Skip to content
noteswale

Units

हिन्दी नाटक और एकांकी — शास्त्र और इतिहास notes

Ready

हिन्दी नाटक और एकांकी — शास्त्र और इतिहास is a topic in Drama and non-fiction (Units) for B.A. Hindi (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.

विषय नाटक और एकांकी का शास्त्र है। तीन सूत्र हैं। पहला — अर्थ, परिभाषा, स्वरूप और तत्त्व। दूसरा — हिन्दी नाटक का उद्भव और विकास। तीसरा — प्रमुख रचनाकार…

इकाई 1 · हिन्दी नाटक और एकांकी — शास्त्र और इतिहास

विषय नाटक और एकांकी का शास्त्र है। तीन सूत्र हैं। पहला — अर्थ, परिभाषा, स्वरूप और तत्त्व। दूसरा — हिन्दी नाटक का उद्भव और विकास। तीसरा — प्रमुख रचनाकार और रचनाएँ। आचार्य रामचंद्र शुक्ल गद्य के आविर्भाव को आधुनिक काल का चिह्न कहते हैं। नाटक उसी गद्य का दृश्य-रूप है। दशरथ ओझा हिन्दी नाटक का इतिहास लिखते हैं। नेमिचंद्र जैन रंग-परंपरा बाँधते हैं।

आधार दशरथ ओझा का हिन्दी नाटक : उद्भव और विकास; नेमिचंद्र जैन का रंग परंपरा और भारतीय नाट्य परंपरा; जयदेव तनेजा संपादित आधुनिक भारतीय रंग परिदृश्य; जगदीश चतुर्वेदी का भारतीय नाटक और रंगमंच। शिखर-नाम भारतेंदु, प्रसाद, राकेश, भारती, साहनी हैं; एकांकी में वर्मा केंद्र हैं। अंधायुग भारती का पद्य-नाटक है, अंधेर नगरी नहीं।

इतिहास तीन सोपान में बैठता है — भारतेंदु व्यंग्य, प्रसाद काव्य-इतिहास, राकेश-भारती-साहनी आधुनिक प्रश्न। एकांकी चौथा सोपान है, कटी पूँछ नहीं। अंधायुग पद्य-नाटक है; अंधेर नगरी गद्य-प्रहसन है। बिना रंग के शास्त्र सूखा है; बिना शास्त्र के रंग तमाशा है।

सार: शास्त्र = परिभाषा, एकांकी से अंतर, तत्त्व, रंग-शिल्प। इतिहास = संस्कृत-पारसी से भारतेंदु, प्रसाद, राकेश, साहनी। एकांकी = वर्मा केंद्र। अंधायुग नाटक है, अंधेर नगरी नहीं।

1 नाटक — अर्थ और परिभाषा

नाटक दृश्य-काव्य है। वह रंगमंच पर अभिनय से पूरा होता है। कविता श्रव्य है; उपन्यास वर्णन है; नाटक संवाद और दृश्य है। भरत के नाट्यशास्त्र में नाट्य लोक की अनुकृति है। चार अभिनय हैं — आंगिक, वाचिक, आहार्य, सात्विक। अरस्तू त्रासदी में कथा, चरित्र, विचार, वाणी, संगीत और दृश्य गिनते हैं। परिभाषा इन्हीं दो धाराओं को मिलाकर बैठती है। शुक्ल नाटक को गद्य का सार्वजनिक रूप कहते हैं। नगेन्द्र उसे संघर्ष का दृश्य-रूप कहते हैं। नेमिचंद्र जैन रंग को साहित्य से अलग नहीं काटते; वे पाठ और प्रदर्शन दोनों देखते हैं।

परिभाषा तीन बिंदुओं पर बैठती है। रूप दृश्य है, केवल पढ़ा जाने वाला निबंध नहीं। माध्यम संवाद और अभिनय है। केंद्र संघर्ष है — व्यक्ति-समाज, व्यक्ति-व्यक्ति, व्यक्ति-आत्म। उद्देश्य मनोरंजन से आगे बोध और प्रश्न है। पारसी कम्पनी तमाशा प्रधान रही। भारतेंदु ने व्यंग्य और सुधार जोड़ा। प्रसाद ने इतिहास और संघर्ष जोड़ा। राकेश ने दांपत्य और भाषा जोड़ी। बिना परिभाषा के इतिहास नामों की सूची रह जाता है। बिना रंग के परिभाषा सूखी रहती है।

गलत वाक्य — नाटक केवल पढ़ी जाने वाली लंबी कहानी है। सही वाक्य — नाटक दृश्य-काव्य है जो अभिनय से पूरा होता है। शुक्ल उसे गद्य का सार्वजनिक रूप कहते हैं क्योंकि वह मंच पर समाज के सामने आता है। नगेन्द्र संघर्ष को केंद्र कहते हैं — बिना द्वंद्व के संवाद उपदेश रह जाता है। भरत की अनुकृति का अर्थ नकल नहीं, लोक का रूपांतर है। अरस्तू कथा को प्राण इसलिए कहते हैं कि चरित्र कर्म से खुलता है, भाषण से नहीं।

ओझा इतिहास लिखते हैं, परिभाषा को सोपान देते हैं। जैन पाठ और प्रदर्शन दोनों देखते हैं — केवल पुस्तक अधूरी है। तनेजा आधुनिक रंग-परिदृश्य में प्रकाश और नेपथ्य को शिल्प का अंग मानते हैं। चतुर्वेदी नाटक को रंगमंच से अलग नहीं पढ़ते। अंधायुग पद्य-नाटक है; यह परिभाषा गद्य-प्रहसन और यथार्थ दोनों पर बैठती है। गोदान उपन्यास का उदाहरण है, कामायनी महाकाव्य का, अंधेर नगरी व्यंग्य-नाटक का। बिना उदाहरण के परिभाषा सूखी रहती है।

आचार्य / आलोचकसूत्र
भरतनाट्य = अनुकृति; चार अभिनय
अरस्तूकथा प्राण; त्रासदी के अंग
दशरथ ओझाहिन्दी नाटक : उद्भव और विकास
नेमिचंद्र जैनरंग परंपरा; भारतीय नाट्य परंपरा

2 स्वरूप — एकांकी, उपन्यास, काव्य से अंतर

स्वरूप पूछता है कि नाटक कौन-सा कथा-शरीर है। उपन्यास से अंतर प्रदर्शन पर है। उपन्यास समय फैलाता है, मन पढ़ता है। नाटक समय को दृश्य में बाँधता है। गोदान पढ़ा जाता है। अंधेर नगरी खेली जाती है। महाकाव्य पद्य और उदात्त नायक का है — साकेत, कामायनी। नाटक संवाद का है। कविता एक कंठ की हो सकती है; नाटक कई शरीर माँगता है। एकांकी नाटक का छोटा रूप है, कहानी का पर्याय नहीं। कहानी एक प्रभाव की गद्य-कथा है। एकांकी एक अंक का दृश्य-रूप है।

नाटक के भीतर उपभेद हैं। सामाजिक, ऐतिहासिक, पौराणिक, समस्या, काव्य-नाटक, नुक्कड़। ये जातियाँ शत्रु नहीं। अंधायुग काव्य-नाटक है। आधे-अधूरे यथार्थ है। अंधेर नगरी व्यंग्य है। कबीरा खड़ा बाजार में इतिहास और लोक-स्वर मिलाता है। स्वरूप तीन प्रश्नों से खुलता है। कथा दृश्य में कितनी सिमटती है। संघर्ष एक है या कई। वाचक वर्णन करता है या केवल पात्र बोलते हैं। इन्हीं से नाटक उपन्यास, महाकाव्य और एकांकी से कटता है।

उपभेद शिल्प नहीं बदलते, आलंबन बदलते हैं। सामाजिक व्यंग्य भारतेंदु है। ऐतिहासिक काव्य प्रसाद है। यथार्थ राकेश है। काव्य-नाटक भारती का अंधायुग है। लोक-इतिहास साहनी हैं। समस्या-नाटक लक्ष्मीनारायण मिश्र की शाखा है। नुक्कड़ बादल सरकार की चर्चा में आता है; हिन्दी केंद्र फिर भी भारतेंदु-प्रसाद-राकेश हैं। एक कृति दो जातियाँ छू सकती है — कबीरा इतिहास भी है, लोक-स्वर भी।

एकांकी स्वतंत्र रूप है, पूर्ण नाटक की कटी पूँछ नहीं। कहानी एक प्रभाव की गद्य-कथा है; एकांकी वही प्रभाव दृश्य बनाती है। साकेत पद्य का उदात्त राम है; अंधेर नगरी गद्य का चौपट राजा है। गोदान समय फैलाता है; नाटक समय को दृश्य में बाँधता है। गलत वाक्य — एकांकी छोटी कहानी है। सही वाक्य — एकांकी एक अंक का दृश्य-रूप है, खेली जाती है।

रूपपहचानउदाहरण-संकेत
उपन्यासगद्य, विस्तार, वर्णनगोदान
महाकाव्यपद्य, उदात्त कथाकामायनी
नाटकअंक, संवाद, रंगमंचअंधेर नगरी; स्कंदगुप्त
एकांकीएक अंक, एक प्रभाववर्मा, अश्क

3 तत्त्व — कथावस्तु और संघर्ष

कथावस्तु घटना-क्रम है। नाटक में वह अंक और दृश्य में बँटती है। आरंभ स्थिति खोलता है। मध्य संघर्ष बढ़ाता है। अंत निर्णय या भंग देता है। अरस्तू कथा को प्राण कहते हैं। भारतीय परंपरा मुख, प्रतिमुख, गर्भ, अवमर्श, निर्वहण गिनती है। हिन्दी उत्तर में इतना विस्तार अनिवार्य नहीं; संघर्ष और मोड़ अनिवार्य हैं। ढीली कथावस्तु भाषण बन जाती है। कसी कथावस्तु कर्म से चलती है।

संघर्ष नाटक का प्राण है। बिना संघर्ष के संवाद उपदेश रह जाते हैं। भारतेंदु का संघर्ष शासन और जन के बीच है। प्रसाद का संघर्ष इतिहास-पुरुष और नैतिक द्वंद्व का है। राकेश का संघर्ष दांपत्य और अधूरेपन का है। साहनी का संघर्ष संस्था और संत-स्वर का है। संयोग का बोझ दोष है। उपकथा का बिखराव एकांकी को तोड़ता है। गुण कारण-शृंखला और दृश्य का दबाव हैं।

भारतीय संधि — मुख, प्रतिमुख, गर्भ, अवमर्श, निर्वहण — शास्त्र का विस्तार है। हिन्दी उत्तर में इतना पाँच-खंड अनिवार्य नहीं; संघर्ष और मोड़ अनिवार्य हैं। अंधेर नगरी छह दृश्य में कारण की उलटी नकल दिखाती है — फंदा नाप है, न्याय नहीं। कबीरा वचन और संस्था का संघर्ष चलाता है, फाँसी की श्रृंखला नहीं। एकांकी एक स्थिति पर कसती है; दूसरी कड़ी की लालसा उसे तोड़ती है।

संयोग का बोझ प्रहसन में व्यंग्य बन सकता है; पूर्ण नाटक में दोष है। उपकथा का बिखराव एकांकी को कहानी जैसा वर्णन बना देता है। गुण कारण-शृंखला और दृश्य का दबाव हैं। ओझा कथावस्तु को इतिहास के सोपान से देखते हैं — तमाशा से व्यंग्य, व्यंग्य से इतिहास-काव्य, फिर यथार्थ। अरस्तू कथा को प्राण कहते हैं; बिना प्राण के संवाद सूची रह जाते हैं।

4 तत्त्व — चरित्र, कथोपकथन, देशकाल

चरित्र वह मनुष्य है जो संघर्ष को अर्थ देता है। सपाट चरित्र एक गुण पर टिकता है — तमाशा का खल। गोल चरित्र बदलता है। नायक आधुनिक नाटक में देवता नहीं। वह राजा भी हो सकता है, साहब भी, संत भी, अधूरा पति भी। खलनायक एकआयामी रहने पर कमजोर पड़ता है। सहायक पात्र दृश्य चलाते हैं; वे केवल नाम न रह जाएँ। प्रसाद के ऐतिहासिक पुरुष आधुनिक प्रश्न बोलते हैं। राकेश के पात्र बोलचाल की खड़ी बोली से बनते हैं।

कथोपकथन नाटक का शरीर है। उपन्यास में संवाद अंग है; नाटक में वही प्रधान माध्यम है। भारतेंदु का संवाद व्यंग्य और लोक-लय का है। प्रसाद का संवाद काव्य-गर्भ का है। राकेश का संवाद बोलचाल का है। देशकाल रंग पर नेपथ्य, वेश और संकेत से आता है। वह पृष्ठ नहीं, दबाव है। अंधेर नगरी का नगर शासन का देशकाल है। आषाढ़ का एक दिन मेघ और उज्जयिनी का है, फिर भी आधुनिक मन का है। बिना संवाद के नाटक व्याख्यान रह जाता है।

उद्देश्य बोध और व्यंग्य है, तमाशा नहीं। रस हास्य-व्यंग्य भारतेंदु में, करुण-वीर प्रसाद में, यथार्थ-द्वंद्व राकेश में। सहायक पात्र सूची न रह जाएँ — जातवाला जाति बेचता है, कोतवाल फंदे का बहाना है, बाजोरिया पूँजी है। बिना कर्म के चरित्र विशेषण रह जाता है। बिना देशकाल के संवाद कक्षा-व्याख्यान रह जाता है।

गलत वाक्य — उपन्यास और नाटक का संवाद एक ही काम करता है। सही वाक्य — उपन्यास में संवाद अंग है, नाटक में प्रधान माध्यम। जैन बिना अभिनय के चरित्र को वाक्य कहते हैं। ओझा इतिहास में चरित्र को युग से बाँधते हैं। ध्रुवस्वामिनी गोल है क्योंकि निर्णय बदलता है; चौपट राजा सपाट है क्योंकि विवेक नहीं बदलता।

तत्त्वकाम
कथावस्तुअंक-दृश्य; कारण
संघर्षनाटक का प्राण
चरित्रगोल / सपाट; कर्म से पहचान
कथोपकथनप्रधान माध्यम
देशकालनेपथ्य, वेश, समय का दबाव
उद्देश्यबोध, व्यंग्य, प्रश्न

5 रंग-शिल्प — अंक, नेपथ्य, अभिनय

शिल्प नाटक को बाँधने का ढंग है। अंक बड़ा खंड है। दृश्य उसके भीतर का टुकड़ा है। एकांकी प्रायः एक अंक रखती है। पूर्ण नाटक कई अंक रखता है। नान्दी आरंभ का मंगल-संकेत है। भरतवाक्य अंत का सार्वजनिक वचन है। भारतेंदु इन्हें लोक-नाटक की चाल में चलाते हैं। प्रवेशक और विष्कम्भक पुरानी संधि हैं; आधुनिक नाटक प्रायः सीधा दृश्य खोलता है। नेपथ्य पीछे की व्यवस्था है — प्रकाश, वेश, ध्वनि। अभिनय चार हैं। आहार्य वेश है। वाचिक वचन है।

शिल्प तत्त्व का विरोधी नहीं। बिना रंग के तत्त्व ढेर हैं। बिना तत्त्व के शिल्प खाली तमाशा है। जयदेव तनेजा आधुनिक रंग-परिदृश्य देखते हैं। जगदीश चतुर्वेदी नाटक और रंगमंच को साथ पढ़ते हैं। सीमा यह है कि साहित्य-पाठ कभी रंग भूल जाता है। गुण यह है कि शिल्प संघर्ष को आँख देता है। निर्धारित अंधेर नगरी व्यंग्य-दृश्य है। कबीरा खड़ा बाजार में लोक-रंग और संवाद है। एकांकी संक्षेप का शिल्प है। शिल्प संघर्ष को आँख देता है।

प्रकाश, ध्वनि और वेश आधुनिक शिल्प के तीन हाथ हैं। तनेजा इन्हें रंग-परिदृश्य का अंग मानते हैं। चतुर्वेदी नाटक को रंगमंच से अलग नहीं पढ़ते। साहित्य-पाठ यदि केवल संवाद गिने तो नेपथ्य गायब हो जाता है। पारसी चमत्कार प्रधान रही; साहित्य-नाटक संघर्ष को आँख देता है। एकांकी संक्षेप का शिल्प है, पूर्ण नाटक विस्तार का।

नान्दी और भरतवाक्य भारतेंदु में हल्के हैं, बोझ नहीं। प्रवेशक-विष्कम्भक आधुनिक गद्य-नाटक प्रायः छोड़ देता है। गलत वाक्य — शिल्प सजावट है, तत्त्व से कटा। सही वाक्य — शिल्प तत्त्व को आँख देता है। निर्धारित अंधेर नगरी छह दृश्य का व्यंग्य-शिल्प है; कबीरा लोक-रंग और सत्संग का।

6 एकांकी — अर्थ और तत्त्व

एकांकी एक अंक का नाटक है। उसमें एक स्थिति, एक संघर्ष, एक प्रभाव होता है। कहानी की संक्षिप्तता यहाँ दृश्य बनती है। पात्र कम हैं। समय सिमटा है। स्थान प्रायः एक है। रामकुमार वर्मा हिन्दी एकांकी के स्थिर केंद्र माने जाते हैं। उपेन्द्रनाथ अश्क मध्यवर्ग और व्यंग्य देते हैं। जगदीश चंद्र माथुर प्रतीक और नैतिक दबाव देते हैं। धर्मवीर भारती व्यंग्य-एकांकी भी लिखते हैं; अंधायुग उनका पद्य-नाटक है, एकांकी नहीं। निर्धारित आवाज़ का नीलाम एकांकी है, अंधायुग नहीं।

तत्त्व वही हैं — कथावस्तु, चरित्र, संवाद, देशकाल, उद्देश्य — पर मात्रा छोटी है। दोष तीन हैं। भाषण का बोझ। दूसरे अंक की लालसा। कहानी जैसा वर्णन। गुण तीन हैं। एक चोट। तेज संवाद। रंग-संभव संक्षेप। बिना उदाहरण के परिभाषा सूखी है। बिना अंतर के एकांकी नाटक की कटी हुई पूँछ लगती है। वह कटी पूँछ नहीं, स्वतंत्र रूप है।

रेडियो ने एकांकी को कान तक पहुँचाया; माथुर आकाशवाणी से जुड़े। रंगमंच ने संक्षेप माँगा। वर्मा स्थिर केंद्र हैं; भुवनेश्वर प्रयोग साथ हैं, निर्धारित नहीं। चार निर्धारित चोटें — मूल्य, साहब, जाल, नीलाम — रूप एक हैं, कथा एक नहीं। पृथ्वीराज की आँखें और रेशमी टाई वर्मा की प्रसिद्ध एकांकी हैं; पाठ्य अफ़ीम-पाठ अलग है।

कोणार्क माथुर का पूर्ण नाटक है, जाला एकांकी है। अंधायुग भारती का पद्य-नाटक है, नीलाम एकांकी है। गलत वाक्य — एकांकी नाटक की कटी पूँछ है। सही वाक्य — एकांकी स्वतंत्र दृश्य-रूप है। दोष भाषण, दूसरी कड़ी की लालसा, कहानी जैसा वर्णन। गुण एक चोट, तेज संवाद, रंग-संभव संक्षेप।

एकांकीकारनिर्धारित / संकेत
रामकुमार वर्माएक तोला अफ़ीम की कीमत; एकांकी-केंद्र
उपेन्द्रनाथ अश्कसाहब को ज़ुकाम है
जगदीश चंद्र माथुरमकड़ी का जाला; कोणार्क अलग नाटक
धर्मवीर भारतीआवाज़ का नीलाम; अंधायुग अलग रूप

7 उद्भव — नाट्यशास्त्र, पारसी, भारतेंदु से पहले

भारतीय नाट्य की जड़ नाट्यशास्त्र में है। भास, कालिदास, शूद्रक, भवभूति संस्कृत के शिखर हैं। अभिज्ञानशाकुंतलम श्रव्य-दृश्य दोनों की संपत्ति है। मध्य काल में नाटक मंद पड़ा; रामलीला, रास, स्वांग लोक में चले। उन्नीसवीं शताब्दी में पारसी थियेटर तमाशा, गीत, चमत्कार और हिन्दुस्तानी संवाद लेकर आया। आगा हश्र कश्मीरी उसी धारा के नाम हैं। हिन्दी का साहित्य-नाटक इसी तमाशे से कटकर भी पाठक-दर्शक उसी से पाता है।

उद्भव का अर्थ एक तिथि नहीं। अर्थ यह है कि खड़ी बोली गद्य ने दृश्य-कथा अपनाई। भारतेंदु युग से पहले अनुवाद और रूपांतर हैं। संस्कृत का साँचा आधुनिक नगर पर ज्यों का त्यों नहीं बैठता। पारसी का तमाशा बिना भारतेंदु के साहित्य नहीं बनता। बिना भरत के परिभाषा अधूरी है। उद्भव का सूत्र यही है — शास्त्र पुराना है, हिन्दी नाटक आधुनिक गद्य के साथ सार्वजनिक होता है।

अभिज्ञानशाकुंतलम श्रव्य-दृश्य दोनों की संपत्ति है। मध्य काल में साहित्य-नाटक मंद पड़ा; रामलीला, रास, स्वांग लोक में चले। उन्नीसवीं शताब्दी में पारसी थियेटर तमाशा, गीत, चमत्कार और हिन्दुस्तानी संवाद लेकर आया। आगा हश्र कश्मीरी उसी धारा के नाम हैं। हिन्दी का साहित्य-नाटक इसी तमाशे से कटकर भी पाठक-दर्शक उसी से पाता है।

संस्कृत का साँचा आधुनिक नगर पर ज्यों का त्यों नहीं बैठता। भारतेंदु युग से पहले अनुवाद और रूपांतर हैं। बिना भरत के परिभाषा अधूरी है; बिना भारतेंदु के हिन्दी नाटक अधूरा है। ओझा उद्भव को शास्त्र और तमाशे दोनों से खोलते हैं। गलत वाक्य — हिन्दी नाटक कालिदास से सीधा चला। सही वाक्य — खड़ी बोली गद्य ने दृश्य-कथा भारतेंदु युग में अपनाई।

8 भारतेंदु युग

भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850, काशी। निधन 6 जनवरी 1885, काशी। हिन्दी नाटक के सीमा-पुरुष। भारत दुर्दशा देश-करुण का नाटक है। अंधेर नगरी 1881 व्यंग्य-नाटक है — निर्धारित आगे। वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति सुधार-व्यंग्य है। नीलदेवी ऐतिहासिक स्त्री-केंद्र छूती है। भाषा खड़ी बोली गद्य, लोक-गीत का स्पर्श। दृष्टि सार्वजनिक है — शासन, पाखंड, महँगाई, न्याय का उलटा तराजू। मंडल में प्रतापनारायण मिश्र, राधाचरण गोस्वामी, बालकृष्ण भट्ट नाटक-निबंध दोनों छूते हैं। भट्ट का मन की दृढ़ता निबंध है, नाटक नहीं — वह कथेतर है।

युग का अर्थ केवल एक लेखक नहीं। अर्थ यह है कि नाटक सुधार और व्यंग्य का माध्यम बना। पारसी तमाशा रहा; भारतेंदु प्रश्न बने। सीमा यह कि आदर्श और शीघ्रता कभी शिल्प दबा देती है। गुण यह है कि हिन्दी नाटक को सार्वजनिक व्यंग्य मिला। अंधेर नगरी का नगर नाममात्र कथा है; लक्ष्य कुशासन है। अंधायुग भारती का महाभारत-पद्य है, यह कृति नहीं। बिना भारतेंदु के हिन्दी नाटक का इतिहास अधूरा है।

भारत दुर्दशा देश-करुण का नाटक है — देश रोता है। अंधेर नगरी 1881 व्यंग्य है — राजा हँसते-हँसते नष्ट होता है। वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति सुधार-व्यंग्य है। नीलदेवी ऐतिहासिक स्त्री-केंद्र छूती है। भाषा खड़ी बोली गद्य, लोक-गीत का स्पर्श। दृष्टि सार्वजनिक है — शासन, पाखंड, महँगाई, न्याय का उलटा तराजू। युग का अर्थ केवल एक लेखक नहीं; नाटक सुधार और व्यंग्य का माध्यम बना।

मंडल में प्रतापनारायण मिश्र, राधाचरण गोस्वामी नाटक-निबंध दोनों छूते हैं। भट्ट का मन की दृढ़ता निबंध है, नाटक नहीं — वह कथेतर इकाई का पाठ है। पारसी तमाशा रहा; भारतेंदु प्रश्न बने। सीमा आदर्श और शीघ्रता की है। गुण सार्वजनिक व्यंग्य है। अंधायुग भारती का महाभारत-पद्य है, यह कृति नहीं। बिना भारतेंदु के हिन्दी नाटक का इतिहास अधूरा है।

कृतिवर्ष / संकेत
भारत दुर्दशा1880 के आसपास; देश-करुण
अंधेर नगरी1881; व्यंग्य; निर्धारित
नीलदेवीऐतिहासिक; स्त्री-केंद्र

9 प्रसाद और काव्य-ऐतिहासिक नाटक

जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1889, काशी। निधन 15 जनवरी 1937, काशी। कवि और कहानीकार के साथ नाटककार। स्कंदगुप्त 1928। चंद्रगुप्त 1931। ध्रुवस्वामिनी 1933। भाषा संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली। संघर्ष राष्ट्र, प्रेम, स्वाभिमान का है। नारी केवल आलंबन नहीं, निर्णय की ओर बढ़ती है — ध्रुवस्वामिनी का प्रश्न दांपत्य और राज्य दोनों छूता है। ये निर्धारित पत्र की कृतियाँ नहीं; युग के शिखर-नाम हैं। आकाशदीप कहानी है, नाटक नहीं — वह कहानी-पत्र का पाठ है।

प्रसाद भारतेंदु के व्यंग्य से इतिहास की ओर मोड़ते हैं। द्विवेदी युग नाटक में पतला रहा; प्रसाद ने नाटक को साहित्य का शिखर दिया। सीमा काव्य-संवाद की दुरुहता और रंग-कठिनाई है। गुण यह कि हिन्दी नाटक को गरिमा और नारी-द्वंद्व मिला। लक्ष्मीनारायण मिश्र समस्या-नाटक की ओर हैं। जगदीश चंद्र माथुर कोणार्क से शिल्प-नाटक देते हैं; निर्धारित एकांकी मकड़ी का जाला अलग है।

स्कंदगुप्त 1928, चंद्रगुप्त 1931, ध्रुवस्वामिनी 1933 — तीन शिखर-नाम युग के हैं, इस पत्र की निर्धारित कृतियाँ नहीं। भाषा संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली। संघर्ष राष्ट्र, प्रेम, स्वाभिमान का है। नारी केवल आलंबन नहीं; ध्रुवस्वामिनी दांपत्य और राज्य दोनों पर निर्णय की ओर बढ़ती है। आकाशदीप कहानी है, नाटक नहीं।

सीमा काव्य-संवाद की दुरुहता और रंग-कठिनाई है। गुण गरिमा और नारी-द्वंद्व है। लक्ष्मीनारायण मिश्र समस्या-नाटक की ओर हैं। आकाशदीप कहानी है, नाटक नहीं — कहानी-पत्र का पाठ है। गलत वाक्य — प्रसाद का केंद्र टका-सेर जैसा व्यंग्य है। सही वाक्य — प्रसाद ऐतिहासिक काव्य-नाटक की गरिमा देते हैं, सार्वजनिक प्रहसन नहीं।

10 स्वातंत्र्योत्तर — राकेश, भारती, साहनी

स्वातंत्र्योत्तर नाटक यथार्थ, पद्य-प्रयोग और इतिहास-पुनर्पाठ खोलता है। मोहन राकेश 1925–1972। आषाढ़ का एक दिन 1958 कालिदास-प्रसंग पर आधुनिक सृजन का द्वंद्व है। लहरों के राजहंस 1963। आधे-अधूरे 1969 दांपत्य और अधूरे मध्यवर्ग का शिखर है। धर्मवीर भारती 1926–1997। अंधायुग 1955 पद्य-नाटक, कुरुक्षेत्र के बाद का नैतिक अँधेरा। गुनाहों का देवता उपन्यास है, नाटक नहीं। निर्धारित एकांकी आवाज़ का नीलाम व्यंग्य है, अंधायुग नहीं।

भीष्म साहनी 1915–2003। तमस उपन्यास 1973 साम्प्रदायिकता का है। कबीरा खड़ा बाजार में 1981 निर्धारित नाटक है — संत-स्वर और संस्था का टकराव। हबीब तनवीर लोक-रंग मिलाते हैं। बादल सरकार बंगला-नुक्कड़ की चर्चा में आते हैं, हिन्दी केंद्र नहीं। साम्य आधुनिक मनुष्य है। वैषम्य रूप पर है — गद्य-यथार्थ, पद्य-नाटक, लोक-इतिहास। सीमा यह कि नाम मिलाए जाते हैं। गुण यह कि नाटक तमाशा से प्रश्न तक फैलता है।

आषाढ़ का एक दिन 1958 कालिदास-प्रसंग पर आधुनिक सृजन का द्वंद्व है। लहरों के राजहंस 1963। आधे-अधूरे 1969 दांपत्य और अधूरे मध्यवर्ग का शिखर है। अंधायुग 1955 पद्य-नाटक, कुरुक्षेत्र के बाद का नैतिक अँधेरा। गुनाहों का देवता उपन्यास है, नाटक नहीं। निर्धारित एकांकी आवाज़ का नीलाम व्यंग्य है, अंधायुग नहीं। नाम का अँधेरा अंधेर नगरी से नहीं मिलता।

तमस 1973 साहनी का विभाजन-उपन्यास है; कबीरा 1981 नाटक है। हबीब तनवीर लोक-रंग मिलाते हैं। बादल सरकार बंगला-नुक्कड़ की चर्चा में आते हैं, हिन्दी केंद्र नहीं। साम्य आधुनिक मनुष्य है। वैषम्य रूप पर है — गद्य-यथार्थ, पद्य-नाटक, लोक-इतिहास। सीमा यह कि नाम मिलाए जाते हैं। गुण यह कि नाटक तमाशा से प्रश्न तक फैलता है।

नाटककारकृति-संकेत
मोहन राकेशआषाढ़ का एक दिन; आधे-अधूरे
धर्मवीर भारतीअंधायुग; आवाज़ का नीलाम
भीष्म साहनीकबीरा खड़ा बाजार में; तमस उपन्यास अलग

11 एकांकी का विकास

हिन्दी एकांकी बीसवीं शताब्दी के दूसरे-तीसरे दशक में स्थिर होती है। रामकुमार वर्मा 1905–1990 एकांकी को साहित्य-रूप बनाते हैं। पृथ्वीराज की आँखें, रेशमी टाई प्रसिद्ध हैं। निर्धारित एक तोला अफ़ीम की कीमत नैतिक व्यंग्य है — मूल्य और नशा, नाम और वस्तु। भुवनेश्वर प्रयोग और अंधकार के एकांकीकार हैं, निर्धारित नहीं। अश्क 1910–1996 कहानी-उपन्यास के साथ एकांकी देते हैं। साहब को ज़ुकाम है कार्यालय-व्यंग्य और सत्ता की सर्दी है। माथुर 1917–1978। मकड़ी का जाला जाल और शिकार का नैतिक चित्र है। कोणार्क पूर्ण नाटक है, यह एकांकी नहीं।

विकास का अर्थ यह है कि एकांकी तमाशा-प्रहसन से समस्या और प्रतीक तक आई। रेडियो ने एकांकी को कान तक पहुँचाया। रंगमंच ने संक्षेप माँगा। सीमा भाषण और नैतिक अंगुली है। गुण एक प्रभाव और नए मध्यवर्ग का चित्र है। भारती की आवाज़ का नीलाम आवाज़ के बिकने का व्यंग्य है। चार निर्धारित एकांकी चार स्वर हैं — मूल्य, साहब, जाल, नीलाम। मिलाए बिना इतिहास अधूरा है।

पृथ्वीराज की आँखें 1938 संग्रह, रेशमी टाई 1941 — प्रसिद्ध हैं, निर्धारित अफ़ीम-पाठ अलग है। भुवनेश्वर प्रयोग और अंधकार के एकांकीकार हैं, निर्धारित नहीं। अश्क 1910–1996 कहानी-उपन्यास के साथ एकांकी देते हैं। माथुर 1917–1978। भारती व्यंग्य-एकांकी भी लिखते हैं। रेडियो कान तक ले गया; रंगमंच संक्षेप माँगा।

विकास का अर्थ तमाशा-प्रहसन से समस्या और प्रतीक तक आना है। सीमा भाषण और नैतिक अंगुली है। गुण एक प्रभाव और नए मध्यवर्ग का चित्र है। चार निर्धारित स्वर — मूल्य, साहब, जाल, नीलाम। कोणार्क और अंधायुग शिखर हैं, इस सूची में नहीं। गलत वाक्य — हिन्दी एकांकी भारतेंदु युग में स्थिर हुई। सही वाक्य — स्थिरता बीसवीं के दूसरे-तीसरे दशक में वर्मा के साथ आई।

12 कथेतर से नाटक का संबंध

नाटक के साथ पत्र में कथेतर गद्य भी है — आत्मकथा, यात्रावृत्त, रेखाचित्र, पत्र, निबंध। वे दृश्य नहीं, कथन हैं। नाटक संघर्ष को आँख देता है। कथेतर विचार और स्मृति देता है। दोनों गद्य हैं; माध्यम अलग है। इकाई दो-तीन दृश्य माँगती हैं; इकाई चार-पाँच कथन माँगती हैं। बिना इस सीमा के नाटक और निबंध एक ढेर लगते हैं। शुक्ल निबंध लिखते हैं, नाटक नहीं; प्रसाद नाटक लिखते हैं, निबंध-केंद्र नहीं।

नाटक संवाद है। निबंध तर्क है। रेखाचित्र व्यक्ति है। पत्र संबोधन है। शुक्ल निबंध लिखते हैं, नाटक नहीं। प्रसाद नाटक लिखते हैं, निबंध-केंद्र नहीं। आधुनिक गद्य कई रूपों में सार्वजनिक हुआ। नाटक उसका दृश्य सिरा है। कथेतर उसका विचार सिरा है। बिना इस सीमा के नाटक और कथेतर एक ढेर लगते हैं।

आत्मकथा स्वयं को सत्य की कसौटी पर रखती है। यात्रावृत्त मार्ग और जन को आँख देती है। रेखाचित्र एक व्यक्ति की रेखा खींचती है। पत्र सम्बोधन से विचार पहुँचाता है। निबंध तर्क और दृष्टि का गद्य है। नाटक संवाद से खेला जाता है; ये पाँच कथन से पढ़े जाते हैं। शुक्ल निबंध लिखते हैं, नाटक नहीं। प्रसाद नाटक लिखते हैं, निबंध-केंद्र नहीं। दोनों आधुनिक गद्य हैं; माध्यम अलग है।

हाड़ा कथेतर को परंपरा और प्रयोग से बाँधते हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी गद्य की सत्ता कहते हैं। हरदयाल आधुनिक हिन्दी गद्य का इतिहास लिखते हैं। गुप्त निबंध का शास्त्र बाँधते हैं। बिना इस सीमा के नाटक और कथेतर एक ढेर लगते हैं। इकाई दो-तीन दृश्य माँगती हैं; इकाई चार-पाँच कथन माँगती हैं। एक पत्र, दो सिरे — आँख और विचार।

13 प्रमुख रचनाकार — क्रम और संबंध

प्रमुख नाम एक पंक्ति में बैठते हैं। शास्त्र — भरत, अरस्तू; इतिहास — ओझा, जैन, तनेजा। हिन्दी नाटक — भारतेंदु; प्रसाद; मिश्र; माथुर का कोणार्क; राकेश; भारती का अंधायुग; साहनी। एकांकी — वर्मा, अश्क, माथुर, भारती। प्रत्येक नाम के साथ एक कृति और एक धारा है। बिना वर्ष के इतिहास कमजोर है। बिना धारा के नाम कमजोर है। अंधेर नगरी और अंधायुग दो कृतियाँ हैं, एक नहीं। कबीरा नाटक है, कबीर ग्रंथावली कविता है।

संबंध निषेध और ग्रहण दोनों है। पारसी तमाशा देते हैं, भारतेंदु व्यंग्य देते हैं। भारतेंदु सुधार देते हैं, प्रसाद इतिहास-काव्य देते हैं। प्रसाद गरिमा देते हैं, राकेश बोलचाल देते हैं। भारती पद्य-अँधेरा देते हैं, साहनी संत-बाजार देते हैं। वर्मा एकांकी स्थिर करते हैं। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं। नाटक उसी गद्य का दृश्य उत्कर्ष है। दो नाटक और चार एकांकी इन्हीं धाराओं के निर्धारित पाठ हैं।

भारतेंदु — अंधेर नगरी 1881, व्यंग्य। प्रसाद — ध्रुवस्वामिनी, काव्य-इतिहास। राकेश — आधे-अधूरे 1969, यथार्थ। भारती — अंधायुग 1955 पद्य और आवाज़ का नीलाम एकांकी। साहनी — कबीरा 1981, संत-बाजार। वर्मा — एकांकी-केंद्र। बिना वर्ष के इतिहास कमजोर है। बिना धारा के नाम कमजोर है। अंधेर नगरी और अंधायुग दो कृतियाँ हैं।

कबीरा नाटक है, ग्रंथावली कविता है। तमस उपन्यास है, कबीरा नहीं। कोणार्क पूर्ण नाटक है, जाला एकांकी है। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; नाटक उसी गद्य का दृश्य उत्कर्ष है। दो नाटक और चार एकांकी इन्हीं धाराओं के निर्धारित पाठ हैं। गलत वाक्य — प्रमुख रचनाकार एक ही रूप लिखते हैं। सही वाक्य — एक नाम कई विधा छू सकता है, निर्धारित कृति अलग लिखी जाती है।

सार: नाटक दृश्य-संघर्ष। एकांकी एक अंक। भारतेंदु 1881 अंधेर नगरी। प्रसाद स्कंदगुप्त-ध्रुवस्वामिनी। राकेश आधे-अधूरे 1969। भारती अंधायुग 1955 ≠ अंधेर नगरी। साहनी कबीरा 1981। वर्मा एकांकी-केंद्र। ओझा इतिहास।

© noteswale.com — for personal exam prep only

More in Units

These Drama and non-fiction notes for B.A. Hindi belong to the B.A. Hindi syllabus on noteswale.