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चार एकांकी — वर्मा, अश्क, माथुर, भारती notes

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चार एकांकी — वर्मा, अश्क, माथुर, भारती is a topic in Drama and non-fiction (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

चार एकांकी हैं। रामकुमार वर्मा — एक तोला अफ़ीम की कीमत। उपेन्द्रनाथ अश्क — साहब को ज़ुकाम है। जगदीश चंद्र माथुर — मकड़ी का जाला। धर्मवीर भारती — आवाज़ का…

इकाई 3 · चार एकांकी — वर्मा, अश्क, माथुर, भारती

चार एकांकी हैं। रामकुमार वर्मा — एक तोला अफ़ीम की कीमत। उपेन्द्रनाथ अश्क — साहब को ज़ुकाम है। जगदीश चंद्र माथुर — मकड़ी का जाला। धर्मवीर भारती — आवाज़ का नीलाम। एक अंक, एक स्थिति, एक चोट। कहानी नहीं, क्योंकि खेली जाती है। पूर्ण नाटक की कटी पूँछ नहीं। अंधायुग भारती का पद्य-नाटक है, यह एकांकी नहीं। कोणार्क माथुर का पूर्ण नाटक है, यह एकांकी नहीं। पाठ प्रसंग और भाव से होता है।

ओझा एकांकी को विकास का सोपान मानते हैं। जैन रंग से नहीं काटते। तनेजा आधुनिक परिदृश्य में संक्षेप के नाटक देखते हैं। लंबा संवाद नहीं; प्रसंग — मूल्य, सर्दी, जाल, नीलाम। चार स्वर एक रूप हैं, एक कथा नहीं।

भुवनेश्वर प्रयोग रखते हैं, निर्धारित नहीं। पृथ्वीराज की आँखें और रेशमी टाई वर्मा की प्रसिद्ध एकांकी हैं, पाठ्य अफ़ीम-पाठ अलग है। अंजो दीदी अश्क का दूसरा नाटक है। चार स्वर एक रूप हैं, एक कथा नहीं। ओझा एकांकी को विकास का सोपान मानते हैं।

सार: वर्मा = मूल्य-अफ़ीम, मुरारीलाल। अश्क = कार्यालय-सर्दी। माथुर = जाल-प्रतीक; कोणार्क अलग। भारती = दिवाकर-बाजोरिया; अंधायुग अलग।

1 चार एकांकी — रूप और निषेध

एकांकी एक अंक का दृश्य-रूप है। पात्र कम। समय सिमटा। स्थान प्रायः एक। संघर्ष एक। प्रभाव एक। वर्मा इस रूप को हिन्दी में स्थिर करते हैं। अश्क मध्यवर्ग और तंत्र देते हैं। माथुर प्रतीक और नैतिक दबाव देते हैं। भारती व्यंग्य-एकांकी भी लिखते हैं। चार स्वर चार चोट हैं — मूल्य, साहब, जाल, नीलाम।

अंतर साफ है। पृथ्वीराज की आँखें और रेशमी टाई वर्मा की प्रसिद्ध एकांकी हैं; यह अफ़ीम-पाठ है। अंजो दीदी अश्क का नाटक है, यह ज़ुकाम नहीं। भोर का तारा माथुर का संग्रह-नाम है; निर्धारित जाला है। गुनाहों का देवता भारती का उपन्यास है। बिना इस अंतर के नाम मिल जाते हैं।

गलत वाक्य — एकांकी नाटक की कटी पूँछ या छोटी कहानी है। सही वाक्य — एकांकी एक अंक का स्वतंत्र दृश्य-रूप है, खेली जाती है। रेडियो ने कान तक पहुँचाया; रंगमंच ने संक्षेप माँगा। भुवनेश्वर प्रयोग और अंधकार रखते हैं, निर्धारित सूची में नहीं। कैद और छठा बेटा अश्क के अन्य स्वर हैं। भोर का तारा माथुर-संग्रह है, जाला पाठ है। गुनाहों का देवता उपन्यास है, नीलाम एकांकी है।

ओझा एकांकी को विकास का सोपान मानते हैं, पूर्ण नाटक का टुकड़ा नहीं। जैन कहते हैं — खेले बिना संवाद गद्य-कथा रह जाता है। तनेजा आधुनिक परिदृश्य में संक्षेप को रंग-विधि मानते हैं। चार निर्धारित चोटें एक रूप हैं, एक कथा नहीं — मूल्य, सर्दी, जाल, आवाज़। पृथ्वीराज की आँखें वर्मा की ऐतिहासिक एकांकी है; यह इकाई अफ़ीम-पाठ माँगती है। अंजो दीदी अश्क का दूसरा नाटक है, ज़ुकाम नहीं।

एकांकीलेखकनहीं मिलाएँ
एक तोला अफ़ीम की कीमतरामकुमार वर्मारेशमी टाई — दूसरी एकांकी
साहब को ज़ुकाम हैउपेन्द्रनाथ अश्कअंजो दीदी — दूसरा नाटक
मकड़ी का जालाजगदीश चंद्र माथुरकोणार्क — पूर्ण नाटक
आवाज़ का नीलामधर्मवीर भारतीअंधायुग — पद्य-नाटक

2 रामकुमार वर्मा

जन्म 15 सितंबर 1905, सागर। निधन 1990। प्रयाग विश्वविद्यालय में हिन्दी अध्यापन। पद्म भूषण 1963। वे हिन्दी एकांकी के केंद्र-नाम माने जाते हैं; जनक कहना विवाद रखता है, भुवनेश्वर प्रयोग साथ हैं। ऐतिहासिक एकांकी — पृथ्वीराज की आँखें, 1938 संग्रह। सामाजिक-व्यंग्य — रेशमी टाई, 1941 संग्रह। निर्धारित पाठ मूल्य और नशे का व्यंग्य है। कविता में छाया-रहस्य का स्पर्श है; एकांकी गद्य-दृश्य है।

शिल्प एक स्थिति पर कसा है। संवाद नैतिक प्रश्न खोलते हैं, भाषण नहीं बनने चाहिए। सीमा उपदेश का बोझ है। गुण एक चोट और मध्यवर्ग का चित्र है। बिना उदाहरण के केंद्र-नाम सूखा रहता है। उदाहरण यही अफ़ीम-एकांकी है।

प्रयाग का अध्यापन उन्हें एकांकी का स्थिर केंद्र बनाता है; जनक कहना भुवनेश्वर को काट देता है। ऐतिहासिक एकांकी में पृथ्वीराज अंधे राजा का द्वंद्व है। सामाजिक-व्यंग्य में रेशमी टाई दिखावा का है। निर्धारित अफ़ीम-पाठ नशे का प्रचार नहीं, प्राण का दाम है। कविता में छाया-रहस्य का स्पर्श रहता है; एकांकी गद्य-दृश्य माँगती है। पद्म भूषण 1963 सम्मान है, कृति नहीं।

शिल्प एक स्थिति पर कसा रहता है। संवाद नैतिक प्रश्न खोलते हैं; भाषण बन जाएँ तो एकांकी निबंध हो जाती है। सीमा उपदेश की अंगुली है। गुण एक चोट और मध्यवर्ग का चित्र है। गलत वाक्य — वर्मा केवल ऐतिहासिक एकांकी लिखते हैं। सही वाक्य — ऐतिहासिक और सामाजिक दोनों धाराएँ हैं; पाठ्य-शीर्षक मूल्य का व्यंग्य है। बिना अफ़ीम-उदाहरण के केंद्र-नाम सूखा रहता है।

संकेततथ्य
जन्म–निधन1905, सागर — 1990
संग्रह-संकेतपृथ्वीराज की आँखें; रेशमी टाई
निर्धारितएक तोला अफ़ीम की कीमत

3 एक तोला अफ़ीम की कीमत — नाम और स्थिति

नाम तराजू है। एक तोला अफ़ीम सस्ती वस्तु लगती है। कीमत जीवन से टकराती है। नायक मुरारीलाल आर्थिक अभाव और प्रतिष्ठा के बोझ में है। निराशा आत्महत्या की ओर ले जाती है। प्रयत्न अफ़ीम से होता है। पता चलता है — जान लेने वाली अफ़ीम का दाम बहुत छोटा है। भाव यह कि मनुष्य आवेश में अपना मूल्य सस्ता नाप लेता है। असफल प्रयत्न बोध बनता है।

यह नशा-प्रचार का चित्र नहीं, मूल्य का व्यंग्य है। अंधेर नगरी में टका-सेर तराजू टूटा है। यहाँ तोला जीवन को सस्ता दिखाता है। दोनों मूल्य पूछते हैं; रूप अलग है। प्रहसन हँसता है। यह एकांकी भीतर का धक्का देती है। लंबा संवाद नहीं चाहिए। प्रसंग — सस्ती अफ़ीम, महँगा जीवन जो सस्ता समझ लिया गया।

मुरारीलाल गोवर्धन नहीं। गोवर्धन मिठाई से मोटा होता है; मुरारीलाल निराशा से सस्ता हो जाता है। दोनों तराजू हैं — टका-सेर सार्वजनिक हाट का, तोला निजी प्राण का। प्रहसन हँसता है; यह एकांकी भीतर का धक्का देती है। असफल प्रयत्न बोध बनता है, उपदेश की सूची नहीं। नाम में कीमत शब्द ही व्यंग्य है — वस्तु छोटी, दाव जीवन।

देशकाल सिमटा मध्यवर्गीय स्थान है, काशी का हाट नहीं। समय एक स्थिति जितना है, छह दृश्य नहीं। संघर्ष सेना का नहीं, मन का है। रेशमी टाई सामाजिक दिखावा काटेगी; यह पाठ प्राण का दाम काटता है। पृथ्वीराज इतिहास-पुरुष है, निर्धारित नहीं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है — सस्ती अफ़ीम, महँगा जीवन जो आवेश में सस्ता नाप लिया गया।

4 अफ़ीम-एकांकी — संवेदना और शिल्प

संवेदना जीवन की अमूल्यता है। क्षणिक हताशा मूल्य तोड़ती है। वर्मा मनोवैज्ञानिक एकांकी की ओर हैं — घटना पतली, निर्णय घना। पात्र कम। स्थान सिमटा। समय एक रात या एक स्थिति जितना। संघर्ष मुरारीलाल और उसके निराश मन के बीच है, सेना के बीच नहीं।

शिल्प एक चोट माँगता है। दूसरा अंक की लालसा दोष है। भाषण दोष है। गुण यह कि शीर्षक स्वयं प्रश्न है। सीमा नैतिक अंगुली है। रेशमी टाई सामाजिक दिखावा है; यह पाठ प्राण का दाम है। दोनों वर्मा हैं; निर्धारित यही अफ़ीम है।

वर्मा मनोवैज्ञानिक एकांकी की ओर हैं — घटना पतली, निर्णय घना। पात्र कम। द्वंद्व मुरारीलाल और उसके निराश मन के बीच है। दूसरा अंक जोड़ने की लालसा दोष है क्योंकि प्रभाव टूट जाता है। कहानी जैसा वर्णन रंग को रोकता है। गुण यह कि शीर्षक स्वयं प्रश्न है। सीमा नैतिक अंगुली है — यदि वाक्य उपदेश बन जाएँ।

अंधेर नगरी का तराजू सार्वजनिक हँसी है। कबीरा का तराजू संत का वचन है। यह तराजू निजी प्राण का है। तीनों मूल्य पूछते हैं; रूप अलग हैं। गलत वाक्य — यह नशा-निषेध का सरकारी चित्र है। सही वाक्य — यह मूल्य का व्यंग्य है, जान लेने वाली वस्तु का दाम जीवन से छोटा निकलता है। निर्धारित यही अफ़ीम-पाठ है, रेशमी टाई नहीं।

5 उपेन्द्रनाथ अश्क

जन्म 14 दिसंबर 1910, जलंधर। निधन 19 जनवरी 1996। कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी। गिरती दीवारें उपन्यास-श्रृंखला। अंजो दीदी नाटक। कैद। छठा बेटा। एकांकी-संग्रह के नाम पर साहब को ज़ुकाम है भी आता है; निर्धारित एक पाठ वही शीर्षक है। भाषा बोलचाल। दृष्टि मध्यवर्ग, दांपत्य, तंत्र।

अश्क प्रसाद की गरिमा नहीं रखते। राकेश के निकट बोलचाल में हैं, दांपत्य-शिखर आधे-अधूरे पर है। यहाँ कार्यालय व्यंग्य है। सीमा कभी घटना का बिखराव है। गुण यह कि साहब का जुकाम सार्वजनिक अड़चन बन जाता है।

जलंधर जन्म, लाहौर-दिल्ली का लेखक-संसार, फिर हिन्दी रंग और कथा। गिरती दीवारें उपन्यास-श्रृंखला मध्यवर्ग की दीवारें गिराती है, यह एकांकी नहीं। अंजो दीदी स्त्री-केंद्र नाटक है; निर्धारित ज़ुकाम कार्यालय है। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली है, प्रसाद की गरिमा नहीं। दृष्टि दांपत्य और तंत्र दोनों छूती है; यहाँ तंत्र प्रधान है।

अश्क राकेश के निकट बोलचाल में हैं; दांपत्य-शिखर फिर भी आधे-अधूरे 1969 पर है। यहाँ साहब का जुकाम सार्वजनिक अड़चन बन जाता है। सीमा घटना का बिखराव कभी पड़ता है। गुण यह कि छोटा रोग बड़ा अधिकार बन जाता है। कैद और छठा बेटा अन्य स्वर हैं, पाठ्य-शीर्षक नहीं। बिना ज़ुकाम-उदाहरण के अश्क केवल कहानीकार रह जाते हैं।

संकेततथ्य
जन्म–निधन1910, जलंधर — 1996
निर्धारितसाहब को ज़ुकाम है
नहींअंजो दीदी; गिरती दीवारें

6 साहब को ज़ुकाम है — सर्दी और अधिकार

देशकाल कार्यालय है। साहब सर्दी से ग्रस्त हैं, या सर्दी को मुखौटा बनाते हैं। फाइलें रुकती हैं। अधीनस्थ प्रतीक्षा करते हैं। छोटा रोग बड़ा तंत्र बन जाता है। व्यंग्य शरीर पर नहीं, अधिकार पर है। जुकाम बहाना भी है, लक्षण भी। प्रसंग — काम साहब की नाक पर टिका है। भाव — सत्ता की सर्दी सबको ठिठुरती है।

यह अफ़ीम का भीतर का धक्का नहीं। यह बाहर का तंत्र है। मकड़ी का जाल संबंध का है; यह जुकाम पद का है। आवाज़ का नीलाम पूँजी का है। चारों मध्यवर्ग छूते हैं; आलंबन अलग है। संवाद तेज हैं, भाषण नहीं। अंधेर नगरी का राजा शराब में है; यह साहब सर्दी में है। दोनों कुशासन के छोटे रूप हैं, शतक और रूप अलग हैं।

फाइलें रुकती हैं। अधीनस्थ प्रतीक्षा करते हैं। छोटा रोग बड़ा तंत्र बन जाता है। व्यंग्य शरीर पर नहीं, अधिकार पर है। जुकाम बहाना भी है, लक्षण भी। संवाद तेज हैं, भाषण नहीं। अंधेर नगरी का राजा शराब में है; यह साहब सर्दी में है। दोनों कुशासन के छोटे रूप हैं, शतक और रूप अलग हैं।

चारों मध्यवर्ग छूते हैं; आलंबन अलग है — प्राण का दाम, पद की सर्दी, संबंध का जाल, प्रेस की बिक्री। गलत वाक्य — यह चिकित्सा-चित्र है। सही वाक्य — यह कार्यालय-अधिकार का व्यंग्य है। अंजो दीदी स्त्री-केंद्र नाटक है, निर्धारित ज़ुकाम नहीं। कैद और छठा बेटा अन्य स्वर हैं।

7 जगदीश चंद्र माथुर

जन्म 16 जुलाई 1917, खुर्जा। निधन 14 मई 1978। आईसीएस। आकाशवाणी के महासंचालक; रेडियो का नाम आकाशवाणी इन्हीं के समय जुड़ा। रंग-शिल्प और लोक-नाट्य पर लेखन — परंपराशील नाट्य। एकांकी — भोर का तारा, ओ मेरे सपने। पूर्ण नाटक कोणार्क 1951 — शिल्पी, मंदिर, व्यवस्था; निर्धारित नहीं। निर्धारित एकांकी मकड़ी का जाला है।

शैली मँजी, संवाद वातावरण के अनुकूल। मध्यवर्ग पर परिवर्तन का दबाव। प्रतीक कोणार्क में शिल्प है; यहाँ जाल स्वार्थ का है। दोनों माथुर हैं; विधा और आलंबन अलग हैं। बिना इस अंतर के दोनों एक लगते हैं।

आईसीएस प्रशासन का अनुशासन रंग-शिल्प में आता है। आकाशवाणी का नाम उनके महासंचालक-काल से जुड़ा; रेडियो ने एकांकी को कान दिया। परंपराशील नाट्य लोक-रंग पर लेखन है। ओ मेरे सपने दूसरा एकांकी-स्वर है। कोणार्क 1951 शिल्पी, मंदिर और व्यवस्था का पूर्ण नाटक है — पत्थर और श्रम। निर्धारित जाला एक स्थिति का नैतिक चित्र है।

दोनों माथुर हैं; विधा और आलंबन अलग हैं। बिना अंतर के कोणार्क और जाला एक लगते हैं। शैली मँजी है, संवाद वातावरण के अनुकूल। मध्यवर्ग पर परिवर्तन का दबाव है। प्रतीक कोणार्क में शिल्प है; यहाँ जाल स्वार्थ का है। गलत वाक्य — निर्धारित पाठ कोणार्क है। सही वाक्य — निर्धारित मकड़ी का जाला एकांकी है।

संकेततथ्य
जन्म–निधन1917, खुर्जा — 1978
कोणार्क1951; पूर्ण नाटक
निर्धारितमकड़ी का जाला; एकांकी

8 मकड़ी का जाला — प्रतीक

शीर्षक प्रतीक है। मकड़ी जाल बुनती है। शिकार स्वयं फँसता है। आधुनिक मनुष्य स्वार्थ और भौतिक मोह के जाल में है। संबंध भी जाल बन सकते हैं। एकांकी इस जाल को एक स्थिति में दिखाती है, महाकाव्य नहीं फैलाती। पात्र मध्यवर्ग के हैं। संघर्ष बाहर की सेना नहीं, भीतर की फँसन है।

कोणार्क मंदिर और शिल्पी का बड़ा रूप है। यह जाला एक स्थिति का नैतिक चित्र है। भोर का तारा भावुकता छूता है; निर्धारित पाठ जाल की चोट है। प्रसंग — फँसना, बुनना, शिकार। भाव — स्वार्थ दूसरों को और अंत में स्वयं को बाँधता है। लंबा उद्धरण नहीं। प्रतीक शीर्षक से ही खुलता है।

प्रतीक रूपक से पतला और तेज होता है। मकड़ी बुनती है; शिकार फँसता है; बुननेवाला भी उसी जाल का हिस्सा बन सकता है। आधुनिक मनुष्य स्वार्थ और भौतिक मोह में है। संबंध प्रेम कहलाकर भी जाल हो जाते हैं। एकांकी महाकाव्य नहीं फैलाती — एक स्थिति, एक फँसन। पात्र मध्यवर्ग के हैं। संघर्ष बाहर की सेना नहीं।

भोर का तारा भावुकता छूता है; निर्धारित पाठ जाल की चोट है। कोणार्क मंदिर का बड़ा रूप है। प्रसंग — फँसना, बुनना, शिकार। भाव — स्वार्थ दूसरों को और अंत में स्वयं को बाँधता है। लंबा उद्धरण नहीं; प्रतीक शीर्षक से खुलता है। यह अंधायुग का कुरुक्षेत्र नहीं। यह अंधेर नगरी का हाट नहीं। यह निजी जाल का दृश्य है।

9 धर्मवीर भारती

जन्म 25 दिसंबर 1926, प्रयाग। निधन 4 सितंबर 1997। कवि, कथाकार, नाटककार, संपादक — धर्मयुग। गुनाहों का देवता उपन्यास। अंधायुग 1955 पद्य-नाटक, कुरुक्षेत्र के बाद का नैतिक अँधेरा। निर्धारित एकांकी आवाज़ का नीलाम व्यंग्य है। दो पात्र। अखबार और पूँजी। स्वतंत्रता के बाद भी नैतिक बेड़ी।

भारती एक लेखक, दो रूप। पद्य-नाटक युद्ध के बाद का प्रश्न है। एकांकी पत्रकार की बिकी आवाज़ है। मिलाया नहीं जाता। नाम का अँधेरा अंधेर नगरी से भी नहीं मिलता। यहाँ नीलाम है, अँधेरा नहीं।

धर्मयुग के संपादक ने सार्वजनिक गद्य चलाया; नाटक उसी सार्वजनिक दृष्टि का दृश्य-सिरा है। गुनाहों का देवता चंद्रसेखर-सुधामा का उपन्यास है, रंगमंच नहीं। अंधायुग 1955 पद्य-नाटक है — अश्वत्थामा और युयुत्सु के बाद का नैतिक अँधेरा। निर्धारित आवाज़ का नीलाम गद्य-एकांकी है — दो पात्र, अखबार, पूँजी। एक लेखक, दो रूप; मिलाया नहीं जाता।

नाम का अँधेरा अंधेर नगरी से भी नहीं मिलता। यहाँ नीलाम है, अँधेरा नहीं। स्वतंत्रता के बाद भी नैतिक बेड़ी — यही व्यंग्य का देशकाल है। गलत वाक्य — निर्धारित पाठ अंधायुग है। सही वाक्य — निर्धारित आवाज़ का नीलाम है। बिना इस काट के भारती केवल कवि-नाटककार रह जाते हैं, एकांकीकार नहीं।

संकेततथ्य
जन्म–निधन1926–1997
अंधायुग1955; पद्य-नाटक
निर्धारितआवाज़ का नीलाम; एकांकी

10 आवाज़ का नीलाम — दिवाकर और बाजोरिया

मंच प्रायः दो पात्र। दिवाकर अखबार आवाज़ के संपादक हैं। निडर पत्रकार, जन की बात। पत्नी की लंबी बीमारी और तंगी उन्हें आवाज़ बेचने को विवश करती है। आवाज़ दो अर्थ — अखबार का नाम, और अभिव्यक्ति। सेठ बाजोरिया पूँजी है। जो गलत काम पर धिक्कार पाता था, विवशता में देवता जैसा लगने लगता है।

पत्नी की मृत्यु के बाद दिवाकर आवाज़ लौटाना चाहते हैं। सेठ नहीं लौटाता — बिकी आवाज़ वापस नहीं होती। प्रसंग यही है। भाव — पत्रकार जनता की आवाज़ होता है; वही बिक जाए तो विडंबना पूरी है। स्वतंत्रता 1947 के बाद का व्यंग्य है, अंधायुग का महाभारत नहीं। लंबे संवाद यहाँ नहीं।

आवाज़ दो अर्थ रखती है — पत्र का नाम, और अभिव्यक्ति का हक। दिवाकर निडर संपादक हैं; तंगी और पत्नी की बीमारी उन्हें बेचने को विवश करती है। बाजोरिया सेठ पूँजी है, जो धिक्कार से देवता बन बैठता है। पत्नी की मृत्यु के बाद लौटाने की इच्छा सेठ नहीं मानता — बिकी आवाज़ वापस नहीं होती। विडंबना यही पूरी होती है।

यह 1947 के बाद का प्रेस-व्यंग्य है, महाभारत का पद्य नहीं। लंबे संवाद यहाँ नहीं; प्रसंग और भाव लिखे जाते हैं। अंधेर नगरी में सब टके सेर बिकता है; यहाँ आवाज़ नीलाम होती है। दोनों बिक्री के तराजू हैं। कबीरा वचन नहीं बेचता; दिवाकर विवशता में बेचता है। गलत वाक्य — सेठ अंत में आवाज़ लौटा देता है। सही वाक्य — बिकी आवाज़ वापस नहीं होती।

11 चार स्वर — साम्य और वैषम्य

साम्य रूप है — एक अंक, मध्यवर्ग, व्यंग्य या नैतिक चोट, खेला जाने वाला गद्य। साम्य युग है — बीसवीं शताब्दी का आधुनिक नगर-मन। वर्मा मूल्य पूछते हैं। अश्क तंत्र पूछते हैं। माथुर जाल पूछते हैं। भारती आवाज़ पूछते हैं।

वैषम्य आलंबन पर है। अफ़ीम भीतर की निराशा है। जुकाम कार्यालय की सर्दी है। जाला संबंध-स्वार्थ है। नीलाम पूँजी और प्रेस है। अंधेर नगरी का हाट सार्वजनिक तमाशा है; ये चार सिमटी स्थितियाँ हैं। कबीरा संत का चौक है। एकांकी वह चौक नहीं।

वर्मा मूल्य पूछते हैं। अश्क तंत्र पूछते हैं। माथुर जाल पूछते हैं। भारती आवाज़ पूछते हैं। युग बीसवीं शताब्दी का नगर-मन है। रूप एक अंक का गद्य-दृश्य है। बिना वैषम्य के चार शीर्षक एक ढेर लगते हैं। अंधेर नगरी का हाट सार्वजनिक तमाशा है; ये चार सिमटी स्थितियाँ हैं।

कबीरा संत का चौक है; एकांकी वह चौक नहीं। आधे-अधूरे दांपत्य का पूर्ण नाटक है; ये एक अंक की चोट हैं। कोणार्क और अंधायुग शिखर हैं, इस चार-सूची में नहीं। गलत वाक्य — चार एकांकी एक ही कथा के चार अंक हैं। सही वाक्य — चार स्वतंत्र कृतियाँ, एक रूप। पृथ्वीराज और अंजो दीदी प्रसिद्ध हैं, निर्धारित नहीं।

12 तत्त्व इन चार में

कथावस्तु एक स्थिति है। मुरारीलाल का प्रयत्न। साहब की सर्दी। जाल की फँसन। आवाज़ का बिकना। संघर्ष एक है। चरित्र कम हैं — दिवाकर-बाजोरिया दो तक सिमट सकते हैं। कथोपकथन प्रधान है। देशकाल कार्यालय, अखबार, मध्यवर्गीय स्थान। उद्देश्य बोध और व्यंग्य है।

शिल्प संक्षेप है। रेडियो ने एकांकी को कान तक पहुँचाया; माथुर आकाशवाणी से जुड़े। रंग संक्षेप है। दोष भाषण, दूसरी कड़ी की लालसा, कहानी जैसा वर्णन। गुण एक चोट। चार उदाहरण तत्त्व को गिनती से बचाते हैं।

चरित्र कम हैं; दिवाकर-बाजोरिया दो तक सिमट सकते हैं। कथोपकथन प्रधान माध्यम है। देशकाल कार्यालय, अखबार, सिमटा मध्यवर्गीय स्थान। उद्देश्य बोध और व्यंग्य है, तमाशा नहीं। मात्रा छोटी है, तत्त्व वही हैं। पूर्ण नाटक कई अंक में कारण फैलाता है; एकांकी एक दबाव में काटती है। यही तत्त्व-अंतर है, केवल लंबाई नहीं।

रेडियो ने कान दिया; माथुर आकाशवाणी से जुड़े। रंग संक्षेप माँगता है। दोष तीन — भाषण, दूसरी कड़ी की लालसा, कहानी जैसा वर्णन। गुण एक चोट। चार उदाहरण तत्त्व को गिनती से बचाते हैं — प्रयत्न, सर्दी, फँसन, बिकना। गलत वाक्य — तत्त्व एकांकी में बदल जाते हैं। सही वाक्य — तत्त्व वही, मात्रा छोटी।

13 महत्त्व, सीमा, पाठ

महत्त्व यह है कि हिन्दी एकांकी तमाशा-प्रहसन से समस्या और प्रतीक तक आई। वर्मा स्थिर करते हैं। अश्क तंत्र देते हैं। माथुर प्रतीक देते हैं। भारती प्रेस-पूँजी देते हैं। ओझा इतिहास में एकांकी को सोपान मानते हैं। नेमिचंद्र जैन रंग से काटते नहीं।

सीमा चारों ओर है। उपदेश। सपाट साहब। प्रतीक का अमूर्त हो जाना। सेठ का एकआयामी खल। गुण यह कि निर्धारित चार स्वर याद रह जाते हैं। पाठ प्रसंग-भाव है। अंधायुग और कोणार्क शिखर हैं, इन चार एकांकियों में नहीं।

ओझा इतिहास में एकांकी को सोपान मानते हैं। जैन रंग से नहीं काटते। तनेजा संक्षेप को आधुनिक रंग-विधि कहते हैं। वर्मा स्थिर करते हैं। अश्क तंत्र देते हैं। माथुर प्रतीक देते हैं। भारती प्रेस-पूँजी देते हैं। महत्त्व तमाशा-प्रहसन से समस्या और प्रतीक तक आना है।

सीमा उपदेश, सपाट साहब, प्रतीक का अमूर्त हो जाना, सेठ का एकआयामी खल। गुण चार स्वर याद रह जाते हैं। पाठ प्रसंग-भाव है, पूरे संवाद का उतार नहीं। अंधायुग और कोणार्क शिखर हैं, इन चार एकांकियों में नहीं। पृथ्वीराज और अंजो दीदी प्रसिद्ध हैं, निर्धारित नहीं।

सार: मुरारीलाल = सस्ती अफ़ीम, महँगा जीवन। साहब = सर्दी-अधिकार। जाला = स्वार्थ-फँसन; कोणार्क अलग। दिवाकर बेचता है, बाजोरिया नहीं लौटाता; अंधायुग अलग।

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