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अंधेर नगरी और कबीरा खड़ा बाजार में notes
Readyअंधेर नगरी और कबीरा खड़ा बाजार में is a topic in Drama and non-fiction (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.
दो नाटक हैं। पहला — भारतेंदु हरिश्चंद्र की अंधेर नगरी, 1881, प्रहसन, छह दृश्य। दूसरा — भीष्म साहनी का कबीरा खड़ा बाजार में, 1981, संत-इतिहास का आधुनिक…
इकाई 2 · अंधेर नगरी और कबीरा खड़ा बाजार में
दो नाटक हैं। पहला — भारतेंदु हरिश्चंद्र की अंधेर नगरी, 1881, प्रहसन, छह दृश्य। दूसरा — भीष्म साहनी का कबीरा खड़ा बाजार में, 1981, संत-इतिहास का आधुनिक पुनर्पाठ। दोनों सार्वजनिक चौक पर बोलते हैं। एक कुशासन का तमाशा तोड़ता है। दूसरा पंथ और जाति के पाखंड पर संत को खड़ा करता है। अंधायुग भारती का पद्य-नाटक है, यह कृति नहीं। तमस साहनी का उपन्यास है, यह नाटक नहीं। कबीर ग्रंथावली कविता है, साहनी का संवाद अलग है।
ओझा लोकप्रिय व्यंग्य में अंधेर नगरी पढ़ते हैं। जैन रंग को साहित्य से नहीं काटते। द्विवेदी कबीर को नाथ-योग और भक्ति से पढ़ते हैं; साहनी रंग पर सार्वजनिक पुरुष बनाते हैं। भारतेंदु के सूत्र-वाक्य पर्याप्त हैं। साहनी के लंबे संवाद यहाँ नहीं; प्रसंग और भाव लिखे जाते हैं।
दोनों सार्वजनिक चौक पर बोलते हैं — एक कुशासन का तमाशा तोड़ता है, दूसरा पंथ और जाति के पाखंड पर संत को खड़ा करता है। भारत दुर्दशा करुण है, यह प्रहसन व्यंग्य है। माधवी और हानूश निर्धारित नहीं। पाठ में भारतेंदु के सूत्र-वाक्य पर्याप्त हैं; साहनी के लंबे संवाद नहीं उतारे जाते।
1 दो कृतियाँ — स्थान और निषेध
अंधेर नगरी भारतेंदु युग का व्यंग्य-नाटक है। काशी के हिंदू नेशनल थियेटर के लिए एक दिन में लिखा गया कहा जाता है। रूप प्रहसन है। अंक की जगह दृश्य हैं — छह। लक्ष्य नगर का नाम नहीं, कुशासन का स्वभाव है। कबीरा खड़ा बाजार में साहनी का नाटक है। देशकाल काशी की जुलाहा-बस्ती, घाट और हाट है। नायक संत कबीर है, ग्रंथ का पद-संग्रह नहीं। दोनों गद्य-दृश्य हैं। एक हास्य से मारता है। दूसरा सत्संग और टकराव से मारता है।
अंतर साफ है। भारत दुर्दशा देश-करुण है, अंधेर नगरी व्यंग्य है। आधे-अधूरे दांपत्य-यथार्थ है, यह प्रहसन नहीं। अंधायुग कुरुक्षेत्र के बाद का नैतिक अँधेरा है; नाम का अँधेरा-साम्य भ्रम है। साहनी की माधवी दूसरा नाटक है, निर्धारित नहीं। बिना इस अंतर के दो शीर्षक एक ढेर लगते हैं।
एक हास्य से मारता है, दूसरा सत्संग और टकराव से। दोनों गद्य-दृश्य हैं, पद्य-नाटक नहीं। काशी दोनों को छूती है — भारतेंदु काशी के लेखक, कबीर काशी के संत — फिर भी प्रश्न अलग हैं। ओझा व्यंग्य-सोपान यहीं देखते हैं। जैन कहते हैं — खेले बिना हलका पड़ता है। माधवी और हानूश साहनी के अन्य नाटक हैं, निर्धारित नहीं।
भारत दुर्दशा देश-करुण है; यह प्रहसन व्यंग्य है। आधे-अधूरे दांपत्य-यथार्थ है, यह नहीं। अंधायुग कुरुक्षेत्र के बाद का नैतिक अँधेरा है; नाम का अँधेरा-साम्य भ्रम है। तमस 1973 विभाजन-उपन्यास है। गलत वाक्य — दोनों नाटक एक ही अँधेरे के दो अंक हैं। सही वाक्य — 1881 प्रहसन है, 1981 इतिहास-पुनर्पाठ है।
| कृति | वर्ष | रूप |
|---|---|---|
| अंधेर नगरी | 1881 | प्रहसन; छह दृश्य |
| कबीरा खड़ा बाजार में | 1981 | संत-इतिहास; आधुनिक रंग |
| नहीं | — | अंधायुग; तमस; कबीर ग्रंथावली |
2 भारतेंदु और अंधेर नगरी
भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850, काशी। निधन 6 जनवरी 1885, काशी। पत्र, कविता, नाटक। अंधेर नगरी उनके सबसे खेले जाने वाले नाटकों में है। पूर्ण शीर्षक प्रायः अंधेर नगरी चौपट राजा टके सेर भाजी टके सेर खाजा कहा जाता है। वर्ष 1881 है। भाषा खड़ी बोली गद्य, हाट की पुकार, दोहे का स्पर्श। दृष्टि सुधार और व्यंग्य की है। पारसी तमाशा दर्शक देता है; यह प्रश्न देता है।
नाटक छोटा है, प्रभाव तेज है। राजा शराब और मनमानी में डूबा है। बाजार में गुण और अवगुण एक दाम पर बिकते हैं। शिष्य लोभ में ठहरता है। अंत में कुशासन अपने तर्क से स्वयं नष्ट होता है। आलोचना इसे औपनिवेशिक और देशी दोनों कुशासनों पर चोट पढ़ती है। सीमा शीघ्रता और सपाट राजा है। गुण यह कि हिन्दी नाटक को सार्वजनिक हँसी-चोट मिली।
आलोचना इसे औपनिवेशिक और देशी दोनों कुशासनों पर चोट पढ़ती है। सीमा शीघ्रता और सपाट राजा है। गुण सार्वजनिक हँसी-चोट है। काशी के हिंदू नेशनल थियेटर के लिए एक दिन में लिखा गया कहा जाता है। पूर्ण शीर्षक में टके सेर भाजी टके सेर खाजा जुड़ा रहता है। पत्र, कविता, नाटक — तीनों भारतेंदु करते हैं; निर्धारित यही प्रहसन है।
जन्म 9 सितंबर 1850 काशी; निधन 6 जनवरी 1885 — सीमा-पुरुष का छोटा शिखर यही खेला जाने वाला व्यंग्य है। पारसी तमाशा दर्शक देता है; यह प्रश्न देता है। भारत दुर्दशा रोती है; यह हँसती है। गलत वाक्य — अंधेर नगरी ऐतिहासिक त्रासदी है। सही वाक्य — अंधेर नगरी 1881 का प्रहसन है, छह दृश्य।
3 नाम और छह दृश्य
अंधेर नगरी नाम अँधेरे शासन का है, भूगोल का नहीं। चौपट राजा नाम ही निर्णय है — शासन बिखरा, न्याय उलटा। टके सेर भाजी टके सेर खाजा मूल्य का समीकरण है। सब्जी और मिठाई एक दाम। अर्थ यह है कि विवेक का तराजू टूटा है। रूप प्रहसन है। प्रहसन हँसी से दोष दिखाता है, करुण-त्रासदी नहीं। छह दृश्य कथा बाँधते हैं। पारंपरिक पाँच अंक यहाँ नहीं।
अंधेर नगरी चौपट राजा।
टके सेर भाजी, टके सेर खाजा।
भारतेंदु — अंधेर नगरी (शीर्षक-सूत्र)
पहला दृश्य महंत और दो शिष्य। दूसरा हाट — सब टके सेर। तीसरा महंत की चेतावनी; गोवर्धन ठहरता है, नारायण दास चलता है। चौथा दरबार — बकरी की मृत्यु से कोतवाल तक फाँसी की श्रृंखला। पाँचवाँ मोटे शिष्य को फाँसी के लिए पकड़ना। छठा श्मशान — महंत का मंत्र, राजा स्वयं फाँसी चढ़ता है। बिना दृश्य-क्रम के व्यंग्य किस्सा रह जाता है।
गलत वाक्य — नाम किसी नगर के भूगोल का है। सही वाक्य — नाम कुशासन के स्वभाव का है। चौपट राजा नाम ही निर्णय है। टका-सेर तराजू टूटा है। रूप प्रहसन है, पाँच अंक का साँचा नहीं। छह दृश्य कारण की उलटी नकल बाँधते हैं। अंधायुग का अँधेरा नैतिक युद्ध के बाद का है; यह अँधेरा विवेकहीन शासन का है।
रंग पर दृश्य-क्रम ही व्यंग्य की रीढ़ है — हाट बिना दरबार के मजाक, दरबार बिना हाट के अकेला, श्मशान बिना दोनों के किस्सा। ओझा इसे लोकप्रिय व्यंग्य मानते हैं। जैन खेले बिना हलका कहते हैं। शीर्षक-सूत्र भारतेंदु का है; भारती का पद्य यहाँ नहीं आता।
4 महंत, गोवर्धन दास, नारायण दास
महंत साधु-गुरु हैं। वे लोभ का फल पहले से देख लेते हैं। दोहा कहते हैं — जहाँ कपूर और कपास एक भाव हों, उस देश में बास न किया जाए। नारायण दास उनकी बात मानता है। गोवर्धन दास — पाठ्य-नाम गोबरधनदास भी — सस्ती मिठाई के लोभ में नगर में रह जाता है। वह नायक नहीं, लोभ का दृष्टांत है। बिना उसके प्रहसन का शिकार नहीं बैठता।
तीनों एक सूत्र हैं। गुरु विवेक है। एक शिष्य संतोष है। दूसरा शिष्य स्वाद है। स्वाद मोटा करता है। मोटा फाँसी के फंदे का नाप बनता है। चरित्र गोल मनोविज्ञान नहीं; प्रहसन के सपाट-तेज रूप हैं। गुण यह कि लोभ निजी रहकर सार्वजनिक दंड बन जाता है। सीमा यह कि गोवर्धन केवल पेट है, और कुछ नहीं। पेट ही व्यंग्य का शरीर है।
पाठ्य-नाम गोबरधनदास भी चलता है; एक पुरुष है। वह नायक नहीं, लोभ का दृष्टांत है। नारायण दास गुरु-वचन मानकर नगर छोड़ता है — विवेक का दूसरा सिरा। महंत अंत में मंत्र देते हैं; विवेक आरंभ और अंत दोनों हैं। कबीर वाणी है; गोवर्धन पेट है। दोनों सार्वजनिक हैं; शरीर अलग है।
चरित्र गोल मनोविज्ञान नहीं; प्रहसन के सपाट-तेज रूप हैं। गुण यह कि लोभ निजी रहकर सार्वजनिक दंड बन जाता है। सीमा यह कि गोवर्धन केवल पेट है — पेट ही व्यंग्य का शरीर है। गलत वाक्य — गोवर्धन नायक-संत है। सही वाक्य — गोवर्धन लोभ का शिकार है, फंदे का नाप बन जाता है।
| पात्र | काम |
|---|---|
| महंत | चेतावनी; अंत में मंत्र |
| गोवर्धन दास | लोभ; मिठाई; फाँसी का नाप |
| नारायण दास | गुरु-वचन; नगर छोड़ना |
5 बाजार — टका और जातवाला
दूसरा दृश्य हाट है। कबाबवाला, हलवाई, कुंजड़िन, नरंगीवाली, मुगल, पाचकवाला, मछलीवाली पुकारते हैं। दाम एक है — टका सेर। सस्ताई आनंद है, विवेक नहीं। गोवर्धन ढाई सेर मिठाई ले आता है। महंत सुनते हैं — गुणी और अवगुणी एक भाव। यही कुदेश है।
जातवाला जाति बेचता है। यह भारतेंदु का तीखा संकेत है — वर्ण भी हाट की वस्तु। व्यंग्य केवल राजा पर नहीं, समाज की बिक्री पर है। पारसी चमत्कार हाट को तमाशा बनाता। भारतेंदु हाट को तराजू बनाते हैं। तराजू टूटा है, इसलिए हँसी कटती है। बिना हाट के दरबार अकेला रह जाता। बिना दरबार के हाट केवल मजाक रह जाता।
तराजू टूटा है, इसलिए हँसी कटती है। बिना हाट के दरबार अकेला रह जाता है। बिना दरबार के हाट केवल मजाक रह जाता है। भाषा लोक-पुकार की है, प्रसाद की गरिमा नहीं। ओझा इसे लोकप्रिय व्यंग्य मानते हैं क्योंकि हाट दर्शक को तुरंत पहचान देता है। जातवाला जाति बेचता है — वर्ण भी हाट की वस्तु।
कबाबवाला, हलवाई, कुंजड़िन, नरंगीवाली, मुगल, पाचकवाला, मछलीवाली पुकारते हैं — दाम एक, टका सेर। सस्ताई आनंद है, विवेक नहीं। गोवर्धन ढाई सेर मिठाई ले आता है। महंत सुनते हैं — गुणी और अवगुणी एक भाव। यही कुदेश है। पारसी चमत्कार हाट को तमाशा बनाती; भारतेंदु हाट को तराजू बनाते हैं।
6 चौपट राजा और न्याय की श्रृंखला
चौपट राजा शराब में डूबा शासक है। फरियादी की बकरी दीवार से दबकर मरती है। न्याय कारण नहीं, किसी को दंड चाहिए। श्रृंखला बनती है। बनिया कल्लू — दीवार उसकी। कारीगर — दीवार उसी ने उठाई। चूनेवाला — मसाला उसी का। भिश्ती — पानी उसी ने डाला। कसाई — मशक उसी की। गड़ेरिया — भेड़ उसी ने बेची। अंत कोतवाल तक ठेल दिया जाता है। फाँसी कोतवाल के गले पर चढ़े।
फंदा दुबले कोतवाल पर बड़ा बैठता है। राजा हुक्म देता है — मोटे को चढ़ाओ। गोवर्धन मिठाई से मोटा हो चुका है। सिपाही उसे पकड़ते हैं। न्याय का प्राण कारण-शृंखला होनी चाहिए। यहाँ कारण बहाना है, फंदा नाप है। अरस्तू कथा को प्राण कहते हैं; यह कथा प्राण की उलटी नकल है। व्यंग्य यहीं पूरा होता है — शासन विवेक नहीं, संयोग चलाता है।
न्याय का प्राण कारण-शृंखला होनी चाहिए। यहाँ कारण बहाना है, फंदा नाप है। बनिया कल्लू — दीवार उसकी। कारीगर — दीवार उसी ने उठाई। चूनेवाला — मसाला। भिश्ती — पानी। कसाई — मशक। गड़ेरिया — भेड़। अंत कोतवाल तक ठेल दिया जाता है। फंदा दुबले कोतवाल पर बड़ा बैठता है। राजा हुक्म देता है — मोटे को चढ़ाओ।
अरस्तू कथा को प्राण कहते हैं; यह कथा प्राण की उलटी नकल है। व्यंग्य यहीं पूरा होता है — शासन विवेक नहीं, संयोग चलाता है। गोवर्धन मिठाई से मोटा हो चुका है — लोभ कानूनी नाप बन जाता है। सिपाही उसे पकड़ते हैं। फरियादी की बकरी दीवार से दबकर मरती है; दंड किसी गले पर चढ़ना है, कारण खोजना नहीं। यही चौपट राजा का न्याय है।
| कड़ी | आरोप |
|---|---|
| बकरी | दीवार से दबकर मृत्यु |
| बनिया → कारीगर → चूना → भिश्ती → कसाई → गड़ेरिया | दोष ठेलना |
| कोतवाल | फाँसी; फंदा बड़ा |
| गोवर्धन | मोटा गला; नाप |
7 श्मशान और राजा की फाँसी
छठा दृश्य श्मशान है। गोवर्धन फाँसी पर चढ़ने वाला है। महंत आकर कान में मंत्र देते हैं। गुरु-शिष्य दोनों फाँसी की उतावली दिखाते हैं। राजा सुनता है — इस घड़ी फाँसी चढ़ने वाला बैकुंठ जाएगा। वह स्वयं चढ़ने की आज्ञा देता है। कुशासन अपने लोभ-तर्क से मरता है। दंड बाहर से नहीं आता।
अंत नैतिक आख्यान भी है, प्रहसन भी। हँसी कड़वी है। भारत दुर्दशा में देश रोता है। यहाँ राजा हँसते-हँसते नष्ट होता है। रस हास्य-व्यंग्य है, करुण नहीं। उद्देश्य सुधार है — विवेकहीन शासन अपने कर्म से गिरता है। सीमा यह कि समाधान आसान है। गुण यह कि दर्शक तराजू पहचान लेता है।
गुरु-शिष्य फाँसी की उतावली दिखाते हैं। राजा सुनता है — इस घड़ी चढ़ने वाला बैकुंठ जाएगा। वह स्वयं चढ़ने की आज्ञा देता है। कुशासन अपने लोभ-तर्क से मरता है। महंत का मंत्र चाल भी है, विवेक भी। श्मशान छठा दृश्य है, पहला नहीं। बिना हाट और दरबार के यह अंत किस्सा रह जाता।
भारत दुर्दशा में देश रोता है। यहाँ राजा हँसते-हँसते नष्ट होता है। रस हास्य-व्यंग्य है, करुण नहीं। दंड बाहर की सेना से नहीं आता। गलत वाक्य — अंत करुण-त्रासदी है। सही वाक्य — अंत प्रहसन का नैतिक आख्यान है, हँसी कड़वी है। समाधान आसान होने की सीमा है; तराजू पहचान का गुण है।
8 व्यंग्य, भाषा, महत्त्व
व्यंग्य तीन स्तरों पर है। पहला — मूल्य: भाजी और खाजा एक दाम। दूसरा — न्याय: फंदा नाप, कारण नहीं। तीसरा — मोक्ष-लोभ: राजा बैकुंठ के दाम पर स्वयं मरता है। भाषा हाट की है, प्रसाद की काव्य-गरिमा नहीं। नान्दी-भरतवाक्य का बोझ हल्का है; दृश्य स्वयं बोलते हैं। ओझा इतिहास में इसे लोकप्रिय व्यंग्य मानते हैं। नेमिचंद्र जैन रंग को साहित्य से नहीं काटते; यह नाटक खेले बिना हलका पड़ता है।
महत्त्व यह है कि हिन्दी नाटक तमाशा से प्रश्न बना। सीमा आदर्श और एक-आयामी राजा है। गुण सार्वजनिक हँसी है। अंधायुग का अँधेरा नैतिक युद्ध के बाद का है; यह अँधेरा कुशासन का है। दोनों कृतियाँ अलग शतक, अलग रूप, अलग प्रश्न हैं। निर्धारित पाठ यही प्रहसन है, भारती का पद्य नहीं।
तीन स्तर याद रहें — मूल्य का एक दाम, न्याय का फंदा-नाप, मोक्ष-लोभ पर राजा की स्वयं-फाँसी। भाषा हाट की है। नान्दी-भरतवाक्य का बोझ हल्का है; दृश्य स्वयं बोलते हैं। ओझा इतिहास में लोकप्रिय व्यंग्य मानते हैं। जैन रंग को साहित्य से नहीं काटते। खेले बिना हलका पड़ता है।
महत्त्व यह कि हिन्दी नाटक तमाशा से प्रश्न बना। सीमा आदर्श और एक-आयामी राजा है। गुण सार्वजनिक हँसी है। अंधायुग का अँधेरा नैतिक युद्ध के बाद का है; यह अँधेरा कुशासन का है। दोनों कृतियाँ अलग शतक, अलग रूप, अलग प्रश्न। निर्धारित पाठ यही प्रहसन है, भारती का पद्य नहीं।
9 भीष्म साहनी और यह नाटक
भीष्म साहनी का जन्म 8 अगस्त 1915, रावलपिंडी। निधन 11 जुलाई 2003, दिल्ली। कहानी, उपन्यास, नाटक। तमस 1973 विभाजन और दंगे का उपन्यास है — निर्धारित यह पत्र नहीं। कबीरा खड़ा बाजार में 1981 का नाटक है। राजकमल से पुस्तक। रंग पर कई निर्देशकों ने खेला। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली, सत्संग का स्वर, हाट का दबाव। दृष्टि संत को संस्था के सामने खड़ा करने की है।
साहनी का कबीर इतिहास की मूर्ति नहीं, आधुनिक प्रश्न का पुरुष है। पंडित और काजी दोनों पाखंड रखते हैं। जाति और पूजा-व्यापार दोनों चोट खाते हैं। सीमा यह कि कुछ प्रसंग — सिकंदर लोदी से भेंट — इतिहास-प्रमाण से अधिक नाटक-आवश्यकता हैं। गुण यह कि संत चौक पर बोलता है, ग्रंथालय में नहीं। माधवी दूसरा नाटक है। हानूश दूसरा नाटक है। निर्धारित यही कबीरा है।
तमस 1973 विभाजन और दंगे का उपन्यास है — यह पत्र नहीं। माधवी दूसरा नाटक है। हानूश दूसरा नाटक है। निर्धारित कबीरा 1981 है, राजकमल से पुस्तक। रंग पर कई निर्देशकों ने खेला। द्विवेदी कबीर को नाथ-योग और भक्ति से पढ़ते हैं; साहनी रंग पर सार्वजनिक पुरुष बनाते हैं। दोनों ग्रंथ अलग हैं। लंबे संवाद यहाँ नहीं।
पंडित और काजी दोनों पाखंड रखते हैं। जाति और पूजा-व्यापार दोनों चोट खाते हैं। सीमा यह कि सिकंदर लोदी से भेंट इतिहास-प्रमाण से अधिक नाटक-आवश्यकता कही जाती है। गुण यह कि संत चौक पर बोलता है, ग्रंथालय में नहीं। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली, सत्संग का स्वर, हाट का दबाव।
| संकेत | तथ्य |
|---|---|
| साहनी | 1915–2003 |
| कबीरा | 1981; नाटक |
| तमस | 1973; उपन्यास; अलग |
| कबीर ग्रंथावली | पद; यह संवाद नहीं |
10 नामकरण — दोहा और चौक
शीर्षक कबीर के प्रचलित दोहे से आता है। कबीरा बाजार में खड़ा है। हाथ में लुकाठी है। जो अपनी आसक्ति जलाए, वही साथ चले। अर्थ चौक पर सार्वजनिक आह्वान है। नाटक उसी छवि को दृश्य बनाता है। देशकाल काशी है — बस्ती, घाट, हाट। रूप इतिहास-पुनर्पाठ है, प्रहसन नहीं। वाचक नहीं; पात्र बोलते हैं। पूरा ग्रंथ नहीं; चुने दृश्य हैं।
कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ।
जो घर फूँके आपना, चले हमारे साथ।
प्रचलित कबीर-पद — नाटक के शीर्षक का स्रोत
घर यहाँ आसक्ति का संकेत है, वास्तु-वर्णन नहीं। साहनी संवाद इस दोहे का पर्याय नहीं; वे प्रसंग गढ़ते हैं। भाव वही सार्वजनिक इंकार है। बिना चौक के संत केवल भक्त रह जाता। बिना संत के चौक केवल व्यापार रह जाता। नाम दोनों को बाँधता है।
अर्थ चौक पर सार्वजनिक आह्वान है। नाटक उसी छवि को दृश्य बनाता है। रूप इतिहास-पुनर्पाठ है, प्रहसन नहीं। वाचक नहीं; पात्र बोलते हैं। पूरा ग्रंथ नहीं; चुने दृश्य हैं। साहनी संवाद इस दोहे का पर्याय नहीं; वे प्रसंग गढ़ते हैं। भाव वही सार्वजनिक इंकार है। बिना चौक के संत केवल भक्त रह जाता है।
कबीर ग्रंथावली पद है; यह नाटक संवाद है। शीर्षक-दोहा स्रोत है, नाटक का पर्याय नहीं। अंधेर नगरी का शीर्षक-सूत्र कुशासन है; यह शीर्षक संत का चौक है। दोनों हाट को तराजू बनाते हैं; प्रश्न अलग है। घर आसक्ति का संकेत है, वास्तु-वर्णन नहीं — वही दोहा-पाठ की सीमा।
11 कबीर, लोई, नीरू-नीमा, रैदास
कथा-सूत्र किंवदंती और नाटक मिलाते हैं। जन्म ब्राह्मण विधवा से जुड़ी कथा है। पालन जुलाहा दंपति नीरू और नीमा करते हैं। कबीर जुलाहा रहता है, पंडित नहीं बनता। पत्नी लोई हैं। वे छोड़कर लौटती भी हैं — नाटक भावना का दृश्य देता है। मित्र रैदास सत्संग में हैं। सत्संग गाना भी है, प्रतिरोध भी। रामानंद का स्पर्श गुरु-प्रभाव के रूप में आता है; लंबा गुरु-संवाद यहाँ केंद्र नहीं।
चरित्र का केंद्र वचन है। कबीर कहता है जो देखता है — पूजा का शोर, हिंसा के बाद दया का उपदेश, जाति का घमंड। लोई गृहस्थी और संत-पथ के बीच खड़ी हैं। नीरू-नीमा श्रम और पालन हैं। रैदास साथ की आवाज़ हैं। सपाट खल पंडित-काजी अधिक हैं; संत गोल है क्योंकि वह चोट भी खाता है, गाता भी है। अंधेर नगरी का गोवर्धन पेट है; यह कबीर वाणी है। दोनों सार्वजनिक हैं; शरीर अलग है।
लोई गृहस्थी और संत-पथ के बीच खड़ी हैं; छोड़कर लौटती भी हैं — नाटक भावना का दृश्य देता है, पूरे जीवन-चरित की नकल नहीं। नीरू-नीमा श्रम और पालन हैं। रैदास साथ की आवाज़ हैं। सपाट खल पंडित-काजी अधिक हैं; संत गोल है क्योंकि वह चोट भी खाता है, गाता भी है। रामानंद का स्पर्श गुरु-प्रभाव है; लंबा गुरु-संवाद केंद्र नहीं।
जन्म ब्राह्मण विधवा से जुड़ी किंवदंती नाटक रखता है; पालन जुलाहा दंपति करते हैं। कबीर जुलाहा रहता है, पंडित नहीं बनता। अंधेर नगरी का गोवर्धन पेट है; यह कबीर वाणी है। प्रसंग और भाव लिखे जाते हैं, लंबे संवाद नहीं। गलत वाक्य — कबीर यहाँ ग्रंथावली का पद-पाठ है। सही वाक्य — कबीर नाटक का सार्वजनिक पुरुष है।
| पात्र | संकेत |
|---|---|
| कबीर | जुलाहा; वचन; चौक |
| लोई | पत्नी; गृहस्थ-संत द्वंद्व |
| नीरू-नीमा | पालन; जुलाहा-बस्ती |
| रैदास | सत्संग; साथ |
12 संस्था, पंथ, सिकंदर-प्रसंग
नाटक का संघर्ष संत और संस्था का है। हिन्दू और मुसलमान दोनों के आयोजन पाखंड बन सकते हैं। अखाड़ों का हिंसा-दृश्य काशी के दबाव को दिखाता है। कबीर निराकार भक्ति की ओर है; मूर्ति और शोर दोनों पर प्रश्न है। व्यापार बना धर्म चोट खाता है। यह तमस का दंगा-उपन्यास नहीं। यह साम्प्रदायिकता का समाचार नहीं। यह वचन का टकराव है।
सिकंदर लोदी से बात का दृश्य नाटक रखता है। इतिहास में यह भेंट विवादित है। काम यह है कि सत्ता संत को नापना चाहती है; संत सत्ता के तराजू पर नहीं बैठता। प्रसंग और भाव से पाठ होता है, लंबे संवाद के उतार से नहीं। सीमा कल्पना को इतिहास कह देना है। गुण यह कि आधुनिक दर्शक संस्था और वचन का द्वंद्व पहचानता है। हजारीप्रसाद द्विवेदी कबीर को नाथ-योग और भक्ति की धारा से पढ़ते हैं; साहनी रंग पर सार्वजनिक पुरुष बनाते हैं। दोनों ग्रंथ अलग हैं।
यह तमस का दंगा-उपन्यास नहीं। यह साम्प्रदायिकता का समाचार नहीं। यह वचन का टकराव है। अखाड़ों का हिंसा-दृश्य काशी के दबाव को दिखाता है, रिपोर्ट नहीं बनता। व्यापार बना धर्म चोट खाता है। कबीर निराकार भक्ति की ओर है; मूर्ति और शोर दोनों पर प्रश्न है। हिन्दू और मुसलमान दोनों के आयोजन पाखंड बन सकते हैं।
सिकंदर-प्रसंग नाटक रखता है; इतिहास में भेंट विवादित है। काम यह है कि सत्ता संत को नापना चाहती है; संत सत्ता के तराजू पर नहीं बैठता। सीमा कल्पना को इतिहास कह देना है। गुण आधुनिक दर्शक संस्था और वचन का द्वंद्व पहचानता है। द्विवेदी ग्रंथ लोक-भक्ति से पढ़ते हैं; साहनी रंग पर सार्वजनिक पुरुष बनाते हैं।
13 दोनों नाटक — साम्य, वैषम्य, पाठ
साम्य सार्वजनिक है। दोनों काशी से छूते हैं — भारतेंदु काशी के लेखक, कबीर काशी के संत। दोनों हाट को तराजू बनाते हैं। दोनों पाखंड पर हँसते या चोट करते हैं। दोनों खेले जाने के लिए लिखे गए। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; नाटक उसी गद्य का दृश्य सिरा है।
वैषम्य रूप और काल पर है। 1881 प्रहसन है; 1981 इतिहास-पुनर्पाठ है। एक का शिकार लोभी शिष्य और मूर्ख राजा है। दूसरे का केंद्र संत की वाणी है। एक का अंत फाँसी का उलटा तर्क है। दूसरे का अंत मूर्ति नहीं, वचन का खड़ा रहना है। भारत दुर्दशा करुण है, अंधेर नगरी व्यंग्य है, कबीरा संत-प्रश्न है। अंधायुग पद्य-अँधेरा है — मिलाया नहीं जाता। पाठ प्रसंग और भाव से होता है; साहनी के लंबे संवाद यहाँ नहीं। भारतेंदु के दो सूत्र-वाक्य पर्याप्त हैं।
शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; नाटक उसी गद्य का दृश्य सिरा है। एक 1881 का प्रहसन है; दूसरा 1981 का इतिहास-पुनर्पाठ है। दोनों काशी से छूते हैं। दोनों हाट को तराजू बनाते हैं। दोनों पाखंड पर हँसते या चोट करते हैं। दोनों खेले जाने के लिए लिखे गए। साम्य यहीं तक है; आगे वैषम्य है।
एक का शिकार लोभी शिष्य और मूर्ख राजा है। दूसरे का केंद्र संत की वाणी है। एक का अंत फाँसी का उलटा तर्क है। दूसरे का अंत मूर्ति नहीं, वचन का खड़ा रहना है। भारत दुर्दशा करुण है। अंधायुग पद्य-अँधेरा है — मिलाया नहीं जाता। पाठ प्रसंग और भाव से होता है; साहनी के लंबे संवाद यहाँ नहीं। भारतेंदु के दो सूत्र-वाक्य पर्याप्त हैं।
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