दुर्योधन ने अंग का राज्य दिया। संकट में उस हाथ को छोड़ना कृतघ्नता है। कर्ण हार देख सकता है; वचन नहीं तोड़ता। जन्म का अधिकार मैत्री के आगे झुकता है। यह धीरोदात्त का प्रण है, हठ भर नहीं। चतुर्थ सर्ग में कुंती भी जन्म लौटाएगी; कर्ण वहाँ भी पक्ष नहीं बदलेगा, केवल अर्जुन छोड़ भाइयों की रक्षा का वचन देगा। संवाद उसी मैत्री-सूत्र को पहले बाँध देता है।

दो दृष्टि आमने-सामने हैं। कृष्ण धर्म, न्याय और युद्ध की दिशा देखते हैं। कर्ण कृतज्ञता और प्रण देखते हैं। सरल खाँचा — धर्म बनाम अधर्म — यहाँ टूटता है। कर्ण नायक इसलिए है कि वह लाभ का मार्ग जानकर भी नहीं चलता। संवाद नाटकीय है; ओज में करुण मिला है। भाषा खड़ी बोली, संस्कृत-गर्भित, संवाद-प्रधान है। गुण ओज है। रस वीर और करुण हैं। आलंबन कर्ण का अंतःकरण है। उद्दीपन युद्ध की निकटता, जन्म-रहस्य और राज-प्रस्ताव हैं। शैली नाटक के दृश्य जैसी है।

आगे की कथा इसी इंकार की कीमत चुकाती है। इंद्र कवच-कुंडल माँगते हैं; कर्ण दान करता है। घटोत्कच पर शक्ति खर्च होती है। पहिए के क्षण में शाप पूरा होता है। संवाद चरित्र का द्वार है, कथानक का विराम नहीं। दिनकर कर्ण-चरित्र का उद्धार नई मानवता की स्थापना कहते हैं। सीमा यह है कि दुर्योधन का कपट मैत्री की रोशनी में नरम पड़ सकता है। गुण यह है कि पौराणिक कथा समता, जाति और कृतज्ञता का प्रश्न बनती है। बिना रंगभूमि के यह संवाद अधूरा रह जाता है; बिना संवाद के दान और कुंती का अर्थ पतला पड़ जाता है।

निष्कर्ष यह है कि कृष्ण-कर्ण संवाद जन्म-रहस्य, पांडव-प्रस्ताव और मित्र-धर्म के इंकार से पहचाना जाता है। कर्ण वचन को राज्य से बड़ा ठहराता है। सर्ग तृतीय है, हुंकार का गीत नहीं।

20. कर्ण की दानवीरता का वर्णन कीजिए।8 अंक

दानवीरता रश्मिरथी के चतुर्थ सर्ग का केंद्र है। कृति दिनकर की है, 1952, नायक कर्ण। इंद्र ब्राह्मण बनकर आते हैं। माँग कवच और कुंडल की है — जन्म के साथ मिले रक्षक। कर्ण याचक को पहचान लेता है। जानता है कि दान युद्ध की ढाल उतार देगा। फिर भी खाली हाथ नहीं लौटाता। इंद्र शक्ति देकर कुछ चुकाते हैं; मूल बात कर्ण का प्रण है — माँगते ही देना। दान यश नहीं, स्वभाव है। यह हुंकार का गीत नहीं, कर्ण का आचरण है। रंगभूमि में भुजा जाति बनी थी; यहाँ त्वचा की ढाल उतरती है।

वीर रस यहाँ त्याग से चमकता है। आलंबन कर्ण हैं; उद्दीपन याचक-इंद्र हैं। षष्ठ सर्ग में घटोत्कच पर वही शक्ति खर्च होती है — दान का दूसरा रूप अस्त्र का खर्च भी है। कुंती इसी सर्ग-घेरे में पक्ष माँगती है; कर्ण वचन देता है, ढाल नहीं माँगता। सप्तम सर्ग का पहिया इसी त्याग के बाद आता है।

निष्कर्ष यह है कि कर्ण की दानवीरता कवच-कुंडल का जान-बूझकर दिया गया दान है; विजय से बड़ा वचन है।

21. कुंती-कर्ण संवाद लिखिए।8 अंक

कुंती-कर्ण संवाद रश्मिरथी के चतुर्थ सर्ग की भेंट है। कृति दिनकर की है, नायक कर्ण। युद्ध से पहले कुंती आती है। माता जन्म बताती है — सूर्य और कुंती, कवच-कुंडल, नदी पर त्याग। पक्ष बदलने को कहती है। कर्ण का विक्षोभ फूटता है — उपेक्षा का जीवन, सूत का नाम, रंगभूमि का अपमान। फिर भी जननी पर नेह है। वचन यह है कि अर्जुन छोड़ और भाइयों को नहीं मारेगा; दुर्योधन का साथ नहीं छूटेगा। तृतीय सर्ग में कृष्ण पहले जन्म-रहस्य खोल चुके हैं; कुंती वही सत्य माँ बनकर लौटाती है। कर्ण दोनों जगह मित्र-धर्म चुनता है।

कुंती माँगती है पुत्र; कर्ण देता है वचन, पक्ष नहीं। मातृत्व और मित्रता एक तराजू पर हैं। रस करुण है; वीर प्रण साथ है। आलंबन कर्ण और कुंती हैं। उद्दीपन युद्ध की निकटता और जन्म-स्वीकार हैं। यह यशोधरा का गृहत्याग नहीं, साकेत का कैकेयी-परिताप भी नहीं। हुंकार की कृष्ण-चेतावनी यहाँ नहीं गूँजती।

निष्कर्ष यह है कि कुंती-कर्ण संवाद जन्म-स्वीकार, पक्ष-इंकार और अर्जुन-छोड़ शेष भाइयों की रक्षा के वचन से पहचाना जाता है।

22. रश्मिरथी के आधार पर कर्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।20 अंक

रश्मिरथी के आधार पर कर्ण धीरोदात्त के निकट वीर हैं, पर त्रासदी उनके साथ है। कृति दिनकर की है, 1952, खंडकाव्य, सात सर्ग, लोकभारती। गुण स्थिर हैं — स्वाभिमान, दान, कृतज्ञता, प्रण, धनुर्विद्या। जन्म सूर्य और कुंती का है; पालन सूत अधिरथ और राधा का है। समाज दूसरा नाम नहीं देता। प्रतिभा शिष्यत्व माँगती है, जाति स्वीकार नहीं करती। द्रोण शिष्य नहीं लेते। परशुराम के आश्रम में परिचय छिपकर विद्या मिलती है; शाप संकट में विद्या का साथ छोड़ना है। नाम रश्मिरथी सूर्य की किरण-रथ के सवार की पहचान है। चरित्र वंश से नहीं, आचरण से नापा जाता है।

रंगभूमि में जाति का प्रश्न उठता है। कृपाचार्य कुल रटते हैं। कर्ण भुजदंड को जाति कहता है। दुर्योधन अंग का राज्य देता है; कर्ण जीवन भर चुकाता है। तृतीय सर्ग में कृष्ण सत्य देते हैं — ज्येष्ठ पांडव, राज और सम्मान। कर्ण पक्ष नहीं बदलता। कुंती माँ बनकर आती है; कर्ण पुत्र का वचन देता है कि अर्जुन छोड़ शेष भाइयों को नहीं मारेगा, मित्र का द्रोह नहीं करता। इंद्र माँगते हैं; कर्ण कवच-कुंडल उतार देता है। सेनापति बनकर घटोत्कच पर शक्ति चलाता है। पहिए के क्षण में निःशस्त्र रहकर बाण सहता है। अश्वसेन का सर्प-सहयोग ठुकराता है — मनुज मनुज से लड़े। ये घटनाएँ चरित्र के प्रमाण हैं, सूची नहीं।

सीमाएँ छिपाई नहीं गईं। परशुराम से परिचय छिपाना असत्य कर्म है, जन्म-व्यवस्था के सामने। द्रौपदी के चीर-प्रसंग में मौन — आहत अभिमान नारी की रक्षा नहीं बोलता। दिनकर युद्ध में पश्चात्ताप से इस दाग को छूते हैं। नायक निष्कलंक देवता नहीं, संघर्षशील मनुष्य है। दलित मुक्ति का पूरा आत्मकथा-स्वर यहाँ नहीं; जन्म-व्यवस्था के विरुद्ध आत्मगौरव है। यह हल्दीघाटी का प्रताप नहीं। प्रताप घाटी और स्वाधीनता के नायक हैं; कर्ण अपमान, दान और मैत्री के नायक हैं। दोनों खंडकाव्य हैं, चरित्र एक नहीं।

अन्य पात्र चरित्र को घेरते हैं। दुर्योधन संकट का दाता और अधर्म का साथी दोनों है। कृष्ण नीति के वाचक हैं; वे सत्य बताते हैं, पक्ष बदलवाते हैं, अंतिम क्षण में अर्जुन को प्रहार कहते हैं। कुंती त्याग और माँग दोनों हैं। अर्जुन प्रतिद्वंद्वी हैं — रंगभूमि से सप्तम सर्ग तक; उनकी विजय शास्त्र-शुद्धि की नहीं, परिस्थिति और सारथी की है। राधा-अधिरथ पालन के मौन आधार हैं। बिना मैत्री और दान के कर्ण केवल योद्धा रह जाते। रस वीर प्रधान है; करुण अपमान और मृत्यु पर है। भाषा खड़ी बोली, गुण ओज, शैली संवाद है।

निष्कर्ष यह है कि कर्ण का चरित्र अपमान, दान और मैत्री तीन सूत्रों से बनता है। वंश नहीं, आचरण नायकत्व देता है। रश्मिरथी उसी आचरण का खंडकाव्य है।

23. रश्मिरथी की काव्यगत विशेषताएँ लिखिए।20 अंक

रश्मिरथी रामधारी सिंह दिनकर का खंडकाव्य है। प्रकाशन 1952, निर्धारित संस्करण लोकभारती का है। विधा एक नायक और निर्णायक प्रसंगों का मध्यम विस्तार है। महाकाव्य अनेक नायकों पर फैलता है; यह कृति कर्ण पर सिमटती है। कामायनी और साकेत महाकाव्य हैं; यह कर्ण का खंड है, हल्दीघाटी का सर्ग नहीं। सात सर्ग हैं — रंगभूमि, परशुराम-शाप, कृष्ण-कर्ण संवाद, कवच-दान और कुंती-भेंट, सेनापति-युद्ध, घटोत्कच-शक्ति, कर्ण-अर्जुन और पहिया। नाम सूर्य-किरण के रथी — कर्ण — की पहचान है। भाषा खड़ी बोली, ओज-गुण, संस्कृत-शब्दों का भार। शैली संवाद-प्रधान है; कृष्ण-कर्ण और कुंती-कर्ण नाटक के दृश्य जैसे हैं। छंद गेय और ओजस्वी है।

रस वीर प्रधान है। करुण अपमान, शाप, दान और मृत्यु पर है। रौद्र युद्ध में है। शांत क्षण दान और प्रण पर झलकते हैं। अलंकार अतिशयोक्ति और ओज के चित्र हैं; छायावाद का प्रतीक-जाल नहीं। बिंब सूर्य, रथ, बाण, सभा, पंक के पहिए हैं — इंद्रिय-चित्र, सीधे। आलंबन कर्ण हैं; उद्दीपन सभा, युद्ध और याचक हैं। साधारणीकरण सभा के अपमान को सामान्य अन्याय बनाता है। दिनकर छायावादोत्तर ओज के कवि हैं; रहस्य उनका मार्ग नहीं। प्रगतिवाद का वर्ग-सूत्र भी पूरा नहीं। स्वर राष्ट्रीय और अन्याय-विरोधी है। कुरुक्षेत्र विचार का ग्रंथ है; रश्मिरथी चरित्र का। उर्वशी ज्ञानपीठ 1972 की कृति है, यह खंडकाव्य नहीं।

दृष्टि आधुनिक पुनर्पाठ की है। पौराणिक कथा समता, जाति और कृतज्ञता के प्रश्न बनती है। दिनकर कर्ण-चरित्र का उद्धार नई मानवता की स्थापना कहते हैं। गुप्त के साकेत में उर्मिला विप्रलंभ हैं; यहाँ कर्ण स्वाभिमान है। दोनों खड़ी बोली की लंबी कथाएँ हैं, स्वर अलग हैं। हरिऔध का प्रिय प्रवास विरह-महाकाव्य है; यह वीर-खंड है। हुंकार की कृष्ण की चेतावनी वन-वापसी का गीत है; वह इस कृति का सर्ग नहीं। अश्वसेन सर्प का सहयोग ठुकराना आधुनिक मनुष्यत्व का सूत्र है — मनुज मनुज से लड़े।

सीमा ओज का आधिक्य और द्रौपदी-प्रसंग की गाँठ है। सर्ग-क्रम कथा का चयन है, महाभारत का पूरा पर्व नहीं। दुर्योधन का कपट मैत्री की रोशनी में नरम पड़ सकता है। फिर भी निर्धारित कृति इन्हीं प्रसंगों से पहचानी जाती है — रंगभूमि, शाप, कृष्ण-संवाद, दान, कुंती, शक्ति, पहिया। महत्त्व साहित्यिक, सामाजिक और नैतिक तीन स्तरों पर है — खंडकाव्य का नायकत्व, जाति-पाखंड पर आघात, वचन का भार। पाठक सहानुभूति कर्ण को देता है; यही साधारणीकरण है। अश्वसेन का सहयोग ठुकराना मनुष्यत्व का सूत्र है। गुप्त का साकेत विप्रलंभ है; यह कृति स्वाभिमान का ओज है।

निष्कर्ष यह है कि विशेषताएँ खंडकाव्य, सप्त सर्ग, ओज, वीर-करुण, संवाद और जन्म-कर्म द्वंद्व हैं। रश्मिरथी कर्ण का काव्य है, प्रताप का नहीं; हुंकार का गीत इसका सर्ग नहीं।

24. रश्मिरथी में जन्म और कर्म का द्वंद्व स्पष्ट कीजिए।20 अंक

जन्म और कर्म का द्वंद्व रश्मिरथी का मूल सूत्र है। कृति दिनकर की है, 1952, खंडकाव्य, नायक कर्ण। जन्म सूर्य और कुंती का है; समाज सूत का नाम चिपकाता है। कवच-कुंडल जन्म के चिह्न हैं; पालन अधिरथ-राधा का कर्म है। कुंती-त्याग जन्म की घटना है; कर्ण का धनुष कर्म है। नाम रश्मिरथी वंश का प्रकाश और कर्म का रथ दोनों बाँधता है। कवि जन्म को काटते नहीं; उसे कर्म से तौलते हैं। यह हल्दीघाटी का स्वाधीनता-द्वंद्व नहीं। यहाँ प्रश्न जाति और प्रतिभा का है, घाटी और केसरिया का नहीं।

रंगभूमि पर द्वंद्व सार्वजनिक होता है। अर्जुन का कौशल स्वीकृत है क्योंकि कुल ज्ञात है। कर्ण का कौशल संदिग्ध है क्योंकि जाति अज्ञात है। कृपाचार्य जन्म पूछते हैं। कर्ण भुजदंड को जाति कहता है। दुर्योधन कर्म-सम्मान देता है — अंग का राज्य। मैत्री इसी तराजू से बँधती है। द्रोण सूत को शिष्य नहीं लेते — जन्म का द्वार बंद। परशुराम के आश्रम में कर्ण परिचय छिपाता है — यह असत्य कर्म, जन्म-व्यवस्था के सामने। शाप वही जन्म-दंड बनकर अंतिम युद्ध में विद्या छीनता है।

कृष्ण जन्म का रहस्य खोलते हैं — ज्येष्ठ पांडव, राज और सम्मान। कर्ण कर्म का पक्ष चुनता है — मित्र का वचन। कुंती जन्म लौटाती है; कर्ण कर्म नहीं तोड़ता, केवल अर्जुन छोड़ भाइयों की रक्षा का वचन देता है। दान जन्म की ढाल उतारता है। कवच-कुंडल जन्म-रक्षा थे; देना कर्म है। इंद्र याचक बनकर आते हैं; कर्ण जानकर भी देता है। घटोत्कच पर शक्ति चलाना भी कर्म है — दान का दूसरा रूप अस्त्र का खर्च। पहिए का धँसना नियति भी है, शाप का कर्म-फल भी। निःशस्त्र वध जन्म के सूर्यपुत्र को नहीं बचाता; आचरण की प्रभा बचाता है।

दिनकर मूल्यांकन वंश से नहीं, आचरण से चाहते हैं। कर्ण-चरित्र का उद्धार वे नई मानवता की स्थापना कहते हैं। सीमाएँ साथ हैं — परिचय छिपाना, द्रौपदी-प्रसंग का मौन। नायक देवता नहीं, मनुष्य है। रस वीर प्रधान है; करुण अपमान पर है। भाषा खड़ी बोली, गुण ओज, शैली संवाद। सात सर्ग इसी द्वंद्व को बाँधते हैं — रंगभूमि से पहिया तक। हुंकार की कृष्ण-चेतावनी इस द्वंद्व का सर्ग नहीं। गुप्त की कैकेयी लोभ का पश्चात्ताप है; कर्ण अपमान का स्वाभिमान है। दोनों खड़ी बोली हैं, प्रश्न अलग हैं। साधारणीकरण सभा के अपमान को सामान्य अन्याय बनाता है। बिना दान और मैत्री के कर्म-पक्ष अधूरा रह जाता है। भाषा खड़ी बोली का ओज इस द्वंद्व को सार्वजनिक बनाता है।

निष्कर्ष यह है कि जन्म अपमान और रहस्य देता है, कर्म दान-मैत्री-प्रण देता है। रश्मिरथी कर्म को जन्म से बड़ा ठहराती है। नायक कर्ण हैं, प्रताप नहीं।

25. रश्मिरथी के रंगभूमि-प्रसंग की व्याख्या कीजिए।8 अंक

व्याख्या रश्मिरथी के प्रथम सर्ग की है। कवि रामधारी सिंह दिनकर, प्रकाशन 1952, खंडकाव्य। प्रसंग हस्तिनापुर की शस्त्र-रंगभूमि है, प्रेमचंद का उपन्यास नहीं। अर्जुन का प्रदर्शन चलता है। कर्ण चुनौती देता है। कृपाचार्य कुल पूछते हैं। अन्वय यह है — जाति रटने वालों के पास पाखंड है; भुजा ही कर्ण की जाति है। आलंबन कर्ण हैं। उद्दीपन सभा, अर्जुन की प्रशंसा और जाति-प्रश्न हैं। रस वीर है; करुण अपमान से चिपकता है। भाषा खड़ी बोली, गुण ओज, शैली संवाद है। दुर्योधन अंग का राज्य देकर मित्र बनता है। सार घटना सुनाता है; व्याख्या अन्वय, रस और आलंबन बाँधती है।

भाव जन्म बनाम कर्म का सार्वजनिक निर्णय है। व्यवस्था प्रतिभा नहीं, वंश नापती है। मैत्री का मूल यही क्षण है। द्वितीय सर्ग का शाप और तृतीय सर्ग का कृष्ण-संवाद इसी अपमान की जड़ से उगते हैं। यह हुंकार की कृष्ण-चेतावनी नहीं। हल्दीघाटी का युद्ध-सर्ग भी नहीं।

निष्कर्ष यह है कि व्याख्या का केंद्र जाति-प्रश्न, भुजदंड और अंगराज-मैत्री है; सर्ग प्रथम है, उपन्यास रंगभूमि नहीं।

26. भारतेंदु की निर्धारित कविताओं का परिचय दीजिए।8 अंक

भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 1850, निधन 1885, स्थान काशी। आधुनिक हिन्दी के सीमा-पुरुष हैं। निर्धारित दो पाठ हैं — निज भाषा उन्नति अहै और चूरन अमल वेद का भारी। पहला पाठ भाषा-आग्रह है। पहचान-सूत्र है — निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल; बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल। भाषा ब्रज है, विषय आधुनिक है। आलंबन निज भाषा है। रस वीर-जागरण है। पत्र कविवचनसुधा उसी आग्रह को गद्य में चलाते हैं। नाटक भारत दुर्दशा सार्वजनिक करुण का गद्य-प्रमाण है।

चूरन अमल वेद का भारी पाखंड-व्यंग्य है। शास्त्र को बाजार का चूर्ण बनाकर बेचना कवि का लक्ष्य है। रूप होली-मुकरी और सार्वजनिक गीत का है। रस हास्य-व्यंग्य है। आलंबन पाखंडी पुरोहित-वैद्य हैं। दोनों पाठ एक कवि के दो हाथ हैं — गौरव और व्यंग्य। अंधेर नगरी गद्य में वही व्यंग्य चलाती है। रीतिकाल नायिका-शृंगार बेचता था; भारतेंदु भाषा और पाखंड पर बोलते हैं। गुप्त और हरिऔध बाद में खड़ी बोली महाकाव्य देते हैं; ये दो पाठ अभी ब्रज के सार्वजनिक गीत हैं।

निष्कर्ष यह है कि निर्धारित कविताएँ निज भाषा और चूरन हैं; पहचान भाषा-गौरव और पाखंड-व्यंग्य से है।

27. निज भाषा उन्नति अहै की व्याख्या कीजिए।8 अंक

प्रसंग भारतेंदु हरिश्चंद्र का निर्धारित पाठ है। कवि काशी के हैं, 1850–1885। पहचान की पहली पंक्ति है — निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। अन्वय यह है — अपनी भाषा की उन्नति सब उन्नति का मूल है; बिना उसके ज्ञान के हृदय का सूल नहीं मिटता। आलंबन निज भाषा है। उद्दीपन पराधीनता, अंग्रेज़ी शिक्षा और विदेशी ज्ञान का दबाव हैं। रस वीर-जागरण और करुण मिला है। भाषा ब्रज है। रूप दोहा-गीत है। यह रीतिकालीन नायिका-शृंगार नहीं, सार्वजनिक दावा है। चूरन अमल वेद का भारी दूसरा निर्धारित पाठ है — व्यंग्य; यह पद गौरव है।

भाव यह है कि देश की उन्नति भाषा से जड़ पकड़ती है। खड़ी बोली गद्य उसी दावे को आगे बढ़ाता है; यह कविता अभी ब्रज में है। शुक्ल भारतेंदु को आधुनिक हिन्दी का केंद्र-पुरुष कहते हैं। पत्र कविवचनसुधा गद्य में वही आग्रह चलाते हैं। द्विवेदी युग कविता को खड़ी बोली देता है; बीज यहीं पड़ता है।

निष्कर्ष यह है कि व्याख्या का केंद्र निज भाषा, मूल-उन्नति और हृदय का सूल है।

28. चूरन अमल वेद का भारी की व्याख्या कीजिए।8 अंक

प्रसंग भारतेंदु हरिश्चंद्र का दूसरा निर्धारित पाठ है। कवि काशी, 1850–1885। चूरन बाजार का चूर्ण है, अमल स्वाद या नशा, वेद शास्त्र का भार। अन्वय यह है — पाखंडी पुरोहित-वैद्य वेद को चूरन बनाकर बेचते हैं। आलंबन पाखंड है। उद्दीपन बाजार, जड़ी-बूटी और शास्त्र-नाम हैं। रस हास्य-व्यंग्य है; करुण समाज की ठगी से चिपकता है। रूप होली-मुकरी और सार्वजनिक गीत है, महाकाव्य नहीं। यह नास्तिकता नहीं; शास्त्र की दुकानदारी का खंडन है। निज भाषा उन्नति अहै ज्ञान माँगती है; यह पद अज्ञान बेचता दिखाता है।

भाव सुधार का है। रीतिकाल शृंगार बेचता था; भारतेंदु पाखंड दिखाते हैं। नाटक अंधेर नगरी गद्य में वही ठगी है। पत्र कविवचनसुधा सुधार का गद्य चलाते हैं; यह गीत उसी सुधार का काव्य है। आलंबन व्यक्ति नहीं, ठगी की रीति है। सहृदय हँसकर भी ठगी पहचानता है — यही साधारणीकरण है। व्याख्या में प्रसंग भारतेंदु युग, अन्वय चूरन-व्यापार, सौंदर्य व्यंग्य लिखे जाते हैं। गुप्त का आदर्श और हरिऔध का विरह यहाँ नहीं; व्यंग्य का हाथ यही पाठ है।

निष्कर्ष यह है कि व्याख्या का केंद्र वेद-चूरन, व्यंग्य और सामाजिक ठगी है।

29. मैथिलीशरण गुप्त का साहित्यिक परिचय दीजिए।8 अंक

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886, चिरगाँव, झाँसी। निधन 12 दिसंबर 1964। उन्हें राष्ट्रकवि कहा जाता है। भारत-भारती 1912 जागरण और अतीत-गौरव का घोष है। साकेत 1931 राम-कथा का आधुनिक महाकाव्य है; उर्मिला-प्रसंग उसकी नई दृष्टि है। यशोधरा 1932 बुद्ध-गृहत्याग का खंडकाव्य है। जयद्रथ वध और पंचवटी अन्य कृतियाँ हैं। भाषा खड़ी बोली है। प्रवृत्ति इतिवृत्त, आदर्श और नैतिक करुण है। सरस्वती-युग के अनुशासन में वाक्य स्थिर है। छायावाद का रहस्य उनका मार्ग नहीं। द्विवेदी युग के वे प्रतिनिधि कवि हैं। हरिऔध विरह-महाकाव्य देते हैं; गुप्त आदर्श और नारी-प्रश्न देते हैं।

निर्धारित पाठ तीन हैं — कैकेयी परिताप साकेत से, सखि वे मुझसे कहकर जाते यशोधरा से, दोनों ओर प्रेम पलता है मुक्तक। नारी पश्चात्ताप और प्रश्न की वाचक है, केवल माता-सती प्रतिमा नहीं। यशोधरा साकेत नहीं; कथा बुद्ध-गृहत्याग की है। सीमा उपदेश का बोझ है। गुण पौराणिक स्त्री को आधुनिक सहानुभूति देना है।

निष्कर्ष यह है कि गुप्त 1886–1964, चिरगाँव, राष्ट्रकवि हैं; पहचान भारत-भारती, साकेत, यशोधरा और खड़ी बोली आदर्श से है।

30. कैकेयी परिताप का भाव लिखिए।8 अंक

कैकेयी परिताप मैथिलीशरण गुप्त के साकेत का निर्धारित प्रसंग है। प्रकाशन 1931। गुप्त चिरगाँव के राष्ट्रकवि हैं। दो वर मिल चुके। राम वन गए। दशरथ नहीं रहे। भरत राज नहीं लेते। कैकेयी को अपना कर्म दिखाई देता है। परिताप पश्चात्ताप है, सफाई नहीं। आलंबन कैकेयी हैं। उद्दीपन रिक्त सिंहासन, राम का वन और भरत का त्याग हैं। रस करुण है; आत्मग्लानि छूती है। गुप्त कैकेयी को केवल षड्यंत्रिणी नहीं छोड़ते; वाचक बनाते हैं। यह यशोधरा का पद नहीं। सखि वे मुझसे कहकर जाते बुद्ध-गृहत्याग की पत्नी का प्रश्न है; कथा अलग है।

भाव यह है कि राज्य-लोभ कुटुंब तोड़ता है; ज्ञान देर से आता है। राम मर्यादा हैं; कैकेयी उस मर्यादा की तोड़। फिर भी कवि दंड के साथ करुण रखते हैं। साधारणीकरण लोभ के सामान्य फल से होता है। दोनों ओर प्रेम पलता है उभय-पक्ष का मुक्तक है; यहाँ प्रेम टूटता है। भाषा खड़ी बोली, शैली आत्मालाप के निकट है।

निष्कर्ष यह है कि कैकेयी परिताप साकेत का करुण पश्चात्ताप है; केंद्र दो वर और आत्मग्लानि हैं।

31. सखि वे मुझसे कहकर जाते का विवेचन कीजिए।20 अंक

सखि वे मुझसे कहकर जाते मैथिलीशरण गुप्त की यशोधरा का निर्धारित पद है। प्रकाशन 1932। गुप्त का जन्म 1886 चिरगाँव, निधन 1964; राष्ट्रकवि। भारत-भारती जागरण का घोष है; साकेत 1931 राम-कथा का महाकाव्य है; यह पद साकेत का नहीं। यशोधरा बुद्ध-गृहत्याग का खंडकाव्य है। सिद्धार्थ रात्रि में गृह त्यागते हैं। यशोधरा सखी से बोलती है। अन्वय यह है — वे मुझसे कहकर जाते; क्या मैं उनकी पथ-बाधा हूँ? प्रश्न स्वाभिमान का है, केवल विलाप का नहीं। आलंबन यशोधरा हैं। उद्दीपन रात्रि-त्याग, पुत्र राहुल और मौन पति हैं। रस करुण और वात्सल्य मिला है। भाषा खड़ी बोली, शैली संबोधन-गीत, छंद गेय है।

गुप्त बुद्ध को महापुरुष रखते हैं; यशोधरा को चुप नायिका नहीं रखते। वेदना वाचक की है। स्त्री यहाँ आलंबन भर नहीं, प्रश्न करने वाली पत्नी है। द्विवेदी युग की माता-सती प्रतिमा से यह पद आगे है। सीमा आदर्श का दबाव है; विद्रोह समकालीन स्त्री-कविता जितना तेज नहीं। फिर भी वाचक-अधिकार आधुनिक सहानुभूति है। कैकेयी परिताप साकेत का पश्चात्ताप है — दो वर, राम का वन, आत्मग्लानि। दोनों ओर प्रेम पलता है स्वतंत्र मुक्तक है — दीप और पतंग उभय-पक्ष प्रेम के बिंब हैं। तीनों गुप्त के निर्धारित पाठ हैं, कथा एक नहीं। यशोधरा को साकेत कहना अधूरा उत्तर है। भारत-भारती जागरण का घोष है; यशोधरा गृह की पीड़ा है।

तुलना हरिऔध से यह है कि प्रिय प्रवास गोपी-विरह है, आराध्य कृष्ण हैं, रस विप्रलंभ-शृंगार है। यहाँ आराध्य बुद्ध-मार्ग है, श्रोता सखी है, वाचक यशोधरा है, रस करुण प्रधान है। सोहनलाल द्विवेदी मन को जगाते हैं; गुप्त स्त्री को बोलने देते हैं। महादेवी का प्रिय आता नहीं; यशोधरा का पति बिना कहे चला जाता है। प्रसाद की कमला रूप से लड़ती है; यशोधरा प्रश्न से आत्मसम्मान माँगती है। साधारणीकरण गृहत्याग की कीमत से होता है — वेदना निजी रहकर भी सामान्य स्त्री-अनुभव बन जाती है। व्याख्या में कवि गुप्त, कृति यशोधरा, रस करुण और पथ-बाधा का प्रश्न नाम सहित आते हैं।

द्विवेदी युग का अनुशासन वाक्य स्थिर रखता है। सरस्वती का प्रभाव खड़ी बोली पर है। छायावाद का रहस्य यहाँ नहीं। इतिवृत्त कथा देता है; पद उसे गीत बनाता है। उर्मिला साकेत में लक्ष्मण-वियोग है; यह पद वह नहीं। दोनों नारी-वेदना हैं, कथा अलग है। बिना कृति-नाम के उत्तर अधूरा रह जाता है। स्त्री विमर्श का वाचक-प्रश्न यहीं टिक सकता है। सीमा उपदेश का बोझ है; गुण पौराणिक स्त्री को आधुनिक कंठ देना है।

निष्कर्ष यह है कि सखि वे मुझसे कहकर जाते यशोधरा का पद है; केंद्र गृहत्याग, सखी-संबोधन और पथ-बाधा का प्रश्न है। साकेत का कैकेयी-परिताप यह पाठ नहीं।

32. प्रिय प्रवास के निर्धारित अंशों का परिचय दीजिए।20 अंक

अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का जन्म 1865, निधन 1947। प्रिय प्रवास खड़ी बोली का प्रथम बड़ा सफल महाकाव्य माना जाता है। प्रकाशन 1914 के आसपास कहा जाता है। कथा कृष्ण का गोकुल छोड़ मथुरा जाना है — प्रिय का प्रवास। आलंबन कृष्ण, यशोदा, गोपी, नंद हैं। रस विप्रलंभ-शृंगार और वात्सल्य हैं। भाषा संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली है। छंद पर संस्कृत-वृत्तों का प्रभाव है। सूर ब्रज पद में वही विरह गाते हैं; हरिऔध उसे महाकाव्य का विस्तार देते हैं। द्विवेदी युग का भाषा-कार्य यहीं कविता के विस्तार तक सिद्ध होता है। निर्धारित पूरे ग्रंथ नहीं, तीन अंश हैं — दिवस का अवसान, दुखिया के आँसू, एक बूँद। साकेत राम-कथा है; यह कृष्ण-विरह है। यशोधरा बुद्ध-गृहत्याग है; यह गोपी-यशोदा की पीड़ा है। तीनों खड़ी बोली की लंबी कथा के अलग सूत्र हैं।

दिवस का अवसान संध्या का चित्र है। पहचान की पंक्ति है — दिवस का अवसान समीप था। गगन लोहित होता है, दिन ढलता है। प्रसंग गोकुल की वह संध्या है जब प्रिय-प्रवास निकट है या विरह का समय घिरता है। आलंबन प्रकृति और ब्रज-जीवन हैं। उद्दीपन लोहित गगन, तरु-शिखा, कमलिनी हैं। रस शांत से विप्रलंभ की ओर मुड़ता है। खड़ी बोली में इतना सघन संध्या-चित्र द्विवेदी युग की उपलब्धि है। पंत बाद में चाँदनी का मौन चित्र देंगे; हरिऔध पहले संध्या को महाकाव्य का द्वार बनाते हैं।

दुखिया के आँसू विरह का जल है — यशोदा या गोपी की पीड़ा। आलंबन दुखिया हैं; उद्दीपन प्रिय का अभाव है। रस करुण और विप्रलंभ हैं। एक बूँद शेष बिंदु है — पूरी नदी नहीं, एक आँसू में विरह सिमटता है। तीन अंश तीन क्षण हैं — संध्या, अश्रु, बिंदु। व्याख्या में कवि हरिऔध, ग्रंथ प्रिय प्रवास, रस विप्रलंभ नाम सहित आते हैं। सूर का भ्रमरगीत निर्गुण-खंडन है; ये अंश सगुण विरह का खड़ी बोली रूप हैं। भारतेंदु व्यंग्य गाते हैं; हरिऔध विरह गाते हैं। गुप्त कैकेयी और यशोधरा को वाचक बनाते हैं; हरिऔध गोपी-यशोदा को विरह का आलंबन बनाते हैं।

सीमा क्लिष्ट समास और इतिवृत्त का बोझ है। गुण यह है कि खड़ी बोली केवल निबंध नहीं रहती, महाकाव्य बनती है। रश्मिरथी कर्ण का खंड है, विरह-महाकाव्य नहीं; नायक और रस अलग हैं। हल्दीघाटी प्रताप का वीर-सर्ग है; यह कृष्ण-प्रवास है। सोहनलाल खादी-गीत गाते हैं; हरिऔध संध्या और अश्रु गाते हैं। रूप महाकाव्य-अंश है, मुक्तक नहीं। आचार्य शुक्ल गद्य-अनुशासन को इसी युग से जोड़ते हैं; प्रिय प्रवास उसी अनुशासन की काव्य-परीक्षा है। बिना तीन शीर्षकों के उत्तर अधूरा रह जाता है।

निष्कर्ष यह है कि निर्धारित अंश दिवस का अवसान, दुखिया के आँसू और एक बूँद हैं। केंद्र कृष्ण-प्रवास और खड़ी बोली विरह है। कवि हरिऔध हैं, गुप्त नहीं; ग्रंथ प्रिय प्रवास है, साकेत नहीं।

33. सोहनलाल द्विवेदी की निर्धारित कविताओं का प्रतिपाद्य लिखिए।8 अंक

सोहनलाल द्विवेदी का जन्म 1906, निधन 1988। वे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी नहीं हैं; सरस्वती के संपादक नहीं, गाँधी-युग के राष्ट्रीय गीतकार हैं। संग्रहों में युगावतार गाँधी याद किया जाता है। निर्धारित तीन पाठ सरल गीत हैं — रे मन, खादी गीत, वंदना। रे मन चित्त को संबोधित करता है — हिम्मत, जागरण, अस्त से विहान। आलंबन मन है। रस वीर-जागरण है। शैली संबोधन की है। तुलसी मन को बावरा कहते हैं; सोहनलाल मन को राष्ट्र-कर्तव्य कहते हैं। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली है।

खादी गीत स्वदेशी का गीत है। खादी नंगों-भुखों की आस और आहत आह का चिह्न है। आलंबन खादी है। उद्दीपन चरखा, गाँव, विदेशी वस्त्र हैं। वंदना नमन का गीत है — राष्ट्र या महापुरुष के प्रति। तीनों पाठ ओज के सरल रूप हैं, रश्मिरथी के संवाद-ओज नहीं। पांडे हल्दीघाटी में युद्ध गाते हैं; सोहनलाल खादी और मन गाते हैं। भारतेंदु व्यंग्य रखते हैं; ये गीत नमन रखते हैं।

निष्कर्ष यह है कि प्रतिपाद्य जागरण, स्वदेशी-खादी और वंदना हैं; कवि सोहनलाल द्विवेदी हैं, महावीर प्रसाद नहीं।

34. हल्दीघाटी के दूसरे सर्ग का विवेचन कीजिए।20 अंक

श्यामनारायण पांडे का जन्म 1907, निधन 1991। अन्य कृतियाँ जौहर और तुमुल याद की जाती हैं। हल्दीघाटी महाराणा प्रताप का खंडकाव्य है। ऐतिहासिक लड़ाई 18 जून 1576 के आसपास है — प्रताप बनाम मानसिंह, अकबर की सेना। स्थान मेवाड़ की हल्दीघाटी। निर्धारित दूसरा सर्ग है, पूरा ग्रंथ नहीं। नायक प्रताप हैं। सहयोगी घोड़ा चेतक कथा का प्राण है। रस वीर प्रधान है; करुण चेतक और घायल मेवाड़ पर सहायक है। भाषा खड़ी बोली, गुण ओज, शैली वर्णनात्मक है। यह रश्मिरथी नहीं। रश्मिरथी कर्ण और जन्म-कर्म का खंड है; नायक सूर्यपुत्र हैं, स्रोत महाभारत है। हल्दीघाटी स्वाधीनता और मैदान का खंड है; नायक प्रताप हैं, स्रोत मेवाड़ का युद्ध है। दोनों खंडकाव्य हैं, कथा एक नहीं।

दूसरा सर्ग युद्ध का सर्ग है। प्रताप सुनते हैं, सेना सजती है, घाटी संकरी है। मानसिंह मुगल-पक्ष हैं। बाण, घोड़े, केसरिया वस्त्र, नगाड़ा — उद्दीपन वीर रस के हैं। आलंबन प्रताप और मेवाड़-सेना हैं। चेतक युद्ध में साथ है। ओज वाक्य को गति देता है। करुण पीछे से आता है — क्षय, घाव, अस्त-घोड़ा। कवि इतिहास दोहराते नहीं; स्वाभिमान को काव्य का स्थायी भाव बनाते हैं। व्याख्या में सर्ग-नाम, कवि पांडे, रस वीर और प्रताप लिखे जाते हैं। सर्ग का कार्य युद्ध का आरंभ, प्रताप का श्रवण और सेना का सन्नद्ध होना है।

भारतेंदु व्यंग्य गाते हैं; पांडे युद्ध गाते हैं। गुप्त नारी का परिताप रखते हैं; पांडे वीर का ओज रखते हैं। सोहनलाल खादी और वंदना सरल गीत में गाते हैं; पांडे युद्ध के विस्तार से गाते हैं। प्रसाद की पेशोला की प्रतिध्वनि भी मेवाड़ है, पर वह झील पर युद्ध के बाद की खामोशी है — पिछोला की गूँज, पेशवा नहीं। पांडे उसी मेवाड़ को मैदान पर गाते हैं। दिनकर का कर्ण दान और मैत्री से नायक है; प्रताप घाटी और स्वाभिमान से नायक है। दोनों ओज हैं, प्रश्न अलग हैं। मिलाकर एक उत्तर लिखना अधूरा है।

सीमा इतिहास का चयन और प्रशस्ति का आधिक्य है। गुण राष्ट्रीय स्मृति को हिन्दी खंडकाव्य में स्थिर करना है। रूप खंड-सर्ग है, महाकाव्य-पूर्ण नहीं। आलंबन प्रताप हैं; उद्दीपन घाटी, सेना और नगाड़ा हैं। साधारणीकरण स्वाभिमान को सामान्य वीर-अनुभव बनाता है। जौहर और तुमुल अन्य कृतियाँ हैं; परीक्षा का केंद्र हल्दीघाटी का दूसरा सर्ग है। हुंकार की कृष्ण की चेतावनी इस सर्ग का अंग नहीं। कैकेयी परिताप और यशोधरा नारी-स्वर हैं; यह पुरुष-वीर का स्वर है।

निष्कर्ष यह है कि दूसरा सर्ग प्रताप, मानसिंह, चेतक और वीर रस से पहचाना जाता है। कवि श्यामनारायण पांडे हैं। यह रश्मिरथी का रंगभूमि-सर्ग नहीं।

35. दोनों ओर प्रेम पलता है की व्याख्या कीजिए।8 अंक

प्रसंग मैथिलीशरण गुप्त का निर्धारित मुक्तक है। गुप्त चिरगाँव, 1886–1964, राष्ट्रकवि। अन्वय यह है — प्रेम उभय-पक्ष पलता है; एक ओर नहीं। दीपक जलता है, पतंग भी जलता है — दोनों आहुति देते हैं। आलंबन प्रेम के दो छोर हैं। उद्दीपन दीप-पतंग का चित्र है। रस विप्रलंभ-शृंगार और शांत मिला है। बिंब इंद्रिय-चित्र है, छायावाद का रहस्य-प्रतीक नहीं। भाषा खड़ी बोली है। रूप स्वतंत्र मुक्तक है, साकेत का सर्ग नहीं, यशोधरा का पद नहीं। कैकेयी परिताप में प्रेम टूटता है। सखि वे मुझसे कहकर जाते में एक पक्ष मौन त्याग करता है। यह पद दोनों पाठों से अलग उभय-उत्तर माँगता है।

भाव पारस्परिक धर्म है, एकपक्षीय भक्ति नहीं। हरिऔध का प्रिय प्रवास विरह-महाकाव्य है; यह लक्षण-मुक्तक है। व्याख्या में अन्वय उभय-पक्ष, उदाहरण दीप-पतंग, कवि गुप्त लिखे जाते हैं। द्विवेदी युग का आदर्श प्रेम को व्यापार नहीं, त्याग का दो तरफा कर्म बनाता है। कवि गुप्त हैं, हरिऔध नहीं।

निष्कर्ष यह है कि व्याख्या का केंद्र उभय-पक्ष प्रेम और दीप-पतंग है; कृति मुक्तक है, साकेत नहीं।

36. भारतेंदु, गुप्त और हरिऔध के निर्धारित पाठों का साम्य-वैषम्य लिखिए।20 अंक

तीन कवि आधुनिक काव्य के सार्वजनिक स्वर हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र 1850–1885, काशी, सीमा-पुरुष। निर्धारित पाठ निज भाषा उन्नति अहै और चूरन अमल वेद का भारी। पहचान-सूत्र है — निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल; बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल। चूरन पाखंड-व्यंग्य है। नाटक भारत दुर्दशा और अंधेर नगरी गद्य-प्रमाण हैं। मैथिलीशरण गुप्त 1886–1964, चिरगाँव, राष्ट्रकवि। निर्धारित पाठ कैकेयी परिताप साकेत से, सखि वे मुझसे कहकर जाते यशोधरा से, दोनों ओर प्रेम पलता है मुक्तक। अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ 1865–1947। निर्धारित पाठ प्रिय प्रवास के दिवस का अवसान, दुखिया के आँसू, एक बूँद। साम्य देश-समाज का विषय और रीतिकालीन नायिका-केंद्र का त्याग है। तीनों आधुनिक सार्वजनिक कविता गाते हैं, दरबारी शृंगार नहीं।

वैषम्य भाषा पर है। भारतेंदु कविता में ब्रज रखते हैं, गद्य में खड़ी बोली। गुप्त और हरिऔध कविता में खड़ी बोली रखते हैं। हरिऔध की खड़ी बोली संस्कृत-गर्भित है; गुप्त की अपेक्षाकृत सरल और आदर्श-प्रधान है। रूप पर वैषम्य है। भारतेंदु गीत, मुकरी, होली और व्यंग्य हैं। गुप्त महाकाव्य-खंड और मुक्तक हैं। हरिऔध महाकाव्य-अंश हैं। रस पर वैषम्य है — भारतेंदु में वीर-जागरण और हास्य-व्यंग्य, गुप्त में करुण-पश्चात्ताप और प्रश्न, हरिऔध में विप्रलंभ-वात्सल्य। आलंबन अलग हैं — निज भाषा और पाखंड, कैकेयी-यशोधरा-उभय प्रेम, संध्या-अश्रु-बिंदु।

नारी-चित्र अलग है। भारतेंदु सुधार की दृष्टि रखते हैं, वाचक प्रायः पुरुष नवजागरण का है। गुप्त कैकेयी और यशोधरा को वाचक बनाते हैं। कैकेयी साकेत की है, यशोधरा यशोधरा की — कथा मिलाई नहीं जाती। हरिऔध गोपी-यशोदा को विरह का आलंबन बनाते हैं, वाचक कम। दीप-पतंग गुप्त के मुक्तक में उभय-पक्ष प्रेम है; हरिऔध का एक बूँद एक पक्ष की पीड़ा सघन करता है। सोहनलाल द्विवेदी इन तीन में नहीं; वे खादी-गीत के कवि हैं। पांडे हल्दीघाटी के कवि हैं; वीर-सर्ग यहाँ तुलना का चौथा नहीं, अलग निर्धारित पाठ है।

युग-स्थान भी अलग है। भारतेंदु नवजागरण के प्रथम उत्थान हैं। गुप्त और हरिऔध द्विवेदी युग के प्रतिनिधि हैं। सरस्वती का अनुशासन गुप्त-हरिऔध पर अधिक है। शुक्ल भारतेंदु को केंद्र-पुरुष कहते हैं; द्विवेदी युग को गद्य का उत्कर्ष भी। सीमाएँ ब्रज-अवशेष, उपदेश और क्लिष्ट समास हैं। गुण सार्वजनिक विषय, खड़ी बोली की ओर बढ़ना और नारी-करुण का नया द्वार हैं। तीनों निर्धारित शीर्षक बिना युग-नाम अधूरा उत्तर है। निज भाषा ज्ञान माँगती है; चूरन अज्ञान बेचता है — भारतेंदु के दो हाथ यहीं पूरे होते हैं।

निष्कर्ष यह है कि साम्य सार्वजनिक विषय पर है, वैषम्य ब्रज बनाम खड़ी बोली, व्यंग्य बनाम करुण बनाम विरह, गीत बनाम महाकाव्य-अंश पर है। यशोधरा साकेत नहीं; प्रिय प्रवास राम-कथा नहीं।

37. श्यामनारायण पांडे का परिचय देते हुए हल्दीघाटी का महत्त्व लिखिए।20 अंक

श्यामनारायण पांडे का जन्म 1907, निधन 1991। वे राष्ट्रीय ओज और ऐतिहासिक स्मृति के कवि हैं। अन्य कृतियाँ जौहर और तुमुल हैं। हल्दीघाटी महाराणा प्रताप का खंडकाव्य है। घटना 18 जून 1576 के आसपास, मेवाड़, प्रताप बनाम मानसिंह। निर्धारित दूसरा सर्ग है, पूरा ग्रंथ नहीं। नायक प्रताप, सहयोगी चेतक। रस वीर, गुण ओज, भाषा खड़ी बोली, शैली वर्णनात्मक। आलंबन प्रताप और मेवाड़-सेना हैं। उद्दीपन बाण, घोड़े, केसरिया, नगाड़ा और संकरी घाटी हैं। करुण घाव और चेतक पर सहायक है। वे महावीर प्रसाद द्विवेदी नहीं, सोहनलाल द्विवेदी भी नहीं। सोहनलाल खादी-गीत गाते हैं; पांडे युद्ध गाते हैं।

महत्त्व ऐतिहासिक स्मृति को काव्य देना है। प्रताप स्वाभिमान का आलंबन बनता है। चेतक युद्ध के प्राण का बिंब है। राष्ट्रीय गीत सोहनलाल सरलता से गाते हैं; पांडे युद्ध के विस्तार से गाते हैं। भारतेंदु व्यंग्य से जगाते हैं; पांडे ओज से जगाते हैं। गुप्त नारी का परिताप रखते हैं; पांडे पुरुष-वीर रखते हैं। हरिऔध विरह रखते हैं; पांडे मैदान रखते हैं। प्रसाद की पेशोला की प्रतिध्वनि मेवाड़ की खामोशी है — पिछोला झील, पेशवा नहीं। पांडे उसी मेवाड़ को हल्दीघाटी के दूसरे सर्ग में लड़ाई बनाते हैं। दोनों मेवाड़ हैं, रूप अलग है — प्रगीत-गूँज और वीर-सर्ग।

रश्मिरथी से अंतर नायक और प्रश्न का है। दिनकर 1908–1974, सिमरिया; रश्मिरथी 1952, कर्ण, जन्म-कर्म और मैत्री। पांडे प्रताप, घाटी और स्वाधीनता। दोनों खंडकाव्य हैं, ओज दोनों में है। स्रोत महाभारत बनाम 1576 का युद्ध। रंगभूमि जाति-प्रश्न है; दूसरा सर्ग सेना-सज्जा और श्रवण है। मिलाकर एक कथा लिखना अधूरा उत्तर है। हुंकार की कृष्ण की चेतावनी न इस सर्ग का अंग है, न रश्मिरथी का सर्ग। परीक्षा सर्ग-नाम माँगती है — दूसरा सर्ग।

दूसरा सर्ग युद्ध का आरंभ है — प्रताप सुनते हैं, सेना सजती है। व्याख्या सर्ग, वीर रस और प्रताप से होती है। सीमा प्रशस्ति और चयन है। गुण मेवाड़ की स्मृति को हिन्दी खंडकाव्य में स्थिर करना है। साधारणीकरण स्वाभिमान को सामान्य वीर-अनुभव बनाता है। रूप खंड-सर्ग है, महाकाव्य-पूर्ण नहीं। जौहर स्त्री-अग्नि की स्मृति की ओर जाता है; निर्धारित पाठ वह नहीं। तुमुल अन्य स्वर है। उत्तर में कवि-परिचय और सर्ग-महत्त्व दोनों चाहिए; केवल जन्म-वर्ष अधूरा है, केवल युद्ध-नाम भी अधूरा है। दूसरा सर्ग प्रताप के श्रवण से सेना की सज्जा तक वीर रस को स्थिर करता है। चेतक बिना नाम के उत्तर अधूरा रह जाता है। मेवाड़ की स्मृति हिन्दी खंडकाव्य की भूमि यहीं पाती है।

निष्कर्ष यह है कि पांडे 1907–1991 के वीर कवि हैं। हल्दीघाटी का महत्त्व प्रताप, चेतक, दूसरा सर्ग और राष्ट्रीय ओज से है। यह रश्मिरथी का कर्ण-काव्य नहीं।

38. जयशंकर प्रसाद का साहित्यिक परिचय दीजिए।8 अंक

जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1889, काशी। निधन 15 जनवरी 1937, काशी। छायावाद के चार स्तंभों में संस्कृति-कवि हैं। काव्य-संग्रह कानन कुसुम, झरना, आँसू, लहर। महाकाव्य कामायनी 1936 शिखर-ग्रंथ है, निर्धारित अंश नहीं। नाटक स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी। कहानी आकाशदीप याद की जाती है। भाषा खड़ी बोली, संस्कृत-गर्भित। गुण प्रसाद और माधुर्य। रस शांत, करुण, वीर और शृंगार के सूक्ष्म रूप। आँसू वैयक्तिक वियोग है। लहर प्रगीत और नाट्य-गीत का संग्रह है; निर्धारित तीन पाठ यहीं से हैं — पेशोला की प्रतिध्वनि, बीती विभावरी, प्रलय की छाया।

प्रवृत्ति कल्पना, प्रतीक, ऐतिहासिक स्मृति और नारी का आत्मप्रश्न है। पेशोला पिछोला झील और मेवाड़ की गूँज है, मराठा पेशवा नहीं। बीती विभावरी उषा का जागरण है। प्रलय की छाया कमला की गुजरात-कथा है। निराला स्पर्श रखते हैं, पंत चित्र रखते हैं, महादेवी वेदना रखती हैं; प्रसाद इतिहास को भाव बनाते हैं। सीमा रहस्य और समास का बोझ है।

निष्कर्ष यह है कि प्रसाद 1889–1937, काशी, लहर और कामायनी के कवि हैं; निर्धारित पहचान तीन लहर-पाठों से है।

39. पेशोला की प्रतिध्वनि का भाव लिखिए।8 अंक

पेशोला की प्रतिध्वनि जयशंकर प्रसाद की लहर का निर्धारित प्रगीत है। पेशोला उदयपुर की पिछोला झील है, मराठा पेशवा नहीं। संध्या में अरुण बिंब पश्चिम व्योम पर लटकता है। उर्मियाँ शांत हैं। दुन्दुभि-मृदंग मौन हैं। पुकार यह है — कौन लेगा भार? मेवाड़ में ऊँची छाती कर कौन कहेगा मैं हूँ? आलंबन झील और मेवाड़ की स्मृति हैं। उद्दीपन संध्या, शांत जल और मौन वाद्य हैं। रस वीर और करुण मिला है। गौरव की काया पड़ी है; प्रताप की प्रतिध्वनि कहाँ है — यही प्रश्न कविता का कंकाल है। पहचान अरुण करुण बिम्ब जैसे संध्या-चित्र से होती है; लंबी पंक्ति नहीं उतारी जाती।

भाव यह है कि प्रकृति स्मृति रखती है, वर्तमान उत्तर नहीं देता। श्यामनारायण पांडे हल्दीघाटी में युद्ध गाते हैं; प्रसाद झील पर युद्ध के बाद की खामोशी गाते हैं। दोनों मेवाड़ हैं, रूप अलग है — वीर-सर्ग और प्रगीत-गूँज। बीती विभावरी उषा का आह्वान है; यह संध्या का मौन है।

निष्कर्ष यह है कि पेशोला पिछोला है; भाव मेवाड़ की गूँज और मौन वर्तमान है।

40. बीती विभावरी जाग री की व्याख्या कीजिए।8 अंक

प्रसंग जयशंकर प्रसाद, संग्रह लहर। विभावरी रात्रि है। पहचान की पहली पंक्ति है — बीती विभावरी जाग री। अन्वय यह है — रात्रि बीती, जाग। अंबर पनघट बनता है। ऊषा नागरी तारा-घट डुबोती है। खग-कुल बोलता है। आलंबन उषा और सोई श्रोता हैं। उद्दीपन तारा, अंबर, पक्षी हैं। रस जागरण और शृंगार मिला है। रूप छोटा प्रगीत है, प्रलय की छाया जैसा नाट्य-विस्तार नहीं। प्रतीक निद्रा तोड़ने का है — निजी भी, सार्वजनिक भी। भाषा संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली है। कामायनी यहाँ नहीं खुलती; यह लहर का छोटा आह्वान है।

पेशोला संध्या और मौन है; यह उषा और संबोधन है। महादेवी का प्रिय आता नहीं; यहाँ ऊषा आकर जगाती है। निराला की संध्या सुंदरी अवसान पर उतरती है; प्रसाद की ऊषा जगाती है। प्रलय की छाया कमला की लंबी कथा है; यह छोटा जागरण है। कामायनी श्रद्धा-इड़ा का महाकाव्य है, निर्धारित अंश नहीं। व्याख्या में संग्रह लहर, जाग री, पनघट-ताराघट लिखे जाते हैं। पहचान बिना पहली पंक्ति के अधूरी रहती है।

निष्कर्ष यह है कि व्याख्या का केंद्र जाग री, ऊषा-नागरी और लहर का प्रगीत है।

41. प्रलय की छाया का विवेचन कीजिए।20 अंक

प्रलय की छाया जयशंकर प्रसाद की लहर का लंबा नाट्य-गीत है। प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1889 काशी, निधन 15 जनवरी 1937 काशी। छायावाद के चार स्तंभों में संस्कृति-कवि हैं। काव्य कानन कुसुम, झरना, आँसू, लहर; महाकाव्य कामायनी 1936। निर्धारित पाठ लहर से तीन हैं — पेशोला की प्रतिध्वनि, बीती विभावरी, प्रलय की छाया। कामायनी शिखर-ग्रंथ है, निर्धारित अंश नहीं। वाचक कमला है — गुजरात की रूप-रानी। पति गुर्जरेश हैं। सुलतान के आक्रमण में देश जलता है। पति युद्ध में आगे बढ़ते हैं, कमला बंदी होती है। आलंबन कमला हैं। उद्दीपन पराजय, रूप, लोभ और रक्त-संध्या हैं। रस शृंगार, वीर, करुण और वीभत्स छूते हैं। भाषा संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली है। रूप संवाद और आत्म-कथा है, छोटा प्रगीत नहीं।

कमला पद्मिनी की गाथा से अपनी तुलना करती है — स्वयं जलने से अधिक सुलतान को जलाना चाहती है। रंगमहल सुवर्ण पिंजरा बनता है। बालसखा मानिक मृत्युदंड से बचता है; लोभ और प्रतिशोध आगे काफूर-खुसरो तक मुड़ते हैं। रूप विजय भी है, अभिशाप भी। स्वाभिमान पद्मिनी-मार्ग माँगता है; जीवन-लोभ दूसरी पंक्ति खोलता है। अंत में पुण्य-हीन सौंदर्य प्रलय की छाया में गिरता नक्षत्र है। नारी यहाँ केवल आलंबन नहीं, वाचक है — ग्लानि सहित। स्त्री विमर्श का वाचक-प्रश्न यहीं टिक सकता है।

बीती विभावरी जागरण का छोटा गीत है — बीती विभावरी जाग री; अंबर पनघट, ऊषा नागरी। पेशोला उदयपुर की पिछोला झील है, मराठा पेशवा नहीं; संध्या में मेवाड़ की गूँज और मौन वर्तमान है। तीनों लहर के हैं, दिशा अलग है — मौन गूँज, उषा-आह्वान, पराजित नारी की लंबी कथा। कामायनी श्रद्धा-इड़ा का महाकाव्य है; यह कमला का नाट्य-गीत है। महादेवी वेदना से पहचान बनाती हैं; कमला रूप से लड़ती है। गुप्त की यशोधरा प्रश्न करती है; कमला कथा कहती है। सुभद्रा वात्सल्य गाती हैं; यह पाठ वह नहीं।

सीमा इतिवृत्त और रहस्य का बोझ है। गुण यह है कि स्वाभिमान और जीवन-लोभ एक स्त्री-कंठ से टकराते हैं। पहचान की पंक्तियाँ धूसर क्षितिज और थके दिन की संध्या का भाव खोलती हैं; लंबी पंक्ति नहीं उतारी जाती, प्रसंग लिखा जाता है। पांडे हल्दीघाटी में युद्ध गाते हैं; प्रसाद पराजय के बाद की स्त्री-कथा गाते हैं। दोनों ओज और करुण छूते हैं, नायक अलग हैं। व्याख्या में कमला, गुजरात, सुलतान, पद्मिनी-स्पर्धा और संग्रह लहर लिखे जाते हैं। बिना वाचक-नाम के उत्तर अधूरा रह जाता है।

निष्कर्ष यह है कि प्रलय की छाया लहर की कमला-कथा है। केंद्र गुजरात, सुलतान, पद्मिनी-स्पर्धा और रूप का प्रलय है। यह बीती विभावरी का छोटा जागरण नहीं, कामायनी का सर्ग भी नहीं।

42. निराला का साहित्यिक परिचय दीजिए।8 अंक

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म 21 फरवरी 1896, महिषादल-मेदिनीपुर। निधन 15 अक्टूबर 1961, प्रयाग। उन्हें महाप्राण कहा जाता है। मुक्त छंद का विधान उनका बड़ा काम है। संग्रह परिमल 1930, गीतिका 1936, अपरा। अन्य कृतियाँ अनामिका, राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति, कुकुरमुत्ता। ओज और कोमलता एक साथ हैं। छायावाद के चार स्तंभों में विद्रोह और छंद-मुक्ति उनके हिस्से हैं। प्रसाद संस्कृति रखते हैं; पंत चित्र रखते हैं; महादेवी वेदना रखती हैं; निराला स्पर्श और मुक्ति रखते हैं। तोड़ती पत्थर सामाजिक करुण है, निर्धारित नहीं।

निर्धारित तीन पाठ हैं — कौन तुम शुभ्र-किरण वसना गीतिका से, जुही की कली परिमल से, संध्या सुंदरी अपरा से। पाठ्यक्रम संध्या सुंदरा लिखता है; प्रचलित शीर्षक सुंदरी है। शुभ्र-किरण प्रश्न-गीत है — सीखा केवल हँसना। जुही स्पर्श से खिलती है। संध्या अवसान पर उतरती है। सीमा रहस्य की धुंध कभी नाम ढकती है। गुण इंद्रिय-चित्र और छंद-मुक्ति है।

निष्कर्ष यह है कि निराला 1896–1961, मुक्त छंद और महाप्राण हैं; पहचान गीतिका, परिमल, अपरा के तीन पाठों से है।

43. जुही की कली और संध्या सुंदरी का परिचय दीजिए।20 अंक

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म 21 फरवरी 1896 महिषादल-मेदिनीपुर, निधन 15 अक्टूबर 1961 प्रयाग। महाप्राण कहे जाते हैं। मुक्त छंद का विधान उनका बड़ा काम है। परिमल 1930, गीतिका 1936, अपरा। अन्य कृतियाँ अनामिका, राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति, कुकुरमुत्ता। निर्धारित तीन पाठ हैं — कौन तुम शुभ्र-किरण वसना गीतिका से, जुही की कली परिमल से, संध्या सुंदरी अपरा से। पाठ्यक्रम संध्या सुंदरा लिखता है; प्रचलित शीर्षक सुंदरी है। तोड़ती पत्थर सामाजिक करुण है, निर्धारित नहीं। दोनों प्रकृति-कविताएँ प्रकृति को आकृति देती हैं, इतिवृत्त नहीं। भाषा खड़ी बोली, मुक्त छंद गति देता है।

जुही की कली परिमल की है। निर्जन वन-वल्लरी पर सुहागिन-सुकुमारी सोती है — कली। पहचान की पंक्ति है — विजन वन-वल्लरी पर / सोती थी सुहागिन सुकुमारी। मलय पवन नायक बनकर आता है। आलिंगन से कली जागती है, खिलती है। आलंबन जुही है। उद्दीपन रात्रि, वन-वल्लरी, पवन हैं। रस शृंगार है। फूल केवल वनस्पति नहीं रह जाता; प्रेम का शरीर बनता है। द्विवेदी युग फूल का नाम गिनता; निराला फूल को नायिका देते हैं। शुभ्र-किरण-वसना गीतिका का प्रश्न-गीत है — कौन तुम शुभ्र-किरण-वसना, सीखा केवल हँसना। जुही स्पर्श का दृश्य है; शुभ्र-किरण प्रश्न है।

संध्या सुंदरी अपरा की है। दिवसावसान पर वह मेघमय आसमान से उतरती है। पहचान की पंक्ति है — दिवसावसान का समय— / मेघमय आसमान से उतर रही है। मानवीकरण पूरा है — संध्या स्त्री है, चुप, कोमल, थके जीवों को सुलाती। आलंबन संध्या हैं। रस शांत; विप्रलंभ छूता है। जुही रात्रि-मिलन है; संध्या अवसान है। प्रसाद की ऊषा जगाती है — बीती विभावरी जाग री; निराला की संध्या सुलाती है। पंत मौन से बुलाते हैं; निराला स्पर्श और उतरने का चित्र देते हैं। महादेवी मेघ बनती हैं, संध्या नहीं। हरिऔध का दिवस का अवसान संध्या का महाकाव्य-चित्र है; निराला संध्या को नारी-आकृति देते हैं।

साम्य दोनों पर प्रकृति का मानवीकरण, खड़ी बोली और छायावादी लाक्षणिकता है। वैषम्य संग्रह और क्षण पर है — परिमल का खिलना, अपरा का अवसान। सीमा रहस्य की धुंध कभी नाम ढकती है। गुण इंद्रिय-चित्र और छंद-मुक्ति है। सुभद्रा चार स्तंभों में नहीं; निराला स्तंभ हैं। कामायनी प्रसाद का महाकाव्य है; ये छोटी प्रकृति-कविताएँ हैं। व्याख्या में परिमल और अपरा के नाम अलग रखे जाते हैं। बिना शीर्षक और संग्रह के उत्तर अधूरा रह जाता है। लंबी पंक्ति नहीं उतारी जाती; भाव और पहचान-पंक्ति पर्याप्त हैं।

निष्कर्ष यह है कि जुही परिमल का शृंगार-प्रकृति है, संध्या सुंदरी अपरा का मानवीकरण है। दोनों निराला की निर्धारित पहचान हैं। गीतिका का शुभ्र-किरण प्रश्न तीसरा पाठ है, इन दो का पर्याय नहीं।

44. मौन निमंत्रण का प्रतिपाद्य लिखिए।8 अंक

मौन निमंत्रण सुमित्रानंदन पंत की पल्लव की कविता है। पल्लव 1926। पंत का जन्म 20 मई 1900 कौसानी, निधन 28 दिसंबर 1977। प्रकृति के सुकुमार कवि कहे जाते हैं। स्तब्ध ज्योत्स्ना में संसार शिशु-सा चकित रहता है। नक्षत्र, फूल, लहर और पक्षी शब्द से नहीं, मौन से बुलाते हैं। आलंबन प्रकृति का मौन संकेत है। उद्दीपन चाँदनी, तारे, वसंत हैं। रस शांत है। निमंत्रण वाक्य नहीं, संकेत है। भाषा खड़ी बोली, गुण माधुर्य, शिल्प चित्रात्मकता। एक तारा और नौका विहार गुंजन के हैं; यह पाठ पल्लव का है। ग्राम्या बाद की प्रगति-पुल है, निर्धारित नहीं।

निराला की जुही स्पर्श से खिलती है; यह कविता बिना स्पर्श बुलाती है। प्रसाद की पेशोला मौन गूँज है, पर मेवाड़ की; पंत चाँदनी का आमंत्रण रखते हैं। महादेवी मेघ बनकर बरसती हैं; पंत मौन देखकर चित्र बाँधते हैं। व्याख्या में संग्रह पल्लव, मौन का आमंत्रण और शांत रस लिखे जाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि प्रतिपाद्य चाँदनी का मौन आमंत्रण है; संग्रह पल्लव है, गुंजन नहीं।

45. पंत की निर्धारित कविताओं में प्रकृति-चित्रण लिखिए।20 अंक

सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई 1900 कौसानी, अल्मोड़ा। निधन 28 दिसंबर 1977। प्रकृति के सुकुमार कवि कहे जाते हैं। पल्लव 1926 छायावाद की भाषा और चित्र का बड़ा संग्रह है। गुंजन 1932। बाद में ग्राम्या और लोकायतन प्रगति और दर्शन की ओर मुड़ते हैं; निर्धारित तीन पाठ छायावादी चित्र के हैं। भाषा खड़ी बोली, गुण माधुर्य, शिल्प चित्रात्मकता। वे छायावाद के चार स्तंभों में चित्र-कवि हैं। प्रसाद इतिहास रखते हैं; निराला स्पर्श रखते हैं; पंत दृश्य रखते हैं। निर्धारित पाठ मौन निमंत्रण पल्लव से; एक तारा और नौका विहार गुंजन से हैं। तीनों प्रकृति के तीन छोर हैं — मौन, बिंदु, प्रवाह।

मौन निमंत्रण ज्योत्स्ना का संकेत है। स्तब्ध चाँदनी में संसार शिशु-सा चकित रहता है। नक्षत्र, फूल, लहर और पक्षी शब्द से नहीं, मौन से बुलाते हैं। आलंबन प्रकृति का मौन संकेत है। उद्दीपन चाँदनी, तारे, वसंत हैं। रस शांत है। निमंत्रण वाक्य नहीं, संकेत है। निराला की जुही स्पर्श से खिलती है; यह कविता बिना स्पर्श बुलाती है। भारतेंदु व्यंग्य से जगाते हैं; पंत मौन से बुलाते हैं। व्याख्या में संग्रह पल्लव, मौन का आमंत्रण और शांत रस लिखे जाते हैं।

एक तारा सांध्य नभ का एक बिंदु है। आलंबन अकेला तारा है। उद्दीपन संध्या, शेष ज्योति, विस्तीर्ण नभ हैं। रस शांत है; करुण एकाकीपन से चिपकता है, फिर भी सौंदर्य पूरा है। भाव यह नहीं कि तारा केवल खगोल है। भाव यह है कि शेष प्रकाश भी पूरा सौंदर्य हो सकता है। महादेवी बादल बनकर बरसती हैं; पंत तारे को बाहर देखते हैं। अज्ञेय बाद में बाजरे की कलगी से नया उपमान देंगे; पंत अभी तारे को चित्र बनाते हैं।

नौका विहार चाँदनी रात की नदी-यात्रा है। ग्रीष्म की रात, जल दर्पण जैसा, नाव मंथर। आलंबन नदी और नौका हैं। रस शांत है। चित्र इतना सघन है कि कवि प्रवाह में अपना बोझ भूलता है। मौन निमंत्रण स्थल-ज्योत्स्ना है; नौका विहार जल-यात्रा है; एक तारा नभ का बिंदु है। प्रसाद की पेशोला झील पर मौन गूँज है; पंत नदी पर चलते हैं। हरिऔध का दिवस का अवसान संध्या ढलती है; पंत चाँदनी रात खोलते हैं। सीमा रहस्य और सौंदर्य का व्यक्ति-केंद्र है; ग्राम्या बाद में यथार्थ की ओर मुड़ती है। गुण चित्र की सघनता है। सुभद्रा वात्सल्य गाती हैं; पंत प्रकृति गाते हैं। दोनों निर्धारित हैं, स्तंभ एक हैं पंत, सुभद्रा नहीं।

निष्कर्ष यह है कि पंत की निर्धारित प्रकृति पल्लव के मौन और गुंजन के तारा-नौका से पहचानी जाती है। केंद्र चित्र और शांत रस है। प्रसाद का इतिहास और महादेवी की वेदना यहाँ प्रधान नहीं।

46. महादेवी वर्मा की वेदना का स्वरूप लिखिए।8 अंक

महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907, फर्रुखाबाद। निधन 11 सितंबर 1987, प्रयाग। आधुनिक मीरा कही जाती हैं। नीहार 1930, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, यामा 1940। यामा पर मंगलाप्रसाद पुरस्कार याद किया जाता है। गद्य में श्रृंखला की कड़ियाँ। भाषा खड़ी बोली, रूप प्रगीत, रस करुण और शांत। प्रिय आराध्य है, देह-नायक नहीं। वेदना वाचक की है, केवल नायिका की नहीं। छायावाद के चार स्तंभों में वेदना उनका हिस्सा है। निर्धारित गीत जो तुम आ जाते एक बार नीहार से, तुम मुझमें प्रिय फिर क्या परिचय नीरजा से, मैं नीर भरी दुख की बदली यामा से हैं।

स्वरूप तीन सूत्रों का है — एक आगमन की कल्पना, अंतर्वर्ती अभेद, मेघ-स्वभाव। प्रसाद की कमला रूप से लड़ती है; महादेवी वेदना से पहचान बनाती हैं। सुभद्रा वात्सल्य गाती हैं, रहस्य नहीं। गुप्त की यशोधरा प्रश्न करती है; महादेवी प्रतीक्षा गाती हैं। सीमा एक स्वर का ठहराव है। गुण स्त्री का वाचक-अधिकार है।

निष्कर्ष यह है कि महादेवी की वेदना प्रगीत की वाचक-वेदना है; केंद्र अनुपस्थित प्रिय और दुख का नीर है।

47. महादेवी के तीन निर्धारित गीतों का विवेचन कीजिए।20 अंक

महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 फर्रुखाबाद, निधन 11 सितंबर 1987 प्रयाग। आधुनिक मीरा कही जाती हैं। नीहार 1930, रश्मि 1932, नीरजा 1935 के आसपास, सांध्यगीत, यामा 1940। यामा पर मंगलाप्रसाद पुरस्कार याद किया जाता है। गद्य में श्रृंखला की कड़ियाँ। भाषा खड़ी बोली, रूप प्रगीत, रस करुण और शांत। प्रिय आराध्य है, देह-नायक नहीं। वेदना वाचक की है, केवल नायिका की नहीं। छायावाद के चार स्तंभों में वेदना उनका हिस्सा है। निर्धारित तीन गीत तीन संग्रहों से हैं — जो तुम आ जाते एक बार नीहार से, तुम मुझमें प्रिय फिर क्या परिचय नीरजा से, मैं नीर भरी दुख की बदली यामा से। लंबी पंक्ति नहीं उतारी जाती; भाव, प्रसंग और संग्रह-नाम लिखे जाते हैं।

जो तुम आ जाते एक बार नीहार का गीत है। शर्त एक आगमन की है। आलंबन अनुपस्थित प्रिय हैं। उद्दीपन प्रतीक्षा, रात्रि, अधूरी भेंट हैं। रस विप्रलंभ और करुण हैं। प्रसाद की उषा आकर जगाती है — बीती विभावरी जाग री; महादेवी का प्रिय आता नहीं। गुप्त की यशोधरा पति के जाने पर प्रश्न करती है; महादेवी आने की एक कल्पना से पूरा गीत भरती हैं। यशोधरा साकेत नहीं; यह गीत यशोधरा भी नहीं — आराध्य-प्रगीत है, बुद्ध-गृहत्याग नहीं। व्याख्या में संग्रह नीहार, एक बार का आगमन और वाचक-वेदना लिखे जाते हैं।

तुम मुझमें प्रिय फिर क्या परिचय नीरजा का गीत है। प्रिय बाहर का अतिथि नहीं; भीतर बसता है। परिचय की रीति टूटती है। आलंबन अंतर्वर्ती प्रिय हैं। रस शांत और भक्ति-शृंगार मिला है। रहस्य यहाँ अंधकार नहीं, अभेद है। पहला गीत दूरी माँगता है; यह गीत दूरी मिटाता है। दोनों एक कवयित्री के दो छोर हैं — प्रतीक्षा और तादात्म्य। शुक्ल रहस्य पर आपत्ति करते रहे; वाजपेयी और नामवर इसे प्रगीत की शक्ति मानते हैं। अभेद मीरा की भक्ति-पंक्ति का आधुनिक रूप है, देह-शृंगार नहीं।

मैं नीर भरी दुख की बदली यामा का गीत है। वाचक अपने को बादल कहती है — नीर दुख का है, बरसना स्वभाव है। आलंबन कवयित्री स्वयं हैं। उद्दीपन मेघ, जल, वेदना हैं। रस करुण है। पंत का एक तारा बाहर टिमटिमाता है; महादेवी का मेघ भीतर से बरसता है। प्रसाद की कमला रूप से लड़ती है; महादेवी वेदना से पहचान बनाती हैं। सुभद्रा उल्लास और इसका रोना गाती हैं — वात्सल्य का उल्टा छोर। साम्य तीन गीतों पर प्रगीत, खड़ी बोली, वाचक स्त्री। वैषम्य दूरी, अभेद और मेघ पर है। सीमा एक स्वर का ठहराव है। गुण स्त्री का वाचक-अधिकार है। स्त्री विमर्श महादेवी को केवल रहस्य-कवि नहीं रहने देता।

निष्कर्ष यह है कि तीन गीत नीहार, नीरजा, यामा से हैं। केंद्र एक आगमन, अंतर्वर्ती प्रिय और दुख की बदली है। वेदना वाचक की है; प्रिय देह-नायक नहीं।

48. सुभद्राकुमारी चौहान की निर्धारित कविताओं का परिचय दीजिए।8 अंक

सुभद्राकुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त 1904, निहालपुर, इलाहाबाद। निधन 15 फरवरी 1948। संग्रह मुकुल। वे छायावाद के चार स्तंभों में नहीं। झाँसी की रानी उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता है; निर्धारित पाठ वह नहीं। निर्धारित चार पाठ हैं — जीवन फूल, कोयल, उल्लास, इसका रोना। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली है। रूप सरल गीत है। रहस्य पतला है; चित्र साफ है। स्वर राष्ट्रीय गीत के निकट वात्सल्य और हर्ष का है। प्रसाद मेवाड़ गाते हैं, महादेवी वेदना गाती हैं; सुभद्रा फूल, कोयल और शिशु गाती हैं।

जीवन फूल क्षणभंगुरता और अधूरी अभिलाषा है। कोयल वसंत की वाणी है। उल्लास मन के हर्ष का गीत है — महादेवी का उल्टा छोर। इसका रोना बच्चे का रोना है। कोई कहता है रोना नहीं सुहाता; वाचक कहती है इसी से अनुपम सुख छाता है। आलंबन शिशु हैं। रस वात्सल्य है। व्याख्या में चार शीर्षक, मुकुल-स्वर और झाँसी की रानी का अभाव लिखे जाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि निर्धारित कविताएँ चार छोटे गीत हैं; पहचान मुकुल-स्वर और वात्सल्य से है, झाँसी की रानी से नहीं।

49. छायावाद के चार स्तंभों का साम्य-वैषम्य लिखिए।20 अंक

छायावाद के चार स्तंभ जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा हैं। सुभद्राकुमारी चौहान निर्धारित हैं, स्तंभ नहीं — मुकुल के जीवन फूल, कोयल, उल्लास, इसका रोना; झाँसी की रानी यहाँ निर्धारित नहीं। काल लगभग 1918–1936। साम्य खड़ी बोली, प्रगीत, सूक्ष्म अनुभूति, प्रकृति-आलंबन और लाक्षणिकता है। शुक्ल रहस्य पर आपत्ति करते हैं। नंददुलारे वाजपेयी, नगेन्द्र और नामवर इसे कल्पना की शक्ति मानते हैं। नामवर की छायावाद पुस्तक आंदोलन को ऐतिहासिक मोड़ कहती है, केवल शैली नहीं। द्विवेदी युग का इतिवृत्त यहाँ सूक्ष्म अनुभूति बनता है। कामायनी 1936 शिखर-ग्रंथ कही जाती है, चारों की निर्धारित पंक्ति नहीं।

प्रसाद काशी, 1889–1937। लहर के तीन पाठ — पेशोला की प्रतिध्वनि, बीती विभावरी, प्रलय की छाया। पेशोला पिछोला झील है, पेशवा नहीं; मेवाड़ की गूँज और मौन वर्तमान। बीती विभावरी जाग री — ऊषा नागरी, पनघट-ताराघट। प्रलय की छाया कमला की गुजरात-कथा है। स्वर इतिहास, जागरण और नाट्य-गीत। संस्कृति-कवि का हिस्सा श्रद्धा-इड़ा कामायनी में है; निर्धारित अंश लहर का है। रस शांत, करुण, वीर के सूक्ष्म रूप।

निराला 1896–1961, मुक्त छंद, महाप्राण। गीतिका, परिमल, अपरा। जुही की कली स्पर्श से खिलती है; संध्या सुंदरी अवसान पर उतरती है; शुभ्र-किरण-वसना प्रश्न है — सीखा केवल हँसना। ओज और कोमलता साथ हैं। पंत 1900–1977, कौसानी। पल्लव और गुंजन। मौन निमंत्रण चाँदनी का संकेत, एक तारा सांध्य बिंदु, नौका विहार चाँदनी-नदी — चित्र और शांत रस। बाद की ग्राम्या प्रगति की ओर पुल है, निर्धारित पाठ नहीं। महादेवी 1907–1987। नीहार, नीरजा, यामा। वेदना वाचक की है। प्रिय आता नहीं, भीतर बसता है, मेघ बरसता है। आधुनिक मीरा का अर्थ आराध्य-प्रगीत है, देह-नायक नहीं।

वैषम्य यहीं साफ है — इतिहास, स्पर्श, चित्र, वेदना। प्रसाद मेवाड़-गुजरात रखते हैं। निराला खिलने-उतरने रखते हैं। पंत मौन चित्र रखते हैं। महादेवी अनुपस्थिति रखते हैं। सुभद्रा वात्सल्य और बोलचाल रखते हैं, स्तंभ-पंक्ति के बाहर। नारी प्रसाद की कमला में वाचक है, निराला की कली-संध्या में आकृति है, महादेवी में वाचक वेदना है, पंत में प्रकृति अधिक नारी कम। सीमाएँ रहस्य, व्यक्ति-केंद्र और एक स्वर का ठहराव हैं। प्रगतिवाद 1936 यथार्थ से चोट करता है। फिर भी आधुनिक प्रगीत इन चार के बिना नहीं लिखा जाता। निर्धारित संग्रह-नाम बिना पाठ अधूरा है। पेशोला पिछोला है, पेशवा नहीं। संध्या सुंदरी अपरा की है; मौन निमंत्रण पल्लव का है; दुख की बदली यामा की है। चार स्तंभ चार संग्रह-कोण हैं, एक गीत के पर्याय नहीं।

निष्कर्ष यह है कि साम्य प्रगीत और खड़ी बोली पर है, वैषम्य प्रसाद के मेवाड़-गुजरात, निराला के खिलने-उतरने, पंत के मौन चित्र और महादेवी की वेदना पर है। सुभद्रा स्तंभ नहीं।

50. अज्ञेय का साहित्यिक परिचय दीजिए।8 अंक

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जन्म 7 मार्च 1911। निधन 4 अप्रैल 1987। तार सप्तक 1943 का संपादन उनकी बड़ी भूमिका है। सात कवि एक विचार के नहीं — मुक्तिबोध और रामविलास शर्मा सामाजिक छोर रखते हैं। दूसरा सप्तक 1951, तीसरा 1959 नई कविता की ओर खुलते हैं। उपन्यास शेखर एक जीवनी और नदी के द्वीप अलग कृतियाँ हैं। निर्धारित नदी के द्वीप कविता है, उपन्यास नहीं। कविताएँ कलगी बाजरे की और नदी के द्वीप हरी घास पर क्षण भर से जुड़ी गिनी जाती हैं। इत्यलम् और बावरा अहेरी स्मरण हैं, निर्धारित पाठ नहीं। भाषा खड़ी बोली। शिल्प बिंब और मनोविज्ञान। वे प्रयोगवाद के केंद्र-नाम हैं, सप्तक के अकेले कवि नहीं।

प्रवृत्ति व्यक्ति की स्वतंत्र सत्ता, क्षण और नए उपमान हैं। आक्षेप दुरुहता और समाज-कटान का रहा। गुण यह है कि बाजरे की कलगी जैसा साधारण बिंब काव्य बनता है। नागार्जुन पेट रखते हैं; मिश्र फेरी रखते हैं; अज्ञेय व्यक्ति-द्वीप और नया उपमान रखते हैं।

निष्कर्ष यह है कि अज्ञेय तार सप्तक, व्यक्ति-बिंब और दो निर्धारित कविताओं से पहचाने जाते हैं; उपन्यास नदी के द्वीप कविता नहीं है।

51. नदी के द्वीप कविता का भाव लिखिए।8 अंक

प्रसंग सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की निर्धारित कविता है। उपन्यास नदी के द्वीप यह पाठ नहीं; शीर्षक-साधर्म्य से दो कृतियाँ मिलाई नहीं जातीं। आलंबन द्वीप और नदी हैं। द्वीप व्यक्ति हैं। नदी समाज, समय और संबंध हैं। द्वीप नदी के प्रवाह से बनते हैं, उसी जल में रहते हैं, पूरी तरह विलीन नहीं होते। आशय यह नहीं कि व्यक्ति समाज से कटकर कुछ है। आशय यह भी नहीं कि व्यक्ति नदी में घुलकर नाम खो दे। संबंध और वैयक्तिकता साथ चलते हैं। रस शांत है; चिंतन प्रधान है। रूप प्रतीकात्मक कविता है, इतिवृत्त नहीं। दोनों निर्धारित कविताएँ हरी घास पर क्षण भर से जुड़ी गिनी जाती हैं। कलगी बाजरे की दृश्य-उपमान है; यह पाठ चिंतन है।

भाव अकेला दावा अधूरा है, विलय का दावा भी अधूरा है। नई कविता का लघु मानव यहीं व्यक्ति की मर्यादा माँगता है। प्रगति का केवल वर्ग-नायक यह कविता नहीं। तार सप्तक 1943 के संपादक का व्यक्ति-सूत्र यहीं बैठता है। पंक्ति नहीं उतारी जाती; प्रतीक-युग्म लिखा जाता है।

निष्कर्ष यह है कि नदी के द्वीप का भाव व्यक्ति-द्वीप और समाज-नदी का संबंध है; शीर्षक-साधर्म्य से उपन्यास मिलाया नहीं जाता।

52. कलगी बाजरे की कविता का प्रतिपाद्य लिखिए।8 अंक

प्रसंग अज्ञेय की दूसरी निर्धारित कविता है। आलंबन बाजरे की कलगी है — साधारण ग्रामीण तुरा। परंपरा प्रेयसी को संध्या के तारे या गुलाब से नापती रही। कवि नया उपमान देता है। लघु वस्तु में सौंदर्य पूरा हो सकता है — यही प्रयोग और नई कविता का ठोस चित्र है। उद्दीपन हरियाली, पवन, गाँव का दृश्य हैं। रस शृंगार का सूक्ष्म रूप और अद्भुत मिला है। रूप छोटी कविता है, प्रगीत-रहस्य नहीं। नदी के द्वीप चिंतन है; यह कविता दृष्टि और बिंब है। दोनों हरी घास पर क्षण भर से जुड़ी गिनी जाती हैं। पंत का एक तारा पुराना उपमान-छोर है; अज्ञेय बाजरे की कलगी से उसे काटते हैं। उपन्यास नदी के द्वीप यहाँ नहीं खुलता।

प्रतिपाद्य यह है कि काव्य का उपमान महल और पुष्प-वाटिका से बँधा नहीं। साधारण अन्न-पौधे की कलगी भी प्रिय के रूप की नाप बनती है। व्याख्या में नया उपमान, ग्रामीण आलंबन और परंपरा-त्याग लिखे जाते हैं। पंक्ति नहीं उतारी जाती।

निष्कर्ष यह है कि कलगी बाजरे की का प्रतिपाद्य नए ग्रामीण उपमान से सौंदर्य नापना है, तारा-गुलाब दोहराना नहीं।

53. अज्ञेय की निर्धारित कविताओं का विवेचन कीजिए।20 अंक

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जन्म 7 मार्च 1911, निधन 4 अप्रैल 1987। तार सप्तक 1943 का संपादन उनकी बड़ी भूमिका है। सात कवि हैं — अज्ञेय, नेमिचंद्र जैन, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरिजाकुमार माथुर, रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध। सभी एक विचार के नहीं। दूसरा सप्तक 1951, तीसरा 1959 नई कविता की ओर खुलते हैं। निर्धारित दो कविताएँ नदी के द्वीप और कलगी बाजरे की हैं। दोनों हरी घास पर क्षण भर से जुड़ी गिनी जाती हैं। उपन्यास नदी के द्वीप और शेखर एक जीवनी अलग कृतियाँ हैं; शीर्षक-साधर्म्य से उपन्यास कविता पर नहीं चढ़ता। भाषा खड़ी बोली। शिल्प बिंब और मनोविज्ञान। वे प्रयोगवाद के केंद्र-नाम हैं, सप्तक के अकेले कवि नहीं। इत्यलम् और बावरा अहेरी स्मरण हैं, निर्धारित पाठ नहीं।

नदी के द्वीप में आलंबन द्वीप और नदी हैं। द्वीप व्यक्ति हैं। नदी समाज, समय और संबंध हैं। द्वीप नदी के प्रवाह से बनते हैं, उसी जल में रहते हैं, पूरी तरह विलीन नहीं होते। आशय यह नहीं कि व्यक्ति समाज से कटकर कुछ है। आशय यह भी नहीं कि व्यक्ति नदी में घुलकर नाम खो दे। संबंध और वैयक्तिकता साथ चलते हैं। रस शांत है; चिंतन प्रधान है। रूप प्रतीकात्मक कविता है, इतिवृत्त नहीं। नई कविता का लघु मानव यहीं व्यक्ति की मर्यादा माँगता है। प्रगति का केवल वर्ग-नायक यह पाठ नहीं। भाव और प्रसंग लिखे जाते हैं, पंक्ति नहीं उतारी जाती।

कलगी बाजरे की में आलंबन बाजरे का तुरा है — साधारण ग्रामीण बिंब। परंपरा प्रेयसी को संध्या के तारे या गुलाब से नापती रही। कवि नया उपमान देता है। लघु वस्तु में सौंदर्य पूरा हो सकता है — यही प्रयोग और नई कविता का ठोस चित्र है। उद्दीपन हरियाली, पवन, गाँव का दृश्य हैं। रस सूक्ष्म शृंगार और अद्भुत। रूप छोटी कविता है, प्रगीत-रहस्य नहीं। पंत का एक तारा पुराना उपमान-छोर है; अज्ञेय बाजरे की कलगी से उसे काटते हैं। नदी के द्वीप चिंतन है; यह कविता दृष्टि और नया बिंब है।

साम्य खड़ी बोली, बिंब, नई दृष्टि। वैषम्य एक ओर चिंतन है, दूसरी ओर दृश्य-उपमान। मुक्तिबोध सप्तक में सामाजिक फैंटेसी रखते हैं; अज्ञेय इन पाठों में व्यक्ति और साधारण वस्तु रखते हैं। रामविलास शर्मा सामाजिक छोर रखते हैं। आक्षेप दुरुहता और समाज-कटान का रहा। गुण साधारण को काव्य बनाना है। नरेश मेहता माँ-वृक्ष-किरण रखते हैं; नागार्जुन प्रेत-मुस्कान रखते हैं; मिश्र गीत-बाजार रखते हैं; कागद बेकलू-जल रखते हैं। अज्ञेय व्यक्ति-द्वीप और कलगी रखते हैं। सीमा रहस्य और आत्म-केंद्र कभी अर्थ ढकते हैं। व्याख्या में पूरा नाम, तार सप्तक 1943, और उपन्यास-कविता का भेद स्थिर रहें।

निष्कर्ष यह है कि निर्धारित कविताएँ द्वीप-नदी के संबंध और बाजरे की कलगी के नए उपमान से पहचानी जाती हैं। उपन्यास का नाम कविता पर नहीं चढ़ता।

54. नरेश मेहता की निर्धारित कविताओं का परिचय दीजिए।8 अंक

नरेश मेहता का जन्म 15 फ़रवरी 1922, निधन 22 नवम्बर 2000। ज्ञानपीठ 1992। प्रयाग और आधुनिक हिन्दी काव्य-नाट्य से जुड़े। संशय की एक रात, महाप्रस्थान, प्रवाद पर्व मिथकीय आधुनिक कृतियाँ हैं; ये निर्धारित पाठ नहीं। निर्धारित तीन कविताएँ माँ, वृक्षत्व, किरण धेनुएँ हैं। भाषा खड़ी बोली। बिंब ग्रामीण और वैदिक स्पर्श रखते हैं। वे प्रयोग और नई कविता के निकट प्रकृति-मनुष्य का संबंध रखते हैं। अज्ञेय व्यक्ति-द्वीप बाँधते हैं; मेहता माँ, वृक्ष और आलोक बाँधते हैं। पंक्ति नहीं उतारी जाती; शीर्षक और भाव लिखे जाते हैं।

माँ आँगन-श्रम, अल्पना, रसोई और पथ-निहार से पहचानी जाती है — केवल ममता का शब्द नहीं। वृक्षत्व वृक्ष जैसे होने की नैतिक अवस्था है — सुगंध, ठहराव; कागद का तपस्वी रूँख मरु का सूखा वृक्ष है, स्वर अलग है। किरण धेनुएँ प्रभात का ग्वाला-बिंब हैं — आलोक दूध-सा फैलता है। रस वात्सल्य, शांत, अद्भुत। सुभद्रा का इसका रोना शिशु-वात्सल्य है; मेहता का पाठ श्रम-वात्सल्य है।

निष्कर्ष यह है कि निर्धारित कविताएँ तीन हैं — माँ, वृक्षत्व, किरण धेनुएँ; मिथक-ग्रंथ इनकी जगह नहीं लेते।

55. माँ, वृक्षत्व और किरण धेनुएँ का विवेचन कीजिए।20 अंक

नरेश मेहता का जन्म 15 फ़रवरी 1922, निधन 22 नवम्बर 2000। ज्ञानपीठ 1992। प्रयाग और आधुनिक हिन्दी काव्य-नाट्य से जुड़े। संशय की एक रात, महाप्रस्थान, प्रवाद पर्व मिथकीय आधुनिक कृतियाँ हैं; ये निर्धारित पाठ नहीं। निर्धारित तीन कविताएँ माँ, वृक्षत्व, किरण धेनुएँ हैं। भाषा खड़ी बोली। बिंब ग्रामीण और वैदिक स्पर्श रखते हैं। वे प्रयोग और नई कविता के निकट प्रकृति-मनुष्य का संबंध रखते हैं। अज्ञेय व्यक्ति-द्वीप बाँधते हैं; मेहता माँ, वृक्ष और किरण को कर्म और प्रकाश देते हैं। भाव और प्रसंग लिखे जाते हैं, पंक्ति नहीं उतारी जाती। तीन पाठ तीन छोर हैं — श्रम, नैतिक स्थिरता, आलोक।

माँ में वाचक माँ को एक मुखाकृति में बंद नहीं करता। माँ उन स्त्रियों में बसती है जो आँगन लीपती हैं, अल्पना रचती हैं, रसोई का श्रम करती हैं, चिंता की आँखों से पथ निहारती हैं। आलंबन माँ का कर्म है, केवल ममता का शब्द नहीं। रस वात्सल्य और करुण मिला है। यह महादेवी की आराध्य-वेदना नहीं। यह गुप्त की यशोधरा-प्रश्न भी नहीं; यशोधरा साकेत नहीं, और माँ वह पद नहीं। यह देहात के रोज के काम से बनी माँ है। सुभद्रा का इसका रोना शिशु-वात्सल्य है; मेहता का पाठ श्रम-वात्सल्य है।

वृक्षत्व वृक्ष जैसे होने की अवस्था है — सुगंध देना, ठहराव, दूसरे को छूना। कवि अनुभव करता है कि वृक्षत्व अधूरा रह जाता है जब उपेक्षा किसी दीन के पास ठहरती है। प्रत्येक का अपना वृक्षत्व है — यही नैतिक निष्कर्ष है। आलंबन वृक्ष-अवस्था है। रस शांत और नैतिक है। वनस्पति-वर्णन मात्र नहीं। कागद का तपस्वी रूँख मरु का सूखा वृक्ष है; मेहता का वृक्षत्व आचरण का प्रश्न है। दोनों वृक्ष हैं, स्वर अलग है। पंत प्रकृति को चित्र देते हैं; मेहता प्रकृति को नैतिक अवस्था देते हैं।

किरण धेनुएँ प्रातः का चित्र हैं। प्रभात का ग्वाला किरणों को धेनुओं की तरह हाँकता है। आलोक दूध-सा फैलता है। अंधकार चर जाता है। आलंबन किरण और उषा हैं। रस शांत-अद्भुत। वैदिक गौ-बिंब आधुनिक प्रभात पर बैठता है। प्रसाद की ऊषा जगाती है; मेहता की किरण धेनु बनती है। निराला की संध्या सुलाती है; यह पाठ प्रातः खोलता है। सीमा यह कि मिथक-नाट्य की प्रसिद्धि निर्धारित छोटे पाठों पर छा जाती है। गुण यह है कि प्रकृति केवल उद्दीपन नहीं, आचरण का प्रश्न बनती है। व्याख्या में ज्ञानपीठ, तीन शीर्षक और मिथक-ग्रंथों का अभाव लिखे जाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि तीन पाठ श्रम, नैतिक स्थिरता और आलोक से पहचाने जाते हैं। केंद्र माँ, वृक्षत्व और किरण-धेनु है। संशय की एक रात यहाँ नहीं खुलती।

56. प्रेत का बयान और दंतुरित मुस्कान का परिचय दीजिए।8 अंक

वैद्यनाथ मिश्र ‘नागार्जुन’ का जन्म 30 जून 1911, मिथिला। निधन 5 नवम्बर 1998। मैथिली में यात्री। प्रगतिशील लेखक संघ 1936 के बाद के जन-कवि हैं। दिनकर का राष्ट्रीय ओज उनका पर्याय नहीं। निर्धारित दो पाठ प्रेत का बयान और यह दंतुरित मुस्कान हैं। प्रेत का बयान व्यंग्य है। वाचक प्राथमिक पाठशाला का शिक्षक-प्रेत है। यम के सामने बयान चलता है। भूख आधिकारिक कारण नहीं बनने दी जाती; बीमारी का नाम कागज़ पर चढ़ता है। आलंबन वह शिक्षक-प्रेत है। रस हास्य-व्यंग्य और करुण। रूप गवाही है। यह दंतुरित मुस्कान वात्सल्य है। आलंबन शिशु की दाँत निकली मुस्कान है। धूल सना गात भी जीवन भर देता है। पंक्ति नहीं उतारी जाती।

दोनों एक कवि के दो सिरे हैं। पहला पेट और तंत्र पूछता है, दूसरा मुस्कान पूछती है। शीर्षक बदलकर एक नहीं कहे जाते। सुभद्रा का इसका रोना वात्सल्य-छोर है, स्वर नागार्जुन का अपना है। मिश्र गीत बेचते हैं; नागार्जुन प्रेत से बयान करवाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि प्रेत का बयान व्यंग्य है, दंतुरित मुस्कान वात्सल्य है; शीर्षक बदलकर एक नहीं कहे जाते।

57. नागार्जुन के व्यंग्य और वात्सल्य का विवेचन कीजिए।20 अंक

वैद्यनाथ मिश्र ‘नागार्जुन’ का जन्म 30 जून 1911 मिथिला-दरभंगा-मधुबनी क्षेत्र, निधन 5 नवम्बर 1998। हिन्दी नाम नागार्जुन, मैथिली नाम यात्री। प्रगतिशील लेखक संघ 1936 के बाद के जन-कवि हैं। विषय भूख, ऋण, नेता, गाँव, शासन की विडंबना। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली, व्यंग्य तेज, रूप गवाही। दिनकर का राष्ट्रीय ओज प्रगतिवाद का पर्याय नहीं; नागार्जुन जन-यथार्थ के प्रतिनिधि हैं। निर्धारित पाठ प्रेत का बयान और यह दंतुरित मुस्कान हैं। पहला व्यंग्य है, दूसरा वात्सल्य। दोनों एक कवि के दो सिरे हैं; एक को दूसरे पर चढ़ाना अधूरा है। भाव और प्रसंग लिखे जाते हैं, पंक्ति नहीं उतारी जाती।

व्यंग्य प्रेत का बयान में बैठता है। वाचक प्राथमिक पाठशाला का शिक्षक-प्रेत है। यम के सामने बयान चलता है। वह भूख या अकाल को मृत्यु का आधिकारिक कारण नहीं बनने देता; पेचिश जैसी बीमारी का नाम लेता है। आशय यह है कि स्वाधीन देश में भूख छिपती है, कागज़ पर कारण बदल जाता है। आलंबन वह शिक्षक-प्रेत है। उद्दीपन दरिद्रता, तंत्र और मृत्यु हैं। रस हास्य-व्यंग्य और करुण मिला है। रूप गवाही है, शोक-गीत नहीं। दलित विमर्श का पर्याय यह पाठ नहीं, निकट का सामाजिक स्वर है — पेट और तंत्र पूछता है।

वात्सल्य यह दंतुरित मुस्कान में बैठता है। आलंबन छोटे बच्चे की दाँत निकली मुस्कान है। धूल सने गात कमल जैसे लगते हैं। मुस्कान मृतप्राय मन में भी जान डालती है। कवि माँ के माध्यम बिना बच्चे को पूरा नहीं पहचान पाता — वात्सल्य कुटुंब से बँधा है। रस वात्सल्य प्रधान है। सुभद्रा के इसका रोना जैसा वात्सल्य-छोर है, स्वर नागार्जुन का अपना है। मेहता की माँ श्रम है; नागार्जुन का शिशु मुस्कान है। प्रेत शासन और पेट पूछता है; मुस्कान जीवन का बचाव पूछती है। शीर्षक बदलकर एक कह देना अधूरा है।

साम्य बोलचाल की खड़ी बोली और जन-संवेदना। वैषम्य एक ओर तंत्र-भूख है, दूसरी ओर दाँत निकली हँसी। मिश्र गीत बेचते हैं; नागार्जुन प्रेत से बयान करवाते हैं। अज्ञेय द्वीप सोचते हैं; नागार्जुन पेट और गोद सोचते हैं। कागद थार की प्यास रखते हैं; नागार्जुन गाँव की भूख रखते हैं। सीमा सिद्धांत और नारे का बोझ कभी कहा गया। गुण करुण और हास्य का साथ है। प्रगतिवाद खेत, कारखाना, ऋण और भूख की ओर मुड़ा; ये दो पाठ उसी यथार्थ के दो चेहरे हैं। व्याख्या में यात्री, मिथिला, 1911–1998 और दो शीर्षकों का अंतर लिखे जाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि नागार्जुन का व्यंग्य प्रेत की गवाही में है, वात्सल्य दंतुरित मुस्कान में है। दोनों निर्धारित पाठ एक कवि के दो स्वर हैं। दिनकर का ओज इनका पर्याय नहीं।

58. गीत फरोश का भाव स्पष्ट कीजिए।8 अंक

प्रसंग भवानीप्रसाद मिश्र की निर्धारित कविता गीत फरोश है। मिश्र का जन्म 29 मार्च 1913 होशंगाबाद-नर्मदापुरम क्षेत्र, निधन 20 फ़रवरी 1985। गाँधी-सरल भाषा के कवि कहे जाते हैं। नई कविता के सरल सिरे पर खड़े हैं। वाचक गीत बेचने वाला है। फेरी पर कई तरह के गीत हैं — सुबह, ग़ज़ल, पहाड़ी, दवा, प्रेम; छंद और बे-छंद; रेशमी और खादी। कलम और कंधा दोनों लगते हैं। अंत में मजबूरी है — गीत बेचना पाप जैसा लगता है, फिर भी पेट माँगता है। आलंबन कवि-फेरीवाला है। रस व्यंग्य और करुण। कहीं नहीं बचे दूसरी निर्धारित कविता है — पर्यावरण का क्षय; यह पाठ बाजार का है। पंक्ति नहीं उतारी जाती।

भाव यह है कि बाजार कविता की कीमत तय करता है। छायावाद का प्रगीत बिकने नहीं आता था; यहाँ गीत दुकान बन जाता है। सोहनलाल खादी को स्वदेशी का गीत बनाते हैं; मिश्र खादी को फेरी के माल में गिनते हैं — स्वर उलटा है। अज्ञेय नया उपमान देते हैं; मिश्र सादगी से व्यंग्य देते हैं।

निष्कर्ष यह है कि गीत फरोश का भाव कविता की बिक्री और फेरी की विडंबना है।

59. भवानीप्रसाद मिश्र की निर्धारित कविताओं का विवेचन कीजिए।20 अंक

भवानीप्रसाद मिश्र का जन्म 29 मार्च 1913 होशंगाबाद-नर्मदापुरम क्षेत्र, निधन 20 फ़रवरी 1985। गाँधी-सरल भाषा के कवि कहे जाते हैं। नई कविता के सरल सिरे पर खड़े हैं — दुर्बोध प्रयोग नहीं, बोलचाल का चयन। निर्धारित पाठ गीत फरोश और कहीं नहीं बचे हैं। रूप मुक्त छंद के निकट गेय-कथन। गुण सादगी। वे अज्ञेय जितने दुरुह नहीं, नागार्जुन जितने नारेबाज नहीं। नामवर नई कविता को बिंब से पढ़ते हैं; मिश्र चयन की हुई सरल भाषा से उसी धारा का सरल सिरा छूते हैं। भाव और प्रसंग लिखे जाते हैं, पंक्ति नहीं उतारी जाती।

गीत फरोश में वाचक गीत बेचने वाला है। फेरी पर तरह-तरह के गीत हैं — सुबह, ग़ज़ल, पहाड़ी, दवा, प्रेम; छंद और बे-छंद; रेशमी और खादी। कलम और कंधा दोनों लगते हैं। अंत में मजबूरी है — गीत बेचना पाप जैसा लगता है, फिर भी पेट माँगता है। आलंबन कवि-फेरीवाला है। रस व्यंग्य और करुण हैं। भाव यह है कि बाजार कविता की कीमत तय करता है। छायावाद का प्रगीत बिकने नहीं आता था; यहाँ गीत दुकान बन जाता है। सोहनलाल खादी को स्वदेशी का गीत बनाते हैं; मिश्र खादी को फेरी के माल में गिनते हैं — स्वर उलटा है। व्याख्या में फेरी, मजबूर बिक्री और व्यंग्य लिखे जाते हैं।

कहीं नहीं बचे में आलंबन लुप्त होती प्रकृति है — हरे वृक्ष, सागर, नदियाँ, पहाड़, झरने। कहीं ठीक-ठाक नहीं बचे। कंक्रीट और लालसा ने जगह ले ली है। सूरज-चाँद धुँधले पड़ते हैं। ऋतु का नियम टूटता है। पक्षी के घोंसले और निर्मल धारा घटते हैं। रस करुण है; व्यंग्य मनुष्य के स्वार्थ पर चिपकता है। रूप सरल कथन है, फैंटेसी नहीं। भाव पर्यावरण और मूल्य दोनों के क्षय का है। केवल प्रकृति-प्रेम लिखना अधूरा है; नहीं बचे का निषेध चाहिए।

साम्य सरल भाषा और आधुनिक लोभ की आलोचना। वैषम्य एक ओर गीत का बाजार है, दूसरी ओर प्रकृति का क्षय। अज्ञेय नया उपमान देते हैं; मिश्र सादगी देते हैं। नागार्जुन प्रेत से बोलते हैं; मिश्र फेरी और अभाव से बोलते हैं। पंत का मौन निमंत्रण प्रकृति को बुलाता है; मिश्र कहते हैं वह बची ही नहीं। कागद मरु में जल माँगते हैं — पूछती है बेकलू, तपस्वी रूँख, क्यों भटकती है, हरा कर देगी, बरसो जल; मिश्र हरियाली के अभाव पर ठहरते हैं। दोनों पर्यावरण छूते हैं, भूमि अलग है — थार की प्यास और सर्वत्र का नहीं बचे। सीमा सरलता कभी कविता को कथन भर बना देती है। गुण सादगी से समय को छूना है।

निष्कर्ष यह है कि निर्धारित कविताएँ गीत फरोश की बिक्री और कहीं नहीं बचे के पर्यावरण-क्षय से पहचानी जाती हैं। नई कविता का सरल सिरा यहीं है।

60. ओम पुरोहित ‘कागद’ की निर्धारित कविताओं का परिचय दीजिए।8 अंक

ओम पुरोहित ‘कागद’ का जन्म 5 जुलाई 1957, केसरीसिंहपुर। निधन 12 अगस्त 2016। राजस्थानी और हिन्दी दोनों में लिखते हैं। निर्धारित पाँच पाठ समकालीन हैं — पूछती है बेकलू, तपस्वी रूँख, क्यों भटकती है, हरा कर देगी, बरसो जल। कुछ फ़ाइलों में बेक्यू लिखा मिलता है; शीर्षक बेकलू है, भोज्य पदार्थ नहीं। बेकलू खेत की चिड़िया है; वह हल, बीनणी और शीतल बूँद की प्रतीक्षा पूछती है। रूँख राजस्थानी में वृक्ष है; सूखे में तपस्वी जैसा ठहराव। मेहता का वृक्षत्व नैतिक सुगंध है; कागद का रूँख मरु का तप है। क्यों भटकती है प्यास की खोज है। हरा कर देगी मरुधरा की आशा है। बरसो जल थार की प्रार्थना है — आज्ञार्थ जल बरस, काल-गणना नहीं। पंक्ति नहीं उतारी जाती।

रस करुण और शांत। आलंबन चिड़िया, वृक्ष, प्यास, मरु, जल। मिश्र कहते हैं बचा नहीं; कागद जल माँगते हैं। नागार्जुन गाँव की भूख रखते हैं; कागद थार की प्यास रखते हैं। धूमिल के सड़क-नारे नहीं; मरु की प्रतीक्षा है।

निष्कर्ष यह है कि कागद की निर्धारित कविताएँ पाँच हैं; पहचान बेकलू, रूँख और जल-प्रार्थना से है, बेक्यू से नहीं।

61. अज्ञेय से कागद तक पाँच कवियों का साम्य-वैषम्य लिखिए।20 अंक

पाँच निर्धारित कवि अज्ञेय, नरेश मेहता, नागार्जुन, भवानीप्रसाद मिश्र और ओम पुरोहित ‘कागद’ हैं। साम्य खड़ी बोली, छोटी कविता, छायावाद के बाद का समय। विषय दरबारी नायिका नहीं। रूप बिंब और कथन। रस शांत, करुण, वात्सल्य और व्यंग्य तक फैलता है। धाराएँ क्रम से प्रयोगवाद, नई कविता, प्रगतिवाद और समकालीन कविता छूती हैं। ये पाँच रश्मिरथी के कर्ण या हल्दीघाटी के प्रताप नहीं; छोटे निर्धारित पाठ के कवि हैं। भाव और प्रसंग लिखे जाते हैं, पंक्ति नहीं उतारी जाती। पाँचों निर्धारित शीर्षक बिना युग-नाम अधूरा है।

अज्ञेय 1911–1987, तार सप्तक 1943। नदी के द्वीप व्यक्ति और समाज का प्रतीक है; कलगी बाजरे की नया ग्रामीण उपमान है। उपन्यास नदी के द्वीप कविता नहीं। नरेश मेहता 1922–2000, ज्ञानपीठ 1992। माँ आँगन-श्रम है, वृक्षत्व नैतिक होना है, किरण धेनुएँ प्रभात का ग्वाला-बिंब हैं। संशय की एक रात निर्धारित नहीं। अज्ञेय व्यक्ति रखते हैं; मेहता कर्म और प्रकाश रखते हैं। दोनों नई दृष्टि के निकट हैं, स्वर अलग है — चिंतन बनाम आँगन।

नागार्जुन 1911–1998, मैथिली में यात्री। प्रेत का बयान व्यंग्य है — शिक्षक-प्रेत, भूख, तंत्र की गवाही। यह दंतुरित मुस्कान वात्सल्य है — शिशु की दाँत निकली हँसी। दिनकर का ओज उनका पर्याय नहीं। मिश्र 1913–1985, होशंगाबाद। गीत फरोश बाजार में कविता की बिक्री है; कहीं नहीं बचे पर्यावरण का क्षय है। नागार्जुन पेट रखते हैं; मिश्र फेरी और अभाव रखते हैं। दोनों जन-स्वर के निकट हैं, रूप अलग है — गवाही बनाम सरल कथन।

कागद 1957–2016, केसरीसिंहपुर। राजस्थानी और हिन्दी। निर्धारित पाँच पाठ हैं — पूछती है बेकलू, तपस्वी रूँख, क्यों भटकती है, हरा कर देगी, बरसो जल। बेकलू खेत की चिड़िया है, प्रतीक्षा पूछती है; बेक्यू शीर्षक नहीं। रूँख वृक्ष है, सूखे में तपस्वी। क्यों भटकती है प्यास की खोज है। हरा कर देगी मरुधरा की आशा है। बरसो जल थार की प्रार्थना है — आज्ञार्थ जल बरस, काल-गणना नहीं। वैषम्य स्वर पर है। चिंतन, आँगन-प्रकाश, गवाही, फेरी-क्षय, मरु-प्यास। अज्ञेय व्यक्ति रखते हैं। नागार्जुन जन रखते हैं। मिश्र सादगी रखते हैं। कागद थार रखते हैं। मेहता वृक्ष-होना रखते हैं। सीमाएँ दुरुहता, मिथक की छाया, नारा, सरलता और लोक-शब्द हैं। मेहता का वृक्षत्व नैतिक सुगंध है; कागद का रूँख मरु का तप है। मिश्र कहते हैं बचा नहीं; कागद जल माँगते हैं। बेकलू चिड़िया है, भोज्य पदार्थ नहीं। बरसो जल प्रार्थना है। पाँचों आधुनिक मनुष्य को अलग आलंबन देते हैं — द्वीप, आँगन, प्रेत, फेरी, थार। बिना शीर्षक के साम्य-वैषम्य अधूरा रह जाता है।

निष्कर्ष यह है कि साम्य आधुनिक छोटी कविता पर है, वैषम्य द्वीप, माँ-वृक्ष, प्रेत-मुस्कान, गीत-बाजार और बेकलू-जल पर है। पाँच कवि पाँच आलंबन हैं, एक स्वर नहीं।

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