Practice
Exam answers notes
Readyपरीक्षा उत्तर
Exam answers is a topic in Hindi language, grammar and communication (Practice) for B.A. English (CBCS 2025–28), Faculty of Arts at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.
Written-style answers for Hindi language, grammar and communication at Maharaja Ganga Singh University, Bikaner.
Exam answers
HINDI 4.5 AECT 21 · लिखित 50 अंक। उत्तर परीक्षा की उत्तर-पुस्तिका की भाषा में हैं — परिभाषा, भेद, उदाहरण, अंतर; पत्र और प्रारूप भरे रूप में। लघु लगभग 2 अंक, दीर्घ और कौशल लगभग 5 अंक। दीर्घ उत्तर विस्तार सहित हैं।
इकाई 1 · लघु उत्तर
1. भाषा से तात्पर्य स्पष्ट कीजिए। भाषा और लिपि में अंतर बताइए।लघु
भाषा शब्द संस्कृत धातु भाष् से बना है। धातु का अर्थ है कहना, प्रकट करना। भाषा मनुष्य का वह साधन है जिससे वह अपने विचार दूसरों पर प्रकट करता है और दूसरों के विचार ग्रहण करता है। केवल बोलना भाषा नहीं है और केवल सुनना भी भाषा नहीं है। जो बात मुँह से निकले और कान तक सही अर्थ में पहुँचे, वही भाषा का पूरा काम है। इसे संप्रेषण कहते हैं। पशु की ध्वनि भावना या चेतावनी तक जाती है, नया वाक्य नहीं बनता। मनुष्य सीमित ध्वनियों से नए-नए वाक्य बना सकता है।
भाषा और लिपि एक नहीं हैं। भाषा पहले कान की वस्तु है। बालक लिखना सीखने से पहले बोलना सीखता है। निरक्षर व्यक्ति भी पूरी भाषा चलाता है। लिपि उस भाषा को कागज़ पर बाँधती है, ताकि बात समय और दूरी पार कर सके। देवनागरी हिन्दी की लिपि है, हिन्दी स्वयं नहीं है।
2. भाषा की दो प्रमुख परिभाषाएँ लिखिए और उनके अंग स्पष्ट कीजिए।लघु
आचार्य कामताप्रसाद गुरु के अनुसार भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर प्रकट करता है और दूसरों के विचार ग्रहण करता है। इस परिभाषा में दो दिशाएँ हैं — कहना और समझना। बिना समझे भाषा एकतरफा शोर रह जाती है।
भोलानाथ तिवारी के अनुसार भाषा यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीकों की वह व्यवस्था है जिसके द्वारा कोई मानव-समाज विचार-विनिमय करता है। इसके पाँच अंग हैं। ध्वनि-प्रतीक का अर्थ है कि मूल इकाई आवाज़ है और वह आवाज़ किसी अर्थ की ओर संकेत करती है। यादृच्छिक का अर्थ है कि शब्द और अर्थ का प्राकृतिक बंधन नहीं है; एक ही वस्तु को हिन्दी जल, अंग्रेज़ी वाटर और फ़ारसी आब कहती है। व्यवस्था का अर्थ है कि शब्द के साथ जोड़ने के नियम भी हैं। मानव-समाज का अर्थ है कि एक व्यक्ति की निजी आवाज़ भाषा नहीं होती। विचार-विनिमय का अर्थ है देना और लेना।
3. भाषा की प्रकृति के आठ धर्म सोदाहरण लिखिए। परिभाषा और प्रकृति में अंतर बताइए।लघु
प्रकृति भाषा का स्वाभाविक धर्म है। आठ धर्म ये हैं। सामाजिक — बालक घर और समाज से भाषा पाता है। यादृच्छिक — गाय शब्द में गाय जैसा चित्र बना हुआ नहीं बैठा। अर्जित — मैं प्यासा हूँ सीखना पड़ता है। परिवर्तनशील — अग्नि से आग बना; संस्कृत से प्राकृत और अपभ्रंश होते हुए हिन्दी बनी। ध्वन्यात्मक — मूल रूप वाचिक है; निरक्षर भी भाषा चलाता है। व्यवस्थाबद्ध — वर्ण से शब्द और शब्द से वाक्य बनते हैं। प्रतीकात्मक — नदी शब्द से पैर नहीं भीगते। उत्पादक — सीमित वर्ण और शब्दों से नए वाक्य बनते हैं।
परिभाषा बताती है कि भाषा क्या है। प्रकृति बताती है कि भाषा कैसी है।
4. भाषा के विविध रूप लिखिए। राजभाषा और राष्ट्रभाषा में अंतर स्पष्ट कीजिए।लघु
भाषा के रूप तीन दृष्टियों से समझे जाते हैं। प्रवाह की दृष्टि से मौखिक और लिखित रूप हैं। मौखिक रूप मूल है। लिखित रूप स्मृति, शिक्षा और शासन का सहारा है। विस्तार की दृष्टि से बोली, उपभाषा और भाषा हैं। बोली छोटे क्षेत्र की बोलचाल है। उपभाषा कई बोलियों का समूह है। भाषा मानक और साहित्यिक विस्तार है। प्रयोजन की दृष्टि से मातृभाषा, संपर्क भाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा, साहित्यिक भाषा और मानक भाषा हैं।
राजभाषा शासन की भाषा है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में हिन्दी है। राष्ट्रभाषा जन-संपर्क की व्यापक भाषा है। संविधान ने राष्ट्रभाषा को कानूनी पद नहीं बनाया। दोनों शब्द एक नहीं हैं।
5. हिन्दी भाषा की विशेषताएँ लिखिए।लघु
हिन्दी भारोपीय परिवार की भारतीय-आर्य शाखा की भाषा है। इसका विकास वैदिक और लौकिक संस्कृत, प्राकृत तथा अपभ्रंश होते हुए आधुनिक हिन्दी तक हुआ है। इसकी लिपि देवनागरी है। लेखन बाएँ से दाएँ चलता है। प्रायः एक ध्वनि के लिए एक चिह्न है। वर्ण उच्चारण-स्थान के क्रम में सजे हैं। लिंग दो हैं — पुल्लिंग और स्त्रीलिंग। वचन दो हैं — एकवचन और बहुवचन। कारक मुख्यतः परसर्ग से बनते हैं — ने, को, से, का / के / की, में, पर। वाक्य-क्रम प्रायः कर्ता, कर्म, क्रिया है। शब्द-भंडार तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी स्रोतों से आता है। अनुच्छेद 343 हिन्दी को संघ की राजभाषा बनाता है। अनुच्छेद 351 उसके विकास का निर्देश देता है।
6. क्रिया किसे कहते हैं? सकर्मक, अकर्मक, द्विकर्मक, संयुक्त, प्रेरणार्थक और तीन वाच्य सोदाहरण लिखिए।लघु
क्रिया उस शब्द को कहते हैं जिससे किसी काम का करना या होना जाना जाए। धातु क्रिया का मूल है — लिख्, पढ़्। नामधातु संज्ञा से बनती है, जैसे शर्म से शर्माना। खिलाना खा धातु से बनी प्रेरणार्थक क्रिया है, नामधातु नहीं।
सकर्मक क्रिया का फल कर्म पर पड़ता है — राम पत्र लिखता है। अकर्मक क्रिया में कर्म नहीं होता — बालक सोता है। द्विकर्मक क्रिया दो कर्म लेती है — उसने मुझे पुस्तक दी। यहाँ पुस्तक मुख्य कर्म है और मुझे गौण कर्म है। संयुक्त क्रिया दो क्रियाओं से एक अर्थ बनाती है — पढ़ लिया, चला गया। प्रेरणार्थक क्रिया दूसरे से काम करवाती है — खिलाना, खिलवाना।
कर्तृवाच्य में कर्ता प्रधान है — राम पत्र लिखता है। कर्मवाच्य में कर्म प्रधान है — पत्र लिखा गया। भाववाच्य अकर्मक क्रिया पर चलता है — उससे चला नहीं जाता। काल समय बताता है। वाच्य दृष्टि बताता है। दोनों एक नहीं हैं।
7. कारक और विभक्ति में अंतर लिखिए। आठ कारक परसर्ग और उदाहरण सहित दीजिए।लघु
कारक अर्थ है — संज्ञा का क्रिया से क्या संबंध है। विभक्ति उस संबंध का चिह्न है। हिन्दी में यह चिह्न प्रायः परसर्ग होता है, जो संज्ञा के बाद अलग लिखा जाता है। कभी चिह्न शून्य रहता है। बालक पढ़ता है में कर्ता है, पर ने नहीं लगा।
कर्ता — किसने / कौन — ने या शून्य — राम ने कहा; बालक पढ़ता है। कर्म — किसे / क्या — को या शून्य — राम को बुलाओ; पत्र लिखो। करण — किससे — से, द्वारा — कलम से लिखना। संप्रदान — किसके लिए — को, के लिए — गरीब को वस्त्र दो। अपादान — किससे अलग — से — वृक्ष से पत्ता गिरा। संबंध — किसका — का, के, की — राम का भाई। अधिकरण — कहाँ / कब — में, पर — कमरे में बैठो। संबोधन — पुकार — हे, अरे — हे मित्र! से करण में भी आता है और अपादान में भी। भेद वाक्य के अर्थ से तय होता है।
8. सर्वनाम के छह भेद लिखिए। सार्वनामिक विशेषण से अंतर बताइए।लघु
सर्वनाम वह शब्द है जो संज्ञा के स्थान पर आए। पुरुषवाचक — मैं, तुम, वह। निश्चयवाचक — यह आया, वह गया। अनिश्चयवाचक — कोई, कुछ। संबंधवाचक — जो परिश्रम करेगा, वह जीतेगा। प्रश्नवाचक — कौन आया? निजवाचक — राम स्वयं आ गया। आप बैठिए में आप आदरसूचक मध्यम पुरुष है, निजवाचक नहीं। सर्वनाम विकारी है — मैं, मुझे, मेरा।
वह आया में वह सर्वनाम है, क्योंकि संज्ञा की जगह आया है। वह लड़का आया में वह सार्वनामिक विशेषण है, क्योंकि लड़का के साथ विशेषता बता रहा है। आदर में एक व्यक्ति के लिए आप आइए और वे आए हैं बहुवचन जैसा रूप चलता है।
9. विशेषण किसे कहते हैं? भेद, प्रविशेषण और तुलना की अवस्थाएँ लिखिए।लघु
विशेषण वह शब्द है जो संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताए। जिसकी विशेषता बताई जाए उसे विशेष्य कहते हैं। गुणवाचक — ईमानदार विद्यार्थी। परिमाणवाचक — थोड़ा जल। संख्यावाचक — दो पुस्तकें, पहला स्थान। सार्वनामिक विशेषण — वह घर, कौन मार्ग। प्रविशेषण विशेषण का पाँचवाँ भेद नहीं है। वह विशेषण की तीव्रता बताता है — बहुत अच्छा।
तुलना की तीन अवस्थाएँ हैं। मूलावस्था — सुंदर। उत्तरावस्था — अधिक सुंदर, सुंदरतर। उत्तमावस्था — सबसे सुंदर, सुंदरतम। वह अच्छा गाता है में अच्छा क्रिया-विशेषण है। वह अच्छा लड़का है में अच्छा विशेषण है।
10. अव्यय किसे कहते हैं? चार भेद सोदाहरण लिखिए।लघु
अव्यय अविकारी शब्द है। लिंग, वचन और कारक से इसका रूप नहीं बदलता। वह धीरे चलता है और वे धीरे चलते हैं — दोनों में धीरे वही रहता है। चार भेद हैं। क्रिया-विशेषण — धीरे, आज, बाहर। संबंधबोधक — के बिना, के सामने, की ओर। समुच्चयबोधक — और, या, किंतु, क्योंकि। विस्मयादिबोधक — हाय, वाह, ओह।
आठ कारकों के छोटे चिह्न परसर्ग कहलाते हैं। लंबे समूह संबंधबोधक कहलाते हैं। कल का काम आज करो में कल संज्ञा है। कल जाऊँगा में कल क्रिया-विशेषण है।
11. वर्ण किसे कहते हैं? स्वर, व्यंजन, अयोगवाह और पाँच वर्ग लिखिए।लघु
वर्ण भाषा की सबसे छोटी स्वतंत्र ध्वनि है, जिसे और नहीं तोड़ा जा सकता। अक्षर वह इकाई है जो एक झटके में बोली जाती है — क, का, कि। वर्ण और अक्षर एक नहीं हैं। स्वर बिना दूसरे वर्ण की मदद के बोले जाते हैं — अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ। ह्रस्व स्वर अ, इ, उ, ऋ हैं। दीर्घ स्वर आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ हैं। व्यंजन के उच्चारण में स्वर का सहारा लगता है — क्। अयोगवाह दो हैं — अं अनुस्वार और अः विसर्ग। ये न पूरे स्वर हैं, न पूरे व्यंजन। अनुनासिक चंद्रबिंदु से लिखा जाता है — आँ। अनुस्वार अं है। दोनों एक नहीं हैं।
पाँच वर्ग ये हैं। कवर्ग — क ख ग घ ङ, स्थान कंठ। चवर्ग — च छ ज झ ञ, तालु। टवर्ग — ट ठ ड ढ ण, मूर्धा। तवर्ग — त थ द ध न, दंत। पवर्ग — प फ ब भ म, ओष्ठ। प्रत्येक वर्ग का क्रम अघोष अल्पप्राण, अघोष महाप्राण, घोष अल्पप्राण, घोष महाप्राण और नासिक्य है। अंतःस्थ य र ल व हैं। ऊष्म श ष स ह हैं। क्ष, त्र, ज्ञ संयुक्त व्यंजन हैं।
12. शब्द-भंडार की उत्पत्ति और रचना के वर्ग सोदाहरण लिखिए।लघु
उत्पत्ति की दृष्टि से चार वर्ग हैं। तत्सम संस्कृत के समान हैं — अग्नि, रात्रि, पुष्प। तद्भव उसी जड़ से बदले रूप हैं — आग, रात, फूल। देशज लोक से बने हैं — रोटी, लोटा, खिड़की। विदेशी अन्य भाषाओं से आए हैं — अदालत, टिकट, अलमारी, कुर्सी। जोड़ी से अंतर स्पष्ट होता है — अग्नि-आग, दुग्ध-दूध, हस्त-हाथ।
रचना की दृष्टि से तीन वर्ग हैं। रूढ़ शब्द का अर्थ खंडों से नहीं खुलता — आम, पेड़। यौगिक शब्द के खंड अर्थ देते हैं — विद्यालय = विद्या + आलय। योगरूढ़ में योग तो है, पर अर्थ रूढ़ हो गया है — पंकज का अर्थ कमल है, हर कीचड़ में जन्मी वस्तु नहीं। विकारी शब्द रूप बदलते हैं। अविकारी शब्द रूप नहीं बदलते। उत्पत्ति और रचना दो अलग दृष्टियाँ हैं।
इकाई 1 · दीर्घ उत्तर
13. भाषा से तात्पर्य, परिभाषा, प्रकृति एवं विविध रूप विस्तार से लिखिए। भाषा के जन्म पर भी प्रकाश डालिए।दीर्घ
भाषा मनुष्य का वह सामाजिक साधन है जिससे वह अपने विचार दूसरों पर प्रकट करता है और दूसरों के विचार ग्रहण करता है। केवल बोलना भाषा नहीं है और केवल सुनना भी भाषा नहीं है। जो बात मुँह से निकले और कान तक सही अर्थ में पहुँचे, वही भाषा का पूरा काम है। इसे संप्रेषण कहते हैं। पशु की ध्वनि भावना या चेतावनी तक जाती है, नया वाक्य नहीं बनता। मनुष्य सीमित ध्वनियों से नए-नए वाक्य बना सकता है।
आचार्य कामताप्रसाद गुरु की परिभाषा व्यवहार की है। उनके अनुसार भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर प्रकट करता है और दूसरों के विचार ग्रहण करता है। इसमें दो दिशाएँ हैं — कहना और समझना। बिना समझे भाषा एकतरफा शोर रह जाती है। भोलानाथ तिवारी भाषा को यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीकों की वह व्यवस्था कहते हैं जिसके द्वारा कोई मानव-समाज विचार-विनिमय करता है। इसके पाँच अंग हैं। ध्वनि-प्रतीक का अर्थ है कि मूल इकाई आवाज़ है और वह आवाज़ अर्थ की ओर संकेत करती है। यादृच्छिक का अर्थ है कि शब्द और अर्थ का प्राकृतिक बंधन नहीं है। एक ही वस्तु को हिन्दी जल, अंग्रेज़ी वाटर और फ़ारसी आब कहती है। व्यवस्था का अर्थ है कि शब्द के साथ जोड़ने के नियम भी हैं। मानव-समाज का अर्थ है कि एक व्यक्ति की निजी आवाज़ भाषा नहीं होती। विचार-विनिमय का अर्थ है देना और लेना।
भाषा का जन्म किसी एक दिन किसी एक व्यक्ति से नहीं होता। वह समाज में साथ रहने, काम बाँटने और सोच बताने की जरूरत से पैदा होती है। समूह ध्वनियों को अर्थ से बाँधता है और बच्चे उसे सुनकर पाते हैं। सामान्य भाषा का यह जन्म सामाजिक है। हिन्दी का ऐतिहासिक जन्म भारतीय-आर्य धारा से आता है — वैदिक भाषा से लौकिक संस्कृत, फिर प्राकृत, फिर अपभ्रंश, फिर आधुनिक हिन्दी। खड़ी बोली इस आधुनिक रूप की मानक धारा बनी। दोनों जन्म एक नहीं हैं।
परिभाषा बताती है कि भाषा क्या है। प्रकृति बताती है कि भाषा कैसी है। प्रकृति के आठ धर्म हैं। सामाजिक — बालक घर और समाज से भाषा पाता है। यादृच्छिक — गाय शब्द में गाय जैसा चित्र बना हुआ नहीं बैठा। अर्जित — मैं प्यासा हूँ सीखना पड़ता है। परिवर्तनशील — अग्नि से आग बना। ध्वन्यात्मक — मूल रूप वाचिक है; निरक्षर भी भाषा चलाता है। व्यवस्थाबद्ध — वर्ण से शब्द और शब्द से वाक्य बनते हैं। प्रतीकात्मक — नदी शब्द से पैर नहीं भीगते। उत्पादक — सीमित वर्ण और शब्दों से नए वाक्य बनते हैं।
भाषा के रूप तीन दृष्टियों से खुलते हैं। प्रवाह से मौखिक और लिखित रूप हैं। मौखिक रूप मूल है। लिखित रूप स्मृति, शिक्षा और शासन का सहारा है। विस्तार से बोली, उपभाषा और भाषा हैं। बोली छोटे क्षेत्र की बोलचाल है। उपभाषा कई बोलियों का समूह है। भाषा मानक और साहित्यिक विस्तार है। प्रयोजन से मातृभाषा, संपर्क भाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा, साहित्यिक भाषा और मानक भाषा हैं। राजभाषा शासन की भाषा है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में हिन्दी है। राष्ट्रभाषा जन-संपर्क की व्यापक भाषा है। संविधान ने राष्ट्रभाषा को कानूनी पद नहीं बनाया। दोनों शब्द एक नहीं हैं।
14. हिन्दी भाषा की विशेषताएँ विस्तार से लिखिए।दीर्घ
हिन्दी भारोपीय परिवार की भारतीय-आर्य शाखा की भाषा है। इसका निकट विकास वैदिक और लौकिक संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और आधुनिक हिन्दी के क्रम से हुआ है। भारत में द्रविड़ परिवार भी है, पर हिन्दी भारतीय-आर्य है। खड़ी बोली दिल्ली-मेरठ क्षेत्र की बोलचाल से निकलकर मानक हिन्दी बनी। ब्रज, अवधी, भोजपुरी विस्तृत बोली या उपभाषा-परंपरा के नाम हैं। मानक हिन्दी शिक्षा, परीक्षा, समाचार और कार्यालय का रूप है।
हिन्दी की लिपि देवनागरी है। भाषा और लिपि एक नहीं हैं। भाषा पहले कान की वस्तु है। निरक्षर भी पूरी भाषा चलाता है। लिपि उस भाषा को कागज़ पर बाँधती है। देवनागरी लिपि है, हिन्दी स्वयं नहीं है। लेखन बाएँ से दाएँ चलता है। प्रायः एक ध्वनि के लिए एक चिह्न है। स्वर स्वतंत्र भी लिखे जाते हैं और मात्रा बनकर व्यंजन से जुड़ते भी हैं। वर्ण उच्चारण-स्थान के क्रम में सजे हैं — कवर्ग कंठ से पवर्ग ओष्ठ तक। शिरोरेखा शब्दों को बाँधती है। अयोगवाह अनुस्वार और विसर्ग हैं। क्ष, त्र, ज्ञ संयुक्त व्यंजन हैं, पाँचवें वर्ग के सदस्य नहीं।
लिंग दो हैं — पुल्लिंग और स्त्रीलिंग। लिंग क्रिया और विशेषण तक जाता है — छोटा बालक आया; छोटी बालिका आई। संस्कृत का नपुंसक हिन्दी व्यवहार में स्वतंत्र कोटि नहीं रहा। पुस्तक स्त्रीलिंग है और गृह पुल्लिंग है। वचन दो हैं — एकवचन और बहुवचन। प्राण, दर्शन, होश बहुवचन चलते हैं — प्राण निकल गए। कारक मुख्यतः परसर्ग से बनते हैं — ने, को, से, का / के / की, में, पर। ने केवल पूर्ण भूतकाल की सकर्मक क्रिया के कर्ता पर लगता है। वर्तमान में राम जाता है, राम ने जाता है नहीं।
वाक्य-क्रम प्रायः कर्ता, कर्म, क्रिया है — बालक पत्र लिखता है। प्रश्न और निषेध में भी क्रिया प्रायः अंत के निकट रहती है — क्या राम आया; राम नहीं आया। सहायक क्रिया काल जोड़ती है — लिख रहा है, लिख चुका, लिखेगा। विशेषण विशेष्य से पहले आता है — लाल साड़ी।
शब्द-भंडार चार स्रोतों से आता है। तत्सम संस्कृत के निकट हैं — अग्नि, रात्रि, दुग्ध। ये गंभीर और शास्त्रीय रंग देते हैं। तद्भव उसी जड़ से बदले रूप हैं — आग, रात, दूध। ये घरेलू रंग देते हैं। देशज लोक से बने हैं — रोटी, लोटा, खिड़की। विदेशी अन्य भाषाओं से आए हैं — अदालत, कानून फ़ारसी-अरबी से; टिकट, स्कूल अंग्रेज़ी से। अनुच्छेद 343 हिन्दी को देवनागरी में संघ की राजभाषा बनाता है। अनुच्छेद 351 हिन्दी के विकास का निर्देश देता है। राजभाषा शासन का पद है। राष्ट्रभाषा जन-संपर्क का व्यापक रूप है। दोनों एक नहीं हैं।
15. क्रिया, विभक्ति, सर्वनाम, विशेषण और अव्यय को सोदाहरण समझाइए।दीर्घ
क्रिया उस शब्द को कहते हैं जिससे किसी काम का करना या होना जाना जाए। धातु क्रिया का मूल है — लिख्, पढ़्। नामधातु संज्ञा या विशेषण से बनती है — शर्म से शर्माना, हाथ से हथियाना। खिलाना खा धातु से बनी प्रेरणार्थक क्रिया है, नामधातु नहीं। सकर्मक क्रिया का फल कर्म पर पड़ता है — राम पत्र लिखता है। अकर्मक में कर्म नहीं होता — बालक सोता है। द्विकर्मक दो कर्म लेती है — उसने मुझे पुस्तक दी; मुझे गौण कर्म है, पुस्तक मुख्य कर्म है। संयुक्त क्रिया दो क्रियाओं से एक अर्थ बनाती है — पढ़ लिया, चला गया। प्रेरणार्थक दूसरे से काम करवाती है — खिलाना, खिलवाना। कर्तृवाच्य में कर्ता प्रधान है — राम पत्र लिखता है। कर्मवाच्य में कर्म प्रधान है — पत्र लिखा गया। भाववाच्य अकर्मक क्रिया पर चलता है — उससे चला नहीं जाता। काल समय बताता है। वाच्य दृष्टि बताता है। दोनों एक नहीं हैं।
कारक अर्थ है — संज्ञा का क्रिया से क्या संबंध है। विभक्ति उस संबंध का चिह्न है। हिन्दी में यह चिह्न प्रायः परसर्ग होता है, जो संज्ञा के बाद अलग लिखा जाता है। कभी चिह्न शून्य रहता है। बालक पढ़ता है में कर्ता है, पर ने नहीं लगा। आठ कारक ये हैं। कर्ता — राम ने कहा; बालक पढ़ता है। कर्म — राम को बुलाओ; पत्र लिखो। करण — कलम से लिखना। संप्रदान — गरीब को वस्त्र दो। अपादान — वृक्ष से पत्ता गिरा। संबंध — राम का भाई। अधिकरण — कमरे में बैठो। संबोधन — हे मित्र! से करण में भी आता है और अपादान में भी। भेद वाक्य के अर्थ से तय होता है।
सर्वनाम वह शब्द है जो संज्ञा के स्थान पर आए। पुरुषवाचक — मैं, तुम, वह। निश्चयवाचक — यह आया, वह गया। अनिश्चयवाचक — कोई, कुछ। संबंधवाचक — जो परिश्रम करेगा, वह जीतेगा। प्रश्नवाचक — कौन आया? निजवाचक — राम स्वयं आ गया। आप बैठिए में आप आदरसूचक मध्यम पुरुष है, निजवाचक नहीं। वह आया में वह सर्वनाम है, क्योंकि संज्ञा की जगह आया है। वह लड़का आया में वह सार्वनामिक विशेषण है, क्योंकि लड़का के साथ विशेषता बता रहा है।
विशेषण वह शब्द है जो संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताए। गुणवाचक — ईमानदार विद्यार्थी। परिमाणवाचक — थोड़ा जल। संख्यावाचक — दो पुस्तकें, पहला स्थान। सार्वनामिक विशेषण — वह घर। प्रविशेषण विशेषण का पाँचवाँ भेद नहीं है। वह विशेषण की तीव्रता बताता है — बहुत अच्छा। तुलना की तीन अवस्थाएँ हैं — सुंदर, अधिक सुंदर, सबसे सुंदर। वह अच्छा गाता है में अच्छा क्रिया-विशेषण है। वह अच्छा लड़का है में अच्छा विशेषण है।
अव्यय अविकारी शब्द है। लिंग, वचन और कारक से इसका रूप नहीं बदलता। वह धीरे चलता है और वे धीरे चलते हैं — दोनों में धीरे वही रहता है। चार भेद हैं। क्रिया-विशेषण — धीरे, आज, बाहर। संबंधबोधक — के बिना, के सामने। समुच्चयबोधक — और, किंतु, क्योंकि। विस्मयादिबोधक — हाय, वाह। आठ कारकों के छोटे चिह्न परसर्ग हैं। लंबे समूह संबंधबोधक हैं। कल का काम आज करो में कल संज्ञा है। कल जाऊँगा में कल क्रिया-विशेषण है।
इकाई 2 · लघु उत्तर
16. संधि किसे कहते हैं? तीन भेद सोदाहरण लिखिए। संधि और समास में अंतर बताइए।लघु
संधि दो वर्णों के पास आने से होने वाला निश्चित ध्वनि-विकार है। मूल खंड दिखाना संधि-विच्छेद है। स्वर संधि — देव + इंद्र = देवेंद्र; हिम + आलय = हिमालय। व्यंजन संधि — सत् + जन = सज्जन; उत् + लास = उल्लास। विसर्ग संधि — निः + चल = निश्चल; मनः + रथ = मनोरथ।
संधि वर्णों का मेल है। समास पदों का संक्षेप है। संधि का विच्छेद दो खंड लौटाता है। समास का विग्रह वाक्यांश लौटाता है — राजपुत्र = राजा का पुत्र। विद्यालय में विद्या + आलय की दीर्घ संधि है। राजपुत्र में राजा और पुत्र दो पद एक शब्द बने हैं, इसलिए समास है। हिमालय में दीर्घ संधि भी है और हिम का आलय कहने पर तत्पुरुष समास भी है।
17. दीर्घ संधि और गुण संधि के नियम सोदाहरण लिखिए।लघु
दीर्घ संधि में समान स्वर मिलकर दीर्घ हो जाते हैं। अ या आ के बाद अ या आ आने पर आ बनता है — हिम + आलय = हिमालय; विद्या + आलय = विद्यालय; महा + आत्मा = महात्मा। इ या ई के बाद इ या ई आने पर ई बनता है — कवि + इंद्र = कवींद्र; गिरि + ईश = गिरीश। उ या ऊ के बाद उ या ऊ आने पर ऊ बनता है — भानु + उदय = भानूदय। अ के बाद इ आए तो दीर्घ संधि नहीं चलती।
गुण संधि में अ या आ के बाद इ या ई आने पर ए बनता है — देव + इंद्र = देवेंद्र; नर + इंद्र = नरेंद्र। अ या आ के बाद उ या ऊ आने पर ओ बनता है — सूर्य + उदय = सूर्योदय; महा + उत्सव = महोत्सव। अ या आ के बाद ऋ आने पर अर् बनता है — महा + ऋषि = महर्षि। विद्यालय दीर्घ संधि है क्योंकि आ + आ मिला। देवेंद्र गुण संधि है क्योंकि अ + इ मिला।
18. वृद्धि, यण और अयादि संधि सोदाहरण समझाइए।लघु
वृद्धि संधि में अ या आ के बाद ए या ऐ आने पर ऐ बनता है — सदा + एव = सदैव; एक + एक = एकैक। अ या आ के बाद ओ या औ आने पर औ बनता है — वन + औषधि = वनौषधि। गुण संधि के परिणाम ए और ओ हैं। वृद्धि संधि के परिणाम ऐ और औ हैं। देवेंद्र गुण संधि है। सदैव वृद्धि संधि है।
यण संधि में इ, ई, उ, ऊ या ऋ के बाद भिन्न स्वर आने पर वे य्, व् या र् बन जाते हैं — इति + आदि = इत्यादि; सु + आगत = स्वागत; पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा। बाद वाला स्वर समान हो तो दीर्घ संधि चलती है — मुनि + ईश = मुनीश। अयादि संधि में ए से अय्, ऐ से आय्, ओ से अव् और औ से आव् बनता है — ने + अन = नयन; नै + अक = नायक; पो + अन = पवन; पौ + अक = पावक।
19. व्यंजन संधि के प्रमुख मेल सोदाहरण लिखिए।लघु
व्यंजन संधि में पूर्व व्यंजन पर वाले वर्ण के प्रभाव से बदलता है। त् + च या छ = च्च या च्छ — सत् + चित् = सच्चित्; उत् + चारण = उच्चारण। त् + ज = ज्ज — सत् + जन = सज्जन। त् + ड = ड्ड — उत् + डयन = उड्डयन। त् + ल = ल्ल — उत् + लास = उल्लास। त् या द् + ह = द्ध — उत् + हार = उद्धार; सत् + धर्म = सद्धर्म। क् + स्वर या घोष = ग् — वाक् + ईश = वागीश; दिक् + अंबर = दिगंबर। म् + व्यंजन = अनुस्वार — सम् + तोष = संतोष; सम् + कृति = संस्कृति।
सज्जन का विच्छेद सत् + जन है, सज + जन नहीं। संस्कृति का विच्छेद सम् + कृति है। सदुपदेश = सत् + उपदेश। यहाँ त् स्वर से पहले द् हुआ है, इसलिए यह व्यंजन संधि है, गुण संधि नहीं।
20. विसर्ग संधि के तीन रूप सोदाहरण लिखिए।लघु
विसर्ग संधि में विसर्ग पर वाले वर्ण से श्, ष्, स्, ओ या र् बन जाता है। प्रथम रूप में विसर्ग श्, ष् या स् होता है। निः + चल = निश्चल। निः + छल = निश्छल। धनुः + टंकार = धनुष्टंकार। निः + तेज = निस्तेज। दुः + कर्म = दुष्कर्म। निः + कपट = निष्कपट।
द्वितीय रूप में अः के बाद घोष व्यंजन आने पर ओ बनता है — मनः + रथ = मनोरथ; तपः + वन = तपोवन; यशः + दा = यशोदा। तृतीय रूप में इः या उः के बाद स्वर आने पर विसर्ग र बनता है — निः + आकार = निराकार; दुः + आत्मा = दुरात्मा; निः + आहार = निराहार। निश्चल का विच्छेद निः + चल है, निश + चल नहीं।
21. समास किसे कहते हैं? छह भेद विग्रह सहित लिखिए।लघु
समास दो या अधिक पदों का अर्थ-संक्षेप है। जो शब्द बनता है उसे समस्त पद कहते हैं। मूल अर्थ खोलना विग्रह है। अव्ययीभाव में पूर्व पद प्रधान होता है — यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार; प्रतिदिन = प्रत्येक दिन। तत्पुरुष में उत्तर पद प्रधान होता है — राजपुत्र = राजा का पुत्र; शोकाकुल = शोक से आकुल; जलमग्न = जल में मग्न; पुत्रहित = पुत्र के लिए हित।
कर्मधारय में पूर्व पद विशेषण होता है — नीलकमल = नीला है जो कमल; महात्मा = महान है जो आत्मा। द्विगु में पूर्व पद संख्या होता है — त्रिभुवन = तीन भुवनों का समाहार; नवग्रह = नौ ग्रहों का समाहार। द्वंद्व में दोनों पद प्रधान होते हैं — रामलक्ष्मण = राम और लक्ष्मण; सुखदुःख = सुख और दुःख। बहुव्रीहि किसी तीसरे अर्थ का वाचक होता है — पीतांबर = पीला है अंबर जिसका, अर्थात् विष्णु; दशानन = दस हैं आनन जिसके, अर्थात् रावण; नीलकंठ = नीला है कंठ जिसका, अर्थात् शिव। नीलकमल कमल ही रहता है, इसलिए कर्मधारय है। नीलकंठ शिव है, इसलिए बहुव्रीहि है।
22. उपसर्ग और प्रत्यय में अंतर लिखिए। कृत्, तद्धित और स्त्री प्रत्यय सोदाहरण दीजिए।लघु
उपसर्ग वह शब्दांश है जो सार्थक शब्द के आगे लगकर अर्थ बदलता है — प्र + हार = प्रहार; आ + हार = आहार; वि + हार = विहार; सम् + हार = संहार। प्र अकेला शब्द नहीं है। संस्कृत के प्रमुख उपसर्ग प्र, परा, अप, सम्, अनु, आ, सु, दुर्, वि, परि, उप हैं। हिन्दी के उपसर्ग अ, अन, अध, भर, कु हैं — अज्ञान, अनहोनी, भरपेट, कुचाल। विदेशी उपसर्ग बे, कम, ला, गैर हैं — बेईमान, लापता, गैरकानूनी।
प्रत्यय शब्द के पीछे लगता है। कृत् प्रत्यय धातु के पीछे लगता है — पढ़् + आई = पढ़ाई; लिख् + अक = लेखक; दा + ता = दाता। तद्धित प्रत्यय संज्ञा या विशेषण के पीछे लगता है — बच्चा + पन = बचपन; धर्म + इक = धार्मिक; मानव + ता = मानवता; भारत + ईय = भारतीय। स्त्री प्रत्यय पुं-रूप से स्त्रीलिंग बनाता है — देव से देवी, छात्र से छात्रा, हंस से हंसिनी। उपसर्ग प्रायः शब्द-वर्ग नहीं बदलता। प्रत्यय प्रायः वर्ग बदलता है — लिख् क्रिया है, लेखक संज्ञा है।
इकाई 2 · दीर्घ उत्तर
23. स्वर संधि के पाँच भेद नियम और विच्छेद सहित लिखिए।दीर्घ
स्वर संधि तब होती है जब स्वर के बाद स्वर आए और दोनों मिलकर एक निश्चित नया स्वर या व्यंजन-स्वर योग बनाएँ। मूल खंड दिखाना संधि-विच्छेद है। स्वर संधि के पाँच भेद हैं — दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण और अयादि। भेद पूर्व स्वर और पर स्वर से तय होता है, अनुमान से नहीं।
प्रथम भेद दीर्घ संधि है। समान स्वर मिलकर दीर्घ हो जाते हैं। अ या आ के बाद अ या आ आने पर आ बनता है — हिम + आलय = हिमालय; विद्या + आलय = विद्यालय; महा + आत्मा = महात्मा; परम + अर्थ = परमार्थ। इ या ई के बाद इ या ई आने पर ई बनता है — कवि + इंद्र = कवींद्र; गिरि + ईश = गिरीश; मुनि + ईश = मुनीश। उ या ऊ के बाद उ या ऊ आने पर ऊ बनता है — भानु + उदय = भानूदय। अ के बाद इ आए तो दीर्घ संधि नहीं चलती।
द्वितीय भेद गुण संधि है। अ या आ के बाद इ या ई आने पर ए बनता है — देव + इंद्र = देवेंद्र; नर + इंद्र = नरेंद्र। अ या आ के बाद उ या ऊ आने पर ओ बनता है — सूर्य + उदय = सूर्योदय; महा + उत्सव = महोत्सव। अ या आ के बाद ऋ आने पर अर् बनता है — महा + ऋषि = महर्षि। विद्यालय दीर्घ संधि है क्योंकि आ + आ मिला। देवेंद्र गुण संधि है क्योंकि अ + इ मिला।
तृतीय भेद वृद्धि संधि है। अ या आ के बाद ए या ऐ आने पर ऐ बनता है — सदा + एव = सदैव; एक + एक = एकैक। अ या आ के बाद ओ या औ आने पर औ बनता है — वन + औषधि = वनौषधि। गुण संधि के परिणाम ए और ओ हैं। वृद्धि संधि के परिणाम ऐ और औ हैं। देवेंद्र गुण संधि है। सदैव वृद्धि संधि है। दोनों को एक कहना गलत है।
चतुर्थ भेद यण संधि है। इ, ई, उ, ऊ या ऋ के बाद भिन्न स्वर आने पर वे य्, व् या र् बन जाते हैं — इति + आदि = इत्यादि; अति + अधिक = अत्यधिक; सु + आगत = स्वागत; पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा। बाद वाला स्वर समान हो तो दीर्घ संधि चलती है, यण नहीं — मुनि + ईश = मुनीश। पंचम भेद अयादि संधि है। ए से अय्, ऐ से आय्, ओ से अव् और औ से आव् बनता है — ने + अन = नयन; नै + अक = नायक; पो + अन = पवन; पौ + अक = पावक। अयादि में पूर्व स्वर ए, ऐ, ओ या औ है। यण में पूर्व स्वर इ, उ या ऋ है। ने + अन अयादि है। इति + आदि यण है।
24. समास के भेद सोदाहरण लिखिए। संधि, समास, उपसर्ग और प्रत्यय का अंतर स्पष्ट कीजिए।दीर्घ
समास दो या अधिक पदों का अर्थ-संक्षेप है। जो शब्द बनता है उसे समस्त पद कहते हैं। मूल अर्थ खोलना विग्रह है। संधि वर्णों का मेल है। उसका खोल विच्छेद है। समास पदों का संक्षेप है। उसका खोल विग्रह है। विद्यालय में विद्या + आलय की दीर्घ संधि है। राजपुत्र में राजा और पुत्र दो पद एक शब्द बने हैं, इसलिए समास है। हिमालय में दीर्घ संधि भी है और हिम का आलय कहने पर तत्पुरुष समास भी है।
अव्ययीभाव में पूर्व पद प्रधान होता है और समस्त पद अव्यय की तरह चलता है — यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार; प्रतिदिन = प्रत्येक दिन; आजन्म = जन्म से लेकर; भरपेट = पेट भरकर। तत्पुरुष में उत्तर पद प्रधान होता है — राजपुत्र = राजा का पुत्र; शोकाकुल = शोक से आकुल; धनहीन = धन से हीन; जलमग्न = जल में मग्न; ग्रामगत = ग्राम को गया हुआ; पुत्रहित = पुत्र के लिए हित; गंगाजल = गंगा का जल। अव्ययीभाव कब, कैसे, कितना जैसे अर्थ देता है। तत्पुरुष किसका, किससे, किसलिए जैसे अर्थ देता है।
कर्मधारय में पूर्व पद विशेषण होता है और उत्तर पद विशेष्य — नीलकमल = नीला है जो कमल; महात्मा = महान है जो आत्मा। द्विगु में पूर्व पद संख्या होती है और समाहार या समूह बनता है — सप्तर्षि = सात ऋषियों का समूह; नवग्रह = नौ ग्रहों का समाहार; त्रिभुवन = तीन भुवनों का समाहार। द्वंद्व में दोनों पद प्रधान रहते हैं और विग्रह और से होता है — रामलक्ष्मण = राम और लक्ष्मण; सुखदुःख = सुख और दुःख; अन्नजल = अन्न और जल; पापपुण्य = पाप और पुण्य। बहुव्रीहि किसी तीसरे अर्थ का वाचक होता है — पीतांबर = पीला है अंबर जिसका, अर्थात् विष्णु; दशानन = दस हैं आनन जिसके, अर्थात् रावण; नीलकंठ = नीला है कंठ जिसका, अर्थात् शिव; लंबोदर = लंबा है उदर जिसका, अर्थात् गणेश। नीलकमल कमल ही रहता है, इसलिए कर्मधारय है। नीलकंठ शिव है, इसलिए बहुव्रीहि है।
उपसर्ग वह शब्दांश है जो सार्थक शब्द के आगे लगकर अर्थ बदलता है — प्र + हार = प्रहार; आ + हार = आहार; वि + हार = विहार; सम् + हार = संहार। प्र अकेला शब्द नहीं है। प्रत्यय शब्द के पीछे लगता है। कृत् प्रत्यय धातु के पीछे लगता है — पढ़् + आई = पढ़ाई; लिख् + अक = लेखक। तद्धित प्रत्यय संज्ञा या विशेषण के पीछे लगता है — बच्चा + पन = बचपन; भारत + ईय = भारतीय। स्त्री प्रत्यय पुं-रूप से स्त्रीलिंग बनाता है — देव से देवी, छात्र से छात्रा। उपसर्ग प्रायः शब्द-वर्ग नहीं बदलता। प्रत्यय प्रायः वर्ग बदलता है — लिख् क्रिया है, लेखक संज्ञा है।
संधि ध्वनि मिलाती है। समास पद जोड़कर संक्षेप करता है। उपसर्ग आगे से अर्थ मोड़ता है। प्रत्यय पीछे से शब्द गढ़ता है। स्वागत = सु + आगत — सु उपसर्ग है और उ + आ से यण संधि भी है। संहार = सम् + हार — सम् उपसर्ग है और व्यंजन संधि भी है। हिमालय = हिम + आलय — दीर्घ संधि और तत्पुरुष। बचपन = बच्चा + पन — तद्धित प्रत्यय, समास नहीं। चारों औजार एक नहीं हैं।
इकाई 3 · लघु उत्तर
25. वाक्य किसे कहते हैं? अंग और पद-क्रम लिखिए। अर्थ और रचना से भेद बताइए।लघु
वाक्य सार्थक पदों का वह क्रम है जिससे पूरा भाव निकले। यदि वह आए आश्रित खंड है, पूरा वाक्य नहीं है। उद्देश्य वह है जिसके विषय में कुछ कहा जाए। विधेय वह है जो उद्देश्य के विषय में कहा जाए। राम विद्यार्थी है में विद्यार्थी पूरक है, कर्म नहीं। हिन्दी का पद-क्रम प्रायः कर्ता, कर्म, क्रिया है। विशेषण विशेष्य से पहले आता है। संबोधन वाक्य का अंग नहीं, पुकार है।
अर्थ की दृष्टि से भेद विधानार्थक, निषेधार्थक, प्रश्नार्थक, आज्ञार्थक और विस्मयादिबोधक हैं। रचना की दृष्टि से तीन भेद हैं। सरल वाक्य में एक क्रिया-सूत्र होता है। संयुक्त वाक्य दो स्वतंत्र खंडों को और, किंतु या या से जोड़ता है। मिश्र वाक्य में एक मुख्य और एक आश्रित उपवाक्य होता है — जो परिश्रम करेगा, वह सफल होगा। अर्थ से पाँच भेद हैं, रचना से तीन।
26. निम्नलिखित वाक्य शुद्ध कीजिए और दोष का नाम लिखिए।लघु
- यह लड़की अच्छा गाती है।
- मेरी बहन आया।
- अनेकों लोग आए।
- प्राण निकल गया।
- प्रत्येक छात्रों ने लिखा।
- राम ने जाता है।
- उसे को बुलाओ।
- तुम जाता है।
- वह वापस लौट आया।
- मैं आपका आभार हूँ।
1. शुद्ध — यह लड़की अच्छी गाती है। दोष — लिंग।
2. शुद्ध — मेरी बहन आई। दोष — लिंग।
3. शुद्ध — अनेक लोग आए। दोष — वचन। अनेक स्वयं बहुवचन है, इसलिए ओं नहीं लगता।
4. शुद्ध — प्राण निकल गए। दोष — वचन। प्राण बहुवचन चलता है।
5. शुद्ध — प्रत्येक छात्र ने लिखा। दोष — वचन। प्रत्येक एक-एक पर जाता है।
6. शुद्ध — राम जाता है। दोष — कारक। वर्तमान सामान्य में ने नहीं लगता।
7. शुद्ध — उसे बुलाओ। दोष — परसर्ग की पुनरुक्ति।
8. शुद्ध — तुम जाते हो। दोष — अन्वय।
9. शुद्ध — वह लौट आया। दोष — पुनरुक्ति। लौटना स्वयं वापस आने का अर्थ देता है।
10. शुद्ध — मैं आपका आभारी हूँ। दोष — उपयुक्त शब्द। आभार संज्ञा है; व्यक्ति आभारी होता है।
27. निम्नलिखित शब्द शुद्ध कीजिए।लघु
- अत्याधिक
- उज्जवल
- चिन्ह
- सदोपदेश
- विस्वविद्यालय
- अधयापक
- अनुसंशा
- परिस्रम
- श्रृंगार
- आशिर्वाद
1. अत्याधिक — अत्यधिक। अति + अधिक में यण से य् आता है, अतिरिक्त आ नहीं।
2. उज्जवल — उज्ज्वल। ज्वल में व् है।
3. चिन्ह — चिह्न।
4. सदोपदेश — सदुपदेश। सत् + उपदेश व्यंजन संधि है।
5. विस्वविद्यालय — विश्वविद्यालय।
6. अधयापक — अध्यापक।
7. अनुसंशा — अनुशंसा।
8. परिस्रम — परिश्रम।
9. श्रृंगार — शृंगार। श् + ऋ है, दोहरा र नहीं।
10. आशिर्वाद — आशीर्वाद।
28. निम्नलिखित के समानार्थक शब्द लिखिए — अग्नि, कमल, सूर्य, जल, आकाश, पृथ्वी।लघु
अग्नि — आग, अनल, ज्वाला, पावक, वह्नि।
कमल — पंकज, जलज, सरोज, नीरज, अरविंद।
सूर्य — रवि, भानु, दिवाकर, आदित्य, भास्कर।
जल — नीर, वारि, पानी, तोय, अंबु।
आकाश — गगन, नभ, अंबर, व्योम।
पृथ्वी — धरा, वसुधा, भूमि, धरती, अवनि।
समानार्थक शब्द अर्थ में निकट होते हैं, पूर्ण एक नहीं। अग्नि शास्त्रीय प्रयोग में आता है और आग घरेलू प्रयोग में।
29. समश्रुत भिन्नार्थक शब्द किसे कहते हैं? आठ जोड़ियाँ वाक्य सहित लिखिए।लघु
समश्रुत भिन्नार्थक वे शब्द हैं जो सुनने में निकट लगें, पर अर्थ में अलग हों।
1. कुल — वंश। उसके कुल में विद्वान् थे। कूल — किनारा। नदी का कूल टूट गया।
2. दिन — दिवस। दिन छोटा हो गया। दीन — गरीब। दीन की सहायता करो।
3. अन्न — अनाज। अन्न-जल आवश्यक है। अन्य — दूसरा। अन्य लोग एकत्र हों।
4. ओर — दिशा। इस ओर आओ। और — समुच्चय। राम और श्याम आए।
5. पत्र — चिट्ठी। उसका पत्र आ गया। पात्र — अधिकारी। वह पुरस्कार का पात्र है।
6. नीर — जल। कमल नीर में खिलता है। नीड़ — घोंसला। पक्षी नीड़ में बैठा।
7. कृपण — कंजूस। कृपण धन नहीं देता। कृपाण — तलवार। सैनिक ने कृपाण उठाया।
8. आदि — आरंभ। कहानी के आदि में नाम है। आदी — अभ्यस्त। वह परिश्रम का आदी है।
30. विलोम शब्द लिखिए — सुख, उदय, आयात, ज्ञान, उत्थान, आस्तिक, सरल, स्वदेश, लाभ, जय, शीत, प्रकाश। विलोम केवल आगे अ लगाना नहीं — उदाहरण से समझाइए।लघु
सुख–दुःख, उदय–अस्त, आयात–निर्यात, ज्ञान–अज्ञान, उत्थान–पतन, आस्तिक–नास्तिक, सरल–जटिल, स्वदेश–विदेश, लाभ–हानि, जय–पराजय, शीत–उष्ण, प्रकाश–अंधकार। उपसर्ग से भी विलोम बनते हैं — आदर–अनादर, न्याय–अन्याय, गुण–अवगुण, बल–दुर्बल।
विलोम अर्थ का उलटा शब्द है, शब्द के आगे अ लगाना मात्र नहीं। छोटा का विलोम बड़ा है, अछोटा नहीं। मित्र का विलोम शत्रु है। पढ़ना का न पढ़ना वाक्यांश है, विलोम शब्द नहीं। आना का विलोम जाना है और देना का लेना है।
31. किन्हीं छह मुहावरों का अर्थ लिखकर वाक्य बनाइए।लघु
1. आँख दिखाना — क्रोध से डाँटना। शिक्षक ने देर से आने पर आँख दिखाई।
2. नाक कटना — प्रतिष्ठा जाना। हार कर उसकी नाक कट गई।
3. कान भरना — चुगली करना। उसने प्राचार्य के कान भर दिए।
4. कमर कसना — तैयार होना। विद्यार्थी ने परीक्षा से पहले कमर कस ली।
5. हाथ मलना — पछताना। अवसर जाने पर वह हाथ मलता रहा।
6. मुँह की खाना — हारना। वाद-विवाद में उसने मुँह की खाई।
32. किन्हीं छह लोकोक्तियों का अर्थ लिखिए। मुहावरा और लोकोक्ति में अंतर बताइए।लघु
1. अधजल गगरी छलकत जाय — थोड़े ज्ञान से अहंकार बढ़ना।
2. एक अनार सौ बीमार — वस्तु थोड़ी, चाहने वाले बहुत।
3. अंधों में काना राजा — गुणहीनों में थोड़ा गुण वाला बड़ा लगना।
4. ऊँची दुकान फीका पकवान — दिखावा बड़ा, सार कम।
5. दूर के ढोल सुहावने — दूर की वस्तु अच्छी लगना।
6. नौ नकद न तेरह उधार — हाथ की नकदी उधार के बड़े वादे से बड़ी।
अंतर यह है कि मुहावरा वाक्य का अंश होता है और लोकोक्ति पूरा कथन होती है। मुहावरा वाक्य के भीतर बैठता है — शिक्षक ने आँख दिखाई। लोकोक्ति स्वतंत्र चलती है — अधजल गगरी छलकत जाय। मुहावरा रूढ़ क्रिया या दशा बताता है। लोकोक्ति नीति या लोक-अनुभव बताती है। दोनों पर्याय नहीं हैं।
इकाई 3 · दीर्घ उत्तर
33. वाक्य रचना और वाक्य शुद्धि विस्तार से समझाइए।दीर्घ
वाक्य सार्थक पदों का वह क्रम है जिससे पूरा भाव निकले। यदि वह आए आश्रित खंड है, पूरा वाक्य नहीं है। उद्देश्य वह है जिसके विषय में कुछ कहा जाए। विधेय वह है जो उद्देश्य के विषय में कहा जाए। बालक सोता है में बालक उद्देश्य है, सोता है विधेय। राम विद्यार्थी है में विद्यार्थी पूरक है, कर्म नहीं, क्योंकि है लगना-बनना जैसी क्रिया के साथ जाति या गुण पूरा करता है। हिन्दी का पद-क्रम प्रायः कर्ता, कर्म, क्रिया है। विशेषण विशेष्य से पहले आता है। संबोधन वाक्य का अंग नहीं, पुकार है।
अर्थ की दृष्टि से पाँच भेद हैं। विधानार्थक — सूर्य पूर्व से निकलता है। निषेधार्थक — वह आज नहीं आया। प्रश्नार्थक — तुम कहाँ जा रहे हो? आज्ञार्थक — बैठो। विस्मयादिबोधक — वाह, क्या दृश्य है! रचना की दृष्टि से तीन भेद हैं। सरल वाक्य में एक क्रिया-सूत्र होता है — पक्षी उड़ता है। संयुक्त वाक्य दो स्वतंत्र खंडों को और, किंतु या या से जोड़ता है — राम आया और श्याम गया। मिश्र वाक्य में एक मुख्य और एक आश्रित उपवाक्य होता है — जो परिश्रम करेगा, वह सफल होगा। यह वाक्य रचना से मिश्र है और अर्थ से विधानार्थक है। अर्थ से पाँच भेद हैं, रचना से तीन। दोनों सूचियाँ एक नहीं हैं।
वाक्य शुद्धि अशुद्ध वाक्य को मानक व्याकरण पर लाना है। लिंग की शुद्धि — यह लड़की अच्छी गाती है; मेरी बहन आई। वचन की शुद्धि — अनेक लोग आए, क्योंकि अनेक स्वयं बहुवचन है; प्राण निकल गए; प्रत्येक छात्र ने लिखा, क्योंकि प्रत्येक एक-एक पर जाता है। कारक की शुद्धि — राम जाता है, वर्तमान सामान्य में ने नहीं लगता; उसे बुलाओ, को दोहराना दोष है; मुझे जाना है। अन्वय की शुद्धि — तुम जाते हो; हम पढ़ते हैं; वे आते हैं। आदर में आप आइए और वे आए हैं बहुवचन जैसा रूप चलता है।
क्रम की शुद्धि — राम पत्र लिखता है; उसने लाल साड़ी खरीदी, विशेषण विशेष्य के पास रहता है। पुनरुक्ति काटनी चाहिए — वह लौट आया, क्योंकि लौटना स्वयं वापस आने का अर्थ देता है; कृपया बैठिए; यह सबसे उत्तम है, तम स्वयं उत्तम का चिह्न है; नया नवीन प्रयोग नहीं, नया प्रयोग। उपयुक्त शब्द — मैं आपका आभारी हूँ; आभार संज्ञा है, व्यक्ति आभारी होता है। वाक्य शुद्धि ढाँचा सुधारती है — लिंग, वचन, कारक, अन्वय, क्रम। शब्द शुद्धि वर्तनी और शब्द-चयन सुधारती है — अत्यधिक, उज्ज्वल, चिह्न। दोनों एक नहीं हैं।
34. शब्द शुद्धि तथा समानार्थक, समश्रुत और विलोम का अंतर उदाहरण सहित लिखिए।दीर्घ
शब्द शुद्धि शब्द के मानक रूप को स्थिर करती है। वर्तनी की शुद्धि ध्वनि और संधि से तय होती है। अत्याधिक अशुद्ध है और अत्यधिक शुद्ध है, क्योंकि अति + अधिक में यण से य् आता है, अतिरिक्त आ नहीं। उज्जवल अशुद्ध है और उज्ज्वल शुद्ध है, क्योंकि ज्वल में व् है। चिन्ह के स्थान पर चिह्न लिखा जाता है। सदोपदेश के स्थान पर सदुपदेश आता है — सत् + उपदेश व्यंजन संधि है, गुण संधि नहीं। विस्वविद्यालय के स्थान पर विश्वविद्यालय, अधयापक के स्थान पर अध्यापक, अनुसंशा के स्थान पर अनुशंसा, परिस्रम के स्थान पर परिश्रम लिखा जाता है। श्रृंगार अशुद्ध है और शृंगार शुद्ध है, क्योंकि श् + ऋ है, दोहरा र नहीं। आशिर्वाद के स्थान पर आशीर्वाद आता है। महत्व के स्थान पर महत्त्व, ग्यान के स्थान पर ज्ञान, परिक्षा के स्थान पर परीक्षा, अधिशाषी के स्थान पर अधिशासी लिखा जाता है।
प्रयोग की शुद्धि भी शब्द शुद्धि का अंग है। कृपया बैठिए शुद्ध है, कृपा करके बैठिए अशुद्ध है, क्योंकि कृपया और करके एक काम दो बार कहते हैं। मैं आपका आभारी हूँ शुद्ध है, मैं आपका आभार हूँ अशुद्ध है। नया नवीन प्रयोग नहीं चलता, क्योंकि नया और नवीन एक अर्थ हैं। वाक्य शुद्धि ढाँचा सुधारती है। शब्द शुद्धि वर्तनी और शब्द-चयन सुधारती है।
समानार्थक एक अर्थ के निकट कई शब्द हैं, पूर्ण एक नहीं। अग्नि — आग, अनल, ज्वाला, पावक। कमल — पंकज, जलज, सरोज। सूर्य — रवि, भानु, दिवाकर। जल — नीर, वारि, पानी। आकाश — गगन, नभ, अंबर, व्योम। पृथ्वी — धरा, वसुधा, भूमि। अग्नि शास्त्रीय प्रयोग में आता है और आग घरेलू प्रयोग में। समश्रुत भिन्नार्थक वे शब्द हैं जो सुनने में निकट लगें, पर अर्थ में अलग हों। कुल वंश है — उसके कुल में विद्वान् थे। कूल किनारा है — नदी का कूल टूट गया। दिन दिवस है। दीन गरीब है। अन्न अनाज है। अन्य दूसरा है। पत्र चिट्ठी है। पात्र अधिकारी है। नीर जल है। नीड़ घोंसला है।
विलोम विपरीत अर्थ का शब्द है — सुख–दुःख, उदय–अस्त, आयात–निर्यात, ज्ञान–अज्ञान, उत्थान–पतन, सरल–जटिल, स्वदेश–विदेश, लाभ–हानि, जय–पराजय, शीत–उष्ण, प्रकाश–अंधकार। उपसर्ग से भी विलोम बनते हैं — आदर–अनादर, न्याय–अन्याय, गुण–अवगुण। विलोम केवल आगे अ लगाना नहीं है। छोटा का विलोम बड़ा है, अछोटा नहीं। मित्र का विलोम शत्रु है। पढ़ना का न पढ़ना वाक्यांश है, विलोम शब्द नहीं। आना का विलोम जाना है और देना का लेना है।
तीनों एक वर्ग नहीं हैं। समानार्थक निकट अर्थ के कई नाम हैं। समश्रुत सुनने में निकट और अर्थ में दूर हैं। विलोम अर्थ का उलटा शब्द है। तीनों को एक सूची में मिलाना दोष है।
इकाई 4 · पत्र और प्रारूप
35. कार्यालयी पत्र के अंग लिखिए। शासकीय और अर्धशासकीय पत्र में अंतर स्पष्ट कीजिए।लघु
कार्यालयी पत्र के अंग ये हैं — पत्र-संख्या या संदर्भ, स्थान और दिनांक, प्रेषक का पद, सेवा में प्राप्तकर्ता का पद और कार्यालय, विषय, संबोधन, कलेवर, समापन, भवदीय, हस्ताक्षर तथा पदनाम, संलग्नक और प्रतिलिपि। कलेवर में पहले संदर्भ, फिर तथ्य, फिर निवेदन या निर्देश आता है।
शासकीय पत्र एक पद से दूसरे पद को जाता है। संबोधन महोदय होता है। भाषा निर्वैयक्तिक होती है। समापन भवदीय होता है। अर्धशासकीय पत्र उसी शासकीय काम पर नाम लेकर लिखा जाता है। संबोधन प्रिय श्री होता है। कलेवर में मैं और आप चलते हैं। समापन आपका या भवदीय हो सकता है। शासकीय पत्र फ़ाइल का नियमित पत्र है। अर्धशासकीय पत्र उसी फ़ाइल को शीघ्रता देने का पत्र है।
36. निविदा, विज्ञप्ति, अधिसूचना और परिपत्र में अंतर लिखिए।लघु
ये चारों प्रारूप हैं। पत्र प्रायः एक प्राप्तकर्ता को पूरा संदेश देता है। प्रारूप कई पाठकों या विधि के पाठ के लिए साँचा होता है। निविदा कार्य या आपूर्ति के लिए दरें माँगती है। इसमें धरोहर राशि, अंतिम तिथि और योग्यता लिखी जाती है। विज्ञप्ति जन या समाचार-माध्यम के लिए तथ्य-सूचना है। इसमें कौन, क्या, कब, कहाँ आता है; धरोहर नहीं होती। अधिसूचना सक्षम प्राधिकारी का विधिवत आदेश है। इसकी भाषा है — इसके द्वारा सूचित किया जाता है। यह बाध्यकारी होती है। परिपत्र एक ही निर्देश कई अधीनस्थ कार्यालयों को भेजता है। संबोधन समस्त प्राचार्य जैसा होता है। स्थिर वाक्य है — सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु।
37. जिला शिक्षा अधिकारी को संदर्भ ग्रंथों की आपूर्ति हेतु शासकीय पत्र लिखिए।कौशल
संख्या: प. 14/पुस्तक/2026
दिनांक: 10 सितंबर 2026
सेवा में,
जिला शिक्षा अधिकारी,
बीकानेर।
विषय: संदर्भ ग्रंथों की आपूर्ति।
महोदय,
आपके कार्यालय के पत्र संख्या 88/शिक्षा/2026 दिनांक 28 अगस्त 2026 के अनुसरण में निवेदन है कि राजकीय महाविद्यालय, बीकानेर के पुस्तकालय के लिए पंद्रह हिन्दी संदर्भ ग्रंथों की आवश्यकता है। अनुमानित व्यय निर्धारित मद से वहन योग्य है। कृपया आपूर्ति की स्वीकृति प्रदान करने का कष्ट करें।
भवदीय,
प्राचार्य
राजकीय महाविद्यालय, बीकानेर।
38. भवन-स्वीकृति शीघ्र कराने हेतु अर्धशासकीय पत्र लिखिए।कौशल
अर्धशासकीय संख्या 7/2026
दिनांक: 10 सितंबर 2026
श्री आर. के. गुप्ता,
जिला कलक्टर,
बीकानेर।
प्रिय श्री गुप्ता जी,
बीकानेर महाविद्यालय की भवन-स्वीकृति तीन महीने से लंबित है। विद्यार्थी छाया में कक्षा पढ़ रहे हैं। मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि फ़ाइल देखकर शीघ्र आदेश हो सके।
आपका,
प्राचार्य
राजकीय महाविद्यालय, बीकानेर।
39. पुस्तकालय लिपिक पद हेतु आवेदन पत्र लिखिए।कौशल
मकान संख्या 18, गंगानगर रोड, बीकानेर।
दिनांक: 10 सितंबर 2026
सेवा में,
प्राचार्य,
राजकीय महाविद्यालय, बीकानेर।
विषय: पुस्तकालय लिपिक पद हेतु आवेदन।
महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं रमेश कुमार, एम.ए. हिन्दी, उक्त रिक्त पद के लिए आवेदन करता हूँ। आयु चौबीस वर्ष है। हिन्दी टंकण का प्रमाण साथ है। महाविद्यालय की सूचना दिनांक 1 सितंबर 2026 के अनुसार यह पद खुला है। कृपया साक्षात्कार हेतु बुलाए जाने का कष्ट करें।
आवेदक,
रमेश कुमार
संलग्नक: अंकतालिका, टंकण प्रमाण।
40. तीन दिवस के अवकाश हेतु विद्यार्थी-आवेदन लिखिए।कौशल
मकान संख्या 18, गंगानगर रोड, बीकानेर।
दिनांक: 10 सितंबर 2026
सेवा में,
प्राचार्य,
राजकीय महाविद्यालय, बीकानेर।
विषय: तीन दिवस के अवकाश हेतु आवेदन।
महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं सीता शर्मा, बी.ए. द्वितीय सेमेस्टर, अनुक्रमांक 24105, 15 सितंबर से 17 सितंबर 2026 तक परिवार के विवाह-कार्य में घर जानी हूँ। कृपया इन तीन दिनों की छुट्टी स्वीकृत करने का कष्ट करें। अनुपस्थिति में सहपाठी से नोट ले लूँगी।
आवेदिका,
सीता शर्मा
बी.ए. द्वितीय सेमेस्टर, अनुक्रमांक 24105
41. पेयजल बंद रहने बाबत शिकायती पत्र लिखिए।कौशल
मकान संख्या 18, गंगानगर रोड, बीकानेर।
दिनांक: 10 सितंबर 2026
सेवा में,
अधिशासी अधिकारी,
नगर परिषद, बीकानेर।
विषय: वार्ड 12 में नल-कनेक्शन बंद रहने बाबत।
महोदय,
निवेदन है कि गंगानगर रोड स्थित मकान संख्या 18 में 5 सितंबर 2026 से पेयजल नहीं आ रहा है। 7 सितंबर को लाइनमैन को मौखिक सूचना दी गई, पर कार्य नहीं हुआ। परिवार पीने का जल बाहर से ला रहा है। कृपया तीन दिनों में कनेक्शन चालू कराने का आदेश दें और की गई कार्रवाई से अवगत कराएँ।
प्रार्थी,
सुरेश कुमार
मकान संख्या 18, गंगानगर रोड, बीकानेर।
42. हिन्दी व्याकरण की पचास प्रतियाँ मँगाने हेतु व्यावसायिक पत्र लिखिए।कौशल
सरस्वती पुस्तक भंडार, स्टेशन रोड, बीकानेर।
दिनांक: 10 सितंबर 2026
सेवा में,
प्रबंधक,
ज्ञान प्रकाशन, जयपुर।
विषय: हिन्दी व्याकरण की पचास प्रतियाँ।
महोदय,
कृपया कामताप्रसाद गुरु के हिन्दी व्याकरण की पचास प्रतियाँ रेल पार्सल से भेजें। बिल हमारे पते पर हो। भुगतान आदेश मिलने के पंद्रह दिनों में किया जाएगा। धन्यवाद।
भवदीय,
प्रबंधक
सरस्वती पुस्तक भंडार, बीकानेर।
43. महाविद्यालय की सीमा-दीवार मरम्मत हेतु निविदा सूचना लिखिए।कौशल
निविदा सूचना संख्या 12/भवन/2026
कार्य — राजकीय महाविद्यालय, बीकानेर की सीमा-दीवार मरम्मत।
अनुमानित लागत — चार लाख रुपये।
धरोहर राशि — दस हजार रुपये, बैंक ड्राफ्ट से, प्राचार्य के पदनाम पर।
प्रपत्र — कार्यालय से प्रातः 10 बजे से अपराह्न 3 बजे तक मिलेगा। मूल्य पाँच सौ रुपये।
अंतिम तिथि — 30 सितंबर 2026, दोपहर 3 बजे।
खोलने की तिथि — उसी दिन अपराह्न 4 बजे।
योग्यता — केवल पंजीकृत ठेकेदार। अधूरी निविदा अस्वीकृत की जाएगी।
संपर्क — प्राचार्य, राजकीय महाविद्यालय, बीकानेर।
शर्तें कार्यालय के सूचना-पट्ट पर देखी जा सकती हैं।
44. जिला पुस्तक मेले की विज्ञप्ति लिखिए।कौशल
विज्ञप्ति
बीकानेर, 12 सितंबर।
जिला पुस्तक मेला 20 से 22 सितंबर 2026 तक डूंगर महाविद्यालय प्रांगण, बीकानेर में लगेगा। आयोजन जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग संयुक्त रूप से करेंगे। प्रवेश निःशुल्क है। समय प्रतिदिन प्रातः 10 बजे से रात्रि 8 बजे तक रहेगा।
मेले में हिन्दी, अंग्रेज़ी और राजस्थानी की पुस्तकें उपलब्ध होंगी। विद्यार्थियों के लिए निबंध और वाचन प्रतियोगिता 21 सितंबर को अपराह्न 2 बजे निर्धारित है। नाम 18 सितंबर तक संबंधित प्राचार्य के माध्यम से भेजे जा सकते हैं।
प्रवक्ता: जनसंपर्क अधिकारी, जिला प्रशासन, बीकानेर।
45. पुस्तकालय समय संबंधी अधिसूचना लिखिए।कौशल
अधिसूचना संख्या एफ. 3/शिक्षा/2026
दिनांक: 1 सितंबर 2026
शिक्षा विभाग, राजस्थान।
इसके द्वारा सूचित किया जाता है कि राजकीय महाविद्यालयों के पुस्तकालय प्रातः 9 बजे से सायं 5 बजे तक खुले रहेंगे। यह आदेश जारी होने की तिथि से प्रभावी है।
हस्ताक्षर
सचिव, शिक्षा विभाग।
46. पुस्तकालय उपस्थिति-पंजी हेतु परिपत्र लिखिए।कौशल
परिपत्र संख्या 21/स्था/2026
दिनांक: 8 सितंबर 2026
समस्त प्राचार्य,
राजकीय महाविद्यालय, बीकानेर मंडल।
विषय: पुस्तकालय उपस्थिति-पंजी।
निर्देश —
(1) प्रत्येक विद्यार्थी प्रवेश पर पंजी में हस्ताक्षर करे।
(2) मासिक सार प्रत्येक माह की 5 तारीख तक जिला कार्यालय पहुँचे।
पालन 15 सितंबर से अनिवार्य है।
सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु।
भवदीय,
संयुक्त निदेशक, महाविद्यालय शिक्षा।
इकाई 5 · संक्षेपण, पल्लवन, निबंध
47. संक्षेपण किसे कहते हैं? नियम और विधि लिखिए।लघु
संक्षेपण मूल पाठ के सार को संक्षिप्त, क्रमबद्ध और अपनी भाषा में लिखना है। प्रचलित अनुपात एक तिहाई है। निर्देश में दूसरा अनुपात हो तो वही मान्य है। संक्षेपण मूल के वाक्य नहीं दोहराता, अर्थ दोहराता है। शीर्षक अनिवार्य है। अन्य पुरुष चलता है। सामान्यतः एक अनुच्छेद लिखा जाता है।
नियम ये हैं — मूल का केंद्र न छूटे, भाषा अपनी हो, उदाहरण और दोहराव कटें, निजी मत न जुड़े, अन्य पुरुष रहे, शीर्षक सार कहे, अनुपात बना रहे और व्याकरण शुद्ध हो। विधि यह है कि मूल दो बार पढ़ा जाए, अनावश्यक अंश काटे जाएँ, बचे बिंदु क्रम में जमाए जाएँ, एक अनुच्छेद अपनी भाषा में लिखा जाए, फिर शब्द गिनकर शीर्षक दिया जाए। संक्षेपण में मेरा मानना है नहीं लिखा जाता।
48. निम्नलिखित गद्यांश का उचित शीर्षक देकर संक्षेपण कीजिए।कौशल
महाविद्यालय का पुस्तकालय ज्ञान का स्थिर केंद्र है। अलमारियों में ग्रंथ चुपचाप प्रतीक्षा करते हैं। जो विद्यार्थी नित्य आता है, वह सूची से ग्रंथ चुनता है, नोट बनाता है और समय पर लौटाता है। जो यदा-कदा आता है, वह पत्रिका के पृष्ठ पलटकर निकल जाता है। यदि कक्ष में बातचीत चले, तो अध्ययन टूट जाता है। इसलिए तीन बातें अनिवार्य हैं — मौन, समय पर वापसी, और सूची से खोज। इनके बिना कक्ष भंडार रह जाता है, अध्ययन-स्थल नहीं। ग्रीष्म की छुट्टी में भी जो थोड़ी देर बैठता है, वह वर्ष भर के प्रश्न हल कर लेता है। जो शोर मचाता है, वह दूसरों का समय भी चुराता है।
शीर्षक: पुस्तकालय के तीन नियम
महाविद्यालय का पुस्तकालय ग्रंथों से ज्ञान देता है। नित्य आने वाला विद्यार्थी सूची, नोट और समय पर वापसी से लाभ उठाता है; यदा-कदा आने वाला नहीं। मौन टूटने पर अध्ययन टूटता है। मौन, समय पर लौटाना और सूची से खोजना — ये तीन नियम कक्ष को अध्ययन-स्थल बनाते हैं।
49. पल्लवन किसे कहते हैं? अंग लिखिए। संक्षेपण से अंतर बताइए।लघु
पल्लवन किसी सूत्र, उक्ति या लोकोक्ति का सोदाहरण विस्तार है। उसके चार अंग हैं — भूमिका में सूत्र का अपना अर्थ, व्याख्या में कारण, एक स्थूल उदाहरण और निष्कर्ष में सूत्र की पुष्टि। सूत्र का अर्थ उलटा नहीं किया जाता। अधजल गगरी छलकत जाय का पल्लवन थोड़े ज्ञान के अहंकार पर जाता है, गगरी के वर्णन पर नहीं। पल्लवन निबंध नहीं है, क्योंकि वह एक दी हुई पंक्ति से बँधा रहता है।
संक्षेपण लंबे पाठ को छोटा करता है। पल्लवन एक सूत्र को फैलाता है। संक्षेपण में निजी राय नहीं जुड़ती। पल्लवन सूत्र के भीतर तर्क जोड़ता है। संक्षेपण का रूप शीर्षक और एक अनुच्छेद है। पल्लवन का रूप चार अंग हैं। संक्षेपण मूल से छोटा होता है। पल्लवन सूत्र से बड़ा होता है।
50. “ज्ञान ही शक्ति है” का पल्लवन कीजिए।कौशल
शक्ति केवल बाहुबल का नाम नहीं है। बाहु से वस्तु उठाई जाती है, निर्णय नहीं लिया जाता। जो जानता है, वह चुन सकता है कि क्या करना है और क्या नहीं करना है। जो नहीं जानता, वह दूसरों के संकेत पर चलता है। सूत्र “ज्ञान ही शक्ति है” यही कहता है कि बल जानकारी के ढेर में नहीं, विवेक और प्रयोग में है।
ज्ञान जानकारी का ढेर मात्र नहीं है। वह क्रम, विवेक और प्रयोग है। पुस्तक का पृष्ठ तब शक्ति बनता है जब पाठक उसे काम में उतारता है। बिना दिशा की जानकारी बोझ है। बिना ज्ञान का साहस भटकाव बन जाता है। किसान खेत की मिट्टी जानता है, इसलिए बीज सही समय पर डालता है। वही जानना शक्ति है।
पुस्तकालय का नियमित पाठक स्रोत याद रखता है और उत्तर लिखता है। जो कक्ष में केवल बातें करता रहता है, वह अनुमान से लिखता है और चूक जाता है। परीक्षा में वही लिखता है जिसके पास इकाई का क्रम है। जिसके पास केवल नारा है, उसके पास शक्ति का नाम रह जाता है, शक्ति नहीं।
इसलिए ज्ञान ही शक्ति है। वह निर्णय की कुंजी है, शोर की नहीं। जो जानता है, वह द्वार खोलता है। जो नहीं जानता, वह द्वार को टेढ़ा कहता रहता है।
51. निबंध किसे कहते हैं? भेद, अंग और गुण लिखिए।लघु
निबंध गद्य की वह रचना है जिसमें एक सीमित विषय पर लेखक अपने विचार क्रम से रखता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल निबंध को व्यक्ति-व्यंजक गद्य कहते हैं। इसमें लेखक का दृष्टिकोण झलकता है, केवल सूचना नहीं रहती। निबंध संक्षेपण नहीं है, क्योंकि मूल पाठ नहीं दिया जाता। निबंध पल्लवन नहीं है, क्योंकि एक सूत्र बाध्य नहीं रहता।
भेद चार हैं। वर्णनात्मक निबंध दृश्य बाँधता है — पुस्तक मेला, नदी का घाट। विवरणात्मक निबंध घटना-क्रम बाँधता है — यात्रा। भावात्मक निबंध में अनुभूति प्रधान है — मित्रता, माँ। विचारात्मक निबंध में तर्क प्रधान है — अनुशासन, राजभाषा, समय का सदुपयोग। अंग तीन हैं — भूमिका, मध्य और निष्कर्ष। गुण हैं — विषय-एकता, क्रम, स्पष्ट भाषा और मौलिकता।
52. “समय का सदुपयोग” विषय पर निबंध लिखिए।कौशल
रूपरेखा — 1. भूमिका: समय लौटता नहीं। 2. अध्ययन का निश्चित घंटा। 3. व्यर्थ बात से बचाव। 4. विश्राम भी योजना है। 5. निष्कर्ष: सदुपयोग चयन है।
समय वह संपत्ति है जो एक बार निकलने के बाद लौटती नहीं। धन बाद में कमाया जा सकता है, पर बीता घंटा वापस नहीं आता। व्यस्त दिखना सदुपयोग नहीं है। सही काम को सही घड़ी देना सदुपयोग है। जो हर काम एक साथ उठाता है, वह समय नहीं चलाता, समय उसे घेर लेता है।
विद्यार्थी के लिए पहला चयन अध्ययन का निश्चित घंटा है। जो पुस्तकालय की समय-सारणी से बँधता है, वह पाठ टुकड़ों में पूरा करता है। इकाई नित्य थोड़ी पूरी होने से परीक्षा में वाक्य अपने होते हैं। जो काम को कल पर ढकेलता है, वह परीक्षा की रात एक साथ पहाड़ उठाता है और थककर गिरता है। कल पर टालना समय बचाना नहीं, समय खो देना है।
दूसरा चयन यह है कि क्या नहीं करना है। व्यर्थ बात, अनावश्यक भ्रमण और बिना काम का शोर घंटे चुराते हैं। जो कक्ष में केवल बातें करता रहता है, वह दूसरों का समय भी लेता है। सदुपयोग का अर्थ हर मिनट पढ़ना नहीं है। अर्थ यह है कि पढ़ने का घंटा पढ़ने का रहे और बात का घंटा बात का।
तीसरा चयन विश्राम है। थकान को काटना भी सदुपयोग है। लगातार बैठे रहना सदुपयोग नहीं। नींद, भोजन और थोड़ी सैर शरीर को लौटाते हैं, ताकि अगला घंटा काम कर सके। बिना विश्राम की मेहनत जल्दी टूटती है। बिना मेहनत का विश्राम आलस्य है। दोनों का संतुलन ही सदुपयोग है।
जो पढ़ने, आराम और आवश्यक काम में संतुलन रखता है, वही समय का स्वामी रहता है। सदुपयोग चयन है। जो चुनता है, वह समय चलाता है। जो नहीं चुनता, समय उसे चलाता है।
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